सोमवार, 2 अगस्त 2010

ये क्या जगह है दोस्तों.....शहरयार, खय्याम और आशा की तिकड़ी और उस पर रेखा की अदाकारी - बेमिसाल

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 452/2010/152

'सेहरा में रात फूलों की' - ८० के दशक की कुछ यादगार ग़ज़लों की इस लघु शृंखला की दूसरी कड़ी में आप सभी का स्वागत है। जैसा कि कल हमने कहा था कि इस शृंखला में हम दस अलग अलग शायरों के क़लाम पेश करेंगे। कल हसरत साहब की लिखी ग़ज़ल आपने सुनी, आज हम एक बार फिर से सन् १९८१ की ही एक बेहद मक़बूल और कालजयी फ़िल्म की ग़ज़ल सुनने जा रहे हैं। यह वह फ़िल्म है दोस्तों जो अभिनेत्री रेखा के करीयर की सब से महत्वपूर्ण फ़िल्म साबित हुई। और सिर्फ़ रेखा ही क्यों, इस फ़िल्म से जुड़े सभी कलाकारों के लिए यह एक माइलस्टोन फ़िल्म रही। अब आपको फ़िल्म 'उमरावजान' के बारे में नई बात और क्या बताएँ! इस फ़िल्म के सभी पक्षों से आप भली भाँति वाक़ीफ़ हैं। और इस फ़िल्म में शामिल होने वाले मुजरों और ग़ज़लों के तो कहने ही क्या! आशा भोसले की गाई हुई ग़ज़लों में किसे किससे उपर रखें समझ नहीं आता। "दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए" या फिर "इन आँखों की मस्ती के", या "जुस्तजू जिसकी थी उसको तो ना पाया हमने" या फिर "ये क्या जगह है दोस्तों"। एक से एक लाजवाब! उधर तलत अज़ीज़ के गाए "ज़िंदगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें" भी तो हमें एक अलग ही दुनिया में लिए जाते हैं जिसे सुन कर यह ज़मीं चांद से बेहतर हमें भी नज़र आने लगती हैं। मौसीकार ख़य्याम साहब ने इस फ़िल्म के लिए १९८२ का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीता था और राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित हुए थे। निर्देशक मुज़फ़्फ़र अली को भी सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। आशा भोसले फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से अपना नाम वापस ले चुकीं थीं, इसलिए उनका नाम नॊमिनेशन में नहीं आया, और इस साल यह पुरस्कार चला गया परवीन सुल्ताना की झोली में फ़िल्म 'कुद्रत' के गीत "हमें तुम से प्यार कितना" के लिए। लेकिन आशा जी को इस फ़िल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से ज़रूर सम्मानित किया गया। दोस्तों, यह इतनी महत्वपूर्ण फ़िल्म रही ग़ज़लों की दृष्टि से कि इस शृंखला में इस फ़िल्म को नज़रंदाज़ करना बेहद ग़लत बात होती। तभी तो आज के लिए हमने चुना है "ये क्या जगह है दोस्तों"।

फ़िल्म 'उमरावजान' की कहानी और इस फ़िल्म के बारे में तो लगभग सभी कुछ आपको मालूम होगा, तो आइए आज ख़ास इस ग़ज़ल की ही चर्चा की जाए। चर्चा क्या साहब, ख़ुद ख़य्याम साहब से ही पूछ लेते हैं इसके बारे में, क्या ख़याल है? विविध भारती के 'संगीत सरिता' कार्यक्रम के सौजन्य से ये अंश हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं - "एक और नग़मा आपने सुना होगा, फ़िल्म में ऒलमोस्ट क्लाइमैक्स है, लड़की, शरीफ़ज़ादी अपने घर में, अपने मोहल्ले में, अपने शहर में, किस तरह से एडुकेशन लेती थी, रहते थे सब, उसके माँ-बाप, और वो लड़की किसी कारण बहुत बड़ी तवायफ़ बन गई। उस मकाम पर, अपने ही घर के सामने उसे मुजरा करना है। और मुजरे का मतलब है लोगों की दिलजोयी। जो तवायफ़ है वो लोगों का दिल लुभाए, दिलजोयी करे, और अब यह सिचुएशन है कि जब मुजरा शुरु हुआ, उसने देखा कि मैं तो वहीं हूँ, घर सामने है, और मेरी बूढ़ी माँ, उस चिलमन के पीछे, इसका डबल मीनिंग् हो गया कि लोगों को, जिनके सामने मुजरा कर रही है वो, उनका दिल लुभा रही है, और उसके इनर में एक तूफ़ान चल रहा है, जो उसकी माँ, कि मैं अपनी माँ को मिल सकूँगी या नहीं, और मैं मुजरा कर रही हूँ। मुजरे वाली वो थी नहीं, लेकिन हालात ने बना दिया। तो वो इस नग़मे में, 'ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है", तो इसमें देखिए आशा जी ने किस अंदाज़ में, उसी अंदाज़ को पकड़ा, जो मैंने कहा, उसी तरह से गाया है, और शहरयार साहब ने उम्दा, बहुत अच्छा लिखा है। मुज़फ़्फ़र अली साहब ने भी हक़ अदा किया। उसका पिक्चराइज़ेशन इतना अच्छा किया है कि लोगों को बाक़ायदा रोते हुए सुना है।" सचमुच दोस्तों, यह ग़ज़ल इतना दिल को छू जाती है कि जितनी भी बार सुनी जाए, जैसे दिल ही नहीं भरता। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर पहली बार 'उमरावजान' की ग़ज़ल, सुनिए, लेकिन उससे पहले ये रहे इस ग़ज़ल के तमाम शेर...

ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है,
हद-ए-निगाह तक जहाँ ग़ुबार ही ग़ुबार है।

ये किस मक़ाम पर हयात मुझको लेके आ गई,
ना बस ख़ुशी पे है जहाँ, ना ग़म पे इख़्तियार है।

तमाम उम्र का हिसाब माँगती है ज़िंदगी,
ये मेरा दिल कहे तो क्या, के ख़ुद से शर्मसार है।

बुला रहा है कौन मुझको चिलमनों के उस तरफ़,
मेरे लिए भी क्या कोई उदासो बेक़रार है।

दोस्तों, यह जो अंतिम शेर है, उसमें उमरावजान की माँ को चिलमन की ओट से अपनी बेटी को देखती हुई दिखाई जाती है। इतना मर्मस्पर्शी सीन था कि शायद ही ऐसा कोई होगा जिसकी आँखें नम ना हुईं होंगी। जैसे अल्फ़ाज़, वैसा संगीत, वैसी ही गायकी, और रेखा की वैसी ही अदायगी। अभी हाल में ख़य्याम साहब को जब 'लाइफ़टाइम अचीवमेण्ट अवार्ड' से नवाज़ा गया था और उन्हे पुरस्कार प्रदान किया था आशा जी ने, और सामने की पंक्ति पर रेखा बैठी हुईं थीं। ख़य्याम साहब ने तब कहा था कि 'उमरावजान' के लिए सब से ज़्यादा श्रेय आशा जी और रेखा को ही जाता है। अकस्मात इतनी बड़ी ऒडिएन्स में इस तरह से ख़य्याम साहब की ज़ुबान से अपनी तारीफ़ सुन कर रेखा अपने जज्बात पर क़ाबू न रख सकीं और उनकी आँखों से टप टप आँसू बहने लग पड़े। ठीक वैसे ही जैसे इस ग़ज़ल को सुनते हुए हम सब के बहते हैं। तो आइए फिर एक बार इस क्लासिक ग़ज़ल को सुने और फिर एक बार अपनी आँखें नम करें। पता नहीं क्यों इस ग़ज़ल के बहाने आँखें नम करने को जी चाहता है!



क्या आप जानते हैं...
'उमरावजान' में ख़य्याम साहब ने लता जी के बजाय आशा जी से गानें इसलिए गवाए क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि 'पाक़ीज़ा' के हैंग्-ओवर से 'उमरावजान' ज़रा सा भी प्रभावित हो। उस पर उन्हे यह भी लगा कि रेखा के लिए आशा जी की कशिश भरी आवाज़ ही ज़्यादा मेल खाती है।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. ग़ज़ल के मतले में फिल्म का शीर्षक है, शायर बताएं - ३ अंक.
२. खय्याम साहब का है संगीत, गायिका बताएं - २ अंक.
३. इस गज़ल का एक पुरुष संस्करण भी है उसमें किसकी आवाज़ है बताएं - २ अंक.
४. अम्ब्रीश संगल निर्देशित फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
पवन जी ने ३ अंकों के सवाल का सही जवाब दिया, तो शरद जी, अवध जी और इंदु जी भी कमर कसे मिले, बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

रविवार, 1 अगस्त 2010

मोहब्बत रंग लाएगी जनाब आहिस्ता आहिस्ता....इसी विश्वास पे तो कायम है न दुनिया के तमाम रिश्ते

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 451/2010/151

फ़िल्म संगीत का सुनहरा दौर ४० के दशक के आख़िर से लेकर ५० और ६० के दशकों में पूरे शबाब पर रहने के बाद ७० के दशक के आख़िर से धीरे धीरे ख़त्म होता जाता है। और इस बारे में यही आम धारणा भी है। ८० के दशक में फ़िल्मों की कहानी ही कहिए, फ़िल्म और संगीत के बदलते रूप ही कहिए, या लोगों की रुचि ही कहिए, जो भी है, हक़ीक़त तो यही है कि ८० के दशक में फ़िल्म संगीत एक बहुत ही बुरे वक़्त से गुज़रा। कुछ फ़िल्मों, कुछ गीतों और कुछ गिने चुने गीतकारों और संगीतकारों को छोड़ कर ज़्यादातर गानें ही चलताऊ क़िस्म के बने। लेकिन जैसा कि हमने "कुछ' शब्द का प्रयोग किया, तो कुछ गानें ऐसे भी बनें उस दशक में दोस्तों जो उतने ही सुनहरे हैं जितने कि फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के गीत। दोस्तों, कुछ ऐसे ही सुनहरी ग़ज़लों को चुन कर आज से अगले दस कड़ियों में पिरो कर हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'सेहरा में रात फूलों की'। चारों तरफ़ वीरानी हो, और ऐसे में कहीं से फूलों की ख़ुशबू आ कर हमारी सांसों को महका जाए, कुछ ऐसी ही बात थी इन ग़ज़लों में जो उस वीरान दौर को महका गई। महका क्या गई, आज भी वो महक फ़िज़ाओं में अपनी ख़ुशबू लुटा रही है। 'सेहरा में रात फूलों की' शृंखला में हमने जिन १० ग़ज़लों को चुना है वो दस अलग अलग शायरों के क़लम से निकली हुई हैं। तो आइए शुरुआत की जाए इस शृंखला की। दोस्तों, कल यानी कि ३१ जुलाई को मोहम्मद रफ़ी साहब की पुण्यतिथि थी। तो क्यों ना इस महकती शृंखला की शुरुआत रफ़ी साहब की गायी हुई ८० के दशक के एक ग़ज़ल से ही कर दी जाए! ऐसे में बस एक ही यादगार ग़ज़ल ज़हन में आती है। चन्द्राणी मुखर्जी के साथ उनकी गायी हुई फ़िल्म 'पूनम' की ग़ज़ल "मोहब्बत रंग लाएगी जनाब आहिस्ता आहिस्ता"। पहली बार 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर गूंज रहा है अनु मलिक का संगीत, और वह भी उनका पहला पहला गीत। इस ग़ज़ल को लिखा था अनु मलिक के मामा, यानी गीतकार और शायर हसरत जयपुरी साहब ने। 'पूनम' १९८१ की फ़िल्म थी जिसके मुख्य कलाकार थे राज बब्बर और पूनम ढिल्लों। फ़िल्म तो नहीं चली, लेकिन यह ग़ज़ल सदाबहार बन कर रह गया।

बरसों पहले अनु मलिक साहब विविध भारती में तशरीफ़ लाए थे फ़ौजी जवानों के लिए 'जयमाला' कार्यक्रम प्रस्तुत करने हेतु। उसमें उन्होने इस ग़ज़ल का भी ज़िक्र किया था, और इसकी रिकार्डिंग् से जुड़ी और ख़ास तौर से रफ़ी साहब से जुड़ी संस्मरणों का भी तफ़सील से ख़ुलासा लिया था। आइए उसी हिस्से को यहाँ पेश करते हैं। "फ़िल्मी दुनिया में जगह बनाने के लिए मुझे बेहद संघर्ष करना पड़ा। रोशनी की किरण बन कर आए श्री हरमेश मल्होत्रा जी। सब से पहले चांस मुझे फ़िल्म 'पूनम' में हरमेश मल्होत्रा जी ने दिया। उसका एक गीत बहुत ही ज़्यादा मशहूर हुआ, गीत के बोल मैं कुछ कहने के बाद सुनाना चाहता हूँ क्योंकि पहले मैं इस गाने के साथ मोहम्मद रफ़ी साहब का नाम जोड़ना चाहता हूँ जिन्होने मेरा पहला गाना गाया। रफ़ी साहब से मेरी बात हुई कि रफ़ी साहब, मुझे इतनी बड़ी पिक्चर मिली है, संगीतकार बनने का मौका मिला है, और मेरी ज़िंदगी का पहला गाना आप गाएँगे। मुस्कुराये, और बोले कि बेटा, कल सुबह मेरे घर आ जाना। ९ बजे का रिहर्सल का वक़्त हमने फ़िक्स किया। ९ बजे के बजाए मैं इतना एक्साइटेड था कि मैं ८ बजे ही पहुँच गया। वहाँ जाके देखा कि रफ़ी साहब अपने बाग़ में, अपने गार्डन में चुप चाप बैठे हुए हैं। उन्होने मुझे देखा, बोले, अरे, ९ बजे का वक़्त था, तुम ८ बजे ही आ गये! मैं डर गया, कहीं मुझे डांट ना दें। मुस्कुराये, बोले, चलो, मेरे रिहर्सल रूम में चलो। रफ़ी साहब पाँच वक़्त के नमाज़ी थे। इतना नूर मैंने किसी के चहरे पर नहीं देखा। सब से अच्छी बात मुझे रफ़ी साहब के बारे में यह लगी कि उन्होने कभी मुझे छोटा संगीतकार नहीं समझा। मेरा नाम ही क्या था, मुझे कौन जानता था, मुझे ऊँचा दर्जा दिया, प्यार से मेरा गीत सुना। अपने सजेशन्स मुझे दिए। रिकार्डिंग् होने के बाद रफ़ी साहब ने मेरे कंधे पे हाथ रखा और कहा कि बेटा, इस गाने के साथ तुमने मेरी २० साल की ज़िंदगी बढ़ा दी। अजीब इत्तेफ़ाक़ की बात है, कहाँ वो कह रहे थे कि तुम्हारे गीत से २० साल की ज़िंदगी बढ़ गई, बड़े अफ़सोस से कहना पड़ता है कि मेरे इस गाने को गाने के कुछ ही दिनों बाद वो इस दुनिया से चल बसे। जी हाँ, यह भी सुन कर आप लोग हैरान होंगे कि उनकी ज़िंदगी का आख़िरी गाना उन्होने मेरे लिए गाया। फ़िल्म 'पूनम' का गीत। २७ जुलाई को उन्होने यह गीत रिकार्ड किया, ३० जुलाई की रात वो गुज़र गए।" अब इसके बाद और क्या कहें दोस्तों, बस इस ग़ज़ल के तमाम शेर नीचे लिख रहे हैं। क्या ख़ूबसूरत शेर कहें हैं हसरत साहब ने। नायक के तमाम शरारत भरे इल्ज़ामों का नायिका किस ख़ूबसूरती से जवाब देती है, इस ग़ज़ल को सुन कर दिल से बस एक ही आवाज़ निकलती है, "वाह"!

मोहब्बत रंग लाएगी जनाब आहिस्ता आहिस्ता,
के जैसे रंग लाती है शराब आहिस्ता आहिस्ता।

अभी तो तुम झिझकते हो, अभी तो तुम सिमटते हो,
के जाते जाते जाएगा हिजाब आहिस्ता आहिस्ता।

हिजाब अपनों से होता है, नहीं होता है ग़ैरों से,
कोई भी बात बनती है जनाब आहिस्ता आहिस्ता।

अभी कमसीन हो क्या जानो, मोहब्बत किसको कहते हैं,
बहारें तुमपे लाएंगी शबाब आहिस्ता आहिस्ता।

बहारें आ चुकी हम पर ज़रूरत बाग़बाँ की है,
तुम्हारे प्यार का दूँगी जवाब आहिस्ता आहिस्ता।



क्या आप जानते हैं...
कि "आहिस्ता आहिस्ता" से कई ग़ज़लें लिखी गई हैं। मूल ग़ज़ल है "सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता" जिसे लिखा था १९-वीं सदी के शायर अमीर मीनाई ने। इस ग़ज़ल को फ़िल्म 'दीदार-ए-यार' में लता-किशोर ने गाया था। इसी ग़ज़ल से प्रेरणा लेकर हसरत जयपुरी ने फ़िल्म 'पूनम' में ग़ज़ल लिखी और निदा फ़ाज़ली ने लिखे फ़िल्म 'आहिस्ता आहिस्ता' की ग़ज़ल "नज़र से फूल चुनती है नज़र आहिस्ता आहिस्ता"।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. इस मास्टर पीस फिल्म में एक से बढ़कर एक ग़ज़लें थी, शायर बताएं - ३ अंक.
२. इस फिल्म की एक रिमेक भी बनी जिसमें जावेद अख्तर साहब ने बोल लिखे, फिल्म का नाम बताएं - १ अंक.
३. अभिनय और गायन का उत्कृष्ट मिलन है ये गीत, अभिनेत्री और गायिका बताएं - २ अंक.
४. फिल्म के निर्देशक का नाम बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
आलेख पढ़ कर आप लोग समझ गए होंगें कि क्यों हम 'पूनम' को अनु की पहली फिल्म मान रहे हैं. हो सकता है हंटरवाली को खुद अनु मिल्क भूलना चाह रहे हों...खैर हमें सही जवाब मिले, शरद जी, पवन जी, इंदु जी और किश जी के, सभी को बधाई.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

रविवार सुबह की कॉफी और रफ़ी साहब के अंतिम सफर की दास्ताँ....दिल का सूना साज़

३१ जुलाई को सभी रफ़ी के चाहने वाले काले दिवस के रूप मानते आये हैं और मनाते रहेंगे क्यूंकि इस दिन ३१ जुलाई १९८० को रफ़ी साब हम सब को छोड़ कर चले गए थे लेकिन इस पूरे दिन का वाकया बहुत कम लोग जानते हैं आज उस दिन क्या क्या हुआ था आपको उसी दिन कि सुबह के साथ ले चलता हूँ.

३१ जुलाई १९८० को रफ़ी साब जल्दी उठ गए और तक़रीबन सुबह ९:०० बजे उन्होंने नाश्ता लिया. उस दिन श्यामल मित्रा के संगीत निर्देशन तले वे कुछ बंगाली गीत रिकॉर्ड करने वाले थे इसलिए नाश्ते के बाद उसी के रियाज़ में लग गए. कुछ देर के बाद श्यामल मित्रा उनके घर आये और उन्हें रियाज़ करवाया. जैसे ही मित्रा गए रफ़ी साब को अपने सीने में दर्द महसूस हुआ. ज़हीर बारी जो उनके सचिव थे उनको दवाई दी वहीँ दूसरी तरफ ये बताता चलूँ के इससे पहले भी रफ़ी साब को दो दिल के दौरे पड़ चुके थे लेकिन रफ़ी साब ने उनको कभी गंभीरता से नहीं लिया. मगर हाँ नियमित रूप से वो एक टीका शुगर के लिए ज़रूर लेते थे और अपने अधिक वज़न से खासे परेशान थे. सुबह ११:०० बजे डॉक्टर की सलाह से उनको अस्पताल ले जाया गया जहाँ एक तरफ रफ़ी साब ने अपनी मर्ज़ी से माहेम नेशनल अस्पताल जाना मंज़ूर किया वहीँ से बदकिस्मती ने उनका दामन थाम लिया क्योंकि उस अस्पताल में कदम से चलने की बजाय सीडी थीं जो एक दिल के मरीज़ के लिए घातक सिद्ध होती हैं और रफ़ी साब को सीढियों से ही जाना पड़ा. शाम ४:०० बजे के आसपास उनको बॉम्बे अस्पताल में दाखिल किया गया लेकिन संगीत की दुनिया की बदकिस्मती यहाँ भी साथ रही और यहाँ भी रफ़ी साब को सीढियों का सहारा ही मिला. अस्पताल में इस मशीन का इंतज़ाम रात ९:०० बजे तक हो पाया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. रात ९:०० बजे के आसपास डॉक्टर के. ऍम. मोदी और डॉक्टर दागा ने उनका मुआयना किया और डॉक्टर के. ऍम. मोदी ने बताया के अब रफ़ी साब के बचने की उम्मीद बहुत कम है.

गीत : तू कहीं आस पास है दोस्त


और आखिर वो घडी आ ही गयी जो न आती तो अच्छा होता काश के वक़्त थम जाता उस वक़्त को निकालकर आगे निकल जाता :

देखकर ये कामयाबी एक दिन मुस्कुरा उठी अज़ल
सारे राग फीके पड़ गए हो गया फनकार शल
चश्मे फलक से गिर पड़ा फिर एक सितारा टूटकर
सब कलेजा थामकर रोने लगे फूट फूटकर
लो बुझ गयी समां महफ़िल में अँधेरा हो गया
जिंदगी का तार टूटा और और तराना सो गया

गीत : कोई चल दिया अकेले


मजरूह सुल्तानपुरी ने तकरीबन शाम ८:०० बजे नौशाद अली को टेलीफ़ोन करके बताया कि रफ़ी साब कि तबियत बहुत ख़राब है. नौशाद अली ने इस बात ज्यादा गौर नहीं दिया क्योंकि सुबह ही तो उन्होंने रफ़ी साब से टेलीफ़ोन पर बात की थी. लेकिन रात ११:०० बजे एक पत्रकार ने नौशाद अली को टेलीफ़ोन करके बताया के रफ़ी साब चले गए. नौशाद अली को फिर भी यकीन नहीं आया और उन्होंने रफ़ी साब के घर पर टेलीफ़ोन किया जिसपर इस खबर की पुष्टि उनकी बेटी ने की. नौशाद अली जब अपनी पत्नी के साथ रफ़ी साब के घर गए तो उनका बड़ा बेटा शहीद रफ़ी बेतहाशा रो रहा है.

नौशाद अली ने दिलीप कुमार के घर टेलीफ़ोन किया जो उनकी पत्नी सायरा बानो ने उठाया लेकिन दिलीप कुमार की तबियत का ख़याल करते हुए उन्होंने इस बारे में अगली सुबह बताया.

गीत : जाने कहाँ गए तुम


तकरीबन १०:१० बजे उनके इस दुनिया से कूच करने के वक़्त उनकी बीवी, बेटी और दामाद बिस्तर के पास थे.

अस्पताल के नियमानुसार उनके शरीर को उस रात उनको परिवार वालों को नहीं सौंपा गया तथा पूरी रात उनका शरीर अस्पताल के बर्फ गोदाम में रहा.

अगले दिन १ अगस्त १९८० सुबह ९:३० बजे रफ़ी साब का शरीर उनको परिवार को मिल सका उस वक़्त साहेब बिजनोर, जोहनी विस्की और ज़हीर बारी भी मौजूद थे. दोपहर १२:३० बजे तक किसी ट्रक का इंतज़ाम न होने की वजह से कन्धों पर ही उनको बांद्रा जामा मस्जिद तक लाया गया वहां पर जनाज़े की नमाज़ के बाद उनको ट्रक द्वारा शंताक्रूज़ के कब्रिस्तान तक लाया गया. शाम ६:१५ बजे कब्रिस्तान पहुंचकर ६:३० बजे तक वहीँ दफना दिया गया.

गीत : दिल का सूना साज़


प्रस्तुति- मुवीन



"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ