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Sunday, December 8, 2019

राग मुल्तानी : SWARGOSHTHI – 446 : RAG MULTANI






स्वरगोष्ठी – 446 में आज


नौशाद की जन्मशती पर उनके राग – 2 : राग मुल्तानी


उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में सुनिए; “दया कर हे गिरिधर गोपाल...”





नौशाद
पण्डित रविशंकर
रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला – “नौशाद की जन्मशती पर उनके राग” की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान रहे नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा करेंगे। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद अली का जन्म हुआ था। इस तिथि के अनुसार दिसम्बर, 2019 को नौशाद का एक सौवाँ जन्मदिन पड़ता है। इस उपलक्ष्य में हम “स्वरगोष्ठी” के दिसम्बर मास के प्रत्येक अंक में नौशाद के कुछ राग आधारित ऐतिहासिक गीत प्रस्तुत करेंगे। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करते थे। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठने लगे। वहाँ वह साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घरवालों की फटकार बदस्तूर जारी रही। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए मायानगरी बम्बई (अब मुम्बई) की ओर रुख किया। 


उस्ताद अमीर खाँ
सबसे पहले नौशाद को ‘न्यू पिक्चर कम्पनी’ में उस्ताद झण्डे खाँ के संगीत निर्देशन में पियानो वादक की नौकरी मिली थी। यहाँ उन्हें चालीस रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता था। नौशाद की अभिरुचि संगीत के साथ-साथ शायरी में भी थी। उन्हीं दिनों नौशाद की मित्रता गीतकार पी.एल. सन्तोषी से हुई। सन्तोषी गीत लिखते समय प्रायः नौशाद से सलाह-मशविरा भी करते थे। उन दिनों नौशाद परेल की एक चाल में दस रुपये माहवार पर रहने लगे थे। उस दौर में ‘न्यू पिक्चर कम्पनी’ की फिल्म ‘सुनहरी मकड़ी’ का निर्माण हो रहा था। उस्ताद झण्डे खाँ की एक धुन से कम्पनी के मालिक हेनरी डोरग्वोच सन्तुष्ट नहीं हो रहे थे। नौशाद ने उस्ताद झण्डे खाँ से इजाज़त लेकर पियानो पर तुरन्त उस गीत को एक नई धुन में ढाल दिया। इस नई धुन को सुन कर हेनरी बहुत खुश हुए और नौशाद की तरक्की सहायक के रूप में हो गई। परन्तु वेतन में कोई वृद्धि नहीं हुई। फिल्म का संगीत पूरा होने बाद नौशाद का हिसाब चुकता कर कम्पनी से हटा दिया गया। फिर काम की तलाश शुरू हुई और इसी सिलसिले में नौशाद का दूसरा ठिकाना ‘फिल्म सिटी’ कम्पनी बनी। इस कम्पनी में नौशाद संगीतकार मुश्ताक हुसेन के सहायक बने। यहाँ उन्होने तीन फिल्मों में सहायक संगीतकार के रूप में काम किया। ‘फिल्म सिटी’ कम्पनी की बाद नौशाद ‘रणजीत फिल्म कम्पनी’ की पंजाबी फिल्म ‘मिर्ज़ा साहिबाँ’ के नायक और संगीतकार मनोहर कपूर के सहायक बन गए। यहीं उनकी मित्रता गीतकार डी.एन. मधोक से हो गई, जो आगे चल कर नौशाद के बहुत काम आई। 1939 में मधोक की सिफ़ारिश पर नौशाद को रणजीत कम्पनी की फिल्म ‘कंगन’ के संगीत निर्देशक के रूप में चुना गया। फिल्म का पहला गीत- “बता दो मोहे कौन गली गए श्याम...” उन्होने रिकार्ड तो करा दिया, किन्तु साजिन्दों के असहयोगात्मक रवैये के कारण मात्र एक गीत रिकार्ड करने के बाद नौशाद ने कम्पनी से त्यागपत्र दे दिया। मधोक की सिफ़ारिश पर नौशाद को ‘भवनानी प्रोडक्शन’ की 1940 में प्रदर्शित फिल्म ‘प्रेम नगर’ में संगीतकार के रूप में नियुक्त किया गया। स्वतंत्र संगीतकार के रूप में नौशाद को अवसर तो 1939-40 में ही मिल चुका था। अपने शुरुआती दौर में उन्होने उत्तर प्रदेश की लोकधुनों का प्रयोग करते हुए अनेक लोकप्रिय गीत रचे। ऐसे गीतों में प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य की छटा थी। दरअसल नौशाद के ऐसे प्रयोगों से उन दिनों प्रचलित फिल्म संगीत को एक नया मुहावरा मिला। आगे चल कर अन्य संगीतकारों ने भी प्रादेशिक और क्षेत्रीय लोक संगीत से जुड़ कर ऐसे ही प्रयोग किए।

राग मुल्तानी तोड़ी थाट का राग माना जाता है। इसकी जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर का प्रयोग किया जाता है। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं किया जाता। इस राग में ऋषभ, गान्धार तथा धैवत स्वर कोमल और मध्यम स्वर तीव्र प्रयोग किया जाता है। आज हम आपको राग मुल्तानी में निबद्ध एक फिल्मी गीत सुनवाते है। वर्ष 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘शबाब’ के संगीतकार नौशाद ने सुविख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ से यह गीत गवाया था। इससे पूर्व वर्ष 1952 में नौशाद ने उस्ताद अमीर खाँ से फिल्म ‘बैजू बावरा’ में दो गीत गवा कर अपने शास्त्रीय संगीत के प्रति अनुराग को सिद्ध किया था। उस्ताद अमीर खाँ जैसे दिग्गज गवैये नौशाद की प्रतिभा के ऐसे कायल हुए कि आगे चल कर जब भी उन्हें नौशाद ने बुलाया, अपनी सहमति और सहयोग प्रदान किया। रागदारी संगीत के प्रति नौशाद की ऐसी अगाध श्रद्धा थी कि इस विषय पर प्रायः फिल्म के निर्माता-निर्देशक के साथ उनकी मीठी नोकझोक भी हो जाती थी। एक साक्षात्कार में नौशाद ने फ़िल्मकार ए.आर. कारदार के हवाले से जिक्र किया भी था कि फिल्म में राग आधारित गीत रखने के सवाल पर कैसे उन्हें चुनौती मिली थी। उस्ताद अमीर खाँ को नौशाद साहब ने दोबारा याद किया, 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘शबाब’ के लिए। इस फिल्म के अन्य गीतों के लिए मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर और हेमन्त कुमार थे, किन्तु उस्ताद अमीर खाँ से उन्होने राग मुल्तानी के स्वरों में मीरा का एक पद- ‘दया कर हे गिरिधर गोपाल...’ गवाया। यह राग दिन के चौथे प्रहर के परिवेश को यथार्थ रूप से अनुभूति कराता है। आप यह गीत सुनिए।

राग मुल्तानी : ‘दया कर हे गिरिधर गोपाल...’ : उस्ताद अमीर खाँ : फिल्म - शबाब


राग मुल्तानी, तोड़ी थाट का राग माना जाता है। इसकी जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर का प्रयोग किया जाता है। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं किया जाता, किन्तु अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस राग में ऋषभ, गान्धार तथा धैवत स्वर कोमल और मध्यम स्वर तीव्र प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। राग मुल्तानी का गायन-वादन आम तौर पर दिन के चौथे प्रहर में किया जाता है। इसे परमेल प्रवेशक राग माना गया है। कारण यह है कि यह दिन के चौथे प्रहर का अन्तिम राग है। इसमें कोमल गान्धार के साथ-साथ कोमल ऋषभ और कोमल धैवत भी प्रयोग किया जाता है। ऋषभ स्वर कोमल होने से राग मुल्तानी सन्धिप्रकाश रागों की श्रेणी में आता है। इस राग में दिन के चौथे प्रहर और सन्धिप्रकाश बेला की विशेषताएँ हैं। इस प्रकार यह तोड़ी थाट के रागों से पूर्वी, मारवा और भैरव थाट के रागों में प्रवेश कराता है। इसीलिए इसे परमेल प्रवेशक राग कहा गया है। परमेल प्रवेशक राग दो थाटों के बीच का राग होता है जो एक थाट से दूसरे थाट में प्रवेश कराता है। राग मुल्तानी में यदि शुद्ध ऋषभ और शुद्ध धैवत स्वरों का प्रयोग किया जाय तो यह राग मधुवन्ती हो जाता है। राग मुल्तानी के शास्त्रीय स्वरूप का अनुभव कराने के लिए अब हम आपको विश्वविख्यात सितार वादक पण्डित रविशंकर द्वारा प्रस्तुत राग मुल्तानी में द्रुत लय की एक रचना सुनवा रहे हैं। आप इस प्रस्तुति का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग मुल्तानी : सितार पर द्रुत एकताल में निबद्ध रचना : पण्डित रविशंकर



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 446वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1955 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष की अन्तिम पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत को किस ताल में निबद्ध किया गया है, हमें ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका का मुख्य स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com  पर ही शनिवार, 14 दिसम्बर, 2019 की मध्यरात्रि तक अपने पते के साथ भेज सकते हैं। इसके बाद आपका उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 448 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से अथवा swargoshthi@gmail.com  पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 444वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मालकौंस, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मोहम्मद रफी

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, डोम्बिवली, महाराष्ट्र से श्रीपाद बावडेकर, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो-दो अंक मिलते हैं। सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “नौशाद की जन्मशती पर उनके राग” की दूसरी कड़ी में आज आपने राग मुल्तानी का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर से सितार पर द्रुत एकताल में इस राग की एक रचना का रसास्वादन किया। नौशाद के राग मालकौंस पर आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में फिल्म “शबाब” से भक्त  कवयित्रि मीराबाई का एक पद प्रस्तुत किया। अगले अंक में हम श्रृंखला की अगली कड़ी में एक अन्य गीत प्रस्तुत करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग मुल्तानी : SWARGOSHTHI – 446 : RAG MULTANI : 8 दिसम्बर, 2019 

Sunday, November 10, 2019

राग पूरिया धनाश्री : SWARGOSHTHI – 442 : RAG PURIYA DHANASHRI






स्वरगोष्ठी – 442 में आज


पूर्वी थाट के राग – 2 : राग पूरिया धनाश्री


उस्ताद राशिद खाँ से राग पूरिया धनाश्री में खयाल और उस्ताद अमीर खाँ से फिल्मी गीत सुनिए




उस्ताद राशिद खाँ
उस्ताद अमीर खाँ
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वी थाट के राग” की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से पाँचवाँ थाट भैरव है। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। इस श्रृंखला में हम पूर्वी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में पूर्वी थाट के जन्य राग पूरिया धनाश्री पर चर्चा करेंगे। आज हम श्रृंखला के इस दूसरे अंक में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ से इस राग में निबद्ध एक रचना प्रस्तुत करेंगे और फिर इसी राग पर केन्द्रित एक फिल्मी गीत उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में सुनवाएँगे। 1952 में प्रदर्शित फिल्म “बैजू बावरा” से शकील बदायूनी रचित और नौशाद का संगीतबद्ध किया एक गीत – “तोरी जय जय करतार...” का रसास्वादन भी आप करेंगे।



पूर्वी थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ प्रमुख राग हैं- ‘पूरिया धनाश्री’, ‘जैतश्री’, ‘परज’, ‘श्री’, ‘गौरी’, ‘वसन्त’ आदि। पूर्वी थाट के विभिन्न रागों में राग पूरिया धनाश्री एक अत्यन्त लोकप्रिय राग है। राग पूर्वी की तरह राग पूरिया धनाश्री भी सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर इस्तेमाल किये जाते हैं। इसका ऋषभ और धैवत स्वर कोमल होता है तथा मध्यम स्वर तीव्र होता है। आरोह के स्वर- नि, रे(कोमल), ग, म॑(तीव्र), प, ध(कोमल), प, नि, सां और अवरोह के स्वर- रे(कोमल), नि, ध, प, म॑(तीव्र), ग, म॑(तीव्र), रे, ग, रे, सा होते हैं। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग पूरिया धनाश्री के गायन-वादन का समय सायंकाल माना जाता है। अब आप रामपुर सहसवान घराने की गायकी में दक्ष उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में राग पूरिया धनाश्री, तीनताल में निबद्ध एक लोकप्रिय खयाल रचना; “पायलिया झनकार मोरी...” सुनिए। इस प्रस्तुति में तबले पर विजय घाटे और हारमोनियम पर सुधीर नायक ने संगति की है।

राग पूरिया धनाश्री : “पायलिया झनकार मोरी...” : उस्ताद राशिद खाँ


अब आप राग पूरिया धनाश्री पर केन्द्रित एक फिल्मी गीत सुनिए। यह गीत हमने फिल्म ‘बैजू बावरा’ से लिया है। अकबर के समकालीन कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और कुछ दन्तकथाओं के मिश्रण से बुनी 1952 में फिल्म- ‘बैजू बावरा’ प्रदर्शित हुई थी। ऐतिहासिक कथानक और उच्चस्तर के संगीत से युक्त अपने समय की यह एक सफलतम फिल्म थी। इस फिल्म को आज छह दशक बाद भी केवल इसलिए याद किया जाता है कि इसका गीत-संगीत भारतीय संगीत के रागों पर केन्द्रित था। फिल्म के कथानक के अनुसार अकबर के समकालीन सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास के शिष्य तानसेन सर्वश्रेष्ठ थे। परन्तु उनके संगीत पर दरबारी प्रभाव आ चुका था। उन्हीं के समकालीन स्वामी हरिदास के ही शिष्य माने जाने वाले बैजू अथवा बैजनाथ थे, जिसका संगीत मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था। फिल्म के कथानक का निष्कर्ष यह था कि संगीत जब राज दरबार की दीवारों से घिर जाता है, तो उसका लक्ष्य अपने स्वामी की प्रशस्ति तक सीमित हो जाता है, जबकि मुक्त प्राकृतिक परिवेश में पनपने वाला संगीत ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण होता है। राग पूरिया धनाश्री के स्वरों से पगा जो गीत आज हमारी चर्चा में है, उसका फिल्मांकन अकबर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन को अपने महल में रियाज़ करते दिखाया गया था। यह फिल्म का शुरुआती प्रसंग है। इसी गीत पर फिल्म की नामावली प्रस्तुत की गई है। राग पूरिया धनाश्री में निबद्ध यह गीत सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में है। फिल्म के संगीतकार नौशाद थे। इस रचना में भी तानसेन का नाम आया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग पूरिया धनाश्री : ‘तोरी जय जय करतार...’ : उस्ताद अमीर खाँ : फिल्म - बैजू बावरा




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 442वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष की अन्तिम पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का प्रभाव है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका का मुख्य स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 16 नवम्बर, 2019 की मध्यरात्रि तक भेज सकते हैं। इसके बाद आपका उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 444 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 440वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – पूर्वी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – सितारखानी अथवा पंजाबी ठेका तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – वाणी जयराम

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हमारे एक नए प्रतिभागी किसी अज्ञात स्थान से श्रीपाद बावडेकर, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो-दो अंक मिलते हैं। सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वी थाट के राग” की दूसरी कड़ी में आज आपने पूर्वी थाट के जन्य राग पूरिया धनाश्री का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस शैली के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात गायक उस्ताद रशीद खाँ से इस राग में एक खयाल रचना का रसास्वादन किया। राग पूरिया धनाश्री पर केन्द्रित रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में फिल्म “बैजू बावरा” का एक गीत प्रस्तुत किया। अगले अंक में हम पूर्वी थाट के नए राग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया
राग पूरिया धनाश्री : SWARGOSHTHI – 442 : RAG PURIYA DHANASHRI : 10 नवम्बर, 2019

Sunday, September 23, 2018

राग अड़ाना : SWARGOSHTHI – 386 : RAG ADANA







स्वरगोष्ठी – 386 में आज

पूर्वांग और उत्तरांग राग – 1 : राग अड़ाना

उस्ताद अमीर खाँ से फिल्मी गीत और उस्ताद कमाल साबरी से सारंगी पर राग अड़ाना सुनिए





उस्ताद अमीर खाँ
उस्ताद कमाल साबरी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हमारी नई श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग (पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग (उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए रागों में वादी स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हमने उत्तरांग प्रधान राग अड़ाना चुना है। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम सुविख्यात गायक उस्ताद अमीर खाँ और उनके साथियों के स्वर में 1955 में प्रदर्शित फिल्म “झनक झनक पायल बाजे” से राग अड़ाना पर आधारित एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सेनिया घराने के सुप्रसिद्ध सारंगीवादक उस्ताद कमाल साबरी का सारंगी पर बजाया राग अड़ाना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।



भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मों की गणना ‘मील के पत्थर’ के रूप में की जाती है। ऐसी ही एक उल्लेखनीय फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ थी जिसका प्रदर्शन 1955 में हुआ था। इस फिल्म में कथक नृत्य शैली का और राग आधारित गीत-संगीत का कलात्मक उपयोग किया गया था। फिल्म का निर्देशन वी. शान्ताराम ने और संगीत निर्देशन वसन्त देसाई ने किया था। वी. शान्ताराम के फिल्मों की सदैव यह विशेषता रही है कि उसके विषय नैतिक मूल्यों रक्षा करते प्रतीत होते है। साथ ही उनकी फिल्मों में रूढ़ियों का विरोध भी नज़र आता है। फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उन्होने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महत्ता को रेखांकित किया था। फिल्म को इस लक्ष्य तक ले जाने में संगीतकार वसन्त देसाई का उल्लेखनीय योगदान रहा। जाने-माने कथक नर्तक गोपीकृष्ण फिल्म की प्रमुख भूमिका में थे। इसके अलावा संगीत के ताल पक्ष में निखारने के लिए सुप्रसिद्ध तबलावादक गुदई महाराज (पण्डित सामता प्रसाद) का उल्लेखनीय योगदान था। वसन्त देसाई ने सारंगीनवाज़ पण्डित रामनारायन और संतूरवादक पण्डित शिवकुमार शर्मा का सहयोग भी प्राप्त किया था।

संगीतकार वसन्त देसाई की सफलता का दौर फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से ही आरम्भ हुआ था। वसन्त देसाई की प्रतिभा का सही मूल्यांकन वी. शान्ताराम ने ही किया था। प्रभात कम्पनी में एक साधारण कर्मचारी के रूप में उनकी नियुक्ति हुई थी। यहीं रह कर उन्होने अपनी कलात्मक प्रतिभा का विकास किया था। आगे चलकर वसन्त देसाई, शान्ताराम की फिल्मों के मुख्य संगीतकार बने। दरअसल वसन्त देसाई फिल्मों के नायक बनने की अभिलाषा लेकर ‘प्रभात’ में शान्ताराम के पास आये थे। उन्हें फ़िल्म-निर्माण के हर पहलू को जानने और परखने का सुझाव शान्ताराम ने दिया। उस प्रथम मुलाक़ात के बारे में वसन्त देसाई ने एक रेडिओ प्रस्तुतकर्त्ता को कुछ इन शब्दों में बताया था– “अजी बस एक दिन यूँही सामने जाके खड़ा हो गया कि मुझे ऐक्टर बनना है। म्युज़िक तब कहाँ आता था? और वैसे भी फ़िल्मों में हर कोई पहले ऐक्टर बनने ही तो आता है। फिर बन जाता है टेक्निशियन। तो मैं भी बाल बढ़ाकर पहुँच गया ऐक्टर बनने। मगर एक कमी थी मुझमें, मैं दुबला-पतला और छोटे कद का था जब कि वह स्टण्ट का ज़माना था। सब ऊँचे कद के पहलवान जैसे हुआ करते थे, छोटे कद के आदमी का काम नहीं था। शान्ताराम जी ने पूछा, 'क्या करना चाहते हो?' मैंने गर्दन हिलाकर बाल दिखाये और कहा कि ऐक्टर बनना चाहता हूँ। उन्होंने मुझे सर से पाँव तक देखा और सोचा होगा कि लड़का पागल है। फिर मुझ पर तरस आ गया और बोले कि मैं तुम्हे रख लेता हूँ, मगर सब काम करना पड़ेगा। कल से आ जाओ स्टुडिओ में। मैं ऑफ़िस बॉय बन गया, नो पगार, मुफ़्त में 18-18 घण्टे का काम। अरे, मालिक ख़ुद काम करते थे हमारे साथ। ऋषियों के आश्रम जैसा था 'प्रभात' का परिवेश। उनका हमेशा से ऐसा ही स्वभाव रहा है कि जैसा कहें वैसा फ़ौरन कर दो। और मैं भी उनकी हर बात मानता था, इसलिए मुझसे वो हमेशा ख़ुश रहते थे। जिस विभाग में कमी हो, अन्ना साहब मुझे फ़ौरन भेज देते, चाहे वह कैमरा विभाग हो या संगीत विभाग। इसलिए आज मैं फिल्म निर्माण की हर इकाई का काम जानता हूँ। फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में मैं उनका सहायक तक रहा हूँ। सिनेमा तकनीक में मैं उन्हें गुरु मानता हूँ। एक साल के बाद उन्होंने मेरी तनख्वाह सात रुपये से बढ़ाकर 45 रुपये कर दी, और बाद में तो यह समझ लीजिए, 'प्रभात' में सबसे ज़्यादा तनख्वाह हीरो चन्द्रमोहन को और मुझे मिलती थी।" आरम्भ से ही शान्ताराम जी को एक ऐसे सामाजिक फ़िल्मकार का दर्जा प्राप्त था, जो मनोरंजन के साथ-साथ समाज की कुप्रथाओं के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते रहते थे। इसके बाद उनकी हर फ़िल्म में समाज को कोई न कोई सन्देश दिया है। शान्ताराम जी ने 1955 में फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ का निर्माण किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई ने इस फिल्म में कई राग आधारित स्तरीय गीतों की रचना की थी। फिल्म का शीर्षक गीत ‘झनक झनक पायल बाजे...’ राग अड़ाना का एक मोहक उदाहरण है। इस गीत को स्वर प्रदान किया, सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ ने। आइए, सुनते हैं, राग अड़ाना पर आधारित यह गीत।

राग अड़ाना : ‘झनक झनक पायल बाजे...’ : उस्ताद अमीर खाँ और साथी : फिल्म – झनक झनक पायल बाजे


फिल्म के इस गीत में आपको राग अड़ाना के स्वरों का स्पष्ट अनुभव हुआ होगा। राग दरबारी से ही मिलता-जुलता राग है, अड़ाना। सातवें प्रहर अर्थात रात्रि के तीसरे प्रहर में यह राग खूब खिलता है। यह आसावरी थाट और कान्हड़ा अंग का राग है। षाड़व-षाड़व जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और अवरोह में धैवत स्वर वर्जित होता है। अवरोह में कोमल गान्धार और शुद्ध मध्यम स्वर वक्रगति से प्रयोग किया जाता है। चंचल प्रकृति के इस राग से विनयपूर्ण और प्रबल पुकार के भाव की सार्थक अभिव्यक्ति सम्भव है। वीर रस के गीतों के लिए यह एक आदर्श राग है। यह राग, दरबारी से काफी मिलता-जुलता है। परन्तु अड़ाना में दरबारी की तरह अतिकोमल गान्धार स्वर का आन्दोलनयुक्त प्रयोग नहीं होता। इसके अलावा राग अड़ाना उत्तरांग प्रधान है, अर्थात इस राग के स्वर अधिकतर मध्य और तार सप्तक में चलते हैं। जबकि दरबारी पूर्वांग प्रधान राग होता है। राग अड़ाना का वादी स्वर तार सप्तक का षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग अड़ाना, राग दीपक के आठ पुत्रों में से एक माना जाता है। इसे ‘रात की सारंग’ भी कहा जाता है।

वाद्य संगीत पर राग अड़ाना की सहज अनुभूति के लिए अब हम आपको यही राग सारंगी पर सुनवाते हैं। सारंगी एक ऐसा वाद्य है जो मानव कण्ठ के सर्वाधिक निकट होता है। आपके लिए सारंगी पर तीनताल में निबद्ध रचना प्रस्तुत कर रहे हैं, सुप्रसिद्ध सारंगी वादक उस्ताद कमाल साबरी। सारंगीवादकों के खानदान की सातवीं पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे उस्ताद कमाल साबरी रामपुर-मुरादाबाद के सेनिया घराने की वादन परम्परा के प्रतिभावान संवाहक हैं। इनके पिता उस्ताद साबरी खाँ विश्वविख्यात सारंगीवादक थे। कमाल साबरी ने अनेकानेक अवसरों पर स्वतंत्र सारंगीवादन के माध्यम से संगीत-प्रेमियों को चमत्कृत किया है। हमारी आज कि गोष्ठी में कमाल साबरी राग अड़ाना की एक ओजपूर्ण रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इस प्रस्तुति में तबला पर साथ दिया है, सरवर साबरी ने। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज का यह अंक यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग अड़ाना : सारंगी पर तीनताल की रचना : उस्ताद कमाल साबरी




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 386वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1966 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 390वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 29 सितम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 388वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 384वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1980 में प्रदर्शित फिल्म “कुदरत” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – विदुषी परवीन सुल्ताना

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, मैरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हमारी नई श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की पहली कड़ी में आपने राग अड़ाना का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने उस्ताद कमाल साबरी द्वारा सारंगी पर प्रस्तुत एक रचना का रसास्वादन किया। साथ ही आपने उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में इस राग पर केन्द्रित एक फिल्मी गीत फिल्म “झनक झनक पायल बाजे” से सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

राग अड़ाना : SWARGOSHTHI – 386 : RAG ADANA : 23 सितम्बर, 2018

Sunday, June 24, 2018

राग पूरियाधनाश्री : SWARGOSHTHI – 375 : RAG PURIYADHANASHRI






स्वरगोष्ठी – 375 में आज

राग से रोगोपचार – 4 : दिन के चौथे प्रहर का राग पूरियाधनाश्री

उच्चरक्तचाप, धड़कन और अपच का निदान छुपा है पूरियाधनाश्री के स्वरों में




पण्डित भीमसेन जोशी
उस्ताद अमीर  खाँ
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज तथा मयूरवीणा के सुविख्यात वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृति की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है। प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होते हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गातन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन, तनाव, चिन्ताविकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन कर रहे हैं। श्रृंखला के चौथे अंक में आज हम राग पूरियाधनाश्री के स्वरो से विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको सुविख्यात गायक पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में राग पूरियाधनाश्री में निबद्ध दो खयाल रचना सुनवाएँगे। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार फिल्म “बैजू बावरा” से उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में इस राग में पिरोया एक गीत भी प्रस्तुत करेंगे।



राग पूरियाधनाश्री को सायंकाल 6 बजे से 7 बजे तक गाने-बजाने का चलन है। इसका वादी स्वर पंचम तथा संवादी स्वर षडज होता है। इस राग के आरोह में नि, रे॒, ग, म॑, प, म॑, ध॒, नि सां और अवरोह में रे॒, नि, ध॒, प, म॑, ग, म॑, रे॒, ग, रे॒, सा स्वर लगते हैं। नि, रे॒, ग, स्वरों से उम्मीद, रे॒, ग, म॑, रे॒, ग, स्वरों से मायूसी के साथ इन्तजार तथा प, म॑, ध॒, प, स्वरों से कटु अनुभव का भाव उत्पन्न होता है। म॑, ग, म॑, रे॒, ग, स्वर समूह से अनुभव दुखदायी होता है, किन्तु ईश्वर पर भरोसा का भाव जागृत होता है। रे॒, सा स्वर निराशा में आशा की उम्मीद जगाता है। चिन्ताविकृति से ग्रस्त व्यक्ति की मनोदशा उक्त स्वरों द्वारा स्पष्ट होती है। डिप्रेशन में भी ऐसी अनुभूति हो सकती है। यदि सुरीला गायक या वादक उक्त मनःस्थिति से ग्रस्त हो जाए तो स्वरयोग विधि से राग पूरियाधनाश्री की साधना करे तो उन्हें मानसिक शान्ति प्राप्त हो सकती है। एक माह तक यदि उपरोक्त प्रक्रिया को पूर्ण कर लिया जाए तो विश्वास है कि राग की सकारात्मक, सार्थक और संवेदनशील स्वरावलियों की नादात्मक परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से उक्त मानसिक समस्याओं तथा उनके कारण उत्पन्न मनोदैहिक समस्याओं; उच्चरक्तचाप, धड़कन, अपच आदि अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है। यदि समस्याग्रस्त कोई संगीत-प्रेमी है तो उसे राग पूरियाधनाश्री के गायन अथवा वादन की रिकार्डिंग का एक माह तक श्रवण करना चाहिए, अवश्य लाभ होगा। अब हम राग पूरियाधनाश्री में निबद्ध दो खयाल; “अरज सुनो पार करो...” और “पायलिया झनकार मोरी...” प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे सुविख्यात गायक पण्डित भीमसेन जोशी ने स्वर दिया है।

राग पूरियाधनाश्री : “अरज सुनो...” और “पायलिया झनकार मोरी...” : पण्डित भीमसेन जोशी


पूर्वी थाट के विभिन्न रागों में राग पूरियाधनाश्री एक अत्यन्त लोकप्रिय राग है। राग पूर्वी की तरह राग पूरियाधनाश्री भी सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर इस्तेमाल किये जाते हैं। इसका ऋषभ और धैवत स्वर कोमल होता है तथा मध्यम स्वर तीव्र होता है। आरोह के स्वर- नि, रे(कोमल), ग, म॑(तीव्र), प, (कोमल), प, नि, सां और अवरोह के स्वर- रे(कोमल), नि, (कोमल), प, म॑(तीव्र), ग, म॑(तीव्र), रे(कोमल), ग, रे(कोमल), सा होते हैं। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। राग पूरियाधनाश्री के गायन-वादन के लिए चौथा प्रहर अर्थात सायंकाल सन्धिप्रकाश के समय को उपयुक्त माना जाता है। राग पूरियाधनाश्री दो रागों; पूरिया और धनाश्री का मिश्रण है। प्रचलित राग धनाश्री काफी थाट का राग है, जिसमे गान्धार और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। अतः अधिकतर संगीतज्ञ राग पूरियाधनाश्री को एक स्वतंत्र राग मानते हैं। हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव लिखित पुस्तक ‘राग परिचय’, भाग – 3 में इस राग के बारे में एक तथ्य का उल्लेख है। इसके अनुसार पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे कृत ‘क्रमिक पुस्तक मालिका’ के चौथे भाग में इस राग का वादी-संवादी क्रमशः पंचम और ऋषभ माना गया है। हम सभी जानते हैं कि वादी-संवादी में षडज-पंचम भाव अथवा षडज-मध्यम भाव का होना आवश्यक है। पंचम और ऋषभ में इनमें से कोई भाव नहीं है। इस दृष्टि से कोमल ऋषभ का संवादी होना उचित नहीं है। इस राग में कोमल ऋषभ स्वर पर कभी भी न्यास नहीं किया जाता। इस दृष्टि से भी ऋषभ का संवादी होना उचित नहीं है। कोमल ऋषभ के स्थान पर षडज स्वर को संवादी मानना न्यायसंगत है। कुछ विद्वान पंचम को वादी और षडज को संवादी मानते हैं। आइए, अब आप 1952 में प्रदर्शित फिल्म “बैजू बावरा” से राग पूरियाधनाश्री में पिरोया एक गीत उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में सुनिए। फिल्म के लगभग सभी गीत विभिन्न रागों पर आधारित हैं। इस फिल्म के संगीतकार नौशाद हैं। आप इस गीत का आनन्द लीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने  की अनुमति दीजिए।

राग पूरियाधनाश्री : “तोरी जय जय करतार...” : उस्ताद अमीर खाँ : फिल्म – बैजू बावरा



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 375वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको सातवें दशक की एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 380वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस युगल-गीत में किस गायक और गायिका के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 30 जून, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 377वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 373वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म “दिल की राहें” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मधुवन्ती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, कोटा, राजस्थान से तुलसी राम वर्मा, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की चौथी कड़ी में आपने कुछ शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग पूरियाधनाश्री का परिचय प्राप्त किया और इस राग में पिरोया दो खयाल पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही इसी राग पर आधारित फिल्म “बैजू बावरा” से नौशाद का संगीतबद्ध एक फिल्मी गीत उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
सम्पादन व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग पूरियाधनाश्री : SWARGOSHTHI – 375 : RAG PURIYADHANASHRI : 24 जून, 2018


Sunday, April 22, 2018

राग पूर्वी और पूरिया धनाश्री : SWARGOSHTHI – 366 : RAG PURVI & PURIYA DHANASHRI




स्वरगोष्ठी – 366 में आज

दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 5 : पूर्वी थाट

राग पूर्वी में ध्रुपद और पूरिया धनाश्री में फिल्म संगीत की रचना





उस्ताद अमीर खाँ
पण्डित अजय चक्रवर्ती
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से पाँचवाँ थाट पूर्वी है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे पूर्वी थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग पूर्वी में निबद्ध एक ध्रुपद रचना पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। साथ ही पूर्वी थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत जन्य राग पूरिया धनाश्री के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



आधुनिक भारतीय संगीत में प्रचलित थाट पद्धति पर हम पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित उन दस थाटों की चर्चा कर रहे हैं, जिनके माध्यम से रागों का वर्गीकरण किया जाता है। उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत की दोनों पद्धतियों में संगीत के सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र, अर्थात कुल बारह स्वरों के प्रयोग में समानता है। दक्षिण भारत के ग्रन्थकार पण्डित व्यंकटमखी ने सप्तक में 12 स्वरों को आधार मान कर 72 थाटों की रचना गणित के सिद्धान्तों पर की थी। भातखण्डे जी ने इन 72 थाटों में से केवल उतने ही थाट चुन लिये, जिनमें उत्तर भारतीय संगीत के प्रचलित सभी रागों का वर्गीकरण होना सम्भव हो। इस विधि से वर्तमान उत्तर भारतीय संगीत को उन्होने पक्की नींव पर प्रतिस्थापित किया। साथ ही उन सभी विशेषताओं को भी, जिनके आधार पर दक्षिण और उत्तर भारतीय संगीत पद्धति पृथक होती है, उन्होने कायम किया। भातखण्डे जी ने व्यंकटमखी के 72 थाटों में से 10 थाट चुन कर प्रचलित सभी रागों का वर्गीकरण किया। थाट सिद्धान्त पर भातखण्डे जी ने ‘लक्ष्य-संगीत’ नामक एक ग्रन्थ की रचना भी की थी।

आज हम पूर्वी थाट के विषय में थोड़ी जानकारी प्राप्त करेंगे। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे॒, ग, म॑, प ध॒, नि। इस थाट में मध्यम स्वर तीव्र और ऋषभ तथा धैवत स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। शेष सभी शुद्ध स्वर होते हैं। पूर्वी थाट का आश्रय राग पूर्वी है। यह सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। राग पूर्वी के आरोह के स्वर- सा, रे(कोमल), ग, म॑(तीव्र), प, (कोमल), नि, सां और अवरोह के स्वर- सां, नि, (कोमल), प, म॑(तीव्र), ग, रे(कोमल), सा होते हैं। इस राग में कोई भी स्वर वर्जित नहीं होता। ऋषभ और धैवत कोमल तथा मध्यम के दोनों प्रकार प्रयोग किये जाते हैं। राग ‘पूर्वी’ का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है तथा इसे दिन के अन्तिम प्रहर में गाया-बजाया जाता है। आज हमारी चर्चा में थाट और राग पूर्वी है। इस राग का प्रत्यक्ष अनुभव कराने के लिए अब हम आपके समक्ष एक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे पंडित अजय चक्रवर्ती ने प्रस्तुत किया है। वर्तमान में भारतीय संगीत की हर शैली पर समान रूप से अधिकार रखने वाले संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती ने राग पूर्वी की इस रचना को ध्रुपद के अन्दाज में प्रस्तुत किया है। अजय जी को पटियाला, कसूर घराने की संगीत-शिक्षा उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के सुपुत्र उस्ताद मुनव्वर अली खाँ से प्राप्त हुई है। आइए, सुनते है, पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में राग पूर्वी की यह रचना। इस प्रस्तुति में सारंगी पर भारतभूषण गोस्वामी ने और पखावज पर माणिक मुण्डे ने संगति की है। कुछ विद्वान इस ध्रुपद को तानसेन की रचना मानते हैं।

राग पूर्वी : ‘कर कपाल लोचन त्रय...’ पण्डित अजय चक्रवर्ती


इस थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ प्रमुख राग हैं- ‘पूरिया धनाश्री’, ‘जैतश्री’, ‘परज’, ‘श्री’, ‘गौरी’, ‘वसन्त’ आदि। पूर्वी थाट के विभिन्न रागों में राग पूरिया धनाश्री एक अत्यन्त लोकप्रिय राग है। राग पूर्वी की तरह राग पूरिया धनाश्री भी सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर इस्तेमाल किये जाते हैं। इसका ऋषभ और धैवत स्वर कोमल होता है तथा मध्यम स्वर तीव्र होता है। आरोह के स्वर- नि, रे(कोमल), ग, म॑(तीव्र), प, (कोमल), प, नि, सां और अवरोह के स्वर- रे(कोमल), नि, (कोमल), प, म॑(तीव्र), ग, म॑(तीव्र), रे(कोमल), ग, रे(कोमल), सा होते हैं। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग पूरिया धनाश्री के गायन-वादन का समय सायंकाल माना जाता है। आइए, अब आप राग पूरिया धनाश्री पर केन्द्रित एक गीत सुनिए। यह गीत हमने फिल्म ‘बैजू बावरा’ से लिया है। अकबर के समकालीन कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और कुछ दन्तकथाओं के मिश्रण से बुनी 1952 में फिल्म- ‘बैजू बावरा’ प्रदर्शित हुई थी। ऐतिहासिक कथानक और उच्चस्तर के संगीत से युक्त अपने समय की यह एक सफलतम फिल्म थी। इस फिल्म को आज छह दशक बाद भी केवल इसलिए याद किया जाता है कि इसका गीत-संगीत भारतीय संगीत के रागों पर केन्द्रित था। फिल्म के कथानक के अनुसार अकबर के समकालीन सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास के शिष्य तानसेन सर्वश्रेष्ठ थे। परन्तु उनके संगीत पर दरबारी प्रभाव आ चुका था। उन्हीं के समकालीन स्वामी हरिदास के ही शिष्य माने जाने वाले बैजू अथवा बैजनाथ थे, जिसका संगीत मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था। फिल्म के कथानक का निष्कर्ष यह था कि संगीत जब राज दरबार की दीवारों से घिर जाता है, तो उसका लक्ष्य अपने स्वामी की प्रशस्ति तक सीमित हो जाता है, जबकि मुक्त प्राकृतिक परिवेश में पनपने वाला संगीत ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण होता है। राग पूरिया धनाश्री के स्वरों से पगा जो गीत आज हमारी चर्चा में है, उसका फिल्मांकन अकबर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन को अपने महल में रियाज़ करते दिखाया गया था। यह फिल्म का शुरुआती प्रसंग है। इसी गीत पर फिल्म की नामावली प्रस्तुत की गई है। राग पूरिया धनाश्री में निबद्ध यह गीत सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अमीर खाँ ने गाया है। फिल्म के संगीतकार नौशाद थे। इस रचना में भी तानसेन का नाम आया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग पूरिया धनाश्री : ‘तोरी जय जय करतार...’ : उस्ताद अमीर खाँ : फिल्म - बैजू बावरा




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 366वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 370वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का प्रभाव है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस उस्ताद गायक के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 28 अप्रैल 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 368वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 364वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1962 में प्रदर्शित फिल्म “संगीत सम्राट तानसेन” से एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – जोगिया, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – कमल बारोट और महेन्द्र कपूर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध अपने पता के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की पाँचवीं कड़ी में आपने पूर्वी थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग पूर्वी में पिरोया भक्तिरस से परिपूर्ण एक ध्रुपद सुविख्यात गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही पूर्वी थाट के जन्य राग पूरिया धनाश्री पर आधारित एक फिल्मी गीत उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक से हम इस श्रृंखला का अगला अंक प्रस्तुत करेंगे। इस नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग पूर्वी और पूरिया धनाश्री : SWARGOSHTHI – 366 : RAG PURVI & PURIYA DHANASHRI : 22 Apr., 2018 

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