गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

दिल तोड़ने वाले तुझे दिल ढूंढ रहा है....महबूब खान ने दिल तो नहीं तोडा मगर दिल उन्हें ढूंढ रहा है आज भी शायद

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 540/2010/240

'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ'। इस शृंखला के दूसरे खण्ड में इन दिनों आप सुन रहे हैं फ़िल्मकार महबूब ख़ान के फ़िल्मों के गानें और महबूब साहब के फ़िल्मी यात्रा का संक्षिप्त विवरण। आज हम आ पहुँचे हैं इस खण्ड की अंतिम कड़ी पर। कल हमारी चर्चा आकर रुकी थी महबूब साहब की सब से मशहूर फ़िल्म 'मदर इण्डिया' पे आकर। आइए 'मदर इण्डिया' फ़िल्म से जुड़े कुछ और रोचक तथ्य आपको बताएं। फ़िल्म के ओपेनिंग् सीक्वेन्स में एक हथोड़ा और कटारी दिखाया जाता है, जो कि महबूब साहब की कंपनी का लोगो था। लेकिन क्योंकि इस फ़िल्म को ऒस्कर में शामिल किया जा रहा था और ऐण्टि-कम्युनिस्ट का दौर था, इसलिए इस सीक्वेन्स को फ़िल्म से हटा दिया गया था। शुरु शुरु में सुनिल दत्त द्वारा निभाया गया बिरजु का किरदार साबू द्वारा निभाया जाना था, जो कि भारतीय मूल के एक मशहूर हॊलीवूड ऐक्टर थे। शूटिंग के दौरान एक अग्निकांड के सीक्वेन्स में नरगिस आग के घेरे में आ गईं थीं और आग बेकाबू हो गयी था। ऐसे में ख़ुद सुनिल दत्त ने एक कम्बल के सहारे नरगिस को आग से बाहर निकाला था। और यहीं से दोनों में प्रेम संबंध शुरु हुआ और एक साल के अंदर दोनों ने शादी भी कर ली। ये तो थी कुछ दिलचस्प बातें 'मदर इण्डिया' के बारे में। आइए अब महबूब साहब की फ़िल्मी सफ़र के अगले पड़ाव की ओर बढ़ा जाए। 'मदर इण्डिया' के बाद ६० के दशक में उन्होंने एक और महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'सन ऒफ़ इण्डिया' की योजना बनाई। उनका यह सपना था कि यह फ़िल्म 'मदर इण्डिया' को भी पीछे छोड़ दे, लेकिन निशाना चूक गया और बदकिस्मती से यह महबूब ख़ान की सबसे कमज़ोर फ़िल्मों में से एक साबित हुई। यह १९६२ की फ़िल्म थी। इसके दो साल बाद, महबूब ख़ान कशमीर की कवयित्री-रानी हब्बा ख़ातून पर एक फ़िल्म बनाने की परियोजना बना रहे थे, लेकिन काल के क्रूर हाथों ने उन्हें हम सब से हमेशा हमेशा के लिए जुदा कर दिया। २८ मई, १९६४ को महबूब ख़ान इस दुनिया-ए-फ़ानी से कूच कर गए, और पीछे छोड़ गए अपनी रचनात्मक्ता, अपने उद्देश्यपूर्ण फ़िल्मों की अनमोल धरोहर। फ़िल्म जगत कर्ज़दार है महबूब ख़ान के उनके अमूल्य योगदान के लिए।

और अब आज का गीत। आज हम आपको सुनवा रहे हैं लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी के गाये हुए युगल गीतों में से चुन कर एक बेहद लोकप्रिय गीत फ़िल्म 'सन ऒफ़ इण्डिया' से - "दिल तोड़ने वाले तूझे दिल ढूंढ़ रहा है, आवाज़ दे तू कौन सी नगरी में छुपा है"। महबूब साहब की और तमाम फ़िल्मों की तरह इस फ़िल्म में भी शक़ील और नौशाद की जोड़ी ने गीत संगीत का पक्ष सम्भाला था। महबूब ख़ान द्वारा निर्मित व निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे कमलजीत और सिमी गरेवाल। महबूब साहब के बेटे साजिद ख़ान ने बाल कलाकार की भूमिका निभाई थी जिन पर शांति माथुर के गाये "नन्हा मुन्ना राही हूँ" और "आज की ताज़ा ख़बर" गीत फ़िल्माये गये थे। ये दोनों ही गीत हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनवा चुके हैं। महबूब साहब को इस फ़िल्म के निर्देशन के लिए उस साल के 'फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार' के लिए नॊमिनेट किया गया था। तो लीजिए लता-रफ़ी की आवाज़ों में यह जुदाई वाला गीत सुना जाए। हम भी महबूब साहब के लिए यही कहते हैं कि तूझे दिल ढूंढ़ रहा है, आवाज़ दे तू कौन सी नगरी में छुपा है!!! इसी के साथ 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' शृंखला का दूसरा खण्ड अब यहीं सम्पन्न होता है जिसमें हमने महबूब ख़ान को फ़ीचर किया। रविवार से इस शृंखला के तीस्रे खण्ड में एक और महान फ़िल्मकार का फ़िल्मी सफ़र लेकर हम पुन: उपस्थित होंगे, और शनिवार को 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में तशरीफ़ लाना ना भूलिएगा। अब दीजिए इजाज़त, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि साजिद ख़ान महबूब ख़ान के गोद लिए हुए पुत्र थे, जो 'मदर इण्डिया' और 'सन ऒफ़ इण्डिया' में बतौर बालकलाकार नज़र आये। १९८३ की फ़िल्म 'हीट ऐण्ड डस्ट' में वो आख़िरी बार नज़र आये थे।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०१ /शृंखला ०५
गीत के अंतरे से ये हिस्सा सुनें -


अतिरिक्त सूत्र - आवाज़ लता जी की है.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - बताएं कि बातें अब किस फिल्मकार की होंगीं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
कल दरअसल मुझे कार्यालय जल्दी जाना पड़ा, सोचा था कि वहाँ जाकर अपडेट कर दूँगा, मगर कुछ यूँ फंसा काम में कि याद ही नहीं रहा.....लगभग शाम ८-९ बजे तक फ्री हुआ, तब जाकर शरद जी का कमेन्ट पढ़ा. माफ़ी चाहूँगा....खैर एक समाधान है अगर आप सब को मंजूर हो तो....कल की पहेली से पहले श्याम जी के १२ अंक थे और शरद जी के १०. कल सबसे पहले शरद जी उपस्थित हुए और जाहिर है उन्होंने गीत पहचान लिया था, वो २ अंकों वाले सवाल का सही जवाब देते इस पर उनके अब तक रिकॉर्ड को देखकर जरा भी संशय नहीं किया जा सकता. श्याम जी उनके बाद आये और उन्होंने गायक का नाम भी बता ही दिया, यानी कि अगर कोई १ अंक वाला जवाब होता तो वो भी जरूर बता देते. तो इस तरह अगर शरद जी २ अंक कमा भी लेते तो भी श्याम जी उनसे १ अंक से आगे रहते. अब अगर पहेली को निरस्त भी किया जाए तो उस स्तिथि में भी श्याम जी ही विजेता ठहरेगें. तो हम चौथी शृंखला के विजेता के रूप में श्याम जी नाम रखते हैं, अगर चूंकि ये भूल हुई है, तो आप सब की राय अपेक्षित है.....आज से नयी शृंखला आरंभ हो रही है....शुभकामनाएँ

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

दुःख भरे दिन बीते रे भैया अब सुख आयो रे.....एक क्लास्सिक फिल्म का गीत जिसके निर्देशक थे महबूब खान

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 539/2010/239

हबूब ख़ान की फ़िल्मी यात्रा पर केन्द्रित इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' का दूसरा खण्ड आप पढ़ और सुन रहे हैं। इस खण्ड की आज चौथी कड़ी में हम रुख़ कर रहे हैं महबूब साहब के ५० के दशक में बनीं फ़िल्मों की तरफ़। वैसे पिछले तीन कड़ियों में हमने गानें ५० के दशक के ही सुनवाए हैं, जानकारी भी दी है, लेकिन महबूब साहब के फ़िल्मी सफ़र के ३० और ४० के दशक के महत्वपूर्ण फ़िल्मों का ज़िक्र किया है। आइए आज की कड़ी में उनकी बनाई ५० के दशक की फ़िल्मों को और थोड़े करीब से देखा जाए। इस दशक में उनकी बनाई तीन मीलस्तंभ फ़िल्में हैं - 'आन', 'अमर' और 'मदर इण्डिया'। 'आन' १९५२ की सफलतम फ़िल्मों में से थी, जिसे भारत के पहले टेक्नो-कलर फ़िल्म होने का गौरव प्राप्त है। दिलीप कुमार, निम्मी और नादिर अभिनीत इस ग्लैमरस कॊस्ट्युम ड्रामा में दिखाये गये आलिशान राज-पाठ और युद्ध के दृष्य लोगों के दिलों को जीत लिया। 'आन' बम्बई के रॊयल सिनेमा में रिलीस की गयी थी । इस फ़िल्म के सुपरहिट संगीत के लिए नौशाद ने कड़ी मेहनत की थी। उन्होंने १०० पीस ऒरकेस्ट्रा का इस्तेमाल किया पार्श्वसंगीत तैयार करने के लिए। उस ज़माने में ऐसा बहुत कम ही देखा जाता था। केवल शंकर जयकिशन ने १०० पीस ऒरकेस्ट्रा का इस्तेमाल किया था 'आवरा' में। नौशाद साहब की आदत थी कि वो अपने नोटबुक में गानों के नोटेशन्स लिख लिया करते थे। और इसी का नतीजा था कि 'आन' का पार्श्वसंगीत लंदन में री-रेकॊर्ड किया जा सका। अमेरिका में एक पुस्तक भी प्रकाशित की गई है 'आन' के नोटेशन्स की, और जिसे नौशाद साहब के हाथों ही जारी किया गय था। इस तरह का सम्मान पाने वाले नौशाद पहले भारतीय संगीतकार थे। 'आन' के बाद १९५४ में महबूब ख़ान ने बनाई 'अमर' जिसमें दिलीप कुमार और निम्मी के साथ मधुबाला को लिया गया। शक़ील - नौशाद ने एक बार फिर अपना कमाल दिखाया। इस फ़िल्म के ज़्यादातर गानें शास्त्रीय रागों पर आधारित थे। लेकिन ५० के दशक में महबूब ख़ान की सब से महर्वपूर्ण आई १९५७ में - 'मदर इण्डिया', जो हिंदी सिनेमा का एक स्वर्णिम अध्याय बन चुका है। अपनी १९४० की फ़िल्म 'औरत' का रीमेक था यह फ़िल्म। नरगिस, सुनिल दत्त, राज कुमार और राजेन्द्र कुमार अभिनीत यह फ़िल्म १४ फ़रवरी के दिन प्रदर्शित किया गया था। 'मदर इण्डिया' की कहानी राधा (नरगिस) की कहानी थी, जिसका पति (राज कुमार) एक दुर्घटना में अपने दोनों हाथ गँवाने के बाद उससे अलग हो जाता है। राधा अपने बच्चों को बड़ा करती है हर तरह की सामाजिक और आर्थिक परेशानियों का सामना करते हुए। उसका एक बेटा बिरजु (सुनिल दत्त) बाग़ी बन जाता है जबकि दूसरा बेटा रामू (राजेन्द्र कुमार) एक आदर्श पुत्र है। अंत में राधा बिरजु की हत्या कर देती है और उसका ख़ून उनकी ज़मीन को उर्वर करता है। 'मदर इण्डिया' के लिए महबूब ख़ान को फ़िल्मफ़ेयर के 'सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म' और 'सर्वश्रेष्ठ निर्देशक' के पुरस्कर मिले थे। नरगिस को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला था। इसके अलावा फ़रदून ए. ईरानी को सर्वश्रेष्ठ सिनेमाटोग्राफ़र और कौशिक को सर्वश्रेष्ठ ध्वनिमुद्रण का पुरस्कार मिला था।

आज की कड़ी में हम आपको सुनवा रहे हैं फ़िल्म 'मदर इण्डिया' का गीत "दुख भरे दिन बीते रे भइया अब सुख आयो रे, रंग जीवन में नया लायो रे"। मोहम्मद रफ़ी, शम्शाद बेग़म, आशा भोसले और मन्ना डे की आवाज़ें, और शक़ील-नौशाद की जोड़ी। इस गीत के बनने की कहानी ये रही मन्ना दा के शब्दों में (सौजन्य: 'हमारे महमान', विविध भारती) - "जब हम 'मदर इण्डिया' के गा रहे थे वह "दुख भरे दिन बीते रे भइया...", अभी मैं, रफ़ी साब, आशा, गा रहे थे सब लोग, और शम्शाद बाई थीं, और कोरस। रिहर्सल करने के बाद, नौशाद साहब के घर में हो रहा था रिहर्सल, तो बोले कि 'अच्छा मन्ना साहब, कल फिर कितने बजे?' तो मैंने बोला कि 'ठीक है नौशाद साहब, मैं आ जाऊँगा १० बजे'। तो रफ़ी साहब, बहुत धीरे बोलते थे, कहने लगे, 'दादा, कल सवेरे रेकॊर्डिंग् है'। बोला कि 'नौशाद साहब, रफ़ी साहब की कल रेकॊर्डिंग् है'। नौशाद साहब बोले कि 'ठीक है शाम को बैठते हैं'। तो आशा ने कहा, 'शाम को तो मैं नहीं आ सकती, शाम को रेकोर्डिंग् है मेरी'। 'अच्छा फिर परसों बैठते हैं'। तो परसों का तय हो गया। तो परसों सब फिर मिले और फिर से "दुख भरे दिन...", फिर से सब किया। कुछ तीन तीन घंटे रिहर्सल। अब फिर कब करना है? तो किसी ने पूछा कि 'और भी रिहर्सल करना है?' 'क्या बात कर रहे हैं?', नौशाद साहब। 'नहीं साहब, दो एक रिहर्सल चाहिए'। 'तो फ़लाना दिन बैठते हैं, ठीक है न रफ़ी मियाँ?' 'हाँ'। 'क्यों शम्शाद बाई?' 'आशा बाई, ठीक है ना?' 'मन्ना जी तो आएँगे'। ऐसे हम फिर मिले। इस तरह से रेकोडिंग् करते थे। पूरी तरह से तैयार करने के बाद जम के रेकोडिंग् 'स्टार्ट' हुई। नौशाद साहब पहुँच गए रेकॊर्डिंग् बूथ में। रेकोडिस्ट के पास जाकर बैठ गए। नौशाद साहब के रिहर्सल्स इतने पर्फ़ेक्ट हुआ करते थे कि रेकॊर्डिंग् के बीच में कभी कट नहीं होते थे। लेकिन इस गाने में 'रेडी वन टू थ्री फ़ोर स्टार्ट', "दुख भरे दिन बीते रे भइया अब सुख आयो रे, रंग जीवन में नया लायो रे", "कट", सब चुप। नौशाद साहब बाहर आये, 'वाह वाह वाह वाह, बेहतरीन, नंदु, तुमने वह क्या बजाया उधर?' वो कहता है, 'नौशाद साहब, मैंने यह बजाया'। 'वह कोमल निखार, वह ज़रा सम्भाल ना, वह ज़रा ठीक नहीं है, एक मर्तबा और'। 'अरे रफ़ी साहब, वह कौन सा नोट लिया उपर? "देख रे घटा घिर के आई, रस भर भर लाई, हो ओ ओ ओ ओ...", इसको ज़रा सम्भालिए, यह फिसलता है उधर'। 'एक मर्तबा और'। और फिर अंदर चले गए।" तो देखा दोस्तों, कि किस तरह से इस गीत की रेकॊर्डिंग् हुई थी। तो लीजिए इस अविस्मरणीय फ़िल्म का यह अविस्मरणीय गीत सुनते हैं महबूब ख़ान को सलाम करते हुए।



क्या आप जानते हैं...
कि 'मदर इण्डिया' को ऒस्कर पुरस्कारों के अंतर्गत सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म की श्रेणी में नामांकन मिला था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली १० /शृंखला ०४
गीत का प्रील्यूड सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान है इसलिए कोई अन्य सूत्र नहीं.

सवाल १ - किन किन पुरुष गायकों की आवाज़ है इस समूह गीत में - २ अंक
सवाल २ - महिला गायिकाओं के नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी २ अंक अभी भी पीछे हैं यानी आज अगर श्याम जी एक अंक वाले सवाल का भी जवाब दे देते हैं तो बाज़ी उन्हीं के हाथ रहेगी...देखते हैं क्या होता है

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

छल्ला कालियां मर्चां, छल्ला होया बैरी.. छल्ला से अपने दिल का दर्द बताती विरहणी को आवाज़ दी शौकत अली ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०४

यूँतो हमारी महफ़िल का नाम है "महफ़िल-ए-ग़ज़ल", लेकिन कभी-कभार हम ग़ज़लों के अलावा गैर-फिल्मी नगमों और लोक-गीतों की भी बात कर लिया करते हैं। लीक से हटने की अपनी इसी आदत को ज़ारी रखते हुए आज हम लेकर आए हैं एक पंजाबी गीत.. या यूँ कहिए पंजाबी लोकगीतों का एक खास रूप, एक खास ज़ौनर जिसे "छल्ला" के नाम से जाना जाता है। इस "छल्ला" को कई गुलुकारों ने गाया है और अपने-अपने तरीके से गाया है। तरीकों के बदलाव में कई बार बोल भी बदले हैं, लेकिन इस "छल्ला" का असर नहीं बदला है। असर वही है, दर्द वही है... एक "विरहणी" के दिल की पीर, जो सुनने वालों के दिलों को चीर जाती है। आखिर ये "छल्ला" होता क्या है, इसके बारे में "एक शाम मेरे नाम" के मनीष जी लिखते हैं (साभार):

जैसा कि नाम से स्पष्ट है "छल्ला लोकगीत" के केंद्र में वो अंगूठी होती है, जो प्रेमिका को अपने प्रियतम से मिलती है। पर जब उसका प्रेमी दूर देश चला जाता है तो वो अपने दिल का हाल किससे बताए? और किससे? उसी छल्ले से जो उसके साजन की दी हुई एकमात्र निशानी है। यानि कि छल्ला लोकगीत छल्ले से कही जाने वाली एक विरहणी की आपबीती है। छल्ले को कई पंजाबी गायकों ने समय-समय पर पंजाबी फिल्मों और एलबमों में गाया है। इस तरह के जितने भी गीत हैं उनमें रेशमा, इनायत अली, गुरदास मान, रब्बी शेरगिल और शौकत अली के वर्ज़न काफी मशहूर हुए।

तो आज हम अपनी इस महफ़िल को शौकत अली के गाए "छल्ला" से सराबोर करने वाले हैं। हम शौकत अली को सुनें, उससे पहले चलिए इनके बारे में कुछ जान लेते हैं। (सौजन्य: विकिपीडिया)

शौकत अली खान पाकिस्तान के एक जानेमाने लोकगायक हैं। इनका जन्म "मलकवल" के एक फ़नकरों के परिवार में हुआ था। शौकत ने अपने बड़े भाई इनायत अली खान की मदद से १९६० के दशक में हीं अपने कॉलेज के दिनों में गाना शुरू कर दिया था। १९७० से ये ग़ज़ल और पंजाबी लोकगीत गाने लगे। १९८२ में जब नई दिल्ली में एशियन खेलों का आयोजन किया गया था, तो शौकत अली ने वहाँ अपना लाईव परफ़ारमेंश दिया। इन्हें पाकिस्तान का सर्वोच्च सिविलियन प्रेसिडेंशियल अवार्ड भी प्राप्त है। अभी हाल हीं में आए "लव आज कल" में इनके गाये "कदि ते हंस बोल वे" गाने (जो कि अब एक लोकगीत का रूप ले चुका है) की पहली दो पंक्तियाँ इस्तेमाल की गई थी। शौकत अली साहब के कई गाने मक़बूल हुए हैं। उन गानों में "छल्ला" और "जागा" प्रमुख हैं। इनके सुपुत्र भी गाते हैं, जिनका नाम है "इमरान शौकत"।

"छल्ला" गाना अभी हाल में हीं इमरान हाशमी अभिनीत फिल्म "क्रूक" में शामिल किया गया था। वह छल्ला "लोकगीत वाले सारे छ्ल्लों" से काफ़ी अलग है। अगर कुछ समानता है तो बस यह है कि उसमें भी "एक दर्द" (आस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीयों का दर्द) को प्रधानता दी गई है। उस गाने को बब्बु मान ने गाया है और संगीत दिया है प्रीतम ने। प्रीतम ने उस गाने के लिए "किसी लोक-धुन" को क्रेडिट दी है, लेकिन सच्चाई कुछ और है। दो महिने पहले जब मैंने और सुजॉय जी ने "क्रूक" के गानों की समीक्षा की थी, तो उस पोस्ट की टिप्पणी में मैंने सच्चाई को उजागर करने के लिए यह लिखा था: वह गाना बब्बु मान ने नहीं बनाया था, बल्कि "बब्बल राय" ने बनाया था "आस्ट्रेलियन छल्ला" के नाम से... वो भी ऐं वैं हीं, अपने कमरे में बैठे हुए। और उस वीडियो को यू-ट्युब पर पोस्ट कर दिया। यू-ट्युब पर उस वीडियो को इतने हिट्स मिले कि बंदा फेमस हो गया। बाद में उसी बंदे ने यह गाना सही से रीलिज किया .. बस उससे यह गलती हो गई कि उसने रीलिज करने के लिए बब्बु मान के रिकार्ड कंपनी को चुना... और आगे क्या हुआ, यह हम सबके सामने है। कैसेट पर कहीं भी बब्बल राय का नाम नहीं है, जबकि गाना पूरा का पूरा उसी से उठाया हुआ है। यह पूरा का पूरा पैराग्राफ़ आज की महफ़िल के लिए भले हीं गैर-मतलब हो, लेकिन इससे दो तथ्य तो सामने आते हीं है: क) हिन्दी फिल्मों में पंजाबी संगीत और पंजाबी संगीत में छल्ला के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। ख) हिन्दी फिल्म-संगीत में "कॉपी-पेस्ट" वाली गतिविधियाँ जल्द खत्म नहीं होने वाली और ना हीं "चोरी-सीनाजोरी" भी थमने वाली है।

बातें बहुत हो गईं। चलिए तो अब ज्यादा समय न गंवाते हुए, "छल्ला" की ओर अपनी महफ़िल का रूख कर देते हैं और सुनते हैं ये पंजाबी लोकगीत। मैं अपने सारे पंजाबी भाईयों और बहनों से यह दरख्वास्त करूँगा कि जिन्हें भी इस नज़्म का अर्थ पता है, वो हमसे शेयर ज़रूर करें। हम सब अच्छे गानों और ग़ज़लों के शैदाई हैं, इसलिए चाहते हैं कि जो भी गाना, जो भी ग़ज़ल हमें पसंद हो, उसे समझे भी ज़रूर। बिना समझे हम वो आनंद नहीं ले पाते, जिस आनंद के हम हक़दार होते हैं। उम्मीद है कि आप हमारी मदद अवश्य करेंगे। इसी विश्वास के साथ आईये हम और आप सुनते हैं "छल्ला":

जावो नि कोई मोर लियावो,
नि मेरे नाल गया नि लड़ के,
अल्लाह करे आ जावे सोणा,
देवन जान कदमा विच धर के।

हो छल्ला बेरीपुर ए, वे वतन माही दा दूरे,
जाना पहले पूरे, वे गल्ल सुन छल्लया
ओ छोरा,
दिल नु लावे झोरा/छोरा

हो छल्ला कालियां मर्चां, ओए मोरा पी के मरसां,
सिरे तेरे चरसां, वे गल्ल सुन छल्लया,
ओ ढोला,
वे तैनु कागा होला/ओला

हो छल्ला नौ नौ थेवे, पुत्तर मित्थे मेवे,
अल्लाह सब नु देवे, छल्ला छे छे
ओ पाया,
ओए दिया तन/धन ने/दे पराया

हो छल्ला पाया ये गहने, दुख ज़िंदरी ने सहने,
छल्ला मापे ने रहने, गल सुन _____
ढोला,
ओए सार के कित्ते कोला

हो छल्ला होया बैरी, सजन भज गए कचहरी,
रोवां शिकर दोपहरी, ओ गल सुन छलया
पावे,
बुरा वेला ना आवे

हो छल्ला हिक वो कमाई, ओए जो बहना दे भाई,
अल्लाह अबके जुदाई, परदेश....
ओ गल्ल सुन छलया
ओ सारां (?),
वीरा नाल बहावां




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "मेहरबानी" और शेर कुछ यूँ था-

ज़िंदगी की मेहरबानी,
है मोहब्बत की कहानी,
आँसूओं में पल रही है... हो..

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

बहुत शुक्रिया बडी मेहरबानी
मेरी जिन्दगी मे हजूर आप आये

ज़िन्दगी से हम भी तर जाते,
जीते जी ही हम मर जाते,
पर उनकी नज़रों की ज़रा सी मेहरबानी न हो सकी (प्रतीक जी)

चीनी से भी ज्यादा मीठी माफ़ी ,
महफिल सजा के की मेहरबानी (मंजु जी)

शमा के नसीब में तो बुझना ही लिखा है
मेहरबानी है उसकी जो जला के बुझाता है. (शन्नो जी)

दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं
दोस्तों की मेहरबानी चाहिए

ऐ मेरे यार ज़रा सी मेहरबानी कर दे
मेरी साँसों को अपनी खुशबु की निशानी कर दे (अवनींद्र जी)

मेहरवानी थी उनका या कोई करम था ,
या खुदा ये उनको कैसा भरम था (नीलम जी)

अवध जी, माफ़ कीजिएगा.. अगर समय पर मैं एक शब्द गायब कर दिया होता तो शायद आप हीं पिछली महफ़िल की शान होते। हाँ, लेकिन आपका शुक्रिया ज़रूर अदा करूँगा क्योंकि आपने समय पर हमें जगा दिया। सुमित भाई, आप "महफ़िल में फिर आऊँगा" लिखकर चल दिए तो हमें लगा कि इस बार भी आप एक-दो दिन के लिए नदारद हो जाएँगे और "शान" की उपाधि से कोई और सज जाएगा। लेकिन आप ६ मिनट में हीं लौट आए और "शान-ए-महफ़िल" बन गए। बधाई स्वीकारें। प्रतीक जी, हमारी मेहनत को परखने और प्रोत्साहित करने के लिए आपका तह-ए-दिल से आभार! मंजु जी, बड़े हीं नायाब तरीके से आपने हमारी प्रशंसा कर दी। धन्यवाद स्वीकारें! शन्नो जी, आपकी डाँट भी प्यारी होती है। आपने कहा कि "कितनी हीं पंजाबी कुड़ियाँ इत-उत मंडराती होगी" तो मैं उन कुड़ियों में से एकाध से अपील करूँगा कि वो हमारी महफ़िल में तशरीफ़ लाएँ और हमें "छल्ला" का अर्थ बता कर कृतार्थ करें :) वैसे, वे अगर महफ़िल में न आना चाहें तो हमसे अकेले में हीं मिल लें। इसी बहाने मेरी पंजाबी थोड़ी सुधर जाएगी। :) अवध जी, शेर तो आपने बहुत हीं जबरदस्त पेश किया, लेकिन शायर का नाम मैं भी नहीं ढूँढ पाया। अवनींद्र जी, मुझे भी आप लोगों से वापस मिलकर बेहद खुशी हुई। कोशिश करूँगा कि अपने ये मिलने-मिलाने का कार्यक्रम यूँ हीं चलता रहें। और हाँ, आपको तो पंजाबी आती है ना? तो ज़रा हमें "छल्ला गाने" का मतलब बता दें। बड़ी कृपा होगी। :) नीलम जी, क्या बात है, दो-दो शेर.. वो भी स्वरचित :) चलिए मैंने अपने पसंद का एक चुन लिया।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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