शनिवार, 12 जुलाई 2014

हिन्दी सिनेमा के पहले दौर के कुछ कलाकारों की स्मृतियों के स्वर



स्मृतियों के स्वर - 05

हिन्दी सिनेमा के पहले दौर के कुछ कलाकारों की स्मृतियों के स्वर




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार किये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत की इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकिया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ, कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तम्भ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर, जिसमें हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। दोस्तों, 1931 में 'आलम आरा' फ़िल्म के साथ शुरुआत हुई थी बोलती फ़िल्मों की और साथ ही फ़िल्म संगीत की भी। उस पहले दशक की यादें आज बहुत ही धुँधली हो चुकी हैं और उस दौर के बारे में आज बहुत कम चर्चा होतो है। परन्तु ये हमारे इतिहास के कुछ सुनहरे पृष्ठ हैं। आइए आज इस कड़ी में उस दौर के कुछ पृष्ठों को पलटते हैं, उसी दौर के कलाकारों की ज़बानी, जिन्हें 'विविध भारती' के अलग-अलग कार्यक्रमों से संकलित किया गया है। 



सूत्र: विविध भारती

अलग-अलग कार्यक्रमों से संकलित




जैसा कि आप जानते हैं भारत की पहली बोलती फ़िल्म थी 'आलम आरा'। निर्माता-निर्देशक अर्देशिर इरानी की कंपनी 'इम्पीरियल मूवीटोन' द्वारा बनाई गई फ़िल्म 'आलम आरा' 14 मार्च 1931 को मुम्बई की 'मजेस्टिक सिनेमा' में प्रदर्शित हुई थी। और इसी फ़िल्म से शुरू हुआ था फ़िल्म संगीत का सफ़र जो आज तक बदस्तूर जारी है। फ़िल्म 'आलम आरा' में वज़ीर मोहम्मद ख़ान का गाया गीत "दे दे ख़ुदा के नाम पर प्यारे" उस ज़माने में बेहद मशहूर हुआ था। इसके बाद प्रदर्शित हुई कोलकाता की फ़िल्म कम्पनी 'मदन थिएटर्स' की फ़िल्म 'शिरीं फ़रहाद'। इस दूसरी बोलती फ़िल्म के नायक थे मास्टर निसार, जो सायलेन्ट फ़िल्मों के दौर में ही सुपरस्टार का दर्जा हासिल कर चुके थे। आप को यह जानकर ताज्जुब होगा कि मास्टर निसार की आवाज़ भी 'विविध भारती' में मौजूद है। तो आइए पढ़ें 'विविध भारती' के साथ मास्टर निसार के बातचीत का यह अंश।

मास्टर निसार:

"1931, तो हमारे मालिक जो थे, कलकत्ते के, मदन थिएटर्स, मदन थिएटर्स लिमिटेड, तो उन्होंने, मैं नाटक में काम करता था, उन्होंने मुझे बुलाकर कहा कि कल तुम स्टुडियो चले जाना। मैंने पूछा 'क्यों साहब?' बोले, 'चले जाना तुम'। तो जहांगीर जी, उनके लड़के थे, वो डिरेक्शन करते थे, मुझसे कहने लगे कि 'शिरीं फ़रहाद', हम यह टॉकी बनाना चाहते हैं, उसमें एक सीन लेना चाहते हैं। तो आग़ा साहब से कहो कि कुछ डायलोग्स लिख दें। आग़ा हश्र साहब से, मैंने जाकर उनसे कहा तो आग़ा साहब कहने लगे कि 'एक सीन का क्या मतलब होता है? पूरा शिरीं फ़रहाद उनसे कहो क्यों नहीं उतारते?' मैंने जाकर उनसे कह दिया। तो बोले कि 'अच्छा, आग़ा साहब से जाकर कहो कि वो लिखें'। तो आग़ा साहब लिखने लगे, और 1931 की बात है, जब 'शिरीं फ़रहाद' नाम से फ़िल्म शुरू हुआ।"







कोलकाता की 'न्यू थिएटर्स कंपनी' द्वारा निर्मित अधिकांश फ़िल्मों का आधार मुख्य रूप से बांगला उपन्यास और कहानियाँ होते थे। बी. एन. सरकार द्वारा स्थापित इस कम्पनी ने उस ज़माने में रायचन्द बोराल, पंकज मल्लिक, तिमिर बरन, के. एल. सहगल, के. सी. डे, केदार शर्मा और कानन देवी जैसे दिग्गज काम करते थे। मधुर संगीत 'न्यू थिएटर्स' के फ़िल्मों की खासियत थी। कालान्तर में यही बातें कही रायचन्द बोराल, यानी आर. सी. बोराल ने इन शब्दों में कही। 


रायचन्द बोराल:

"मैं लगभग 40 बरसों से फ़िल्म इंडस्ट्री में हूँ। मतलब न्यू थिएटर्स के जनम से ही फ़िल्म  संगीत की सेवा करता हूँ। आज मैं उन बीते हुए समय की झलक दिखाऊँ? हो सकता है ये फ़िल्में आप ने न देखी हों, उन फ़िल्मों के कलाकारों को भी आप ने न देखा हो, मगर नाम ज़रूर सुना होगा। यह बात है 40 साल पहले की, फ़िल्म 'धूप छाँव' का संगीत निर्देशन मैंने किया और गायक कलाकार थे के. सी. डे।"


उस ज़माने में पार्श्वगायन, यानी प्लेबैक शुरू नहीं हुआ था, और अभिनेताओं को कैमरे के सामने ख़ुद गाना पड़ता था। प्लेबैक का ख़याल सबसे पहले 'न्यू थिएटर्स' में सन 1935 में बनी फ़िल्म 'धूप छाँव' के दौरान संगीतकार पंकज मल्लिक के मन में कौंधा था। पंकज मल्लिक के ही शब्दों में-

पंकज मल्लिक:

"बोलती फ़िल्मों के भारत में चालू होने के दो साल पहले ही मैं फ़िल्मी दुनिया में आ चुका था। यानी सन 1928 में। उस समय मूक फ़िल्में दिखाई जाती थी। उसके साथ जिस संगीत की रचना के बजने का रिवाज़ था, उस संगीत की रचना मैं किया करता था। उसके बाद जब बोलती फ़िल्में आयीं, कलकत्ते में, तो मुझे ही संगीत निर्देशक बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। तब तो आकाशवाणी नहीं था, इसका नाम था 'इण्डियन ब्रॉडकास्टिंग्‍ कॉर्पोरेशन'। मेरे आने के करीब 6 महीने पहले शायद यह कम्पनी चालू हुई थी। मैंने रेडियो पर जो पहला गाना गाया था, वह गीत कविगुरु रबीन्द्रनाथ ठाकुर की एक रचना थी।


'न्यू थिएटर्स' से सम्बन्धित एक और नाम था तिमिर बरन का, जिन्होंने 1935 की फ़िल्म 'देवदास' में संगीत दिया था।

तिमिर बरन:

"आज इस कार्यक्रम के ज़रिये आप लोगों से बातचीत करने का मुझे जो मौका मिला है, उसके लिए मैं अपने आप को धन्य समझता हूँ। जब कि मैंने भी कई फ़िल्मों की धुनें बनाई थी और संगीत निर्देशक रह चुका हूँ, अब भी फ़िल्मों से जुड़ा हुआ हूँ और संगीत निर्देशन का कार्य जारी है। मुझे गीतों के बोलों से साज़-ओ-संगीत से ज़्यादा प्रेम है क्योंकि मैं ख़ुद एक सरोद-वादक हूँ।"



सन् 1934 में 'बॉम्बे टॉकीज़' अस्तित्व में आया जिसकी नीव इंगलैण्ड से आये हिमांशु राय और देविका रानी ने एक पब्लिक लिमिटेड कम्पनी के तौर पर रखी थी। शंकर मुखर्जी, कवि प्रदीप और अशोक कुमार ने अपने करियर की शुरुआत 'बॉम्बे टॉकीज़' की फ़िल्मों से ही की थी। विविध भारती के ‘जयमाला’ कार्यक्रम में दादामुनि अशोक कुमार ने फ़िल्मों के उस शुरुआती दौर को याद करते हुए कुछ इस तरह से कहा था-

अशोक कुमार:

 “दरसल जब मैं फ़िल्मों में आया था, सन् 1934-35 के आसपास, उस समय गायक-अभिनेता सहगल ज़िंदा थे। उन्होंने फ़िल्मी गानों को एक शकल दी और मेरा ख़याल है उन्ही की वजह से फ़िल्मों में गानों को एक महत्वपूर्ण जगह मिली। आज उन्हीं  की बुनियाद पर यहाँ की फ़िल्में बनाई जाती हैं, यानि ‘बॉक्स ऑफ़िस सक्सेस’ के लिए गानों को सब से ऊँची जगह दी जाती है। मेरे वक़्त में प्लेबैक तकनीक की तैयारियाँ हो ही रही थीं। तलत, रफ़ी, मुकेश फ़िल्मी दुनिया में आए नहीं थे, लता तो पैदा भी नहीं हुई होगी। अभिनेताओं को गाना पड़ता था चाहे उनके गले में सुर हो या नहीं। इसलिए ज़्यादातर गाने सीधे सीधे और सरल बंदिश में बनाये जाते थे ताकि हम जैसे गाने वाले आसानी से गा सके।”



सन् 1936 में अस्तित्व में आई सोहराब मोदी की कम्पनी 'मिनर्वा मूवीटोन'। इस बैनर के तले बनी 1939 की फ़िल्म 'पुकार' की आशातीत सफलता ने देखते ही देखते सोहराब मोदी को उस ज़माने के अग्रणी निर्माता निदेशकों की कतार में ला खड़ा किया।


सोहराब मोदी:

"ऐ निगेहबान-ए-वतन, ऐ मर्द मैदान-ए-वतन, तेरे दम से है बहारों पर गुलिस्तान-ए-वतन। तुझ पे जान-ओ-दिल फ़िदा, हस्ती फ़िदा, मस्ती फ़िदा, तुझपे बेक़स ग़ुलामों की यह कुल बस्ती फ़िदा। आज तेरी अर्ज़मंदी को पहुँच सकता है कौन, तेरी रूहानी बुलन्दी को पहुँच सकता है कौन, वीरों के लिए तो वाक़ई जब से होश संभाला, तब से ही अपने दिल-ओ-दिमाग़ में सबसे ऊँचा मक़ाम पाया, लेकिन तवारिख जैसे सबजेक्ट में बचपन में मुझे कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी। मैं सिसिल बी. डे मिले की अंग्रेज़ी फ़िल्में बहुत देखा करता था, और उनसे मुतासिर होकर अपने देश की तवारिख पर गौर करने लगा। उस वक़्त मुझे ख़्याल आया कि हमारे देश को ऐसी फ़िल्मों की बहुत ज़रूरत है, अपने देश की जनता को जगाने के लिए, देश के बच्चों को देश की महानता का ज्ञान कराने के लिए यही एक ज़रूरी काम था ताकि वो अपनी तवारिख से अनजान न बने रहे। दूसरी बात यह कि तवारिख फ़िल्म का कैनवस जितना बड़ा सोशल फ़िल्मों का नहीं। मैं हमेशा बड़े कैनवस की तस्वीरों को खींचने का कायल रहा हूँ। यह वजह भी मुझे इस ओर ज़्यादा खींचती रही। तीसरी वजह यह कि हर कलाकार अपनी कला को पनपने के लिए अधिक से अधिक स्कोप चाहता है जो मेरे ख़याल से ऐसी फ़िल्मों में ही मिल सकता था। इसकी पहली वजह तो यह है कि हर कलाकार की अपनी एक रुचि होती है। मेरी रुचि इसी तरह के पात्रों में थी।"

************************************************************

ज़रूरी सूचना:: उपर्युक्त लेख 'विविध भारती' के कार्यक्रम का अंश है। इसके सभी अधिकार 'विविध भारती' के पास सुरक्षित हैं। किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा इस प्रस्तुति का इस्तेमाल व्यावसायिक रूप में करना कॉपीराइट कानून के ख़िलाफ़ होगा, जिसके लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ज़िम्मेदार नहीं होगा।



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

रविवार, 6 जुलाई 2014

‘बरखा ऋतु आई...’ : राग मेघ मल्हार





स्वरगोष्ठी – 175 में आज

वर्षा ऋतु के राग और रंग – 1 : राग मेघ मल्हार


‘गरजे घटा घन कारे कारे, पावस रुत आई, दुल्हन मन भावे...’







‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, आज से हम एक नई लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के राग और रंग’ का शुभारम्भ कर रहे हैं। इस शीर्षक से यह अनुमान आपको हो ही गया होगा कि यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हम राग मेघ मल्हार की चर्चा करेंगे। राग मेघ मल्हार एक प्राचीन राग है, जिसके गायन-वादन से संगीतज्ञ वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक परिवेश का सृजन करते हैं। इस राग में आज हम आपको सुप्रसिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती द्वारा प्रस्तुत मध्यलय झपताल की एक खयाल रचना और इसी राग के स्वरों पर आधारित 1942 में प्रदर्शित फिल्म ‘तानसेन’ में खुर्शीद बेगम का गाया गीत भी सुनवा रहे हैं।




स वर्ष कुछ विलम्ब से ही सही आजकल हम सब प्रकृति के अद्भुत वरदान पावस ऋतु का आनन्द ले रहे हैं। हमारे चारो ओर के परिवेश ने हरियाली की चादर ओढ़ने की पूरी तैयारी कर ली है। तप्त-शुष्क भूमि पर वर्षा की फुहारें पड़ने पर चारो ओर जो सुगन्ध फैलती है वह अवर्णनीय है। ऐसे ही मनभावन परिवेश का सृजन करने के लिए और और हमारे उल्लास और उमंग को द्विगुणित करने के लिए आकाश में कारे-कजरारे मेघ उमड़-घुमड़ रहे हैं। भारतीय साहित्य और संगीत को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली दो ऋतुएँ, बसन्त और पावस हैं। पावस ऋतु में मल्हार अंग के रागों का गायन-वादन अत्यन्त सुखदायी होता है। वर्षाकालीन सभी रागों में सबसे प्राचीन राग मेघ मल्हार माना जाता है। काफी थाट का यह राग औड़व-औड़व जाति का होता है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में 5-5 स्वरों का प्रयोग होता है। गान्धार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। समर्थ कलासाधक कभी-कभी परिवर्तन के तौर पर गान्धार स्वर का प्रयोग करते है। भातखण्डे जी ने अपने ‘संगीत-शास्त्र’ ग्रन्थ में भी यह उल्लेख किया है कि कोई-कोई कोमल गान्धार का प्रयोग भी करते हैं। लखनऊ के वरिष्ठ संगीत-शिक्षक और शास्त्र-अध्येता पण्डित मिलन देवनाथ के अनुसार लगभग एक शताब्दी पूर्व राग मेघ में कोमल गान्धार का प्रयोग होता था। आज भी कुछ घरानों की गायकी में यह प्रयोग मिलता है। रामपुर, सहसवान घराने के जाने-माने गायक उस्ताद राशिद खाँ जब राग मेघ गाते हैं तो कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं। ऋषभ का आन्दोलन राग मेघ का प्रमुख गुण होता है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। इस राग के माध्यम से आषाढ़ मास के मेघों की प्रतीक्षा, उमड़-घुमड़ कर आकाश पर छा जाने वाले काले मेघों और वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक परिवेश का सजीव चित्रण किया जाता है। आइए, अब हम राग मेघ मल्हार में एक भावपूर्ण खयाल सुनते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे है, पटियाला (कसूर) गायकी में सिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती। यह मध्यलय झपताल की रचना है, जिसके बोल हैं- ‘गरजे घटा घन कारे कारे पावस रुत आई...’।


राग मेघ मल्हार : ‘गरजे घटा घन कारे कारे, पावस रुत आई, दुल्हन मन भावे...’ : गायक - पण्डित अजय चक्रवर्ती 





भारतीय साहित्य में भी राग मेघ मल्हार के परिवेश का भावपूर्ण चित्रण मिलता है। वर्षा ऋतु के आगमन की आहट देने वाले राग मेघ की प्रवृत्ति को महाकवि कालिदास ने ‘मेघदूत’ के प्रारम्भिक श्लोकों में अत्यन्त यथार्थ रूप में किया है-

आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्टसानुं वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श।

अर्थात; रामगिरि पर्वत पर शापित यक्ष विरह-ताप से पीड़ित है। तभी आषाढ़ मास के पहले दिन आकाश में काले-काले मेघ मँडराने लगे। ऐसा प्रतीत होने लगा मानो मदमस्त हाथियों का झुण्ड पर्वत की श्रृंखलाओं के साथ अटखेलियाँ कर रहे हों। ‘मेघदूत’ का यक्ष अपनी प्रियतमा तक सन्देश भेजने के लिए आषाढ़ मास के मेघों को ही अपना दूत बनाता है। इससे थोड़ा भिन्न परिवेश पाँचवें दशक की एक फिल्म से हमने लिया है। आज का गीत हमने 1942 में रणजीत स्टूडियो द्वारा निर्मित और जयन्त देसाई द्वारा निर्देशित फिल्म ‘तानसेन’ से चुना है। फिल्म के प्रसंग के अनुसार अकबर के आग्रह पर तानसेन ने राग ‘दीपक’ गाया, जिसके प्रभाव से उनका शरीर जलने लगा। कोई उपचार काम में नहीं आने पर उनकी शिष्या ने राग ‘मेघ मल्हार’ का आह्वान किया, जिसके प्रभाव से आकाश मेघाच्छन्न हो गया और बरखा की बूँदों ने तानसेन के तप्त शरीर का उपचार किया। इस प्रसंग में राग ‘मेघ मल्हार’ की अवतारणा करने वाली तरुणी को कुछ इतिहासकारों ने तानसेन की प्रेमिका कहा है तो कुछ ने उसे तानसेन की पुत्री तानी बताया है। बहरहाल, इस प्रसंग से यह स्पष्ट हो जाता है कि राग ‘मेघ मल्हार’ मेघों का आह्वान करने में सक्षम है। दूसरे रूप में हम यह भी कह सकते हैं कि इस राग में मेघाच्छन्न आकाश, उमड़ते-घुमड़ते बादलों की गर्जना और वर्षा के प्रारम्भ की अनुभूति कराने की क्षमता है। फिल्म ‘तानसेन’ के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश और गीतकार पण्डित इन्द्र थे। फिल्म में तानसेन की प्रमुख भूमिका में कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल थे। फिल्म के लगभग सभी गीत विभिन्न रागों पर आधारित थे। फिल्म ‘तानसेन’ में राग मेघ मल्हार पर आधारित गीत है- ‘बरसो रे कारे बादरवा हिया में बरसो...’, जिसे उस समय की विख्यात गायिका-अभिनेत्री खुर्शीद बेगम ने गाया और अभिनय भी किया था। तीनताल में निबद्ध इस गीत में पखावज की संगति की गई है। आइए, सुनते हैं वर्षा ऋतु का आह्वान करते राग ‘मेघ मल्हार’ पर आधारित यह गीत। आप इस गीत के माध्यम से पावस का आनन्द लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग मेघ मल्हार : ‘बरसो रे कारे बादरवा हिया में बरसो...’ फिल्म – तानसेन : स्वर – खुर्शीद बेगम : संगीत – खेमचन्द्र प्रकाश 






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 175वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको नारी-कण्ठ-स्वर में एक खयाल रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 180वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1- खयाल के इस अंश को सुन कर गायिका की आवाज़ को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

2 – यह संगीत रचना किस राग में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 177वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 173वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया द्वारा प्रस्तुत बाँसुरी वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग हंसध्वनि और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल सितारखानी अथवा पंजाबी ठेका अथवा अद्धा त्रिताल। इस अंक की पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इस अंक से हमने ऋतु के अनुकूल रागों अर्थात वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों पर यह लघु श्रृंखला आरम्भ किया है। अगले अंक में एक और वर्षाकालीन राग पर आपसे चर्चा करेंगे। आप भी यदि भारतीय संगीत के किसी विषय में कोई जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

शनिवार, 5 जुलाई 2014

"मोरा गोरा अंग ल‍इ ले..." - जानिये किन मुश्किलों से गुज़रते हुए बना था यह गीत


एक गीत सौ कहानियाँ - 35
 

मोरा गोरा अंग ल‍इ ले...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्युटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 35-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'बन्दिनी' के गीत "मोरा गोरा अंग ल‍इ ले..." के बारे में। 




गुलज़ार
फ़िल्म 'बन्दिनी' का निर्माण चल रहा था, जिसके निर्देशक थे बिमल राय, संगीतकार थे सचिनदेव बर्मन और बतौर गीतकार शैलेन्द्र फ़िल्म के गाने लिखने वाले थे। अब हुआ यूँ कि दादा बर्मन और शैलेन्द्र के बीच किसी वजह से मनमुटाव हो गया और ग़ुस्से में आकर सचिन दा ने कह दिया कि वो शैलेन्द्र के साथ काम नहीं करेंगे। इसी समय बिमल दा के लिए इस फ़िल्म का पहला गीत शूट करना बेहद ज़रूरी हो गया था। वो मुश्किल में पड़ गये; लाख समझाने पर भी सचिन दा शैलेन्द्र जी के साथ काम करने के लिए तैयार नहीं हुए। जब बिमल दा ने यह बात शैलेन्द्र को बताई तो शैलेन्द्र जी सोच में पड़ गये कि बिमल दा को इस मुश्किल से कैसे निकाला जाये। उन्हीं दिनों शैलेन्द्र Bombay Youth Choir के सदस्य हुआ करते थे जिसके गुलज़ार भी सदस्य थे। यह कॉयर किशोर कुमार की पत्नी रूमा देवी चलाती थीं। गुलज़ार उन दिनों एक गराज में गाड़ियों को रंगने का काम किया करते थे और एक लेखक बनने का ख़्वाब देखा करते। क्योंकि शैलेन्द्र को गुलज़ार के इस लेखन-रुचि का पता था, उन्होंने गुलज़ार से कहा कि जाकर बिमल दा से मिले और बताया कि बिमल दा के लिए एक गीत लिखना है। क्योंकि गुलज़ार को गीत लेखन में कोई रुचि नहीं थी और न ही वो फ़िल्मों के लिए कुछ लिखना चाहते थे, इसलिए उन्होंने शैलेन्द्र जी को मना कर दिया। पर शैलेन्द्र जी कहाँ मानने वाले थे। आख़िरकार शैलेन्द्र की ज़िद के आगे गुलज़ार को झुकना पड़ा। गुलज़ार अपने एक दोस्त देबू के साथ, जो उन दिनों बिमल दा के सहायक थे, पहुँच गये बिमल राय के डेरे पर। बिमल दा ने गुलज़ार को उपर से नीचे तक देखा और देबू की तरफ़ मुड़ कर बांगला में बोले, "भद्रलोक कि बैष्णब कोबिता जाने?" (क्या इस महाशय को वैष्णव कविता पता है?) जब देबू ने बिमल दा को बताया कि गुलज़ार को बांगला समझ आती है, तो बिमल दा को शर्म आ गई। ख़ैर, बिमल दा ने गुलज़ार को सिचुएशन समझाया और सचिन दा के पास भेज दिया धुन सुनने के लिए। दादा बर्मन से धुन लेकर गुलज़ार चले गये घर और एक सप्ताह बाद गीत लेकर वापस पहुँच गये सचिन दा के पास। सचिन को जब गीत सुनाया तो उन्हें पसन्द आया। गुलज़ार ने पूछा कि क्या मैं बिमल दा को जा कर गीत सुना दूँ? सचिन ने पूछा कि क्या तुम्हे गाना आता है? गुलज़ार के ना कहने पर सचिन ने उन्हें बिमल दा को गीत सुनाने से मना करते हुए कहा, "अरे तुम कैसा भी सुनायेगा और हमारा ट्युन रीजेक्ट हो जायेगा"। ख़ैर, बिमल राय को गीत और धुन, दोनों बहुत पसन्द आया और गायिका के रूप में लता मंगेशकर का नाम चुन लिया गया। गुलज़ार को ये सब कुछ सपना जैसा लग रहा था। एक सप्ताह पहले वो एक गराज में मकेनिक थे और एक सप्ताह बाद उनके लिखे पहले फ़िल्मी गीत के साथ सचिनदेव बर्मन और लता मंगेशकर का नाम जुड़ रहा था। वाकई यह किसी सपने से कम नहीं था।

बिमल राय
"मोरा गोरा अंग लै ले" की सिचुएशन कुछ ऐसी थी कि नूतन, यानी कल्याणी, मन ही मन बिकाश, यानी अशोक कुमार को चाहने लगी है। एक रात चुल्हा-चौका समेट कर गुनगुनाती हुई बाहर निकल रही है। इस सिचुएशन पर यह गीत आता है। गीत बनने के बाद बिमल राय और सचिन देव बर्मन के बीच एक और विवाद खड़ा हो गया। बिमल दा चाहते थे कि गीत घर के अन्दर फ़िल्माया जाये, जबकि सचिन देव बर्मन आउटडोर के लिए इन्टरल्युड बना चुके थे। बिमल राय ने तर्क दिया, यह कहते हुए कि ऐसा करेक्टर घर से बाहर जाकर नहीं गा सकती। सचिन दा ने कहा कि बाहर नहीं जायेगी तो बाप के सामने गायेगी कैसे? दादा बर्मन के सवाल पर बिमल राय ने दलील दी कि बाप से हमेशा वैष्णव कवितायें सुना करती हैं तो गा क्यों नहीं सकती? सचिन दा बोले, "यह कविता पाठ नहीं है दादा, यह गाना है"। इस बात पर बिमल दा बोले कि तो फिर कविता लिखो, वो कविता गायेगी। अब सचिन देव बर्मन को झल्लाहट होने लगी। फिर भी उन्होंने अपनी दलील दी कि गाना घर में घुट जायेगा। उनके इस बात पर बिमल दा ने कहा कि तो फिर आंगन में ले जाओ, लेकिन बाहर नहीं जायेगी। सचिन देव अब इस बात पर अड़ गये कि अगर वो बाहर नहीं जायेगी तो हम भी गाना नहीं बनायेगा। इस तरह थोड़ी देर बहस चलती रही। और बाद में दोनों ने डिसाइड किया कि चलो कल्याणी यानी नूतन को घर के आंगन में ले जाते हैं और तय हो गया कि यह गाना कल्याणी आंगन में ही गायेगी। बिमल राय और दादा बर्मन ने अब गुलज़ार से बोला कि अब तुम इस गाने को आंगन का गाना बनाओ। गुलज़ार फिर देबू के पास गये। उससे वैष्णव कवितायें ली, जो कल्याणी अपने पिता से सुना करती थी। बिमल दा ने गुलज़ार से कहा कि सिचुएशन कुछ ऐसी होगी कि रात का वक़्त है, कल्याणी को यह डर है कि चाँदनी रात में उसे कोई देख न ले। इसलिए वो घर से बाहर नहीं जा रही है। वो आंगन से आगे नहीं जा पाती। इस पर सचिन देव बर्मन ने भी अपनी बात ऐड कर दी, चांदनी रात में भी वो डरती तो है, मगर बाहर चली आयी है। अब मुड़-मुड़ कर आंगन की तरफ़ देखती है, ऐसा कुछ भी होगा, इस पर भी कुछ लिखो। तो गुलज़ार साहब ने बिमल राय और सचिन देव बर्मन, दोनों की बातों को मिला कर, कल्याणी की हालत समझ कर जो गीत लिखा, वह गीत था "मोरा गोरा अंग लै ले, मोहे श्याम रंग दै दे"। क्या मास्टरपीस गीत लिखा गुलज़ार ने। इस गीत को सुनने के बाद शैलेन्द्र ने भी स्वीकार किया कि इतना अच्छा शायद वो भी नहीं लिख पाते इस सिचुएशन पर। बिमल दा और शैलेन्द्र, दोनो यह चाहते थे कि 'बन्दिनी' के बाकी के गीत भी गुलज़ार ही लिखे। पर सचिन देव बर्मन ने गुलज़ार जैसे नये गीतकार के साथ काम करने से मना कर दिया। जल्द ही उनकी शैलेन्द्र से दोस्ती हो गई और उन्होंने ऐलान किया कि इस फ़िल्म के बाकी गीत शैलेन्द्र ही लिखेंगे। सचिन दा का मिज़ाज कुछ ऐसा हुआ करता था कि उनकी बात को टालना किसी के बस की बात नहीं होती। इस बात पर बिमल दा और शैलेन्द्र, दोनों को गुलज़ार के लिए बुरा लगा, पर गुलज़ार ने कुछ भी नहीं कहा और शैलेन्द्र जी को उनकी कुर्सी वापस देते हुए कहा कि यह आप ही की कुर्सी है, आप ही सम्भालिये। बस, इतनी सी है इस गीत के पीछे की कहानी। लीजिए, अब आप भी उस गीत को सुनिए।

फिल्म - बंदिनी : 'मोरा गोरा अंग लइले मोहे श्याम रंग दइदे...' : लता मंगेशकर : संगीत - सचिनदेव बर्मन : गीत - गुलजार 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ