शुक्रवार, 22 मई 2009

सखी री मेरा मन उलझे तन डोले....रोशन साहब का लाजवाब संगीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 88

दोस्तों, अगर आपको याद हो तो कुछ रोज़ पहले हमने आपको 'आम्रपाली' फ़िल्म का एक गीत सुनवाया था और साथ ही आम्रपाली की कहानी भी सुनाई थी। आम्रपाली की तरह एक और नृत्यांगना हमारे देश में हुईं हैं चित्रलेखा। आज इन्ही का ज़िक्र 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में। चित्रलेखा सम्राट चंद्रगुप्त के समय की राज नर्तकी थीं। चंद्रगुप्त का एक दोस्त बीजगुप्त हुआ करता था जो चित्रलेखा को देखते ही उससे प्यार कर बैठा। वह चित्रलेखा के प्यार में इस क़दर खो गया कि उसके लिए सब कुछ न्योछावर करने को तैयार हो गया। चित्रलेखा भी उससे प्यार करने लगी। लेकिन बीजगुप्त का विवाह यशोधरा से तय हो चुका था। यशोधरा के पिता को जब बीजगुप्त और चित्रलेखा की प्रेम कहानी का पता चला तो वो योगी कुमारगिरि के पास गये और उनसे विनती की, कि वो चित्रलेखा को बीजगुप्त से मिलने जुलने को मना करें। योगी कुमारगिरि चित्रलेखा को उसके दायित्वों और कर्तव्यों की याद दिलाते हैं लेकिन चित्रलेखा योगी महाराज की बातों को हँसकर अनसुना कर देती हैं। लेकिन आगे चलकर एक दिन चित्रलेखा को अपनी ग़लतियों का अहसास हो जाता है। आईने में अपने एक सफ़ेद बाल को देख कर वो बौखला जाती है, उसे यह अहसास होता है कि सांसारिक सुख क्षणभंगुर हैं। 'जीवन क्या है?' वो अपने आप से पूछती है और राजमहल छोड़कर योगी कुमारगिरि के आश्रम चली जाती है। जब बीजगुप्त को इस बात का पता चलता है तो वो भी चित्रलेखा की तलाश में निकल पड़ते हैं। उधर कुमारगिरि जिन्होने सांसारिक जीवन को त्याग कर योग साधना को अपने जीवन का आदर्श बना लिया था, वो आख़िर चित्रलेखा की ख़ूबसूरती के प्रभाव से बच ना सके और एक रात चित्रलेखा के कमरे में आ खड़े हुए बुरे ख़यालों से। चित्रलेखा जान गयी कुमारगिरि के मन के भाव को और तुरंत आश्रम से निकल पड़ी। लेकिन अब वो कहाँ जाएगी? क्या उसे अपना प्यार वापस मिल जाएगा, या फिर वो कहीं खो जाएगी गुमनामी के अंधेरे में? इन सब का जवाब मिलता जाता है फ़िल्म के नाटकीय 'क्लाइमैक्स' में। चित्रलेखा के जीवन की दिशा को बदलने में पुरुषों का किस तरह का प्रभाव रहा है, यही विषयवस्तु है इस फ़िल्म की। श्री भगवती चरण वर्मा ने चित्रलेखा की कहानी को उपन्यास की शक्ल में प्रकाशित किया था सन् १९३४ में, और सन् १९४१ में 'फ़िल्म कार्पोरेशन औफ़ इंडिया' ने इस उपन्यास पर आधारित 'चित्रलेखा' नामक फ़िल्म बनाई थी जिसका निर्देशन किया था नवोदित निर्देशक केदार शर्मा ने। यह फ़िल्म वितरकों से घिरी रही क्योंकि एक दृश्य में चित्रलेखा बनी नायिका महताब को स्नान करते हुए दिखाया गया था। ४० के दशक की फ़िल्मों की दृष्टि से यह बहुत बड़ी बात थी। ख़ैर, आज हम यहाँ १९४१ की 'चित्रलेखा' का नहीं बल्कि १९६४ में बनी 'चित्रलेखा' का एक गीत सुनवाने जा रहे हैं।

गीत सुनने से पहले आपको यह हम बता दें कि १९६४ की 'चित्रलेखा' का निर्देशन भी केदार शर्मा ने ही किया था। फ़िल्म की मुख्य भूमिकायों में थे मीना कुमारी (चित्रलेखा), अशोक कुमार (योगी कुमारगिरि) और प्रदीप कुमार (बीजगुप्त्त. संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध गीत इस फ़िल्म का एक प्रमुख आकर्षण रहा। लता मंगेशकर और रफ़ी साहब के गाये एकल गीत हों या फिर आशा भोंसले और उषा मंगेशकर के गाये युगल गीत, सभी के सभी गानें बेहद मकबूल हुए थे और आज भी उतने ही प्यार से सुने जाते हैं। रोशन के फ़िल्मी सफ़र का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पड़ाव रहा है 'चित्रलेखा' का संगीत। शास्त्रीय रागों पर आधारित गीतों को किस तरह से जनसाधारण में लोकप्रिय बनाया जा सकता है रोशन ने इस फ़िल्म के गीतों के माध्यम से साबित किया है। तो आज सुनिए लताजी की आवाज़ में १९६४ की 'चित्रलेखा' का एक सदाबहार गीत "सखी री मेरा मन उलझे तन डोले"। गीतकार हैं साहिर लुधियानवी। एक उर्दू शायर होते हुए भी उन्होने जिस दक्षता के साथ इस शुद्ध हिंदी वाली पौराणिक पीरियड फ़िल्म के गाने लिखे हैं, उनकी तारीफ़ शब्दों में करना नामुमकिन है। सुनिए!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. कवि गोपाल दास नीरज का लिखा एक शानदार गीत.
२. मुकेश की आवाज़ में है ये मधुर गीत.
३. मुखड़े में शब्द है - "दर्पण".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
रचना जी बहुत करीब थी आप, पर चूक गयी. शरद तैलंग हैं आज के विजेता जोरदार तालियाँ इनके लिए...मनु जी कहे इतनी दुविधा में रहते हैं आप....सूत्र तो पूरे पढ़ा कीजिये :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


"रोने से दुःख कम न होंगे तो क्यों न हंस खेल जिंदगी बिता लें हम..."- यही था फलसफा किशोर दा का

श्रोताओं और दर्शकों से खचा खच भरे सभागृह में एक हीरे का सौदागर आता है और उसे देख सभी १० मिनट तक सीटी बजाते हैं, चिल्लाते हैं, सारा माहौल गूंज रहा है, सब मस्त है ... |
आख़िर ये कौन है जिसे देख कर मस्ती आ जाती है, नौजवान मुश्कियां मारने लगते हैं, कौन है यह कौन है ... ?

ये जनाब हैं अपने किशोर कुमार |आदरणीय गालिब के शेर को किशोर बाबू के लिए उधार मांगूं तो कुछ ऐसा होगा -

जिसके आने से आती थी स्टेज पर मस्ती,
लोग कहतें हैं वो तो किशोर कुमार था |

एक वो भी समय था जब किशोर के दिल की धड़कन स्टेज शो के नाम पर तेज हो जाती थी | किशोर कुमार एक मस्ती का नाम जरुर था लेकिन उनमें एक शर्मिलापन भी दिख जाता था | एक बार तो सुनील दत्त और उनके दोस्तों ने उन्हें परदे के पीछे से स्टेज पर ढकेला और शो कराने के लिए मजबूर किया | डरते डरते दादा ने एक लय पकड़ ली और बस निकल पडी स्टेज शो की गाडी ... पम्प पम्प पम्प |

अब स्टेज शो में किशोर भैया तब तक गाते जब तक नही थकते | इस सजीव शो (real show) में किशोर ने गाया भी, नाचा भी और अभिनय भी किया | अपने अंदाजों को लोगों की मांग (public demand) पर बदलने लगे | कभी सभ्य आदमी (gentle man) बनकर तो कभी कुरते , पैजामे और सर पर मखमली टोपी पहन कोई जौहरी (diamond merchant) बनकर गाते रहें |क्या वे कला के हीरे(diamond)नही थे ?

उनका एक अंदाज़ आज भी याद किया जाता है | स्टेज शो की शुरुआत कुछ इस तरह से करते -
"ओ मेरे संगीत प्रेमियों....,
मेरे दादा दादियों , मेरे नाना नानियों ,
वो मेरे मामा मामियों , मेरे यारों यारियों ,
आप सब को किशोर कुमार का सप्रेम नमस्कार ..."


और सब उनके पीछे यह दोहराते मानो कोई प्रार्थना हो रही हो | कई बार तो वे स्टेज पर लेट कर, माइक को मुंह पर लगा गाते, लुढ़कते, उठते फिर गिरते | उनका यह कुदरती अंदाज लोगों को बहुत लुभाता | कला मंच पर मंझ चुके किशोर दा अब तरह तरह के नए प्रयोग करने लगे | अभिनय का अनुभव उन्हें वहां बहुत काम आ रहा था | श्रोताओं की मांग पर गाना गाया जाने लगा और किशोर कुमार दल इसके लिए हमेशा तैयार रहता था ! अपने सफल स्टेज शो के दौर में उन्होंने बहुत से संगीतकारों, गायिकाओं और अपने बेटे अमित कुमार के साथ स्टेज पर धूम मचाया, संग नाचा, गाया |

धीरे-धीरे, देश-विदेश में में उनका यह स्टेज शो उनके बिगड़ते स्वस्थ के कारण रुकने लगा और लोग किशोर स्टेज शो को तरसने लगे| बेटे अमित कुमार ने उनके इस सिलसिले को आज भी कायम रखा है |आज आवाज़ पर देखिये किशोर कुमार एक मशहूर लाइव कार्यक्रम की कुछ झलकियाँ, जहाँ वो गा रहे हैं ईना मीना डीका, मेरे सपनों की रानी, रोते हुए आते हैं सब और प्यार बांटते चलो जैसे लाजवाब गीत अपने मस्तमौला अंदाज़ में. आनंद लें-



जाते जाते ...

तुमने स्टेज पर कूदा ,
फिर गाया - नाचा ,
अब तरसता मन कहे ,
किशोर फिर से आजा |



प्रस्तुतकर्ता- अवनीश तिवारी

गुरुवार, 21 मई 2009

बूझ मेरा क्या नाव रे....कौन है ये मचलती आवाज़ वाली गायिका....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 87

ओ. पी नय्यर के निर्देशन में जिन तीन पार्श्व गायिकाओं ने सबसे ज़्यादा गाने गाये, वो थे आशा भोंसले, गीता दत्त और शमशाद बेग़म। शमशाद बेग़म के लिए नय्यर साहब के दिल में बहुत ज़्यादा इज़्ज़त थी। शमशादजी की आवाज़ की नय्यर साहब मंदिर की घंटी की आवाज़ से तुलना किया करते थे। उनके शब्दों में शमशादजी की आवाज़ 'टेम्पल बेल' की आवाज़ थी। भले ही आशा भोंसले के आने के बाद गीता दत्त और शमशाद बेग़म से नय्यर साहब गाने लेने कम कर दिये, लेकिन यह भी हक़ीक़त है कि नय्यर साहब ने ही इन दोनो गायिकायों को सबसे ज़्यादा 'हिट' गीत दिए। १९५२ से लेकर करीब करीब १९५८ तक नय्यर साहब ने इन दोनो गायिकायों से बहुत से गाने गवाये और लगभग सभी के सभी लोकप्रिय भी हुए। जहाँ तक शमशादजी के गाये हुए गीतों का सवाल है, उनकी पंजाबी लोकगीत शैली वाली अंदाज़ को नय्यर साहब ने अपने गीतों के ज़रिए ख़ूब बाहर निकाला और हर बार सफल भी हुए। नय्यर साहब के अनुसार संगीतकार ही गायक गायिका को तैयार करता है, यह संगीतकार के ही उपर है कि वह गायक गायिका से कितना काम ले सकता है और कितनी अच्छी तरह से ले सकता है। इसमें कोई शक़ नहीं कि नय्यर साहब ने हर गायक और गायिका की प्रतिभा को और भी निखारा और सँवारा और पूरे 'पर्फ़ेकशन' के साथ जनता के सामने प्रस्तुत किया। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में नय्यर साहब और शमशादजी की जोड़ी का एक मचलता हुआ नग़मा पेश कर रहे हैं फ़िल्म 'सी.आइ.डी' से।

फ़िल्म 'सी.आइ.डी' बनी थी १९५६ में। १९५४ में 'आर पार' और १९५५ में 'मिस्टर ऐंड मिसेस ५५' बनाने के बाद गुरु दत्त ने 'सी.आइ.डी' की परिकल्पना की। देव आनंद जो ग़लत राह पर चल पड़ने वाले नायक की भूमिका निभाया करते थे, इस फ़िल्म में पुलिस इंस्पेक्टर के रोल में नज़र आये। इसी फ़िल्म से वहीदा रहमान का हिंदी फ़िल्म जगत में पदार्पण हुआ। इससे पहले वो दो तेलुगू फ़िल्मों में काम कर चुकी थीं। इनमें से एक फ़िल्म ने 'सिल्वर जुबिली' मनाई और इसी मौके पर गुरु दत्त की नज़र उन पर पड़ गई, और उन्हे 'सी.आइ.डी' की नायिका के रोल का औफ़र दे बैठे। राज खोंसला निर्देशित यह 'मर्डर मिस्ट्री' अपनी रोमांचक कहानी, जानदार अभिनय और सदाबहार गीत संगीत की वजह से अमर होकर रह गयी है। ओ. पी. नय्यर और मजरूह सुल्तानपुरी के गीत संगीत तथा रफ़ी, गीता, शमशाद और आशा की आवाज़ों ने चारों तरफ़ धूम मचा दी थी। शमशाद बेग़म की आवाज़ में प्रस्तुत गीत भारतीय लोक संगीत और पाश्चात्य और्केस्ट्रेशन का संतुलित मिश्रण है जिसे सुनते ही दिल एक दम से ख़ुश हो जाता है। जब मैं छोटा था और इस गीत को सुनता था तो मुझे ऐसा लगता था कि 'नाम' को 'नाव' क्यों कहा गया है इस गीत में, क्या 'गाँव' से तुकबंदी करने के लिए ऐसा किया गया है, लेकिन बाद में मुझे पता चला कि मराठी में नाम को 'नाव' कहते हैं, और इस तरह से अर्थ भी बरक़रार रहा और तुकबंदी भी हो गयी। तो लीजिए सुनिए आज का यह गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. केदार शर्मा निर्देशित इस फिल्म में थे मीना कुमारी, अशोक कुमार और प्रदीप कुमार.
२. रोशन का संगीत और लता के स्वर.
३. मुखड़े में शब्द है -"मन".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम-
रचना जी ने एक बार फिर मैदान मारा है. मनु जी और पराग ने सहमती दी है, तो जाहिर है जवाब सही ही है.... जाते-जाते शरद तैलंग भी अपनी मुहर लगा गये, वो भी सहीवाला।

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


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