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Wednesday, January 14, 2009

जब मिला तबले को वरदान

पंडित किशन महाराज (१९२३- २००८) को संगीत की तीनों विधाओं में सर्वश्रेष्ठ कलाकार होने का सौभाग्य प्राप्त था. वो तबले के उस्ताद होने के साथ साथ मूर्तिकार, चित्रकार, वीर रस के कवि और ज्योतिष के मर्मज्ञ भी थे. यानी दूसरे शब्दों में कहें तो भारत सरकार द्वारा पद्मविभूषण से सम्मानित होने वाले वाले पहले कलाकार पंडित किशन महाराज जी, एक सम्पूर्ण कलाकार थे. बीते साल में उन्हें खोना संगीत की दुनिया को हुई एक बहुत बड़ी क्षति है. वीणा साधिका, राधिका बुधकर जी लेकर आई हैं पंडित जी पर दो विशेष आलेख.

रात का समय ....जब पुरी दुनिया गहरी नींद में सो रही थी ...तब वाराणसी के संकट मोचन मंदिर में तबले की थाप गूंज रही थी, तबले के बोल मानो ईश्वरीय नाद की तरह सम्पूर्ण वातावरण में बहकर उसे दिव्य और भी दिव्य बना रहे थे, अचानक न जाने क्या हुआ और तबले की ध्वनी कम और मंदिर की घंटियों की आवाज़ ज्यादा सुनाई देने लगी, उन्होंने पल भर के लिए तबले की बहती गंगा को विराम दिया और सब कुछ शांत हो गया, उन्होंने फ़िर तबले पर बोलो की सरिता का प्रवाह अविरत किया और फ़िर मंदिरों की घंटिया बजने लगी, सुबह लोगो ने कहा उन्हें ईश्वरीय वरदान मिला हैं, संकट मोचन हनुमान ने स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी के तबले को वरदान दिया, और उनका तबला युगजयी हो गया ।

आदरणीय स्वर्गीय पंडित किशन जी का जन्म, जन्माष्टमी की वैसी ही आधी रात को हुआ जैसी आधी रात में युगों युगों तक हर ह्रदय पर राज्य करने वाले किशन कन्हैया का जन्म हुआ था, इस जन्माष्टमी की आधी रात को शायद वर मिला हैं कि इस रात दिव्य आत्मायें, देव, गंधर्व ही पृथ्वी पर जन्म लेंगे ।

आदरणीय स्वर्गीय पंडित किशन महाराज प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे, माथे पर एक लाल रंग का टिक्का हमेशा लगा रहता था, वे जब संगीत सभाओं में जाते, संगीत सभायें लय ताल से परिपूर्ण हो गंधर्व सभाओ की तरह गीत, गति और संगीतमय हो जाती । अपने पिताजी पंडित हरि महाराज जी से संगीत शिक्षा लेने के उपरांत आदरणीय पंडित किशन महाराज जी ने अपने चाचा पंडित कंठे महाराज जी से शिक्षा ग्रहण की ।

बनारस के संकट मोचन मंदिर में ही पहला संगीत कार्यक्रम देने के बाद सन १९४६ में पंडित जी में मुंबई की और प्रस्थान किया, एक बहुत बड़े संगीत कार्यक्रम के अवसर पर देश के श्रेष्ठ सितार वादक आदरणीय पंडित रविशंकर जी और आदरणीय पंडित किशन महाराज जी पहली बार मिले, जैसे ही इनका वादन सम्म्पन हुआ, श्रोताओ में से आदरणीय ओमकारनाथ ठाकुर जी उठे और मंच पर जाकर उन्होंने घोषणा की "यह दोनों बच्चे भविष्य के भारतीय शास्त्रीय संगीत के चमकते सितारे होंगे ।" उसी दिन से आदरणीय पंडित रविशंकर जी, ओर स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी में गहरी मैत्री हो गई ।

तबला बजाने के लिए वैसे पद्मासन में बैठने की पद्धत प्रचलित हैं, किंतु स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी दोनों घुटनों के बल बैठ कर वादन किया करते थे, ख्याल गायन के साथ उनके तबले की संगीत श्रोताओ पर जादू करती थी, उनके ठेके में एक भराव था, और दाये और बाये तबले का संवाद श्रोतोई और दर्शको पर विशिष्ट प्रभाव डालता था ।

अपनी युवा अवस्था में में पंडित जी ने कई फिल्मो में तबला वादन किया, जिनमे नीचनगर, आंधियां, बड़ी माँ आदि फिल्मे प्रमुख हैं ।

कहते हैं न महान कलाकार एक महान इंसान भी होते हैं, ऐसे ही महान आदरणीय स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी भी थे, उन्होंने बनारस में दूरदर्शन केन्द्र स्थापित करने के लिए भूख हड़ताल भी की और संगत कलाकारों के प्रति सरकार की ढुलमुल नीति का भी पुरजोर विरोध किया ।

श्रद्धेय किशन महारज जी को मेरा सादर प्रणाम, सुनतें हैं उनकी एल्बम "साज़" से तीन ताल-


प्रस्तुति -वीणा साधिका
राधिका
(राधिका बुधकर )


लेख के अगले अंक में : जब मुझे विचित्र वीणा बजाने हेतू मिला आदरणीय स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी का आशीर्वाद


Tuesday, October 21, 2008

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब का एक अनमोल इंटरव्यू और शहनाई वादन

"अमा तुम गाली दो बेशक पर सुर में तो दो....गुस्सा आता है बस उस पर जो बेसुरी बात करता है.....पैसा खर्च करोगे तो खत्म हो जायेगा पर सुर को खर्च करके देखिये महाराज...कभी खत्म नही होगा...." मिलिए शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान से, मशहूर कार्टूनिस्ट इरफान को दिए गए एक ख़ास इंटरव्यू के माध्यम से और सुनिए शहनाई के अलौकिक स्वरों में राग ललित

२१ मार्च १९१६ में जन्में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का नाम उनके अम्मा वलीद ने कमरुद्दीन रखा था, पर जब उनके दादा ने नवजात को देखा तो दुआ में हाथ उठाकर बस यही कहा - बिस्मिल्लाह. शायद उनकी छठी इंद्री ने ये इशारा दे दिया था कि उनके घर एक कोहेनूर जन्मा है. उनके वलीद पैगम्बर खान उन दिनों भोजपुर के राजदरबार में शहनाई वादक थे. ३ साल की उम्र में जब वो बनारस अपने मामा के घर गए तो पहली बार अपने मामा और पहले गुरु अली बक्स विलायतु को वाराणसी के काशी विश्वनाथ मन्दिर में शहनाई वादन करते देख बालक हैरान रह गया. नन्हे भांजे में विलायतु साहब को जैसे उनका सबसे प्रिये शिष्य मिल गया था. १९३० से लेकर १९४० के बीच उन्होंने उस्ताद विलायतु के साथ बहुत से मंचों पर संगत की. १४ साल की उम्र में अलाहाबाद संगीत सम्मलेन में उन्होंने पहली बंदिश बजायी. उत्तर प्रदेश के बहुत से लोक संगीत परम्पराओं जैसे ठुमरी, चैती, कजरी, सावनी आदि को उन्होने एक नए रूप में श्रोताओं के सामने रखा और उनके फन के चर्चे मशहूर होने लगे.१९३७ में कलकत्ता में हुए अखिल भारतीय संगीत कांफ्रेंस में पहली बार शहनायी गूंजी इतने बड़े स्तर पर, और संगीत प्रेमी कायल हो गए उस्ताद की उस्तादगी पर.


१९३८ में लखनऊ में आल इंडिया रेडियो की शुरवात हुई. जहाँ से नियमित रूप से उस्ताद का वादन श्रोताओं तक पहुँचने लगा. १५ अगस्त १९४७ को वो पहले साजिन्दे बने जिसे आजाद भारत की अवाम को अपनी शहनाई वादन से मंत्र्मुग्द किया. ये ब्रॉडकास्ट लालकिले से हुआ था, जहाँ उन्हें सुन रहे थे ख़ुद महात्मा गाँधी भी और जहाँ उनके वादन के तुंरत बाद पंडित नेहरू ने अपना मशहूर संबोधन दिया था आजाद देश की जनता के नाम. तब से अब तक जाने कितने ही एतिहासिक समारोहों और जाने कितने ही रास्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय समारोहों में इस महान फनकार ने अपने अद्भुत हुनर से सुनने वालों सम्मोहित किया. पदम् श्री, पदमा भूषण और पद्मा विभूषण के बाद सन २००१ में उन्हें भारत रत्न से नवाजा गया. पुरस्कार तो जैसे बरसते रहे उम्र भर उनपर. बहुत कम लोग जानते होंगे कि उन्होने सत्यजित राय की फ़िल्म "जलसागर" में अभिनय भी किया था. फ़िल्म "गूँज उठी शहनायी" जिसका कि एक एक गीत एक नायाब मोती है,में भी उन्होने वाध्य बजाया (याद कीजिये लता की आवाज़ में "मेरे सुर और तेरे गीत"), ऐ आर रहमान ने "ये जो देश है तेरा..." फ़िल्म स्वदेश में जब उनसे शहनाई बजवायी तो जैसे शहनायी परदेश से स्वदेश लौट रहे नायक के लिए जैसी देश की मिट्टी का प्रतीक बन गयी.

मशहूर कार्टूनिस्ट इरफान ने उनके इन्तेकाल से कुछ वर्षों पहले उनका एक इंटरव्यू किया था जिसकी रिकॉर्डिंग आज हम आप के लिए लाये हैं. रूबरू होईये उस्ताद के कुछ अनछुए पहलुओं से -



और अब सुनते है राग ललित उस्ताद की शहनाई में -



२१ अगस्त २००६ को उस्ताद एक सादा और सूफी जीवन जीने के बाद दुनिया से विदा हुए और पीछे छोड़ गए अपने संगीत का ऐसा अनमोल खज़ाना, जिस पर हिंदुस्तान का हर संगीत प्रेमी नाज़ कर सकता है. उस्ताद को आवाज़ का सलाम.

Wednesday, August 13, 2008

और दिल जुनून पर है...

राख हो जायेंगे हम, आग का हुस्न फुनून पर है,
मोहब्बत बे-इन्तहा है, और दिल जुनून पर है.

Love or material needs, whatever you may want is not what you will get. Life moves on & so does your soul. But somewhere deep inside you, there is a place where that vacancy always exists forever & its irreplaceable.

ये कहना है सुदीप यशराज का, जो हैं आवाज़ पर इस हफ्ते के, उभरते सितारे. हमने कोशिश की, कि सुदीप भी हमें अपने बारे में हिन्दी में ही लिख कर दें, पर अतिव्यस्तता के चलते वो ऐसा नही कर पाये. तो हमने उनके कथन मूल रूप में ही आपके सामने रख रहे हैं.

दिल्ली में जन्मे और पढ़े बढ़े सुदीप इन दिनों मुंबई में हैं. हिंद युग्म पर अपने पहले गीत "बेइंतेहा प्यार..." को मिले प्रोत्साहन से सुदीप बेहद संतुष्ट हैं. उनका मानना है -

Business or music is creative outburst of mind which should achieve satisfaction, life is just a memory if not lived the way you want to.



I am not a trained musician & make music for personal satisfaction.

I have been lucky to be in the company of some of the great musicians of Varanasi, anything that i learnt or i know is a gift of my stay at Reeva Kothi on Assi Ghat in Varanasi. Born & bought up in a modest Brahmin family of Delhi, I have played with many popular bands in Delhi & I am now a veteran in that circuit.

I have actively composed ad jingles, musical shows for many producers in India.

Professionally I m a CRM consultant & work with one of India's biggest loyalty company in marketing domain. Whenever get free time I love spending it with my 9 months old daughter.

My music is highly influenced by my life where each songs denote moments of what I call as living. I write, compose & sing for the simple reason that the journey called life is much better with ones own creative expression.

If I ever go missing, I would be found on top of a hill along with my Guitar. Just follow the voice & you will find me.

मेरी आवाज़ ही पहचान है.... बिल्कुल ठीक है सुदीप, हम आपके संगीत के पीछा करते करते आप तक पहुँच ही जायेंगे.

सुदीप जल्द ही संगीत की दुनिया में अपनी एक नई पहचान लेकर उतरेंगे, हिंद युग्म की टीम अपनी समस्त शुभकामनायें सुदीप को देती है. सुदीप के संगीत की ताज़गी को एक बार फ़िर से महसूस कीजिये यह गीत सुनकर.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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