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Saturday, May 21, 2016

"तू मुझे सुना मैं तुझे सुनाऊँ अपनी प्रेम कहानी...", दो दोस्तों के इस गीत के बहाने ज़िक्र आनन्द बक्शी और यश चोपड़ा के दोस्ती की


एक गीत सौ कहानियाँ - 82
 

'तू मुझे सुना मैं तुझे सुनाऊँ अपनी प्रेम कहानी...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 82-वीं कड़ी में आज जानिए 1989 की मशहूर फ़िल्म ’चाँदनी’ के गीत "तू मुझे सुना मैं तुझे सुनाऊँ अपनी प्रेम कहानी..." के बारे में जिसे सुरेश वाडकर और नितिन मुकेश ने गाया था। बोल आनन्द बक्शी के और संगीत शिव-हरि का। 

  
फ़िल्म-संगीत में दोस्ती के गानें 70 के दशक में काफ़ी लोकप्रिय हुए थे। "यारी है इमान मेरा...", "ये दोस्ती
सुरेश वाडकर और नितिन मुकेश
हम नहीं तोड़ेंगे...", "तेरे जैसा यार कहाँ, कहाँ ऐसा याराना...", "बने चाहे दुश्मन ज़माना हमारा, सलामत रहे दोस्ताना हमारा...", "दीये जलते हैं, फूल खिलते हैं...", "सात अजूबे इस दुनिया में आठवीं अपनी जोड़ी...", "एक रास्ता दो राही..." जैसे गाने अपने ज़माने के मशहूर गीत रहे हैं। 80 के दशक में भी दोस्ती भरे गीतों का सिलसिला जारी रहा। किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी, मुकेश और मन्ना डे ने रिले-रेस का बैटन अगली पीढ़ी के गायकों को सौंप दिया। मोहम्मद अज़ीज़, शब्बीर कुमार, सुरेश वाडकर, नितिन मुकेश, सूदेश भोसले जैसे गायक अब दोस्ती के गीत गाने लगे। "कुछ भी नहीं रहता दुनिया में लोगों रह जाती है दोस्ती" (ख़ुदगर्ज़), "तेरी मेरी यारी दोस्ती हमारी भगवान को पसन्द है अल्लाह को है प्यारी" (दाता), "इमली का बूटा बेरी का पेड़..." (सौदागर) आदि गीत भी ख़ूब चले थे। यश चोपड़ा की 1989 की फ़िल्म ’चाँदनी’ में भी दो दोस्तों पर एक गीत फ़िल्माया गया था, गीत दोस्ती पर तो नहीं था पर दो दोस्त एक दूसरे से अपनी अपनी प्रेम कहानी सुनाने का अनुरोध कर रहे हैं। गीत का महत्व है क्योंकि दोनों एक ही लड़की से प्यार कर रहे हैं पर इस बात से दोनों अनजान हैं। आनन्द बक्शी का लिखा हुआ नितिन मुकेश (ॠषी कपूर) और सुरेश वाडकर (विनोद खन्ना) का गाया यह गीत है "तू मुझे सुना मैं तुझे सुनाऊँ अपनी प्रेम कहानी, कौन है वो, कैसी है वो तेरे सपनों की रानी?" यह आश्चर्य की बात है कि सुरेश वाडकर कभी ॠषी कपूर का स्क्रीन वॉयस हुआ करते थे, इस हिसाब से सुरेश की आवाज़ ॠषी पर सजने चाहिए थे, पर इस गीत में ऐसा नहीं किया गया।


दोस्ती के इस गीत के बहाने आज चर्चा करने जा रहे हैं यश चोपड़ा और आनन्द बक्शी के दोस्ती की। बक्शी
साहिर लुधियानवी और यश चोपड़ा
साहब के पुत्र राकेश बक्शी के एक अंग्रेज़ी में लिखे लेख से इस दोस्ती का ख़ुलासा हुआ था। भले यश जी और बक्शी साहब ने साथ में 1989 में ही पहली बार काम किया ’चाँदनी’ में, पर दोनों एक दूसरे को बहुत पहले से ही जानते थे। अक्सर फ़िल्मी फ़ंक्शन और पार्टियों में दोनों की मुलाक़ातें होती थीं। उस समय दोनों स्थापित हो चुके थे। यश चोपड़ा का परिचय आनन्द बक्शी से एक नए अन्दाज़ में उस दिन हुआ जिस दिन यश जी के गीतकार साहिर लुधियानवी ने उनसे कहा कि कभी आप आनन्द बक्शी से भी गाने लिखवाइए, वो भी अच्छा लिखते हैं! यश साहब को हैरानी हुई कि साहिर साहब उनके चहेते गीतकार होते हुए भी वो बक्शी साहब का नाम सुझा रहे हैं उनकी फ़िल्मों के लिए। यश जी ने कभी उनसे किसी अन्य गीतकार की परामर्श नहीं माँगी थी और वो साहिर साहब के गीतों से बहुत संतुष्ट थे। और तो और बक्शी साहब ने भी कभी भी यश जी से उन्हें अपनी फ़िल्म में गीत लिखने का मौका देने के लिए कभी भी नहीं कहा। शायद बक्शी साहब यह जानते थे कि साहिर साहब यश जी के पसन्दीदा गीतकार हैं और दोस्त भी, और बक्शी साहब इस बात का सम्मान करते थे। यश चोपड़ा के शब्दों में "बक्शी जी एक बहुत नेक इंसान थे और सर्वोपरि गीतकार भी। बहुत अच्छे अच्छे कवि, शायर और गीतकार आए हैं, पर केवल एक फ़िल्मी गीतकार जो एक बेहतरीन शायर भी हैं, वो हैं सिर्फ़ आनन्द बक्शी!"


यश चोपड़ा के शब्दों में, "एक दिन मेरे पास एक गुल्शन राय आए जो मुझसे अपनी फ़िल्म निर्देशित करवाना
आनन्द बक्शी
चाहते थे। उसमें संगीत आर. डी. बर्मन का था। गुल्शन जी या फिर पंचम, मुझे अभी ठीक से याद नहीं, ने मुझे सुझाव दिया कि गाने लिखवाने के लिए आनन्द बक्शी साहब को साइन करवाया जाए। मुझे ख़ुशी हुई और मैं बक्शी साहब से मिल कर उन्हे इस फ़िल्म में गीत लिखवाने का न्योता दे आया। वो राज़ी भी हो गए बिना कोई सवाल पूछे। लेकिन जैसे ही मैं घर लौटा, मुझे अपराध बोध हुआ और साहिर साहब के लिए बुरा लगा। आख़िर साहिर साहब लम्बे समय से मेरे लिए गीत लिखते चले आ रहे थे और वो मेरे पुराने दोस्त भी थे। इसलिए मुझे उनके साथ ही काम करना चाहिए, ऐसा मुझे लगा, बावजूद इसके कि एक बार साहिर साहब ने ही मुझे बक्शी साहब से गीत लिखवाने के बारे में ज़िक्र किया था। मैं निर्णय ले लिया कि मैं बक्शी साहब के पास जाकर माफ़ी माँग लूँगा। शर्मिन्दा चेहरा लिए मैं बक्शी साहब के पास पहुँचा और माफ़ी माँगते हुए पूरी बात बताई। बक्शी साहब इतने अच्छे स्वभाव के थे कि वो ख़ुश होते हुए कहा कि मैं चाहता था कि आप साहिर साहब के साथ ही काम करें। मुझे लगता है कि साहिर साहब ने कभी बक्शी जी को गीत लेखन के बारे में बारीक़ियाँ बताई थी और उन्हें निर्माता-निर्देशकों से मिलवाया था 1956 से 1964 के दौरान जब बक्शी साहब संघर्षरत थे। बक्शी साहब ने आगे यह भी कहा कि भले हम साथ काम ना करें पर इससे हमारी दोस्ती में कोई असर नहीं पड़नी चाहिए, हम दोस्त बने रहेंगे। मैं तो यही कहूँगा कि मैंने आनन्द बक्शी जैसा आदमी अपनी ज़िन्दगी में नहीं देखा। उन्होंने कभी राजनीति नहीं की, कभी किसी के बारे में ख़राब बातें नहीं की, कभी दूसरे गीतकारों की आलोचना नहीं की। वो बस अपना गाना लिखते और चले जाते बिना इधर उधर की बातें किए। उपरवाले ने जब साहिर साहब को हमसे छीन लिया, तभी मैं दोबारा बक्शी साहब के दरवाज़े जा पहुँचा अपनी फ़िल्म में गीत लिखवाने के लिए। उनके साथ ’चाँदनी’ मेरी पहली फ़िल्म थी। और क्या गाने उन्होंने मुझे दिए इस फ़िल्म में! अविस्मरणीय! उन्होंने आगे चलकर मेरे कई फ़िल्मों में गाने लिखे, और मेरे बेटे आदित्य की पहली और दूसरी निर्देशित फ़िल्मों में भी। हमने साथ में ’चाँदनी’ (1989), 'लम्हे’ (1991), 'परम्परा’ (1992), ’डर’ (1993), ’दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे’ (1995), 'दिल तो पागल है’ (1997), 'मोहब्बतें’ (2000), और ’मुझसे दोस्ती करोगे!’ (2002) में काम किया। 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Saturday, September 20, 2014

"तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ" - क्यों नहीं माने साहिर इस गीत की अवधि को छोटा करने के सुझाव को?


एक गीत सौ कहानियाँ - 41
 

तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 41वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'धूल का फूल' के सदाबहार युगल गीत "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ..." के बारे में। 

बी.आर.चोपड़ा व यश चोपड़ा

हिन्दी फ़िल्म जगत में कई मशहूर कैम्प रहे हैं, जैसे कि राज कपूर कैम्प, बी.आर. चोपड़ा कैम्प, ॠषीकेश मुखर्जी कैम्प आदि। कैम्प का अर्थ है उन कलाकारों का समूह जो हर फ़िल्म में स्थायी रहे। उदाहरणस्वरूप राज कपूर कैम्प में शंकर-जयकिशन, शैलेन्द्र-हसरत और मुकेश स्थायी सदस्य रहे हैं। वैसे ही बी. आर. चोपड़ा कैम्प में साहिर लुधियानवी, रवि और महेन्द्र कपूर ने लम्बी पारी खेली। बी. आर. चोपड़ा द्वारा निर्मित दूसरी फ़िल्म 'नया दौर' में साहिर साहब ने गीत तो लिखे पर संगीतकार थे ओ. पी. नय्यर और गाने भी रफ़ी साहब ने गाये। उनकी अगली फ़िल्म 'साधना' में संगीतकार बने एन. दत्ता, गीतकार साहिर ही रहे। तीसरी फ़िल्म 'धूल का फूल' में साहिर और एन. दत्ता के साथ-साथ नवोदित गायक महेन्द्र कपूर की एन्ट्री हुई चोपड़ा कैम्प में। अगली फ़िल्म 'कानून' में कोई गीत नहीं था। और 1964 में फ़िल्म 'गुमराह' से बी. आर. चोपड़ा के स्थायी संगीतकार बने रवि। और इसी फ़िल्म से चोपड़ा कैम्प में रवि, साहिर लुधियानवी और महेन्द्र कपूर की तिकड़ी बनी जिसने एक लम्बे समय तक एक के बाद एक मशहूर नग़मे श्रोताओं को दिये। 'गुमराह', 'वक़्त', 'आदमी और इंसान', 'हमराज़', 'धुन्ध' आदि फ़िल्मों के लोकप्रिय गीतों से सभी अवगत हैं। आज ज़िक्र है 1959 की फ़िल्म 'धूल का फूल' के मशहूर युगल गीत "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ..." का। इस फ़िल्म की ख़ास बात यह थी कि यह यश चोपड़ा निर्देशित पहली फ़िल्म थी और अभिनेत्री माला सिन्हा की शुरुआती कामयाब फ़िल्मों में से एक। इस गीत में नायक राजेन्द्र कुमार और माला सिन्हा स्टेज पर यह गीत गा रहे हैं, बल्कि यूँ कहें कि एक सुरीला मुकाबला हो रहा है, सवाल जवाब हो रहे हैं। इस गीत के निर्माण के साथ दो रोचक किस्से जुड़े हुए हैं।

बायें से - यश चोपड़ा, महेन्द्र कपूर, साहिर लुधियानवी, एन. दत्ता
पहला किस्सा है गायक महेन्द्र कपूर से जुड़ा हुआ। हुआ यूँ कि यश चोपड़ा को 'धूल का फूल' निर्देशित करने का मौका उनके बड़े भाई-साहब ने दिया। तो गीतों की रेकॉर्डिंग के लिए स्टुडियो बुक करने के लिए वो उस ज़माने के मशहूर रेकॉर्डिस्ट कौशिक साहब के पास पहुँचे। उसी दिन नवोदित गायक महेन्द्र कपूर ने उसी स्टुडियो में नौशाद के संगीत निर्देशन में 'सोहनी महिवाल' फ़िल्म का एक गीत रेकॉर्ड करवाया था जिसके बोल थे "चाँद छुपा और तारे डूबे..."। फ़िल्म के बाकी गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में थे, बस यही गीत महेन्द्र कपूर से गवाया था नौशाद साहब ने क्योंकि महेन्द्र कपूर जिस प्रतियोगिता के विजेता बने थे उसके जज नौशाद साहब थे। पुरस्कारस्वरूप यह मौका उन्होंने दिया था महेन्द्र कपूर को। ख़ैर, तो यश चोपड़ा को कौशिक साहब ने महेन्द्र कपूर का उसी दिन रेकॉर्ड किया हुआ गीत बजा कर सुनवाया और साथ ही यश जी से पूछा कि बताइये ज़रा कि यह गायक कौन हैं? यश चोपड़ा ने कहा कि यह तो रफ़ी साहब की आवाज़ है, और किसकी? कौशिक साहब के यह कहने पर कि इसे रफ़ी साहब ने नहीं बल्कि महेन्द्र कपूर ने गाया है, यश चोपड़ा को यकीन ही नहीं हुआ। पर कौशिक साहब ने जब गीत को बार बार बजाकर सुनवाया तो यश साहब को आवाज़ में थोड़ा फ़र्क महसूस हुआ और मान गये। घर वापस आकर यश चोपड़ा ने बड़े भाई बी. आर. चोपड़ा को जब यह बात बतायी तो बड़े भाई साहब को भी उत्सुकता हुई इस आवाज़ को सुनने की। यश जी ने उनसे यह भी कहा कि वो चाहते हैं कि 'धूल का फूल' में लता जी के साथ "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ" की जो परिकल्पना बन रही है, उसमें वो महेन्द्र कपूर की आवाज़ लेना चाहते हैं। बी. आर. चोपड़ा मान गये और तब दोनों भाइयों ने मिल कर महेन्द्र कपूर के साथ सम्पर्क स्थापित किया उनके सिनेमाटोग्राफ़र के ज़रिये जिनकी पत्नी महेन्द्र कपूर की माँ की सहेली हुआ करती थीं। टेलीफ़ोन पर न्योता मिलने के बाद महेन्द्र कपूर बी. आर. फ़िल्म्स के दफ़्तर में गये जो उस समय कारदार स्टुडियो के पास हुआ करता था। यश चोपड़ा उन्हें फ़िल्म के संगीतकार दत्ता नाईक, यानी एन. दत्ता के पास ले गये। ख़ूब गाने की रिहर्सल हुई और इस तरह से महेन्द्र कपूर ने पहली बार लता मंगेशकर के साथ युगल गीत गाया। ऐसा सुनने में आया था कि लता जी के साथ गाना है यह जान कर जहाँ एक तरफ़ महेन्द्र कपूर की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था, वहीं दूसरी ओर वो नर्वस भी बहुत हो गये थे लता जी को सामने देख कर। पर लता जी ने जब उन्हें साहस दिया और हौसला बढ़ाया, तब जा कर उन्हें थोड़ी शान्ति मिली। गीत की रेकॉर्डिंग के बाद लता जी ने उनकी तारीफ़ भी की थी। 'धूल का फूल' के सब गाने चल गये, और यहाँ का दस्तूर यही है कि अगर कोई फ़िल्म कामयाब होती है तो अगले फ़िल्म में वही टीम रिपीट की जाती है। और इस तरह से महेन्द्र कपूर को आगे भी बी. आर. फ़िल्म्स में गाने के मौके मिलते चले गये।

साहिर व यश चोपड़ा
और अब आते हैं इस गीत से जुड़े दूसरे किस्से पर। "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ..." गीत फ़ाइनल रिहर्सल हो कर रेकॉर्डिंग के लिए तैयार हो चुका था। तभी एन. दत्ता के सहायक ने उन्हें बताया कि इस गीत की अवधि ज़रूरत से ज़्यादा लम्बी हो गई है। उस ज़माने में किसी फ़िल्मी गीत की अवधि 3 मिनट से 5 मिनट तक की होती थी, क़व्वाली या कोई ख़ास गीत हो तो ही 6 या 7 मिनट की हो सकती थी, पर ऐसा बहुत कम ही था। ऐसे में "तेरे प्यार का आसरा...", जो कि एक सामान्य रोमांटिक युगल गीत था, इसकी अवधि हो गई थी कुल 6 मिनट और लगभग 40 सेकण्ड। सहायक की बात सुन कर एन. दत्ता को भी लगने लगा कि वाकई यह गीत काफ़ी लम्बा हो गया है। लेकिन किसी की क्या मजाल जो यह बात साहिर लुधियानवी को जाकर कहे। साहिर साहब अपने लिखे किसी भी गीत के साथ कोई छेड़-छाड़, काँट-छाँट या फेर-बदल बिल्कुल पसन्द नहीं करते थे। ऐसे में एन. दत्ता कैसे उन्हे कहें कि गीत के कुछ अन्तरे काटने पड़ेंगे? इसलिए उन्होंने यह बात जाकर यश चोपड़ा को बताई। यश चोपड़ा ने गीत को सुना और उन्हे भी गीत काफ़ी लम्बा लगा, और उन्होंने तय किया कि वो ख़ुद साहिर साहब से बात करेंगे। जब साहिर साहब को उन्होंने बताया कि गीत के कुल सात अन्तरों में से दो अन्तरे कम करने पड़ेंगे तो साहिर ने उन्हें समझाया कि देखिये, यह किसी आम सिचुएशन का युगल गीत नहीं है, यह एक प्रतियोगितामूलक गीत है। स्टेज पर नायक और नायिका के बीच में लड़ाई चल रही है, इसलिए इसका थोड़ा लम्बा होना स्वाभाविक है। गीत को छोटा कर देंगे तो यह प्रतियोगितामूलक गीत नहीं बल्कि इस सिचुएशन का एक महज़ औपचारिक गीत बन कर रह जायेगा। सिचुएशन का इम्पैक्ट ही ख़त्म हो जायेगा। साहिर साहब के समझाने पर भी यश जी जब किन्तु-परन्तु करने लगे तो साहिर साहब ने थोड़े कड़े शब्दों में उनसे कहा कि अगर वाक़ई उन्हे लगता है कि गीत लम्बा हो गया है तो यह गीत उन्हे वापस दे दिया जाये, और इसके बदले वो कोई दूसरा गीत लिख कर दे देंगे, पर यह गीत ऐसे ही जायेगा, किसी भी तरह की कोई कटौती नहीं होगी इसमें। अब यश जी घबरा गये क्योंकि उन्हें यह गीत बहुत पसन्द था। गीत हाथ से निकल जायेगा सोच कर उन्होंने बात को यहीं ख़त्म करने की सोची और साहिर साहब से कहा कि वो इसी गीत को रखेंगे बिना किसी काट-छाँट के। इस तरह से गीत रेकॉर्ड हुआ और बेहद लोकप्रिय भी हुआ। फ़िल्म के पोस्टर पर भी लिखा गया "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ"। लोग थिएटर से फ़िल्म देख कर निकलते वक़्त इसी गीत को गुनगुनाते हुए पाये गये। बस, इतनी सी है इस गीत की कहानी। लीजिए, अब आप यही गीत सुनिए।

फिल्म - धूल का फूल : 'तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ...' : लता मंगेशकर और महेन्द्र कपूर : संगीत - एन. दत्ता : गीत - साहिर लुधियानवी 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें  cine.paheli@yahoo.com  के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, October 27, 2012

"रोमांस के जादूगर" और "हँसी के शहंशाह" को 'सिने पहेली' का सलाम...

(27 अक्टूबर, 2012)
सिने-पहेली # 43



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। अक्टूबर का यह सप्ताह जहाँ एक ओर त्योहारों की ख़ुशियाँ लेकर आया, वहीं दूसरी ओर दो दुखद समाचारों ने सब के दिल पर गहरा चोट पहुँचाया। मनोरंजन जगत के दो दिग्गज कलाकारों को काल के क्रूर हाथों ने हम से छीन लिए। इनमें एक हैं रोमांस के जादूगर, सुप्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता व निर्देशक  यश चोपड़ा और दूसरे हैं हँसी के शहंशाह, जाने-माने हास्य अभिनेता जसपाल भट्टी। आज की 'सिने पहेली' समर्पित है यश चोपड़ा और जसपाल भट्टी की पुण्य स्मृति को। 


श चोपड़ा अपनी फ़िल्मों (ख़ास कर अपनी निर्देशित फ़िल्मों) में रोमांस को उस मकाम तक लेकर गये कि हर पीढ़ी के लोगों को उनकी फ़िल्मों से, उनकी फ़िल्मों की नायक-नायिकाओं से प्यार हो गया। हर फ़िल्म में प्यार की एक नई परिभाषा उन्होंने बयाँ की। उनकी फ़िल्मों की सफलता का राज़ है कि लोग उनके किरदारों में अपनी झलक पाते हैं या अपने आप को उन किरदारों जैसा बनने का सपना देखते हैं। जनता की नव्ज़ को बख़ूबी पकड़ती रही है यश जी की फ़िल्में। आज यश जी हमारे बीच नहीं रहे, पर उनकी प्यार भरी फ़िल्में आने वाली पीढ़ियों को प्यार करना सिखाती रहेंगी।

सपाल भट्टी एक ऐसा नाम है जो दूरदर्शन के सुनहरे दौर में घर-घर सुनाई देने वाला नाम बन गया था। 'फ़्लॉप शो' और 'उल्टा-पुल्टा' जैसी हास्य कार्यक्रमों के ज़रिये वो मध्यम वर्ग के लोगों के दिलों पर छा गये थे। आम सामाजिक और गंभीर विषयों को हास्य-व्यंग के माध्यम से लोगों तक पहुँचाने में जसपाल भट्टी के तमाम कार्यक्रमों का बड़ा योगदान है। बाद में टेलीविज़न से फ़िल्मों में भी उनका पदार्पण हुआ और बहुत सारी हिन्दी व पंजाबी फ़िल्मों में बतौर हास्य/चरित्र अभिनेता वो नज़र आए। 

आइए आज 'सिने पहेली' के माध्यम से जसपाल भट्टी और यश चोपड़ा साहब को हम श्रद्धांजलि अर्पित करें और उनसे जुड़े पाँच सवाल आपसे पूछें। हर सवाल के सही जवाब के लिए आपको मिलेंगे 2 अंक।

सवाल # 1


यश चोपड़ा निर्मित इस फ़िल्म में शशि कपूर के पिता का किरदार निभाया था मनमोहन कृष्ण ने। इस फ़िल्म में लता और अनवर की गाई हुई एक ग़ज़ल है। इस फ़िल्म में हेलेन और कल्पना अय्यर, दोनों बतौर कैबरे डांसर नज़र आई हैं। तो बताइये हम किस फ़िल्म की बात कर रहे हैं?

सवाल # 2


आशा भोसले के गाये इस गीत में उन्होंने एक ग़लती कर दी थी। "कश्ती खेती हूँ" को उन्होंने गा दिया "कश्ती ख़ेती हूँ"। इसी फ़िल्म के लिए फ़िल्म के संगीतकार ने इक़बाल लिखित अमर देश भक्ति गीत "सारे जहाँ से अच्छा" को स्वरबद्ध किया था, और फ़िल्म की नामावली के पार्श्व-संगीत के रूप में इसका प्रयोग किया गया था। तो बताइये आशा भोसले के गाये किस गीत की बात हम कर रहे हैं?


सवाल # 3

इसमें कोई संदेह नहीं कि यश चोपड़ा की रोमांटिक फ़िल्मों की सफलता के पीछे लता मंगेशकर की आवाज़ का बहुत बड़ा योगदान है। इसलिए यश जी पर केन्द्रित कम से कम एक पहेली लता जी की आवाज़ की तो ज़रूर बनती है। तो सुनिये गीत के इस अंश को और पहचानिये फ़िल्म का नाम और गीत का मुखड़ा।




सवाल # 4


इस फ़िल्म में लता-किशोर का गाया एक ऐसा गीत है जिसके मुखड़े में "स" के अनुप्रास अलंकार का बहुत सुंदर उदाहरण है। गीत का एक दृश्य नीचे दिया गया है। कौन सा गीत है यह?



सवाल # 5


नीचे दिये चित्रों को देख कर बताइये कि जसपाल भट्टी अभिनीत ये किस फ़िल्म के दृश्य हैं?






जवाब भेजने का तरीका


उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 43" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान अवश्य लिखें। आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 1 नवम्बर शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।


पिछली पहेली के सही जवाब


1. जॉन एब्रहम व उपेन पटेल
2. राजेन्द्र कुमार व राजेश खन्ना
3. सुचित्रा सेन व माधुरी दीक्षित
4. वैजयन्तीमाला व आशा पारेख
5. हरमन बवेजा व ॠतिक रोशन


पिछली पहेली के परिणाम


'सिने पहेली - 42' के परिणाम इस प्रकार हैं...

1. गौतम केवलिया, बीकानेर --- 10 अंक
2. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 10 अंक
3. महेश बसंतनी, पिट्सबर्ग --- 10 अंक
4. क्षिति तिवारी, जबलपुर --- 10 अंक
5. विजय कुमार व्यास, बीकानेर --- 10 अंक
6. पंकज मुकेश, बेंगलुरु --- 10 अंक
7. महेन्द्र कुमार रंगा, बीकानेर --- 9 अंक
8. तरुशिखा सुरजन, उत्तराखण्ड --- 9 अंक
9. गणेश एस. पालीवाल, बीकानेर --- 9 अंक
10. अदिति चौहान, उत्तराखंड --- 9 अंक
11. चन्द्रकान्त दीक्षित, लखनऊ --- 8 अंक
12. शरद तैलंग, कोटा --- 7 अंक
13. इंदु पुरी गोस्वामी, चित्तौड़गढ़ --- 7 अंक


पाँचवें सेगमेण्ट का सम्मिलित स्कोरकार्ड यह रहा...




नये प्रतियोगियों का आह्वान


नये प्रतियोगी, जो इस मज़ेदार खेल से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए हम यह बता दें कि अभी भी देर नहीं हुई है। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ ऐसे हैं कि किसी भी समय जुड़ने वाले प्रतियोगी के लिए भी पूरा-पूरा मौका है महाविजेता बनने का। अगले सप्ताह से नया सेगमेण्ट शुरू हो रहा है, इसलिए नये खिलाड़ियों का आज हम एक बार फिर आह्वान करते हैं। अपने मित्रों, दफ़्तर के कलीग, और रिश्तेदारों को 'सिने पहेली' के बारे में बतायें और इसमें भाग लेने का परामर्श दें। नियमित रूप से इस प्रतियोगिता में भाग लेकर महाविजेता बनने पर आपके नाम हो सकता है 5000 रुपये का नगद इनाम। अब महाविजेता कैसे बना जाये, आइए इस बारे में आपको बतायें।


कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता?


1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा। 

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। चौथे सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...



4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, नमस्कार। 


 
'मैंने देखी पहली फिल्म' : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता
दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 30 नवम्बर, 2012 है।







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