सोमवार, 5 मई 2014

हसरत की कलम से निकला मुकेश का गाया ये दर्दभरा गीत

खरा सोना गीत - आंसू भरी है ये जीवन की राहें....

हमारे प्रस्तोता अनुज श्रीवास्तव के साथ आज याद करें मुकेश के इस क्लासिक गीत की. स्क्रिप्ट है सुजॉय चट्टर्जी की और प्रस्तुति में मेहनत है संज्ञा टंडन की...लीजिये सुनिए.
  

रविवार, 4 मई 2014

अनूठा तालवाद्य नक्कारा अथवा नगाड़ा



स्वरगोष्ठी – 166 में आज

संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला – 4

'नक्कारखाने में तूती की आवाज़'- अब तो इस मुहावरे का अर्थ ही बदल चुका है 

'तूती के शोर में गुम हुआ नक्कारा'  





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ की चौथी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ कम प्रचलित, लुप्तप्राय अथवा अनूठे वाद्यों की चर्चा कर रहे हैं। वर्तमान में प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख आज भी उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का उल्लेख करेंगे। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे एक ऐसे तालवाद्य की चर्चा करेंगे जिसका लोकसंगीत और लोकनाट्य में सर्वाधिक प्रयोग किया जाता रहा है। नक्कारा अथवा नगाड़ा नामक यह वाद्य अपनी ऊँची आवाज़ और विशिष्ट वादन शैली के कारण पिछली शताब्दी का सर्वाधिक लोकप्रिय तालवाद्य रहा है। आज भी कभी-कभी नक्कारा का उपयोग नज़र आ जाता है, परन्तु धीरे-धीरे यह लुप्तप्राय होता जा रहा है।  


ज के अंक में हम आपके साथ एक ऐसे लोक ताल वाद्य के बारे में चर्चा कर रहे हैं जो भारतीय ताल वाद्यों में सबसे प्राचीन है, किन्तु आज इस वाद्य के अस्तित्व पर ही संकट के बादल मँडरा रहे हैं। एक मुहावरा है- ‘नक्कारखाने में तूती की आवाज़’, जिसे हम बचपन से सुनते आ रहे हैं और समय-समय पर इसका प्रयोग भी करते रहते हैं। ऐसे माहौल में जहाँ अपनी कोई सुनवाई न हो या बहुत अधिक शोर-गुल में अपनी आवाज़ दब जाए, वहाँ हम इसी मुहावरे का प्रयोग करते हैं। परन्तु ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आने वाले समय में यह मुहावरा ही अर्थहीन हो जाएगा, क्योंकि ऊँचे सुर वाला तालवाद्य नक्कारा या नगाड़ा ही नहीं बचेगा तो तूती (एक छोटे आकार और ऊँचे स्वरों वाला सुषिर वाद्य) की आवाज़ भला क्यों दबेगी?

नाथूलाल सोलंकी 
'नक्कारा' अथवा 'नगाड़ा' अतिप्राचीन घन वाद्य है। प्राचीन ग्रन्थों में इसका उल्लेख 'दुन्दुभी' नाम से किया गया है। देवालयों में इस घन वाद्य का प्रयोग ‘नौबत’ के अन्तर्गत प्राचीन काल से ही किया जा रहा है। नौबतखाना में नौ वाद्यों का समूह होता है, जिसमें अन्य वाद्यों- दमामा, कर्णा, सुरना, नफीरी, श्रृंगी, शंख, घण्टा और झाँझ के साथ नक्कारा का प्रयोग भी किया जाता है। परन्तु मन्दिरों में नक्कारा की भूमिका ताल वाद्य के रूप में नहीं, बल्कि प्रातःकाल मन्दिर के कपाट दर्शनार्थ खुलने की अथवा सांध्य आरती आदि की सूचना भक्तों अथवा दर्शनार्थियों को देने के रूप में होती रही है। अधिकांश मन्दिरों में यह परम्परा आज भी कायम है। मन्दिरों के अलावा नक्कारे का प्रयोग प्रचीनकाल में युद्धभूमि में भी किया जाता था| परन्तु यहाँ भी नक्कारा तालवाद्य नहीं, बल्कि सैनिकों के उत्साहवर्धन के लिए प्रयोग किया जाने वाला वाद्य ही था। ताल वाद्य के रूप में नक्कारा अथवा नगाड़ा लोक संगीत और लोक नाट्य का अभिन्न अंग रहा है। हिमांचल प्रदेश से लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान तक के विस्तृत क्षेत्र के लोक संगीत में इस ताल वाद्य का प्रयोग किया जाता रहा है। अब हम प्रस्तुत कर रहे है, स्वतंत्र नक्कारा वादन। वादक है, राजस्थान के चर्चित लोक कलाकार नाथूलाल सोलंकी। यह प्रस्तुति आठ मात्रा के कहरवा ताल में की गई है।



स्वतंत्र नक्कारा वादन : आठ मात्रा कहरवा ताल : वादक – नाथूलाल सोलंकी





मुबारक बेगम 
कव्वाली गायक शंकर और शम्भू 
पौराणिक काल में दो भिन्न ध्वनियों वाले अवनद्ध वाद्य का उल्लेख मिलता है, जिसे ‘सम्बल’ नाम से जाना जाता था। वर्तमान नक्कारा अथवा नगाड़ा इसी वाद्य का विकसित रूप है। यह धातु अथवा लकड़ी के दो खोखले अर्द्धगोलाकार आकृति पर चर्म मढ़ कर बनाया जाता है। नक्कारा के बड़े हिस्से अर्थात बाएँ हिस्से का व्यास 75 से लेकर 120 सेंटीमीटर तक होता है। यह निचले स्वरों की उत्पत्ति करता है। वादन के दौरान वादक प्रायः पानी से भीगे कपड़े इसके सतह पर फेरते रहते हैं। इस क्रिया से इसकी ध्वनि ऊँची नहीं होती और इसकी गूँज बनी रहती है। नक्कारा के दाएँ हिस्से को ‘झील’ या ‘डुग्गी’ कहा जाता है। इसका व्यास 25 से लेकर 40 सेंटीमीटर तक होता है। इसका स्वर काफी ऊँचा होता है। वादक प्रायः इस हिस्से पर मढ़े चमड़े को आग से सेंक कर बजाते हैं। इससे टंकार उत्पन्न होता है। यह वाद्य लकड़ी के दो चोब के प्रहार से बजाया जाता है। जब कुशल वादक नक्कारा वादन करते हैं तो बिना माइक्रोफोन के इसकी आवाज़ दूर-दूर तक पहुँचती है। लोकगीतों के साथ तालवाद्य के रूप में आमतौर पर ढोलक और नक्कारा का प्रयोग होता रहा है। शहनाई या सुन्दरी वाद्य के साथ नक्कारा की संगति बेहद कर्णप्रिय होती है। अठारहवीं शताब्दी से हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अत्यन्त लोकप्रिय लोकनाट्य शैली ‘नौटंकी’ का तो यह अनिवार्य संगति वाद्य होता है। लोकनाट्य शैली नौटंकी को विभिन्न क्षेत्रों में सांगीत, स्वांग, रहस, भगत आदि नामों से भी पुकारा जाता है। नौटंकी संगीत प्रधान नाट्य शैली है जिसका कथानक पौराणिक, ऐतिहासिक अथवा लोकगाथाओं पर आधारित होता है। अधिकतर संवाद गेय और छन्दबद्ध होते हैं। नौटंकी के छन्द दोहा, चौबोला, दौड़, बहरेतबील, लावनी आदि के रूप में होते हैं। नौटंकी का ढाँचा पूरी तरह छन्दबद्ध होता है और इसके कलाकार काफी ऊँचे स्वर में गायन करते हैं, इसीलिए ऊँचे स्वर वाला नक्कारा ही इन छन्दों के लिए अनुकूल संगति वाद्य है। आइए अब हम आपको प्रसिद्ध नौटंकी ‘लैला मजनूँ’ के कुछ छंदों का रसास्वादन कराते है। इन अंशों में नक्कारे की आकर्षक संगति की गई है। इन प्रसंगों को हमने 1966 की फिल्म ‘तीसरी कसम’ से लिया है। चर्चित गीतकार शैलेन्द्र की यह महत्वाकांक्षी फिल्म थी जिसमें संगीतकार शंकर जयकिशन ने लोकगीतों की मौलिकता को बरक़रार रखा। इसी फिल्म के एक प्रसंग में ग्रामीण मंच पर नौटंकी ‘लैला मजनूँ’ का मंचन हो रहा है। अभिनेत्री वहीदा रहमान नौटंकी की नायिका हैं। नौटंकी के दोहा, चौबोला, दौड़ और बहरेतबील छंदों के उदाहरण इस अंश में उपस्थित है। अपने समय के चर्चित कव्वाली गायक शंकर व शम्भू तथा पार्श्वगायिका मुबारक बेगम ने इन अंशों में अपने स्वर दिये हैं। नौटंकी लोकनाट्य में नक्कारा एक संगति वाद्य के रूप में कितना महत्त्वपूर्ण है, इसका स्पष्ट अनुभव आपको यह संगीत अंश सुन कर सहज ही होगा। आप इन छंदों का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



नक्कारा संगति: नौटंकी – लैला मजनूँ : फिल्म – तीसरी कसम : स्वर – शंकर, शम्भू और मुबारक बेगम : संगीत – शंकर जयकिशन






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 166वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक कम प्रचलित वाद्य पर राग रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 170वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – संगीत रचना के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – यह रचना किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 168वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 164वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको परदे वाले अप्रचलित गज-तंत्र वाद्य मयूर वीणा के वादन का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। इस जाति के वाद्य- इसराज, दिलरुबा, तार शहनाई, ताऊस और मयूर वीणा की बनावट और इनके स्वर निकास में काफी समानता होती है। पहले प्रश्न के रूप में हमने वाद्ययंत्र का नाम पूछा था, जिसका सही उत्तर है- मयूर वीणा। परन्तु जिन प्रतिभागियों ने इसके समान वाद्यों का उल्लेख किया है, उनके उत्तर को भी हमने सही माना है। पहेली के दूसरे दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग मारू बिहाग। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी (इसराज), हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी (तार शहनाई/दिलरुबा) तथा हमारी एक नई संगीतसाधिका पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने (दिलरुबा) दिया है। चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह ने और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने केवल दूसरे प्रश्न का सही उत्तर दिया है। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात




मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हमने संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला के आज के अंक में हमने एक लुप्तप्राय अवनद्ध वाद्य नक्कारा अथवा नगाड़ा के बारे में चर्चा की। अगले अंक में हम एक अप्रचलित तंत्रवाद्य पर चर्चा करेंगे। इस प्राचीन किन्तु कम प्रचलित वाद्य की बनावट, इसके गुण और इसकी वादन शैली हमारी चर्चा के केन्द्र में होगा। आप भी अपनी पसन्द के गीत-संगीत की फरमाइश हमे भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे एक नए अंक के साथ हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे। 



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

शनिवार, 3 मई 2014

"आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये...", सच में नाज़िया और बिद्दु ने बात बना दी थी इस गीत में


एक गीत सौ कहानियाँ - 30
 

'आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये तो बात बन जाये...' 





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कम सुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह साप्ताहिक स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 30वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'क़ुर्बानी' के गीत "आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये..." के बारे में।




नाज़िया हसन
बिद्दु
डिस्को, यूरो-डिस्को और इण्डि-पॉप के नीव रखवाने और इन्हें लोकप्रियता की बुलन्दियों तक पहुँचाने में जिन कलाकारों का नाम लिया जाता है, उनमें एक महत्वपूर्ण नाम है बिद्दु का। बिद्दु अप्पय्या का जन्म कर्नाटक में हुआ। 60 के दशक में उन्होंने अपना करीयर एक म्युज़िक बैण्ड के रूप में यहीं से शुरु किया पर जल्द ही इंग्लैण्ड स्थानान्तरित हो गए और एक म्युज़िक प्रोड्युसर के रूप में कार्य करने लगे। पाँच दशक लम्बे उनके करीयर में उन्होंने संगीतकार, गीतकार, गायक और निर्माता की भूमिकाएँ निभाईं और बेहद चर्चित व सफल रहे। उनके द्वारा स्वरबद्ध "आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये..." गीत के बारे में जानने से पहले यह ज़रूरी है कि इस गीत से पहले के उनके संगीत यात्रा पर नज़र डाली जाये। उनके द्वारा निर्मित पहला हिट गीत 1969 में जापानीज़ बैण्ड 'The Tigers' के लिए आया। उसके बाद 1972 में अंग्रेज़ी फ़िल्म 'Embassy' में उनके द्वारा रचा साउण्डट्रैक सराहा गया। इसके बाद उनके शुरुआती डिस्को गीतों ने 70 के दशक के आरम्भिक वर्षों में ब्रिटिश क्लबों में लोकप्रियता हासिल किये। उन्हें पहली बार अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति मिली 1974 में कार्ल डॉगलस द्वारा गाये "Kung Fu Fighting" गीत से जिसे उन्होंने प्रोड्युस और कम्पोज़ किया। दिलचस्प बात है कि उनके इस कम्पोज़िशन का प्रयोग लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने 1980 की फ़िल्म 'राम बलराम' में "यार की ख़बर मिल गई" गीत में किया। हैरत में डालने वाली एक और बात यह है कि "Kung Fu Fighting" के बनने के कई वर्ष पहले, 1966 में, तमिल संगीतकार एम. एस. विश्वनाथन ने तमिल फ़िल्म 'नदोदी' के लिए लगभग इसी धुन पर एक गीत कम्पोज़ किया था जिसके बोल थे "उलगम एलुगुम..."। क्या बिद्दु इस गीत से प्रेरित होकर "Kung Fu Fighting" की रचना की थी, कहना मुश्किल है। पर सच यही है कि इस गीत ने बिद्दु को विश्व भर में मशहूर बना दिया। इस गीत के एक करोड़ रेकॉर्ड्स बिके और यह न केवल एक 'all time best-selling singles' के रूप में मशहूर हुआ बल्कि इसने डिस्को संगीत को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यूरोप की तरफ़ से अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए यह पहला डिस्को गीत था, और इसने बिद्दु को सबसे ज़्यादा चर्चित ग़ैर-अमरीकी डान्स-म्युज़िक प्रोड्युसर की उपाधि दिला दी।

फिर इसके बाद बिद्दु कामयाबी की नई-नई ऊँचाइयाँ चढ़ते चले गए। बहुत सारे रेकॉर्ड्स बने, जिनमें कई बेस्ट-सेलर्स भी रहे। 70 के ही दशक के अन्त में पाश्चात्य डिस्को एशिया में भी लोकप्रिय होने लगा। भारत में बप्पी लाहिड़ी ने डिस्को को लोकप्रिय बनाया, 'डिस्को डान्सर' फ़िल्म इसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण उदाहरण है। पर उस दौरान भारत में ऐसा कोई कलाकार नहीं था जिसे "डिस्को स्टार" कहा जा सके। और यही वजह 1979 में फ़िल्मकार फ़िरोज़ ख़ान को इंगलैण्ड ले गया बिद्दु के पास। फ़िरोज़ ख़ान चाहते थे कि उनकी अगली फ़िल्म 'कुर्बानी' में एक ऐसा गीत रहे जिसे सुनते ही लोग उससे जुड़ जाये और ज़ुबाँ-ज़ुबाँ पर फ़ौरन चढ़ जाये। फ़िल्म के मुख्य संगीतकार के रूप में कल्याणजी-आनन्दजी काम कर रहे थे, पर फ़िरोज़ ख़ान को जिस गीत की तलाश थी वो नहीं मिल पा रही थी। शुरु-शुरु में बिद्दु किसी हिन्दी फ़िल्मी गीत कपोज़ करने के लिए तैयार नहीं थे, पर सोच विचार के बाद फ़िरोज़ ख़ान के इस ऑफ़र को स्वीकारते हुए कहा कि शायद इससे मेरी माँ, जो कि भारत में है, ख़ुश हो जायेगी। बिद्दु को "आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये" तैयार करने में समय नहीं लगा। इस गीत की धुन उनकी पहली कई धुनों से मेल खाती है। ख़ास कर 1976 की टिना चार्ल्स का हिट गीत "Dance Little Lady Dance" से इस गीत का स्वरूप काफ़ी हद तक मेल खाता है।


नाज़िया और ज़ोहेब
फिरोज खान
इन्हीं दिनो फ़िरोज़ ख़ान के एक दोस्त ने उनकी मुलाक़ात 15-वर्षीया नाज़िया हसन से करवाई लंदन की किसी पार्टी में। जिस तरह से बिद्दु मूल रूप से भारतीय थे, वैसे ही नाज़िया हसन पाक़िस्तानी मूल की थीं, और इंग्लैण्ड में पल-बढ़ रही थीं। 70 के दशक में नाज़िया ने पाक़िस्तान में बतौर बाल-गायिका कई गीत गा चुकी थीं। तो उस पार्टी में ख़ान साहब ने नाज़िया को गाते हुए सुना, उनकी आवाज़ उन्हें पसन्द आई, और नाज़िया से कहा कि वो बिद्दु के पास जा कर एक ऑडिशन दे आये। "आप जैसा कोई..." गीत के लिए जिस आवाज़ की ज़रूरत थी, वह आवाज़ नाज़िया के गले में बिद्दु ने पायी, और फ़ौरन इस गीत के लिए उन्हें चुन लिया। नाज़िया ने यह प्रस्ताव हाथों-हाथ ग्रहण किया। इन्दीवर के लिखे लगभग 3 मिनट 45 सेकण्ड्स अवधि के इस गीत को फ़िल्म में एक आइटम नंबर के रूप में दर्शाया गया और इसे ज़ीनत अमान पर फ़िल्माया गया है। नाज़िया हसन की आवाज़ नैज़ल थी। बिद्दु ने इको ईफ़ैक्ट के लिए इसे बैकट्रैक करने की सोची। लंदन में इस गीत की रेकॉर्डिंग हुई और फ़िल्म-संगीत इतिहास का यह वह पहला गीत था जिसकी रेकॉर्डिंग कुल 24 ट्रैक पर हुई। 1980 में रिलीज़ हुई 'क़ुर्बानी'। फ़िल्म सुपर-डुपर हिट हुई, और इसके गानें भी उतने ही लोकप्रिय हुए। "लैला ओ लैला" और "आप जैसा कोई" गीतों को सर्वाधिक लोकप्रियता मिली। नाज़िया हसन रातों-रात मशहूर हो गईं। सिर्फ़ भारत में ही नहीं, समूचे दक्षिण एशिया में इस गीत ने हलचल पैदा कर दी। उस वर्ष 'बिनाका गीतमाला' के वार्षिक काउण्टडाउन में 'क़ुर्बानी' के कुल चार गीत शामिल थे। 26 और 27 पायदान पर "अल्लाह को प्यारी है क़ुर्बानी" और "क्या देखते हो सूरत तुम्हारी" थे, 6 पर "लैला मैं लैला" तथा 4 पर रहा "आप जैसा कोई..."। इस गीत ने उस वर्ष कई मशहूर गीतों को पीछे छोड़ दिया जैसे कि "परदेसिया यह सच है पिया", "हमें तुमसे प्यार कितना", "छू कर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा", "आनेवाला पल जानेवाला है", "जब छाये मेरा जादू" आदि। उस वर्ष फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ गायिका के लिए जिन पाँच गायिकाओं का नामांकन हुआ, वो सभी नई पौध की गायिकायें थीं। "आप जैसा कोई" के लिए नाज़िया तो थीं ही, इसी फ़िल्म की "लैला मैं लैला" के लिए कंचन, 'आप तो ऐसे न थे' फ़िल्म के "तू इस तरह से मेरी ज़िन्दगी में शामिल है" के लिए हेमलता, 'गृहप्रवेश' फ़िल्म के "पहचान तो थी" के लिए चन्द्राणी मुखर्जी और 'प्यारा दुश्मन' फ़िल्म के "हरि ओम हरि" के लिए उषा उथुप के बीच टक्कर थी। और विजेता बनी नाज़िया हसन। नाज़िया न केवल पहली पाक़िस्तानी गायिका थीं जिसने किसी हिन्दी फ़िल्म के लिए गाया, बल्कि 15 वर्ष की आयु में फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार जीतने वाली सबसे कम आयु की गायिका होने का रेकॉर्ड भी कायम किया।

"आप जैसा कोई" की अपार सफलता को देखते हुए बिद्दु ने नाज़िया हसन और उनके भाई ज़ोहेब हसन को लेकर एक उर्दू पॉप ऐल्बम बनाने की सोची। इस तरह का कोई ऐल्बम इससे पहले भारतीय उपमहाद्वीप में नहीं आया था। बिद्दु ने नाज़िया और ज़ोहेब को उस समय के अमरीकी लोकप्रिय भाई-बहन जोड़ी 'The Carpenters' जैसी शक्ल देने की कोशिश की। बिद्दु ने "आप जैसा कोई" की तरह कुछ गीत कम्पोज़ कर 'डिस्को दीवाने' नामक ऐल्बम में जारी किया 1981 में। एशिया, दक्षिण अफ़्रीका और दक्षिण अमरीका के देशों में इसने ख़ूब लोकप्रियता हासिल की। तब तक कि यह एशिया की 'बेस्ट-सेलर' ऐल्बम रही है। हर कलाकार का अपना समय होता है, अपना दौर होता है जब वो आसमान की बुलन्दियों को छूता है। बिद्दु और नाज़िया का भी यह वही समय था। डिस्को की लोकप्रियता भी उस वक़्त सर चढ कर बोल रही थी। आज वह दौर गुज़र चुका है। नाज़िया भी अल्लाह को प्यारी हो चुकी हैं बहुत ही कम उम्र में। लेकिन जब-जब डिस्को के दौर का ज़िक्र होगा, तब-तब बिद्दु और नाज़िया हसन के इन गीतों का ज़िक्र होगा। और इस ज़िक्र में "आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये" सबसे उपर आयेगा। बस, इतनी सी है इस गीत की कहानी! अब आप यह गीत सुनिए।



फिल्म - कुर्बानी : 'आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आये...' : गायिका - नाज़िया हसन : संगीत - बिद्दू : गीत - इन्दीवर





अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ