Saturday, February 7, 2015

"हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ..." - जानिये, किस भागमभाग में रेकॉर्ड हुआ था यह गाना


एक गीत सौ कहानियाँ - 52
 

हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ- 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 52वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'एक मुट्ठी आसमाँ' के शीर्षक गीत "हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ..." के बारे में जिसे किशोर कुमार ने गाया था।


1973 की एक ऑफ़-बीट फ़िल्म थी 'एक मुठी आसमाँ'। निर्माता, निर्देशक व लेखक विरेन्द्र सिन्हा निर्मित व निर्देशित यह एक कम बजट की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे विजय अरोड़ा, योगिता बाली, प्राण, राधा सलूजा, महमूद आदि। वीरेन्द्र सिन्हा मूलत: एक संवाद लेखक थे जिन्होंने 'हिमालय की गोद में', 'दो बदन', 'मिलन', 'कल आज और कल' और 'ज़हरीला इन्सान' जैसी चर्चित फ़िल्मों के संवाद लिखे हैं। बतौर निर्माता उनकी केवल तीन फ़िल्में आयीं - 'बुनियाद', 'ज़हरीला इन्सान' और 'एक मुट्ठी आसमाँ'। किशोर कुमार की आवाज़ के प्रति अत्यधिक लगाव के कारण वीरेन्द्र सिन्हा ने अपनी इन तीनों फ़िल्मों में उन्हें गवाया। 1972 की फ़िल्म 'बुनियाद' के बुरी तरह असफल होने के बाद, 'एक मुट्ठी आसमाँ' के लिए उनका बजट और कम हो गया। इतनी तंग हालत थी कि सोच विचार के बाद यह निर्णय लिया गया कि फ़िल्म में केवल एक ही गीत रखा जायेगा, जो फ़िल्म का शीर्षक गीत भी होगा और किशोर कुमार की आवाज़ में ही होगा। इस गीत के अलग अलग अन्तरे पूरे फ़िल्म में कई बार आते रहेंगे तो गीत की कमी पूरी होती रहेगी। इस एक गीत के लिए गीतकार इन्दीवर और संगीतकार मदन मोहन को कार्यभार सौंपा गया। फ़िल्म की कहानी और अलग-अलग सिचुएशन के हिसाब से इन्दीवर ने गीत के सारे अन्तरे लिखे और जब सारे अन्तरे और इन्टरल्यूड म्युज़िक को जोड़ा गया तो गीत की कुल अवधि बनी करीब करीब 9 मिनट और 25 सेकण्ड। गीत का एक हिस्सा प्राण पर फ़िल्माया गया और बाक़ी नायक विजय अरोड़ा पर। यह गीत बन कर तैयार हो गया, पर इस फ़िल्म से जुड़े सभी को केवल एक गीत वाली बात खटक रही थी। सभी को कम से कम एक डुएट गीत की ज़रूरत महसूस हो रही थी क्योंकि फ़िल्म में एक नहीं दो दो नायिका मौजूद थीं। ऐसे में जब इन्दीवर और मदन मोहन ने "प्यार कभी कम ना करना सनम" जैसा एक श्योर-शॉट हिट गीत बना डाले तो वीरेन्द्र सिन्हा भी इसे रेकॉर्ड और पिक्चराइज़ेशन  करने का फ़ैसला लिया। किशोर दा तो थे ही, पर इस युगल गीत के लिए लता मंगेशकर को गवाने का बजट विरेन्द्र सिन्हा के पास नहीं था। इसलिए वाणी जयराम को इस गीत के लिए चुन लिया गया जिन्होंने हाल ही में 'गुड्डी' में गीत गा कर हिन्दी फ़िल्म इण्डस्ट्री में हलचल पैदा कर दी थी। और यह डुएट फ़िल्माया गया विजय अरोड़ा और राधा सलूजा पर। तो इस तरह से 'एक मुट्ठी आसमाँ' में दो गीत रखे गये।

किशोर कुमार और मदन मोहन
अब ज़िक्र 'एक मुट्ठी आसमाँ' के शीर्षक गीत के रेकॉर्डिंग की। मदन मोहन ने किशोर कुमार से रेकॉर्डिंग की बात की, उन्हें रेकॉर्डिंग की तारीख़ बतायी और किशोर कुमार ने उन्हें हाँ भी कर दी। जब रेकॉर्डिंग की तारीख़ करीब आयी तो किशोर कुमार बड़े धर्मसंकट में फँस गये। दरअसल बात यह थी कि रेकॉर्डिंग की जो तारीख़ तय हुई थी, उसी दिन किशोर कुमार को शाम चार बजे की फ़्लाइट से विदेश यात्रा पर जाना था। उन्हें शोज़ के लिए एक ओवरसीस ट्रिप पर जाना था। सिर्फ़ यही बात होती तो सुबह रेकॉर्डिंग ख़त्म करके वो शाम की फ़्लाइट पकड़ सकते थे, पर बात यह थी कि उसी दिन उन्होंने राहुल देव बर्मन को भी रेकॉर्डिंग के लिए सुबह का समय दे रखा था। इतनी बड़ी गड़बड़ किशोर दा ने कैसे की, यह अब बताना मुश्किल है। इतनी टाइट शिड्यूल के बावजूद उन्होंने ना तो मदन मोहन की रेकॉर्डिंग कैंसिल की और ना ही पंचम की। वो किसी को भी निराश नहीं करना चाहते थे और उन्हें पता था कि रेकॉर्डिंग कैंसिल करने का मतलब निर्माता के पैसों की बरबादी करना है, जो वो नहीं चाहते थे। ख़ैर, रेकॉर्डिंग का वह दिन आ गया। मदन मोहन के गाने की रेकॉर्डिंग 'फ़ेमस स्टुडियो' में होनी थी, और पंचम की रेकॉर्डिंग 'फ़िल्म सेन्टर' में। दोनों जगह एक दूसरे से काफ़ी दूर थे। किशोर कुमार को सुबह 11 बजे तक पंचम के साथ रेकोर्डिंग करनी थी और उसके बाद उन्हें मदन जी के रेकॉर्डिंग पर पहुँच जाना था। एयरपोर्ट पर विशेष सन्देश पहुँचाया भी गया था कि उन्हें 'चेक-इन' करने में विलम्ब हो सकता है, तो यह बात ध्यान में रखी जाये। 2 बजे तक रेकॉर्डिंग ख़त्म करके उन्हें सीधे एयरपोर्ट की तरफ़ निकलना था, ऐसी तैयारी के साथ किशोर दा घर से निकले थे। पर सब कुछ योजना के अनुसार कहाँ हो पाता है भला? पंचम की रेकॉर्डिंग शुरू तो समय पर ही हुई थी पर समय लम्बा खींच गया, और किशोर दा भी उसमें ऐसे मगन हो गए कि 11 कब बज गये उन्हें पता ही नहीं चला। नतीजा यह हुआ कि उन्हें मदन मोहन की रेकॉर्डिंग में जाने का ख़याल ही नहीं आया। उधर 'फ़ेमस स्टुडियो' में मदन मोहन रेकॉर्डिंग की सारी तैयारी कर किशोर का इन्तज़ार कर रहे थे। दो घन्टे तक इन्तज़ार करने पर जब किशोर कुमार नहीं आये तो मदन जी का पारा थोड़ा खिसकने लगा। अपने एक सहायक को बुलवाने भेजा। वो शख्स वहाँ पहुँचकर किशोर कुमार को जब बताया कि मदन साहब उनका स्टुडियो में इन्तज़ार कर रहे हैं गुस्से में, तो किशोर कुमार के होश ठिकाने आ गये। दोपहर हो चुकी थी। शाम को फ़्लाइट भी पकड़नी थी। और इधर गाने का कुछ काम बचा हुआ था। अब करें तो क्या करें! तब किशोर कुमार ने सोचा कि पंचम तो दोस्त है, उसे तो वो किसी न किसी तरह सम्भाल ही लेंगे, मगर मदन मोहन को सम्भालना भारी पड़ जायेगा। इसलिए वो पंचम के इधर-उधर होते ही चुपचाप पीछे के दरवाज़े से भागे और सीधे 'फ़ेमस स्टुडियो' पहुँच गये। वहाँ पहुँच कर मदन मोहन जी से माफ़ी माँगी, और रेकॉर्डिंग शुरू की। अब इधर जब पंचम को पता चला कि किशोर स्टुडियो में दिख नहीं रहे हैं तो उन्होंने किशोर की तलाश शुरू कर दी। काफ़ी देर खोजने के बाद पंचम को पता चला कि मदन जी का एक सहायक वहाँ आया था और उन्हें 'फ़ेमस स्टुडियो' ले गये हैं। अब पंचम भागे 'फ़ेमस स्टुडियो'। पहुँच कर देखा कि किशोर कुमार मदन जी का गाना रेकॉर्ड कर रहे थे। अब दोनो म्युज़िक डिरेक्टर्स को एक साथ देख कर किशोर कुमार डर गये। वो तुरन्त पंचम के पास आये और उनसे नुरोध किया कि उन्हें थोड़ा समय दे दो, बस इनका गाना पूरा करते ही तुम्हारे पास आता हूँ और तुम्हारा गाना पूरा करके ही मैं फ़्लाइट पकड़ूंगा। तो इस तरह किशोर ने पंचम को किसी तरह शान्त करके वापस भेज दिया, और मदन मोहन के पास जाकर बोले कि माफ़ कीजिये मैं आपकी रेकॉर्डिंग के बारे में भूल ही गया था और उधर पंचम का गाना भी अधूरा छोड़ कर आया हूँ; अगर हो सके तो थोड़ा जल्दी कर लीजिये ताकि विदेश जाने से पहले उसका गाना भी रेकॉर्ड हो जाये वरना वो अटक जायेगा। तब मदन मोहन ने फ़टाफ़ट रेकॉर्डिंग शुरू की और एक टेक में ही यह इतना लम्बा गीत रेकॉर्ड हो गया, और बन गया किशोर कुमार का एक मास्टरपीस गीत। किशोर वहाँ से फ़टाफ़ट पंचम के पास भागे और उनका गाना भी कम्प्लीट किया। और इस तरह भागमभाग में रेकॉर्ड हुए दो गीत। एक तो था "हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ", पर पंचम का वह कौन सा गीत था यह मैं नहीं खोज पाया। क्या आप में से किसी को पता है कि वह दूसरा गीत कौन सा था जो उस दिन पंचम के वहाँ रेकॉर्ड हुआ था? आपको यदि राहुलदेव बर्मन के उस गीत की जानकारी हो तो नीचे दिये गए ई-मेल आई.डी. पर अवश्य सूचित करें। और अब आप 'एक मुट्ठी आसमाँ' का वह गीत सुनिए।

फिल्म एक मुट्ठी आसमाँ : 'हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ...' : किशोर कुमार : संगीत मदन मोहन : गीत इन्दीवर 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, February 1, 2015

धमार के रंग : राग केदार के संग : SWARGOSHTHI – 205 : DHAMAR



स्वरगोष्ठी – 205 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : ध्रुपद – 3

‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम सम्मुख हो क्यों न खेलो होरी...’ 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की तीसरी कड़ी मे मैं कृष्णमोहन मिश्र हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से जो भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धांतों के अनुकूल धारा थी उसे स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। भारतीय संगीत की सबसे प्राचीन और वर्तमान में उपलब्ध संगीत शैली है, ध्रुपद अथवा ध्रुवपद। पिछली कड़ी में हमने ध्रुपद बन्दिश के विषय में चर्चा की थी। आज के अंक में हम आपसे ध्रुपद शैली के अन्तर्गत धमार गीत पर चर्चा करेंगे और सुप्रसिद्ध युगल गायक गुण्डेचा बन्धुओं की आवाज़ में एक राग केदार का एक रसपूर्ण धमार प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके अलावा पार्श्वगायक मन्ना डे का गाया एक फिल्मी ध्रुपद भी प्रस्तुत करेंगे। 


ध्रुपद अंग की गायकी में निबद्ध गीतों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। निबद्ध गीतों के विषयवस्तु में ईश्वर की उपासना, साकार और निराकार, दोनों प्रकार से की गई है। इसके अलावा ध्रुपद गीतों में आश्रयदाता राजाओं और बादशाहों की प्रशस्ति, पौराणिक आख्यान, प्रकृति चित्रण और विविध पर्वों और सामाजिक उत्सवों का उल्लेख भी खूब मिलता है। सुप्रसिद्ध संगीत चिन्तक और दार्शनिक ठाकुर जयदेव सिंह ने ‘भारतीय संगीत के इतिहास’ विषयक पुस्तक में यह भी उल्लेख किया है कि सोलहवीं शताब्दी से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक तक ध्रुपद गीतों के साथ नृत्य और अभिनय का चलन भी था। इस उल्लेख का सीधा सा अर्थ है कि उस काल में ध्रुपद शैली लोकजीवन से गहराई तक जुड़ी हुई थी। ध्रुपद शैली के अन्तर्गत ही गीत का एक प्रकार है, जिसे आज हम ‘धमार’ के नाम से जानते हैं। धमार नाम का उल्लेख ‘संगीत शिरोमणि’ में मिलता है। इस ग्रन्थ में ‘धम्माली’ नाम का उल्लेख है। धमाल, धम्माल अथवा धम्माली शब्द से उल्लास से परिपूर्ण नृत्य का स्पष्ट आभास होता है। इस गीत शैली के साहित्य में आज भी होली पर्व के उमंग और उल्लास की अभिव्यक्ति की जाती है। लोक शैली का स्पर्श होने और पर्व विशेष के परिवेश का यथार्थ चित्रण होने के कारण ‘धमार’ या ‘धमाल’ नामकरण इस गीत शैली के लिए सार्थक है। ब्रज के गोप-गोपिकाओं के साथ कृष्ण के होली खेलने का प्रसंग धमार गीतों में प्रमुख रूप से उकेरा जाता है। यह गीत शैली चौदह मात्रा के ताल में गायी जाती है। धमार एक प्रकार की गायकी भी है और एक ताल विशेष का नाम भी है। यह पखावज पर बजने वाला १४ मात्रा का ताल है, जिसकी संगति धमार गायन में होती है। धमार की रचनाओं में अधिकतर राधा-कृष्ण की होली और फाल्गुनी परिवेश का चित्रण होता है। गम्भीर प्रवृत्ति के रागों की अपेक्षा चंचल प्रवृत्ति के रागों में धमार की प्रस्तुतियाँ मन को अधिक लुभातीं हैं। आज हम आपको चर्चित युगल गायक रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा बन्धुओं द्वारा राग केदार में प्रस्तुत धमार सुनवा रहे हैं। पखावज पर अखिलेश गुण्डेचा ने धमार ताल में संगति की है। हमारे अनुरोध पर ‘स्वरगोष्ठी’ के श्रोताओं के लिए गुण्डेचा बन्धुओं ने इस धमार गीत को स्वयं हमे उपलब्ध कराया है।


धमार राग केदार : ‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम...’ : रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा




धमार गीतों में उपज का काम अधिक होता है। यह लय-प्रधान शैली है। इसके विपरीत ध्रुपद बन्दिश की गायकी ध्रुपद बन्दिश में गम्भीरता होती है, जबकि धमार गायकी में चंचलता होती है। पिछले अंक में हमने आपको 1943 की फिल्म ‘तानसेन’ में शामिल किये गए एक प्राचीन ध्रुपद का गायन प्रसिद्ध गायक-अभिनेता कुन्दनलाल सहगल के स्वर मे सुनवाया था। तानसेन के गुरु और प्रसिद्ध सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास की यह रचना 1962 में बनी फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ में भी शामिल किया गया था। दोनों फिल्मों के इस गीत का स्थायी तो समान है, किन्तु अन्तरे के शब्दों में थोड़ा परिवर्तन किया गया है। फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के संगीतकार थे एस.एन. त्रिपाठी और यह गीत पार्श्वगायक मन्ना डे की आवाज़ में है। फिल्म का यह ध्रुपद गीत राग यमन कल्याण की अनुभूति कराता है। आप इस फिल्मी ध्रुपद गीत का आनन्द लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ध्रुपद राग यमन कल्याण : “सप्तसुरन तीन ग्राम...’ : मन्ना डे : फिल्म – संगीत सम्राट तानसेन






संगीत पहेली



‘स्वरगोष्ठी’ के 205वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक वाद्य संगीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन प्रश्नों में से कोई दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 210 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – यह कौन सा वाद्य है? वाद्य का नाम बताइए।

2 – संगीत वाद्य पर यह कौन सा राग बजाया जा रहा है? राग का नाम बताइए।

3 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए। 
 


आप उपरोक्त तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 7 फरवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 207वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 203वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको गुण्डेचा बन्धुओं की आवाज़ में एक ध्रुपद बन्दिश का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भूपाली और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- सूल ताल। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ जारी है। श्रृंखला पहले हिस्से में हम ध्रुपद शैली का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की विभिन्न शैलियों का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला में आप भी योगदान कर सकते हैं। भारतीय संगीत की किसी शैली पर अपना परिचयात्मक आलेख अपने नाम और परिचय के साथ हमारे ई-मेल पते पर भेज दें। आप अपनी फरमाइश या अपनी पसन्द का आडियो क्लिप भी हमें भेज सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी। 



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Saturday, January 31, 2015

"महलों का राजा मिला..." - इस गीत के माध्यम से श्रद्धांजलि दी रोशन साहब की पत्नी ने उन्हें



एक गीत सौ कहानियाँ - 51
 

महलों का राजा मिला कि रानी बेटी राज करेगी...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 51वीं कड़ी में आज जानिए फ़िल्म 'अनोखी रात' के मशहूर गीत "महलों का राजा मिला कि रानी बेटी राज करेगी..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर ने गाया था। 



हिन्दी फ़िल्म संगीत जगत में कई संगीतकार ऐसे हुए हैं जो अपनी अप्रतिम प्रतिभा के बावजूद बहुत ज़्यादा अन्डर-रेटेड रहे। एक से एक बेहतरीन रचना देने के बावजूद इंडस्ट्री और पब्लिक ने उनकी तरफ़ उतना ध्यान नहीं दिया जितना कुछ गिने-चुने और "सफल" संगीतकारों की तरफ़ दिया करते थे। ऐसे एक अन्डर-रेटेड संगीतकार थे रोशन। 40 के दशक में रोशन साहब की प्रतिभा और कला से प्रभावित होकर निर्माता-निर्देशक और संगीतकार ख़्वाजा ख़ुर्शीद अनवर, जो बाद में देश-विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गये थे, उन्होंने रोशन को All India Radio Delhi में नौकरी दिलवा दी बतौर इन्स्ट्रूमेण्टलिस्ट। और वहीं रोशन साहब की मुलाक़ात हुई कलकत्ता की इरा मोइत्रा से। इरा जी उनके साथ ही काम करने लगीं। दोनों ही कला और संगीत के प्रेमी थे। ऐसे में दोनो का एक दूसरे के निकट आना, प्रेम का पुष्प खिलना बहुत ही प्राकृतिक और सामान्य बात थी। रोशन और इरा के बीच प्यार हो गया और दोनो ने विवाह कर लिया। विवाह के बाद रोशन साहब मुम्बई (तब बम्बई) आ गये और ख़्वाजा ख़ुर्शीद अनवर के साथ म्युज़िक ऐसिस्टैन्ट के रूप में काम करने लगे। एक लम्बे संघर्ष और कई चुनौतियों को पार करने के बाद उन्हें स्वतंत्र फ़िल्में मिलने लगी। जिन फ़िल्मों में संगीत देकर उन्होंने हिन्दी फ़िल्म संगीत संसार में अपने नाम की छाप छोड़ दी, वो फ़िल्में थीं 'बावरे नैन', 'बरसात की रात', 'आरती', 'ताज महल', 'ममता', 'बहू बेग़म', 'दिल ही तो है', 'दूज का चाँद', 'चित्रलेखा', 'भीगी रात', 'देवर' और 'अनोखी रात'। रोशन ने लगभग 94 फ़िल्मों में स्वतंत्र रूप से संगीत दिया और उसके अलावा भी कई ऐसी फ़िल्में की जिनमें उन्होंने दो या तीन गीतों का संगीत तैयार किया जब कि उन फ़िल्मों में कोई और मुख्य संगीतकार थे।


रोशन दम्पति
1968 में रोशन साहब जब 'अनोखी रात' फ़िल्म का संगीत बना रहे थे, उसी दौरान उनकी तबीयत नासाज़ हो गई। हार्ट की प्रॉबलेम हो गई थी। फिर भी उन्होंने ऐसी हालत में भी 'अनोखी रात के लगभग सभी गीत रेकॉर्ड कर लिये, पर एक गाना रेकॉर्ड होना अभी बाक़ी था। और दुर्भाग्यवश दिल का दौरा पड़ने से रोशन साहब चले गये 16 नवम्बर के दिन। उनके इस आकस्मिक निधन से इस फ़िल्म का संगीत अधूरा ही रह गया। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के कुछ समय बाद 'अनोखी रात' फ़िल्म के निर्देशक असित सेन ने यह फ़ैसला किया वो बचा हुआ जो एक गीत है इस फ़िल्म का, उसे सलिल चौधरी से कम्पोज़ और रेकॉर्ड करवायेंगे। यहाँ पर यह बताना ज़रूरी है कि किसी किसी जगह इस बात का उल्लेख है कि 'अनोखी रात' फ़िल्म के इस अन्तिम गीत को रोशन साहब के गुज़र जाने के बाद उनके मुख्य सहायक श्याम राज और सोनिक (संगीतकार जोड़ी सोनिक-ओमी के) ने रेकॉर्ड करवाया था। पर शायद यह सच्चाई नहीं है। तो साहब, जब रोशन साहब की पत्नी इरा जी को इस बात का पता चला कि असित दा सलिल दा से वह आख़िरी गाना बनवाना चाह रहे हैं, तो उनके मन में कुछ और ही बात चल रही थी।   वो उस मातम के दौर में भी असित सेन के पास गईं और उनसे कहा कि फ़िल्म का यह जो एक बचा हुआ गाना है, उसे वो अपनी देख रेख में रेकॉर्ड करवाना चाहती हैं। यह गीत एक श्रद्धांजलि होगी एक वियोगी पत्नी की अपने स्वर्गीय पति के लिए। यह सुन कर असित सेन चौंक उठे। उन्हें यह तो मालूम था कि इरा जी एक गायिका हैं, पर इसका ज़रा सा भी अंदाज़ा नहीं था कि वो इस तरह का संगीत संयोजन और पूरे रेकॉर्डिंग का संचालन कर कर पायेंगी। उन्होंने इरा जी से पूछा कि आप ये सब कुछ कर पायेंगी? जवाब था "हाँ"। और तब दादा असित सेन ने इरा जी की भावनाओं का सम्मान करते हुए इस बचे हुए गीत की रेकॉर्डिंग की ज़िम्मेदारी उनको दे दी।


राजेश रोशन
"महलों का राजा मिला, हमारी बेटी राज करेगी, ख़ुशी ख़ुशी कर दो विदा, हमारी बेटी राज करेगी...", यह था वह गीत। गीत की धुन रोशन साहब ने पहले से ही तैयार की हुई थी। इरा जी ने पूरे गाने को अरेंज करके, इस धुन को फ़ाइन ट्यून करके, रेकॉर्ड करवाया, और इस तरह से यह मास्टरपीस कम्पोज़िशन बनी एक श्रद्धांजलि, एक वियोगी पत्नी की तरफ़ से अपने स्वर्गवासी पति के लिए। और क्या लिखा है कैफ़ी साहब ने कि गीत सुनते ही आँखें भर आती हैं! और सिचुएशन भी क्या थी, मुसाफ़िरों का एक दल एक रात के लिए एक रेस्ट-हाउस में आसरा लेता है। एक व्यापारी पिता (तरुन बोस) और उनकी पुत्री (ज़हिदा) उस दल का हिस्सा हैं। यह सामने आता है कि पिता अपनी पुत्री का किसी से विवाह करवाना चाहते हैं पर पुत्री इस रिश्ते से ख़ुश नहीं हैं। तभी बारिश शुरू होती है और एक डाकू (संजीव कुमार) भी उसी बिल्डिंग में शरण लेने घुस आते हैं। वो उस लड़की की तरफ़ जब एक दृष्टि से देखने लगता है तो लड़की इसका कारण पूछती है। और वो कहता है कि उनकी शक्ल बिल्कुल उसके स्वर्गवासी पत्नी से मिलती है, और इस तरह से अपनी पूरी कहानी बताता है। इस गीत में दर्द है एक बेटी का। पर आश्चर्य की बात है कि इसी धुन का इस्तेमाल रोशन साहब के बेटे और अगले दौर के संगीतकार राजेश रोशन ने फ़िल्म 'ख़ुदगर्ज़' में किया और बना डाला एक ख़ुशी का गीत। शत्रुघ्न सिन्हा और अमिता सिंह पर फ़िल्माया हुआ तथा नितिन मुकेश व साधना सरगम का गाया वह गीत था "यहीं कहीं जियरा हमार, ए गोरिया गुम होई गवा रे..."। यह गीत भी अपने समय में काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। राजेश रोशन ने कई बार दूसरों की धुनों से प्रेरित होकर अपने गीत बनाये हैं और उन पर धुन चुराने के आरोप भी जनता ने लगाये हैं, पर इस गीत के लिए यही कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने पिता की धुन का सहारा लिया है। क्या पिता की सम्पत्ति पुत्र की सम्पत्ति नहीं है? क्या इसे भी चोरी ही कहेंगे आप?

फिल्म - अनोखी रात : 'महलों का राजा मिला कि रानी बेटी राज करेगी...' : लता मंगेशकर : संगीत - रोशन : गीत - कैफी आज़मी



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

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