Saturday, September 24, 2011

सुनो कहानी - बदचलन - हरिशंकर परसाई - अर्चना चावजी

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में अनुराग शर्मा की कहानी "टुन्न परेड" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार हरिशंकर परसाई का व्यंग्य "बदचलन", जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 44 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



मेरी जन्म-तारीख 22 अगस्त 1924 छपती है। यह भूल है। तारीख ठीक है। सन् गलत है। सही सन् 1922 है। ।
~ हरिशंकर परसाई (1922-1995)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

"बहू-बेटियां सबके घर में हैं। यहां ऐसा दुराचारी आदमी रहने आ रहा है। भला शरीफ आदमी यहां कैसे रहेंगे।"
(हरिशंकर परसाई की "बदचलन" से एक अंश)


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#146th Story, Badchalan: Harishankar Parsai/Hindi Audio Book/2011/27. Voice:
Archana Chaoji

Thursday, September 22, 2011

चली गोरी पी के मिलन को चली...राग भैरवी में पी को ढूंढती हेमन्त दा की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 750/2011/190

'ओल्ड इज़ गोल्ड’ पर चल रही श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की समापन कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला के आरम्भ में हमने आपसे स्पष्ट किया था कि शास्त्रीय संगीत से सम्बन्धित इस प्रकार की लघु श्रृंखलाओं का उद्देश्य पाठकों को कलाकार बनाना नहीं है, बल्कि संगीत का अच्छा श्रोता बनाना है। प्रायः लोग कहते मिल जाते हैं कि शास्त्रीय संगीत बहुत जटिल है और सिर के ऊपर से गुज़र जाता है। परन्तु यह जटिलता और क्लिष्टता तो प्रस्तुतकर्त्ता यानी कलाकार के लिए है, साधारण श्रोता के लिए नहीं। संगीत की थोड़ी प्रारम्भिक जानकारी पाकर भी आप अच्छे श्रोता बन सकते हैं। ऐसी श्रृंखलाएँ प्रस्तुत करने के पीछे हमारा यही उद्देश्य है।

श्रृंखला की कल की कड़ी तक हमने संगीत के नौ थाटों और उनके आश्रय रागों का परिचय प्राप्त किया। आज हम ‘भैरवी’ थाट और राग के बारे में चर्चा करेंगे। परन्तु इससे पहले आइए, थाट और राग के अन्तर को समझने का प्रयास किया जाए। दरअसल थाट केवल ढाँचा है और राग एक व्यक्तित्व है। थाट-निर्माण के लिए सप्तक के १२ स्वरों में से कोई सात स्वर क्रमानुसार प्रयोग किया जाता है, जब कि राग में पाँच से सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। साथ ही राग की रचना के लिए आरोह, अवरोह, प्रबल, अबल आदि स्वर-नियमों का पालन किया जाता है।

आज का थाट है- ‘भैरवी’, जिसमें सा, रे॒, ग॒, म, प, ध॒, नि॒ स्वरों का प्रयोग होता है, अर्थात ऋषभ, गांधार, धैवत और निषाद स्वर कोमल और शेष स्वर शुद्ध। ‘भैरवी’ थाट का आश्रय राग भैरवी नाम से ही पहचाना जाता है। इस थाट के अन्य कुछ प्रमुख राग हैं- मालकौस, धनाश्री, विलासखानी तोड़ी आदि। राग भैरवी के आरोह स्वर- सा, रे॒, ग॒, म, प, ध॒, नि॒, सां तथा अवरोह के स्वर- सां, नि॒, ध॒, प, मग, रे॒, सा होते हैं। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यूँ तो इसके गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, किन्तु अनेक वर्षों से राग ‘भैरवी’ का गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। राग ‘भैरवी’ को ‘सदा सुहागिन राग’ भी कहा जाता है।

ठुमरी, दादरा, सुगम संगीत और फिल्म संगीत में राग भैरवी का सर्वाधिक प्रयोग मिलता है। आज आपको सुनवाने के लिए राग भैरवी पर आधारित जो गीत हमने चुना है वह सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार बी.आर. चोपड़ा की १९५६ में बनी फिल्म ‘एक ही रास्ता’ से है। इस फिल्म के संगीतकार हेमन्त कुमार थे, जिन्होने मजरूह सुल्तानपुरी की लोक-स्पर्श करते गीत को भैरवी के स्वरों में बाँधा था। गीत में कहरवा की लयकारी अत्यन्त आकर्षक है। इस गीत की एक विशेषता यह भी है की संगीतकार हेमन्त कुमार ने गीत को स्वयं अपना ही कोमल और मधुर स्वर दिया है। गीत के बोल हैं- ‘चली गोरी पी के मिलन को चली...’।

राग भैरवी पर आधारित यह मनमोहक गीत सुनने से पहले आइए, हमारी ओर से एक बधाई स्वीकार कीजिए। आपको सहर्ष अवगत कराना है कि ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ की यह ७५०वीं कड़ी है। आप सभी पाठकों/श्रोताओं के सहयोग से हमने एक हजार कड़ियों के लक्ष्य का तीन-चौथाई सफर तय कर लिया है। एक सुरीला सफ़र जो हमने शुरु किया था २० फ़रवरी २००९ की शाम और बहुत सारे सुमधुर पड़ावों से होते हुए आज, २२ सितम्बर, २०११ को हम आ पहुँचे हैं, अपने ७५०वीं मंज़िल पर। दोस्तों, आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के इस यादगार मौक़े पर हम सबसे पहले आप सभी का आभार व्यक्त करते हैं। जिस तरह का प्यार आपने इस स्तम्भ को दिया है, जिस तरह आपने इस स्तम्भ का साथ दिया है और इसे सफल बनाया है, उसी का यह नतीजा है कि आज हम इस मुक़ाम तक पहुँच पाए हैं। एक बार पुनः आप सबको हार्दिक शुभकामनाएँ। और लीजिए अब आप सुनिए, श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की इस समापन कड़ी में थाट ‘भैरवी’ के आश्रय राग ‘भैरवी’ पर आधारित यह गीत-



और अब एक विशेष सूचना:
२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

इन ३ सूत्रों से पहचानिये अगला गीत -
१. सुर कोकिला लता का है स्वर जिसमें वो श्रद्धाजन्ली दे रहीं हैं पंकज मालिक को.
२. मूल गीत खुद पंकज मालिक का गाया हुआ है.
३. मुखड़े में शब्द है -"भुलाना"

अब बताएं -
फिल्म का नाम - ३ अंक
फिल्म के नायक का नाम - २ अंक
गीतकार का नाम - २ अंक
सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम-
क्षिति जी बहुत दिनों बाद स्वागत आपका

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, September 21, 2011

जागो रे जागो प्रभात आया...मन और जीवन के अंधेरों को प्रकाशित करता एक गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 749/2011/189

रागदारी संगीत में प्रचलित थाट प्रणाली पर परिचयात्मक श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की नौवीं कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः आपका स्वागत करता हूँ। आज बारी है थाट ‘तोड़ी’ से परिचय प्राप्त करने की। श्रृंखला की अभी तक की कड़ियों में हमने उत्तर भारतीय संगीत में प्रचलित थाट प्रणाली को रेखांकित करने का प्रयास किया है। आज की कड़ी में हम दक्षिण भारतीय संगीत में प्रचलित प्राचीन थाट व्यवस्था पर चर्चा करेंगे।

दक्षिण भारतीय संगीत पद्यति के विद्वान पण्डित व्यंकटमखी ने थाटों की संख्या निश्चित करने के लिए गणित को आधार बनाया और पूर्णरूप से गणना कर थाटों की कुल संख्या ७२ निर्धारित की। इनमें से उन्होने १९ व्यावहारिक थाटों का चयन किया। व्यंकटमखी की थाट संख्या को दक्षिण भारतीय संगीतज्ञों ने तो अपनाया, किन्तु उत्तर भारत के संगीत पर इसका विशेष प्रभाव नहीं हुआ। उत्तर भारतीय संगीत के विद्वान पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने रागों के वर्गीकरण के लिए १० थाट प्रणाली को अपनाया और रागों का वर्गीकरण किया, जो आज तक प्रचलित है। थाट का उद्देश्य मात्र राग के शुद्ध और विकृत स्वरों को चिन्हित करना है। चूँकि एक थाट के गठन के लिए सप्तक के सातों स्वरों का होना आवश्यक है, अतः यह भी आवश्यक है कि थाट सम्पूर्ण हो।

आइए आज आपका परिचय ‘तोड़ी’ थाट से कराते हैं। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे॒, ग॒, म॑, प, ध॒, नि अर्थात ऋषभ, गांधार और धैवत स्वर कोमल, मध्यम तीव्र तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते है। इस थाट का आश्रय राग ‘तोड़ी’ ही कहलाता है। तोड़ी के अलावा इस थाट का एक अन्य प्रमुख राग है- मुलतानी। राग ‘तोड़ी’ एक सम्पूर्ण राग है, जिसके आरोह में- सा, रे॒, ग॒, म॑प, ध॒, निसां स्वरों का तथा अवरोह में- सांनिध॒प, म॑ग, रे॒, सा स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गांधार होता है तथा राग के गायन-वादन का समय दिन का दूसरा प्रहर माना जाता है।

आज की कड़ी में हम आपको राग तोड़ी पर आधारित एक मोहक गीत सुनवाएँगे, जिसके बोल हैं- ‘जागो रे जागो प्रभात आया...’। यह गीत हमने १९६४ में प्रदर्शित फिल्म ‘सन्त ज्ञानेश्वर’ से लिया है, जिसके संगीतकार लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल हैं। फिल्म ‘सन्त ज्ञानेश्वर’ इस संगीतकार जोड़ी की प्रारम्भिक फिल्मों में से एक थी। इस दौर में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने राग आधारित कई अच्छे गीतों को संगीतबद्ध किया था। शास्त्रीयता को सुगम धुनों में ढालने की कला में कुशल इस संगीतकर जोड़ी ने फिल्म ‘सन्त ज्ञानेश्वर’ में राग शिवरंजिनी, भैरवी और तोड़ी रागों पर आधारित अच्छे गीतों की रचना की थी, इन्हीं में एक राग तोड़ी पर आधारित यह गीत भी सम्मिलित है। गायक मन्ना डे के स्वरों में यह गीत अधिक भावपूर्ण बन गया है। एकताल में निबद्ध इस गीत के गीतकार भरत व्यास हैं। आइए सुना जाये, राग ‘तोड़ी’ पर आधारित यह गीत-



और अब एक विशेष सूचना:
२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

इन तीन सूत्रों से पहचानिये अगला गीत -
१. स्वयं संगीतकार ने इसे स्वर दिया है.
२. फिल्मकार हैं बी आर चोपडा.
३. एक अंतरे का अंतिम शब्द है - "गली".

अब बताएं -
किस राग आधारित है गीत - ३ अंक
गीतकार का नाम बताएं - २ अंक
संगीतकार एवं गायक कौन हैं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम-
आजकल अमित जी को काफी समय मिल जाता है, काश कि उन्हें कोई सही टक्कर दे...

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, September 20, 2011

मुझे गले से लगा लो....उदासी के एहसास को प्यार का मरहम लगाता एक नग्मा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 748/2011/188

र्तमान भारतीय संगीत में रागों के वर्गीकरण के लिए ‘थाट’ प्रणाली का प्रचलन है। ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ पर जारी वर्तमान श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के अन्तर्गत अब तक हमने सात थाटों का परिचय प्राप्त किया है। आज बारी है, आठवें थाट अर्थात ‘आसावरी’ की। इस थाट का परिचय प्राप्त करने से पहले आइए प्राचीन काल में प्रचलित थाट प्रणाली की कुछ चर्चा करते हैं।

सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलन में आ चुका था, जो उस समय के ग्रन्थ ‘संगीत-पारिजात’ और ‘राग-विबोध’ से स्पष्ट है। इसी काल में मेल की परिभाष देते हुए श्रीनिवास ने बताया है कि राग की उत्पत्ति थाट से होती है और थाट के तीन रूप हो सकते हैं- औडव (पाँच स्वर), षाड़व (छह स्वर), और सम्पूर्ण (सात स्वर)। सत्रहवीं शताब्दी के अन्त तक थाटों की संख्या के विषय में विद्वानों में मतभेद भी रहा है। ‘राग-विबोध’ के रचयिता ने थाटों की संख्या २३ वर्णित की है, तो ‘स्वर-मेल कलानिधि’ के प्रणेता २० और ‘चतुर्दंडि-प्रकाशिका’ के लेखक ने १९ थाटों की चर्चा की है।

आज हमारी चर्चा का थाट है- ‘आसावरी’। इस थाट के स्वर होते हैं- सा, रे, ग॒, म, प ध॒, नि॒ अर्थात आसावरी थाट में गांधार, धैवत और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। आसावरी थाट का आश्रय राग आसावरी ही कहलाता है। इस थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य मुख्य राग हैं- जौनपुरी, देवगांधार, सिंधु भैरवी, कौशिक कान्हड़ा, दरबारी कान्हड़ा, अड़ाना आदि। राग आसावरी के आरोह में- सा, रे, म, प, ध॒ सां तथा अवरोह में- सां, नि॒, ध॒, प, मग॒, रे, सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अर्थात आरोह में गांधार और निषाद स्वर वर्जित होता है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गांधार होता है। दिन के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन सार्थक अनुभूति कराता है।

थाट आसावरी के आश्रय राग आसावरी पर आधारित एक फिल्म-गीत अब हम आपको सुनवाते हैं। आज हम आपको १९६३ में प्रदर्शित फिल्म ‘आज और कल’ का गीत- ‘मुझे गले से लगा लो बहुत उदास हूँ मैं....’ सुनवाएँगे। इस गीत में राग आसावरी के स्वरों की छाया ही नहीं बल्कि आसावरी का गाम्भीर्य भी उपस्थित है। संगीतकार रवि ने फिल्म के प्रसंग के अनुसार ही इस गीत के धुन की रचना की है। भान के अनुकूल संगीत–रचना करना रवि की विशेषता रही है। संगीत की कर्णप्रियता तथा धुन की गेयता का वे विशेष ध्यान रखते थे। रागों पर आधारित उनके संगीतबद्ध किये गीत भी एक सामान्य व्यक्ति सरलता से गुनगुना सकता है। गीतकार साहिर लुधियानवी के शब्दों को आशा भोसले और मोहम्मद रफी ने अपने स्वरों से सजाया है। कहरवा ताल में निबद्ध यह गीत अभिनेत्री नन्दा और सुनील दत्त पर फिल्माया गया है। लीजिए, आप सुनिए यह आकर्षक गीत-



और अब एक विशेष सूचना:
२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

इन तीन सूत्रों से पहचानिये अगला गीत -
१. स्वर है मन्ना दा का.
२. इस संगीतकार जोड़ी के आरंभिक दिनों की फिल्म थी ये.
३. प्रभात की बेला को वर्णित करता ये मधुर गीत.

अब बताएं -
किस राग आधारित है गीत - ३ अंक
गीतकार का नाम बताएं - २ अंक
फिल्म का नाम बताएं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी शायद आपकी मुराद हम पूरी कर पाए हैं

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, September 19, 2011

काली घोड़ी द्वारे खड़ी...काली बाईक का जिक्र और थाट काफ़ी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 747/2011/187

‘ओल्ड इज गोल्ड’ पर जारी भारतीय संगीत के आधुनिक काल में प्रचलित थाटों की श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की आज की कड़ी में हम ‘काफी’ थाट का परिचय प्राप्त करेंगे और इस थाट के आश्रय राग ‘काफी’ पर आधारित एक फिल्मी गीत का आनन्द भी लेंगे। परन्तु उससे पहले प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में की गई थाट विषयक चर्चा की कुछ जानकारी आपसे बाँटेंगे।

संगीत की परिभाषा में थाट को संस्कृत ग्रन्थों में मेल अर्थात स्वरों का मिलाना या इकट्ठा करना कहते हैं। इन ग्रन्थों में थाट अथवा मेल के विषय में जो व्याख्या की गई है, उसके अनुसार ‘वह स्वर-समूह थाट कहलाता है, जो राग-निर्मिति में सक्षम हो’। पं॰ सोमनाथ अपने ‘राग-विवोध’ के तीसरे अध्याय में मेलों को परिभाषित करते हुए लिखा है- ‘थाट इति भाषायाम’ अर्थात, मेल को भाषा में थाट कहते हैं। ‘राग-विवोध’ आज से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व की रचना है। यह ग्रन्थ ‘थाट’ का प्राचीन आधार भी है।

आज हम आपसे थाट ‘काफी’ के विषय में कुछ चर्चा करेंगे।काफी थाट के स्वर हैं- सा, रे, ग॒, म, प, ध, नि॒। इस थाट में गान्धार और निषाद कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। काफी थाट का आश्रय राग ‘काफी’ होता है। इस थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- ‘भीमपलासी’, ‘पीलू’, ‘बागेश्वरी’, ‘नायकी कान्हड़ा’, सारंग अंग और मल्हार अंग के कई राग। राग ‘काफी’ में गांधार और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। इसके आरोह के स्वर हैं- सारेग॒, म, प, धनि॒सां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां नि॒ ध, प, मग॒, रे, सा । इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है और इसका गायन-वादन समय मध्यरात्रि होता है।

काफी थाट का आश्रय राग ‘काफी’ होता है। आज हम आपको राग काफी पर आधारित एक फिल्म-गीत सुनवाते हैं, जिसे हमने १९८१ में प्रदर्शित फिल्म ‘चश्म-ए-बद्दूर’ से लिया है। फिल्म के संगीत निर्देशक राजकमल हैं, जिन्हें राजश्री की कई पारिवारिक फिल्मों के माध्यम से पहचाना जाता है। राजश्री के अलावा राजकमल ने निर्देशिका सई परांजपे की अत्यन्त चर्चित फिल्म ‘चश्म-ए-बद्दूर’ में भी उत्कृष्ट स्तर का संगीत दिया था। इस फिल्म में उन्होने इन्दु जैन के लिखे दो गीतों को क्रमशः राग मेघ और काफी के स्वरों पर आधारित कर संगीतबद्ध किया था। आज हम आपको राग काफी पर आधारित गीत- ‘काली घोड़ी द्वारे खड़ी...’ सुनवाते हैं, जिसे येसुदास और हेमन्ती शुक्ला ने स्वर दिया है। गीत सितारखानी ताल में में निबद्ध है। आप यह गीत सुनिये और गीत का शब्दों पर ध्यान दीजिएगा। गीत में ‘काली घोड़ी’ शब्द का प्रयोग ‘मोटर साइकिल’ के लिए हुआ है। आइए आप भी सुनिए यह मनोरंजक किन्तु राग काफी के स्वरों पर आधारित यह गीत-



और अब एक विशेष सूचना:
२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

इन तीन सूत्रों से पहचानिये अगला गीत -
१. यह गीत कहरवा ताल में निबद्ध है.
२. एक आवाज़ आशा की है जिन्होंने अभिनेत्री नंदा के लिए पार्श्व गायन किया है.
३. मुखड़े में शब्द है -"उदास".

अब बताएं -
गीतकार का नाम बताएं - ३ अंक
संगीतकार कौन है - २ अंक
फिल्म का नाम बताएं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम-
बधाई प्रतिभा जी, हिन्दुस्तानी जी और अमित जी को

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, September 18, 2011

पायलिया बांवरी मोरी....सूने महल में नाचती रक्कासा के स्वरों में राग मारवा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 746/2011/186

‘ओल्ड इज़ गोल्ड‘ पर जारी श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के नए सप्ताह में सभी रसिकों का मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। आधुनिक उत्तर भारतीय संगीत में राग-वर्गीकरण के लिए प्रचलित दस थाट प्रणाली पर केन्द्रित इस श्रृंखला में अब तक आप कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव और पूर्वी थाट का परिचय प्राप्त कर चुके हैं। आज की कड़ी में हम ‘मारवा’ थाट पर चर्चा करेंगे।

हमारा भारतीय संगीत एक सुदृढ़ और समृद्ध आधार पर विकसित हुआ है। समय-समय पर इसका वैज्ञानिक दृष्टि से मूल्यांकन होता रहा है। यह परिवर्द्धन वर्तमान थाट प्रणाली पर भी लागू है। आधुनिक संगीत में प्राचीन मुर्च्छनाओं के स्थान पर मेल अथवा थाट प्रणाली का उपयोग किया जाता है। सभी छोटे-बड़े अन्तराल, जो रागों के लिए आवश्यक हैं, सप्तक की सीमाओं के अन्तर्गत रखे गए और मुर्च्छना की प्राचीन प्रणाली का परित्याग किया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि यह परिवर्तन चार-पाँच सौ वर्ष पूर्व हुआ। आज ऋषभ, गांधार, मध्यम, धैवत और निषाद स्वरों के प्रत्येक स्वर की एक या दो श्रुतियों को ग्रहण कर नवीन थाट का निर्माण करते हैं, जबकि षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। जिस प्रकार प्राचीन मुर्च्छनाएँ प्राचीन जातियों के लिए स्रोत रही हैं, उसी प्रकार मेल अथवा थाट हमारे रागों के लिए स्रोत हैं।

आइए, अब हम ‘मारवा’ थाट के विषय में कुछ चर्चा करते हैं। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे॒, ग, म॑, प, ध, नि । अर्थात ‘मारवा’ थाट में ऋषभ कोमल, मध्यम तीव्र तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। राग मारवा, ‘मारवा’ थाट का आश्रय राग है, जिसमे ऋषभ कोमल और मध्यम तीव्र होता है किन्तु पंचम वर्जित होता है। ‘मारवा’ थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- पूरिया, साजगिरी, ललित, सोहनी, भटियार, विभास आदि। आश्रय राग मारवा का आरोह- सा, रे, ग, म॑ध, निध, सां तथा अवरोह- सां, निध, म॑ग, रे, सा होता है। इसका वादी स्वर ऋषभ तथा संवादी स्वर धैवत होता है। इस राग का गायन-वादन दिन के चौथे प्रहर में उपयुक्त माना जाता है।

राग मारवा का प्रयोग हमारी फिल्मों में कम ही हुआ है। हिन्दी फिल्मों में रागों पर आधारित सर्वाधिक गीतों की रचना करने वाले संगीतकार के रूप में नौशाद अली का नाम सर्वोपरि है। १९६६ में प्रदर्शित फिल्म ‘साज और आवाज़’ में संगीतकार नौशाद ने राग ‘मारवा’ के स्वरों का सहारा लेकर एक अनूठा नृत्य-गीत स्वरबद्ध किया। अनूठा इसलिए कि यह गीत श्रृंगार रस प्रधान है और राग मारवा की प्रवृत्ति गम्भीरता और उदासी का भाव उत्पन्न करने में सहायक होता है। फिल्म ‘साज और आवाज़’ का यह गीत- ‘पायलिया बावरी मोरी...’ अभिनेत्री सायरा बानो के नृत्य पर फिल्माया गया था। यह गीत तीनताल और कहरवा तालों में निबद्ध किया गया है। गीतकार खुमार बाराबंकवी के शब्दों को लता मंगेशकर ने अपने सुरों से सजाया है। लीजिए, आप भी सुनिए, यह मधुर गीत-



और अब एक विशेष सूचना:
२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

इन तीन सूत्रों से पहचानिये अगला गीत -
१. फिल्म की निर्देशिका एक महिला है.
२. इस युगल गीत में एक आवाज़ येसुदास की है.
३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से - "भीड़".

अब बताएं -
गीतकार का नाम बताएं - ३ अंक
दूसरी आवाज़ किसकी है - २ अंक
इस क्लास्सिक फिल्म का नाम बताएं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
अरे थोड़ी सी पहेली मुश्किल क्या हुई आप लोगों ने हथियार डाल दिए, कृष्ण मोहन के नए हिंट भी किसी को गीत तक नहीं पहुंचा पाया. ऐसा तो पहली बार हुआ

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

'गीतांजलि' ने मानव मन में एक स्निग्ध, स्नेहिल स्पर्श दिया - माधवी बंद्योपाध्याय

सुर संगम - 35 -रवीन्द्रनाथ ठाकुर की सार्द्धशती वर्ष-२०११ पर श्रद्धांजलि (तीसरा भाग)

बांग्ला और हिन्दी साहित्य की विदुषी श्रीमती माधवी बंद्योपाध्याय से कृष्णमोहन मिश्र की रवीन्द्र साहित्य और उसके हिन्दी अनुवाद विषयक चर्चा
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पहला भाग
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भी संगीत-प्रेमियों का ‘सुर संगम’ के आज के अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। आपको स्मरण ही है कि इन दिनों हम कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर के १५०वें जयन्ती वर्ष में रवीन्द्र-साहित्य की विदुषी माधवी बंद्योपाध्याय से बातचीत कर रहे हैं। माधवी जी ने रवीद्रनाथ के अनेक गद्य और पद्य साहित्य का हिन्दी अनुवाद किया है। यह सभी अनुवाद सदा साहित्य जगत में चर्चित रहे। इस वर्ष रवीन्द्रनाथ ठाकुर के सार्द्धशती वर्ष में माधवी जी द्वारा अनूदित रवीन्द्रनाथ ठाकुर की लोकप्रिय कहानियों के संग्रह का प्रकाशन उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा किया गया है। गद्य साहित्य से अधिक महत्त्वपूर्ण है रवीन्द्रनाथ के गीतों का हिन्दी अनुवाद। माधवी जी द्वारा किये गीतों का अनुवाद केवल शाब्दिक ही नहीं है बल्कि स्वरलिपि के अनुकूल भी है। इस श्रृंखला की तीसरी कड़ी में आज हम माधवी जी से रवीन्द्र संगीत और साहित्य के हिन्दी अनुवाद के विषय में चर्चा करेंगे।

कृष्णमोहन– माधवी जी, नमस्कार! और एक बार फिर ‘सुर संगम’के मंच पर आपका स्वागत है। आज हम आपसे रवीन्द्र साहित्य के हिन्दी अनुवाद पर चर्चा करना चाहते हैं। आपने भी रवीन्द्रनाथ की अनेक रचनाओं का हिन्दी अनुवाद किया है। आप द्वारा अनूदित ‘वर्षामंगल’ सहित कुछ अन्य कृतियों की मंच-प्रस्तुतियों में मैं भी सहभागी और साक्षी रहा हूँ। इस विषय में हमारे पाठकों को कुछ बताएँ।

माधवी दीदी- इसमें कोई सन्देह नहीं है कि रवीन्द्र साहित्य को अनेक भाषाओं में अनूदित किया गया है परन्तु हम रवीन्द्र संगीत के विषय में ऐसा नहीं कह सकते है। रवीन्द्र-संगीत सुधा का रसास्वादन केवल बंगभाषी ही कर रहे है। मेरी यह इच्छा रही है कि बांग्ला भाषा के निकटतम भाषा हिन्दी में इसका अनुवाद अवश्य होना चाहिये, इससे हिन्दी वलय के श्रोता भी इसका रसास्वादन कर सकेंगे। मैंने स्वयं संगीत के अनुवाद कार्य करने की धृष्टता की है। मैंने प्रयास किया है कि गीतों का केवल शाब्दिक अथवा गीत के भावों का ही अनुवाद न हो। आप जानते ही हैं कि रवीन्द्रनाथ के गीत, संगीत प्रधान होते हैं। यदि मूल गीत की स्वरलिपि में ही हिन्दी अनुवाद को गाया जा सके तो यह रवीन्द्र संगीत के प्रति एक न्यायसंगत प्रयास होगा। स्वरलिपि के अनुकूल अनुवाद से कोई भी हिन्दीभाषी स्वरलिपि पढ़ कर गानों को गा सकता है। हिन्दी भाषा का चलन बंगला से अलग होता है, उस चलन को बरकरार रखने के लिए मैंने गीतों के ठहराव में एकाध मात्राओं का परिवर्तन किया है, परन्तु स्वरलिपि में कहीं भी परिवर्तन नहीं है। मैंने ‘वर्षामंगल’’ तथा ‘‘ऋतुरंग’’ का ऐसे ही अनुवाद किया है। इसके अलावा मैंने उनके और भी अनेक गीतों तथा कविताओं के अनुवाद का प्रयास किया है। मुझे इस कार्य में कितनी सफलता मिली है, इसका मूल्यांकन तो पाठक और आप जैसे समीक्षक ही करेंगे।

कृष्णमोहन– माधवी दी’, आपके रचना संसार का अवलोकन कर मैं तो मंत्रमुग्ध हो जाता हूँ। आपका रवीन्द्र संगीत का हिन्दी अनुवाद तो वन्दनीय है ही, परन्तु आपने गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ का अवधी से बांग्ला में जो अनुवाद किया है, वह भी कम अनूठा नहीं है। आपने इस कृति के बांग्ला अनुवाद में मूल कृति के दोहे, चौपाई, सोरठा आदि छन्दों की मात्राओं का पूरा ध्यान रखा है।

माधवी दीदी- कृष्णमोहन जी, आप जानते ही हैं कि मेरा जन्म मर्यादपुरुषोत्तम राम की नगरी अयोध्या में हुआ था। मैं मानती हूँ कि मेरा यह प्रयास ईश्वरीय कृपा से ही सम्भव हुआ है। थोड़ा विषयान्तर तो होगा, परन्तु अपने पाठकों और श्रोताओं को क्या आप बांग्ला और अवधी में ‘रामचरितमानस’ के समानान्तर गायन के अंश को सुनवा सकते हैं?

कृष्णमोहन- अवश्य, आपकी इच्छानुसार हम अपने पाठकों/श्रोताओं को ‘रामचरितमानस’ से बालकाण्ड के रामजन्म का प्रसंग, आपके बांग्ला अनुवाद और मूल अवधी में समानान्तर गायन प्रस्तुत कर रहे हैं। संगीत निर्देशन प्रोफ़ेसर कमला श्रीवास्तव ने किया है। आरम्भ में प्रसंग का परिचय माधवी बंद्योपाध्याय की आवाज़ में है।

रामचरितमानस (बांग्ला/अवधी) : “बालकाण्ड – रामजन्म प्रसंग” : अनुवाद – माधवी बंद्योपाध्याय


कृष्णमोहन- बांग्ला अनुवाद का यह एक उत्कृष्ठ उदाहरण है। माधवी दी’, अब हम विश्वकवि की कालजयी कृति ‘गीतांजलि’ पर थोड़ी चर्चा करेंगे।

माधवी दीदी- कृष्णामोहन जी, विश्व में ऐसा कोई प्रबुद्ध व्यक्ति शायद ही हो जो रवीन्द्रनाथ की ‘गीतांजली’ से परिचित न हो। ‘गीतांजलि’ के कारण ही रवीन्द्रनाथ नोबेल पुरस्कार से भूषित हुए थे और हर भारतवासी का मस्तक गर्व से ऊँचा हो गया था। रवीन्द्रनाथ की अंग्रेजी ‘गीतांजलि’ के विश्व-जय करने की कहानी सभी ने सुनी है। एशियावासी के रूप में साहित्य में प्रथम नोवेल पुरस्कार हासिल करना एक बहुत बड़ा कृतित्व था। उस समय के बारे में भी सोचना चाहिये, जिस समय ‘गीतांजलि’ काव्य-ग्रन्थ इतना अधिक लोकप्रिय हुआ था। वह प्रथम विश्वयुद्ध का समय था, देश भर में चारों ओर खून की नदी बह रही थी, राजनैतिक क्षेत्र में भयंकर हलचल मचा हुआ था। उस समय रवीन्द्रनाथ की यह संवेदनशील ‘गीतांजलि’ ने मानव मन में एक स्निग्ध, स्नेहिल स्पर्श दिया, प्रलेप लगाया।

अब आज के समाज को ही ले लीजिए- आज समाज में आतंकवाद का बोलबाला है, आदमी आदमी का शिकार कर रहा है, तो आज तो ‘गीतांजलि’ मानव मन में उस काल से भी अधिक सकून देगा। समाज के इस रक्तपात के वातावरण में ‘गीतांजलि’ के प्रत्येक गीत हमारे लिए अमृत है, अमर कविता है, अविनाशी गान है। इसीलिए आज ‘गीतांजलि’ को लोग अधिक श्रद्धा से वक्ष में ले रहे हैं। ‘गीतांजलि’ काव्य को हम अध्यात्मवादी नाम भी दे सकते है। गौर कीजिए कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपनी सभी रचनाओं को किसी न किसी को अर्पित किया है। पर ‘गीतांजलि’ को उन्होंने किसी को भी अर्पित नहीं किया। ‘गीतांजलि’ को हम ईश्वरीय उदगार कह सकते हैं। उन्होंने लिखा है- “हे निभृत, प्रण के देवता, ब्रज के वंशी-वादक, अब मुझे ग्रहण करो नाथ, मम अन्तर को विकसित कर दो.... -इन सब पंक्तियों में कवि जिन्हें सम्बोधित कर रहे हैं, यही है ‘गीतांजलि’ की ईश्वर-चेतना। यदि ध्यान दिया जाय तो समझ में आयेगा कि कविगुरु के ईश्वर मानव में ही बसे हुए हैं। ‘गीतांजली’ में ईश्वर के लिए एक मौलिक चेतना विद्यमान है और साथ ही साथ नर देवता के प्रति कविगुरु का अपार श्रद्धा बोध।

कृष्णमोहन- बहुत-बहुत धन्यवाद माधवी दीदी, आपने ‘गीतांजलि’ के गुणों की अत्यन्त प्रेरक अभिव्यक्ति हम सब के लिए की है। आइए, रवीन्द्रनाथ ठाकुर के सार्द्धशती (१५०वें) जयन्ती वर्ष मे आयोजित इस श्रृंखला के समापन से पूर्व चर्चित रवीन्द्र-गीत –"चोखेर आलोए देखे छिलाम..." के मूल बांग्ला और फिर उसके हिन्दी अनुवाद का रसास्वादन कराते हैं।

रवीद्र संगीत : "चोखेर आलोए देखे छिलाम, चोखेर बाइरे..." : बांग्ला गीत


रवीद्र संगीत : "आँखों की ज्योति से देखा अब तक..." : हिन्दी रूपान्तरण


कृष्णमोहन- इस मधुर गीत के साथ ही हम ‘हिन्दयुग्म’ परिवार की ओर से रवीद्र साहित्य और संगीत की विदुषी माधवी बंद्योपाध्याय के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं। माधवी दीदी, आप हमारे इस मंच पर आईं और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के साहित्य और संगीत पर सार्थक चर्चा की, हम आपको हार्दिक धन्यवाद देते हैं।

माधवी दीदी- आपके इस मंच के माध्यम से मुझे भी कविगुरु को श्रद्धा-सुमन अर्पित करने का अवसर मिला, इसके लिए आपको भी धन्यवाद ज्ञापन करती हूँ। नमस्कार!


प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती

आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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