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Thursday, May 28, 2009

जिसे तू कबूल कर ले वो अदा कहाँ से लाऊं....पूछा था चंद्रमुखी से देव बाबू से लता के स्वर में.

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 94

न्यू थियटर्स के प्रमथेश चंद्र बरुवा ने सन् १९३५ में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के मशहूर उपन्यास 'देवदास' को पहली बार रुपहले परदे पर साकार किया था। यह फ़िल्म बंगला में बनायी गयी थी और बेहद कामयाब रही। देवदास की भूमिका में कुंदन लाल सहगल ने हर एक के दिल को छू लिया। बंगाल में इस फ़िल्म की अपार सफलता से प्रेरित होकर बरुवा साहब ने इस फ़िल्म को हिंदी में बना डाली उसी साल और पूरे देश भर में सहगल दर्द का पर्याय बन गए। जमुना, राजकुमारी (कलकत्ता) और पहाड़ी सान्याल ने कमश: पारो, चंद्रमुखी और चुन्नी बाबू की भूमिकायें निभायी। इसके बाद सन् १९५५ में लोगों ने देवदास को तीसरी बार के लिये परदे पर तब देखा (हिंदी में दूसरी बार) जब बिमल राय ने 'ट्रेजेडी किंग' दिलीप कुमार को देवदास की भूमिका में प्रस्तुत करने का बीड़ा उठाया। उस समय दिलीप कुमार के अलावा इस चरित्र के लिये किसी और का नाम सुझाना नामुमकिन था। दिलीप साहब हर एक की उम्मीदों पर खरे उतरे और उन्हे इस फ़िल्म के लिए उस साल का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार भी मिला। पारो और चंद्रमुखी की भूमिकायों में थीं सुचित्रा सेन और वैजयंतीमाला। मोतीलाल बने चुन्नी बाबू। कहा जाता है कि वैजयंतीमाला को इस फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार दिया गया था लेकिन उन्होने यह कहकर पुरस्कार लेने से मना कर दिया कि वो उस फ़िल्म में सह-अभिनेत्री नहीं बल्कि मुख्य अभिनेत्री थीं। पारो और चंद्रमुखी के किरदार ऐसे हैं इस उपन्यास मे कि वाक़ई यह बताना मुश्किल है कि कौन 'मुख्य' हैं और कौन 'सह'। साहिर लुधियानवी ने फ़िल्म के गाने लिखे और सचिन देव बर्मन ने बंगाल के लोक संगीत के अलग अलग विधाओं जैसे कि कीर्तन, भटियाली और बाउल संगीत के इस्तेमाल से इस फ़िल्म के गीतों में ऐसा संगीत दिया जो कहानी के स्थान, काल, और पात्रों को पूरी तरह से समर्थन दिये।

चंद्रमुखी के किरदार में वैजयंतीमाला ने अपनी नृत्यकला से दर्शकों का मन जीत लिया। लता मंगेशकर के गाये मुजरा गीतों के साथ उन्होने ऐसी अदायें बिखेरीं कि जब भी कोई गीत शुरु होता, लोग थियटर स्क्रीन पर पैसे फेंकने लग जाते। "दिलदार के क़दमों में दिलदार का नज़राना, महफ़िल में उठा और यह कहने लगा दीवाना, अब आगे तेरी मरज़ी ओ मोरे बालमा बेदर्दी", या फिर "ओ आनेवाले रुक जा कोई दम, रस्ता घेरे हैं बाहर लाखों ग़म" जैसे मुजरा गीतों पर दर्शकों ने काफ़ी पैसे लुटाये। लेकिन लताजी का गाया जो सबसे प्रसिद्ध गाना था वह था "जिसे तू क़बूल कर ले वो अदा कहाँ से लाऊँ, तेरे दिल को जो लुभा ले वो सदा कहाँ से लाऊँ"। चंद्रमुखी यह गीत उस वक़्त गाती है जब वो देवदास के दिल में अपने लिए प्यार उत्पन्न करने में नाकामयाब हो जाती हैं, क्यूंकि देवदास को पारो के अलावा और किसी चीज़ में कोई दिलचस्पी ही नहीं! साहिर साहब ने इस गीत में चंद्रमुखी के जज़्बात को बहुत सुंदरता से उभारा है, जब वो लिखते हैं कि "तुझे और की तमन्ना मुझे तेरी आरज़ू है, तेरे दिल में ग़म ही ग़म है मेरे दिल में तू ही तू है, जो दिलों को चैन दे दे वो दवा कहाँ से लाऊँ, तेरे दिल को जो लुभा ले वो सदा कहाँ से लाऊँ"। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इसी लाजवाब गीत की बारी, सुनिए।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. सुमन कल्याणपुर और मीनू पुरुषोत्तम की आवाजें.
२. साहिर का लिखा और रोशन का स्वरबद्ध ये गीत जिस फिल्म का है उसके सभी गीत मकबूल हुए थे और फिल्म भी सफल थी.
३. मुखड़े में आता है -"हाथ न लगाना".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी लगातार शतक पे शतक मार रहे हैं. मनु जी और गुडू का भी जवाब सही है बधाई...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Saturday, May 16, 2009

मेरा दिल ये पुकारे आजा.....तड़पती नागिन की पुकार लता के स्वर में...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 82

ल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप ने सुना हेमन्त कुमार के संगीत और आवाज़ से सजी फ़िल्म 'बीस साल बाद' का एक गीत। आज भी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हेमन्तदा छाये रहेंगे क्यूंकि आज भी हम उन्ही का स्वरबद्ध गीत सुनवाने जा रहे हैं आपको। लेकिन यह बात ज़रूर है कि आज का गीत उनकी आवाज़ में नहीं बल्कि सुर कोकीला लता मंगेशकर की आवाज़ में है। जहाँ हेमन्तदा का मधुर संगीत और लताजी की मधुर आवाज़ एक साथ घुलमिल जाये तो इस संगम से कैसा मीठा रस उत्पन्न होगा इसका शायद आप ख़ुद ही अंदाज़ा लगा सकते हैं। आज हम आपको सुनवाने के लिए लाये हैं १९५४ की फ़िल्म 'नागिन' का एक गीत। यूँ तो फ़िल्म 'नागिन' का नाम आते ही लताजी का गाया "मन डोले मेरा तन डोले" गीत याद आता है और साथ ही याद आती है रवि और कल्याणजी द्वारा बजाये गये हारमोनियम और क्लेवियोलिन पर बीन की ध्वनि। लेकिन इसी फ़िल्म में लताजी ने बहुत सारे एक से एक मधुर एकल गीत गाये हैं जिनकी चर्चा इस गीत से थोडी कम होती है। तो इसलिए हमने सोचा कि क्यों ना इन्ही में से एक गीत आज चुना जाए। अब देखना यह है कि क्या हमारी पसंद आपकी भी पसंद है या नहीं। ज़रूर बताइएगा!

'नागिन' के निर्देशक थे आइ. एस. जोहर और फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाई प्रदीप कुमार और वैजयन्तिमाला ने। लताजी ने इस फ़िल्म में जितने भी गाने गाये उन सबकी खासियत यह थी कि गाने बड़े सीधे सरल शब्दों में लिखे हुए थे जिन्हे लिखा था गीतकार राजेन्द्र कृष्ण ने, और उनका हेमन्तदा ने शास्त्रीय रागों का सहारा लेकर हल्के फुल्के धुनों में पिरोकर ऐसे प्रस्तुत किया कि सुननेवालों के कानों से होते हुए सीधे दिल में उतर गए। इस फ़िल्म के मधुर संगीत के लिए हेमन्त कुमार को उस साल के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार भी मिला था। उन दिनो संगीतकार रवि उनके सहायक हुआ करते थे। हेमन्तदा पुरस्कार लेकर मंच से नीचे आये और रवि के पास आकर उन्हे वह ट्राफ़ी सौंप दी। कहने की ज़रूरत नहीं कि रवि का 'नागिन' के संगीत में बहुत बड़ा हाथ था। आज हम आपको सुनवा रहे हैं "मेरा दिल ये पुकारे आजा"। इस गीत में भी अपको बीन की आवाज़ सुनाई देगी जिसे रवि और कल्याणजी ने बजाया था। और आपको यह भी बता दें कि यह गीत राग किरवाणी पर आधारित है। तो सुनिए यह गीत और खो जाइए इसकी मधुरता में।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. निर्देशक रमेश सहगल की इस फिल्म में थे राज कपूर और माला सिन्हा.
२. साहिर के सशक्त बोलों पर खय्याम का संगीत.
३. मुखड़े में शब्द है -"आजकल".

कुछ याद आया...?
पिछली पहेली का परिणाम -
पहली बार नीलम जी ने बाजी मारी है। बधाइयाँ..... हालाँकि शरद तैलंग ने इनसे पहले ही उत्तर बता दिया था, लेकिन वे गलती से अपना उत्तर शक्ति सामंत वाली पोस्ट पर दे गये थे...... रचना जी और मनु जी को भी बधाई। पवन जी, आपका स्वागत है..... ज़रूर सुनवायेंगे.... रोज़ सुनते रहिए.... आपको यह गाना मिलेगा।

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Thursday, May 14, 2009

जाओ रे जोगी तुम जाओ रे....आम्रपाली के स्वर में लता की सदा...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 80

ह कहानी है भारत के इतिहास के पन्नो से। इस कहानी की शुरुआत होती है वैशाली शहर में जहाँ एक रोज़ एक नारी का आविर्भाव होता है वहाँ के एक आम के बगीचे से। किसी को नहीं पता कि वह कौन है और कहाँ से आयी है। वह बहुत सुंदर थी और नृत्यकला में उसका कोई सानी नहीं था वहाँ पर। शहर में हर पुरुष उसका प्यार जीतना चाहता था। इसलिए उस लड़की ने यह ऐलान किया कि वह कभी किसी से शादी नहीं करेगी और वह पूरे शहर के लिए नृत्य करती रहेगी। दिन गुज़रने लगे, लोग उसे 'आम्रपाली' के नाम से पुकारने लगे क्योंकि वो आम के बगीचे से निकल कर पहली बार शहर में आयी थी। एक दिन अचानक मगध के राजा अजातशत्रु ने वैशाली पर आक्रमण कर दिया। शहर के सारे लोग, जो आम्रपाली के नृत्य में डूबे हुए थे, अब युद्ध के लिए तैयार हो रहे थे। यह देख आम्रपाली का हृदय दर्द से भर उठा। अजातशत्रु के सिपाही मगध की सेना से युद्ध में हारने लगते हैं, तो अजातशत्रु युद्धभूमी से भागकर मगध के सैनिक का भेस धारण कर वैशाली शहर में घुस जाते हैं और इत्तेफ़ाक से आ पहुँचते हैं नर्तकी आम्रपाली के घर। दोनो को एक दूसरे से प्यार हो जाता है, लेकिन अजातशत्रु फिर से वैशाली पर आक्रमण करने की साज़िश रचने लगता है। जब मगध के राजा को इस बात का पता चलता है कि उनकी राज नर्तकी आम्रपाली अजातशत्रु को अपने घर में पनाह दे रखी है तो आम्रपाली को क़ैद कर लिया जाता है और काल-कोठरी में डाल दिया जाता है ता-उम्र के लिए। इस बात पर अजातशत्रु भड़क उठता है और वैशाली पर बुरी तरह से फिर एक बार आक्रमण कर देता है। इस बार वैशाली हार जाता है और चारों तरफ़ मौत ही मौत नज़र आती है। अजातशत्रु आम्रपाली को मुक्त तो करवा देता है लेकिन आम्रपाली अब वो पहलीवाली आम्रपाली नहीं रही। वह संसार की मोह-माया को छोड़ कर भगवान बुद्ध के शरण में चली जाती है अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए। तो दोस्तों, यह थी आम्रपाली की कहानी। इस कहानी को आधार बना कर सन १९६६ में लेख टंडन ने एक फ़िल्म बनाई थी 'आम्रपाली' जिसमें आम्रपाली की भूमिका अदा की थी वैजयंतिमाला ने जो एक अच्छी नृत्यांगना भी थीं और इस चरित्र के लिए जिसकी बहुत ज़रूरत भी थी। और सुनिल दत्त नज़र आये अजातशत्रु के चरित्र में।

ऐतिहासिक और पौराणिक फ़िल्मों के लिए हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री ने जैसे कुछ संगीतकारों को अलग से नियुक्त कर रखा था। एक बार इधर किसी ने पौराणिक फ़िल्मों में संगीत दिया और उधर सामाजिक फ़िल्मों में उनके लिए दरवाज़ा लगभग हमेशा के लिए बंद सा हो गया। यही रीत चली आ रही थी दशकों से हमारे फ़िल्म जगत में। 'आम्रपाली' एक ऐतिहासिक फ़िल्म होते हुए भी इस फ़िल्म के संगीत के लिए किसी पौराणिक फ़िल्म के संगीतकार को नहीं बल्कि शंकर जयकिशन को ही लिया गया था। और इस बेजोड़ संगीतकार जोड़ी ने यह साबित भी किया कि ऐसे फ़िल्मों के लिए भी वो उतना ही असरदार संगीत तैयार कर सकते हैं जितना की किसी दूसरे सामान्य सामाजिक फ़िल्म के लिए। इस फ़िल्म में कुल ५ गीत थे, जिनमें ४ लताजी की एकल आवाज़ में थे और एक गीत समूह स्वरों में था। लताजी के गाए ये चारों गीत अपने आप में 'मास्टरपीसेस' हैं जिन्हे सुनकर दिल को एक अजीब सुकून और शांति मिलती है। इन्ही चार गीतों में से एक गीत आज आप को सुनवा रहे हैं - "जाओ रे जोगी तुम जाओ रे", जिसे लिखा है गीतकार शैलेन्द्र ने। इस गीत से मिलता-जुलता रोशन का स्वरबद्ध किया हुआ एक गीत है 'चित्रलेखा' फ़िल्म में "संसार से भागे फिरते हो भगवान को तुम क्या पायोगे", याद आया न? इस गीत को हम फिर कभी सुनेंगे, आज अब यहाँ पेश है आम्रपाली का गीत, सुनिए और याद कीजिए वैशाली के उस पुरातन युग को जहाँ राज दरबार में राज नर्तकी आम्रपाली नृत्य कर रही है इस गीत पर...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. हेमंत दा का सदाबहार गीत.
२. इस सस्पेंस थ्रिलर फिल्म का नाम एक अंक से शुरू होता है.
३. पहला अंतरा इन शब्दों पर खत्म होता है -"खुद को बचाईये".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
ओल्ड इस गोल्ड की पहेलियों में पहली बार ऐसा हुआ कि दो गीत जिनके मुखड़ों में सूत्र का शब्द आता है और उनके रचनाकार भी एक ही निकले, कल की पहेली के जवाब में ये दोनों ही गीत हमें रचना जी ने सुझाए...उनमें से कौन सा जवाब सही था ये तो अब आप जान ही चुके हैं....पर रचना जी दाद देनी पड़ेगी आपकी....बहुत बहुत बधाई..नीलम जी कोशिश करते रहिये कभी तो तुक्का भी फिट होगा. हर्षद जी, पराग जी और मनु जी "रुक जा रात..." गीत भी किसी दिन जरूर सुनेंगे हम और आप इस महफिल में.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


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