शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

वो इश्क जो हमसे रूठ गया........महफ़िल-ए-जाविदा और "फ़रीदा"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२६

ब कुछ आपकी उम्मीद के जैसा हो, लेकिन ज्यादा कुछ आपकी उम्मीद से परे, तो किंकर्तव्यविमुढ होना लाज़िमी है। ऐसा हीं कुछ हमारे साथ हो रहा है। इस बात का हमें फ़ख्र है कि हम महफ़िल-ए-गज़ल में उन फ़नकारों की बातें करते हैं,जिनका मक़बूल होना उनका और हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और यही कारण है कि हमें अपने पाठकों और श्रोताओं से ढेर सारी उम्मीदें थीं और अभी भी हैं। और इन्हीं उम्मीदों के दम पर महफ़िल-ए-गज़ल की यह रौनक है। हमने सवालों का दौर यह सोचकर शुरू किया था कि पढने वालों की याददाश्त मांजने में हम सफल हो पाएँगे। पिछली कड़ी से शुरू की गई इस मुहिम का रंग-रूप देखकर कुछ खुशी हो रही है तो थोड़ा बुरा भी लग रहा है। खुशी का सबसे बड़ा सबब हैं "शरद जी" । जब तक उन्हें "एपिसोड" वाली कहानी समझ नहीं आई, तब तक उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और हर बार जवाबों का पिटारा लेकर हीं हाज़िर हुए। हमें यह बात बताने में बड़ी खुशी हो रही है कि शरद जी ने पहली बार में हीं सही जवाब दे दिया और ४ अंकों के हक़दार हुए। चूँकि इनके अलावा कोई भी शख्स मैदान में नहीं उतरा इसलिए ३ अंक और २ अंकों वाले स्थान खाली हीं रहे। और यही बात है जो थोड़ी विचारणीय है। आखिर क्या कारण है कि हमारे पाठक फूर्ति नहीं दिखा रहे। भाई! कम से कम गज़लों को सुनने के बहाने हीं पिछली कड़ियों का एक चक्कर लगा लिया करें। कुछ भूली-बिसरी जानकारियाँ मिल जाएँगी और आपको इन सवालों का जवाब भी मिल जाएगा। इसी उम्मीद के साथ कि इस बार ज़्यादा लोग रूचि दिखाएँगे, आज की प्रक्रिया शुरू करते हैं। २५ वें से २९ वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद ३ अंक और उसके बाद हर किसी को २ अंक मिलेंगे। जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है,मतलब कि उससे जुड़ी बातें किस अंक में की गई थी। इन ५ कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की तीन गज़लों की फरमाईश कर सकता है, जिसे हम ३०वीं से ३५वीं कड़ी के बीच में पेश करेंगे। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) गुलज़ार के प्रिय एक फ़नकार जिन्होंने पंचम दा के लिए "दम मारो दम" और "चुरा लिया है" में गिटार बजाकर अपनी संगीत-यात्रा की शुरूआत की।
२) गुमनाम, क़ातिल, सरफ़रोश जैसी पाकिस्तानी फ़िल्मों में अपनी गायकी का हुनर दिखाने वाली इस फ़नकारा ने ज़नरल ज़िया उल हक़ के शासन के दौरान "फ़ैज़" के कई सारे क्रांतिकारी कलाम गाए।


इन सवालों के बाद अब आज की गज़ल की ओर रूख करते हैं। आज की गज़ल और गज़ल से जुड़ी फ़नकारा मानो एक दूसरे के पूरक हैं। जहाँ भी इस गज़ल का ज़िक्र होता है, वहाँ अनकहे हीं इन फ़नकारा का नाम ज़ाहिर हो जाता है और जहाँ भी इन फ़नकारा का नाम लिया जाता है, वहाँ इनके नाम को मुकम्मल करने के लिए इस गज़ल की चर्चा लाज़िमी हो जाती है। यूँ तो इन फ़नकारा का सबसे मक़बूल कलाम है "आज जाने की ज़िद्द ना करो" ,लेकिन अगर गज़ल की बात करें तो आज की गज़ल इनकी गज़लों की फ़ेहरिश्त में सबसे ऊपर आएगी। "बुलबुल-ए-पंजाब" मुख्तार बेगम की छोटी बहन "फ़रीदा खानुम" को अगर "मल्लिका-ए-गज़ल" कहें तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। और यकीं मानिए यह उपाधि कोई हमने यूँ हीं बातों-बातों में नहीं दे दी है, बल्कि हुनर-पसंद दुनिया इन्हें इसी नाम से जानती है। इनकी गज़ल-गायकी का अंदाज़ औरों से काफ़ी अलग है,इनकी आवाज़ में एक हल्का-सा भारीपन गज़लों के असर को कई गुना बढा देता है। यूँ तो गज़लें इनकी प्राथमिकता हैं, लेकिन गज़लों के अलावा भी इन्होंने कई सारे पंजाबी लोकगीत गाए हैं। कुछ गीत जो खासे चर्चित हुए,उनमें "बल्ले-बल्ले तोर पंजाबन दी" और "मैंने पाँव में पायल पहने हीं नहीं" ऊपर आते हैं। इन्होंने न सिर्फ़ उर्दू और पंजाबी में गज़लें गाई हैं, बल्कि "फारसी" और "पस्तो" भाषाओं पर भी इनका बराबर अधिकार रहा है। जहाँ तक पुरस्कारों की बात है तो हिन्दुस्तान में क्लासिकल और सेमि-क्लासिकल गानों वालों के लिए दिया जाने वाला सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार "हाफ़िज़ अली खां अवार्ड" आज तक बस दो हीं पाकिस्तानियों के हिस्से में आया है। १९९६ में इस पुरस्कार से बाबा नुसरत फतेह अली खान को नवाज़ा गया था और सन् २००५ में "फ़रीदा खानुम" को इस पुरस्कार के लिए चुना गया , संयोग देखिए कि उसी साल जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के हाथों इन्हें "हिलाल-ए-इम्तियाज़" से नवाज़ा गया, जो पाकिस्तान का सबसे बड़ा "सिविलियन" सम्मान है। "अमृतसर" में जन्मी, "कलकत्ता" में पली-बढी(कहीं-कहीं यह क्रम उल्टा भी दर्ज़ है, इसलिए यकीनन नहीं कह सकता) और बंटवारे के बाद "रावलपिंडी" में संगीत का नाम रौशन करने वाली इस मल्लिका ने विवाहोपरांत "लाहौर" को अपने घर के रूप में चुना और आज तक वहीं हैं। संगीत की साधना अभी भी जारी है। खुदा से यही दुआ है कि यह "रियाज़" कभी बंद न हो! आमीन!

यह तो हुई "फ़नकारा" की बात, अब ज़रा "शायर" से मुखातिब हुआ जाए। कभी-कभी कुछ ऐसे शायर हो जाते हैं(या फिर ज्यादातर ऐसे हीं होते हैं), जो भले हीं अपना नाम न कर पाए हों,लेकिन उनकी कोई न कोई गज़ल लोगों के जुबान पर जम हीं जाती है। आज के शायर की हक़ीक़त भी कुछ ऐसी हीं है। अंतर्जाल पर इनके बारे में ज्यादा सामग्री नहीं है और जो भी है वह बस इनके गज़लों की फ़ेहरिश्त मात्र है। "कभी साया है, कभी धूप मुकद्दर मेरा", "लम्हों के अज़ाब सह रहा हूँ", "सोचते और जागते साँसों का एक दरिया हूँ मैं", "इतने दिनों के बाद तू आया है आज" और "वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया" -बस इतनी हीं गज़लें हैं जो इनके नाम के साथ दर्ज़ हैं। आज हम इन्हीं गज़लों में से एक "वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया" सुनाने जा रहे हैं। इस गज़ल के गज़लगो हैं जनाब "अतर नफ़ीस"। मुझे नहीं मालूम कि पाकिस्तान में इनका कैसा रूतबा है, लेकिन इस बात का यकीन दिला सकता हूँ कि इनकी इस गज़ल की मक़बूलियत कमाल की है। ज़रा इस गज़ल के बोलों पर ध्यान देंगे -" वो इश्क जो हमसे रूठ गया, अब उसका हाल बताएँ क्या, कोई मेहर नहीं, कोई कहर नहीं , फिर सच्चा शेर सुनाएँ क्या।" इस मतले में "महबूब" से जो शिकायत की गई है, वह काबिल-ए-तारीफ़ है। जनाब इस बात का शोक मना रहे हैं कि उनका इश्क उनसे रूठ गया है और इसलिए हाल बताने लायक कुछ बचा नहीं। लेकिन जब उनसे कोई इस बात की दरख्वास्त करता है कि इसी बात पर कोई शेर सुना दिया जाए, तो वो कहते हैं कि "रूठने" की इस प्रकिया में ना कोई "दिल टूटने का दर्द" चस्पां है और ना हीं कोई "मज़ेदार किस्सा" तो फिर शेर बनाएँ तो कैसे और अगर शेर बना भी लिया तो उसमें "सच्चाई" तो होगी नहीं। इसे अगर दूसरी तरह से समझे तो माज़रा यह बनता है कि "महबूब के रूठने के बाद उनकी ज़िंदगी में ना कोई मेहर है और ना हीं कोई कहर यानि कि जीने लायक कोई ज़िंदगी हीं नहीं बची, इसलिए इस बेमतलब की ज़िंदगी के ऊपर कोई सच्चा शेर कैसे सुनाया जा सकता है।" दोनों हीं अर्थों में "महबूब" से हिज्र को बड़ी हीं खूबसूरती से दर्शाया गया है। इस गज़ल के बाकी शेरों में भी ऐसा हीं अनोखापन है। इस गज़ल की ओर बढने से पहले क्यों ना हम "अतर" साहब का एक शेर देख लें:

ऐ सरापा रंग-ओ-निखत तू बता,
किस धनक से तेरा पैराहन बुनूँ।


चलिए अब थोड़ा भी देर किए बिना आज की गज़ल से रूबरू होते हैं। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया, अब उसका हाल बताएँ क्या,
कोई मेहर नहीं, कोई कहर नहीं, फिर सच्चा शेर सुनाएँ क्या।

एक हिज़्र जो हमको ला-हक है, ता-देर उसे दुहराएँ क्या,
वो जहर जो दिल में उतार लिया, फिर उसके नाज़ उठाएँ क्या।

एक आग ग़म-ए-तन्हाई की, जो सारे बदन में फैल गई,
जब जिस्म हीं सारा जलता हो, फिर दामने-दिल को बचाएँ क्या।

हम नगमा-सरा कुछ गज़लों कें, हम सूरत-गर कुछ ख्वाबों के,
ये जज्बा-ए-शौक सुनाएँ क्या, कोई ख्वाब न हों तो बताएँ क्या।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

मैं ____ भी हूँ मोती भी हूँ ग़ोताज़न भी
कोई भी नाम मेरा लेके बुला ले मुझको

आपके विकल्प हैं -
a) दरिया, b) समंदर, c) साहिल, d) मांझी

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-
पिछली महफिल का सही शब्द था -"शहर" और सही शेर कुछ यूं था -

इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटी महिफ़लें,
हर शख्स तेरा नाम ले हर शख्स दीवाना तेरा...

इब्न-ए-इंशा के इस शेर को सबसे पहले सही पकडा एक बार फिर शरद जी ने, बधाई जनाब -

अब नए शहरों के जब नक्शे बनाए जाएंगे
हर गली बस्ती में कुछ मरघट दिखाए जाएंगे ।
गैर मुमकिन ये कि हम फुटपाथ पर भी चल सकें
क्योंकि हर फुटपाथ पर बिस्तर बिछाए जाएंगे ।

क्या बात है शरद जी, जहां के दर्द को बड़ी हीं खूबसूरती से दर्शाया है आपने।
दिशा जी महफ़िल में आईं तो ज़रूर, लेकिन गलत शब्द चुन लिया।
मिलिंद जी आपका स्वागत है महफ़िल-ए-गज़ल के इस मुहिम में। आपका शेर कुछ यूँ था:

सीने में जलन, आँखों में तूफ़ानसा क्यों है ?
इस शहर में हर शक्स परेशानसा क्यों है?

अगली कोशिश में दिशा जी ने सही शब्द पकड़ा। कोई बात नहीं- देर आयद, दुरूस्त आयद:

इस शहर में हर कोइ अज़नबी लगता है
भीड़ में भी हर मंजर सूना दिखता है
कहूँ तो कहूँ किससे बात अपनी
मुझे हर शख्स यहाँ बहरा लगता है...

मन्जु जी, आपका भी स्वागत है..शब्द तो सही पकड़ा है आपने,लेकिन यही दरख्वास्त रहेगी कि देवनागरी में टंकण करें।
सुमित जी, आप तो हर बार कमाल कर जाते हैं। बस ये दो बार पोस्ट करने की अदा समझ नहीं आती :)

कोई दोस्त है न रकीब है ,
तेरा शहर कितना अजीब है

शुभान-अल्लाह!

मनु जी के तो हम फ़ैन हो गए हैं। वैसे भी हमारे वो बहुत काम आते हैं। मुख्यत: शब्दार्थ बताने के :)

वैसे उनके ये दो शेर भी काबिल-ए-तारीफ़ हैं:

हर मोड़ पे रुसवाइयों का दाम मिला है
पर शहर में तेरे बहुत आराम मिला है..

घर पे आते ही मेरा साया मुझ से यूं लिपटा,
अलग शहर में था दिन भर, अलग-अलग सा रहा..

पूजा जी! आप भी यूँ हीं आती रहिए और महफ़िल का आनंद उठाती रहिए........बस एक गिला है, आप आती तो हैं लेकिन कोई शेर नहीं सुनाती। भला ऐसा क्यों? अगली बार से ऐसा नहीं चलेगा।
बाकी सभी मित्रों से भी अनुरोध है कि महफ़िल की शमा जलाए रखने में हमारे साथ बने रहें। अगली महफ़िल तक के लिए खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

गुरुवार, 2 जुलाई 2009

दिल लगाकर हम ये समझे ज़िंदगी क्या चीज़ है- शक़ील बदायूँनी की दार्शनिक शायरी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 129

"होश वालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है, इश्क़ कीजिये फिर समझिये ज़िंदगी क्या चीज़ है"। जगजीत सिंह की आवाज़ में फ़िल्म 'सरफ़रोश' की यह मशहूर ग़ज़ल तो आप ने बहुत बार सुनी होगी, जिसे लिखा था शायर और गीतकार निदा फ़ाज़ली साहब ने। 1999 में यह फ़िल्म आयी थी, लेकिन इससे लगभग 34 साल पहले गीतकार शक़ील बदायूँनी ने फ़िल्म 'ज़िंदगी और मौत' में एक गीत लिखा था "दिल लगाकर हम ये समझे ज़िंदगी क्या चीज़ है, इश्क़ कहते हैं किसे और आशिक़ी क्या चीज़ है"। आख़िरी अंतरे की अंतिम लाइन है "होश खो बैठे तो जाना बेख़ुदी क्या चीज़ है", जो एक बार फिर से हमारा ध्यान "होश वालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है" की तरफ़ ले जाती है। इसमें कोई शक़ नहीं कि इन दोनों गीतों में अद्‍भुत समानता है, बोलों के लिहाज़ से भी और कुछ हद तक संगीत के लिहाज़ से भी। जिस तरह से कई गीतों का संगीत एक दूसरे से बहुत अधिक मिलता जुलता है, ठीक वैसी ही बहुत सारे गाने ऐसे भी हैं जो लेखनी की दृष्टि से आपस में मिलते जुलते हैं। 1965 की 'ज़िंदगी और मौत' तथा 1999 की 'सरफ़रोश' फ़िल्मों के ये दो गीत इसी श्रेणी में आते हैं। आगे चलकर हम इसी तरह के कुछ और उदाहरण आप के सामने लाते रहेंगे। तो आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल सज रही है महेन्द्र कपूर के गाये फ़िल्म 'ज़िंदगी और मौत' के इसी गीत से। वैसे इस गीत के दो संस्करण हैं, दूसरी आवाज़ आशा भोसले की है। यह फ़िल्म संगीतकार सी. रामचन्द्र के संगीत सफ़र के आख़िरी मशहूर फ़िल्मों में से एक है। यहाँ पर यह बताना ज़रूरी है कि सी. रामचन्द्र ने ही गायक महेन्द्र कपूर को पहला बड़ा ब्रेक दिया था फ़िल्म 'नवरंग' में, जिसमें महेन्द्र कपूर ने आशाजी के साथ कुछ यादगार गीत गाये थे।

1965 की फ़िल्म 'ज़िंदगी और मौत' का निसार अहमद अंसारी ने फ़िल्म का निर्देशन किया था और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे प्रदीप कुमार और फ़रियाल। महेन्द्र कपूर की आवाज़ में यह गीत तो ख़ुद ही सुनेंगे, लेकिन आशा जी वाले वर्ज़न में से तीन अंतरे हम यहाँ आलेख में पेश कर रहे हैं शक़ील साहब की शान में - "बाद मुद्दत के मिले तो इस तरह देखा इधर, जिस तरह एक अजनबी पर अजनबी डाले नज़र, आप ने यह भी ना सोचा दोस्ती क्या चीज़ है", "पहले पहले आप ही अपना बना बैठे हमें, फिर न जाने किस लिये दिल से भुला बैठे हमें, अब हुआ मालूम हमको बेरुख़ी क्या चीज़ है", "प्यार सच्चा है तो मेरा तो देख लेना ऐ सनम, तोड़े देंगे आप ही आकर मेरी ज़ंजीर-ए-ग़म, बंदा परवर जान लेंगे बंदगी क्या चीज़ है"। शक़ील साहब की शायरी की जितनी तरीफ़ की जाए, कम है। उनकी शायरी की तारीफ़ में उन्हीं का शे'र कहना चाहेंगे कि "शक़ील दिल का हूँ तर्जुमा, मोहब्बतो का हूँ राज़दान, मुझे फ़क़्र है मेरी शायरी मेरी ज़ीम्दगी से जुदा नहीं"!




और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. जोड़ी संगीतकार का संगीत।
2. 'ग़रीबों की लता' कहीं जाने वाली गायिका की आवाज़।
3. गीत के बोल फिल्म 'ख़ानदान' के एक गीत से मिलते-जुलते हैं।

पिछली पहेली का परिणाम-
स्वप्न मंजूषा को एक बार और बधाई। अब आप 26 अंकों पर पहुँच गईं, शरद जी अंकों के बिलकुल क़रीब। राज जी, दिशा जी, मंजू जी, मनु जी का धन्यवाद। पराग जी हमेशा की तरह कुछ नायाब लेकर आये हैं। साधुवाद

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

बुधवार, 1 जुलाई 2009

तुमको पिया दिल दिया कितने नाज़ से- कहा मंगेशकर बहनों ने दगाबाज़ से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 128

काश की सुंदरता केवल चाँद और सूरज से ही नहीं है। इनके अलावा भी जो असंख्य सितारे हैं, जिनमें से कुछ उज्जवल हैं तो कुछ धुंधले, इन सभी को एक साथ लेकर ही आकाश की सुंदरता पूरी होती है। यही बात फ़िल्म संगीत के आकाश पर भी लागू होती है। भले ही कुछ फ़नकार बहुत ज़्यादा प्रसिद्ध हुए हों, फ़िल्म संगीत जगत पर छाये रहे हों, लेकिन इनके अलावा भी बहुत सारे गीतकार, संगीतकार और गायक-गायिकायें ऐसे भी थे जिनका इनके मुकाबले नाम ज़रा कम हुआ। लेकिन वही बात कि इन सभी को मिलाकर ही फ़िल्म संगीत सागर अनमोल मोतियों से समृद्ध हो सका है। इन कम चर्चित फ़नकारों के योगदान को अगर अलग कर दिया जाये, फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने से निकाल दिया जाये, तो शायद इस ख़ज़ाने की विविधता ख़त्म हो जायेगी, एकरसता का शिकार हो जायेगा फ़िल्म संगीत संसार। इसीलिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के ज़रिये समय समय पर 'हिंद-युग्म' सलाम करती है ऐसे कमचर्चित फ़नकारों को। आज का गीत भी एक कमचर्चित संगीतकार द्वारा स्वरबद्ध किया हुआ है, जिन्हें हम और आप जानते हैं जी. एस. कोहली के नाम से। कोहली साहब का पूरा नाम था गुरुशरण सिंह कोहली, और उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनका जन्म पंजाब में सन 1928 में हुआ था। धर्म से वो सिख थे लेकिन दाढ़ी-मूँछ उन्होंने नहीं रखी। 1951 में ओ. पी. नय्यर की पहली ही फ़िल्म 'आसमान' से जी. एस. कोहली नय्यर साहब के सहायक बन गये थे, और आगे चलकर उनकी एक से एक 'हिट' फ़िल्मों में उन्होने नय्यर साहब को ऐसिस्ट किया। नय्यर साहब के बहुत से गीतों में कोहली साहब ने शानदार तबला भी बजाये। बतौर स्वतंत्र संगीतकार उनकी पहली फ़िल्म थी 'लम्बे हाथ' (1960)। अपने पूरे कैरीयर में उन्होंने कुछ 10-11 फ़िल्मों में संगीत दिया, लेकिन दो फ़िल्में जिनके संगीत की वजह से लोग उन्हें पहचानते हैं, वो दो फ़िल्में हैं- 'नमस्तेजी' और 'शिकारी', और आज इसी 'शिकारी' से एक सदाबहार नग़मा आप की ख़िदमत में हम लेकर आये हैं।

'शिकारी' 1963 की फ़िल्म थी। 'ईगल फ़िल्म्स' के बैनर तले एफ़. सी. मेहरा ने इस फ़िल्म का निर्माण किया था, कहानी सुरिंदर मेहरा की थी, पटकथा ब्रजेन्द्र गौड़ का, और निर्देशन मोहम्मद हुसैन का। अजीत और रागिनी अभिनीत इस छोटी फ़िल्म को आज अगर याद किया जाता है तो केवल इसके गानों की वजह से। इस फ़िल्म में चार गाने लिखे फ़ारूख़ क़ैसर ने और दो गानें क़मर जलालाबदी ने भी लिखे। इस फ़िल्म का जो सब से मशहूर गीत है वह है लता मंगेशकर और उषा मंगेशकर की आवाज़ों में। क़ैसर साहब के लिखे इस गीत का शुमार सर्वाधिक कामयाब 'फ़ीमेल डुएट्स' में होता है। "तुम को पिया दिल दिया कितने नाज़ से" गीत की कामयाबी का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इस गीत के बनने के 40 साल बाद, यानी कि हाल ही में इस गीत का रीमिक्स बना और वह भी ख़ूब चला। लेकिन अफ़्सोस की बात यह है कि इस गीत के मूल संगीतकार को न तो इसका कोई श्रेय मिल सका और न ही उस समय उन्हें किसी फ़िल्मकार ने बड़ी बजट की कोई फ़िल्म दी। हालाँकि इस गीत को परदे पर मैंने कभी देखा नहीं है, लेकिन गीत के बोलों को सुनकर गीत को सुनकर यह कोई मुजरा गीत जान पड़ता है। अगर मैं ग़लत हूँ तो ज़रूर संशोधन कर दीजियेगा। अब बस यह बताते हुए कि लता और उषा, इन दो बहनों ने एक साथ सब से पहले फ़िल्म 'आज़ाद' में गाया था। याद है न आप को वह "अपलम चपलम" वाला गीत! यह गीत भी आगे चलकर हम ज़रूर सुनवाने की कोशिश करेंगे, फ़िल्हाल सुनिये जी. एस कोहली और फ़ारूख़ क़ैसर की याद में फ़िल्म 'शिकारी' का यह दिलकश नग़मा।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. गीत के गायक ने 'नवरंग' फिल्म में भी गाने गाये हैं।
2. इस गीत को आशा भोसले ने भी गाया है।
।3. गीत के बोल 1999 में आई फिल्म 'सरफरोश' की ग़ज़ल से मिलते-जुलते हैं।

पिछली पहेली का परिणाम-
कल भी काँटे की टक्कर रही। स्वप्न मंजूषा 2 मिनट आगे रहीं। बधाई। स्वप्न मंजूषा बहुत तेज़ी से शरद जी के 30 अंकों के करीब बढ़ रही हैं। आपके 24 अंक हो गये हैं। शरद जी, मंजू और मनु जी, इसी तरह से हमारी महफिल को गुलज़ार करते रहें। पराग जी, आपके उस आलेख का हमें भी इंतज़ार रहेगा।

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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