शुक्रवार, 3 जून 2011

लाईफ बहुत सिंपल है....वाकई अमोल गुप्ते और हितेश सोनी के रचे इन गीतों सुनकर आपको भी यकीन हो जायेगा

Taaza Sur Taal (TST) - 16/2011 - STANLEY KA DABBA

दोस्तों मुझे यकीन है कि "तारे ज़मीन पर" आपकी पसंदीदा फिल्मों में से एक होगी. अगर हाँ तो आप ये भी जानते होंगें कि इस फिल्म के निर्देशक पहले अमोल गुप्ते नियुक्त हुए थे, बाद में कुछ कारणों के चलते अमोल, अमीर से अलग हो गए और अमीर ने खुद फिल्म का निर्देशन किया. पर ये भी सच है कि उस फिल्म में अमोल का योगदान एक लेखक से बहुत कुछ अधिक था, जाहिर है जब उस अमोल की खुद निर्देशित फिल्म आये और उसमें भी बच्चों की ही प्रमुख भूमिकाएं हो तो उम्मीदें बेहद बढ़ जाती है. "तारे ज़मीन पर" में संगीत था शंकर एहसान लॉय की तिकड़ी का और कुछ गीत तो फिल्म के ऐसे थे कि आने वाले कई दशकों तक श्रोताओं को याद रहेंगें. मगर अमोल ने अपनी फिल्म "स्टेनली का डब्बा" के लिए चुना संगीतकार हितेश सोनिक को, और गीतकार की भूमिका खुद उठाने की सोची. हितेश अब तक पार्श्व संगीत के लिए जाने जाते थे और अनुराग कश्यप विशाल भारद्वाज जैसे बड़े संगीतकारों के साथ काम कर चुके है. बतौर स्वतंत्र संगीतकार ये उनकी पहली फिल्म है.

बहरहाल हम आते हैं इस अल्बम के गीतों पर. दरअसल पहला गीत ही ऐसा है जो आपको गहरे तक छूने की कुव्वत रखता है. शान की मधुर आवाज़ और अमोल गुप्ते के अलग "हट के" बोलों में जैसे जादू है. "लाईफ बहुत सिंपल है..." जीवन को सरल और सहज होकर देखने की सीख देती है, हितेश ने संगीत संयोजन बेहद सरल रखा है. और धुन भी मन को छूने में सक्षम है. यक़ीनन आप इस गीत को ड्राईव करते हुए गुनगुनाना चाहेंगें.

सुखविंदर ने सहज होकर गाया है अगला गीत "डब्बा", जिसे सुनकर आपको याद आ जायेगा माँ के हाथों बनाया हुआ टिफिन का डब्बा जिसे स्कूल ले जाते समय ताकीद मिलती थी कि कुछ भी बाकी नहीं छूटना चाहिए, और वो स्कूल रिसेस जिसमें योजना बनती थी इस डिब्बे को कैसे खाली किया जाए. दाल, चावल, पनीर, मशरूम, गोभी....सब कुछ है इस मसाला मिक्स गीत में. सुखविंदर यहाँ आपको एक नए अंदाज़ में दिखेंगें. वो एक ऐसे गायक हैं कि जो गाते हैं उसमें अपना दिल उंडेल देते है, अमोल के गैर पारंपरिक शब्द इस सरल सहज गीत की जान हैं.

शंकर महादेवन की आवाज़ में है अगला गीत "नन्ही सी जान". कहानीनुमा ये गीत अल्बम के अन्य गीतों से अलग कुछ रोक् शैली का है. ये फिल्म की सिचुएशन के अनुरूप होना चाहिए, जो शायद परदे पर अधिक सटीक लगे. विशाल ददलानी आते है अगला गीत लेकर "तेरे अंदर भी कहीं...", ये सोफ्ट रोक् गीत उनकी आवाज़ में खूब जचता है. इस गीत का एक संस्करण आदित्य चक्रवर्ती की किशोर आवाज़ में भी है. अमोल लिखते हैं –"किरणों में नहाके ताज़ा तरीन, खुशियों के निवाले हो ज्यादा महीन, भोला सा दिल करे सबपे यकीन, भेड़ों की भीड़ में भूल आया क्या तू...." वाह

तमाम पुरुष गायकों की भीड़ में एक गीत है जिसमें महिला स्वर सुनाई देता है. इसे गीत को खुद अमोल के स्वरबद्ध किया है. ये गीत एक लोरी है, पता नहीं कितने दिनों बाद फिल्मों में एक अच्छी लोरी सुनने को मिली है, पार्श्व वाध्य के रूप में सिर्फ बांसुरी के स्वर हैं, और हंसिका अय्यर की सुरीली आवाज़ में बहुत प्यारा बन पड़ा है ये गीत – झूला झूल...., अवश्य सुनियेगा. व्यक्तिगत तौर पर मैं इस अल्बम की सिफारिश अवश्य करूँगा, बाकी सुनकर आप भी बताएं कि ये धीमा, सुरीला संगीत अपनी सहजता में आपको किस हद तक भाया है.

आवाज़ रेटिंग - 8/10

एक और बात: इस एलबम के सारे गाने आप यहाँ पर सुन सकते हैं।




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

गुरुवार, 2 जून 2011

रूठ के हमसे कभी जब चले जाओगे तुम....हर किसी के जीवन को कभी न कभी छुआ होगा मजरूह के इस गीत ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 670/2011/110

"मेरे पीछे ये तो मोहाल है कि ज़माना गर्म-ए-सफ़र न हो, कि नहीं मेरा कोई नक़्श-ए-पाँव जो चिराग़-ए-राह-गुज़र न हो", मजरूह साहब के लेखनी की विविधता ऐसी है कि आने वाली तमाम पीढ़ियाँ उनके लेखनी से प्रभावित होती रहेंगी। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इन दिनों मजरूह सुल्तानपुरी के गीतों का जो कारवाँ चला जा रहा था, वह कारवाँ आज की कड़ी में जाकर कुछ समय के लिये पड़ाव डाल रहा है। '...और कारवाँ बनता गया' शृंखला की आज है दसवीं और अंतिम कड़ी। १९४६ में 'शाहजहाँ' से जो कारवाँ चल पड़ा था, वह आकर रुका था १९९९ में फ़िल्म 'जानम समझा करो' पे आकर। राहुल देव बर्मन वाले अंक में हमनें ज़िक्र किया था उन फ़िल्मों का जिनमें नासिर हुसैन, मजरूह सुल्तानपुरी और राहुल देव बर्मन की तिकड़ी का संगम था। पंचम को अलग रखें तो नासिर साहब के साथ मजरूह साहब नें पंचम के आने से पहले 'फिर वही दिल लाया हूँ' तथा पंचम के बाद आनंद-मिलिंद के साथ 'क़यामत से क़यामत तक', जतीन-ललित के साथ 'जो जीता वही सिकंदर' और अनु मलिक के साथ 'अकेले हम अकेले तुम' में काम किया। और सिर्फ़ काम ही नहीं किया, अपने हुनर का लोहा भी मनवाया कि ४० के दशक में पारी की शुरुआत करने वाले गीतकार ९० के दशक के आख़िर में भी उतने ही सक्रीय व सफल हैं और गीतों का स्तर भी उतना ही ऊँचा है। तो इस शृंखला को समाप्त करते हुए आज की कड़ी के लिये हमने चुना है १९९२ की फ़िल्म 'जो जीता वही सिकंदर' से जतिन की आवाज़ में "रूठ के हमसे कभी जब चले जाओगे तुम, यह न सोचा था कभी इतने याद आओगे तुम"। भले ही ९० के दशक के गीतों से हम परहेज़ करते हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में, लेकिन कभी कभी इस रवायत को तोड़ने को जी चाहता है। गीत अगर सचमुच अच्छा है तो सिर्फ़ दशक का ठप्पा लगा कर उसे नज़रंदाज़ तो नहीं किया जा सकता न!

"रूठ के हमसे कभी जब चले जाओगे तुम", भाई-भाई के संबंध को लेकर इस गीत से बेहतर गीत मैंने तो आज तक नहीं सुना! इस गीत को सही तरीके से अनुभव वही कर सकता है जिसका कोई भाई है। फ़िल्म में आमिर ख़ान का बड़ा भाई एक दुर्घटना के बाद अस्पताल में ज़िंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहा है, ऐसे में यह गीत पार्श्व में बज उठता है और आमिर ख़ान अपने बड़े भाई के साथ गुज़ारे बचपन के दिनों को याद करते हैं। आमिर ख़ान के बचपन का रोल पता है किसने निभाया था? जी हाँ, उनके भांजे इमरान ख़ान नें, जो आज के दौर के नायक हैं। मजरूह साहब नें इस गीत में ऐसे बोल लिखे हैं कि गीत को सुनते हुए आँखें भर आती हैं। "मैं तो ना चला था दो क़दम भी तुम बिन, फिर भी मेरा बचपन यही समझा हर दिन, छोड़ के मुझे भला अब कहाँ जाओगे तुम, यह न सोचा था कभी इतने याद आओगे तुम"। और २४ मई २००० को नीमोनिआ से ग्रस्त होकर मजरूह साहब भी इस संसार से रूठ कर हमेशा हमेशा के लिये चले गये, और पीछे छोड़ गये अपने हज़ारों गीतों का सुरीला कारवाँ। आज उनको समर्पित इस शृंखला को समाप्त करते हुए मुझे उनके लिखे जिस गीत के बोल बार बार याद आ रहे हैं, वो हैं....

"जब हम ना होंगे, जब हमारी ख़ाक पे तुम रुकोगे चलते चलते,
अश्क़ों से भीगी चांदनी में एक सदा सी सुनोगे चलते चलते,
वहीं पे कहीं हम तुमसे मिलेंगे, बनके कली, बन के सबा, बाग़-ए-वफ़ा में,
रहें ना रहें हम...
"।

मजरूह साहब, आप चाहें शारीरिक तौर से हमारे बीच मौजूद न हों, लेकिन आपका फ़न, आपकी कला, आपके गीतों के ज़रिये अमर हो गया है, जो युगों युगों तक दुनिया की फ़िज़ाओं में आप के मौजूद होने का निरंतर आभास कराते रहेंगे। मजरूह सुल्पानपुरी की सुरीली स्मृति को 'हिंद-युग्म - आवाज़' परिवार का विनम्र नमन। अगले सप्ताह एक नई शृंखला लेकर हम पुन: उपस्थित होंगे, और शनिवार को विशेषांक में आपसे फिर मुलाक़ात होगी, तब तक के लिये 'ओल्ड इज़ गोल्ड' से हमें अनुमति दीजिये, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि 'जानम समझा करो' में जब मजरूह साहब के लिखे "लव हुआ", "आइ वास मेड टू लव यू बेबी क्या ख़याल है बोल" और "जानम समझा करो" जैसे गीतों की समालोचना हुई तो उन्होंने कहा था - "These are certainly not objectionable. They only sound like that way because of the English words. I will always maintain that "aati kya khandala" is a 'be-huda' song because the mukhda is like an indecent proposal, and the degenerate element among the youth have got a new weapon in their armour for harassing women"।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 9/शृंखला 17
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - सहगल साहब की आवाज़ में था ये मशहूर गीत.
सवाल १ - गीतकार बताएं - ३ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी और अनजाना जी एच्छिक रूप से प्रतियोगिता से दूर रहे तो हमें मिला एक नया विजेता अविनाश जी के रूप में जिन्हें सबसे जबरदस्त टक्कर मिली क्षिति जी और प्रतीक जी से. अविनाश जी को हमारी ढेरो बधाईयां, अमित और अनजाना जी अब नयी शृंखला के बारे में क्या योजना है ?

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

बुधवार, 1 जून 2011

आओ मनाये जश्ने मोहब्बत, जाम उठाये गीतकार मजरूह साहब के नाम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 669/2011/109

जरूह सुल्तानपुरी एक ऐसे गीतकार रहे हैं जिनका करीयर ४० के दशक में शुरु हो कर ९० के दशक के अंत तक निरंतर चलता रहा और हर दशक में उन्होंने अपना लोहा मनवाया। कल हमनें १९७३ की फ़िल्म 'अभिमान' का गीत सुना था। आज भी इसी दशक में विचरण करते हुए हमनें जिस संगीतकार की रचना चुनी है, वो हैं राजेश रोशन। वैसे तो राजेश रोशन के पिता रोशन के साथ भी मजरूह साहब नें अच्छा काम किया, फ़िल्म 'ममता' का संगीत उसका मिसाल है; लेकिन क्योंकि हमें १०-कड़ियों की इस छोटी सी शृंखला में अलग अलग दौर के संगीतकारों को शामिल करना था, इसलिए रोशन साहब को हम शामिल नहीं कर सके, लेकिन इस कमी को हमन उनके बेटे राजेश रोशन को शामिल कर पूरा कर रहे हैं। एक बड़ा ही लाजवाब गीत हमनें सुना है मजरूह-राजेश कम्बिनेशन का, १९७७ की फ़िल्म 'दूसरा आदमी' से। "आओ मनायें जश्न-ए-मोहब्बत जाम उठायें जाम के बाद, शाम से पहले कौन ये सोचे क्या होना है शाम के बाद"। हज़ारों गीतों के रचैता मजरूह सुल्तानपुरी के फ़न की जितनी तारीफ़ की जाये कम है। ज़िक्र चाहे दोस्त के दोस्ती की हो या फिर महबूब द्वारा अपने महबूबा से छुवन का पहला अहसास, मुश्किल से मुश्किल भाव को भी बड़े ही सहजता से व्यक्त करना उनका कमाल था और बड़ी ख़ूबसूरती के साथ इन अहसासों को वे लफ़्ज़ों में पकड़ लेते थे। लता मंगेशकर और किशोर कुमार की आवाज़ों में आज का प्रस्तुत गीत भी इन्हीं में से एक है।

फ़िल्म संगीत का स्वर्णयुग बीत जाने के बाद भी मजरूह सुल्तानपुरी अपने स्तर को कायम रखने में सक्षम थे। जहाँ दूसरे गीतकार फ़िल्म निर्माता के डिमाण्ड के मुताबिक सस्ते और चल्ताउ किस्म के गीत लिख रहे थे और उन्हें पब्लिक डिमाण्ड कह कर चला रहे थे, वहीं दूसरी तरफ़ कुछ गिने-चुने गीतकारों नें यह साबित भी किया कि अगर सृजनात्मक्ता है तो तमाम पाबंदियों में रह कर भी अच्छा गीत लिखा जा सकता है। मजरूह साहब भी इन गिने चुने गीतकारों में से थे। शारीरिक संबंध और पैशन को अश्लील और खुले शब्दों में व्यक्त करने का काम तो बहुत से गीतकारों नें हाल में किया है, लेकिन मजरूह साहब नें कई बार ऐसे सिचुएशनों के लिये भी कुछ ऐसे सुंदर गीत लिखे हैं जो यौनोत्तेजक होते हुए भी उनमें कितनी सुंदर अभिव्यक्ति हुई है। मजरूह साहब के ही शब्दों में - "I have said it all in so many songs, without resorting to cheapness or blatant verse"। उनका कहना बिल्कुल सही है। फ़िल्म 'अनामिका' में लता जी से ही गवाया गया था "बाहों में चले आओ, हमसे सनम क्या परदा"। अगर इस गीत को दूसरे अंदाज़ में लिखा गया होता तो शायद लता जी इस गीत को कभी नहीं गातीं, लेकिन सेन्सुअस होते हुए भी शालीनता को बरकरार रखते हुए मजरूह साहब नें इस गीत को जो अंजाम दिया है कि लता जी भी गीत को गाने के लिये राज़ी हो गईं, जब कि फ़िल्म के सभी दूसरे गीत आशा जी की आवाज़ में है। और आज के अंक के 'दूसरा आदमी' के गीत को ही ले लीजिये, इसके अंतरे के बोलों पर ज़रा ध्यान दीजिये, "ये आलम है ऐसा, उड़ा जा रहा हूँ, तुम्हें लेके बाहों में, हमारे लबों से तुम्हारे लबों तक, नहीं कोई राहों में, कैसे कोई अब दिल को सम्भाले, इतने हसीं पैग़ाम के बाद, शाम से पहले कौन ये सोचे क्या होना है शाम के बाद"। गीत के पिक्चराइज़ेशन की बात करें तो यह पार्श्व में चलने वाला गीत है, यानी किसी अभिनेता ने लिप-सींक नहीं किया है। पार्टी में ॠषी कपूर और राखी डांस करते हुए दिखाये जाते हैं और राखी को मन ही मन चाहने वाले परीक्षित साहनी दूर खड़े उन्हें देखते रहते हैं। और घर में तन्हाई में बैठी नीतू सिंह अपने पति ॠषी कपूर के दफ़्तर से वापस लौटने का इंतज़ार कर रही है। वैवाहिक संबंधों के तानेबाने पर केन्द्रित यश चोपड़ा की इस फ़िल्म के सभी गानें लोकप्रिय हुए थे, लेकिन यह गीत फ़िल्म का सब से उत्कृष्ट गीत है हमारी नज़र में, आइए सुना जाये!



क्या आप जानते हैं...
कि मजरूह सुल्तानपुरी के बेटे अंदलिब सुल्तानपुरी फ़िल्म जगत में एक निर्देशक की हैसियत रखते हैं। 'जानम समझा करो' उन्हीं के निर्देशन में बनी पहली फ़िल्म थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 9/शृंखला 17
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.
सवाल १ - फिल्म में नायक के भाई की भूमिका किस कलाकार ने निभायी है - ३ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - निर्देशक कौन है इस खूबसूरत फिल्म के - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अविनाश जी ने दूसरी कोशिश में कैच पूरा किया और लपक लिए ३ अंक. प्रतीक जी और क्षिति जी को भी बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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