Saturday, December 22, 2012

'सिने पहेली' में आज क्रिस्मस स्पेशल


22 दिसम्बर, 2012
सिने-पहेली - 51  में आज 

पहचानिये सैण्टा क्लॉस के पीछे छुपे चेहरों को


'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, पिछली कड़ी में हमने आपसे जो सवाल पूछा था, उसके जो जवाब आप सब ने भेजे हैं, उसे देख कर हम सचमुच चकित रह गए हैं। हमने तो यही सोचा था कि आप ज़्यादा से ज़्यादा 40-50 गीत चुन कर भेजेंगे, पर आप में से कई प्रतियोगियों ने तो इससे कई गुणा अधिक गीत लिख कर भेजे हैं। पर दोस्तों, कई बार क्या होता है कि क्वान्टिटी के अधिक होने से क्वालिटी पर असर पड़ता है, आप सब के साथ भी वही हुआ। बिना जाँच-पड़ताल किए सीधे इंटरनेट से उपलब्ध जानकारी के अनुसार गीतों की सूची भेजने की वजह से कई गीत आप ने ग़लत भी भेज दिए हैं। तीन गायकों वाले कुछ गीतों में चौथा नाम डाल कर भी कुछ गीत आये हैं (उदाहरण - फ़िल्म 'राम लखन' के गीत "माइ नेम इज़ लखन" को मोहम्मद अज़ीज़, अनुराधा पौडवाल और नितिन मुकेश ने गाया है, जबकि कुछ प्रतियोगियों ने अनुराधा श्रीराम का नाम भी शामिल कर दिया है, जो ग़लत है)। इसी तरह से पाँच गायकों वाले गीत में से एक नाम हटा कर भी कुछ गीत हमें मिले हैं (उदाहरण - "दुक्की पे दुक्की हो या सत्ते पे सत्ता", "मिस्टर लोवा लोवा तेरी आंखों का जादू" आदि)। कुछ प्रतियोगियों ने एक ही गीत को एकाधिक बार अपनी सूची में शामिल किया है। एक प्रतियोगी ने तो एक गीत को तीन बार लिखा है। इन सब के चलते केवल दो दिनों में पिछली पहेली के परिणाम व विजेताओं की घोषणा कर पाना हमारे लिए असंभव हो गया है। हम आपके द्वारा भेजे गये हर गीत की जाँच कर रहे हैं, और यह जाँच पूरी होने पर ही 'सिने पहेली-50' के विजेताओं के नाम घोषित किए जायेंगे। सम्भवत: अगली कड़ी या उसकी अगली कड़ी में यह संभव हो पाएगा।

'सिने पहेली - 50' तथा पाँचवे सेगमेण्ट के परिणामों की घोषणा 29 दिसंबर अथवा 5 जनवरी के अंक में की जाएगी। इस विलम्ब के लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।


तो चलिए 'सिने पहेली' के सफ़र में आगे बढ़ते हैं और शुरू करते हैं इस प्रतियोगिता का छ्ठा सेगमेण्ट, अर्थात् 'सिने पहेली - 51'। क्योंकि नये सेगमेण्ट की शुरुआत हो रही है, इसलिए हम नये प्रतियोगियों का एक बार फिर से आह्वान करना चाहेंगे...


नये प्रतियोगियों का आह्वान

नये प्रतियोगी, जो इस मज़ेदार खेल से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए हम यह बता दें कि अभी भी देर नहीं हुई है। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ ऐसे हैं कि किसी भी समय जुड़ने वाले प्रतियोगी के लिए भी पूरा-पूरा मौका है महाविजेता बनने का। अगले सप्ताह से नया सेगमेण्ट शुरू हो रहा है, इसलिए नये खिलाड़ियों का आज हम एक बार फिर आह्वान करते हैं। अपने मित्रों, दफ़्तर के साथी, और रिश्तेदारों को 'सिने पहेली' के बारे में बताएँ और इसमें भाग लेने का परामर्श दें। नियमित रूप से इस प्रतियोगिता में भाग लेकर महाविजेता बनने पर आपके नाम हो सकता है 5000 रुपये का नगद इनाम। अब महाविजेता कैसे बना जाये, आइए इस बारे में आपको बतायें।

आज की पहेली : 'मेरी' क्रिस्मस, तेरी पहेली


'सिने पहेली' के सभी प्रतियोगियों को हमारी तरफ़ से क्रिस्मस की हार्दिक शुभकामनायें। सैण्टा क्लॉस क्रिस्मस का अभिन्न अंग हैं। सैण्टा के बिना बच्चों और बड़ों, सब की क्रिस्मस अधूरी है। इसलिए आज की पहेली को तैयार करने में सैण्टा क्लॉस का ही हमने सहारा लिया है। हमने दस अभिनेता और गायकों को सैण्टा का जामा पहनाया है, अब आपको इस अभिनेताओं व गायकों की शिनाक्त करनी है। तो ये रहे वो दस कलाकार, ध्यान से इन तसवीरों को देखिये और पहचानिये सैण्टा क्लॉस के पीछे छुपे इन चेहरों को....













जवाब भेजने का तरीका

उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 51" अवश्य लिखें, और अन्त में अपना नाम व स्थान लिखें। आपका ईमेल हमें गुरुवार, 27 दिसम्बर, शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।



कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता'

1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा।

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। चौथे सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...


4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।


'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, आज के लिए मुझे अनुमति दीजिए, अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी, आप सभी को एक बार फिर से "मेरी क्रिस्मस",  नमस्कार। 



Friday, December 21, 2012

शब्दों के चाक पर - अंक 22

जब तुम्हारे दिल में मेरे लिए प्यार उमड़ आये,
और वो तुम्हारी आँखो से छलक सा जाए
मुझसे अपनी दिल के बातें सुनने को
यह दिल तुम्हारा मचल सा जाए
तब एक आवाज़ दे कर मुझको बुलाना
दिया है जो प्यार का वचन सजन,
तुम अपनी इस प्रीत की रीत को निभाना
~ रंजु भाटिया

दोस्तों, कविता पाठ के इस साप्ताहिक कार्यक्रम की आज की कड़ी में हमारा विषय है - "प्रीत की रीत निभाये" एवं "उस पार और एक आवाज़"। हमने शुरूआत प्यार से की और सफर खत्म पर किया यादों पर। दोनों विषयों पर हमें एक से बढकर कविताएँ पढने को मिलीं और हमने पूरी कोशिश की कि उनमें से कुछ कविताएँ आपको सुनवा दें। उम्मीद करते हैं कि हम इस प्रयास में सफल हुए होंगे। कविताएं पिरोकर लाये हैं आज हमारे विशिष्ट कवि मित्र। पॉडकास्ट को स्वर दिया है शेफाली गुप्ता ओर अनुराग शर्मा ने, स्क्रिप्ट रची है विश्व दीपक ने, सम्पादन व संचालन है अनुराग शर्मा का। आइये सुनिए सुनाईये ओर छा जाईये ...


(नीचे दिए गए किसी भी प्लेयेर से सुनें)




 या फिर यहाँ से डाउनलोड करें (राईट क्लिक करके 'सेव ऐज़ चुनें')

"शब्दों के चाक पर" हमारे कवि मित्रों के लिए हर हफ्ते होती है एक नयी चुनौती, रचनात्मकता को संवारने के लिए मौजूद होती है नयी संभावनाएँ और खुद को परखने और साबित करने के लिए तैयार मिलता है एक और रण का मैदान. यहाँ श्रोताओं के लिए भी हैं कवि मन की कोमल भावनाओं उमड़ता घुमड़ता मेघ समूह जो जब आवाज़ में ढलकर बरसता है तो ह्रदय की सूक्ष्म इन्द्रियों को ठडक से भर जाता है. तो दोस्तों, इससे पहले कि हम पिछले हफ्ते की कविताओं को आत्मसात करें, आईये जान लें इस दिलचस्प खेल के नियम -
1. इस साप्ताहिक कार्यक्रम में शब्दों का एक दिलचस्प खेल खेला जायेगा. इसमें कवियों को कोई एक थीम शब्द या चित्र दिया जायेगा जिस पर उन्हें कविता रचनी होगी...ये सिलसिला सोमवार सुबह से शुरू होगा और गुरूवार शाम तक चलेगा, जो भी कवि इसमें हिस्सा लेना चाहें वो रश्मि जी के फेसबुक ग्रुप में यहाँ जुड़ सकते है.


2. सोमवार से गुरूवार तक आई कविताओं को संकलित कर हमारे पोडकास्ट टीम के प्रमुख पिट्सबर्ग से अनुराग शर्मा जी अपने साथी पोडकास्टरों के साथ इन कविताओं में आवाज़ भरेंगें और अपने दिलचस्प अंदाज़ में इसे पेश करेगें.


3. हमारी टीम अपने विवेक से सभी प्रतिभागी कवियों में से किसी एक कवि को उनकी किसी खास कविता के लिए सरताज कवि चुनेगी. आपने अपनी टिप्पणियों के माध्यम से यह बताना है कि क्या आपको हमारा निर्णय सटीक लगा, अगर नहीं तो वो कौन सी कविता जिसके कवि को आप सरताज कवि चुनते.


4. अधिक जानकारी के लिए आप हमारे संचालक विश्व दीपक जी से इस पते पर संपर्क कर सकते हैं- vdeepaksingh@gmail.com

Thursday, December 20, 2012

रफी ने जब नौशाद का पहला गीत गाया : नौशाद के 94वें जन्मदिन पर विशेष


स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल – 28

नौशाद की बारात में जब बैंड पर उन्हीं के रचे गीतों की धुन बजी



भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों के झरोखे से’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, लगभग आधी शताब्दी तक सिने-संगीत पर एकछत्र राज करने वाले चर्चित संगीतकार नौशाद अली का 25 दिसम्बर को 94वाँ जन्मदिवस है। इस अवसर के लिए आज का यह अंक हम उनकी स्मृतियों को समर्पित कर रहे हैं। फिल्मों में नौशाद का पदार्पण चौथे दशक में ही हो गया था, किन्तु उन्हे स्वतंत्र रूप से पहचान मिली पाँचवें दशक के आरम्भिक वर्षों में। उनके संगीत से सजी, 1944 में प्रदर्शित फिल्म ‘रतन’ को आशातीत सफलता मिली थी। आज के अंक में फिल्म ‘रतन’ और इसी वर्ष बनी तीन अन्य फिल्मों में नौशाद के रचनात्मक योगदान की  चर्चा करेंगे।



1944 का साल संगीतकार नौशाद के करीयर का ‘टर्निंग पॉयण्ट ईयर’ साबित हुआ। गीतकार के रूप में ख्याति अर्जित करने के बाद दीनानाथ मधोक ने ख़ुद फ़िल्म बनाने की सोची। पर युद्धकाल होने की वजह से फ़िल्म-निर्माण लाइसेन्स नियंत्रित हो गया था जिसका नियंत्रण ब्रिटिश सरकार के हाथ में था। ऐसे में मधोक ने जेमिनी दीवान से सम्पर्क किया जिनके पास फ़िल्म-निर्माण का लाइसेन्स था। इस तरह से ‘जेमिनी पिक्चर्स’ के बैनर तले मधोक ने बनाई ‘रतन’ जिसके प्रदर्शित होते ही चारों तरफ़ धूम मच गई और नौशाद प्रथम श्रेणी के संगीतकारों में शामिल हो गए। नौशाद ने इस फ़िल्म में ज़ोहराबाई अम्बालेवाली से “अखियाँ मिलाके जिया भरमाके चले नहीं जाना...” गवाकर चारों तरफ़ तहलका मचा दिया। यह गीत न केवल ज़ोहराबाई का सबसे चर्चित गीत साबित हुआ बल्कि यह अब तक का सबसे पुराना ऐसा गीत है जिसका रीमिक्स बना है। एम. सादिक़ निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे करण दीवान और स्वर्णलता। फ़िल्म के अन्य चर्चित गीतों में ज़ोहराबाई और करण दीवान का गाया “सावन के बादलों, उनसे ये जा कहो, तक़दीर में यही था, साजन मेरे ना रो...” गीत भी अपने ज़माने का मशहूर गीत रहा। डी.एन. मधोक के लिखे इन गीतों में ज़ोहराबाई के एकल स्वर में “परदेसी बालम आ बादल आए, तेरे बिना कछु न भाए आ...”, “रुमझुम बरसे बादरवा, मस्त हवाएँ आईं...” और “आई दीवाली, आई दीवाली, दीपक संग नाचे पतंगा...” जैसे गीतों का भी अपना अलग स्वाद था। ये सभी गीत उत्तर भारत के लोक-संगीत पर आधारित थे। “आई दीवाली...” तो राग भैरवी पर भी आधारित था। अमीरबाई और श्याम कुमार का गाया युगल गीत “ओ जानेवाले बालमवा लौट के आ, लौट के आ...” अपने आप में एक ट्रेण्डसेटर गीत था क्योंकि इसमें नायिका जिस तरह से नायक से अपने प्रेम के लिए राज़ी कर रही हैं, मना रही हैं, पर नायक जवाब में कहते हैं “जा मैं ना तेरा बालमवा, बेवफ़ा बेवफ़ा”। फ़िल्मी गीत का यह फ़ॉरमूला बाद के वर्षों में अनेक गीतों में सुनने को मिला। अमीरबाई के एकल स्वर में “मिलके बिछड़ गईं अखियाँ हाय रामा...” भी एक सुन्दर रचना थी जिसमें भी लोक-संगीत और ऑरकेस्ट्रेशन का सुरीला संगम था। ‘रतन’ में मंजू नामक अभिनेत्री ने करण दीवान के बहन की भूमिका निभाई थी और उनका गाया इस फ़िल्म का गीत “अंगड़ाई तेरी है बहाना, साफ़ कह दो हमें कि जाना जाना...” बेहद मशहूर हुआ था। मंजू का गाया फ़िल्म का एक और गीत रहा “झूठे हैं सब सपन सुहाने, मूरख मन सच जाने...”। इसी फ़िल्म के सेट पर करण दीवान और मंजू का पहला परिचय हुआ था और इन दोनों ने बाद में एक दूजे से शादी कर ली। अमीरबाई, ज़ोहराबाई और मंजू की अलग अलग आवाज़ें फ़िल्म के गीतों में विविधता ले आई और एक दूसरे से बढ़कर सुनने में लगे। करण दीवान की आवाज़ सहमी हुई आवाज़ थी, इसलिए उनसे ज़्यादा गाने गवाए नहीं गए। उनके एकल स्वर में ‘रतन’ का एक गीत था “जब तुम ही चले परदेस, लगा कर ठेस, ओ प्रीतम प्यारा...”। ‘रतन’ में कुल दस गीत थे, जिन्हें मधोक ने लिखे, और मधोक ने ही फ़िल्म के संवाद भी लिखे। एक ब्लॉकबस्टर फ़िल्म होने के साथ साथ ‘रतन’ विवाद में भी फँसी क्योंकि फ़िल्म विधवा-पुनर्विवाह की कहानी पर केन्द्रित थी। अगर ग़ुलाम हैदर पंजाबी लोक धुनों को फ़िल्म-संगीत में लोकप्रिय बनाने के लिए जाने गए, तो नौशाद ने उत्तर प्रदेश के लोक-संगीत पर प्रयोग किए और फ़िल्मी गीतों में इन्हें ऐसे घोल दिया कि फिर कभी यह इससे अलग ही नहीं हो पाया। आइए यहाँ थोड़ा विराम लेकर आपको सुनवाते है, फिल्म ‘रतन’ का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत-


फिल्म ‘रतन’ : ‘अँखियाँ मिलाके जिया भरमाके...’ : ज़ोहराबाई अम्बालेवाली



उत्तर प्रदेश की लोक धुनें, मधुर ऑरकेस्ट्रेशन, और ग़ुलाम मोहम्मद की थिरकन भरी तबले और ढोलक के ठेके, कुल मिलाकर एक ऐसी स्टाइल का जन्म हुआ जिसे लोगों ने हाथोंहाथ ग्रहण किया। कहा जाता है कि ‘रतन’ का निर्माण 80,000 रुपये में हुआ था, जबकि निर्माता को केवल ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड की रॉयल्टी से ही 3,50,000 रुपये की आमदनी हुई थी। नौशाद अपने परिवार के ख़िलाफ़ जाकर फिल्म संगीत में अपनी क़िस्मत आज़माने बम्बई आ गए थे। उनके संगीतकार बन जाने के बाद और सफलता हासिल कर लेने के बाद भी उनके परिवार में इस कामयाबी को अच्छी निगाहों से नहीं देखा गया। उन्हीं के शब्दों में एक मज़ेदार क़िस्से का आनन्द लीजिए यहाँ पर – “ख़ैर, माँ का पैग़ाम आया कि शादी के लिए लड़की तय हो गई है, मैं घर आ जाऊँ। उस वक़्त मैं नौशाद बन चुका था। माँ ने कहा कि लड़की वाले सूफ़ी लोग हैं, इसलिए उनसे उन्होंने (नौशाद के पिता ने) यह नहीं कहा कि तुम संगीत का काम करते हो, बल्कि तुम दर्ज़ी का काम करते हो। मैंने सोचा कि संगीतकार से दर्ज़ी की इज़्ज़त ज़्यादा हो गई है! तो शादी में शामियाना लगाया गया, और बैण्ड वाले मेरे ही गाने बजाए जा रहे हैं और मैं दर्ज़ी बना बैठा हूँ। किसी ने फिर कहीं से कहा कि कौन ये सब बजा रहा है, सबको ख़राब कर रहा है?

‘कारदार प्रोडक्शन्स’ की १९४४ की सभी तीन फ़िल्मों में नौशाद का संगीत और डी.एन. मधोक व माहर-उल-क़ादरी के गीत थे। ये फ़िल्में थीं ‘गीत’, ‘जीवन’ और ‘पहले आप’। ‘गीत’ में निर्मला, अमीरबाई, ज़ोहराबाई और शाहू मोडक के गाए गीत थे। अब हम आपको फिल्म ‘गीत’ से नौशाद का संगीतबद्ध किया और निर्मला देवी का गाया एक मधुर गीत सुनवाते हैं।


फिल्म ‘गीत’ : ‘मैं तो पिया की जोगिनियाँ हूँ...’ : निर्मला देवी



नौशाद की ही संगीतबद्ध फिल्म ‘जीवन’ में ज़ोहराबाई और निर्मला देवी के साथ साथ हमीदा ने भी अपनी आवाज़ दी थी। ‘जीवन’ में ज़ोहराबाई का गाया “नैनों में नैना मत डालो जी ओ बलम...” लोकप्रिय हुआ था। अंग्रेज़ी शब्दों के प्रयोग वाला ज़ोहरा का ही गाया एक गीत भी फिल्म में था “My dear my dear, I love you, मोरा जिया न लगे... ”। इस फ़िल्म का नाम पहले ‘बहार’ रखा गया था। ‘रतन’ और इन तमाम फ़िल्मों में गीत गाकर ज़ोहराबाई उस दौर में शीर्ष की पार्श्वगायिकाओं में अपना नाम दर्ज करवा चुकी थीं। इन्हीं ज़ोहराबाई की आवाज़ में अब हम आपको फिल्म ‘जीवन’ का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत सुनवाते है।


फिल्म ‘जीवन’ : ‘नैनों में नैना मत डारो...’ : ज़ोहराबाई अम्बालेवाली




नौशाद के संगीत निर्देशन में 1944 में बनी फिल्म ‘पहले आप’ में भी ज़ोहराबाई के गाये कम से कम दो चर्चित गीत रहे “मोरे सैंयाजी ने भेजी चुनरी रंगूँ मैं इसे प्यार के रंग दा...” और “चले गए चले गए दिल में आग लगाने वाले...”। परन्तु ‘पहले आप’ फ़िल्म को आज लोग जिस वजह से याद करते हैं, उसका कारण कुछ और है। यही वह फ़िल्म थी जिसके ज़रिए नौशाद ने हिन्दी सिने-संगीत जगत को एक नई आवाज़ दी। यह वह शख़्स की आवाज़ थी जिसे आज गायकों का शहंशाह कहा जाता है, जिनका नाम फ़िल्म-संगीत के इतिहास के सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायकों की फ़ेहरिस्त में सबसे उपर आता है। यह नाम है मोहम्मद रफ़ी का जिन्होंने फ़िल्म-संगीत जगत में अपने समकालीन कुछ और चर्चित पार्श्वगायकों के साथ करीब करीब ३५ वर्षों तक राज किया। नौशाद से रफ़ी को मिलवाने का श्रेय हमीद भाई को ही जाता है। उन्होंने ही लखनऊ जाकर नौशाद के पिता से मिल कर, उनसे एक सिफ़ारिशनामा लेकर रफ़ी को दे दिया कि बम्बई जाकर इसे नौशाद को दिखाए। बम्बई जाकर नौशाद से रफ़ी की पहली मुलाक़ात का वर्णन विविध भारती पर नौशाद के साक्षात्कार में मिलता है– “जब मोहम्मद रफ़ी मेरे पास आए, तब वर्ल्ड वार ख़त्म हुआ चाहता था। मुझे साल याद नहीं। उस वक़्त फ़िल्म प्रोड्यूसर्स को कम से कम एक वार-प्रोपागण्डा फ़िल्म ज़रूर बनाना पड़ता था। रफ़ी साहब लखनऊ से मेरे पास मेरे वालिद साहब का एक सिफ़ारिशी ख़त लेकर आए। छोटा सा तम्बूरा हाथ में लिए खड़े थे मेरे सामने। मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने संगीत सीखा है, तो बोले कि उस्ताद बरकत अली ख़ाँ से सीखा है, जो उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब के छोटे भाई थे। मैंने उनको कहा कि इस वक़्त मेरे पास कोई गीत नहीं है जो मैं उनसे गवा सकता हूँ, पर एक कोरस ज़रूर है जिसमें अगर वो चाहें तो कुछ लाइनें गा सकते हैं। और वह गाना था “हिन्दुस्तान के हम हैं हिन्दुस्तान हमारा, हिन्दू मुस्लिम दोनों की आँखों का तारा...”। इस गीत में रफ़ी साहब ने दो लाइन गायीं जिसके लिए उन्हें दस रुपये दिए गए। श्याम, दुर्रानी और कुछ अन्य गायकों ने भी कुछ-कुछ पंक्तियाँ गायीं।” और इस तरह से मोहम्मद रफ़ी का गाया पहला हिन्दी फ़िल्मी गीत बाहर आया। पर रेकॉर्ड पर इस गीत को “समूह गीत” लिखा गया। यह गीत न केवल रफ़ी साहब के करियर का एक महत्वपूर्ण गीत बना, बल्कि इसके गीतकार डी.एन. मधोक के लिए भी यह उतना ही महत्वपूर्ण गीत बना क्योंकि इस गीत में उनके धर्मनिरपेक्षता के शब्दों के प्रयोग के लिए उन्हें “महाकवि” के शीर्षक से सम्मानित किया गया था। ब्रिटिश राज ने इस गीत का मार्च-पास्ट गीत के रूप में विश्वयुद्ध में इस्तेमाल किया। भले ही “हिन्दुस्तान के हम हैं...” गीत के लिए रफ़ी का नाम रेकॉर्ड पर नहीं छपा, पर इसी फ़िल्म में नौशाद ने उनसे दो और गीत भी गवाए, जो श्याम के साथ गाए हुए युगल गीत थे – “तुम दिल्ली में आगरे, मेरे दिल से निकले हाय...” और “एक बार उन्हें मिला दे, फिर मेरी तौबा मौला...”। एक गीत ज़ोहराबाई के साथ भी उनका गाया हुआ बताया जाता है- “मोरे सैंयाजी ने भेजी चुनरी...”, पर रेकॉर्ड पर ‘ज़ोहराबाई और साथी’ के नाम श्रेय दिया गया है। जो भी है, ‘पहले आप’ फिल्म से नौशाद और रफ़ी की जो जोड़ी बनी थी, वह अन्त तक क़ायम रही। फिल्म ‘पहले आप’ में नौशाद के संगीत निर्देशन में रफी के गाये पहले गीत का आप आनन्द लीजिए और आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


फिल्म ‘पहले आप’ : ‘हिन्दुस्तान के हम हैं हिन्दुस्तान हमारा...’ : मोहम्मद रफी और साथी




आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के आगामी अंक में आपके लिए हम एक रोचक संस्मरण लेकर उपस्थित होंगे। आप अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें radioplaybackindia@live.com पर अवश्य भेजें। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Tuesday, December 18, 2012

बोलती कहानियाँ: झलमला - पदुमलाल पन्नालाल बख्शी

सेर भर सोने को हजार मन कण्डे में, खाक कर छोटू वैद्य रस जो बनाते हैं।
लाल उसे खाते तो यम को लजाते, और बूढ़े उसे खाते देव बन जाते हैं।
रस है या स्वर्ग का विमान है या पुष्प रथ, खाने में देर नहीं, स्वर्ग ही सिधाते हैं।
सुलभ हुआ है खैरागढ़ में स्वर्गवास, और लूट घन छोटू वैद्य सुयश कमाते हैं।
(पदुमलाल पन्नालाल बख्शी की "घनाक्षरी", अप्रैल 1931 में "प्रेमा" में प्रकाशित)

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में श्री हंसराज “सुज्ञ” की हिन्दी लघुकथा ""आसक्ति की मृगतृष्णा" का पॉडकास्ट सुना था। 18 दिसंबर को सरस्वती पत्रिका के कुशल संपादक, साहित्य वाचस्पति और ‘मास्टरजी’ के नाम से प्रसिद्ध हिन्दी के प्रख्यात साहित्यकार डॉ. पदुमलाल पन्नालाल बख्शी की पुण्यतिथि पर रेडियो प्लेबैक इंडिया की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं साहित्य वाचस्पति पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ‘मास्टरजी’ की लघुकथा "झलमला", अनुराग शर्मा की आवाज़ में।

प्रस्तुत कहानी "झलमला" का पाठ उदन्ती.कॉम पर पढ़ा जा सकता है। कहानी का कुल प्रसारण समय 5 मिनट 40 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

 यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


डॉ. पदुमलाल पन्नालाल बख्शी
जन्म: २७ मई, १८९४
राजनांदगांव, छत्तीसगढ़, भारत
मृत्यु: १८ दिसंबर, १९७१
रायपुर, छत्तीसगढ़, भारत

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी

"'भाभी क्या तुम्हारे प्रेम के आलोक का इतना ही मूल्य है।?"
(डॉ. पदुमलाल पन्नालाल बख्शी की लघुकथा "झलमला" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
 

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
(लिंक पर राइट क्लिक करके "सेव ऐज़" का विकल्प चुनें)

 #42nd Story, Jhalmala: Padumlal Punnalal Bakshi/Hindi Audio Book/2012/42. Voice: Anurag Sharma

Monday, December 17, 2012

चुनिए वर्ष २०१२ के संगीत दिग्गज

दोस्तों पिछले हफ्ते की वोटिंग के बाद हमें हमारे चुने हुए ५० गीतों में से आप श्रोताओं की पसंद के २० श्रेष्ठ गीत प्राप्त हो गए हैं. अब बारी है चुनने की वर्ष के सर्वश्रेष्ठ संगीत महारथियों को जिनका काम आपको सबसे अधिक अच्छा लगा. आपके पास वोटिंग के लिए रविवार शाम ४.३० तक का समय रहेगा. अगले सोमवार यानी २४ दिसंबर को हम आपको सुनवायेंगें रेडियो प्लेबैक के समीक्षकों की टीम और उसके श्रोताओं द्वारा चुने गए २० सर्वश्रेष्ठ गीत, साथ ही बतायेंगें उन कलाकारों के नाम भी जो होंगें आपकी राय में वर्ष के सबसे सुरीले रचनाकार.


सर्वश्रेष्ठ गायक (वर्ष २०१२) 


सर्वश्रेष्ठ गायिका (वर्ष २०१२)


सर्वश्रेष्ठ संगीतकार (वर्ष २०१२)


सर्वश्रेष्ठ गीतकार (वर्ष २०१२) 


सर्वश्रेष्ठ अल्बम (वर्ष २०१२)

Sunday, December 16, 2012

नारी-कण्ठ पर सुशोभित ठुमरी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’


स्वरगोष्ठी-१०० में आज 

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – ११

‘आ जा साँवरिया तोहे गरवा लगा लूँ, रस के भरे तोरे नैन...’ 


‘स्वरगोष्ठी’ के १००वें अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, आपकी शुभकामनाओं, आपके सुझावों और मार्गदर्शन के बल पर आज हम ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के १००वें अंक तक आ पहुँचे है। इन दिनों इस साप्ताहिक स्तम्भ के अन्तर्गत लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ का हम प्रकाशन कर रहे हैं। आज इस श्रृंखला की ११वीं कड़ी है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हमने आपको कुछ ऐसी पारम्परिक ठुमरियों का रसास्वादन कराया जिन्हें फिल्मों में शामिल किया गया था। इस लघु श्रृंखला को अब हम आज विराम देंगे और नए वर्ष से आप सब के परामर्श के आधार पर एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ करेंगे। आइए, अब आज की कड़ी का आरम्भ करते हैं।


घु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के अन्तर्गत आज हम जिस ठुमरी पर चर्चा करेंगे, वह है- ‘आ जा साँवरिया तोहे गरवा लगा लूँ, रस के भरे तोरे नैन...’। प्रत्यक्ष रूप से तो यह ठुमरी श्रृंगार रसप्रधान है किन्तु कुछ समर्थ गायक-गायिकाओं ने इसे कृष्णभक्ति से तो कुछ ने विरह भाव से जोड़ा है। इन सभी भावों की अभिव्यक्ति के लिए राग भैरवी के अलावा भला और कौन राग हो सकता है? इस श्रृंखला के दौरान जाने-माने इसराज और मयूरवीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने अनुरोध किया था कि कोई ऐसी ठुमरी केवल महिला गायिकाओं के स्वरों में ही सुनवाया जाए जिसमें स्त्रियोचित श्रृंगार के भाव हों। श्रीकुमार जी के अनुरोध को स्वीकार कर आज की यह श्रृंगारप्रधान ठुमरी केवल महिला गायिकाओं के स्वरों में ही प्रस्तुत कर रहे हैं।

हमारी आज की ठुमरी- ‘रस के भरे तोरे नैन...’ की पहली गायिका हैं, अपने समय की सुप्रसिद्ध गायिका, गौहर जान। २६ जून, १८७३ को जन्मीं गौहर जान आर्मेनियन माता-पिता की सन्तान थीं। हालाँकि उनकी माँ विक्टोरिया का जन्म भारत में ही हुआ था और उनका विवाह १८७२ में विलियम रावर्ट के साथ हुआ था। विक्टोरिया भारतीय गायन और नृत्य शैली में पारंगत थी। रावर्ट के साथ विवाह सम्बन्ध टूटने के बाद विक्टोरिया ने अपने एक संगीत के कद्रदान खुर्शीद से निकाह कर लिया और बनारस आ बसीं। उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार किया और खुद का नाम बदल कर मालिका जान कर लिया और अपनी बेटी को गौहर जान नाम दिया। गौहर को ठुमरी, दादरा और गजल गायन में खूब शोहरत मिली। भारत का पहला डिस्क ग्रामोफोन कम्पनी ने जो जारी किया, वह उनकी आवाज़ में ख़याल गायन का था, जो राग जोगिया में निबद्ध था। १९०२ में जारी हुए इस पहले रिकॉर्ड से १९२० तक उनके लगभग ६०० रेकॉर्ड्स बाजार में आए। हिन्दी, उर्दू के अलावा उन्होंने, बांग्ला, गुजराती, मराठी, तमिल, अरेबिक, पश्तो, फ्रेंच, और अँग्रेजी भाषाओं में भी गीत गाये थे। उन दिनों ग्रामोफोन कम्पनी के चलन के अनुसार गौहर जान अपनी हर रिकॉर्डिंग का समापन वो इस संवाद के साथ करती थी– “मेरा नाम गौहर जान है”। (मासिक पत्रिका ‘अहा ज़िंदगी’ के दिसम्बर, २०१२ अंक में प्रकाशित सजीव सारथी के आलेख ‘आवाज़ की दुनिया के दोस्तों...’ से साभार।) गायिका गौहर जान (१८७३-१९३०) की आवाज़ में ठुमरी- ‘रस के भरे तोरे नैन...’ जिसे अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, ग्रामोफोन कम्पनी ने इसकी रिकॉर्डिंग १९०५ में की थी।



ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : गायिका गौहर जान




बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जो ठुमरी गायिकाएँ संगीत-रसिकों की सिरमौर बनीं थी उनमें शीर्ष पर एक ही नाम था, रसूलन बाई (१९०२-१९७४) का। बात जब जब बोल-बनाव ठुमरी की हो तो रसूलन बाई का ज़िक्र आवश्यक हो जाता है। पूरब अंग की गायकी- ठुमरी, दादरा, होरी, चैती, कजरी आदि शैलियों की अविस्मरणीय गायिका रसूलन बाई बनारस (वाराणसी) की रहने वाली थीं। संगीत के संस्कार इन्हें अपनी नानी से विरासत में मिले थे। रसूलन बाई के संगीत को निखारने में उस्ताद आशिक खाँ, नज्जू मियाँ और टप्पा गायकी के अन्वेषक मियाँ शोरी खानदान के शम्मू खाँ का बहुत बड़ा योगदान था। पूरब अंग की भावभीनी गायकी की चैनदारी, बोल-बनाव के लहजे, कहन के खास ढंग और ठहराव, यह सारे गुण रसूलन बाई की गायकी में था। टप्पा तो जैसे रसूलन बाई के लिए ही बना था। बारीक मुरकियाँ और मोतियों की लड़ियों जैसी तानों पर उन्हें कमाल हासिल था। उनकी गायी ठुमरी भैरवी- ‘रस के भरे तोरे नैन...’, आप सुनिए और श्रृंगार रस की सार्थक अनुभूति कीजिए।



ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : गायिका रसूलन बाई



जिस अवधि में गायिका रसूलन बाई सक्रिय थीं, लगभग उसी अवधि में ठुमरी के भक्ति और आध्यात्मिक भाव को उकेरने में सिद्ध गायिका सिद्धेश्वरी देवी का यश भी चरम पर था। पूरब अंग की ठुमरियों के लिए विख्यात बनारस के संगीत-प्रेमियों में सिद्धेश्वरी देवी का नाम आदर से लिया जाता था। संगीत-प्रेमियों के बीच वे ‘ठुमरी क्वीन’ के नाम से पहचानी जाती थीं। उनकी संगीत संगीत-शिक्षा बचपन में गुरु सियाजी महाराज से हुई थी। निःसन्तान होने के कारण सियाजी दम्पति ने सिद्धेश्वरी को गोद ले लिया और संगीत की शिक्षा के साथ-साथ उनका पालन-पोषण भी किया। बाद में उनकी शिक्षा बड़े रामदास से भी हुई। बनारस की गायिकाओं में सिद्धेश्वरी देवी, काशी बाई और रसूलन बाई समकालीन थीं। १९६६ में उन्हें ‘पद्मश्री’ सम्मान से अलंकृत किया गया था। नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत संगीत-शिक्षा प्रदान करने के लिए उन्हें १९६५ में दिल्ली के श्रीराम भारतीय कला केन्द्र आमंत्रित किया गया। लगभग बारह वर्षों तक केन्द्र में कार्य करते हुए १९७७ में सिद्धेश्वरी देवी का निधन हुआ। १९८९ में फिल्मकार मणि कौल ने सिद्धेश्वरी देवी के जीवन और संगीत पर एक वृत्तचित्र ‘सिद्धेश्वरी’ का निर्माण किया था। आइए, आज की इसी ठुमरी को सिद्धेश्वरी जी के स्वरों में एक अलग ही अंदाज़ में सुनते हैं।


ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : गायिका सिद्धेश्वरी देवी
 


उप-शास्त्रीय संगीत को वर्तमान में संगीत के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कराने में विदुषी गिरिजा देवी के योगदान को सदियों तक स्मरण किया जाता रहेगा। आयु के नौवें दशक में भी सक्रिय गिरिजा देवी का जन्म ८ मई, १९२९ को कला और संस्कृति की राजधानी वाराणसी (तत्कालीन बनारस) में हुआ था। पिता रामदेव राय जमींदार थे और संगीत से उनका विशेष लगाव था। मात्र पाँच वर्ष की गिरिजा के लिए उन्होने संगीत-शिक्षा की व्यवस्था कर दी थी। एक साक्षात्कार में गिरिजा देवी ने स्वीकार किया है कि उनके प्रथम गुरु उनके पिता ही थे। गिरिजा देवी के प्रारम्भिक गुरु पण्डित सरयूप्रसाद मिश्र थे। नौ वर्ष की आयु में पण्डित श्रीचन्द्र मिश्र से उन्होंने संगीत की विभिन्न शैलियों की शिक्षा प्राप्त करना आरम्भ किया। नौ वर्ष की आयु में ही एक हिन्दी फिल्म ‘याद रहे’ में गिरिजा देवी ने अभिनय भी किया था। गिरिजा देवी का विवाह १९४६ में एक व्यवसायी परिवार में हुआ था। उन दिनों कुलीन विवाहिता स्त्रियों द्वारा मंच प्रदर्शन अच्छा नहीं माना जाता था। परन्तु सृजनात्मक प्रतिभा का प्रवाह भला कौन रोक सका है? १९४९ में गिरिजा देवी ने अपना पहला प्रदर्शन इलाहाबाद के आकाशवाणी केन्द्र से दिया। यह देश की स्वतंत्रता के तत्काल बाद का उन्मुक्त परिवेश था, जिसमें अनेक रूढ़ियाँ टूट रहीं थीं। संगीत के क्षेत्र में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे और पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने स्वतंत्रता से पहले ही भारतीय संगीत को जनमानस में प्रतिष्ठित करने का जो अभियान छेड़ा था, उसका सार्थक परिणाम आज़ादी के बाद नज़र आने लगा था। गिरिजा देवी को भी अपने युग की रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा। १९४९ में रेडियो से अपने गायन का प्रदर्शन करने के बाद गिरिजा देवी ने १९५१ में बिहार के आरा में आयोजित एक संगीत सम्मेलन में अपना गायन प्रस्तुत किया। इसके बाद गिरिजा देवी की अनवरत संगीत-यात्रा जो आरम्भ हुई, वह आज तक जारी है। गिरिजा देवी ने स्वयं को केवल मंच-प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि संगीत के शैक्षणिक और शोध कार्यों में भी अपना योगदान किया। ८० के दशक में उन्हें कोलकाता स्थित आई.टी.सी. संगीत रिसर्च अकादमी ने आमंत्रित किया। वहाँ रह कर उन्होने न केवल कई योग्य शिष्य तैयार किये, बल्कि शोधकार्य भी कराये। इसी प्रकार ९० के दशक में गिरिजा देवी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जुड़ीं और अनेक विद्यार्थियों को प्राचीन संगीत परम्परा की दीक्षा दी। गिरिजा देवी को १९७२ में ‘पद्मश्री’, १९७७ में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, १९९९ में ‘पद्मभूषण’ और २०१० में संगीत नाटक अकादमी का फेलोशिप जैसे प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किये गए। गिरिजा देवी आधुनिक और स्वतन्त्रता से पूर्व काल के संगीत की विशेषज्ञ और संवाहिका हैं। ऐसी विदुषी के स्वरों में आप यह ठुमरी सुनिए और स्वर, रस, भाव की सुखानुभूति कीजिए।


ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : विदुषी गिरिजा देवी



श्रृंखला के शीर्षक के अनुसार अब हम प्रस्तुत करेंगे पारम्परिक ठुमरी- ‘रस के भरे तोरे नैन...’ का फिल्मी प्रयोग। इस परम्परागत ठुमरी को उपशास्त्रीय गायिका हीरादेवी मिश्र ने अपने स्वरों से एक अलग रंग में ढाल दिया है। १९७८ में प्रदर्शित मुज़फ्फर अली की फिल्म ‘गमन’ में इस ठुमरी को शामिल किया गया था। मूलतः श्रृंगारप्रधान ठुमरी में संगीतकार जयदेव और गायिका हीरादेवी मिश्र ने इसी ठुमरी में श्रृंगार के साथ-साथ भक्तिरस का समावेश अत्यन्त कुशलता से करके ठुमरी को एक अलग रंग दे दिया है। गायिका हीरादेवी मिश्र पूरब अंग की ठुमरी, दादरा, कजरी, चैती आदि की अप्रतिम गायिका थीं। मुजफ्फर अली जैसे कुछेक फ़िल्मकारों ने उनकी प्रतिभा का फिल्मों में उपयोग किया। फिल्म ‘गमन’ के लिए इस ठुमरी के प्रारम्भ में एक पद ‘अरे पथिक गिरधारी सो इतनी कहियों टेर...’ जोड़ कर भक्ति रस का समावेश जिस सुगढ़ता से किया गया है, वह अनूठा है। फिल्म के संगीतकार जयदेव ने ठुमरी के मूल स्वरुप में कोई परिवर्तन नहीं किया किन्तु सारंगी, बाँसुरी और स्वरमण्डल के प्रयोग से ठुमरी की रसानुभूति में वृद्धि कर दी है। इस गीत के सुनने के बाद कुछ पलों तक कुछ और सुनने की इच्छा नहीं होगी। इसे सुन कर आपको राग भैरवी के प्रभाव की सार्थक अनुभूति अवश्य होगी। आइए सुनते हैं, श्रृंगार और भक्ति रस के अनूठे मेल से युक्त आज के कड़ी की और लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ की यह समापन प्रस्तुति- ‘रस के भरे तोरे नैन...’।

ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : फिल्म गमन : हीरादेवी मिश्र



आज की पहेली
 
मित्रों, आज की यह संगीत पहेली, वर्ष २०१२ की अन्तिम पहेली है। आपको स्मरण ही होगा, हमने वर्ष के आरम्भ में दस-दस कड़ियों को पाँच श्रृंखलाओं में बाँटा था। यह इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला की अन्तिम कड़ी की पहेली है। इस कड़ी में हम आपको एक हिन्दी फिल्म में शामिल राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के सौवें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष का महाविजेता और द्वितीय-तृतीय स्थान प्राप्त करने वालों को उप-विजेता घोषित कर पुरस्कृत किया जाएगा।

sg100-ras-paheli.mp3

१-यह भक्ति गीत किस राग पर आधारित है?

२-यह गीत किस ताल में निबद्ध है?
 

आप अपने उत्तर केवल पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेताओं के नाम की घोषणा हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ३० दिसम्बर, २०१२ को प्रकाशित होने वाले अंक में करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता
 
‘स्वरगोष्ठी’ के ९८वें अंक की पहेली में हमने आपको उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ की आवाज़ में बेहद लोकप्रिय ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर इस बार एकमात्र प्रतिभागी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने ही दिया है। प्रकाश जी को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले दो अंक एक विशेषांक के रूप में होंगे। फिल्म संगीत में शास्त्रीय और लोक संगीत का सर्वाधिक उपयोग करने वाले फिल्म संगीतकार नौशाद का जन्मदिवस २५ दिसम्बर को मनाया जाता है। इस उपलक्ष्य में ‘स्वरगोष्ठी’ के इस वर्ष के अन्तिम दो अंक हम उन्हीं की स्मृतियो को समर्पित करेंगे। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर हमारी इस सुरीली गोष्ठी में आप अपनी उपस्थिति अवश्य दर्ज़ कराइएगा।

कृष्णमोहन मिश्र

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