रविवार, 17 जून 2012

हारमोनियम बनाया अंग्रेजों ने, पर बजाया भैया गणपत राव ने


स्वरगोष्ठी – ७५ में आज

ठुमरी गायन और हारमोनियम वादन के एक अप्रतिम साधक : भैया गणपत राव 

हारमोनियम एक ऐसा सुषिर वाद्य है जिसका प्रयोग आज देश में प्रचलित हर संगीत शैलियों में किया जा रहा है, किन्तु एक समय ऐसा भी था जब शास्त्रीय संगीत के मंचों पर यह वाद्य प्रतिबन्धित रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के ऐसे ही सांगीतिक परिवेश में एक संगीत-पुरुष अवतरित हुआ जिसने हारमोनियम वाद्य को इतनी ऊँचाइयों पर पहुँचा दिया कि आज इसे विदेशी वाद्य मानने में अविश्वास होता है। हारमोनियम वादन और ठुमरी गायन में सिद्ध इस संगीत-पुरुष का नाम है- भैया गणपत राव।
भैया गणपत राव 

‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज के अंक में हम आपसे एक ऐसे संगीत-साधक की चर्चा करेंगे, जिसके कृतित्व को जानबूझ कर उपेक्षित किया गया। ग्वालियर राज-परिवार से जुड़े भैया गणपत राव एक ऐसे ही साधक थे जिन्होने हारमोनियम वादन और ठुमरी-दादरा गायन को उन ऊँचाइयों पर पहुँचाया जिसे स्पर्श करना हर संगीतकार का स्वप्न होता है। उन्नीसवीं शताब्दी के लगभग मध्य-काल में तत्कालीन ग्वालियर नरेश महाराज जयाजीराव सिंधिया के पुत्र के रूप में उनका जन्म हुआ था, किन्तु राजपुत्र होने का गौरव तो दूर, दरबारी संगीतकार के रूप में समुचित स्थान उन्हें कभी नहीं मिला। केवल इसलिए कि गणपत राव महारानी के गर्भ से नहीं, बल्कि राज दरबार की सुप्रसिद्ध गायिका चन्द्रभागा देवी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। यह उपेक्षा केवल गणपत राव को ही नहीं उनके अग्रज भैया बलवन्त राव को भी झेलनी पड़ी, जबकि वे श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त और कुशल वीणा-वादक थे।

पिछले वर्ष मार्च-अप्रैल में मेरे सम्पादक सजीव सारथी ने ‘फिल्मों में ठुमरी’ के प्रयोग विषयक २० कड़ियों की एक लम्बी श्रृंखला लिखने का दायित्व सौंपा था। लगभग तीन-साढ़े तीन सौ फिल्मी ठुमरियों में से काल-क्रम के अनुसार २० फिल्मी ठुमरियों को चुनना तो सरल था किन्तु ठुमरी शैली के इतिहास की बारी आई तो दिग्भ्रमित हो गया। ठुमरी शैली को प्रतिष्ठित स्थान दिलाने और उसके प्रचार-प्रसार में भैया गणपत राव की भूमिका के बारे में बचपन से लेकर युवावस्था तक वाराणसी के कई संगीतज्ञों, विशेष रूप से पण्डित महादेवप्रसाद मिश्र से सुन चुका था। लखनऊ की डॉ. सुशीला मिश्रा और डॉ. श्रीक़ृष्ण नारायण रतञ्जंकर के शिष्य और संगीत-शिक्षक पण्डित सीताशरण सिंह भी ठुमरी की चर्चा छिड़ने पर भैया गणपत राव और उनके शिष्य मौजुद्दीन खाँ के गुणों का उल्लेख अवश्य करते थे। परन्तु ‘फिल्मों में ठुमरी’ विषयक श्रृंखला तैयार करते समय मैंने भैया जी के सांगीतिक योगदान का उल्लेख करने में इतिहासकारों को प्रायः मौन पाया। और यदि उनके बारे में चर्चा की भी गई तो वह भ्रमपूर्ण और अप्रामाणिक। सच तो यही है कि भैया गणपत राव के कृतित्व का सही मूल्यांकन हम नहीं कर सके। बहरहाल, बुजुर्गों से सुनी बातों और भैया जी के विषय में पुस्तकों में उल्लिखित आधे-अधूरे
भैया जी के शिष्य मौजूद्दीन खाँ
तथ्यों के सहारे मैंने अपनी श्रृंखला तो किसी तरह पूरी कर ली थी, परन्तु एक महान संगीतज्ञ के कृतित्व से अपने पाठकों का पूरा परिचय न करा पाने की विवशता से ग्रसित भी था। अचानक पिछले दिनों भैया गणपत राव पर प्रकाशित ‘संगीत’ मासिक पत्रिका के विशेषांक के कारण भैया जी के बारे में बुजुर्गों से प्राप्त अधिकतर जानकारी की पुष्टि हुई। अपने सुने हुए तथ्यों की पुष्टि किसी पुस्तक या पत्र-पत्रिका द्वारा न होने से मैं अपने ठुमरी-श्रृंखला के आलेखों में इन तथ्यों का उल्लेख नहीं कर सका था।

आइए यहाँ थोड़ा रुक कर पहले आपको भैया गणपत राव के प्रमुख शिष्य मौजुद्दीन खाँ के स्वर में एक अत्यन्त प्रसिद्ध ठुमरी- ‘बाजूबन्द खुल खुल जाए....’ सुनवाते हैं। यह दुर्लभ ठुमरी ग्रामोफोन कम्पनी ने १९०८ में रिकार्ड की थी। भैया जी के पूरे जीवन-काल में उनके गायन या हारमोनिया वादन का कोई रिकार्ड नहीं बना था।

मौजुद्दीन खाँ : ठुमरी – “बाजूबन्द खुल खुल जाए...”



अब आइए, थोड़ी चर्चा ‘संगीत’ मासिक के उस विशेषांक की करते हैं, जो भैया गणपत राव के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित है। भारतीय संगीत विषयक यह पत्रिका विगत ७७ वर्षों से प्रकाशित हो रही है। पत्रिका के अंकों में शास्त्रीय गायन-वादन विषय पर विद्वानो के लेख, नवीन सांगीतिक रचनाओं का उल्लेख, स्वरलिपियाँ तथा सुगम और फिल्म संगीत पर भी चर्चा होती है। प्रत्येक वर्ष का पहला अंक एक समृद्ध विशेषांक के रूप में प्रकाशित होता है। इस वर्ष ‘संगीत’ का विशेषांक भैया गणपत राव पर है। सम्पादक मण्डल ने विशेषांक की सामग्री के लिए दतिया के प्रसिद्ध संगीतज्ञ महेशकुमार मिश्र ‘मधुकर’ को दायित्व दिया। यह उचित भी था, क्योंकि ग्वालियर में भैया जी सदा उपेक्षित ही रहे और दतिया-नरेश ने उन्हें सर-आँखों पर बैठाया था। मधुकर जी ने अपने से पहले की पीढ़ी के उन संगीत-साधकों से प्राप्त जानकारियों को आधार बनाया है, जो भैया जी के शिष्य थे। दतिया के रामप्रसाद पंडा से मधुकर जी को पर्याप्त सामाग्री प्राप्त हुई। श्री पंडा और उनके पिता भी भैया जी के शिष्य रहे। इनके अलावा दतिया के कई और संगीत-साधकों का उल्लेख भी मधुकर जी ने किया है। विशेषांक में मधुकर जी की पूरी शोध-सामग्री को अलग-अलग शीर्षकों में बाँटा गया है। जैसे- एक विस्मृत कलाकार, भैया गणपत राव की शिक्षण-पद्यति, उनकी गुरु-शिष्य परम्परा, ग्वालियर में स्थिति और परिस्थितियाँ, भैया जी का जन्म और निधन वर्ष, उनकी प्रिय चीजें और उनकी स्वरलिपियाँ आदि कुछ उल्लेखनीय शीर्षक हैं। मधुकर जी के अनुसार भैया जी की गायी कुछ रचनाएँ, जो संगीत जगत आज भी लोकप्रिय हैं, उन रचनाओं में से एक का रसास्वादन हम आपको भी कराते हैं।

मधुकर जी ने उल्लेख किया है कि राग तिलक कामोद की ठुमरी- ‘कंकर मार जगा गयो रे बम्हना के छोरा....’ भैया जी की एक प्रिय ठुमरी है, जिसे उन्होने भैया जी के शिष्य पंडा जी से प्रत्यक्ष सुनी थी। अब हम आपको यही ठुमरी उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों में सुनवाते हैं, किन्तु खाँ साहब ने यह ठुमरी राग पीलू में गाया है।

उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ : ठुमरी - ‘कंकर मार जगा गयो रे बम्हना के छोरा....’



भैया गणपत राव पर केन्द्रित ‘संगीत’ मासिक के विशेषांक में सम्पादकीय आलेख पत्रिका के विद्वान प्रधान सम्पादक डॉ. लक्ष्मीनारायण गर्ग का है। डॉ. गर्ग ने अपने सम्पादकीय में मधुकर जी द्वारा विभिन्न शीर्षकों में बाँटी गई शोध-सामग्री का एक प्रकार से सारांश प्रस्तुत कर दिया है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि विशेषांक की सामग्री सौंपने के बाद भैया जी की स्मृतियों को समेटने वाले विद्वान मधुकर जी का स्वर्गवास हो गया था। विशेषांक के अन्त में उनके पुत्र विनोद मिश्र ‘सुरमणि’ ने दतिया के समाज गायन का उल्लेख करते हुए पत्रिका के सम्पादक के प्रति आभार व्यक्त किया है।

मधुकर जी ने भैया जी की जिन प्रिय चीजों का उल्लेख किया है, उनमें राग खमाज की एक रचना है- ‘कौन गली गयो श्याम....’, जिसका गायन अनेक प्रतिष्ठित संगीत-साधकों ने किया है। अब हम आपको विदुषी प्रभा अत्रे के स्वरों में यही ठुमरी राग मिश्र खमाज, दीपचंदी ताल में सुनवाते हैं।

विदुषी प्रभा अत्रे : ठुमरी - ‘कौन गली गयो श्याम....’



भैया गणपत राव की प्रिय यह ठुमरी कई फिल्मों में भी गायी गई है। १९७२ में प्रदर्शित फिल्म ‘पाकीज़ा’ में विदुषी परवीन सुलताना ने यही ठुमरी राग पहाड़ी में गाया है। इसी प्रकार १९५९ की फिल्म ‘मधु’ में संगीतकार रोशन ने अन्तरों में परिवर्तन कर यह ठुमरी लता मंगेशकर और मन्ना डे से अलग-अलग गवाया था। हम आपको पहले परवीन सुलताना और फिर लता जी की आवाज़ में यह ठुमरी सुनवाते हैं। आप इन गीतों का रसास्वादन कीजिये और इस अंक को यहीं विराम देने की हमें अनुमति दीजिए। ‘संगीत’ मासिक के सम्पादक-मण्डल को एक उपयोगी विशेषांक प्रकाशित करने के लिए सभी संगीत-प्रेमियों की ओर से आभार और भारतीय संगीत के अप्रतिम साधक भैया गणपत राव की स्मृतियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से नमन!

फिल्म – पाकीज़ा : परवीन सुलताना - ‘कौन गली गयो श्याम....’



फिल्म – मधु : लता मंगेशकर - ‘बता दो कोई कौन गली गयो श्याम....’



आज की पहेली

आज की संगीत-पहेली में हम आपको सुनवा रहे हैं, संगीत-मार्तण्ड ओमकारनाथ ठाकुर के बुलन्द स्वर में स्वतंत्र भारत के प्रथम सूर्योदय पर रेडियो से सजीव रूप से प्रसारित ‘वन्देमातरम’ गीत का एक अंश। इसे सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ८०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक/श्रोता हमारी तीसरी पहेली श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमें राग का नाम बताइए।

२ – संविधान द्वारा राष्ट्रगीत के समतुल्य मान्य इस गीत के रचनाकार (लेखक) कौन हैं?

आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ७७वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। इस अंक में ‘संगीत’ मासिक पत्रिका के ‘भैया गणपत राव विशेषांक’ की चर्चा की गई है। इस पत्रिका के विषय में यदि आपको कोई जानकारी प्राप्त करनी हो या कोई टिप्पणी करनी हो तो अपना सन्देश sangeetkaryalaya101@gmail.com पर भेजें।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ७३वें अंक में हमने आपको पण्डित फिरोज दस्तूर के स्वर में राग यमन की एक रचना का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। हमारे पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग यमन और दूसरे का उत्तर है- पण्डित भीमसेन जोशी। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, जबलपुर की क्षिति तिवारी तथा पटना की अर्चना टण्डन ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

मित्रों, अब हमने आपकी प्रतिक्रियाओं, सन्देशों और सुझावों के लिए एक अलग साप्ताहिक स्तम्भ ‘आपकी बात’ आरम्भ किया है। अब प्रत्येक शुक्रवार को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’पर आपके भेजे सन्देश को आपके साथी अमित तिवारी और दीपा तिवारी अपने सजीव कार्यक्रम में शामिल किया करेंगे। आप हमें swargoshthi@gmail.com के पते पर आज ही लिखें।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, अगले रविवार यानी २४ जून को संगीत-मार्तण्ड पण्डित ओमकारनाथ ठाकुर की जयन्ती है। इस पुनीत अवसर पर हम आपको उनके सांगीतिक जीवन के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही उनकी कुछ चुनी हुई श्रेष्ठ रचनाएँ भी आपको सुनवाएँगे। आगामी रविवार को प्रातः ९-३० बजे आप और हम ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में पुनः मिलेंगे। तब तक के लिए हमें विराम लेने की अनुमति दीजिए। 


कृष्णमोहन मिश्र

शनिवार, 16 जून 2012

प्लेबैक वाणी (3) -शंघाई, टोला और आपकी बात

संगीत समीक्षा - शंघाई



खोंसला का घोंसला हो या ओए लकी लकी ओए हो, दिबाकर की फिल्मों में संगीत हटकर अवश्य होता है. उनका अधिक रुझान लोक संगीत और कम लोकप्रिय देसिया गीतों को प्रमुख धारा में लाने का होता है. इस मामले में ओए लकी का संगीत शानदार था, तू राजा की राजदुलारी और जुगनी संगीत प्रेमियों के जेहन में हमेशा ताज़े रहेंगें जाहिर है उनकी नयी फिल्म शंघाई से भी श्रोताओं को उम्मीद अवश्य रहेगी. अल्बम की शुरुआत ही बेहद विवादस्पद मगर दिलचस्प गीत से होती है जिसे खुद दिबाकर ने लिखा है. भारत माता की जय एक सटायर है जिसमें भारत के आज के सन्दर्भों पर तीखी टिपण्णी की गयी है. सोने की चिड़िया कब और कैसे डेंगू मलेरिया में तब्दील हो गयी ये एक सवाल है जिसका जवाब कहीं न कहीं फिल्म की कहानी में छुपा हो सकता है, विशाल शेखर का संगीत और पार्श्व संयोजन काफी लाउड है जो टपोरी किस्म के डांस को सप्पोर्ट करती है. विशाल ददलानी ने मायिक के पीछे जम कर अपनी कुंठा निकाली है. अल्बम का दूसरा गीत एक आइटम नंबर है मगर जरा हटके. यहाँ इशारों इशारों में एक बार फिर व्यंगात्मक टिप्पणियाँ की गयी है, जिसे समझ कर भरपूर एन्जॉय किया जा सकता है.  इम्पोर्टेड कमरिया का नौटकी नुमा अंदाज़ श्रोताओं को रास आ सकता है. गीतकार कुमार ने अच्छे शब्द बुने हैं दुआ गीत के लिए वहीँ नंदनी श्रीकर की आवाज़ अच्छी जमी है भरे नैना गीत में. खुदाया अल्बम का सर्वश्रेष्ठ गीत प्रतीत होता है. इस सूफी अंदाज़ के गीत में श्रोताओं को काफी गहराई नज़र आएगी. मोर्चा गीत संभवता फिल्म के क्लाईमेक्स में आता होगा जहाँ, क्रांति का बिगुल है और अन्याय के खिलाफ उठ खड़े होने का जज्बा दिखाता रोष है, ये गीत अन्ना और उनकी टीम को निश्चित ही प्रेरित करेगा. भगवान विष्णु के १००० नामों की ध्वनि है मंत्र विष्णु सहस्र्नामम में, जिसको प्रमुख धारा की एक बॉलीवुड अल्बम में शामिल करना वाकई हिम्मत का काम है. विशाल शेखर यहाँ कहानी वाला जादू तो यहाँ नहीं रच पाए मगर निराश भी नहीं करते. कुल मिलाकर शंघाई के संगीत को रेडियो प्लेबैक की और से दी जा रही है २.८ की रेटिंग  


पुस्तक चर्चा - टोला




पिकरेस्क (picaresque) यानी कि स्लमडोग मिलेनियर सरीखी कहानियों का चलन हर भाषा के साहित्य में मिलता है. ऐसा ही एक उपन्यास है रमेश दत्त दुबे लिखित "टोला". यहाँ ये कहानी इस श्रेणी की अन्य कहानियों जैसे निराला की "बिल्लेसुर बकरिहा" और "कुल्लीभाट" या फिर केदारनाथ अग्रवाल की "पतिया" जैसे उपन्यासों से अलग इस मामले में भी है कि ये व्यक्ति केंद्रित न होकर समूह केंद्रित अधिक है. बकौल कांति कुमार जैन रमेश के टोले में रहने वाले वो लोग हैं जो समाज के सबसे निचले स्तर पर है या कहें कि हाशिए पर हैं, उनके होने न होने से किसी को कुछ फरक नहीं पड़ता, वो बीडी और अवैध शराब बनाते हैं, गर्भपात करवाते हैं, स्त्रियां जंगल से लकड़ी बीन कर लाने, देह व्यापार करने, लड़ने झगडने और पति की मार खाने के लिए ही जन्म लेती है यहाँ. बाढ़, सूखा और महामारी में कभी पूरा का पूरा टोला खतम हो जाता है मगर कुछ दिनों बाद फिर से बस भी जाता है. किसी बेहतर जीवन का न कोई वादा, न कोई यकीं, न कोई उम्मीद...मगर लेखक इन घुप्प अंधेरों में भी कहीं मानवीय संवेदना तलाश रहा है. दमयंती और मर्दन के प्रेम में जैसे कोई दबी हुई आस टिमटिमा रही है. लेखक ने अपने रियलिस्टिक अप्रोच से पाठकों को बाँध कर रखा है. पृथ्वी का टुकड़ा और गांव का कोई इतिहास नहीं होता जैसे काव्य संग्रह रचने वाले रमेश दत्त दुबे का ये उपन्यास अँधेरी गलियों में जिंदगी के सहर की तलाश है, जो कुछ अलग किस्म का साहित्य पढ़ने को इच्छुक पाठकों को पसंद आ सकती है. उपन्यास के प्रकाशक हैं राधाकृष्ण प्रकाशन और कुल १०७ पृष्ठों की इस उपन्यास की कीमत है १५० रूपए मात्र    


और अंत में आपकी बात, अमित और दीपा तिवारी के साथ

 

शुक्रवार, 15 जून 2012

कहानी पॉडकास्ट - सुशीला - हरिशंकर परसाई - अर्चना चावजी

'बोलती कहानियाँ' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में कामेश्वर की मार्मिक कथा "चप्पल" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार हरिशंकर परसाई का व्यंग्य "सुशीला", जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 3 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

मेरी जन्म-तारीख 22 अगस्त 1924 छपती है। यह भूल है। तारीख ठीक है। सन् गलत है। सही सन् 1922 है। । ~ हरिशंकर परसाई (1922-1995)

हर शनिवार को "बोलती कहानियाँ" पर सुनें एक नयी कहानी

"आम बाज़ार भाव से तो लड़के की क़ीमत मांगते ही थे, इनके अशुद्ध होने का दण्ड पाँच छह हज़ार और मांगते थे।" (हरिशंकर परसाई की "सुशीला" से एक अंश)

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#21st Story, Susheela: Harishankar Parsai/Hindi Audio Book/2012/21. Voice: Archana Chaoji

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