शनिवार, 21 अगस्त 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (४), जब शरद तैलंग मिले रीटा गांगुली से

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के साप्ताहिक अंक 'ईमेल के बहाने, यादों के ख़ज़ाने' में आप सभी का स्वागत है। हर हफ़्ते आप में से किसी ना किसी साथी की सुनहरी यादों से समृद्ध कर रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के इस ख़ास ख़ज़ाने को। हमें बहुत से दोस्तों से ईमेल मिल रहे हैं और एक एक कर हम सभी को शामिल करते चले जा रहे हैं। जिनके ईमेल अभी तक शामिल नहीं हो पाए हैं, वो उदास ना हों, हम हर एक ईमेल को शामिल करेंगे, बस थोड़ा सा इंतेज़ार करें। और जिन दोस्तों ने अभी तक हमें ईमेल नहीं किया है, उनसे गुज़ारिश है कि अपने पसंद के गानें और उन गानों से जुड़ी हुई यादों को हिंदी या अंग्रेज़ी में हमारे ईमेल पते oig@hindyugm.com पर भेजें। अगर आप शायर या कवि हैं, तो अपनी स्वरचित कविताएँ और ग़ज़लें भी हमें भेज सकते हैं। किसी जगह पर घूमने गए हों कभी और कोई अविस्मरणीय अनुभव हुआ हो, वो भी हमें लिख सकते हैं। इस स्तंभ का दायरा विशाल है और आप को खुली छूट है कि आप किसी भी विषय पर अपना ईमेल हमें लिख सकते हैं। बहरहाल, आइए अब आज के ईमेल की तरफ़ बढ़ा जाए। शरद तैलंग का नाम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के लिए कोई नया नाम नहीं है। शुरु से ही उन्होंने ना केवल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' से जुड़े रहे हैं, बल्कि इसमें सक्रीय हिस्सा भी लिया। वो ना केवल एक अच्छे गायक हैं, बल्कि हिंदी फ़िल्म संगीत के बहुत अच्छे जानकारों में से हैं। तभी तो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के पहेली प्रतियोगिताओं में वो हर बार सब से आगे रहते हैं। बहुत ही कम ऐसे मौके हुए कि जब शरद जी ने दैनंदिन पहेली का हल ना कर सके हों। आज हम शरद जी की यादों में बसे एक मुलाक़ात से रु-ब-रु होंगे। मशहूर ग़ज़ल गुलुकारा बेग़म अख़्तर जी की शिष्या रीटा गांगुली से शरद जी की एक मुलाक़ात का क़िस्सा पढ़िए शरद जी के अपने शब्दों में।


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रीटा गांगुली से एक सार्थक मुलाकात

० शरद तैलंग

संगीत जगत में स्व. बेगम अख्तर की शिष्या रीटा गांगुली ने न केवल फ़िल्मों में गीत गाए बल्कि अपनी अदाकारी भी दिखाई है। कुछ वर्षों पूर्व वे एक दिन मेरे गाँव टीकमगढ़ जा पहुंचीं। उन्हें मालूम हुआ था कि टीकमगढ़ में एक बहुत ही बुजुर्ग महिला असगरी बाई रहतीं हैं जो ध्रुपद धमार तथा पुरानी गायिकी दादरा और टप्पा की बहुत ही कुशल गायिका हैं। राजाओं के ज़माने में असगरी बाई राज दरबार की प्रमुख गायिका थीं तथा हर शुभ अवसर पर महल में उनकी महफ़िल सजती थी किन्तु राजाओं के राज्य चले जाने के बाद असगरी बाई भी एक झोपडी में अपने दिन गुजार रहीं थी। मेरे बड़े भाई स्व विक्रम देव तैलंग उनके घर अक्सर मिलने जाया करते थे। रीटा गांगुली को भी वे उनसे मिलवाने ले गए। उनकी दयनीय हालत देख कर रीटा जी ने उन्हें अपने साथ दिल्ली चलने का प्रस्ताव उनके समक्ष रखा जिसे असगरी बाई ने स्वीकार कर लिया। दिल्ली में असगरी बाई को कुछ संगीत समारोहों में रीटा जी ने प्रस्तुत किया तथा मुख्य रूप से ध्रुपद गायकी के सम्मेलनों में। धीरे धीरे असगरी बाई का नाम पूरे देश में ध्रुपद गायिका के रूप में फैलने लगा। उस समय ध्रुपद गायन में महिला कलाकार गिनी चुनी थी, उनके अलावा जयपुर की मधु भट्ट का नाम ही लिया जा सकता है। फिर एक दिन सुना कि असगरी बाई को मध्यप्रदेश शासन के पुरस्कार के अलावा पद्मश्री सम्मान भी प्रदान किया गया है।

बात आई गई हो गई। कोटा में कुछ समय बाद ही स्व बेग़म अख्तर की याद में एक ग़ज़ल प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में रीटा गांगुली जी कोटा पधारीं। चूंकि वो मेरे गाँव में मेरे घर जा चुकीं थीं इसलिए मेरे मन में उनसे मिलने की प्रबल इच्छा थी। मैं, जिस होटल में वे रुकीं थी, वहाँ पंहुच गया। वे उस समय एक किताब पढ़ रहीं थी, मुझे देखते ही उन्होंनें वो किताब एक तरफ़ रख दी। मैनें अपना परिचय दिया तथा असगरी बाई तथा मेरे गाँव में उनकी यात्रा का सन्दर्भ दिया। वे मुझसे मिलकर बहुत खुश हुईं। थोडी देर बातचीत के बाद उन्होनें मुझसे पूछा कि क्या आप भी कुछ गाने का शौक रखते हैं? मैनें जब उनको यह बताया कि हाँ स्टेज प्रोग्राम भी करता हूँ तथा आकाशवाणी जयपुर से सुगम संगीत भी प्रसारित होते हैं, उन्होनें फ़ौरन हारमोनियम मेरे आगे खिसका दिया और कहा कि कुछ सुनाइए। मैनें अपनी एक कम्पोज़ीशन दुष्यन्त कुमार की ग़ज़ल 'कहाँ तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए, कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए" उनको सुनाई। बीच बीच में वे भी उस धुन में हल्के से एक दो ताने लगा दिया करतीं थीं। मेरा गाना सुनकर वे बोली- बहुत अच्छी कम्पोज़ीशन है, आजकल लोग दूसरों की कम्पोज़ीशन चुरा लेते है और अपनी कहकर महफ़िलों में सुनाया करते हैं, आप किसी अच्छे स्टूडियों में इनको रिकॊर्ड करा लीजिए मैं आपको मुम्बई के एक अच्छे स्टूडियों के नाम पत्र लिख कर देती हूँ वे मेरे अच्छे परिचित हैं। फ़िर थोड़ी देर बाद वे बोली कि अजीब संयोग है आपके आने से पहले मैं दुष्यन्त कुमार की यही ग़ज़ल पढ़ रही थी और जब वो किताब जो मेरे आने पर उन्होंने रख दी थी उसको पलट कर दिखाई तो इसी ग़ज़ल का पेज़ सामने खुला हुआ था। वे बोली आज मैं भी आपकी ये कम्पोज़ीशन चुरा रही हूँ लेकिन जिस महफ़िल में भी इसे सुनाऊंगी आपका नाम लेकर ही सुनाऊंगी। मैं भी शाम को महफ़िल में उनसे मिलने का वादा करके वहाँ से रुखसत हो गया ।


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वाह! वाक़ई हैरत की बात थी कि शरद जी ने जिस ग़ज़ल को गाकर सुनाया, रीटा जी वही ग़ज़ल उस वक़्त पढ़ रहीं थीं। इस सुंदर संस्मरण के बाद आइए अब शरद जी की फ़रमाइश पर एक फ़िल्मी ग़ज़ल सुना जाए। मिर्ज़ा ग़ालिब की लिखी हुई ग़ज़ल है और फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' का ही है। जी हाँ, उसी १९५४ की फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' का है जिसमें संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद ने ग़ालिब की ग़ज़लों को बड़े ख़ूबसूरत तरीकों से स्वरबद्ध किया था। सुरैय्या और तलत महमूद की आवाज़ों में ये ग़ज़लें फ़िल्मी ग़ज़लों में ख़ास जगह रखती हैं। सुनते हैं इन दो महान आवाज़ों में "दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है"। लेकिन उससे पहले सुरैय्या जी की यादों के ख़ज़ाने जो उन्होंने बाँटे विविध भारती पर ख़ास इसी फ़िल्म के बारे में - "ज़िंदगी में कुछ मौके ऐसे आते हैं जिन पे इंसान सदा नाज़ करता है। मेरी ज़िंदगी में भी एक ऐसा मौका आया था जब 'मिर्ज़ा ग़ालिब' को राष्ट्रपति पुरस्कार मिला, और उस फ़िल्म का एक ख़ास शो राष्ट्रपति भवन में हुआ था, जहाँ हमने पण्डित नेहरु जी के साथ बैठ कर यह फ़िल्म देखी थी। पण्डित नेहरु हर सीन में मेरी तारीफ़ करते और मैं फूली ना समाती।" और दोस्तों, फूले तो हम भी नहीं समाते ऐसे प्यारे प्यारे सदाबहार लाजवाब गीतों को सुन कर। पेश-ए-ख़िदमत है शरद तैलंग जी के अनुरोध पर 'मिर्ज़ा ग़ालिब' की यह युगल ग़ज़ल।

गीत - दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है


तो ये था 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का ख़ास साप्ताहिक अंक 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। यह साप्ताहिक सिलसिला आपको कैसी लग रही है और इसे और भी बेहतर और आकर्षक कैसे बनाया जा सकता है, आप अपने विचार और सुझाव हमारे ईमेल पते oig@hindyugm.com पर लिख सकते हैं। तो आज के लिए बस इतना ही, अगले हफ़्ते किसी और साथी के ईमेल और उनकी यादों के साथ हम फिर हाज़िर होंगे, और 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमीत अंक में आप से कल शाम फिर मुलाक़ात होगी, तब तक के लिए हमें दीजिए इजाज़त, लेकिन आप बने रहिए 'आवाज़' के साथ। नमस्कार!

प्रस्तुति: सुजॊय चटर्जी

कृश्न चन्दर - एक गधे की वापसी - अंतिम भाग (3/3)

सुनो कहानी: एक गधे की वापसी- कृश्न चन्दर - अंतिम भाग (3/3)

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने प्रीति सागर की आवाज़ में सुधा अरोड़ा की एक कथा अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं कृश्न चन्दर की कहानी "एक गधे की वापसी" का अंतिम भाग, जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 7 मिनट 39 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

एक गधे की वापसी के पिछले अंश पढने के लिये कृपया नीचे दिए लिंक्स पर क्लिक करें
एक गधे की वापसी - प्रथम भाग
एक गधे की वापसी - द्वितीय भाग

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



यह तो कोमलांगियों की मजबूरी है कि वे सदा सुन्दर गधों पर मुग्ध होती हैं
~ पद्म भूषण कृश्न चन्दर (1914-1977)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए एक नयी कहानी

मैं महज़ एक गधा आवारा हूँ।
( "एक गधे की वापसी" से एक अंश)


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#Eighty Seventh Story, Ek Gadhe Ki Vapasi: Folklore/Hindi Audio Book/2010/31. Voice: Anurag Sharma

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

जब हुस्न-ए-इलाही बेपर्दा हुआ वी डी, ऋषि और नए गायक श्रीराम के रूबरू

Season 3 of new Music, Song # 17

सूफी गीतों का चलन इन दिनों इंडस्ट्री में काफी बढ़ गया है. लगभग हर फिल्म में एक सूफियाना गीत अवश्य होता है. ऐसे में हमारे संगीतकर्मी भी भला कैसे पीछे रह सकते हैं. सूफी संगीत की रूहानियत एक अलग ही किस्म का आनंद लेकर आती है श्रोताओं के लिए, खास तौर पे जब बात हुस्न-ए-इलाही की तो कहने ही क्या. जिगर मुरादाबादी के कलाम को विस्तार दिया है विश्व दीपक तन्हा ने. दोस्तों गुलज़ार साहब इंडस्ट्री में इस फन के माहिर समझे जाते हैं. ग़ालिब, मीर आदि उस्ताद शायरों के शेरों को मुखड़े की तरह इस्तेमाल कर आगे एक मुक्कमल गीत में ढाल देने का काम बेहद खूबसूरती से अंजाम देते रहे हैं वो. हम ये दावे के साथ कह सकते हैं इस बार हमारे गीतकार उनसे इक्कीस नहीं तो उन्नीस भी नहीं हैं यहाँ. ऋषि ने पारंपरिक वाद्यों का इस्तेमाल कर सुर रचे हैं तो गर्व के साथ हम लाये हैं एक नए गायक श्रीराम को आपके सामने जो दक्षिण भारतीय होते हुए भी उर्दू के शब्दों को बेहद उ्म्दा अंदाज़ में निभाने का मुश्किल काम कर गए हैं इस गीत में. साथ में हैं श्रीविद्या, जो इससे पहले "आवारगी का रक्स" गा चुकी हैं हमारे लिए. तो एक बार सूफियाना रंग में रंग जाईये, और डूब जाईये इस ताज़ा गीत के नशे में.

गीत के बोल -


इश्क़.. इश्क़
मौला का करम
इश्क़... इश्क़
आशिक का धरम

हम कहीं जाने वाले हैं दामन-ए-इश्क़ छोड़कर,
ज़ीस्त तेरे हुज़ूर में, मौत तेरे दयार में.....

हबीब-ए-हुस्न-ए-इलाही
हबीब-ए-हुस्न-ए-इलाही

हम ने जिगर की
बातें सुनी हैं
मीलों आँखें रखके
रातें सुनी हैं
एक हीं जिकर है
सब की जुबां पे
साँसें सारी जड़ दे
शाहे-खुबां पे

सालों ढूँढा खुद में जो रेहां
हमने पाया तुझमें वो निहां..

खुल्द पूरा हीं वार दें, हम तो तेरे क़रार पे....

हबीब-ए-हुस्न-ए-इलाही...
हबीब-ए-हुस्न-ए-इलाही...

मोहब्बत काबा-काशी
मोहब्बत कासा-कलगी
मोहब्बत सूफ़ी- साकी,
मोहब्बत हर्फ़े-हस्ती..

एक तेरे इश्क़ में डूबकर हमें मौत की कमी न थी,
पर जी गए तुझे देखकर, हमें ज़िंदगी अच्छी लगी।



मेकिंग ऑफ़ "हुस्न-ए-इलाही" - गीत की टीम द्वारा

श्रीराम: मैं सूफ़ी गानों का हमेशा से हीं प्रशंसक रहा हूँ, इसलिए जब ऋषि ने मुझसे यह पूछा कि क्या मैं "हुस्न-ए-इलाही" गाना चाहूँगा, तो मैंने बिना कुछ सोचे फटाफट हाँ कह दिया। इस गाने की धुन और बोल इतने खूबसूरत हैं कि पहली मर्तबा सुनने पर हीं मैं इसका आदी हो चुका था। गाने की धुन साधारण लग सकती है, लेकिन गायक के लिए इसमें भी कई सारे रोचक चैलेंजेज थे/हैं। ऋषि चाहते थे कि कि "सालों ढूँढा खुद में जो रेहां" पंक्ति को एक हीं साँस में गाया जाए। अब चूँकि यह पंक्ति बड़ी हीं खूबसूरत है तो मुझे हर लफ़्ज़ में जरूरी इमोशन्स और एक्सप्रेसन्स भी डालने थे और बिना साँस तोड़े हुए (जो कि असल में टूटी भी) यह करना लगभग नामुमकिन था। मैं उम्मीद करता हूँ कि मैंने इस पंक्ति के साथ पूरा न्याय किया होगा। इस गाने में कुछ शब्द ऐसे भी हैं, जिन्हें पूरे जोश में गाया जाना था और साथ हीं साथ गाने की स्मूथनेस भी बरकरार रखनी थी, इसलिए आवाज़ के ऊपर पूरा नियंत्रण रखना जरूरी हो गया था। विशेषकर गाने की पहली पंक्ति, जो हाई-पिच पर है.. इसे ऋषि ने गाने में तब जोड़ा जब पूरे गाने की रिकार्डिंग हो चुकी थी। चूँकि यह मेरा पहला ओरिजिनल है, इसलिए मेरी पूरी कोशिश थी कि यह गाना वैसा हीं बनकर निकले, जैसा ऋषि चाहते थे। मैं यह कहना चाहूँगा कि इसे गाने का मेरा अनुभव शानदार रहा। साथ हीं मैं श्रीविद्या की तारीफ़ करना चाहूँगा। उनकी मधुर मेलोडियस आवाज़ ने इस गाने में चार चाँद लगा दिए हैं। और अंत में मैं ऋषि और विश्व दीपक को इस खूबसूरत गाने के लिए बधाई देना चाहूँगा।

श्रीविद्या:मेर हिसाब से हर गीत कुछ न कुछ आपको सिखा जाता है. इस गीत में मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया इसकी धुन ने जो सूफी अंदाज़ की गायिकी मांगती है. हालाँकि मेरा रोल गीत में बेहद कम है पर फिर भी मैं खुश हूँ कि मैं इस गीत का हिस्सा हूँ. ये ऋषि के साथ मेरा दूसरा प्रोजेक्ट है और मुझे ख़ुशी है विश्व दीपक और श्रीराम जैसे पतिभाशाली कलाकारों के साथ ऋषि ने मुझे इस गीत के माध्यम से काम करने का मौका दिया

ऋषि एस: "हुस्न-ए-इलाही" गाने का मुखड़ा "जिगर मुरादाबादी" का है.. मेरे हिसाब से मुखड़ा जितना खूबसूरत है, उतनी हीं खूबसूरती से वी डी जी ने इसके आस-पास शब्द डाले हैं और अंतरा लिखा है। आजकल की तकनीकी ध्वनियों (टेक्नो साउंड्स) के बीच मुझे लगा कि एक पारंपरिक तबला, ढोलक , डफ़्फ़ वाला गाना होना चाहिए, और यही ख्याल में रखकर मैंने इस गाने को संगीतबद्ध किया है। मुंबई के श्रीराम का यह पहला ओरिज़िनल गाना है। उन्होंने इस गाने के लिए काफ़ी मेहनत की है और अपने धैर्य का भी परिचय दिया है। मैंने उनसे इस गाने के कई सारे ड्राफ़्ट्स करवाए, लेकिन वे कभी भी मजबूरी बताकर पीछे नहीं हटे। उनकी यह मेहनत इस गाने में खुलकर झलकती है। आउटपुट कैसा रहा, यह तो आप गाना सुनकर हीं जान पाएँगें। इस गाने में फीमेल लाइन्स बहुत हीं कम हैं, फिर भी श्रीविद्या जी ने अपनी आवाज़ देकर गाने की खूबसूरती बढा दी है। इस गाने को साकार करने के लिए मैं पूरी टीम का तह-ए-दिल से आभारी हूँ।

विश्व दीपक: आवाज़ पर महफ़िल-ए-ग़ज़ल लिखते-लिखते न जाने मैंने कितना कुछ जाना, कितना कुछ सीखा और कितना कुछ पाया.. यह गाना भी उसी महफ़िल-ए-ग़ज़ल की देन है। जिगर मुरादाबादी पर महफ़िल सजाने के लिए मैंने उनकी कितनी ग़ज़लें खंगाल डाली थी, उसी दौरान एक शेर पर मेरी नज़र गई। शेर अच्छा लगा तो मैंने उसे अपना स्टेटस मैसेज बना लिया। अब इत्तेफ़ाक देखिए कि उस शेर पर ऋषि जी की नज़र गई और उन्होंने उस शेर को मेरा शेर समझकर एक गाने का मुखरा गढ डाला। आगे की कहानी यह सूफ़ियाना नज़्म है| जहाँ तक इस नज़्म में गायिकी की बात है, तो पहले हम इसे पुरूष एकल (मेल सिंगल) हीं बनाना चाहते थे, लेकिन हमें सही मेल सिंगर मिल नहीं रहा था। हमने यह गाना श्रीराम से पहले और दो लोगों को दिया था। एक ने पूरा रिकार्ड कर भेज भी दिया, लेकिन हमें उसकी गायिकी में कुछ कमी-सी लगी। तब तक हमारा काफ़ी समय जा चुका था। ऋषि इस गाने को जल्द हीं रिकार्ड करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने मुझसे पूछा कि हमारे पास फीमेल सिंगर्स हैं, क्या हम इसे फीमेल सॉंग बना सकते हैं। मुझे कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन ऋषि को हीं लगा कि गाने का मूड और गाने का थीम मेल सिंगर को ज्यादा सूट करता है। इस मुद्दे पर सोच-विचार करने के बाद आखिरकार हमने इसे दो-गाना (डुएट) बनाने का निर्णय लिया। श्रीविद्या ने अपनी रिकार्डिंग हमें लगभग एक महीने पहले हीं भेज दी थी। उनकी मीठी आवाज़ में आलाप और "इश्क़ इश्क़" सुनकर हमें अपना गाना सफल होता दिखने लगा। लेकिन गाना तभी पूरा हो सकता था, जब हमें एक सही मेल सिंगर मिल जाता। इस मामले में मैं कुहू जी का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा, जिन्होंने ऋषि को श्रीराम का नाम सुझाया। श्रीराम की आवाज़ में यह गाना सुन लेने के बाद हमें यह पक्का यकीन हो चला था कि गाना लोगों को पसंद आएगा। मुज़िबु पर इस गाने को लोगों ने हाथों-हाथ लिया है, आशा करता हूँ कि हमारे आवाज़ के श्रोता भी इसे उतना हीं प्यार देंगे।

श्रीराम ऐमनी
मुम्बई में जन्मे और पले-बढे श्रीराम गायन के क्षेत्र में महज़ ७ साल की उम्र से सक्रिय हैं। ये लगभग एक दशक से कर्नाटक संगीत की शिक्षा ले रहे हैं। आई०आई०टी० बम्बे से स्नातक करने के बाद इन्होंने कुछ दिनों तक एक मैनेजमेंट कंसल्टिंग कंपनी में काम किया और आज-कल नेशनल सेंटर फॉर द परफ़ोर्मिंग आर्ट्स (एन०सी०पी०ए०) में बिज़नेस डेवलपेंट मैनेज़र के तौर पर कार्यरत हैं। श्रीराम ने अपने स्कूल और आई०आई०टी० बम्बे के दिनों में कई सारे स्टेज़ परफोरमेंश दिए थे और कई सारे पुरस्कार भी जीते थे। ये आई०आई०टी० के दो सबसे बड़े म्युज़िकल नाईट्स "सुरबहार" और "स्वर संध्या" के लीड सिंगर रह चुके हैं। श्रीराम हर ज़ौनर का गाना गाना पसंद करते हैं, फिर चाहे वो शास्त्रीय रागों पर आधारित गाना हो या फिर कोई तड़कता-फड़कता बालीवुड नंबर। इनका मानना है कि कर्नाटक संगीत में ली जा रही शिक्षा के कारण हीं इनकी गायकी को आधार प्राप्त हुआ है। ये हर गायक के लिए शास्त्रीय शिक्षा जरूरी मानते हैं। हिन्द-युग्म (आवाज़) पर यह इनका पहला गाना है।

श्रीविद्या कस्तूरी
कर्णाटक संगीत की शिक्षा बचपन में ले चुकी विद्या को पुराने हिंदी फ़िल्मी गीतों का खास शौक है, ये भी मुजीबु पे सक्रिय सदस्या हैं. ये इनका दूसरा मूल हिंदी गीत है। हिन्द-युग्म पर इनकी दस्तक सजीव सारथी के लिखे और ऋषि द्वारा संगीतबद्ध गीत "आवारगी का रक्स" के साथ हुई थी।

ऋषि एस
ऋषि एस॰ ने हिन्द-युग्म पर इंटरनेट की जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीतों के निर्माण की नींव डाली है। पेशे से इंजीनियर ऋषि ने सजीव सारथी के बोलों (सुबह की ताज़गी) को अक्टूबर 2007 में संगीतबद्ध किया जो हिन्द-युग्म का पहला संगीतबद्ध गीत बना। हिन्द-युग्म के पहले एल्बम 'पहला सुर' में ऋषि के 3 गीत संकलित थे। ऋषि ने हिन्द-युग्म के दूसरे संगीतबद्ध सत्र में भी 5 गीतों में संगीत दिया। हिन्द-युग्म के थीम-गीत को भी संगीतबद्ध करने का श्रेय ऋषि एस॰ को जाता है। इसके अतिरिक्त ऋषि ने भारत-रूस मित्रता गीत 'द्रुजबा' को संगीत किया। मातृ दिवस के उपलक्ष्य में भी एक गीत का निर्माण किया। भारतीय फिल्म संगीत को कुछ नया देने का इरादा रखते हैं।

विश्व दीपक 'तन्हा'
विश्व दीपक हिन्द-युग्म की शुरूआत से ही हिन्द-युग्म से जुड़े हैं। आई आई टी, खड़गपुर से कम्प्यूटर साइंस में बी॰टेक॰ विश्व दीपक इन दिनों पुणे स्थित एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। अपनी विशेष कहन शैली के लिए हिन्द-युग्म के कविताप्रेमियों के बीच लोकप्रिय विश्व दीपक आवाज़ का चर्चित स्तम्भ 'महफिल-ए-ग़ज़ल' के स्तम्भकार हैं। विश्व दीपक ने दूसरे संगीतबद्ध सत्र में दो गीतों की रचना की। इसके अलावा दुनिया भर की माँओं के लिए एक गीत को लिखा जो काफी पसंद किया गया।

Song - Husn-E-Ilaahi
Voice - Sriraam and Srividya
Music - Rishi S
Lyrics - Vishwa Deepak
Graphics - Prashen's media


Song # 16, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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