मंगलवार, 2 मार्च 2010

पिया संग खेलूँ होली फागुन आयो रे...मौसम ही ऐसा है क्यों न गूंजें तराने फिर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 361/2010/61

होली का रंगीन त्योहार आप सभी ने ख़ूब धूम धाम से और आत्मीयता के साथ मनाया होगा, ऐसी हम उम्मीद करते हैं। दोस्तों, भले ही होली गुज़र चुकी है, लेकिन वातावरण में, प्रकृति में जो रंग घुले हुए हैं, वो बरक़रार है। फागुन का महीना चल रहा है, बसंत ऋतु ने चारों तरफ़ रंग ही रंग बिखेर रखी है। चारों ओर रंग बिरंगे फूल खिले हैं, जो मंद मंद हवाओं पे सवार होकर जैसे झूला झूल रहे हैं। उन पर मंडराती हुईं तितलियाँ और भँवरे, ठंडी ठंडी हवाओं के झोंके, कुल मिलाकर मौसम इतना सुहावना बन पड़ा है इस मौसम में कि इसके असर से कोई भी बच नहीं सकता। इन सब का मानव मन पर असर होना लाज़मी है। इसी रंगीन वातावरण को और भी ज़्यादा रंगीन, ख़ुशनुमा और सुरीला बनाने के लिए आज से हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शुरु कर रहे हैं दस रंगीन गीतों की एक लघु शृंखला 'गीत रंगीले'। इनमें से कुछ गानें होली गीत हैं, तो कुछ बसंत ऋतु को समर्पित है, किसी में फागुन का ज़िक्र है, तो किसी में है इस मौसम की मस्ती और धूम। दोस्तों, मुझे श्याम 'साहिल' की लिखी हुई एक कविता याद आ रही है, जो कुछ इस तरह से है:

महक महक उठा मन फागुनी बसन्त में,
बहक बहक उठा तन फागुनी बसन्त में।
समझ नहीं पाया क्या जीवन अभिशाप है,
उलझा सा जीवन पथ पुण्य है या पाप है,
तभी ये बयार आई बसन्ती गीत लिए,
कानों में गुनगुनाई, नयनों में प्रीत लिए,
फूंक दिए प्राण फिर जीवन पंथ में,
महक महक उठा मन फागुनी बसन्त में,
बहक बहक उठा तन फागुनी बसन्त में।
पीताम्बर ओढे हुए धरती मधुमास है,
अंबर की छांव तले छाया उल्हास है,
कण कण में घुला हुआ जीवन का सार है,
जड और चेतन का सुखमय आधार है,
तृप्त हुआ अन्तरमन आदि और अनन्त में,
महक महक उठा मन फागुनी बसन्त में,
बहक बहक उठा तन फागुनी बसन्त में।

तो दोस्तों, इस फ़ागुनी और बसंती वातावरण में इस रंग-रंगीली सुरीली शृंखला की शुरुआत की जाए लता मंगेशकर और सखियों की गाई फ़िल्म 'फागुन' के होली गीत से, "पिया संग खेलूँ होली फागुन आयो रे"। मजरूह सुल्तानपुरी के बोल, सचिन देव बर्मन का संगीत। जब भी हमारी फ़िल्मों में किसी होली गीत के फ़िल्मांकन की बात आती है तो हर फ़िल्मकार उसे बड़े ही शानदार और रंगीन तरीक़े से फ़िल्माने की कोशिश करता है। गीतकार, संगीतकार और गायक कलाकारों का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है ऐसे गीतों की कामयाबी में; लेकिन जब तक होली गीत का फ़िल्माकंन सही तरीके से ना हो तो उसका कालजयी बन पाना ज़रा सा मुश्किल हो जाता है। युं तो हिंदी फ़िल्मों में बेशुमार होली गीत हुए हैं, जिन्हे आप हर साल होली के दिन विभिन्न रेडियो व टीवी चैनलों पर सुनते और देखते आए हैं, लेकिन कुछ होली गीत ऐसे भी रहे हैं जो उस ज़माने में तो काफ़ी प्रसिद्ध हुए, लेकिन आज उनकी गूंज ज़रा सी कम होती जा रही है। ऐसा ही एक गीत है फ़िल्म 'फागुन' का जिसे हमने आज के अंक के लिए चुना है। फ़िल्म 'फागुन' का नाम सुनते ही हमें १९५८ की ओ. पी. नय्यर साहब के संगीत वाली फ़िल्म की याद आती है। लेकिन सन् १९७३ में भी इस शीर्षक से एक फ़िल्म बनी थी जो बॊक्स ऒफ़िस पर कामयाब नहीं हो सकी, लेकिन इस फ़िल्म का यह होली गीत ख़ूब बजा। धर्मेन्द्र और वहीदा रहमान अभिनीत इस फ़िल्म को आज केवल इसी गीत की वजह से लोगों ने याद रखा है। चलिए आज हम भी इस गीत के साथ थोड़ा सा मन ही मन होली खेल लेते हैं, और आप सभी को एक बार फिर से होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं!



क्या आप जानते हैं...
कि वहीदा रहमान की सब से निकट की सहेली (Best Friend) हैं अभिनेत्री नंदा, जिनके साथ उन्होने फ़िल्म 'काला बाज़ार' (१९६०) में काम किया था।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. कल इस गीत के संगीतकार का जन्मदिन है नाम बताये -३ अंक.
2. मीना कुमारी अभिनीत इस फिल्म के निर्देशक का नाम बताएं - २ अंक.
3. इस होली गीत के गीतकार का नाम बताएं, ये वही हैं जिन्होंने मदर इंडिया का वो क्लास्सिक होली गीत रचा था- २ अंक.
4. फिल्म के नायक कौन हैं-सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
कल पहेली जरा देर से पोस्ट हुई,पर फिर भी शरद जी मुश्तैद रहे और ३ अंक चुरा लिए
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

सोमवार, 1 मार्च 2010

कहीं शेर-ओ-नग़मा बन के....तलत साहब की आवाज़ में एक दुर्लभ गैर फ़िल्मी गज़ल

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 360/2010/60

'दस महकती ग़ज़लें और एक मख़मली आवाज़', तलत महमूद पर केन्द्रित इस ख़ास पेशकश की अंतिम कड़ी में आपका फिर एक बार हम स्वागत करते हैं। दोस्तों, किसी भी इंसान की जो जड़ें होती हैं, वो इतने मज़बूत होती हैं, कि ज़िंदगी में एक वक़्त ऐसा आता है जब वह अपने उसी जड़ों की तलाश करता है, उसी की तरफ़ फिर एक बार रुख़ करने की कोशिश करता है। तलत महमूद सहब के गायन की शुरुआत ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं के साथ हुई थी जब उन्होने "सब दिन एक समान नहीं था" से अपना करीयर शुरु किया था। फिर उसके बाद कमल दासगुप्ता के संगीत में उनका पहला कामयाब ग़ैर फ़िल्मी गीत आया, "तसवीर तेरी दिल मेरा बहला ना सकेगी"। तलत साहब के अपने शब्दों में "१९४१ में मैंने अपना पहला गीत रिकार्ड करवाया था "तसवीर तेरी दिल मेरा..."। फ़य्याज़ हशमी ने इसे लिखा था और कमल दासगुप्ता की तर्ज़ थी। मैं अपनी तारीफ़ ख़ुद नहीं करना चाहता पर तसवीर पर इससे बेहतरीन गीत आज तक नहीं हुआ है।" तो हम बात करे थे अपने जड़ों की ओर वापस मुड़ने की। तो तलत साहब, जिन्होने ग़ैर फ़िल्मी गीत से अपने पारी की शुरुआत की थी, ५० के दशक के आते आते वो फ़िल्म जगत में अपना क़दम जमा लिया, लेकिन फिर एक समय ऐसा आया जब वो वापस ग़ैर फ़िल्मी जगत का रुख़ किया। यह दौर था ७० और ८० के दशकों का। एक से एक मशहूर शायरों की ग़ज़लों को उन्होने ना केवल गाया बल्कि उनकी धुनें भी बनाई। "मुझे भी धुनें बनाने का शौक है, फ़िल्मों के लिए नहीं, बल्कि मेरे ग़ैर फ़िल्मी गीतों के लिए। मैंने अपने कई गीतों का संगीत तैयार किया है। अब मैं आपको ऐसी एक ग़ज़ल सुनवाने जा रहा हूँ, जिसे लिखा है शक़ील बदायूनी ने और जिसकी तर्ज़ मैंने ही बनाई थी। और यक़ीन मानिए मैंने पूरी ग़ज़ल की ट्युन १५ मिनट में तैयार कर दिया था।" दोस्तो, जिस ग़ज़ल की तरफ़ तलत साहब ने इशारा किया, वह ग़ज़ल थी "तुमने यह क्या सितम किया"। आज भी हम आपको एक ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़ल ही सुनवा रहे हैं, लेकिन यह वाली नहीं, बल्कि शायर और गीतकार ख़ुमार बाराबंकवी का लिखा "कहीं शेर-ओ-नग़मा बन के दिल आँसुओं में ढलके"। तर्ज़ तलत साहब की ही है।

दोस्तों, तलत साहब की गाई हुई ग़ज़लों की इस ख़ास शृंखला की अंतिम कड़ी में आइए आज ग़ज़लों से संबंधित कुछ बातें की जाए जो गुलज़ार साहब ने ग़ज़लों पर जारी एक विशेष सी.डी '50 Glorious Years of Popular Ghazals' की भूमिका में कहे थे! "ग़ज़ल उसने छेड़ी मुझे साज़ देना, ज़रा उम्र-ए-रफ़्ता को आवाज़ देना। उम्र-ए-रफ़्ता को आवाज़ दी तो बहुत दूर तक गूँजती चली गई। क़रीब उस इत्तदा तक जहाँ साज़ पर ग़ज़ल छेड़ी गई थी, और रिकार्ड होनी शुरु हुई थी। ग़ज़ल लिखने के बाद क़िताब में महफ़ूज़ हो चुकी थी, लेकिन साज़ पर गाए जाने के बाद पहली बार रिकार्ड पर और फिर टेप पर महफ़ूज़ हुई। ख़याल महफ़ूज़ था लेकिन आवाज़ पहली बार महफ़ूज़ होनी शुरु हुई थी। एक और सफ़र शुरु हुआ ग़ज़ल का यहाँ से। जी चाहा इस सफ़र को शुरु से दोहरा कर देखें।" दोस्तों, उस सी.डी में फिर उसके बाद एक के बाद एक कुल १०० ग़ज़लें शामिल की गयीं थी। लेकिन हमारी यह शृंखला उस सी.डी से बिल्कुल अलग रही, और इस शृंखला में शामिल कोई भी ग़ज़ल उस सी.डी का हिस्सा नहीं है। आइए अब सुना जाए आज की ग़ज़ल, जिसके तीन शेर कुछ इस तरह से हैं-

कहीं शेर-ओ-नग़मा बन के कहीं आँसुओं में ढलके,
तुम मुझे मिले थे लेकिन कई सूरतें बदल के।

ये चराग़-ए-अंजुमन तो हैं बस एक शब के महमान,
तू जला वो शम्मा ऐ दिल जो बुझे कभी ना जल के।

न तो होश से तआरूफ न जुनूं से आशनाई,
ये कहाँ पहुँच गए हम तेरी बज़्म से निकल के।



क्या आप जानते हैं...
कि तलत महमूद साहब की शख़सीयत इतनी ज़्यादा लोकप्रिय हुआ करती थी कि अमरीकी ५५५ स्टेट एक्स्प्रेस सिगरेट कंपनी ने अपने भारतीय विज्ञापनों के लिए तलत साहब को चुना था ५० के दशक में।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. एक माह का नाम है गीत के मुखड़े में, गीत बताएं -३ अंक.
2. संगीतकार हैं एस डी बर्मन गीतकार कौन हैं बताएं - २ अंक.
3. इसी नाम की एक फिल्म पहले भी बनी थी जिसमें ओ पी नय्यर साहब का जबरदस्त संगीत था, बताएं फिल्म का नाम- २ अंक.
4. फिल्म की नायिका का नाम बताएं -सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी, ३ अंक आपके कोई नहीं रोक सकता, बधाई, शरद जी ने तो ३ अंक चुरा ही लिए, बहुत मुश्किल गज़ल पहचान कर, वैसे तीसरे सवाल का जवाब आसान था, पर किसी से कोशिश नहीं की, उम्मीद है आप सब ने बढ़िया होलि खेली होगी आज
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

"अमन की आशा" है संगीत का माधुर्य, होली पर झूमिए इन सूफी धुनों पर

ताज़ा सुर ताल ०९/२०१०

सुजॊय - सभी पाठकों को होली पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ और सजीव, आप को भी!
सजीव - मेरी तरफ़ से भी 'आवाज़' के सभी रसिकों को होली की शुभकामनाएँ और सुजॊय, तुम्हे भी।
सुजॊय - होली का त्योहार रंगों का त्योहार है, ख़ुशियों का त्योहार है, भाइचारे का त्योहार है। गिले शिकवे भूलकर दुश्मन भी गले मिल जाते हैं, चारों तरफ़ ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है।
सजीव - सुजॊय, तुमने भाइचारे की बात की, तो मैं समझता हूँ कि यह भाइचारा केवल अपने सगे संबंधियों और आस-पड़ोस तक ही सीमित ना रख कर, अगर हम इसे एक अंतर्राष्ट्रीय रूप दें, तो यह पूरी की पूरी पृथ्वी ही स्वर्ग का रूप ले सकती है।
सुजॊय - जी बिल्कुल! आज कल जिस तरह से अंतर्राष्ट्रीय उग्रवाद बढ़ता जा रहा है, विनाश और दहशत के बादल इस पूरी धरा पर मंदला रहे हैं। ऐसे में अगर कोई संस्था अगर अमन और शांति का दूत बन कर, और सीमाओं को लांघ कर दो देशों को और ज़्यादा क़रीब लाने का प्रयास करें, तो हमें खुले दिल से उसकी स्वागत करनी चाहिए।
सजीव - हाँ, और ऐसी ही दो संस्थाओं ने मिल कर अभी हाल में एक परियोजना बनाई है भारत और पाक़िस्तान के रिश्तों को मज़बूत करने की। ये संस्थाएँ हैं भारत का सब से बड़ा मीडिया ग्रूप 'टाइम्स ग्रूप', पाक़िस्तान का मीडिया जायण्ट 'जंग ग्रूप', तथा 'जीओ टीवी ग्रूप', और इस परियोजना का शीर्षक है 'अमन की आशा'। ये मीडिया जायण्ट्स मिल कर दोनों देशों के बीच राजनैतिक और सांस्कृतिक संबंधों में सुधार लाने की कोशिश कर रहे हैं। जहाँ तक सांस्कृतिक पक्ष का सवाल है, तो इन दोनों देशों के जानेमाने कलाकारों के गीतों का एक संकलन हाल ही में जारी किया गया है।
सुजॊय - डबल सी डी पैक वाले 'अमन की आशा' ऐल्बम में ऐसे ऐसे कालजयी कलाकारों की रचनाएँ शामिल किए गए हैं कि कौन सा गीत किससे बेहतर है बताना मुश्किल है। इनमें से कुछ फ़िल्मी रचनाएँ हैं तो कुछ ग़ैर-फ़िल्मी, लेकिन हर एक गीत एक अनमोल नगीने की तरह है जो इस ऐल्बम में जड़े हैं। और क्यों ना हो जब लता मंगेशकर, गुलज़ार, भुपेन्द्र सिंह, शंकर महादेवन, हरीहरण, रूप कुमार राठोड़, नूरजहाँ, गु़लाम अली, नुसरत फ़तेह अली ख़ान, अबीदा परवीन, मेहदी हसन, राहत फ़तेह अली ख़ान, वडाली ब्रदर्स जैसे अज़ीम फ़नकारों के गाए गानें इसमें शामिल हों। इनमें से कुछ गानें नए हैं तो कुछ कालजयी रचनाएँ हैं। और कुछ पारम्परिक गानें तो आप ने हर दौर में अलग अलग गायकों की आवाज़ों में सुनते आए हैं।
सजीव - इस ऐल्बम में कुल २० गानें हैं, जिनमें से हम ५ ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं को आज के इस 'ताज़ा सुर ताल' की कड़ी में शामिल कर रहे हैं। बाक़ी गीत आप समय समय पर 'आवाज़' के अन्य स्तंभों में सुन पाएँगे। तो सुजॊय, चलो बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाने से पहले एक गीत हो जाए अबीदा परवीन का गाया हुआ!

गीत - मैं नारा-ए-मस्ताना


सजीव- वाह ये तो कोई जादू था सुजॉय, मैं तो अभी तक झूम रहा हूँ...
सुजॊय -बिलकुल ठीक, अबीदा परवीन का जन्म १९५४ में हुआ था पाकिस्तान के सिंध के लरकाना के अली गोहराबाद मोहल्ले में। संगीत की तालीम उन्होने शुरुआती समय में अपने पिता उस्ताद ग़ुलाम हैदर से ही प्राप्त किया। बाद में शाम चौरसिया घराने के उस्ताद सलामत अली ख़ान से उन्हे संगीत की शिक्षा मिली। अपने पिता के संगीत विद्यालय में जाते हुए अबीदा परवीन में संगीत के जड़ मज़बूत होते चले गए। उनका प्रोफ़ेशनल करीयर रेडियो पाक़िस्तान के हैदराबाद केन्द्र से शुरु हुआ था सन् १९७३ में। उनका पहला हिट गीत एक सिंधी गीत था "तूहींजे ज़ुल्फ़न जय बंद कमंद विधा"। सूफ़ियाना संगीत में अबीदा जी का एक अलग ही मुक़ाम है। मूलत: वो ग़ज़लें गाती हैं, लेकिन उर्दू प्रेम गीत और ख़ास तौर पर काफ़ी पर उनका जैसे अधिकार सा बना हुआ है। वो उर्दू, सिंधी, सेरैकी, पंजाबी और पारसी में गाती हैं।
सजीव - व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो अबीदा परवीन ने रेडियो पाक़िस्तान के सीनियर प्रोड्युसर ग़ुलाम हुसैन शेख़ से शादी की, जिनका अबीदा जी के शुरुआती करीयर में एक गायिका के रूप में उभरने में महत्वपूर्ण योगदान रहा। पुरस्कारों की बात करें तो अबीदा परवीन को १९८२ में 'प्राइड ऒफ़ परफ़ॊर्मैंस' का 'प्रेसिडेण्ट ऒफ़ पाक़िस्तान अवार्ड' मिला था। अभी कुछ वर्ष पहले २००५ में उन्हे 'सितारा-ए-इमतियाज़' के सम्मान से नवाज़ा गया था।
सुजॊय - वैसे तो अबीदा जी के असंख्य ऐल्बम बनें हैं, उनमें से कुछ के नाम हैं आपकी अबीदा, अरे लोगों तुम्हारा क्या, बेस्ट ऒफ़ अबीदा परवीन (१९९७), बाबा बुल्ले शाह, अबीदा परवीन सिंग्स् सॊंग्स् ऒफ़ दि मिस्टिक्स, अरीफ़ाना क़लाम, फ़ैज़ बाइ अबीदा, ग़ालिब बाइ अबीदा परवीन, ग़ज़ल का सफ़र, हर तरन्नुम, हीर बाइ अबीदा, हो जमालो, इश्क़ मस्ताना, जहान-ए-ख़ुसरो, कबीर बाइ अबीदा, काफ़ियाँ बुल्ले शाह, काफ़ियाँ ख़्वाजा ग़ुलाम फ़रीद ख़ज़ाना, कुछ इस अदा से आज, लट्ठे दी चादर, मेरे दिल से, मेरी पसंद, रक़्स-ए-बिस्मिल, सरहदें, तेरा इश्क़ नचया, दि वेरी बेस्ट ऒफ़ अबीदा, यादगार ग़ज़लें, आदि। इन नामों से ही आप अंदाज़ा ल्गा सकते हैं कि अबीदा परवीन किन शैलियों में महारथ रखती हैं।
सजीव - अबीदा परवीन के बारे में अच्छी बातें हमने जान ली, और अब 'अमन की आशा' में आगे बढ़ते हुए दूसरा गीत रूप कुमार राठोड़ और देवकी पंडित की आवाज़ों में, यह एक आध्यात्मिक गीत है, दैवीय सुर गूंजते हैं इस भक्ति रचना में जिसके बोल हैं "अल्लाहू"। 'अमन की आशा' सूफ़ी संगीत को एक और ही मुक़ाम तक ले जाती है।

गीत - अल्लाहू


सजीव - अगला गीत है वडाली ब्रदर्स का गाया "याद पिया की आए"। ये दोनों भाई जब किसी महफ़िल में गाते हैं तो एक ऐसा समा बंध जाता है कि महफ़िल के ख़त्म होने तक श्रोता मंत्रमुग्ध होकर उन्हे सुनते हैं, और महफ़िल के समापन के बाद भी जिसका असर लम्बे समय तक बरक़रार रहता है। सुजॊय, इन दो भाइयों के बारे में कुछ बताना चाहोगे?
सुजॊय - ज़रूर! पूरनचंद वडाली और प्यारेलाल वडाली भी सूफ़ी गायक व संगीतज्ञ हैं जिनका ताल्लुख़ पंजाब के अमृतसर के गुरु की वडाली से है। वडाली ब्रदर्स सूफ़ी संतों के उपदेशों व विचारों को गीत-संगीत के माध्यम से लोगों तक पहुँचाने वाले कलाकारो की पाँचवी पीढ़ी के सदस्य हैं। ये दो भाई एक ग़रीब परिवार से ताल्लुख़ रखते थे। बड़े भाई पूरनचंद २५ वर्ष के लम्बे समय तक कुश्ती के अखाड़े से जुड़े हुए थे। छोटा भाई प्यारेलाल अपने घर की अर्थिक स्थिति को थोड़ा बेहतर बनाने के लिए गाँव के रासलीला में श्री कृष्ण की भूमिक निभाया करते थे। भगवान के आशीर्वाद से दोनों भाइयों ने मिलकर आज जो मुक़ाम हासिल किया है, वह उल्लेखनीय है।
सजीव - जहाँ तक मैम्ने सुना है इनके पिता ठाकुर दास ने पूरनचंद को ज़बरदस्ती संगीत में धकेला जब कि उनकी दिलचस्पी अखाड़े में थी। ख़ैर, पूरनचंद ने पंडित दुर्गादास और उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान से तालीम ली, जब कि प्यारेलाल को पूरनचंद ने ही संगीत सीखाया। आज भी प्यारेलाल अपने बड़े भाई को ही अपना गुरु और्व सर्वस्व मानते हैं। अपने गाँव के बाहर इन दो भाइयों ने अपना पहला पब्लिक परफ़ॊर्मैंस जलंधर के हरबल्लभ मंदिर में दिया था।
सुजॊय - पता है वडाली ब्रदर्स दरसल जलंधर में आयोजित हरबल्लभ संगीत सम्मेलन में भाग लेने के लिए ही गए थे, लेकिन उनके वेश-भूषा को देख कर उन्हे वहाँ गाने का मौका नहीं दिया गया। निराश होकर इन्होने तय किया कि वो हरबल्लभ मंदिर के बाहर ही अपना संगीत प्रस्तुत करेंगे। और इन्होने ऐसा ही किया। संयोगवश उस वक़्त वहाँ आकाशवाणी जलंधर के संगीत विभाग के एक सदस्य मौजूद थे जिनको उनकी गायकी अच्छी लगी और आकाशवाणी जलंधर में उनकी पहली रिकार्डिंग् हुई।
सजीव - वडाली ब्रदर्स के बारे में अभी और भी बहुत सी बातें हैं बताने को, लेकिन वो हम फिर किसी दिन बताएँगे। यहाँ पर बस यह बताते हुए कि वडाली ब्रदर्स काफ़ी, गुरबाणी, ग़ज़ल और भजन शैलियों में महारथ रखते है, आपको सुनवा रहे है 'अमन की आशा' ऐल्बम में उनका गाया "याद पिया की आए"।
सुजॊय - सजीव, "याद पिया की आए" उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान साहब ने ठुमरी के अंदाज़ में गाया था। लेकिन वडाली ब्रदर्स के गाए इस वर्ज़न में तो उन्होने इसका नज़रिया ही बिल्कुल बदल के रख दिया है। चलिए सुनते हैं इस रूहानी रचना को।

गीत - याद पिया की आए


सजीव - "याद पिया की आए" की तरह एक और पारम्परिक रचना है "दमादम मस्त कलंदर, अली दम दम दे अंदर", जिसे हर दौर में अलग अलग फ़नकारों ने गाए हैं, जैसे कि नूरजहाँ, अबीदा परवीन, रूना लैला, नुसरत फ़तेह अली ख़ान और भी बहुत सारे। 'अमन की आशा' में इस क़व्वाली का जो संस्करण शामिल किया गया है उसे गाया है रफ़ाक़त अली ख़ान ने।
सुजॊय - रफ़ाक़त अली ख़ान पाक़िस्तान के अग्रणी गायक हैं जिनका ताल्लुख़ शाम चौरसी घराने से है। गायन के साथ साथ कई साज़ बजाने में वो माहिर हैं और अपने गीतों में पाश्चात्य साज़ों का भी वो ख़ूब इस्तेमाल करते हैं। तबला, ढोलक, हारमोनियम, इलेक्ट्रिक ड्रम और सीन्थेसाइज़र वो ख़ूब बजा लेते हैं। रफ़ाक़त साहब का जन्म लाहौर में हुअ था। संगीत उन्हे विरासत में ही मिली, पिता उस्ताद नज़ाक़त अली ख़ान, चाचा उस्ताद सलामत अली ख़ान, स्व: उस्ताद नौरत फ़तेह अली ख़ान और जवाहर वत्तल जानेमाने गायक हुए हैं।
सजीव - हाल की उनके दो ऐल्बम 'अल्लाह तेरा शुक्रिया' और 'मान' काफ़ी चर्चित रहे। रफ़ाक़त साहब के पसंदीदा फ़नकारों में लता मंगेशकर, किशोर कुमार, हरीहरन और शंकर महादेवन शामिल हैं।
सुजॊय - रफ़ाक़त अली ख़ान के बारे में एक और दिलचस्प बात यह कि वो जिम्नास्टिक्स में यूनिवर्सिटी व नैशनल चैम्पियन रह चुके हैं। तो आइए सुनते हैं यह मशहूर पारम्परिक उर्दू सूफ़ी क़लाम।

गीत - दमादम मस्त कलंदर


सजीव - और अब इस ऐल्बम का शीर्षक गीत पेश है शंकर महादेवन और राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ों में। गुलज़ार साहब के लिखे इस गीत को 'अमन की आशा' मिशन का ऐंथेम माना जा रहा है।
सुजॊय - "नज़र में रहते हो जब तुम नज़र नहीं आते, ये सुर बुलाते हैं जब तुम इधर नहीं आते"। २ मिनट का यह गीत दरअसल एक ऐंथेम की तरह ही है, सीधे सादे बोल लेकिन गहरा भाव छुपा हुआ है, शांति का प्रस्ताव भी है, अमन की आशा भी है। शंकर और राहत साहब के अपने अपने अनोखे अंदाज़ से इसमें एक जो कॊण्ट्रस्ट पैदा हुआ है, वही इसकी खासियत है।
सजीव - इस गीत को सुनने से पहले हम बस यही कहेंगे अपने पाठकों व श्रोताओं को कि यह ऐल्बम एक मास्टर पीस ऐल्बम है और अच्छे संगीत के क़द्रदान इसे ज़रूर ख़रीदें। यह उपलब्ध है टाइम्स म्युज़िक पर।
सुजॊय - सभी को एक बार फिर से होली की ढेरों शुभकामनाएँ देते हुए हम अमन और शांति की आशा करते हैं।

नज़र में रहते हो (अमन की आशा)


"अमन की आशा" के संगीत को आवाज़ रेटिंग *****
भाई अब जहाँ ऐसे ऐसे फनकार होंगें उस अल्बम की समीक्षा कोई क्या करे, अल्बम का हर गीत अपने आप में बेमिसाल है, खासकर आबिदा के कुछ जबरदस्त सूफी गीतों को इसमें स्थान दिया गया है. संगीत प्रेमियों के लिए अति आवश्यक है ये अल्बम, हर हाल में खरीदें सुनें.

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # २६- अभी हाल में वडाली ब्रदर्स ज़ी टीवी के किस कार्यक्रम में अतिथि बन कर पधारे थे?
TST ट्रिविया # २७ आबिदा की किस अल्बम पर पीटर मार्श ने टिपण्णी की थी कि वो शौपिंग लिस्ट भी गाकर श्रोताओं को रुलाने की कुव्वत रखती है ?
TST ट्रिविया # २८ अभी हाल ही में देविका पंडित की कौन सी अलबम बाजार में आई है


TST ट्रिविया में अब तक -
सीमा जी ने जबरदस्त वापसी की है सभी सवालों का सही जवाब देकर, बधाई

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