गुरुवार, 23 जुलाई 2009

ये हवा ये रात ये चांदनी...सज्जाद हुसैन का संगीतबद्ध एक नायाब गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 150

'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल दिन-ब-दिन, कड़ी दर कड़ी आगे बढ़ती चली जा रही है दोस्तों। यह आप सब का प्यार और पुराने फ़िल्म संगीत में आप की दिलचस्पी ही है कि इस शृंखला की रोचकता में ज़रा सी भी कमी नहीं आयी है। आज इस शृंखला ने पूरे किए पूरे १५० दिन! आप सब का प्यार युंही बना रहे, तो हम आगे भी आप के पसंदीदा गीतों के इस महफ़िल को युंही रोशन करते रहेंगे। दरअसल यह महफ़िल रोशन है गुज़रे ज़माने के उन लाजवाब कलाकारों की अपार मेहनत और लगन की वजह से जिन्होने फ़िल्म संगीत के धरोहर को समृद्ध किया, उसमें बेशुमार मोतियाँ जड़ें। आज यह धरोहर एक विशाल अनमोल ख़ज़ाने का रूप ले चुकी है, और इसी ख़ज़ाने से चुन चुन कर हम मोतियाँ निकाल कर ला रहे हैं हर रोज़ आप के लिए। आज इस शृंखला की १५० वीं कड़ी के लिए हमने जो गीत चुना है वो फ़िल्म संगीत का एक सदाबहार नग़मा है। इसके संगीतकार ने अपने पूरे जीवन में केवल १४ फ़िल्मों में संगीत दिया है, लेकिन इन १४ फ़िल्मों में उन्होने कुछ ऐसा काम कर दिखाया है कि आज ५० साल बाद भी वो ज़िंदा हैं अपने रचे उन तमाम कालजयी संगीत की वजह से। हम बात कर रहे हैं संगीतकार सज्जाद हुसैन की, और आज आप को सुनवा रहे हैं उन्ही के संगीत निर्देशन में तलत महमूद का गाया १९५२ की फ़िल्म 'संगदिल' का गाना "ये हवा ये रात ये चांदनी, तेरी इक अदा पे निसार है, मुझे क्यों न हो तेरी आरज़ू तेरी जुस्तजू में बहार है"। फ़िल्म 'संगदिल' के इस गीत को सज्जाद साहब के सब से ज़्यादा लोकप्रिय गीतों में से माना जाता है। आज कोई फ़िल्म 'संगदिल' की बात करे, या फिर सज्जाद साहब की बात करें, एक ही बात है।

दिलीप कुमार और मधुबाला अभिनीत फ़िल्म 'संगदिल' एक अद्‍भुत प्रेम कहानी थी, जिसका निर्माण और निर्देशन आर. सी. तलवार ने किया था। आज के इस प्रस्तुत गीत को याद करते हुए सज्जाद साहब के दोस्त और हास्य अभिनेता जगदीप ने अमीन सायानी को दिये एक साक्षात्कार में कहा था - "सज्जाद साहब का यह मानना था कि ये अंग्रेज़ी साज़ जो है ना, बहुत ज़्यादा ज़रूरी नहीं है, उनको अपने साज़ों पर बड़ा ऐतबार था, हिंदुस्तानी साज़ों पर, मैंडोलीन को उन्होने वीणा बना दिया था। तो उन्होने 'संगदिल' फ़िल्म में, कहा, "बेटा मैने क्या किया, दो सारंगियाँ ली और दो 'माइक्स' रखे, और दोनों को उनके सामने बजा दिया, ऐसी धमक पैदा हुई जो हज़ारों वायलीन में भी नहीं पैदा हो सकती"।" दोस्तों, यह गीत तलत साहब का भी पसंदीदा नग़मा है। इस गीत को गाये बग़ैर वो अपना कोई भी शो ख़तम नहीं कर सकते थे। सज्जाद साहब के बारे में यह बात मशहूर थी कि वो किसी गीत की रिकॉर्डिंग में तब तक री-टेक करते रहते थे जब तक कि हर एक साज़िंदा या गायक पूरे 'पर्फ़ेक्शन' से साथ बजा या गा न लें। 'संगदिल' फ़िल्म के प्रस्तुत गीत के लिए कुल १७ री-टेक हुए थे। इस गीत के साथ सज्जाद साहब की बातें कुछ इस क़दर जुड़ी हुई हैं कि हम अक्सर इसके गीतकार को याद करना भूल जाते हैं। गीतकार राजेन्द्र कृष्ण ने इस गीत को लिखा था और क्या ख़ूब लिखा था साहब! इसमें कोई दोराय नहीं होनी चाहिये कि सज्जाद और तलत साहब के साथ साथ राजेन्द्र जी का भी इस गीत की कामयाबी में पूरा पूरा हक़ बनता है। तो सुनिये यह गीत और एक बार फिर से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की १५०-वीं कड़ी के मौके पर इस शृंखला से जुड़े सभी श्रोताओं और पाठकों को हमारी तरफ़ से हार्दिक धन्यवाद!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा दूसरा (पहले गेस्ट होस्ट हमें मिल चुके हैं शरद तैलंग जी के रूप में)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. ओल्ड इस गोल्ड के १५१ वें एपिसोड से शुरू हो रही है रफी साहब पर विशेष शृंखला जो आधारित होगी अलग अलग अदाकारों के लिए किये उनके पार्श्वगायन पर.
2. इस कड़ी में हमारे पहले अदाकार होंगे - "शम्मी कपूर".
3. इस गीत के पहले चार शब्दों से प्रेरित होकर एक नयी फिल्म का नाम रखा गया था, जिसमें आमिर और माधुरी दिक्षित ने काम किया था.

इससे पहले कि हम कल के परिणाम बताएं एक ज़रूरी सूचना देना चाहेंगे, इस पहेली के जवाब वाला गीत कल के स्थान पर परसों यानी २५ तारिख को पेश होगा. कल के लिए हमें कुछ विशेष योजना बनायीं है, सुजोय जी हमें १५० शामों से लगातार गीत सुनवा रहे हैं, तो खुश होकर हमारे कुछ श्रोताओं ने सोचा कि १५० एपिसोड पूरे होने की ख़ुशी में कल सुजोय जी को कुछ ख़ास सुनाया जाए. अब ये कौन से श्रोता हैं और वो क्या सुनाएगें ये तो हम कल ही बतायेंगें. सुजोय जी को दी जा रही इस "सरप्राईस" पार्टी में आप सब भी सादर आमंत्रित हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
स्वप्न जी ४० का आंकडा छू लिया है आपने, निर्विरोध एकदम, बधाई...दिलीप जी, शरद जी, मनु जी, पराग जी, राज जी, दिशा जी, सुमित जी और अन्य सभी श्रोताओं से अनुरोध है कि आप सब कल की ख़ास महफिल में जरूर आयें.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

एक दिल से दोस्ती थी ये हुज़ूर भी कमीने...विशाल भारद्वाज का इकरारनामा

ताजा सुर ताल (12)

त्मावलोकन यानी खुद के रूबरू होकर बीती जिंदगी का हिसाब किताब करना, हम सभी करते हैं ये कभी न कभी अपने जीवन में और जब हमारे फ़िल्मी किरदार भी किसी ऐसी अवस्था से दोचार होते हैं तो उनके ज़ज्बात बयां करते कुछ गीत भी बने हैं हमारी फिल्मों में, अक्सर नतीजा ये निकलता है कि कभी किस्मत को दगाबाज़ कहा जाता है तो कभी हालतों पर दोष मढ़ दिया जाता है कभी दूसरों को कटघरे में खडा किया जाता है तो कभी खुद को ही जिम्मेदार मान कर इमानदारी बरती जाती है. रेट्रोस्पेक्शन या कन्फेशन का ही एक ताजा उदाहरण है फिल्म "कमीने" का शीर्षक गीत. फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ जिंदगी को तो बा-इज्ज़त बरी कर दिया है और दोष सारा बेचारे दिल पर डाल दिया गया है, देखिये इन शब्दों को -

क्या करें जिंदगी, इसको हम जो मिले,
इसकी जाँ खा गए रात दिन के गिले....
रात दिन गिले....
मेरी आरजू कामिनी, मेरे ख्वाब भी कमीने,
एक दिल से दोस्ती थी, ये हुज़ूर भी कमीने...


शुरू में ये इजहार सुनकर लगता है कि नहीं ये हमारी दास्तान नहीं हो सकती, पर जैसे जैसे गीत आगे बढता है सच आइना लिए सामने आ खडा हो जाता है और कहीं न कहीं हम सब इस "कमीनेपन" के फलसफे में खुद को घिरा हुआ पाते हैं -

कभी जिंदगी से माँगा,
पिंजरे में चाँद ला दो,
कभी लालटेन देकर,
कहा आसमान पे टांगों.
जीने के सब करीने,
थे हमेशा से कमीने,
कमीने...कमीने....
मेरी दास्ताँ कमीनी,
मेरे रास्ते कमीने,
एक दिल से दोस्ती थी, ये हुज़ूर भी कमीने...

शायद ही किसी हिंदी गीत में "कमीने" शब्द इस तरह से प्रयोग हुआ हो, शायद ही किसी ने कभी गीत जिंदगी का इतना बोल्ड अवलोकन किया हो. इस डार्क टेक्सचर के गीत में तीन बातें है जो गीत को सफल बनाते है. विशाल ने इस गीत के जो पार्श्व बीट्स का इस्तेमाल किया है वो एकदम परफेक्ट है गीत के मूड पर, अक्सर स्वावलोकन में जिंदगी बेक गिअर में भागती है, कई किरदार कई, किस्से और संगीत संयोजन शब्दों के साथ साथ एक अनूठा सफ़र तय करता है, दूसरा प्लस है विशाल की खुद अपनी ही आवाज़ जो एक दम तटस्थ रहती है भावों के हर उतार चढावों में भी इस आवाज़ में दर्द भी है और गीत के "पन्च" शब्द 'कमीने' को गरिमापूर्ण रूप से उभारने का माद्दा भी और तीसरा जाहिर है गुलज़ार साहब के बोल, जो दूसरे अंतरे तक आते आते अधिक व्यक्तिगत से हो जाते हैं -

जिसका भी चेहरा छीला,
अन्दर से और निकला,
मासूम सा कबूतर,
नाचा तो मोर निकला,
कभी हम कमीने निकले,
कभी दूसरे कमीने,
मेरी दोस्ती कमीनी,
मेरे यार भी कमीने...
एक दिल से दोस्ती थी,
ये हुज़ूर भी कमीने....

अब हमारा अवलोकन किस हद तक सही है ये तो आप गीत सुनकर ही बता पायेंगें.चलिए अब बिना देर किये सुन डालिए ताजा सुर ताल में फिल्म "कमीने" का ये गीत -



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं. फिल्म "ओमकारा" में भी संगीतकार विशाल ने एक युगल गीत को आवाज़ दी थी, कौन सा था वो गीत, बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब था अध्ययन सुमन जो कि टेलीविजन ऐक्टर शेखर सुमन के बेटे हैं. दिशा जी ने एकदम सही जवाब दिया जी हाँ उन्होंने फिल्म राज़ (द मिस्ट्री) में भी काम किया था, और तभी से महेश भट्ट कैम्प के स्थायी सदस्य बन चुके हैं. तनहा जी ने फिल्म "हाले-ए- दिल" का भी जिक्र किया. त्रुटि सुधार के लिए आप दोनों का धन्येवाद. मंजू जी, मनीष जी, निर्मला जी, प्रज्ञा जी ने भी गीत को पसंद किया. मनु जी रेटिंग आपने लिख कर बतानी है जैसे 5 में से 3, २ या १ इस तरह.:) वर्ना हम कैसे जान पायेंगें कि आपकी रेटिंग क्या है.


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

बुधवार, 22 जुलाई 2009

सूरज रे जलते रहना... सम्पूर्ण सूर्य ग्रहण के एतिहासिक अवसर पर सूर्य देव को नमन

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 149

दोस्तों, आज सुबह सुबह आप ने बहुत दिनों के बाद सम्पूर्ण सूर्य ग्रहण का नज़ारा देखा होगा। आप में से बहुत से लोग अपनी आँखों से इस अत्यंत मनोरम खगोलीय घटना को देखा होगा, और बाक़ी टीवी के परदे पर इसे देख कर ही संतुष्ट हुए होंगे! यूं तो सूर्य ग्रहण साल में कई बार आता है, लेकिन सम्पूर्ण सूर्य ग्रहण की बारी यदा कदा ही आती है। सम्पूर्ण सूर्य ग्रहण वैज्ञानिक दृष्टि से बेहद महत्व रखता है क्युंकि सूर्य से संबधित कुछ ऐसे शोध करने के अवसर मिल जाते हैं जो सूर्य की तेज़ रोशनी की वजह से आम दिनों में संभव नहीं हो पाती। दोस्तों, संगीत के इस मंच पर विज्ञान का पाठ पढ़ा कर मैं आप को और ज़्यादा बोर नहीं करूँगा, अब मैं सीधे आ जाता हूँ आज के गीत पर। हमने यह सोचा कि इस सम्पूर्ण सूर्य ग्रहण को यादगार बनाते हुए क्यों न आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' भी सूर्य देव के ही नाम कर दिया जाये। तब सूर्य देव के उपर बनने वाले तमाम गीतों को ज़हन में लाते हुए हमारी नज़र जिस गीत पर जा कर रुक गयी और हमें ऐसा लगा कि इस गीत से बेहतर आज के दिन के लिए दूसरा कोई गीत हो ही नहीं सकता, वह गीत है "जगत भर की रोशनी के लिए, करोड़ों की ज़िंदगी के लिए, सूरज रे जलते रहना, सूरज रे जलते रहना"। हेमन्त कुमार की गुरु-गम्भीर स्वर में यह गीत फ़िल्म 'हरीशचन्द्र तारामती' का है। हमें पूरा विश्वास है कि आज के दिन आप इस गीत को खुले दिल से स्वीकार करेंगे।

१९६३ में बनी थी फ़िल्म 'हरीशचन्द्र तारामती', जिसका निर्माण व निर्देशन किया था बी. के. आदर्श ने। फ़िल्म में राजा हरीशचन्द्र की भूमिका में थे पृथ्वीराज कपूर, और जयमाला थीं रानी तारामती की भूमिका में। फ़िल्म में संगीत दिया लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने और गानें लिखे कवि प्रदीप ने। प्रस्तुत गीत में कवि प्रदीप ने भले ही सूर्य की महानता का गुणगान किया है, लेकिन इसके पीछे छुपे जिस भाव को वो उजागर करना चाहते हैं वह यह है कि हर मनुष्य को अपने जीवन में ऐसे पथ पर चलना चाहिये जिससे जगत का कल्याण हो, मानवता का विकास हो, ठीक वैसे ही जैसे सूरज ख़ुद आग में जलकर पूरे संसार को रोशनी प्रदान करता है, जीवन प्रदान करता है। इस गीत को बड़े ध्यान से सुनिएगा दोस्तों, इसका एक एक शब्द एक एक अनमोल मोती के बराबर है। यह गीत एक सुंदर कविता है जो हमें थोड़े से ही शब्दों में ज़िंदगी जीने का सही और सर्वोत्तम तरीका सीखा जाती है। इसके बोल इतने सुंदर हैं कि मैं अपने आप को रोक नहीं सका, और इसके पूरे बोल नीचे लिख रहा हूँ।

जगत भर की रोशनी के लिए,
करोड़ों की ज़िंदगी के लिए,
सूरज रे जलते रहना, सूरज रे जलते रहना।

जगत कल्याण की ख़ातिर तू जन्मा है,
तू जग के वास्ते हर दुख उठा रे,
भले ही अंग तेरा भस्म हो जाये,
तू जल जल के यहाँ किरणें लुटा रे,
लिखा है यही तेरे भाग में,
के तेरा जीवन रहे आग में,
सूरज रे जलते रहना, सूरज रे जलते रहना।

करोड़ों लोग पृथ्वी के भटकते हैं,
करोड़ों आंगनों में है अंधेरा,
अरे जब तक न हो घर घर में उजियाला,
समझ ले है अधूरा काम तेरा,
जगत उद्धार में अभी देर है,
अभी तो दुनिया में अंधेर है,
सूरज रे जलते रहना, सूरज रे जलते रहना।


कवि प्रदीप, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, और हेमन्त कुमार के इस असाधारण गीत को आज हम समर्पित कर रहे हैं सूर्य देव के नाम, और साथ ही सभी से विनम्र निवेदन है कि इस गीत से ज़रूर शिक्षा ग्रहण करें, और मानव कल्याण के पथ पर ही अपने जीवन को आगे बढ़ायें।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा दूसरा (पहले गेस्ट होस्ट हमें मिल चुके हैं शरद तैलंग जी के रूप में)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. संगीतकार सज्जाद हुसैन को समर्पित है ओल्ड इस गोल्ड का १५० वां एपिसोड.
2. राजेंद्र कृष्ण ने लिखा है इस गीत को.
3. मुखड़े में शब्द है -"चांदनी".

पिछली पहेली का परिणाम -
अदा जी एक बार फिर सही जवाब, शरद जी के बाद तो लगता है आपका मैदान साफ़ हो गया, कोई भी आपको चुनौती ही नहीं दे पा रहा (38 अंक). दिशा जी कल फिर चूक गयी, और अनु गुप्ता जी भी. मंजू जी का जवाब सही है पर आने में देर कर दी. पराग जी, शरद जी, दिलीप जी, सुमित जी और निर्मला जी ने गीत का आनंद लिया, आज मुकेश जी की जयंती भी है, तो सूर्य देव के साथ उन्हें भी याद कर लिया जाए...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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