सोमवार, 3 नवंबर 2014

जयशंकर प्रसाद की लघुकथा खंडहर की लिपि

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको हिन्दी में मौलिक व अनुवादित नई पुरानी, रोचक कहानियाँ सुनवा रहे हैं। पिछली बार आपने भावों के अनूठे चित्रकार गिरिजेश राव की मार्मिक लघुकथा "... एक सुख ऐसा भी" का पॉडकास्ट अनुराग शर्मा के स्वर में सुना था। आज हम लेकर आये हैं हिन्दी के प्राख्यात साहित्यकार जयशंकर प्रसाद की मर्मस्पर्शी लघुकथा "खंडहर की लिपि", वाचन अर्चना चावजी द्वारा।

कहानी "खंडहर की लिपि" का आलेख प्रतिलिपि पर उपलब्ध है। इस प्रस्तुति का कुल प्रसारण समय 5 मिनट 33 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो देर न करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया हमें admin@radioplaybackindia.com पर संपर्क करें।


मिला कहाँ वह सुख जिसका मै स्वप्न देखकर जाग गया।
आलिंगन में आते-आते मुस्काकर जो भाग गया।
~ जयशंकर प्रसाद



"बोलती कहानियाँ" में हर सप्ताह सुनें एक नयी कहानी


‘‘तो प्रभु, क्या मैं यही उत्तर दे दूँ? ‘‘दासी ने कहा।
(जयशंकर प्रसाद की लघुकथा "खंडहर की लिपि" से एक अंश)



नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
खंडहर की लिपि MP3

#Twelfth Story, Khandahar Ki Lipi; Jaishankar Prasad/Hindi Audio Book/2014/12. Voice: Archana Chaoji

रविवार, 2 नवंबर 2014

वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ : SWARGOSHTHI – 192 : RAG BHIMPALASI


स्वरगोष्ठी – 192 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 1 : राग भीमपलासी

संगीतज्ञ पण्डित शंकरराव व्यास और गायिका सरस्वती राणे की जोड़ी ने राग भीमपलासी के स्वरों में रचा एक मधुर गीत




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हम एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे है। इस श्रृंखला का शीर्षक है- ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के पहले अंक में आज हम आपसे 1943 की फिल्म ‘रामराज्य’ के एक गीत- ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ की चर्चा करेंगे। इस गीत का सृजन अपने समय की दो दिग्गज सांगीतिक विभूतियों, संगीतकार पण्डित शंकरराव व्यास और किराना घराने की चर्चित गायिका सरस्वती राणे द्वारा हुआ था। राग भीमपलासी के फिल्मी प्रयोग का यह एक अच्छा उदाहरण है। इसके साथ ही राग भीमपलासी स्वरूप को समझने के लिए इस अंक में हम आपको शीर्षस्थ गायिका गंगूबाई हंगल की आवाज़ में राग भीमपलासी की एक मोहक रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 
 


हात्मा गाँधी ने अपने जीवनकाल में एकमात्र फिल्म ‘रामराज्य’ देखी थी। 1943 में प्रदर्शित इस फिल्म का निर्माण प्रकाश पिक्चर्स ने किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक अपने समय के जाने-माने संगीतज्ञ पण्डित शंकरराव व्यास थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी, व्यासजी की कुशलता केवल फिल्म संगीत निर्देशन के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि शास्त्रीय गायन, संगीत शिक्षण और ग्रन्थकार के रूप में भी सुरभित हुई। फिल्म ‘रामराज्य’ में पण्डित जी ने राग भीमपलासी के स्वरों में एक गीत ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ संगीतबद्ध किया था। इस गीत को किराना घराने के संस्थापक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की सुपुत्री और सुप्रसिद्ध गायिका सरस्वती राणे ने स्वर दिया था। आज पहले हम इस गीत के संगीतकार पण्डित शंकरराव व्यास और उसके बाद विदुषी सरस्वती राणे के व्यक्तित्व-कृतित्व पर चर्चा करेंगे।

शंकरराव व्यास 
कोल्हापुर में 23 जनवरी, 1898 को पुरोहितों के परिवार में जन्मे शंकरराव व्यास के पिता गणेश पन्त, कथावाचक के साथ-साथ संगीत-प्रेमी भी थे। संगीत के संस्कार उन्हें अपने पिता से ही प्राप्त हुए। दुर्भाग्यवश जब शंकरराव आठ वर्ष के थे तब उनके पिता का देहान्त हो गया। पिता के देहान्त के बाद वे अपने चाचा श्रीकृष्ण सरस्वती के आश्रित हुए। उन्हीं दिनों पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर भारतीय संगीत को उसकी दयनीय स्थिति से उबारने के लिए पूरे महाराष्ट्र में भ्रमण कर रहे थे और उनकी अगली योजना पूरे देश में संगीत के प्रचार-प्रसार की थी। बालक शंकरराव के संगीत-ज्ञान और उत्साह देख कर पलुस्कर जी ने उन्हें अपने साथ ले लिया। पलुस्कर जी द्वारा स्थापित गान्धर्व विद्यालय में ही उन्होने ९ वर्ष तक संगीत शिक्षा प्राप्त की और अहमदाबाद के राष्ट्रीय विद्यालय में संगीत शिक्षक हो गए। इसी बीच पलुस्कर जी ने लाहौर में संगीत विद्यालय की स्थापना की और शंकरराव को वहीं प्रधानाचार्य के पद पर बुला लिया। लाहौर में संगीत विद्यालय विधिवत स्थापित हो जाने और सुचारु रूप से संचालित होने के बाद वे अहमदाबाद आए और यहाँ भी ‘गुजरात संगीत विद्यालय’ की स्थापना की। 1934 में उन्होने गन्धर्व संगीत महाविद्यालय स्थापित किया। इस बीच उन्होने संगीत शिक्षण के साथ-साथ संगीत सम्मेलनों में भाग लेना भी जारी रखा।

1938 में 40 वर्ष की आयु में शंकरराव व्यास ने फिल्म संगीत के क्षेत्र में पदार्पण किया। 1938 में रमणलाल बसन्तलाल के उपन्यास पर बनी फिल्म ‘पूर्णिमा’ में कई गीत गाये थे। गायन के साथ-साथ फिल्मों की संगीत रचना के क्षेत्र में भी उनका वर्चस्व कायम हो चुका था। व्यास जी के संगीतबद्ध, भक्ति प्रधान और नीति पधान गीत गली-गली गूँजने लगे थे। 1940 में ‘सरदार’, ‘नरसी भगत’ और 1942 में ‘भरतमिलाप’ फिल्मों के गीत लोकप्रियता के शिखर पर थे। इसी समय 1943 में प्रकाश पिक्चर्स की फिल्म ‘रामराज्य’ प्रदर्शित हुई थी। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के दौर में प्रदर्शित फिल्म ‘रामराज्य’ में दर्शकों को गाँधीवादी रामराज्य की परिकल्पना परिलक्षित हो रही थी। इस फिल्म के राग आधारित गीत भी अत्यन्त जनप्रिय हुए थे, विशेष रूप से फिल्म में लव और कुश चरित्रों पर फिल्माया गया गीत ‘भारत की एक सन्नारी की हम कथा सुनाते हैं...’ और राजमहल में फिल्माया गया गीत ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’। पण्डित शंकरराव व्यास ने इन दोनों गीतों को क्रमशः काफी और भीमपलासी के स्वरों में बाँधा था। आज हमारी चर्चा में रमेश चन्द्र गुप्ता के लिखे, शंकरराव व्यास के संगीतबद्ध किए और सरस्वती राणे के गाये गीत ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ ही है। आइए, पहले हम यह गीत सुनते हैं।


राग भीमपलासी : ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ : फिल्म – रामराज्य : स्वर – सरस्वती राणे : संगीत – पण्डित शंकरराव व्यास





सरस्वती राणे 
अभी आपने जो गीत सुना वह अपने समय की विख्यात गायिका सरस्वती राणे के स्वरों में था। इनका जन्म 4 अक्टूबर, 1913 को महाराष्ट्र के मिरज में हुआ था। किराना घराने के संस्थापक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ और तारा बाई की सन्तान सरस्वती राणे को संगीत विरासत में मिला था। 1930 में पति से अलग होने के बाद तारा बाई ने अपने पाँच सन्तानों का स्वयं पालन-पोषण किया। सरस्वती ने अपने पिता से प्राप्त संगीत शिक्षा को अपने बड़े भाई सुरेशबाबू माने और बड़ी बहन हीराबाई बड़ोदकर के मार्गदर्शन से आगे बढ़ाया। उन दिनों संगीत के मंचों पर हीराबाई और सरस्वती के जुगलबन्दी प्रस्तुतियाँ खूब चर्चित हो गई थी। सरस्वती राणे का मंच-पदार्पण सात वर्ष की आयु में संगीत प्रधान नाटकों के माध्यम से हुआ था। 1929 में मराठी रंगमंच के सितारे बालगन्धर्व जैसे कलाकारों के साथ अभिनय और गाने का उन्हें अवसर मिला। 1933 से रेडियो पर गाने का अवसर मिला जो 1990 तक जारी रहा। 1943 में जब उन्होने फिल्म ‘रामराज्य’ के लिए पार्श्वगायन किया था, उस समय सरस्वती राणे लोकप्रियता के शिखर पर थीं।

राग ‘भीमपलासी’ भारतीय संगीत का एक ऐसा राग है, जिसमें भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ खिल उठती है। यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात आरोह में पाँच स्वर- सा, (कोमल), म, प, नि (कोमल), सां और अवरोह में सात स्वर- सां नि (कोमल), ध, प, म (कोमल), रे, सा प्रयोग किए जाते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह काफी थाट का राग है और इसका वादी और संवादी स्वर मध्यम और तार सप्तक का षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर मध्यम के स्थान पर पंचम का प्रयोग भी किया जाता है। ‘भीमपलासी’ के गायन-वादन का समय दिन का चौथा प्रहर होता है।

गंगूबाई हंगल 

आइए, अब हम आपको राग भीमपलासी की ही एक आकर्षक बन्दिश सुनवाते हैं। यह किराना घराने की गायकी में शीर्षस्थ विदुषी गंगूबाई हंगल की एक रिकार्डिंग है। 5 मार्च, 1913 को धारवाड़, कर्नाटक में उनका जन्म हुआ था। बाल्यावस्था में उन्हें अपनी माँ से दक्षिण भारतीय संगीत पद्यति की शिक्षा मिली। 1928 में उनका परिवार हुबली स्थानान्तरित हो गया। जाने-माने संगीतविद् सवाई गन्धर्व से उत्तर भारतीय संगीत में दक्षता प्राप्त करने से पूर्व किन्नरी वीणा वादक कृष्ण आचार्य और दत्तोपन्त देसाई से संगीत की शिक्षा ग्रहण की थी। पण्डित भीमसेन जोशी इनके गुरूभाई थे। गंगूबाई हंगल ने संगीत को आत्मसात करने के लिए कठिन साधना की थी। भारत के उच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मभूषण’ से 1971 में और ‘पद्मविभूषण’ से 2002 में अलंकृत किया गया था। 21 जुलाई, 2009 को इस महान गायिका का हुबली में निधन हुआ था। अब आप विदुषी गंगूबाई हंगल की आवाज़ में राग भीमपलासी की यह खयाल रचना सुनिए। इस प्रस्तुति में उनके गायन में उनकी सुपुत्री कृष्णा हंगल ने सहयोग किया है। आप राग भीमपलासी का रसास्वादन कीजिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भीमपलासी : ‘गरवा हरवा डारो री...’ : विदुषी गंगूबाई हंगल : तीनताल 






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 192वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छः दशक से भी पहले की एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा तथा वर्ष 2014 में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी को वार्षिक विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में आपको किस राग का आभास होता है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 194वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 190वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी राग भैरवी की ठुमरी ‘रस के भरे तोरे नैन...’ का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका विदुषी गिरिजा देवी। पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से नई लघु श्रृंखला ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मों गीत’ आरम्भ हुई है। पहले की तरह इस श्रृंखला के बारे में भी आपके सुझाव आमंत्रित हैं। नए वर्ष से ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के अन्तर्गत आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हों, हमे आविलम्ब लिखें। आप अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

शनिवार, 1 नवंबर 2014

"रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना" - कैसे बना था एक ही शॉट में फ़िल्माये जाने वाले हिन्दी सिनेमा का यह पहला गीत?


एक गीत सौ कहानियाँ - 44
 

रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना...





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 44-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'आराधना' के मशहूर गीत "रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना..." के बारे में।


'आराधना' कई कारणों से हिन्दी सिनेमा की एक बेहद महत्वपूर्ण फ़िल्म है। जहाँ एक तरफ़ इस फ़िल्म ने अभिनेता राजेश खन्ना को स्टार बना दिया, वहीं दूसरी ओर गायक किशोर कुमार के करीयर की गाड़ी को सुपरफ़ास्ट ट्रैक पर ला खड़ा किया। एक लो बजट फ़िल्म होते हुए भी इस फ़िल्म ने लाखों का मुनाफ़ा कमाया। फ़िल्म-संगीत के चलन की अगर बात करें तो यह एक ट्रेण्डसेटर फ़िल्म रही जिसने 70 के दशक के फ़िल्म-संगीत शैली की नीव रखी। कहने का मतलब है कि 'आराधना' के गीतों की जो स्टाइल थी, वही स्टाइल आगे चलकर 70 के दशक के फ़िल्मी गीतों की स्टाइल बनी। यही नहीं इस फ़िल्म में शर्मीला टैगोर ने साड़ी जिस स्टाइल से पहनी थी, उस ज़माने की लड़कियों ने भी उस स्टाइल को अपनाया। राजेश खन्ना, आनन्द बक्शी और राहुलदेव बर्मन की तिकड़ी भी इसी फ़िल्म से शुरू हुई (हालाँकि इस फ़िल्म के संगीतकार सचिनदेव बर्मन थे)। 'आराधना' रिलीज़ हुई थी 1969 में 'बान्द्रा टॉकीज़' में, और मद्रास के एक थिएटर में यह फ़िल्म लगातार दो साल चली थी। 'आराधना' के गीत-संगीत से जुड़ा एक दिलचस्प पहलू यह है कि रफ़ी और किशोर, दोनों ने कैसे एक ही नायक का पार्श्वगायन किया, जबकि उस ज़माने में एक फ़िल्म में एक नायक का पार्श्वगायन एक ही गायक करता था। इस मुद्दे पर दो थियरी सुनने को मिलती है जिसे हम इस लेख में उजागर करने जा रहे हैं। पहली थिअरी है ख़ुद शक्ति दा की जो उन्होंने विविधभारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में कहे थे। शक्ति दा के शब्दों में - "शुरू में यह तय हुआ था कि मोहम्मद रफ़ी इस फ़िल्म के सभी गीतों को गायेंगे। पर वो एक लम्बे वर्ल्ड टूर पर निकल गये, इसलिए आपस में बातचीत कर यह तय हुआ कि किशोर कुमार को इस फ़िल्म के गीतों को गाने के लिए लाया जाये। पर उस समय किशोर कुमार देव आनन्द के लिए पार्श्वगायन किया करते थे, इसलिए मैं श्योर नहीं था कि किशोर एक नये हीरो के लिए गायेगा या नहीं। मैंने किशोर को फ़ोन किया। वो तब तक अशोक कुमार के ज़रिये मेरा दोस्त बन चुका था। किशोर ने कहा कि वो देव आनन्द के लिए गाता है। तो मैंने कहा कि नख़रे क्यों कर रहा है, हो सकता है कि यह तुम्हारे लिए कुछ अच्छा हो जाये! किशोर राज़ी हो गया और इस तरह से पहला गाना रेकॉर्ड हुआ। एक एक करके तीन गाने रेकॉर्ड हो गये - "कोरा कागज़ था यह मन मेरा...", "मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू...." और "रूप तेरा मस्ताना..."। जब रफ़ी वर्ल्ड टूर से वापस आए तो उन्होंने बाक़ी के दो गीत गाये - "गुनगुना रहे हैं भँवरें...." और "बाग़ों में बहार है..."।"


दूसरी थिअरी का पता हमें चला अन्नु कपूर से, उन्ही के द्वारा प्रस्तुत 'सुहाना सफ़र' कार्यक्रम में। "उन दिनों यह प्रचलन था कि फ़िल्म के शुरू होने पर लौन्चिंग पैड के तौर पर फ़िल्म के दो गाने रेकॉर्ड होते थे, और गानो के रेकॉर्ड होने की ख़बर इंडस्ट्री के प्रचलित अख़्बार 'स्क्रीन' में छप जाती थी। फ़िल्म के गीतों को गाने के लिए सचिनदेव बर्मन की पहली पसन्द थे मोहम्मद रफ़ी साहब। और यही वजह थी कि उन्होंने फ़िल्म के दो गीत रफ़ी से गवाये। "गुनगुना रहे हैं ..." और "बाग़ों में बहार है..."। इससे पहले कि वो और गानों को रेकॉर्ड करवा पाते, दादा की तबीयत ख़राब हो गई, बीमार पड़ गये। हेल्थ के हाथों मजबूर दादा के संगीत की ज़िम्मेदारी आन पड़ी उनके बेटे पंचम के कन्धों पर। पंचम की किशोर कुमार से बहुत अच्छी दोस्ती थी। और वो किशोर कुमार को, ऐज़ ए सिंगर लाइक भी बहुत करते थे। लेकिन किशोर कुमार का उस वक़्त करीयर अच्छा नहीं चल रहा था। पंचम के दिमाग़ में यह बात बस गई और उन्होंने किशोर कुमार की आवाज़ को लेने का निर्णय ले डाला। पंचम का मानना था कि राजेश खन्ना एक नया आर्टिस्ट है जिसके उपर किशोर की आवाज़ बहुत फ़िट रहेगी। बहुत सारी चीज़ों का ध्यान रखते हुए, उनके अपने विचार होंगे, किशोर कुमार के साथ रिहर्सलें शुरू कर दी। पंचम के साथ "मेरे सपनों की रानी...", "कोरा कागज़ था..." और "रूप तेरा मस्ताना...", इन गानों की तैयारी करनी शुरू कर दी। जब गानों की फ़ाइनल रेकॉर्डिंग चल रही थी, तब पिताजी यानी सचिनदेव बर्मन की हालत में कुछ सुधार आ गया और वो फ़ाइनल रेकॉर्डिंग को सुनने स्टुडियो जा पहुँचे। वहाँ जाकर क्या देखते हैं कि किशोर गाना गा रहा है। पंचम से बोले कि ये तूने क्या किया? मैं रफ़ी से गाने गवाना चाहता था क्योंकि वो इंडस्ट्री की नम्बर वन आवाज़ है, डिस्ट्रिब्युटर्स और फ़ाइनन्सर्स की वो पहली पसन्द है, वैसे भी राजेश खन्ना की पहले आई तीन फ़िल्में फ़्लॉप हो चुकी हैं, कम से कम गानों की वजह से तो फ़िल्म प्रोमोट की जा सकती है। क्या तुझे रफ़ी की आवाज़ में रेकॉर्ड की हुई पहले दो गीतों में कोई कमी लगी है? पंचम ने बहुत शान्त भाव से उत्तर दिया कि आप सही कह रहे हैं बाबा, मैंने वो दोनो गीत सुने हैं, और कहीं से भी कमतर नहीं है। पर बचे हुए गीतों के लिए मुझे लगा कि किशोर की आवाज़ बहुत ऐप्ट और पर्फ़ेक्ट रहेगी। मैं चाहता हूँ कि एक बार आप सुनें और फिर कहें। सचिन दा ने जब किशोर की आवाज़ में वो तीनो गाने सुने तो ख़ुश हो गये। पंचम ने उनकी रॉ ट्युन्स को जिस फ़ैशन में फ़ाइनल टच किया था, वो सचमुच बेहतरीन था। गाने फ़ाइनली किशोर की ही आवाज़ में रेकॉर्ड हुए। जब फ़िल्म रिलीज़ हुई तो किशोर के गाये इन गीतों को बहुत कामयाबी मिली। और इस फ़िल्म के गीत "रूप तेरा मस्ताना..." के लिए किशोर कुमार को उस साल फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड भी मिला। और इस तरह से इसी फ़िल्म के साथ कमबैक हुआ किशोर कुमार का।"

सचिन दा, शक्ति दा, राजेश खन्ना और पंचम
अब इन दोनों थिअरी में से कौन सी थिअरी सच है और कौन सी ग़लत, यह कह पाना मुश्किल है। पर एक बात जो सच है, वह यह कि "रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना..." गीत की जो कम्पोज़िशन दादा सचिनदेव बर्मन ने बनाई थी, उसमें उतना सेन्सुअसनेस नहीं था। सीन जितना बोल्ड था, उस हिसाब से गीत की धुन ठंडी थी। रिहर्सल करते समय किशोर कुमार ने इसमें अपना अंदाज़ डाल दिया, मुड़कियाँ कम कर दीं और अपनी आवाज़-ओ-अंदाज़ में ऐसी सेन्सुअस अपील ले आये कि सीन के साथ पर्फ़ेक्ट मैच कर गया। कहना ज़रूरी है कि फिर इसके बाद इस तरह का मेल सेन्सुअस गीत दूसरा नहीं बन पाया है। अब इस गीत के पिक्चराइज़ेशन की कहानी भी सुन लीजिये। शक्ति सामन्त अपने गीतों के पिक्चराइज़ेशन के बारे में रात को अपने कमरे में बैठ कर गीतों को सुनते हुए सोचा करते थे और पिक्चराइज़ेशन की प्लैनिंग किया करते थे। तो इस गीत को जैसे वो सुन रहे थे, अचानक से उनके दिमाग़ में यह ख़याल आया कि इस गीत को एक ही शॉट में फ़िल्माया जा सकता है। उन्होंने एक कागज़ लिया और उस पर A, B, C लिखा - A हीरो के लिए, B हीरोइन के लिए, C कैमरे के लिए, और अपने मन-मस्तिष्क में गीत का पूरा फ़िल्मांकन कर बैठे। शूटिंग के दिन उन्होंने एक राउन्ड ट्रॉली मँगवाया और 'फ़िल्मालय' स्टुडियो में इसकी शूटिंग शुरू की। शुरू शुरू में कुछ लोगों ने उनके इस विचार का विरोध किया था कि गीत को एक ही शॉट में फ़िल्माया जाये। किसी ने कहा भी था कि इसका दिमाग़ ख़राब हो गया है जो इतना अच्छा गाना एक ही शॉट में ले रहा है। तब शक्ति दा ने यह दलील दी कि जब रात को मैं यह गाना सुन रहा था तो समझ ही नहीं आया कि "कट" कहाँ पर बोलूँ? इस तरह से यह गीत हिन्दी सिनेमा का वह पहला गीत बना जो एक ही शॉट में फ़िल्माया गया था। बस इतनी सी ही थी इस गीत के बनने की कहानी।  लीजिए, अब आप वह गीत सुनिए।

फिल्म - आराधना : 'रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना...' : किशोर कुमार : संगीत - सचिनदेव बर्मन : गीत - आनन्द बक्शी 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ'' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 


अपना मनपसन्द स्तम्भ पढ़ने के लिए दीजिए अपनी राय 



नए साल 2015 में शनिवार के नियमित स्तम्भ रूप में आप कौन सा स्तम्भ पढ़ना सबसे ज़्यादा पसन्द करेंगे?

1.  सिने पहेली (फ़िल्म सम्बन्धित पहेलियों की प्रतियोगिता)

2. एक गीत सौ कहानियाँ (फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया से जुड़े दिलचस्प क़िस्से)

3. स्मृतियों के स्वर (रेडियो (विविध भारती) साक्षात्कारों के अंश)

4. बातों बातों में (रेडियो प्लेबैक इण्डिया द्वारा लिये गए फ़िल्म व टीवी कलाकारों के साक्षात्कार)

5. बॉलीवुड विवाद (फ़िल्म जगत के मशहूर विवाद, वितर्क और मनमुटावों पर आधारित श्रृंखला)


अपनी राय नीचे टिप्पणी में अथवा cine.paheli@yahoo.com  पर अवश्य बताएँ। 







The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ