शनिवार, 9 मई 2015

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 02: : कमल सदाना


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 02

 
कमल सदाना



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक समर्पित है अभिनेता और निर्देशक कमल सदाना को। 



21 अक्तूबर 1990 की शाम की घटना है। 20 वर्षीय कमल सदाना की सालगिरह के पार्टी का आयोजन चल रहा है। कमल के पिता थे बृज सदाना जो एक फ़िल्म निर्माता थे और ’दो भाई’, ’यह रात फिर ना आएगी’, ’विक्टोरिया नंबर 203', 'उस्तादों के उस्ताद’, ’नाइट इन लंदन’, ’यकीन’, और ’प्रोफ़ेसर प्यारेलाल’ उनके द्वारा निर्मित चर्चित फ़िल्में थीं। तो उस शाम बृज सदाना और उनकी पत्नी सईदा ख़ान बेटे के जनमदिन की पार्टी की देख-रेख करने उस होटल में पहुँचे जहाँ पार्टी होनी थी। मिया-बीवी में अक्सर झगड़ा हुआ करता था, और उस दिन भी किसी बात को लेकर दोनों में मनमुटाव हो गया। बात इतनी बढ़ गई कि होटल में लगभग तमाशा खड़ा हो गया। दोनों घर वापस आए और जम कर बहस और लड़ाई होने लगी। बृज सदाना शराब के नशे में थे और बीवी के साथ गरमा-गरमी इतनी ज़्यादा हो गई कि उन्होंने अपना रिवॉल्वर  निकाला और बीवी पर गोली चला दी। सईदा ख़ान पल भर में गिर पड़ीं और उनकी मौत हो गई। बगल के कमरे में बेटी नम्रता पार्टी में जाने के लिए तैयार हो रही थीं। गोली की आवाज़ सुन कर वह दौड़ी आईं और नज़ारा देख कर ज़ोर ज़ोर से चीख पड़ीं। पिता ने पुत्री को भी नहीं बख्शा। रिवॉल्वर का निशाना बेटी पर लगाया और एक  बार फिर गोली चला दी। बेटी की भी पल भर में जीवन लीला समाप्त हो गई। बीवी और बेटी के बेजान शरीर को देख कर बृज सदाना के होश वापस आ गए। शराब का पूरा नशा उतर गया। पर बहुत देर हो चुकी थी। उनके पास बस एक ही रास्ता बचा था और उन्होंने वही किया। रिवॉल्वर अपने सर पर तान कर तीसरी गोली चला दी।

जन्मदिन की ख़ुशियाँ दोस्तों के साथ मनाने के बाद युवा कमल सदाना घर वापस पहुँचे। अपने माता-पिता और बहन की लाशों का नज़ारा देख कर वो पत्थर हो गए। पलक झपकते ही उनका पूरा हँसता-खेलता परिवार बिखर चुका था, सब तहस-नहस हो गया था। जन्मदिन पर माँ-बाप और बहन की मृत्यु के दर्द को सह पाना कोई आसान काम नहीं था। बृज सदानाह अपने बेटे को जल्द ही फ़िल्म में लौन्च करने वाले थे। उससे पहले ही सब ख़त्म हो गया। परिवार के जाने का ग़म तो एक बोझ था ही उनके दिल पर, साथ ही उनका भविष्य, उनका करीयर भी अंधकारमय हो गया। ग़लत राह पर चल निकलना बहुत आसान था एक बीस वर्षीय युवक के लिए। पर ऐसा नहीं हुआ। जो सपना पिता ने अपने बेटे के लिए देखा था, बेटा उसी राह पर चल निकला और पूरी जान लगा दी फ़िल्मों में मौका पाने के लिए। जब 1992 में राहुल रवैल निर्देशित फ़िल्म ’बेख़ुदी’ से सैफ़ अली ख़ान किसी कारणवश निकल गए तो नायक के रोल के लिए कमल सदाना को मौका मिल गया और यहीं से उनका फ़िल्मी सफ़र शुरू हो गया। ’बेख़ुदी’ के बाद ’रंग’, ’बाली उमर को सलाम’, ’हम हैं प्रेमी’, ’हम सब चोर हैं’, ’अंगारा’, ’निर्णायक’, ’मोहब्बत और जंग’, ’करकश’, और ’विक्टोरिया नं 203' जैसी फ़िल्मों में वो नज़र आए। ’विक्टोरिया नं 203’ का उन्होंने ही निर्माण किया 2007 में अपने पिता को श्रद्धांजलि स्वरूप। हाल ही में उन्होंने निर्देशित की महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’Roar - Tigers of the Sundarbans’, जिसे दुनिया भर से वाह-वाही मिली। कमल सदाना बिना किसी सहारे के अपने करीयर को निखारते चले जा रहे हैं। बीस साल के जन्मदिन की उस भयानक दुर्घटना के दर्द पर काबू पा कर अपनी ज़िन्दगी को आगे बढ़ाया और आज एक ऐसे मुकाम पर आ गए हैं कि हम वाक़ई यह कहते हैं कि कमल जी, तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी। रेडियो प्लेबैक इण्डिया की तरफ़ से कमल सदाना को झुक कर सलाम। 

आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



रविवार, 3 मई 2015

भैरव थाट के राग : SWARGOSHTHI – 217 : BHAIRAV THAAT



स्वरगोष्ठी – 217 में आज

दस थाट, दस राग और दस गीत – 4 : भैरव थाट

राग भैरव और जोगिया के स्वरों में शिव की आराधना


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने में समर्थ मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को वर्गीकृत किया जाता है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे भैरव थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग भैरव में निबद्ध एक खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे। साथ ही भैरव थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग जोगिया के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे।



पिछले अंकों में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि वर्तमान में प्रचलित थाट पद्धति पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित है। भातखण्डे जी ने गम्भीर अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि तत्कालीन प्रचलित राग-वर्गीकरण की जितनी भी पद्धतियाँ उत्तर भारतीय संगीत में प्रचार में आईं और उनके काल में अस्तित्व में थीं, उनके रागों के वर्गीकरण के नियम आज के रागों पर लागू नहीं हो सकता। गत कुछ शताब्दियों में सभी रागों में परिवर्तन एवं परिवर्द्धन हुए हैं, अतः उनके पुराने और नए स्वरूपों में कोई समानता नहीं है। भातखण्डे जी ने तत्कालीन राग-रागिनी प्रणाली का परित्याग किया और इसके स्थान पर जनक मेल और जन्य प्रणाली को राग वर्गीकरण की अधिक उचित प्रणाली माना। उन्हें इस वर्गीकरण का आधार न केवल दक्षिण में, बल्कि उत्तर में ‘राग-तरंगिणी’, ‘राग-विबोध’, ‘हृदय-कौतुक’, और ‘हृदय-प्रकाश’ जैसे ग्रन्थों में मिला।

आज हमारी चर्चा का थाट है- ‘भैरव’। इस थाट में प्रयोग किये जाने वाले स्वर हैं- सा, रे॒(कोमल), ग, म, प, ध॒(कोमल), नि । अर्थात ऋषभ और धैवत स्वर कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। थाट ‘भैरव’ का आश्रय राग ‘भैरव’ ही है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग ‘भैरव’ में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत का प्रयोग होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। राग में आरोह के स्वर- सारे(कोमल)गम प(कोमल) निसां तथा अवरोह के स्वर- सांनि(कोमल) पमग रे(कोमल) सा होते हैं। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल होता है। राग भैरव के स्वर समूह भक्तिरस का सृजन करने में समर्थ हैं। इस राग का स्वरूप स्पष्ट करने के लिए अब हम आपको विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे के स्वरों में राग भैरव का एक द्रुत खयाल प्रस्तुत करते हैं।

डॉ. प्रभा अत्रे
पिछले छह दशक की अवधि में भारतीय संगीत जगत की किसी ऐसी कलासाधिका का नाम लेना हो, जिन्होने संगीत-चिन्तन, मंच-प्रस्तुतीकरण, शिक्षण, पुस्तक-लेखन, शोध आदि सभी क्षेत्रों में पूरी दक्षता के साथ संगीत के शिखर को स्पर्श किया है, तो वह एक नाम विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे का ही है। प्रभा जी किराना घराने की गायकी का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रभा जी का जन्म महाराष्ट्र के पुणे शहर में 13 सितम्बर, 1932 को हुआ था। उनकी माँ इन्दिराबाई और पिता आबासाहेब बालिकाओं को उच्च शिक्षा दिलाने के पक्षधर थे। पारिवारिक संस्कारों के कारण ही आगे चल कर प्रभा अत्रे ने पुणे विश्वविद्यालय से विज्ञान विषयों के साथ स्नातक और यहीं से कानून में स्नातक की पढ़ाई की। इसके अलावा गन्धर्व महाविद्यालय से संगीत अलंकार (स्नातकोत्तर) और फिर सरगम विषय पर शोध कर ‘डॉक्टर’ की उपाधि से अलंकृत हुईं। यही नहीं उन्होने लन्दन के ट्रिनिटी कालेज ऑफ म्युजिक से पाश्चात्य संगीत का भी अध्ययन किया। कुछ समय तक उन्होने कथक नृत्य की प्रारम्भिक शिक्षा भी ग्रहण की। प्रभा जी के लिए ज्ञानार्जन के इन सभी स्रोतों से बढ़ कर थी, प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत ग्रहण की गई व्यावहारिक शिक्षा। गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत प्रभा जी को किराना घराने के विद्वान सुरेशबाबू माने और विदुषी (पद्मभूषण) हीराबाई बरोडकर से संगीत-शिक्षा मिली। कठिन साधना के बल पर उन्होने खयाल, तराना, ठुमरी, दादरा, गजल, भजन आदि शैलियों के गायन में दक्षता प्राप्त की। मंच-प्रदर्शन के क्षेत्र में अपार सफलता मिली ही, संगीत विषयक पुस्तकों के लेखन से भी उन्हें खूब यश प्राप्त हुआ। उनकी प्रथम प्रकाशित पुस्तक का शीर्षक था ‘स्वरमयी’। इससे पूर्व उनके शोधकार्य का विषय ‘सरगम’ था। डॉ. प्रभा अत्रे ने कई प्रतिष्ठित पदों पर कार्य किया। आकाशवाणी में प्रोड्यूसर, मुम्बई के एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और संगीत-विभागाध्यक्ष, रिकार्डिंग कम्पनी ‘स्वरश्री’ की निदेशक आदि कई प्रतिष्ठित पदों को उन्होने सुशोभित किया। संगीत के प्रदर्शन, शिक्षण-प्रशिक्षण और संगीत संस्थाओं के मार्गदर्शन में आज भी संलग्न हैं। आइए, प्रभा जी के स्वर में राग भैरव में निबद्ध एक रचना सुनते हैं। यह आदिदेव शिव की वन्दना करती एक मोहक रचना है, जो द्रुत तीनताल में निबद्ध है।


राग भैरव : ‘हे आदिदेव शिवशंकर, भोर भई जागो करुणाकर...’ : डॉ. प्रभा अत्रे




कमल बारोट 
महेन्द्र कपूर
‘भैरव’ थाट के अन्तर्गत आने वाले अन्य प्रमुख राग होते हैं- ‘अहीर भैरव’ ‘गौरी’ ‘नट भैरव’ ‘वैरागी’ ‘रामकली’, ‘गुणकली’, ‘कलिंगड़ा’, ‘जोगिया’, ‘विभास’ आदि। आज हम आपको राग जोगिया पर आधारित एक फिल्मी गीत भी सुनवा रहे हैं। राग जोगिया औड़व-षाड़व जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में गान्धार और निषाद तथा अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। राग में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत का प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी शुद्ध स्वर प्रयोग होते हैं। आरोह के स्वर हैं- सा रे(कोमल) म प (कोमल) सां और अवरोह के स्वर हैं- सां नि (कोमल) प (कोमल) म रे(कोमल) सा। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल होता है। राग जोगिया के स्वरों का सार्थक प्रयोग 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के एक गीत में संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने किया था। यह गीत वास्तव में शिव वन्दना है। अनेक विद्वानो का मत है कि इसकी गीत और संगीत रचना स्वयं तानसेन ने की थी। फिल्म में यह गीत कमल बारोट और महेन्द्र कपूर की आवाज़ में है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग जोगिया : ‘हे नटराज गंगाधर...’ : कमल बारोट और महेन्द्र कपूर : फिल्म संगीत सम्राट तानसेन





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 217वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको पचास के दशक की फिल्म में शामिल एक राग आधारित गीत का अंश एक उस्ताद गायक की आवाज में सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 220 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 - क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान रहे है? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 9 मई, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 217वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 215वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1977 में प्रदर्शित फिल्म ‘भूमिका’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग तिलक कामोद, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- अद्धा त्रिताल या पंजाबी ठेका और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका प्रीति सागर। इस बार की पहेली में हमारे दो नए श्रोता / पाठकों ने भाग लिया है। दिल्ली की दिशा भटनागर ने दूसरे और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर दिया है। किसी अज्ञात स्थान से प्रसीत मुखर्जी ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर दिया है। श्री मुखर्जी से अनुरोध है कि भविष्य में पहेली का उत्तर ई-मेल से ही दिया करें। उनका COMMENT में दिया गया उत्तर हमने शनिवार तक प्रकाशित होने से रोक दिया था। इसके साथ ही जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिया है। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ जारी है। श्रृंखला के आज के अंक में हमने आपसे भैरव थाट और और उसके रागों पर सोदाहरण चर्चा की। अगले अंक से हम एक और थाट के साथ उपस्थित होंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फर्माइशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 




शनिवार, 2 मई 2015

"यह कहाँ आ गए हम..." और "हम कहाँ खो गए..." गीतों का आपस में क्या सम्बन्ध है?


एक गीत सौ कहानियाँ - 58
 

यह कहाँ आ गए हम...’




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 58-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म ’सिलसिला’ के मशहूर गीत "ये कहाँ आ गए है..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर और अमिताभ बच्चन ने गाया था। 


फ़िल्म ’सिलसिला’ यश चोपड़ा की एक महत्वाकांक्षी फ़िल्म थी जो बॉक्स ऑफ़िस पर असफल रही। पर फ़िल्म के गीत-संगीत का पक्ष ज़बरदस्त था। संगीतकार जोड़ी शिव-हरि ने पहली बार किसी फ़िल्म में बतौर संगीतकार काम किया इस फ़िल्म में। लता मंगेशकर और अमिताभ बच्चन के गाए इस असाधारण और अद्वितीय गीत के बारे में जानिए शिव-हरि के पंडित शिव कुमार शर्मा के मुख से - "आपने एक चीज़ पे ग़ौर किया होगा, यह एक ’अन-यूज़ुअल’ गीत है। मैं आपको इसका बैकग्राउण्ड बताऊँगा कि यह गाना कैसे बना। शुरू में यश जी ने कहा कि मैं कुछ ऐसा करना चाहता हूँ कि नायक अपने ख़यालों में बैठा हुआ है और कुछ पोएट्री लिख रहा है, या पोएट्री रीसाइट कर रहा है, शेर-ओ-शायरी कुछ, और बीच में कुछ आलाप ले आएँगे, लता जी की आवाज़ में कुछ आलाप ले आएँगे बीच बीच में, ऐसा कुछ। तो इस तरह का सोच कर के शुरू किया कि थोड़ा म्युज़िक रहेगा, थोड़ी शेर-ओ-शायरी होगी, और फिर कुछ बीच में आलाप आएगा। यह बिल्कुल नहीं सोचा था कि इस तरह का गाना बनेगा। बनते-बनते, जैसा होता है कि उस ज़माने में अमिताभ बच्चन, अभी भी उतने ही बिज़ी हैं, उस ज़माने की क्या बात कहें, कि वो बारह-एक बजे जब उनके शूटिंग्‍ की शिफ़्ट ख़त्म होती थी, तो वो आते थे, और फिर आकर के हमारे साथ बैठते थे क्योंकि उन्होंने गाने भी गाए हैं, होली का जो गाना है, और "नीला आसमाँ", तो यह गाना जब बनने लगा तो उसकी शुरुआत ऐसे ही हुई, बनते बनते कुछ उसमें धुन का ज़िक्र जब आया, तो जावेद अख़्तर इसमें गाने लिखे, जावेद अख़्तर साहब की यह पहली फ़िल्म थी बतौर गीतकार। तो वो बैठे हुए थे तो वो बीच में उनकी ही सारी नज़में हैं जो बच्चन साहब पढ़े हैं। तो जब एक धुन गुनगुना रहे थे हम लोग तो सोचा कि इसके उपर बोल आ जाएँ तो कैसा लगेगा! तो धीरे धीरे जब बोल आया तो लगा कि अस्थायी बन गई, ऐसा करते हैं कि यह जो नज़्म है, जो शेर पढ़ रहे हैं, उसको हम ऐसा इस्तमाल करते हैं जैसे इन्टरल्यूड म्युज़िक होता है, जैसे इन्ट्रोडक्शन म्युज़िक होता है। ऐसे करते करते इसकी शक्ल ऐसी बनी। और वह एक असाधारण गाना बन गया कि पोएट्री और गाना साथ में चल रहा है लेकिन वह एक के साथ एक जुड़ा हुआ है, और वह बात आगे बढ़ रही है। पोएट्री कह रही है, गाने में नायिका की जो सिंगिंग् है वह उसको आगे बढ़ाती है। तो यह इस क़िस्म से, मेरे ख़याल में इस क़िस्म का गाना फिर किसी ने दुबारा कोशिश ही नहीं की और इसमें जो इन्स्ट्रूमेन्टेशन हुआ था, कुछ कोरस आवाज़ें ली, तो वह पूरा जो उसका माहौल बना है, वह आज इस गाने को बने हुए इतने साल हो गए हैं, पर अभी भी वह फ़्रेश लगता है।"

जावेद अख़्तर का कहना है, "मैं गीतकार नहीं था, ज़बरदस्ती बना दिया गया। मैं तो फ़िल्में लिखा करता था। यश जी एक दिन मेरे घर आए, वो मुझसे उनकी फ़िल्म ’सिलसिला’ के लिए एक गीत लिखवाना चाहते थे। मैंने साफ़ इनकार कर दिया, कहा कि मैं पोएट्री सिर्फ़ अपने लिए करता हूँ, फ़िल्म के लिए नहीं लिख सकता। लेकिन वो तो पीछे ही पड़ गए। इसलिए ना चाहते हुए भी मैं एक गीत लिखने के लिए राज़ी हो गया। मैंने उनसे कहा कि मुझे इसके लिए कोई क्रेडिट नहीं चाहिए क्योंकि मैंने सोचा कि वो लोग मुझे एक ट्यून सुना देंगे और मुझसे उस पर गाना लिखने की उम्मीद करेंगे, अगर लिख ना पाया तो क्या होगा? मुझे फिर यश जीने शिव-हरि से एक दिन मिलवा दिया, वो धुन सुनाते गए और शाम तक मैं "देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए" लिख चुका था। फिर मैंने इस फ़िल्म में कुल तीन गीत लिखे, यूं कह सकते हैं कि मुंह में ख़ून लग गया था। बाक़ी के दो गीत थे "नीला आसमाँ सो गया" और "ये कहाँ आ गए हम"। शबाना जी को "यह कहाँ आ गए हैम" बहुत पसन्द है और वो अक्सर इसे गुनगुनाती हैं।"

फ़िल्म ’सिलसिला’ साल 1982 की फ़िल्म थी। इसी वर्ष एक फ़िल्म आई थी ’वक़ील बाबू’। निर्माता थे जवाहर कपूर। फ़िल्म में गीत लिख रहे थे आनन्द बक्शी और संगीतकार थे लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल। फ़िल्म की कहानी के मुताबिक तीन गीत बने और रेकॉर्ड हो चुके थे। पर ये सभी गीत बिल्कुल साधारण क़िस्म के बने। कोई ख़ास बात नहीं थी उनमें। जवाहर कपूर को इन गीतों से बहुत निराशा हुई, पर आनन्द बक्शी और लक्ष्मी-प्यारे से कहने में हिचकिचा रहे थे। पर उसी समय जैसे ही फ़िल्म ’सिलसिला’ के गाने रिलीज़ हुए, उनकी निराशा ग़ुस्सा बन कर उमड़ पड़ी। उनके मुख से निकल गया कि बेकार ही मैंने आनन्द बक्शी और लक्ष्मी-प्यारे जैसे दिग्गजों को फ़िल्म में लिया, इनसे बेहतर तो जावेद अख़्तर और शिव-हरि जैसे नए फ़नकार हैं जिन्होंने ’सिलसिला’ में कमाल का काम किया। इतना ही नहीं जवाहर कपूर ने बक्शी साहब और लक्ष्मी-प्यारे से साफ़ कह दिया कि उन्हें अपनी इस फ़िल्म में "यह कहाँ आ गए हम" जैसा एक गीत चाहिए। तब जाकर "हम कहाँ खो गए, तुम कहाँ खो गए" गीत बना जिसे लता मंगेशकर ने गाया और बीच बीच में शशि कपूर की शायरी डाली गई जिस तरह से ’सिलसिला’ के गीत में अमिताभ बच्चन पढ़ते हैं। गीत बहुत अच्छा बना और जवाहर कपूर का ग़ुस्सा ठण्डा हुआ। ’वकील बाबू’ फ़िल्म बुरी तरह असफल रही पर आज अगर इस फ़िल्म को याद किया जाता है तो सिर्फ़ इस गीत की वजह से। लीजिए, अब आप ये दोनों गीत सुनिए, पहले फिल्म 'वकील बाबू' का और फिर फिल्म 'सिलसिला' का गीत।

फिल्म - वकील बाबू : 'हम कहाँ खो गए...' : लता मंगेशकर और शशि कपूर


फिल्म - सिलसिला : 'ये कहाँ आ गए हम...' : लता मंगेशकर और अमिताभ बच्चन 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

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