शनिवार, 4 अगस्त 2012

'सिने पहेली' के नए सेगमेण्ट की शुरुआत किशोर कुमार की याद के साथ...


सिने-पहेली # 31 (4 अगस्त, 2012) 


'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार, और स्वागत है आप सभी का 'सिने पहेली' स्तंभ में। प्रतियोगियों के अनुरोध पर आज से यह स्तंभ सोमवार के स्थान पर शनिवार को प्रकाशित हुआ करेगा। तीसरे सेगमेण्ट में कुल 26 खिलाड़ियों ने भाग लिया था, अब हम उम्मीद करेंगे कि चौथे सेगमेण्ट में यह संख्या बढ़ कर दुगुनी हो जाए! आप सब अपने सगे-संबंधियों, दोस्तों और सहयोगियों से इस प्रतियोगिता से जुड़ने का सुझाव दें। जितने ज़्यादा प्रतियोगी इसमें भाग लेंगे, खेल उतना ही ज़्यादा मज़ेदार व मनोरंजक बन पड़ेगा।

आज से 'सिने पहेली' का चौथा सेगमेण्ट शुरू हो रहा है जो अगले दस सप्ताह तक चलेगा। आइए आज सबसे पहले आपको बता दें 'सिने पहेली' प्रतियोगिता के नियम।

कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता'?


1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा। 

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। तीसरे सेगमेण्ट की समाप्ति पर अब तक का 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...



4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

तो चलिए शुरू किया जाए 'सिने पहेली' का चौथा सेगमेण्ट, अर्थात् 'सिने पहेली' # 31

आज की पहेलियाँ : बूझो तो जाने...


दोस्तों, आज 4 अगस्त है। गायक और हरफ़नमौला कलाकार, हम सब के चहेते, किशोर कुमार का जनमदिवस। इसलिए आइए किशोर दा के गाये गीतों पर आधारित करें आज की पहेलियाँ। नीचे हम पाँच पहेलियाँ लिख रहे हैं, हर पहेली के लिए आपको पहचानना है गीत। अर्थात् आपको बताना है कि प्रत्येक पहेली किस गीत की तरफ़ इशारा कर रही है। तो ये रही आज की पहेलियाँ...



किशोर बने बंगाली बाबू, मद्रासी बनीं आशा, 
प्रेम निवेदन करते करते गूँजी प्यार की भाषा।





चुटकुले पे चुटकुला, किशोर दा चले सुनाते हुए,
बच्चों के संग बच्चे बन कर काका हैं छाए हुए।  




पंचम ने कहा किशोर से, लाया हूँ एक गाना राग शिवरंजिनी जैसा,
तेरे राग की ऐसी तैसी, पहले लता से गवा, तब गाऊँगा बिलकुल वैसा।  


यार को अल्लाह कहती किशोर दा की ये गजल,
सुर्खियों में न आ पाई, पर हीरा है असल।   


बाप और बेटे, दोनों के होठों पर सजा है यह गीत,
रोमीयो बने युवाओं को ख़ूब भाया यह गीत,
मुखड़े के पहले तीन शब्दों को लेकर बनी है एक फ़िल्म,
मुखड़े के अन्य चार शब्दों को लेकर भी बनी है एक फ़िल्म,
किस गीत की बात हो रही है, क्या आपको है यह इल्म?


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और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम....

1. उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

2. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 31" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान अवश्य लिखें।

3. आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 9 अगस्त शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।

4. सभी प्रतियोगियों ने निवेदन है कि सूत्र या हिंट के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के किसी भी संचालक या 'सिने पहेली' के किसी भी प्रतियोगी से फ़ोन पर या ईमेल के ज़रिए सम्पर्क न करे। हिंट माँगना और हिंट देना, दोनों इस प्रतियोगिता के खिलाफ़ हैं। अगर आपको हिंट चाहिए तो अपने दोस्तों, सहयोगियों या परिवार के सदस्यों से मदद ले सकते हैं जो 'सिने पहेली' के प्रतियोगी न हों।

तो बस अब जुट जाइए आज की पहेलियों के समाधान के लिए और निर्धारित समय सीमा के भीतर लिख भेजिए अपने जवाब। मैं आपसे फिर मिलूँगा अगले शनिवार 'सिने पहेली' की 32-वीं कड़ी के साथ। तब तक के लिए अनुमति दीजिए, नमस्कार!

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

कहानी पॉडकास्ट - वापसी - उषा प्रियंवदा - शेफाली गुप्ता

'बोलती कहानियाँ' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने शेफाली गुप्ता की आवाज़ में सुधा ओम ढींगरा की कथा "बिखरते रिश्ते" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार उषा प्रियंवदा की कहानी "वापसी", जिसको स्वर दिया है शेफाली गुप्ता ने।

"वापसी" का पाठ्य हिन्दी साहित्य ब्लॉग पर उपलब्ध है।

इस कहानी का कुल प्रसारण समय 22 मिनट 10 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

उषा प्रियंवदा आज हिंदी कहानी का एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। परिवार और समाज की विसंगतियों और विडंबनाओं को उन्होंने जितनी सूक्ष्मता से चित्रित किया है, उतनी ही व्यापकता में व्यक्ति के बाह्य और आंतरिक संसार के बीच के संबंध को भी उकेरा है।
tu।

हर शुक्रवार को "बोलती कहानियाँ" पर सुनें एक नयी कहानी

"पढने का तो बहाना है, कभी जी ही नहीं लगता।"
(उषा प्रियंवदा की "वापसी" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
(लिंक पर राइटक्लिक करके सेव ऐज़ का विकल्प चुनें)

#27th Story, Vapasi: Usha Priyamvada/Hindi Audio Book/2012/27. Voice: Shaifali Gupta

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल – 8


भूली-बिसरी यादें


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में आयोजित विशेष श्रृंखला ‘स्मृतियों के झरोखे से’ के एक नये अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने सहयोगी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी के साथ आपका स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में प्रत्येक मास के पहले और तीसरे गुरुवार को हम आपके लिए लेकर आते हैं, मूक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर के कुछ रोचक तथ्य और दूसरे हिस्से में सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर की कोई उल्लेखनीय संगीत रचना और रचनाकार का परिचय। आज के अंक में हम आपसे इस युग के कुछ रोचक तथ्य साझा करेंगे। 



‘राजा हरिश्चन्द्र’ से पहले : उत्कृष्ट वृत्त-चित्रों से आगे बढ़ा भारतीय फिल्मों का काफिला

भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में भावी फिल्मों के लिए दिशा की खोज जारी थी। मुहावरे गढ़े जा रहे थे। 3मई, 1913 को भारत में निर्मित पहली कथा-फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ तक पहुँचने में भारतीय फ़िल्मकारों को 17वर्ष लगे। 1896 से 1913 तक की अवधि में भारतीय फ़िल्मकार दो अलग-अलग दिशाओं में सक्रिय रहे। एक वर्ग फिल्म के निर्माण में तो दूसरा वर्ग फिल्म के व्यावसायिक प्रदर्शन के क्षेत्र में सलग्न था। बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में कथा-फिल्म की अवधारणा का जन्म तो हुआ परन्तु दिशा की तलाश की जा रही थी। हाँ, इस दौर में कुछ अच्छे वृत्त-चित्र अवश्य बने। 1905 में ज्योतिष सरकार नामक एक स्वप्नदर्शी फ़िल्मकार ने बंग-भंग आन्दोलन के अग्रणी नेता सुरेन्द्रनाथ सेन के व्यक्तित्व और आन्दोलन के औचित्य पर
जे.एफ. मदान
एक प्रभावी वृत्त-चित्र- ‘ग्रेट बेंगाल पार्टीशन मूवमेंट’ का निर्माण किया था। यह भारत में बनाने वाला पहला राजनैतिक वृत्त-चित्र था। इसी प्रकार 1911 में एक ब्रिटिश छायाकर चार्ल्स अर्बन ने ‘दिल्ली दरबार’ का रंगीन फिल्मांकन किया था। चार्ल्स के अलावा दो भारतीय फ़िल्मकारों- हीरालाल सेन और एस.एन. पाटनकर ने भी इस महत्त्वाकांक्षी राजनैतिक समारोह का फिल्मांकन किया था।

फिल्मों के निर्माण के साथ-साथ प्रदर्शन के क्षेत्र में भी प्रयत्न किये जा रहे थे। 1902 में जे.एफ. मदान ने एक फ्रांसीसी कम्पनी से प्रोजेक्टर और फिल्म प्रदर्शन से सम्बन्धित अन्य उपकरण खरीदा और कलकत्ता (अब कोलकाता) के मैदान में अस्थायी सिनेमाघर बना कर फिल्मों का प्रदर्शन आरम्भ किया। मदान ने ही 1907 में बम्बई (अब मुम्बई) में पहला स्थायी सिनेमाघर ‘एल्फ़िल्स्टन पिक्चर पैलेस’ का निर्माण कराया। 1904 में मानेक डी. सेठना ने मुम्बई में ‘टूरिंग सिनेमा कम्पनी’ की स्थापना की और पहली बार नियमित सिनेमा का प्रदर्शन आरम्भ किया। इस नियमित प्रदर्शन का आरम्भ एक विदेशी फिल्म ‘लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ के प्रदर्शन से हुआ। उस दौर में फिल्म-निर्माण और प्रदर्शन के क्षेत्र में किये गए ये कुछ ऐसे प्रयास थे जिन्हें फिल्म-इतिहास के पृष्ठों पर सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा।

सवाक युग के धरोहर : 'पूरन भगत' की बातें और के.सी. डे का स्मरण

वाक फ़िल्मों के पहले दौर में जिन कम्पनियों का फ़िल्म निर्माण में सराहनीय योगदान रहा उनमें एक है कलकत्ता का 'न्यू थिएटर्स'। यह वह कम्पनी है जिसने न केवल रुचिकर फ़िल्में बनाई, बल्कि एक से एक महान कलाकार को मंच दिया, ताकि वे अपनी कला को देश-विदेश तक पहुँचा सकें। रुचिकर फ़िल्में अर्थात वो फ़िल्में जो हर कोई देख सकता था। लता मंगेशकर ने एक बार किसी साक्षात्कार में कहा था कि जब वो छोटी थीं तब उनके पिता दीनानाथ जी उन्हें केवल 'न्यू थिएटर्स' की फ़िल्मों को ही देखने की अनुमति दिया करते थे, क्योंकि उनके हिसाब से इस बैनर की फ़िल्में बहुत शालीन होती थीं और गीत-संगीत भी ऊँचे स्तर का होता था। 'न्यू थिएटर्स' की फ़िल्मों में चलताऊ चीज़ें नहीं होती थीं। कलाकारों की बात करें तो कुन्दनलाल सहगल, कानन देवी, रायचन्द्र बोराल, पंकज मल्लिक, तिमिर बरन, पहाड़ी सान्याल और के.सी. डे जैसे कलाकारों ने इसी कम्पनी की छत्र-छाया में रह कर अपनी यात्रा शुरू की थी और नाम कमाया। बी.एन. सरकार द्वारा गठित 'न्यू थिएटर्स', जिसकी स्थापना 10फ़रवरी 1931 को कलकत्ता में हुई, इस कम्पनी ने 1931 से लेकर 1955 तक करीब 150 फ़िल्मों का निर्माण किया, और न केवल फ़िल्मों में, बल्कि फ़िल्म-संगीत की धरोहर को समृद्ध करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘न्यू थिएटर्स’ की फ़िल्मों के गाने इतने उत्कृष्ट हुआ करते थे कि आने वाली पीढ़ियों के बहुत से दिग्गज कलाकार इस कम्पनी के गीतों से प्रेरित होकर ही इस क्षेत्र में आने की बात करते थे। ‘न्यू थिएटर्स’ ने 1932 में जिन तीन फ़िल्मों के माध्यम से संगीतकार रायचन्द्र बोराल और गायक-अभिनेता कुन्दनलाल सहगल को फ़िल्म-संगीत में उतारा, वो हैं– ‘मोहब्बत के आँसू’, ‘सुबह का सितारा’ और ‘जिन्दा लाश’। 1933 में इसकी तीन महत्त्वपूर्ण फ़िल्में आईं– ‘राजरानी मीरा’, ‘यहूदी की लड़की’, और ‘पूरन भगत’। बोराल और सहगल की जोड़ी ने पुन: अपना जादू जगाया, ‘पूरन भगत’ में। राग बिहाग और यमन-कल्याण पर आधारित “राधे रानी दे डारो ना...” हो या “दिन नीके बीते जाते हैं सुमिरन कर पिया राम नाम...”, फ़िल्म के सभी गीत, जो मूलत: भक्तिरस पर आधारित थे, लोकप्रिय हुए। वैसे सहगल इस फ़िल्म में नायक नहीं थे, सिर्फ़ उनके गाये गीत रखने के लिये उन्हें पर्दे पर उतारा गया था। “राधा रानी…” भजन संगीतकार रोशन के मनपसन्द भजनों में से एक है, ऐसा उन्होंने एक रेडियो कार्यक्रम में कहा था।

के.सी. डे
कृष्णचन्द्र डे, जो के.सी. डे के नाम से भी जाने गए, ने इस फ़िल्म में अभिनय और गायन प्रस्तुत किया था। “जाओ जाओ हे मेरे साधु रहो गुरु के संग...” और “क्या कारण है अब रोने का, जाये रात हुई उजियारा...” जैसे गीत उन्हीं के गाये हुए थे। सहगल और के.सी. डे की दो आवाज़ें एक दूसरे से बिल्कुल ही अलग थीं। एक तरफ़ सहगल की कोमल मखमली आवाज़, तो दूसरी तरफ़ के.सी. डे की बुलन्द आवाज़ थी। के.सी. डे के बारे में यह बताना ज़रूरी है कि वो आँखों से अन्धे थे। कुछ लोग कहते हैं कि वो जन्म से ही अन्धे थे, जबकि कई लोगों का कहना है कि कड़ी धूप में पतंगबाज़ी से उनके आँखों की रोशनी जाती रही। उन्हें फिर ‘अन्ध-कवि’ की उपाधि दी गई। पार्श्वगायक मन्ना डे इन्हीं के भतीजे हैं। मन्ना डे ने सहगल और अपने चाचाजी का ज़िक्र एक रेडियो कार्यक्रम में कुछ इस तरह से किया था- ‘सहगल साहब बहुत लोकप्रिय थे। मेरे सारे दोस्त जानते थे कि मेरे चाचा जी, के.सी. डे के साथ उनका रोज़ उठना-बैठना है। इसलिए उनकी फ़रमाइश पर मैंने सहगल साहब के कई गाने एक दफ़ा नहीं, बल्कि कई बार गाये होंगे। 'कॉलेज-उत्सवों में उनके गाये गाने गा कर मैंने कई बार इनाम भी जीते’। के.सी. डे एक गायक और अभिनेता होने के साथ-साथ एक संगीतकार भी थे।

बतौर संगीतकार के.सी. डे की पहली फ़िल्म थी 'आबे-हयात' (1933), पर यह फ़िल्म नहीं चली। संगीतकार के रूप में उनकी पहली उल्लेखनीय फ़िल्म थी 1934 की 'चन्द्रगुप्त'। भले उन्होंने 'न्यू थिएटर्स' की कई फ़िल्मों में गायन और अभिनय किया, लेकिन संगीतकार भी भूमिका उन्होंने 'ईस्ट इण्डिया फ़िल्म कॉर्पोरेशन' की फ़िल्मों में ही निभाई। इन दो फ़िल्मों के अलावा 1934 की ही फिल्म 'किस्मत की कसौटी', 'शहर का जादू', और 'सीता' में भी उनका संगीत था। 'सीता' में सचिनदेव बर्मन का गाया गीत था और यही वह पहली फ़िल्म थी जिसने कोई अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीता था। वेनिस में 1935 के तीसरे ‘सिनेमेट्रोग्राफ़िक आर्ट एक्जीबिशन’ में उसे स्वर्ण पदक मिला था। के.सी. डे के स्वरबद्ध कुछ और उल्लेखनीय फ़िल्मों के नाम हैं- 'सुनहरा संसार' (1936), 'मिलाप' (1937), 'आँधी' (1940), 'मेरा गाँव' (1942), 'तमन्ना' (1942), 'बदलती दुनिया' (1943), 'सुनो सुनाता हूँ' (1944), 'देवदासी' (1945), 'दूर चलें' (1946)। फ़िल्म संगीत की पाँचवें दशक के अन्त की बदलती धारा में के.सी. डे के नीतिप्रधान, भक्तिप्रधान गानों की कमी आती गई और वो धीरे-धीरे फ़िल्म जगत से दूर चले गए।

'पूरन भगत' के माध्यम से सहगल और के.सी. डे का उल्लेख इस लेख में हुआ, पर यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि न तो सहगल इस फ़िल्म के नायक थे और न ही के. सी. डे। देवकी बोस निर्देशित इस फ़िल्म के नायक-नायिका थे कुमार और अनवरी। फ़िल्म के गीत GCIL-HMV/ Hindustan-New Theatres Label के रेकॉर्ड्स पर जारी किए गए। ये रहे इस फ़िल्म के कुल 20 गीतों की सूची -

1. मोरे महाराजा के भई सन्तान, कैसी खुशी का आज समय है...

2. दु:ख सुख है सब एक समान, सुख की छाई जग में बदरिया...

3. बात कहूँ मैं मन की कैसे कासी, कैसी यह सुगन्ध है...

4. क्या कारण है अब रोने का काली रात हुई उजियारी.... (के.सी. डे)

5. कैसी चलत पवन मस्तानी, छिटकी हुई है चाँदनी...

6. जगत में प्रेम की बंसी बाजे, जाकी बंसी वही को साजे...

7. काहे करे कोई दु:ख नैनन का, कौन बिचारे दु:खड़ा मन का...

8. हे शम्भू हे विश्वनाथ, कैलाशपति हे भोलानाथ...

9. भज भज मन राम चरण निसदिन सुखदाई...

10. गावो जय जय आज भक्तों, भक्ति दिखाती है शक्ति...

11. भजूँ मैं तो भाव से श्री गिरिधारी हृदय से अब... (सहगल)

12. आज जय गावो मिल सब साधु, आज एक साधु की कुटिया पर...

13. सत प्रेम पर नारी के हँसी न सोहाय...

14. सखी री पिया मिलन की आस, जैन करे जवा में...

15. मानव जीवन प्यारे जग का सिंगार, केवल परीक्षा ही है...

16. प्रीतम मेरी आस न तोड़, अब तो प्रेम की आस लगी है...

17. जाओ-जाओ ऐ मेरे साधो रहो गुरू के संग... (के.सी. डे)

18. दिन नीके बीत जात हैं... (सहगल)

19. अवसर बीतो जाए... (सहगल)

20. राधे रानी दे डारो न बंसरी मोरी रे... (सहगल)

फिल्म ‘पूरन भगत : ‘जाओ-जाओ ऐ मेरे साधो रहो गुरू के संग...’ : के.सी. डे



फिल्म ‘पूरन भगत : ‘क्या कारण है अब रोने का...’ : के.सी. डे 



इसी गीत के साथ इस अंक से हम विराम लेते हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के आगामी अंक में बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता की। हमारे अगले अंक में जो आलेख शामिल होगा वह प्रतियोगी वर्ग से होगा। आपके आलेख हमें जिस क्रम से प्राप्त हुए हैं, उनका प्रकाशन हम उसी क्रम से कर रहे हैं। यदि आपने ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के लिए अभी तक अपना संस्मरण नहीं भेजा है तो हमें तत्काल radioplaybackindia@live.com पर मेल करें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र और सुजॉय चटर्जी

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