मंगलवार, 2 जून 2009

एक हीं बात ज़माने की किताबों में नहीं... महफ़िल-ए-ज़ाहिर और "फ़ाकिर"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१७

कुछ गज़लें ऐसी होती हैं,जिन्हें आप हर दिन सुनते हैं,हर पल सुनना चाहते हैं, और बस सुनते हीं नहीं, गुनते भी हैं,लेकिन आपको उस गज़ल के गज़लगो की कोई जानकारी नहीं होती। कई सारे लोग तो उस गज़ल के गायक को हीं "गज़ल" का रचयिता माने बैठे होते हैं। "जगजीत सिंह" साहब की ऐसी हीं एक गज़ल है- "वो कागज़ की कस्ती,वो बारिश का पानी"- मेरे मुताबिक हर किसी ने इस गज़ल को सुना होगा, मैंने भी हज़ारों बार सुना है। लेकिन इसके गज़लगो, इसके शायर का नाम मुझे तब पता चला, जब उस शायर ने अपनी अंतिम साँस ले ली। जिस तरह पिछले अंक में मैंने "खुमार" साहब के बारे में कहा था कि वे हमेशा "गुमनाम" हीं रहे, आज के शायर के बारे में भी मैं ऐसा हीं कुछ कहना चाहता हूँ। लेकिन हाँ ठहरिये, इतनी सख्त बात कहने की गुस्ताखी मैं आज नहीं करूँगा। दर-असल हर शायर का अपना प्रशंसक-वर्ग होता है, जिसके लिए वह शायर कभी "गुमनाम" नहीं होता। शायद ऐसे हीं एक प्रशंसक(नाम जानने के लिए पिछले अंक की टिप्पणियों को देखें) को मेरी बात बुरी लग गई। इसलिए आज के शायर के बारे में मैं इतना हीं कहूँगा कि महानुभाव मेरी(और लगभग सभी की) नज़र में बहुत हीं ऊँचा ओहदा रखते हैं, लेकिन यह दुनिया की बदकिस्मती थी कि वह इनको उतना न जान सकी,जितने रूतबे के ये हक़दार थे। "थे" इसलिए कहा, क्योंकि वह शायर अब स्वर्ग सिधार चुके हैं। "आदमी आदमी को क्या देगा", "अहल-ए-उल्फ़त के हवालों पे हँसी आती है", "हम तो यूँ अपनी ज़िंदगी से मिले", "मेरे दु:ख की कोई दवा न करो", "आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यॊं है", "इश्क़ में गैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया", "किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी", "कुछ तो दुनिया की इनायत ने दिल तोड़ दिया", "शेख जी थोड़ी-सी पीकर आईये", "ज़िंदगी तुझको जिया है कोई अफ़सोस नहीं" - न जाने ऐसी कितनी हीं गज़लों को उन्होंने अपने अंदाज़-ए-बयां से हरा किया है। मुझे यकीन है कि इन सारी मशहूर गज़लों को कलमबद्ध करने वाले उस शख्स को पहचानने में अब आपको कोई मुश्किल न होगी।

गज़लों की बेगम "बेगम अख्तर" जब अपनी गायिकी(अपनी ज़िंदगी) के अंतिम दौर में थीं तो उस दौरान जिस शख्स ने उन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित किया था, वही शख्स आने वाले दिनों में "जगजीत सिंह" का सबसे पसंदीदा शायर हो गया। "फ़िरोज़पुर" में जन्मे और "जालंधर" में पले-बढे उस शख्स की फ़नकारी बस गज़लों तक हीं सीमित नहीं रही, बल्कि "भक्ति रस" का भी उन्होंने भरपूर रसपान किया और औरों को भी उस रस में सराबोर कर दिया। "हे राम" एलबम के गाने इस बात के जीते-जागते सबूत हैं। जहाँ एक ओर जगजीत सिंह की आवाज़ का मीठापन वहीं दूसरी ओर भक्ति में डूबे बोलों का सम्मोहन। उस शायर, उस कवि, उस फ़नकार में बात हीं कुछ ऐसी थी कि लफ़्ज़ खुद-ब-खुद जिगर में उतर जाते थे। अब इतना कहने के बाद यह तो ज़ाहिर है कि उस शख्स पर और ज्यादा पर्दा डाले रखना गज़लों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। एक अदद नानी की कहानी और बारिश के पानी के लिए सारी दौलत और शोहरत को कुर्बान करने वाले "सुदर्शन फ़ाकिर" के बारे में जितना भी कहा जाए उतना कम है, फिर भी हमारी यह पूरी कोशिश रहेगी कि आप सबको उनकी ज़िंदगी से रूबरू कराया जाए। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि आज की गज़ल के साथ एक और शख्सियत का नाम जुड़ा है और वह नाम ऐसा है कि बाकी नाम उसके सामने कहीं नहीं आते और शायद यही कारण है कि मैं यहाँ पर उनका जिक्र करने से कतरा रहा हूँ। गायकी के बेताज बदशाह "मोहम्मद रफ़ी" साहब ने आज की गज़ल को अपनी आवाज़ दी है। अब "रफ़ी" साहब की शख्सियत को एक छोटे से आलेख में समेटना सूर्य को दीया दिखाने के समान होगा। इसलिए रफ़ी साहब की बात कभी आराम से और दो-तीन आलेखों में करेंगे। आज के आलेख को बस "फ़ाकिर" साहब और इस गज़ल तक हीं सीमित रखते हैं।

"फ़ाकिर" साहब के बारे में कई लोगों का यह कहना है कि "उन्होंने बेगम साहब की जिद्द पर जालंधर रेडियो की नौकरी छोड़ दी और बंबई आ गए। यहाँ आकर भी उन्हें बहुत दिनों तक संघर्ष करना पड़ा।" इस बात का खंडन करते हुए एकबार फ़ाकिर साहब ने कहा था- "इस बात में कोई सच्चाई नहीं है। मैं दर-असल अपने पसंदीदा संगीतकार मदन मोहन के साथ काम करने के लिए बंबई आया था। लेकिन वह हो न सका। मुझे जयदेव के साथ काम करने का मौका मिला। और भीम सेन की फ़िल्म दूरियाँ में मेरा लिखा गीत "ज़िंदगी,ज़िंदगी मेरे घर आना ज़िंदगी" खासा प्रसिद्ध हुआ था। जहाँ तक मेरे संघर्ष करने का सवाल है तो मुझे एक दिन,एक पल के लिए भी संघर्ष नहीं करना पड़ा। मैंने सारे हीं गीत,सारी हीं गज़लें अपने हिसाब से लिखीं।" अब जब किसी की शायरी में हीं इतना दम हो तो उसे संघर्ष क्यों करना पड़े। मस्तमौला मिजाज के "फ़ाकिर" साह्ब को दूसरे शायरों की तरह हीं शराब का बेहद शौक था। उनका मानना था कि "शराब" और "शायर" में एक गहरा रिश्ता होता है। खुद की आदतों का जिक्र आने पर कहते थे "जब तक मैं दो प्याले शराब के निगल न जाऊँ तब तक मेरे जहन में शायरी की पैदाईश नहीं होती। लगभग हर गज़ल का मतला मैं शराब के नशे में हीं लिखता हूँ,लेकिन इस बात का ध्यान रखता हूँ कि गज़ल के बाकी शेर अगली सुबह हीं लिखूँ, जब नशा पूरी तरह उतर चुका हो।" यह तो हुई एक शायर की दास्तान अब इन शायर के कहे अनुसार "शराब" पीनी चाहिए या नहीं,यह तो मैं नहीं कह सकता,लेकिन इतना जरूर कह सकता हूँ कि मदहोशी की हालत में हीं दर्द और खुमार का अनुभव होता है। अब आज की गज़ल को हीं देखिए, दर्द और ग़म की तुलना शराब के नशे से की गई है। "जो ग़म-ए-दोस्त में नशा है शराबों में नहीं" - अगर गौर से आप इस पंक्ति को सुनेंगे तो आपको दुगने नशा का अनुभव होगा। शायर ने गम-ए-दोस्त, गम-ए-हबीब की तुलना शराब से करके शराब को ऊँचा स्थान दे दिया है। वहीं इस गज़ल के मक़ते में शराब को उसकी औकात भी बताई गई है। शराब की औकात या फिर शराब का ओहदा जो भी हो,लेकिन शायरों के दिल में शराब ने अपना एक अलग हीं मुकाम बना रखा है,फ़िर चाहे वह मुकाम अच्छा हो या फिर बुरा। यकीन न हो तो "फ़ाकिर" साहब का यह शेर हीं देख लीजिए:

हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शराब,
आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया।


"रेयर मोमेंट्स- मोहम्मद रफ़ी" से ली गई आज की गज़ल को संगीत से सजाया है "ताज अहमद खान" ने। वक्त आने पर कभी इनकी भी बात करेंगे अभी तो बस इस गज़ल का लुत्फ़ उठाते हैं:

एक हीं बात ज़माने की किताबों में नहीं,
जो ग़म-ए-दोस्त में नशा है,शराबों में नहीं।

हुस्न की भीख न माँगेंगे न जलवों की कभी,
हम फ़क़ीरों से मिलो खुलके, हिजाबों में नहीं।

हर जगह फिरते हैं आवारा ख्यालों की तरह,
यह अलग बात है हम आपके ख्वाबों में नहीं।

न डुबो सागर-औ-मीना में ये ग़म ऐ "फ़ाकिर",
कि मक़ाम इनका दिलों में है शराबों में नहीं।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

मुझे गुस्सा दिखाया जा रहा है,
___ को चबाया जा रहा है ...


आपके विकल्प हैं -
a) मुस्कराहट, b) मोहब्बत, c) तबस्सुम, d) बनावट

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-

पिछली महफिल का शब्द था शबनम और शेर कुछ यूं था-

कितने दिन के प्यासे होंगें यारों सोचो तो,
शबनम का कतरा भी जिनको दरिया लगता है...

जवाब दिया एक बार फिर नीलम जी ने पर कोई शेर अर्ज नहीं किया, हालाँकि मनु जी, सुमित जी आदि सभी महफिल में मौजूद थे पर जाने क्यों इस बार न "इरशाद" हुई न "वाह वाह". शायद शब्द मुश्किल लगा होगा. पर पिछली महफ़िल की शान बन कर आये कुलदीप अंजुम साहब जो इत्तेफ्फाकन "खुमार" साहब के मुरीद निकले, उन्होंने खुमार साहब पर कुछ बेशकीमती जानकारी भी हमें दी जिसके लिए हम उनके आभारी हैं, अंजुम जी यदि आपके पास उनके फ़िल्मी गीतों का संकलन मौजूद हो तो हमें उपलब्ध कराएँ. ताकि अन्य श्रोता भी उन्हें सुनकर अनद उठा सकें.
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

सोमवार, 1 जून 2009

जवाँ है मोहब्बत हसीं है ज़माना...यादें है इस गीत में मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ की

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 98

ज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' बहुत ख़ास है क्योंकि आज हम इसमे एक ऐसी आवाज़ आप तक पहुँचा रहे हैं जो ४० के दशक मे घर घर गली गली गूँजा करती थी। १९४७ में देश के बँटवारे के बाद वो फनकारा पाक़िस्तान चली गयीं और पीछे छोड़ गयीं अपनी आवाज़ का वो जादू जिन्हे आज तक सुनते हुए हमारे कान नहीं थकते और ना ही उनकी आवाज़ को कोई भुला ही पाया है. लताजी के आने से पहले यही आवाज़ थी हमारे देश की धड़कन, जी हाँ, हम बात कर रहे हैं मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ की। नूरजहाँ की आवाज़ उस ज़माने मे इतनी लोकप्रिय थी कि उन दिनों हर उभरती गायिका उन्हे अपना आदर्श बनाकर पार्श्वगायन के क्षेत्र में क़दम रखती थीं। यहाँ तक कि अगर हम सुरकोकिला लताजी के शुरुआती दो चार फ़िल्मों के गानें सुनें तो उनमें भी नूरजहाँ का अंदाज़ साफ़ झलकता है। यह बेहद अफ़सोस की बात है हम भारतवासियों के लिए कि स्वाधीनता के बाद नूरजहाँ अपने पति शौकत अली के साथ पाक़िस्तान जा बसीं जिससे कि हमारी यहाँ की फ़िल्में उनकी आवाज़ के जादू से वंचित रह गयीं। कहते हैं कि कला की कोई सीमा नहीं होती और ना ही कोई सरहद इसे रोक पायी है। नूरजहाँ की जादूई आवाज़ आज भी हमारे यहाँ मौजूद है उनके यहाँ गाये हुए तमाम गीतों में जो फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने का एक अमूल्य सम्पदा है। कई लोग इस तर्क में जाते हैं कि अगर नूरजहाँ यहाँ रहतीं तो लताजी उस शिखर पर शायद नहीं पहुँच पातीं जहाँ पर वो आज पहुँची हैं। दोस्तों, यह तर्क बेकार और अर्थहीन है। लता लता है और नूरजहाँ नूरजहाँ। ये दोनो अपनी अपनी जगह पर हैं और इन दोनो का एक दूसरे से तुलना करना बिल्कुल निरर्थक है। हम तो बस यही कहेंगे कि अगर नूरजहाँ हमारे देश मे रहतीं तो यहाँ का फ़िल्म संगीत और भी समृद्ध होता।

नूरजहाँ की आवाज़ में हमने जिस गीत को चुना है आज यहाँ बजाने के लिए वह है फ़िल्म 'अनमोल घड़ी' का। यह फ़िल्म बनी थी १९४६ में और इसका निर्माण महबूब ख़ान ने किया था। नूरजहाँ, सुरेन्द्र और सुरैय्या अभिनीत यह फ़िल्म उस साल का एक 'म्युज़िकल ब्लाकबस्टर' साबित हुआ था। और क्यों न हो, नूरजहाँ, सुरेन्द्र और सुरैय्या उस ज़माने के चोटी के 'सिंगिंग स्टार्स' जो थे, और साथ में था नौशाद साहब का संगीत और तनवीर नक़वी के बोल, क़माल तो होना ही था! दोस्तों, नौशाद साहब ने सहगल साहब और नूरजहाँ के साथ बस एक एक फ़िल्म में काम किया है, सहगल साहब के साथ 'शाहजहाँ' में और नूरजहाँ के साथ इस 'अनमोल घड़ी' में। 'अनमोल घड़ी' की अपार सफलता के बाद नौशाद साहब ने महबूब साहब की हर एक फ़िल्म में संगीत दिया। १९४४ में फ़िल्म 'रतन' में ज़ोहराबाई का गाया "अखियाँ मिलाके जिया भरमाके चले नहीं जाना" की बेशुमार कामयाबी के बाद नौशाद का जो गीत इसी तरह से हर किसी के ज़ुबान पर चढ़ गया था वह था 'अनमोल घड़ी' का "जवाँ है मोहब्बत हसीं है ज़माना, लुटाया है दिल ने ख़ुशी का ख़ज़ाना"। राग पहाड़ी मे स्वरबद्ध नूरजहाँ का गाया यह गीत उनके यहाँ गाये हुए सबसे ज़्यादा मशहूर गीतों में से एक है। तो लीजिए आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ के नाम!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. कमर जलालाबादी का लिखा सुरैय्या का गाया ये गीत.
२. संगीतकार हैं सज्जाद हुसैन.
३. मुखड़े में शब्द है -"बयां".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
भई सबसे पहले तो भूल के लिए माफ़ी. मुखड़े में "खजाना" लिखना था "तराना" लिखा गया. पर फिर भी आप लोगों ने सही गीत चुन लिया, स्वप्न मंजूषा जी को विजेता होने की बधाई, चलिए इस बहाने ही सही पराग जी बहुत दिनों के बाद ओल्ड इस गोल्ड में लौटे...कहाँ थे जनाब ? हम अपनी १०० वीं कड़ी की तरफ बढ़ रहे हैं. ये ओल्ड इस गोल्ड के लिए ही नहीं बल्कि आवाज़ और हिंद युग्म के लिए भी एक एतिहासिक मौका होगा. ओल्ड इस गोल्ड के सभी नियमित श्रोता इस एपिसोड का हिस्सा जरूर बनें और यदि कोई सुझाव या बदलाव आप इस फॉर्मेट में चाहते हैं तो हमें अवश्य बतायें.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Y2K: पार्श्वगायन के नए दौर में प्रतिभाओं का अम्बार

भूमिका

हिंदी फ़िल्म संगीत के हर दौर में कुछ निर्दिष्ट गायकों ने राज किया है और हर पीढ़ी में हम गिने चुने गायकों का नाम भी ले सकते हैं जो अपने दौर में पूरी तरह से छाये रहे, अपने दौर का जिन्होने प्रतिनिधित्व किया। लेकिन आज फ़िल्म संगीत का जो दौर चला है, उसमें एक दम से इतने सारे नये गायक आ गये हैं कि हिसाब रखना मुश्किल हो रहा है कि कौन सा गीत किस गायक ने गाया है। बहुत ही कम समय में इतने सारे गायकों के आ जाने से जहाँ एक तरफ़ प्रतियोगिता बहुत ज़्यादा बढ़ गयी है, वहीं दूसरी तरफ़ नयी नयी आवाज़ों से फ़िल्म संगीत में एक नयी ताज़गी भी आयी है। कुछ भी हो, इतना ज़रूर साफ़ है कि इन बहुत सारी आवाज़ों में वही आवाज़ें बहुत आगे तक जा पायेंगी जिनमें कुछ अलग हटके बात हो! एक समय ऐसा था जब नये गायक पुराने ज़माने के दिग्गज गायकों की आवाज़ को अपनी गायिकी का आधार बनाकर इस क्षेत्र में क़दम रखते थे और सफलता भी हासिल करते थे, लेकिन आज उस तरह से बात बिल्कुल नहीं बनेगी। आज वही आवाज़ मशहूर है जो दूसरों से अलग है, जुदा है। यह एक अच्छा लक्षण है कि आज के युवा गायक शुरु से ही अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। "फ़िल्म संगीत के नवोदित पार्श्वगायक" नाम है उस शृंखला का जिसमें हम आनेवाले हफ़्तों में ज़िक्र करेंगे आज की पीढ़ी के पार्श्वगायकों की। इससे पहले की हम नवोदित आवाज़ों से आपका परिचय करवाना शुरु करें, यह बेहद ज़रूरी होगा कि फ़िल्म संगीत के सभी पीढ़ियों के पार्श्वगायकों पर जल्दी जल्दी एक नज़र दौड़ा लिया जाये, और फिर उसके बाद इत्मीनान से आज की पीढ़ी की विस्तार से चर्चा की जाये।

१९३१ में फ़िल्म संगीत का जन्म हुआ था जब गायक अभिनेता वज़ीर मोहम्मद ख़ान ने फ़िल्म 'आलम आरा' में गाया था "ख़ुदा के नाम पर दे दे प्यारे"। इसके बाद फ़िल्म संगीत ने पहली पीढ़ी के गायकों, गीतकारों और संगीतकारों की उंगलियाँ थामे धीरे धीरे खड़ा होना सीखा, चलना सीखा, आगे बढ़ना सीखा। पीढ़ी दर पीढ़ी फ़िल्म संगीत का ऐसे कलाकारों के सहारे निरंतर विकास होता गया। और वह बीज जिसे 'आलम आरा' के कलाकारों ने बोया था, आज उसने एक विशाल वटो वृक्ष का रूप ले चुका है। यूँ तो फ़िल्म संगीत के विकास में फ़िल्म निर्माता - निर्देशकों, गीतकार, संगीतकार और पार्श्व गायकों गायिकायों का समान रूप से हाथ रहा है, हमारी इस प्रस्तुति में हम ज़िक्र करने जा रहे हैं केवल पार्श्वगायकों का। फ़िल्म संगीत के लगभग ८० साल पुराने इतिहास को हम पार्श्वगायकों की ६ पीढ़ियों में विभाजन कर सकते हैं। पहली पीढ़ी में शामिल हैं कुंदन लाल सहगल, के. सी. डे, पंकज मल्लिक, ख़ान मस्ताना, जी एम् दुर्रानी, अरुण कुमार, सुरेन्द्र, गोविंदराव टेम्बे, आदि जिन्होने फ़िल्मी गीतों की नींव को पहले पहल मज़बूत किया था। वह दौर पार्श्वगायन का नहीं था, हालाँकि १९३५ के आसपास पार्श्वगायन की तकनीक आ गयी थी। उन दिनों अभिनेता को ख़ुद अपने गीत गाने पड़ते थे। सहगल, सुरेन्द्र जैसे कलाकार अभिनेता होने के साथ साथ अच्छे गायक भी थे। लेकिन कुछ ऐसे नायक भी थे जो अभिनेता तो बहुत ऊँचे स्तर के थे, लेकिन गायिकी में थोड़े कच्चे। अशोक कुमार, मोतीलाल, पहाड़ी सान्याल, जैसे कलाकार इस श्रेणी में आते हैं। संगीतकार बहुत ज़्यादा उन्नत या मुश्किल धुन नहीं बना पाते थे क्योंकि उन्हे गा पाना इन अभिनेताओं के बस में नहीं था।

पार्श्वगायन पद्धति को लोकप्रियता मिली ४० के दशक में जब कई अच्छे गायक गायिकायों ने इस उद्योग में क़दम रखा। द्वितीय विश्वयुद्ध और आज़ादी के बाद फ़िल्मों में व लोगों की रुचि में बदलाव आया। तो ज़ाहिर है कि फ़िल्म संगीत के रंग ढंग भी बदले और शुरु हो गया फ़िल्म संगीत का सुनहरा दौर। इस सुनहरे दौर का प्रतिनिधित्व जिन पार्श्वगायकों ने किया उनके नाम हैं मुकेश, मोहम्मद रफ़ी, किशोर कुमार, तलत महमूद, मन्ना डे, हेमन्त कुमार, और महेन्द्र कपूर प्रमुख। ७० के दशक के बीचों बीच आते आते पार्श्व गायकों की तीसरी पीढ़ी क़दम रख चुकी थी। इस पीढ़ी में हम शामिल कर सकते हैं बहुत सारे गायकों को। लेकिन जिन गायकों ने मुख्य रूप से अपनी छाप छोड़ी है उनके नाम हैं भूपेन्द्र, सुरेश वाडेकर, जेसुदास, एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम, किशोरदा के बेटे अमित कुमार, हरिहरण, जसपाल सिंह, शैलेन्द्र सिंह, मनहर उधास, विजय बेनेडिक्ट, नरेन्द्र चंचल आदि। ७० के दशक के अंत और ८० के दशक में ग़ज़लों का एक दौर चल पड़ा था। ऐसे में कई अच्छे ग़ज़ल गायक आये और जिन्होने ग़ज़ल गायिकी के साथ साथ फ़िल्मों में भी अपनी आवाज़ के जलवे बिखेरे। ग़ुलाम अली, पंकज उधास, तलत अजीज़, अनुप जलोटा ऐसे ही चंद नाम हैं। ८० के दशक के शुरु होते ही गायक रफ़ी साहब का इन्तक़ाल हो गया था। लोग उनकी आवाज़ के ऐसे दीवाने बन चुके थे कि उनकी कमी को पूरा करने के लिए फ़िल्मकारों और संगीतकारों ने कई ऐसी आवाज़ें खोज निकाले जो रफ़ी साहब की आवाज़ से मिलते जुलते थे। और इस तरह से पार्श्व गायकों की इस तीसरी पीढ़ी में रफ़ी साहब जैसी आवाज़ वाले कई गायक शामिल हुए जिनमें प्रमुख नाम हैं अनवर, शब्बीर कुमार और मोहम्मद अजीज़ का। मुकेश के जाने के बाद उनके बेटे नितिन मुकेश इस क्षेत्र में आये और अपने पिता के नाम और काम को आगे बढ़ाया।

१९८७ में किशोरदा हमसे बिछड़ गये थे और ऐसा लगा कि फ़िल्म संगीत का एक अध्याय समाप्त हो गया। सचमुच फ़िल्म संगीत ने अपनी आँखें मूंद कर एक अंगड़ाई ली और आँखें खोलते ही देखा कि आ गयी है पार्श्वगायकों की चौथी पीढ़ी। रफ़ी साहब के शागिर्दों की तरह किशोरदा के भी पदचिन्हों पर चलनेवाले कई गायक आये इस पीढ़ी के, जिनमें सब से ज़्यादा ख्याति मिली कुमार सानू और अभिजीत को। उदित नारायण की आवाज़ मौलिक ज़रूर थी, लेकिन सोनू निगम की आवाज़ में शुरु शुरु में रफ़ी साहब की आवाज़ का असर महसूस होता था, हालाँकि बाद में उन्होने अपनी अलग पहचान बनायी। इस चौथी पीढ़ी के कुछ और पार्श्वगायक रहे हैं विनोद राठोड़, रूप कुमार राठोड़, सूदेश भोंसले, जौली मुखर्जी, सुखविंदर सिंह, आदि। इस पीढ़ी के बाद पाँचवी पीढ़ी के गायकों में शामिल हैं शान, के.के, बाबुल सुप्रियो, कुणाल गांजावाला, कैलाश खेर, लकी अली, अल्ताफ़ राजा, अदनान सामी, शंकर महादेवन जैसे गायक और इनमें से कई आज की पीढ़ी में भी काफ़ी सक्रीय हैं। हर पीढ़ी में कई संगीतकार ऐसे भी रहे हैं जो संगीतकार होने के साथ साथ अच्छे गायक भी थे। इस ओर कुछ प्रमुख नाम हैं के.सी. डे, पंकज मल्लिक, चितलकर (सी. रमचन्द्र), सचिन देव बर्मन, हेमन्त कुमार, राहुल देव बर्मन, रविन्द्र जैन, बप्पी लाहिड़ी, और अनु मलिक। इसी तरह से पाँचवी पीढ़ी में जिन दो संगीतकार ने अपने सुरों के साथ साथ अपने आवाज़ से भी काफ़ी धूम मचायी, वो हैं ए. आर रहमान और हिमेश रेशमिया।

आज छठी पीढ़ी चल रही है जिसमें पाँचवी पीढ़ी के कई गायक तो शामिल हैं ही, लेकिन पिछले दो तीन सालों में बहुत सारी नयी प्रतिभायें इस क्षेत्र में अपना क़िस्मत आज़माने आ गयीं हैं, और इस शृंखला में हम ऐसे ही नवोदित युवा प्रतिभाओं का ज़िक्र करेंगे जिन्होने अभी अभी अपनी पारी का खाता खोला है। तो दोस्तों, आज बस यहीं तक, अगले हफ़्ते से हम शुरु करेंगे इन नवोदित पार्श्वगायकों की बातें और बातों के साथ साथ हम उनके गाये हुए गानें भी आपको सुनवाते जायेंगे। हमें उम्मीद है कि इस शृंखला के समापन के बाद आप यह बात फिर कभी नहीं कहेंगे कि "आज कौन सा गीत कौन से गायक गा रहे हैं कुछ पता ही नहीं चलता"। अगर कहेंगे तो हम तो भई यही समझेंगे कि हमारी मेहनत रंग नहीं लायी। तो बने रहिये 'हिंद-युग्म' के साथ 'आवाज़' की इस दुनिया में, और 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के साथ साथ नये संगीत और नयी आवाज़ों का भी खुले दिल से स्वागत कीजिये।

प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ