गुरुवार, 3 नवंबर 2011

कहाँ तुम चले गए ...बस यही दोहराते रह गए जगजीत के दीवाने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 780/2011/220

गजीत सिंह को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'जहाँ तुम चले गए' की अंतिम कड़ी में आप सभी का स्वागत है। दोस्तों, जगजीत सिंह का पंजाबी भाषा और पंजाबी काव्य को लोकप्रिय बनाने और दूर दूर तक फैलाने में भी उल्लेखनीय योगदान रहा है। शिव कुमार बटालवी की कविताओं को जनसाधारण तक पहुँचाने में उनका ऐल्बम 'बिरहा दा सुल्तान' उल्लेखनीय है। "माय नी माय मैं इक शिकरा यार बनाइया", "रोग बन के रह गिया है पियार तेरे शहर दा", "यारियां राब करके मैनुं पाएं बिरहन दे पीड़े वे", "एह मेरा गीत किसी नी गाना" इसी ऐल्बम के कुछ लोकप्रिय गीत हैं। १० मई २००७ को संसद के युग्म अधिवेषन में ऐतिहासिक केन्द्रीय हॉल में जगजीत सिंह नें बहादुर शाह ज़फ़र की ग़ज़ल "लगता नहीं है दिल मेरा" गा कर भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (१८५७) के १५० वर्ष पूर्ति पर आयोजित कार्यक्रम को चार चाँद लगाया। राष्ट्रपति अब्दुल कलाम, प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह, उप-राष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत, लोक-सभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी, और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी वहाँ मौजूद थीं। सन् २००३ में जगजीत सिंह को पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

२००७ के आसपास जगजीत सिंह की सेहत बिगड़ने लगी थी। ब्लड सर्कुलेशन की समस्या के चलते उन्हें २००७ के अक्टूबर में अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। इससे पहले १९९८ के जनवरी में उन्हें दिल का दौरा पड़ा था जिसके बाद उन्होंने सिगरेट पीना छोड़ दिया था। अभी हाल में ब्रेन हैमरेज से आक्रान्त जगजीत को अस्पताल ले जाया गया, पर वो वापस घर न लौट सके। उनका दिया अंतिम कॉनसर्ट था १६ सितंबर २०११ को नेहरू साइन्स सेन्टर मुंबई में, १७ सितंबर को सिरि फ़ोर्ट ऑडिटोरियम नई दिल्ली में और २० सितंबर को देहरादून के इण्डियन पब्लिक स्कूल में। और फिर ख़ामोश हो गई यह आवाज़ हमेशा हमेशा के लिए। जैसे उन्हीं का गाया गीत साकार हो उठा - "चिट्ठी न कोई संदेस, जाने वो कौन सा देस, जहाँ तुम चले गए"। आइए जगजीत सिंह को समर्पित इस शृंखला का समापन भी हम इसी गीत से करें। उत्तम सिंह के संगीत में यह है गीतकार आनन्द बक्शी की रचना १९९८ की फ़िल्म 'दुश्मन' के लिए। यूं तो यह पुराने फ़िल्म का गीत नहीं है, और इसलिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में शामिल होने के काबिल भी नहीं, पर इसके बोल कुछ ऐसे हैं कि जगजीत जी के जाने की परिस्थिति में बहुत ही ज़्यादा सार्थक बन पड़ा है। आइए इस गीत को सुनें और इस शृंखला को यहीं सम्पन्न करें। पूरे 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से स्वर्गीय जगजीत सिंह को भावभीनी श्रद्धांजली और उनकी पत्नी चित्रा जी के लिए समवेदना और सहानुभूति। अनुमति दीजिए, नमस्कार!



चलिए आज कुछ बातें जगजीत की ही की जाये, हमें बताएं उनके गाये अपने सबसे पसंदीदा ५ गीत...

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खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

बुधवार, 2 नवंबर 2011

ये तेरा घर ये मेरा घर....आम आदमी की संकल्पनाओं को शब्द दिए जावेद अख्तर ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 779/2011/219

गजीत सिंह को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'जहाँ तुम चले गए' में एक बार फिर से मैं, सुजॉय चटर्जी, आपका स्वागत करता हूँ। कल की कड़ी में हमनें आपको जगजीत और चित्रा सिंह के कुछ ऐल्बमों के बारे में बताया। उनके बाद जगजीत जी के कई एकल ऐल्बम आये जिनमें शामिल थे Hope, In Search, Insight, Mirage, Visions, कहकशाँ, Love Is Blind, चिराग, और सजदा। मिर्ज़ा ग़ालिब, फ़िराक़ गोरखपुरी, कतील शिफ़ई, शाहीद कबीर, अमीर मीनाई, कफ़ील आज़ेर, सुदर्शन फ़ाकिर, निदा फ़ाज़ली, ज़का सिद्दीक़ी, नाज़िर बकरी, फ़ैज़ रतलामी और राजेश रेड्डी जैसे शायरों के ग़ज़लों को उन्होंने अपनी आवाज़ दी। जगजीत जी के शुरुआती ग़ज़लें जहाँ हल्के-फुल्के और ख़ुशमिज़ाजी हुआ करते थे, बाद के सालों में उन्होंने संजीदे ग़ज़लें ज़्यादा गाई, शायद अपनी ज़िन्दगी के अनुभवों का यह असर था। ऐसे ऐल्बमों में शामिल थे Face To Face, आईना, Cry For Cry. जगजीत जी के ज़्यादातर ऐल्बमों के नाम अंग्रेज़ी होते रहे, और कईयों में उर्दू शब्दों का प्रयोग हुआ जैसे कि 'सजदा', 'सहर', 'मुन्तज़िर', 'मारासिम' और 'सोज़'। इस शृंखला में आप उनके फ़िल्मी गीत तो सुन ही रहे हैं, नए दौर के कई फ़िल्मों में भी उनके गाये गीत और ग़ज़लें रहे, जैसे कि 'दुश्मन', 'सरफ़रोश', 'तुम बिन', 'तरकीब', 'जॉगर्स पार्क', 'लीला' आदि। ग़ज़लों के अलावा जगजीत सिंह नें भजन और गुरुबानी भी बहुत गाये। उनके गाये ऐसे धार्मिक ऐल्बमों में शामिल हैं 'माँ', 'हरे कृष्णा', 'हे राम' हे राम', इच्छाबल', 'मन जीताई जगजीत' (पंजाबी)। इन ऐल्बमों के ज़रिये उन्होंने वो दर्जा हासिल कर लिया जो दर्जा अनुप जलोटा, हरिओम शरण जैसे भजन गायकों का था।

दोस्तों, अब तक इस शृंखला में शामिल आठ गीतों में प्रथम सात गीत ऐसे थे जिनका संगीत जगजीत सिंह नें तैयार किया था। लता मंगेशकर, आशा भोसले, दिलराज कौर, विनोद सहगल, चित्रा सिंह के एक एक गीत के अलावा दो गीत जगजीत सिंह के गाये हुए भी रहे। और आठवाँ गीत एक पारम्परिक ठुमरी थी जिसे जगजीत और चित्रा नें गाई। आज नवी कड़ी में प्रस्तुत है एक बड़ा ही हँस-मुख और ज़िन्दगी से भरपूर डुएट जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की ही आवाज़ों में। फ़िल्म 'साथ-साथ' का यह सदाबहार गीत है "ये तेरा घर ये मेरा घर, किसी को देखना हो गर, तो पहले आके माँग ले, मेरी नज़र तेरी नज़र"। इस फ़िल्म में संगीत था कुलदीप सिंह का। जगजीत और चित्रा के गाये तमाम युगल ग़ज़लें तो हैं ही, इस जोड़ी नें कई फ़िल्मी गीत भी साथ में गाये हैं, जिनमें आज का यह गीत सब से ज़्यादा लोकप्रिय रहा और आज भी एवेरग्रीन डुएट्स में शुमार होता है।



चलिए अब खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
आनंद बख्शी का लिखा है ये गीत जगजीत की आवाज़ से महका

पिछले अंक में

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मंगलवार, 1 नवंबर 2011

बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए...पारंपरिक बोलों पर जगजीत चित्रा के स्वरों की महक

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 778/2011/218

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों का स्वागत है इस स्तंभ में जारी शृंखला 'जहाँ तुम चले गए' की आठवीं कड़ी में। आपको याद दिला दें कि यह शृंखला समर्पित है ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह को जिनका हाल में निधन हो गया। ७० के दशक में ग़ज़ल गायकी पर जिन कलाकारों का दबदबा था वो थे नूरजहाँ, मल्लिका पुखराज, बेगम अख़्तर, तलत महमूद, और महदी हसन। इन महारथियों के होने के बावजूद जगजीत सिंह नें अपनी पहचान बना ही ली। १९७६ में उनका पहला एल.पी रेकॉर्ड बाज़ार में आया 'The Unforgetables' के शीर्षक से। इस ऐल्बम की ख़ास बात यह थी कि उन दिनों ग़ज़ल गायकी शास्त्रीय संगीत आधारित हुआ करता था, पर जगजीत सिंह नें हल्के-फुल्के अंदाज़ में ग़ज़लों को गाया और बहुत लोकप्रिय हुईं ये ग़ज़लें। ग़ज़ल के रेकॉर्डों की बिक्री के सारे रेकॉर्ड तोड़ दिए उनकी गाई ग़ज़लों नें। १९६७ में जगजीत सिंह की मुलाक़ात चित्रा से हुई थी जो ख़ुद भी एक गायिका थीं। दो साल बाद दोनों नें शादी कर ली और उनकी यह जोड़ी पहली पति-पत्नी की जोड़ी थी जो गायक-गायिका के रूप में साथ में पर्फ़ॉर्म किया करते। ग़ज़ल जगत को समृद्ध करने में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन दोनों नें जिन ऐल्बमों में साथ में गाया है उनमें शामिल हैं 'Ecstasies', 'A Sound Affair', 'Passions', 'Beyond Time'.

२८ जुलाई १९९० को जगजीत-चित्रा का एकलौता बेटा विवेक एक सड़क दुर्घटना में चल बसा। इसके बाद जगजीत और चित्रा का साथ में बस एक ही ऐल्बम आया 'Someone Somewhere' और इसके बाद चित्रा सिंह नें गाना छोड़ दिया। जगजीत सिंह अक्सर "मिट्टी दा बावा" गीत गाया करते थे जो चित्रा नें किसी पंजाबी फ़िल्म में गाया था और यह गीत कहीं न कहीं उन दोनों की ही कहानी बयान करता, जिसमें कहानी थी अपने किसी प्यारे जन को बहुत ही कम उम्र में खोने की। दोस्तों, आज हम जिस गीत को सुनने जा रहे हैं, उसका संगीत जगजीत सिंह नें नहीं बनाई है, बल्कि यह एक पारम्परिक ठुमरी है, जिसे समय समय पर कई कलाकारों नें गाया है। "बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाये", जी हाँ, जगजीत सिंह और चित्रा सिंह नें यह ठुमरी १९७४ की फ़िल्म 'आविष्कार' के लिए गाई थी। बासु भट्टाचार्य निर्देशित इस फ़िल्म में राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर मुख्य कलाकार थे और संगीत था कानु रॉय का। इस ठुमरी को एक पार्श्वसंगीत के रूप में फ़िल्म में ईस्तेमाल किया गया है। राग भैरवी में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की आवाज़ में यह ठुमरी एक अलग ही अहसास कराती है। आइए आनन्द लें।



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कुलदीप सिंह के संगीत में जगजीत चित्रा की जोड़ी थी इस युगल गीत में

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सही कहा अमित जी वाकई शानदार गाया है :)

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