सोमवार, 14 नवंबर 2011

आ री आजा, निन्दिया तू ले चल कहीं....बाल दिवस पर किशोर दा लाये एक मीठी लोरी बच्चों के लिए

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 787/2011/227

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी नियमित व अनियमित श्रोता-पाठकों को हमारा सप्रेम नमस्कार! आज १४ नवंबर है, भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहरलाल नेहरु का जन्मदिन, जिसे हम सब 'बाल-दिवस' के रूप में मनाते हैं। संयोग देखिए कि इन दिनों हम जिस शृंखला को प्रस्तुत कर रहे हैं, उसका भी बच्चों के साथ ही ज़्यादा ताल्लुख़ है। पुरुष गायकों द्वारा गाई हुई फ़िल्मी लोरियों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'चंदन का पलना, रेशम की डोरी' की सातवीं कड़ी में आज हम लेकर आये हैं किशोर कुमार की आवाज़ में फ़िल्म 'कुवारा बाप' की लोरी "आ री आजा, निन्दिया तू ले चल कहीं, उड़नखटोले में, दूर, दूर, दूर, यहाँ से दूर"। साथ में लता जी की आवाज़ भी शामिल है। जहाँ किशोर दा की आवाज़ सजी है महमूद पर, लता जी नें एक बालकलाकार का पार्श्वगायन किया है। फ़िल्म के संगीतकार थे राजेश रोशन और इस लोरी को लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी। १९७४ में बनी 'कुंवारा बाप' के नायक थे महमूद। फ़िल्म के शीर्षक से ज़ाहिर है कि महमूद नें इसमें कुंवारे बाप की भूमिका निभाई होगी और इस तरह से इस लोरी की फ़िल्म में अहमियत बढ़ जाती है। यूं तो महमूद हास्य चरित्रों के लिए जाने जाते हैं, पर इस फ़िल्म में उन्होंने वह मर्मस्पर्शी अभिनय किया कि दर्शकों को रुलाकर छोड़ा। दोस्तों, मुझे महमूद के अभिनय वाली एक और फ़िल्म याद आ रही है जिसमें भी किशोर दा और लता जी की गाई हुई एक लोरी थी। फ़िल्म 'लाखों में एक' और गीत के बोल "चंदा ओ चंदा, किसने चुराई तेरी मेरी निन्दिया, जागे सारी रैना, तेरे मेरे नैना"। इस लोरी का एक लता सोलो वर्ज़न भी है।

'कुंवारा बाप' की कहानी अज़ीज़ क़ैसी की लिखी हुई है और फ़िल्म का निर्देशन महमूद नें ही किया था। इस फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि महेश (महमूद) एक साइकिल रिक्शा चालक है जिसे अपने माँ-बाप की कोई जानकारी नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण का वह उपासक है और एक जुग्गी झोपड़ी में रहता है। शीला (मनोरमा) नामक लड़की से उसकी दोस्ती है जो घर घर बाई का काम करती है, और जिसे वो एक दिन शादी करना चाहता है। पर कालू दादा (भूषण तिवारी) की गन्दी नज़र शीला पर है। एक रात महेश घर लौट रहा था कि उसे एक मन्दिर के बाहर एक छोटा बच्चा दिखाई दिया। वो इधर-उधर उसके परिवारवालों को ढूंढ़ा, मन्दिर के पुजारी से भी पूछा, पुलिस को भी सूचित किया, पर कहीं से भी उस बच्चे के माँ-बाप का पता न चल सका। न चाहते हुए भी हालात कुछ ऐसे बन गए कि उस बच्चे को उसे गले से लगाना ही पड़ा, पर उसके आस-पड़ोस वाले महेश के बच्चे के गोद लेने के ख़िलाफ़ थे। महेश भी बच्चे से नफ़रत करने लगा। वो उस बच्चे की तरफ़ ध्यान नहीं दिया करता, और इस तरह से बच्चा पोलियो का शिकार हो गया। इस घटना नें महेश के दिल पर असर किया और उसके दिल में बच्चे के लिए प्यार उमड़ पड़ा। उस बच्चे का नाम उसने हिन्दुस्तान रखा, उसका इलाज शुरु करवाया, उसे क्रच दिलवाये, और तमाम मुसीबतों से लड़ते हुए उसे बिशॉप कॉटन जुनियर कॉलेज में भर्ती करवाया। १२ साल बाद हिन्दुस्तान जब बड़ा हुआ, तब उसे हड्डी के एक ऑपरेशन की ज़रूरत आन पड़ी जिसके लिए महेश को १००० रुपय का बन्दोपस्त करना था। उसने पैसा इकट्ठा करने के लिए दारा से कुश्ती लड़ने और एक रिकशा रेस में भाग लेने का फ़ैसला किया, पर दारा और कालू नें उसे बुरी तरह पीटा। महेश रात-दिन काम करने लगा, पर इससे पहले कि वो पैसे जमा कर पाता, पुलिस इन्स्पेक्टर रमेश (विनोद खन्ना) ने उसे गिरफ़्तार कर लिया हिन्दुस्तान को अगवा करने के जुर्म में। रमेश और राधा (भारती) के अनुसार हिन्दुस्तान के जन्मदाता वो दोनों हैं। अदालत में मुकद्दमा चलता है और फ़िल्म का क्या अंजाम होता है, वह आप कभी फ़िल्म को ख़ुद ही देख कर जान लीजिएगा। इस कहानी को पढ़ कर आप समझ चुके होंगे कि इस लोरी की फ़िल्म में क्या अहमियत होगी। तो आइए सुना जाये किशोर दा की आवाज़ महेश पर और लता जी की आवाज़ हिन्दुस्तान पर।



पहचानें अगला गीत, इस सूत्र के माध्यम से -
कल की लोरी एक डुएट है। जिस गायक-गायिका जोड़ी नें इसे गाया, उस जोड़ी नें साथ में बहुत ज़्यादा गीत नहीं गाये हैं, पर राकेश रोशन और जया प्रदा अभिनीत एक अन्य फ़िल्म में इस जोड़ी के गाये गीत लोकप्रिय हुए थे। बताइए गोविंदा पर फ़िल्माई हुई किस लोरी की हम बात कर रहे हैं और राकेश रोशन-जया प्रदा के उस अन्य फ़िल्म का नाम क्या है?

पिछले अंक में
कल की हमारी शृंखला का सीरियल नंबर था ७८६, क्या किसी ने गौर किया

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

रविवार, 13 नवंबर 2011

लल्ला लल्ला लोरी....जब सुनाने की नौबत आये तो यही लोरी बरबस होंठों पे आये

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 786/2011/226

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक और नई सप्ताह के साथ हम उपस्थित हैं, मैं सुजॉय चटर्जी, साथी सजीव सारथी के साथ, आप सभी का इस सुरीले सफ़र में फिर एक बार स्वागत करते हैं। आमतौर पर बच्चों के साथ माँ के रिश्ते को ज़्यादा अहमियत दी जाती है, फ़िल्मों में भी माँ और बच्चे के रिश्ते को ज़्यादा साकार किया गया है। पर कई फ़िल्में ऐसी भी बनीं जिनमें पिता-पुत्र या पिता-पुत्री के सम्बंध को पर्दे पर साकार किया गया। ऐसी कई फ़िल्मों में पिता द्वारा गाई लोरियाँ भी रखी गईं, हालाँकि संख्या में ये बहुत कम हैं। पर इन लोरियों के माध्यम से गीतकारों नें वो सब जज़्बात, वो सब मनोभाव भरें जो एक पिता के मन में होता है अपने बच्चे के लिए। ऐसी ही कुछ लाजवाब पुरुष लोरियों को लेकर इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में जारी है लघु शृंखला 'चंदन का पलना, रेशम की डोरी', जिसमें आप दस लोरियाँ सुन रहे हैं दस अलग अलग गायकों के गाये हुए। अब तक आपनें चितलकर, तलत महमूद, हेमन्त कुमार, मन्ना डे और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ें सुनी। और ये लोरियाँ केवल पाँच अलग गायक ही नहीं, बल्कि पाँच अलग गीतकारों के लिखे और पाँच अलग संगीतकारों द्वारा स्वरबद्ध किए हुए थे। ये गीतकार-संगीतकार जोड़ियाँ हैं राजेन्द्र कृष्ण - सी. रामचन्द्र, ख़ुमार बाराबंकवी - नाशाद, शक़ील - नौशाद, प्रेम धवन - रवि, और शैलेन्द्र - शंकर-जयकिशन। ५० और ६० के दशकों के बाद आज हम ७० के दशक में क़दम रखते हुए आपको सुनवाने जा रहे हैं गायक की मुकेश की गाई हुई लोरी और इसमें गीतकार-संगीतकार जोड़ी है आनन्द बक्शी - राहुल देव बर्मन। १९७७ की फ़िल्म 'मुक्ति' की यह कालजयी लोरी है "लल्ला लल्ला लोरी, दूध की कटोरी, दूध में बताशा, मुन्नी करे तमाशा"।

गायक मुकेश की आवाज़ भी बहुत ही कोमल है और लोरियों के लिए तो बिल्कुल पर्फ़ेक्ट। उनकी गाई फ़िल्म 'मिलन' की लोरी "राम करे ऐसा हो जाए, मेरी निन्दिया तोहे मिल जाए" हम जितनी भी बार सुनें एक अद्भुत अनुभव होता है। इसी तरह से 'मुक्ति' की यह लोरी भी अपने ज़माने का हिट गीत रहा है। शशि कपूर पर ज़्यादातर किशोर कुमार और रफ़ी साहब की आवाज़ ही सजी है, पर कई फ़िल्मों में मुकेश नें उनका पार्श्वगायन किया है जैसे कि 'मुक्ति', 'दिल ने पुकारा', 'माइ लव' आदि। 'मुक्ति' फ़िल्म की तमाम जानकारियाँ हमनें उस अंक में दिया था जिसमें हमनें मुकेश का ही गाया "सुहानी चाँदनी रातें हमें सोने नहीं देती" गीत सुनवाया था। आज बस इस लोरी की बात करते हैं। इस लोरी के भी दो संस्करण है; मुकेश वाले संसकरण का मिज़ाज हँसमुख है जिसमें पिता अपनी पुत्री को प्यार करते हुए यह लोरी गाते हैं, जबकि लता जी वाला संस्करण सैड वर्ज़न है। पिता के बिछड़ जाने के बाद जब बच्चा अपनी माँ से पापा कब आयेंगे पूछता है, तो उसे सम्भालते हुए, सुलाते हुए माँ उसी लोरी को गाती हैं, पर "मुन्नी करे तमाशा" के जगह पर बोल हो जाते हैं "जीवन खेल तमाशा"। दोनों ही संस्करण अपने आप में उत्कृष्ट है। क्योंकि इस शृंखला में हम गायकों की गाई लोरियाँ बजा रहे हैं, इसलिए लता जी वाला संस्करण हम फिर कभी सुनवाने की कोशिश करेंगे अगर सम्भव हो सका तो। आइए मुकेश की कोमल आवाज़ में सुनें यह लोरी।



पहचानें अगला गीत, इस सूत्र के माध्यम से -
मूलत: एक हास्य अभिनेता पर फ़िल्माई यह लोरी है, जो इस फ़िल्म के नायक भी हैं, पर यह फ़िल्म हास्य फ़िल्म नहीं बल्कि एक मर्मस्पर्शी फ़िल्म है। जिस बच्चे के लिए यह लोरी गाई जा रही है, उसका फ़िल्म में नाम है 'हिन्दुस्तान'। बताइए किस फ़िल्म के लोरी की बात हो रही है?

पिछले अंक में
अमित जी सवाल तो पढ़िए ध्यान से

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

सुर संगम में आज - एन. राजम् के वायलिन-तंत्र बजते नहीं, गाते हैं...

सुर संगम- 43 – संगीत विदुषी डॉ. एन. राजम् की संगीत-साधना


सुर संगम के इस सुरीले सफर में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, आज एक बेहद सुरीले गज-तंत्र वाद्य वायलिन और इस वाद्य की स्वर-साधिका डॉ. एन. राजम् के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आपसे चर्चा करने जा रहा हूँ। डॉ. राजम् वायलिन जैसे पाश्चात्य वाद्य पर उत्तर भारतीय संगीत पद्यति को गायकी अंग में वादन करने वाली प्रथम महिला स्वर-साधिका हैं। उनकी वायलिन पर अब तक जो कुछ भी बजाया गया है, उसका प्रारम्भ स्वयं उन्हीं से हुआ है। गायकी अंग में वायलिन-वादन उनकी विशेषता भी है और उनका अविष्कार भी।

डॉ. राजम् के पिता नारायण अय्यर कर्नाटक संगीत पद्यति के सुप्रसिद्ध वायलिन वादक और गुरु थे। वायलिन की प्रारम्भिक शिक्षा उन्हें अपने पिता से ही प्राप्त हुई। बाद में सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर से उन्हें उत्तर भारतीय संगीत पद्यति में शिक्षा मिली। इस प्रकार शीघ्र ही उन्हें संगीत की दोनों पद्यतियों में कुशलता प्राप्त हुई। पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर अपने प्रदर्शन-कार्यक्रमों में एन. राजम् को वायलिन संगति के लिए बैठाया करते थे। संगति के दौरान उनका यही प्रयास होता था कि उनके गुरु जो क्रियाएँ कण्ठ से करते हों, उन्हें यथावत वायलिन के तंत्रों पर उतारा जाए। इस साधना के बल पर मात्र १७ वर्ष की आयु में एन. राजम् गायकी अंग में वायलिन-वादन में दक्ष हो गईं। उस दौर के संगीतविदों ने गायकी शैली में वायलिन-वादन को एक नया आविष्कार माना और इसका श्रेय एन. राजम् को दिया गया। उनके गायकी अंग के वादन में जैसी मिठास और करुणा है, उसे सुन कर ही अनुभव किया जा सकता है। उनके वादन में कोई चमत्कारिक लटके-झटके नहीं, बल्कि सादगी और तन्मयता है। सुनने वालों को ऐसा प्रतीत होता है, मानो वायलिन के तंत्र बजते नहीं बल्कि गा रहे हों। लीजिए, डॉ. एन. राजम् के वायलिन को राग जयजयवन्ती का गायन करते हुए, आप भी सुनें। प्रस्तुति में पण्डित अभिजीत बनर्जी ने तबला संगति की है।

डॉ. एन. राजम् : राग – जयजयवन्ती : आलाप और बन्दिश


एन. राजम् की प्रारम्भिक संगीत शिक्षा दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत पद्यति में हुई थी। उन दिनों दक्षिण भारत में वायलिन प्रचलित हो चुका था, किन्तु उत्तर भारतीय संगीत में इस वाद्य का पदार्पण नया-नया ही हुआ था। एन. राजम् की आयु उस समय मात्र १२ वर्ष थी। अपने गुरु पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के मार्गदर्शन में उन्होने वायलिन को गायकी अंग में बजाने का निश्चय किया। स्वर और लय का ज्ञान तो उन्हें पहले से ही था, गुरु जी की स्वरावली का अनुसरण करते-करते वादन में भाव, रस और माधुर्य उत्पन्न करने की कठोर साधना उन्होने की। ध्रुवपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा आदि गायन की सभी विधाओं की बारीकियों का गहन अध्ययन कर वायलिन पर साध लिया। उन दिनों अधिकतर वादको ने तंत्रकारी अंग में ही वायलिन को अपनाया था। परन्तु एन. राजम् का मानना था कि सारंगी की भाँति वायलिन भी गायकी अंग के निकट है। आइए अब सुनते हैं- डॉ. एन. राजम् से राग दरबारी की दो खयाल रचनाएँ जो विलम्बित एकताल में और द्रुत तीनताल में निबद्ध है।

डॉ. एन. राजम् : राग – दरबारी : विलम्बित एकताल और द्रुत तीनताल


विदुषी एन. राजम् के गुरु पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर ग्वालियर घराने के थे, इसलिए स्वयं को इसी घराने की शिष्या मानतीं हैं। घरानॉ के सम्बन्ध में उनका मत है कि कलाकार को किसी एक ही घराने में बंध कर नहीं रहना चाहिए, बल्कि हर घराने की अच्छाइयों का अनुकरण करना चाहिए। घरानों की प्राचीन परम्परा के अनुसार तीन पीढ़ियों तक यदि विधा की विशेषता कायम रहे तो प्रथम पीढ़ी के नाम से घराना स्वतः स्थापित हो जाता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो आने वाले समय में राजम् जी के नाम से भी यदि एक नए घराने का नामकरण हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। डॉ. राजम् को प्रारम्भिक शिक्षा अपने पिता पण्डित नारायण अय्यर से मिली। उनके बड़े भाई पण्डित टी.एन. कृष्णन् कर्नाटक संगीत पद्यति के प्रतिष्ठित और शीर्षस्थ वायलिन-वादक रहे हैं। डॉ. राजम् की एक भतीजी कला रामनाथ वर्तमान में विख्यात वायलिन-वादिका हैं। राजम् जी की सुपुत्री और शिष्या संगीता शंकर अपनी माँ की शैली में ही गायकी अंग में वादन कर रहीं हैं। यही नहीं संगीता की दो बेटियाँ अर्थात डॉ. राजम् की नातिनें- नंदिनी और रागिनी भी अपनी माँ और नानी के साथ मंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही हैं।

और अब इस अंक को विराम देते हुए हम आपको विदुषी डॉ. एन. राजम् द्वारा प्रस्तुत राग भैरवी का एक दादरा सुनवाते हैं। यह उल्लेखनीय है कि उनके गुरु पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर ने मंच पर कभी भी ठुमरी-दादरा प्रस्तुत नहीं किया। उपशास्त्रीय संगीत का ज्ञान उन्होने वाराणसी में प्राप्त किया था। वाराणसी के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संगीत संकाय में पहले प्रोफेसर और बाद में विभागाध्यक्ष होकर सेवानिवृत्त हुई। लीजिए, सुनिए- विदुषी डॉ. एन. राजम् की वायलिन पर राग भैरवी में दादरा-

डॉ. एन. राजम् : राग – भैरवी : दादरा


और अब बारी है इस कड़ी की पहेली की जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

सुर संगम 44 की पहेली : इस ऑडियो क्लिप को सुन कर संस्कार गीतों के अन्तर्गत आने वाली लोक संगीत की विधा को पहचानिए। सही पहचान करने पर आपको मिलेंगे 5 अंक


चित्र परिचय
ऊपर बाएं - विदुषी डा. एन. राजम्
नीचे दायें - डा. एन. राजम्अपनी सुपुत्री संगीता शंकर के साथ


पिछ्ली पहेली का परिणाम : सुर संगम के 43वें अंक में पूछे गए प्रश्न का सही उत्तर है- वायलिन और राग दरबारी। इस अंक की पहेली के पहले भाग का सही उत्तर हमारे एक नए पाठक/श्रोता उज्ज्वल कुमार ने और दूसरे भाग का सही उत्तर क्षिति तिवारी ने दिया है। दोनों विजेताओं को मिलते हैं 5-5 अंक। इन्हें हार्दिक बधाई।

अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। अगले रविवार को हम एक और संगीत-कलासाधक अथवा विधा के साथ पुनः उपस्थित होंगे। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तम्भ को और रोचक बना सकते हैं! आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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