Saturday, January 18, 2014

"रहे न रहे हम महका करेंगे...", सुचित्रा सेन की पुण्य स्मृति को नमन करती है आज की 'सिने पहेली'

सिने पहेली –97






"जब हम ना होंगे, जब हमारी खाँक़ पे तुम रुकोगे चलते चलते,
अश्कों से भीगी चाँदनी में एक सदा सी सुनोगे चलते चलते,
वही पे कही हम तुम से मिलेंगे, बन के कली, बन के सबा, बाग-ए-वफ़ा में,
रहे ना रहे हम..."!

अभिनेत्री सुचित्रा सेन के निधन की ख़बर सुनते ही फ़िल्म 'ममता' के उन पर फ़िल्माये गीत के ये बोल जैसे कानों में गूंजने लगे। जनवरी के कड़ाके की ठंड से कंपकंपाती रात में इस वक़्त जब मैं अपने लैपटॉप पर सुचित्रा सेन की यादों को ताज़ा कर रहा हूँ, बाहर अचानक मुस्लाधार बारिश शुरू हो गई है, और जैसे सुचित्रा सेन की यादें भी बारिश के साथ घुल मिल कर छम छम बरस रही हैं। चली गईं बांगला सिनेमा की सबसे लोकप्रिय, सदाबहार व ख़ूबसूरत अभिनेत्री सुचित्रा सेन। बंगाल के बाहर के पाठकों को यह बता दूँ कि उत्तम कुमार व सुचित्रा सेन की जोड़ी बांगला सिनेमा की सर्वाधिक लोकप्रिय जोड़ी रही है, और इस जोड़ी की फ़िल्में आज पाँच -छह दशक बाद भी हर बांगला टीवी चैनल पर नियमित रूप से दिखाई जाती है। बदलते दौर के साथ-साथ जहाँ सब कुछ बदल चुका है, सुचित्रा सेन की फ़िल्मों का जादू आज भी सर चढ़ कर बोलते है। हिन्दी में उन्होंने गिनी-चुनी फ़िल्में ही कीं, पर उनका भी अपना अलग मुकाम है, अलग पहचान है। 'सिने पहली' के मेरे दोस्तों, आइए आज की 'सिने पहेली' का यह अंक हम समर्पित करें बांगला सौन्दर्य सुचित्रा सेन की पुण्य स्मृति को।

आज की पहेली : सुचित्रा सेन विशेष

आज की पहेली केन्द्रित है अभिनेत्री सुचित्रा सेन पर। तो ये रहे उनसे जुड़े कुछ सवाल। हर सवाल के सही जवाब पर 2.5 अंक आपको दिये जायेंगे।

1. सुचित्रा सेन पर फ़िल्माये आशा भोसले का गाया यह गीत है संगीतकार सी. रामचन्द्र का स्वरबद्ध किया हुआ। इस गीत को सुनते हुए आपको अहसास होगा कि सी. रामचन्द्र ने फ़िल्म 'अनारकली' के मशहूर गीत "ये ज़िन्दगी उसी की है जो किसी का हो गया" की धुन को कुछ हद तक इसी गीत की धुन पर आधारित किया था। फ़िल्म में नायक रहे देव आनन्द। क्या आप बता सकते हैं आशा भोसले और साथियों का गाया यह गीत कौन सा गीत है?

2. आशा भोसले और साथियों का ही गाया एक और गीत है सुचित्रा सेन पर फ़िल्माया हुआ। कहा जाता है कि इस गीत के मूल धुन की रचना 1920 में वी. जगन्नाथ राव ने किया था। इस धुन का इस्तमाल संगीतकार सी. आर. सुब्बुरमण ने 1950 की अपने किसी फ़िल्म के गीत में किया था। पाँच साल बाद 1955 में संगीतकार मास्टर वेणु ने इसी धुन का इस्तमाल किया अपनी फ़िल्म में, और एक बार फिर इसी धुन का इस्तमाल हुआ इसके अगले ही साल 1956 की एक फ़िल्म में, इस बार संगीतकार थे एस. दक्षिणामूर्ती। और इसी धुन का इस्तमाल आशा भोसले के गाये इस हिन्दी गीत में भी किया गया। तो अंदाज़ा लगाइये यह कौन सा गीत है भला?

3. सुचित्रा सेन पर फ़िल्माये लता मंगेशकर के गाये इस बेहद मशहूर गीत के लिए एक सिचुएशन ऐसी बनी थी कि जिसमें बचपन, जवानी और बुढापा को दर्शाना था संगीत के माध्यम से। और संगीतकार ने क्या ख़ूब उतारा उम्र के इन तीन पड़ावों को इस गीत में! ज़रा सोचिये कि यह मशहूर गीत भला कौन सा हो सकता है?

4. सुचित्रा सेन पर फ़िल्माया हुआ लता मंगेशकर का गाया यह एक बहुत ही कर्णप्रिय गीत है हेमन्त कुमार का स्वरबद्ध किया हुआ। इसका एक बांग्ला संस्करण भी है हेमन्त कुमार का गाया हुआ। गीत का एक दृश्य नीचे दिया गया है। क्या इसे देख कर आप गीत पहचान सकते हैं?




अपने जवाब आप हमें cine.paheli@yahoo.com पर 23 जनवरी शाम 5 बजे तक ज़रूर भेज दीजिये।



पिछली पहेली का हल


1. ख़ूबसूरत
2. ग़ज़ल
3. नैना
4. एक शोला
5. दिल
6. ज़िन्दगी
7. आँचल
8. काजल
9. धड़कन
10. शबनम

गीत - ये नैना ये काजल ये ज़ुल्फ़ें ये आँचल.....ख़ूबसूरत सी हो तुम ग़ज़ल, कभी दिल हो कभी धड़कन कभी शोला कभी शबनम, तुम ही हो तुम मेरी हमदम........ज़िन्दगी..... तुम मेरी, मेरी तुम ज़िन्दगी.........(फिल्‍म - दिल से मिले दिल)




पिछली पहेली के विजेता


इस बार हमारे चार नियमित प्रतियोगियों ने ही केवल भाग लिया और सभी के 100% सही जवाब हैं। सबसे पहले जवाब भेज करइस बार 'सरताज प्रतियोगी' बने हैं लखनऊ के श्री प्रकाश गोविन्द। बहुत बहुत बधाई आपको प्रकाश जी!

और अब इस सेगमेण्ट के सम्मिलित स्कोर कार्ड पर एक नज़र...



और अब महाविजेता स्कोर-कार्ड पर भी एक नज़र डाल लेते हैं।





इस सेगमेण्ट की समाप्ति पर जिन पाँच प्रतियोगियों के 'महाविजेता स्कोर कार्ड' पर सबसे ज़्यादा अंक होंगे, वो ही पाँच खिलाड़ी केवल खेलेंगे 'सिने पहेली' का महामुकाबला और इसी महामुकाबले से निर्धारित होगा 'सिने पहेली महाविजेता'। 


एक ज़रूरी सूचना:


'महाविजेता स्कोर कार्ड' में नाम दर्ज होने वाले खिलाड़ियों में से कौछ खिलाड़ी ऐसे हैं जो इस खेल को छोड़ चुके हैं, जैसे कि गौतम केवलिया, रीतेश खरे, सलमन ख़ान, और महेश बसन्तनी। आप चारों से निवेदन है (आपको हम ईमेल से भी सूचित कर रहे हैं) कि आप इस प्रतियोगिता में वापस आकर महाविजेता बनने की जंग में शामिल हो जायें। इस सेगमेण्ट के अन्तिम कड़ी तक अगर आप वापस प्रतियोगिता में शामिल नहीं हुए तो महाविजेता स्कोर कार्ड से आपके नाम और अर्जित अंख निरस्त कर दिये जायेंगे और अन्य प्रतियोगियों को मौका दे दिया जायेगा।


तो आज बस इतना ही, नये साल में फिर मुलाक़ात होगी 'सिने पहेली' में। लेकिन 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के अन्य स्तंभ आपके लिए पेश होते रहेंगे हर रोज़। तो बने रहिये हमारे साथ और सुलझाते रहिये अपनी ज़िंदगी की पहेलियों के साथ-साथ 'सिने पहेली' भी, अनुमति चाहूँगा, नमस्कार!

प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

Friday, January 17, 2014

बॉलीवुड के खान'दान की संगीतमयी भिडंत

ताज़ा सुर ताल - 2014 - 02

ताज़ा सुर ताल के नए अंक में आपका स्वागत है. आज हम आमने सामने ला रहे हैं बॉलीवुड के दो बड़े 'खान' को. २०१३ के अंत में आई धूम ३ ने अब तक के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. सबसे अधिक कमाई करने वाली इस फिल्म का संगीत भी श्रोताओं को बहुत रास आया है. प्रीतम ने एक बार फिर से साबित किया है ऐसी बड़ी फिल्मों की बागडोर सँभालने में उनसे बेहतर कोई नहीं है. समीर के शब्दों में सूफी रंग बहुत खूब जचा है. भाग मिल्खा भाग  के गीतों से अपनी दमदार उपस्तिथि दर्ज करने के बाद सिद्धार्थ महादेवन ने एक बार फिर अपनी सशक्त आवाज़ से पूरे गीत पर अपनी पकड़ बनाये रखी है, गीत का एक चौंकाने वाला पक्ष रहा शिल्पा राव की आवाज़. अमित त्रिवेदी की टीम का अहम अंग रही शिल्पा ने पिछले साल ही मुरब्बा  ओर मनमर्जियाँ  जैसे गहरे गीत गाए थे, पर मलंग  में उनका एक नया ही सुखद अंदाज़ सुनने को मिला है. कहा जाता है ये बॉलीवुड में अब तक का सबसे महंगा गीत है. देश विदेश से बड़े बड़े जिमनास्टिकों की पूरी फ़ौज है इसमें ओर इस गीत में लगभग ५ करोड का खर्चा आया है. बहरहाल गीत को परदे पर देखना वाकई सुखद है. एक ओर जानकारी आपको देते चलें कि ऑडियो में इस गीत का केवल एक पैरा ही है, जबकि फिल्म में एक ओर पैरा जोड़ा गया है, ओर गीत की स्क्रीन लम्बाई ६ मिनट से अधिक है. लीजिए सुनिए मलंग  का रूहानी अंदाज़     
शाहरुख की चेन्नई एक्सप्रेस  का रिकॉर्ड तोडा धूम ३ ,तो क्या अब सलमान खान की जय हो  ,धूम ३ का रिकॉर्ड तोड़ पाएगी ये देखने वाला होगा. सलमान की ये नई फिल्म फिर एक बार एक दक्षिण की हिट फिल्म का रिमेक है. प्रस्तुत गीत शायद इस फिल्म का सबसे सुरीला गीत है, जिसे रचा है सलमान के लिए हिट गीतों को रचती आई गीतकार-संगीतकार जोड़ी समीर ओर साजिद वाजिद ने. शान ओर श्रेया की भरोसेमंद आवाजों में ये गीत बेशक कुछ नया ऑफर नहीं करता मगर सुनने में बेहद सुरीला अवश्य है. डब्बू मलिक के बेटे अरमान मलिक भी इस एल्बम के साथ अपनी शुरुआत कर रहे हैं. उन्हें हमारी शुभकामनाएँ. सुनिए तेरे नैना बड़े कातिल मार ही डालेंगें .....    

Thursday, January 16, 2014

जब दिलीप साहब को मिली तलत साहब की मखमली आवाज़

खरा सोना गीत - जब जब फूल खिले 
प्रस्तोता - दीप्ती सक्सेना 
स्क्रिप्ट - सुजॉय चट्टर्जी 
प्रस्तुति - संज्ञा टंडन 

Wednesday, January 15, 2014

रागमाला गीत – 1 : प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट



 


प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट



रागो के रंग, रागमाला गीत के संग – 1


राग बहार, बागेश्री, यमन कल्याण, केदार, भैरव और मेघ मल्हार के रंग बिखेरता रागमाला गीत

‘मधुर मधुर संगीत सुनाओ...’


फिल्म : संगीत सम्राट तानसेन 
संगीतकार : एस.एन. त्रिपाठी 
गायक : पूर्णिमा सेठ, पंढारीनाथ कोल्हापुरे और मन्ना डे

आलेख : कृष्णमोहन मिश्र 
स्वर एवं प्रस्तुति : संज्ञा टण्डन







Tuesday, January 14, 2014

मनमोहन भाटिया की बड़ी दादी

इस साप्ताहिक स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको हिन्दी में मौलिक और अनूदित, नई और पुरानी, प्रसिद्ध कहानियाँ और छिपी हुई रोचक खोजें सुनवाते रहे हैं। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट काजल कुमार की व्यंग्यात्मक लघुकथा "ड्राइवर" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं मनमोहन भाटिया की कथा बड़ी दादी जिसे स्वर दिया है अर्चना चावजी ने।

कहानी "बड़ी दादी" का गद्य हिन्दी समय पर उपलब्ध है। इस कथा का कुल प्रसारण समय 19 मिनट 40 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

दिल्ली प्रेस कहानी प्रतियोगिता 2006 तथा अभिव्यक्ति कथा महोत्सव 2008 में पुरस्कृत मनमोहन भाटिया (बीकॉम एलएलबी) दिल्ली में रहते हैं। उनकी रचनायें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से छप रही हैं। उनका ब्लॉग कथासागर है।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

नन्हे पौत्र की शैतानी भरी बातें सुन कर देविका हँसने लगी।
 (मनमोहन भाटिया रचित "बड़ी दादी" से एक अंश)





नीचे के प्लेयर से सुनें.


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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
बड़ी दादी MP3

#First Story, Badi Dadi: Manmohan Bhatia/Hindi Audio Book/2014/01. Voice: Archana Chaoji

Monday, January 13, 2014

बदमस्त झुमरू

खरा सोना गीत - मैं हूँ झुमरू 
प्रस्तोता - लिंटा मनोज 
स्क्रिप्ट - सुजॉय चट्टर्जी 
प्रस्तुति - संज्ञा टंडन 


Sunday, January 12, 2014

पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के दिव्य स्वर में सूरदास का वात्सल्य भाव

 
स्वरगोष्ठी – 150 में आज


रागों में भक्तिरस – 18

कृष्ण की लौकिक बाललीला का अलौकिक चित्रण

‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...’



रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की अठारहवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और कुछ प्रमुख भक्तिरस कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की पिछली दो कड़ियों में हमने आपसे पन्द्रहवीं शताब्दी के सन्त कवि कबीर के व्यक्तित्व और उनके एक पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम सोलहवीं शताब्दी के कृष्णभक्त कवि सूरदास के एक लोकप्रिय पद- ‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...’ पर सांगीतिक चर्चा करेंगे। सूरदास के इस पद को भारतीय संगीत के अनेकानेक शीर्षस्थ कलासाधकों स्वर दिया है, परन्तु ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के इस अंक में हम आपको यह पद संगीत मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर, दक्षिण और उत्तर भारतीय संगीत पद्यति में समान रूप से लोकप्रिय गायिका विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी तथा हिन्दी फिल्मों के पहले सुपर स्टार कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ों में प्रस्तुत कर रहे हैं।  


पने शैशवकाल से ही हिन्दी साहित्य और संगीत परस्पर पूरक रहे हैं। नाथ पन्थ के कवियों से लेकर जयदेव और विद्यापति के भक्ति-साहित्य राग-रागिनियों से अभिसिंचित हैं। सोलहवीं शताब्दी के कृष्ण-भक्त कवि सूरदास का तो पूरा साहित्य ही संगीत पक्ष पर अवलम्बित है। सूर-साहित्य के अध्येताओं के लिए यह निश्चय कर पाना कठिन हो जाता है कि उनका साहित्यकार पक्ष अधिक प्रबल है कि संगीतज्ञ का। साहित्य और संगीत, दोनों ही रस और भाव की सृष्टि करने समर्थ है। ‘सूरसागर’ में भावों की जैसी विविधता दिखलाई देती है, वह अन्य किसी कवि की रचनाओं में दुर्लभ ही है। किस राग अथवा स्वर समूह से किस रस की सृष्टि की जा सकती है, यह सूरदास को ज्ञात था। कृष्ण की बाललीला हो या गोपियों का विरह प्रसंग, सूरदास ने भाव के अनुकूल ही रागों का चयन किया है। प्रत्येक राग किसी न किसी रस विशेष की अभिव्यक्ति करता है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद के पहले दशक में रेडियो से प्रसारित एक साक्षात्कार में कविवर सुमित्रानन्दन पन्त के यह पूछने पर कि “विशेष रस के लिए विशेष राग होते हैं, क्या यह सत्य है?” संगीत मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का उत्तर था- “यह नितान्त सत्य है। प्रत्येक राग विशेष रस के लिए होता है। हमें यह तथ्य प्रकृति से ही प्राप्त है। उच्चारण भेद से, आवाज़ के लगाव से, उसकी फ्रिक्वेन्सी के भिन्न-भिन्न रेशों के द्वारा भिन्न-भिन्न परिणाम आ सकते हैं”

सबसे पहले सूरदास का लोकप्रिय पद ‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...’ आप संगीत मार्तण्ड, अर्थात भारतीय संगीत जगत के सूर्य पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर से ही सुनेगे। 24 जून, 1897 को तत्कालीन बड़ौदा राज्य के जहाज नामक गाँव में एक ऐसे महापुरुष का जन्म हुआ था जिसने आगे चल कर भारतीय संगीत जगत को ऐसी गरिमा प्रदान की, जिससे सारा विश्व चकित रह गया। ओंकारनाथ का बचपन अभावों में बीता। यहाँ तक कि किशोरावस्था में ओंकारनाथ जी को अपने पिता और परिवार के सदस्यों के भरण-पोषण के लिए एक मिल में नौकरी करनी पड़ी। ओंकारनाथ की आयु जब 14 वर्ष की थी तभी उनके पिता का देहान्त हो गया। उनके जीवन में एक दिलचस्प मोड़ तब आया, जब भड़ौच के एक संगीत-प्रेमी सेठ ने किशोर ओंकारनाथ की प्रतिभा को पहचाना और उनके बड़े भाई को बुला कर संगीत-शिक्षा के लिए बम्बई के विष्णु दिगम्बर संगीत महाविद्यालय भेजने को कहा। पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के मार्गदर्शन में उनकी संगीत-शिक्षा आरम्भ हुई। विष्णु दिगम्बर संगीत महाविद्यालय, बम्बई (अब मुम्बई) में प्रवेश लेने के बाद ओंकारनाथ जी ने वहाँ के पाँच वर्ष के पाठ्यक्रम को तीन वर्ष में ही पूरा कर लिया और इसके बाद गुरु जी के चरणों में बैठ कर गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत संगीत की गहन शिक्षा प्राप्त की। 20 वर्ष की आयु में ही वे इतने पारंगत हो गए कि उन्हें लाहौर के गन्धर्व संगीत विद्यालय का प्रधानाचार्य नियुक्त कर दिया गया। 1934 में उन्होने मुम्बई में ‘संगीत निकेतन’ की स्थापना की। 1940 में महामना मदनमोहन मालवीय उन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संगीत संकाय के प्रमुख के रूप में बुलाना चाहते थे किन्तु अर्थाभाव के कारण न बुला सके। बाद में विश्वविद्यालय के एक दीक्षान्त समारोह में शामिल होने जब आए तो उन्हें वहाँ का वातावरण इतना अच्छा लगा कि वे काशी में ही बस गए। 1950 में उन्होने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के गन्धर्व महाविद्यालय के प्रधानाचार्य का पद-भार ग्रहण किया और 1957 में सेवानिवृत्त होने तक वहीं रहे। पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का जितना प्रभावशाली व्यक्तित्व था उतना ही असरदार उनका संगीत भी था। उनके संगीत में ऐसा जादू था कि आम से लेकर खास व्यक्ति भी सम्मोहित हुए बिना नहीं रह सकता। जब वे सूरदास का पद- ‘मैं नहीं माखन खायो, मैया मोरी...’ गाते थे तो वात्सल्य भाव की सार्थक अनुभूति से पूरे श्रोता समुदाय की आँखेँ नम हो जाती थीं। इस पद में राग तिलक कामोद की प्रधानता है, परन्तु साहित्य के सभी रसों से साक्षात्कार कराने के लिए पण्डित जी ने कुछ अन्य रागों के स्वर भी इस्तेमाल किये हैं। इस रिकार्डिंग में पण्डित जी के साथ अन्य स्वर, जो आप सुनेगे, वह पण्डित बलवन्तराव भट्ट, पण्डित कनक राय त्रिवेदी और पण्डित प्रदीप दीक्षित ‘नेहरंग’ के हैं। लीजिए आप भी सुनिए, पण्डित जी के स्वर में, सूरदास का यह पद।


सूरदास पद : ‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...’ : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर




सूरदास के साहित्य की भावभूमि का आधार वात्सल्य और श्रृंगार वर्णन है। वात्सल्य रस भी अन्य रसों की भाँति संगीत के मुख्य चार रसों- श्रृंगार, करुण, वीर और शान्त में ही समाहित हो जाता है। सूरदास के इस पद में अन्य सभी नौ रसों की उपस्थिति तो है, किन्तु वात्सल्य रस सभी रसों पर प्रभावी है। सूरदास का यही पद अब आप विश्वविख्यात संगीत विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी के स्वरों में सुनेगे। उत्तर और दक्षिण भारत के संगीत प्रेमियों के बीच समान रूप से लोकप्रिय शुभलक्ष्मी जी ने सूरदास के इस पद के लिए राग काफी का चयन किया है। राग काफी भक्ति, श्रृंगार और चंचलता का भाव सृजित करता है। यह काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा, स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर कोमल गान्धार और संवादी स्वर कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिया राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है। अब आप विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी के स्वरों में सूरदास का यही पद सुनिए। एच.एम.वी. द्वारा जारी इस रिकार्ड में सहयोगी स्वर राधा विश्वनाथन् का है।


सूरदास पद : ‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...’ : विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी




1942 में सूरदास के व्यक्तित्व पर एक फिल्म बनी थी- ‘भक्त सूरदास’, जिसमें अन्य पदों के साथ ‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...’ भी शामिल था। इस फिल्म के संगीतकार ज्ञानदत्त और गायक कुन्दनलाल सहगल थे। चौथे दशक के उत्तरार्द्ध से पाँचवें दशक के पूर्वार्द्ध में अत्यन्त सक्रिय रहे संगीतकार ज्ञानदत्त आज जनमानस से विस्मृत हो चुके हैं। रणजीत मूवीटोन की 1937 में बनी फिल्म ‘तूफानी टोली’ से अपनी संगीतकार की पारी आरम्भ करने वाले ज्ञानदत्त रणजीत स्टुडियो के अनुबन्धित संगीत निर्देशक थे। वर्ष 1940 तक उन्होने रणजीत की लगभग 20 फिल्मों में संगीत दिया था। अपनी पहली फिल्म ‘तूफानी टोली’ में ज्ञानदत्त ने अभिनेत्री निम्मी की माँ और अपने समय की मशहूर तवायफ वहीदन बाई से उनका पहला फिल्मी गीत- ‘क्यों नैनन में नीर बहाए...’ गवाया था। बाद में महिला गायिकाओं में वहीदन बाई, ज्ञानदत्त की प्रमुख गायिका बन गईं। इसके साथ ही अपनी पहली फिल्म में उन्होने पुरुष गायक के रूप में कान्तिलाल को अवसर दिया था। आगे चल कर ज्ञानदत्त की आरम्भिक फिल्मों में कान्तिलाल प्रमुख पुरुष गायक बने। महिला गायिकाओं में वहीदन बाई के अलावा कल्याणी, इन्दुबाला, इला देवी, राजकुमारी, खुर्शीद और सितारा आदि ने भी उनके गीतों को स्वर दिया।

पाँचवें दशक के आरम्भ में ज्ञानदत्त ने रणजीत के अलावा अन्य फिल्म निर्माण संस्थाओं की कई उल्लेखनीय फिल्मों में भी संगीत निर्देशन किया था। वे मूलतः प्रेम और श्रृंगार के संगीतकार थे और उन्होने उस समय के इस प्रकार के गीतों की प्रचलित परिपाटी से हट कर अपने गीतों में सुगम और कर्णप्रियता के तत्व डालने की कोशिश की थी। उन्होने पाँचवें दशक की अपनी फिल्मों में धुन की भावप्रवणता पर अधिक ध्यान दिया। इस दौर की उनकी सबसे उल्लेखनीय फिल्म थी, 1942 में प्रदर्शित, ‘भक्त सूरदास’। इस फिल्म में कुन्दनलाल सहगल के गाये कई गीतों ने अपने समय में धूम मचा दी थी। फिल्म ‘भक्त सूरदास’ में सूरदास के कुछ लोकप्रिय पदों को शामिल किया गया था। ‘निस दिन बरसत नैन हमारे...’, ‘मैं नहीं माखन खायो...’ और ‘मधुकर श्याम हमारे चोर...’ जैसे प्रचलित पदों को कुन्दनलाल सहगल ने अपना भावपूर्ण स्वर दिया था। सहगल के स्वरों में ‘मैं नहीं माखन खायो...’ का गायन शान्तरस के साथ वात्सल्य भाव की सृष्टि करता है। अब आप फिल्म ‘भक्त सूरदास’ का यह गीत सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


सूरदास पद : ‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...’ : फिल्म भक्त सूरदास : कुन्दनलाल सहगल





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक महान गायक की आवाज़ में भक्ति रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह पाँचवें सेगमेंट की अन्तिम पहेली है। इस अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – इस भक्ति रचना के अंश को सुन कर गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम लिख भेजिए।

2 – इस रचना की प्रस्तुति में किस ताल का प्रयोग हुआ है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 152वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 148वीं कड़ी में हमने आपको भक्तकवि कबीर के एक पद का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायक पण्डित कुमार गन्धर्व और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- चौदह मात्रा का चाँचर ताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हमारी एक नई प्रतिभागी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और चण्डीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने कृष्ण की बाललीला पर केन्द्रित भक्तकवि सूरदास के एक पद पर चर्चा की। इस अंक में कविवर सुमित्रानन्दन पन्त और पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर की बातचीत का प्रसंग सुश्री डेजी वालिया की पुस्तक ‘सूर काव्य में संगीत लालित्य’ से तथा संगीतकार ज्ञानदत्त का परिचय पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ से साभार उद्धरित किया है। अगले अंक में एक और भक्त कवि के व्यक्तित्व और कृतित्व पर हम आपसे चर्चा करेंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की उन्नीसवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

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