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Sunday, January 25, 2015

राग भूपाली और कल्याण में ध्रुपद गीत : SWARGOSHTHI – 204 : DHRUPAD BANDISH



स्वरगोष्ठी – 204 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : ध्रुपद – 2

गुण्डेचा बन्धुओं और सहगल से सुनिए ध्रुपद के निबद्ध गीत



 


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का मैं कृष्णमोहन मिश्र नई लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैली परिचय’ की दूसरी कड़ी मे हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की मौजूदा शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से जो भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धांतों के अनुकूल धारा थी उसे स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। भारतीय संगीत की सबसे प्राचीन और वर्तमान में उपलब्ध संगीत शैली है, ध्रुपद अथवा ध्रुवपद। पिछली कड़ी में हमने ध्रुपद शैली के परिचय से श्रृंखला की शुरुआत की थी और इस कड़ी में आपको ध्रुपद आलाप से परिचित कराया था। आज के अंक में हम आपके लिए ध्रुपद शैली में निबद्ध गीत अर्थात ध्रुपद बन्दिश का रसास्वादन कराएंगे। सुप्रसिद्ध युगल गायक गुण्डेचा बन्धु राग भूपाली में निबद्ध बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके अलावा विख्यात गायक कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में एक फिल्मी ध्रुपद भी प्रस्तुत करेंगे। 


ध्रुपद के आलाप में राग के स्वरों का बिना लय के क्रमशः विस्तार किया जाता है। विलम्बित से आरम्भ करते हुए क्रमशः द्रुत गति की ओर बढ़ते जाते हैं। आलाप का यह भाग वीणा के आलाप, जोड़ और अन्त में झाला की भाँति की जाती है। कुशल गायक इसी भाग में रागानुकूल भाव और रस की सृष्टि करने में समर्थ होते हैं। द्रुत लय में आलाप के सम्पन्न होने के बाद बारी आती है, बन्दिश की। इस भाग में एक पद रचना को राग के स्वरों में ढाल कर विलम्बित मध्य लय में प्रस्तुत किया जाता है। स्वरों से उपजने वाले रस और भाव को जब साहित्य का आश्रय मिल जाता है तब प्रस्तुति का प्रभाव द्विगुणित हो जाता है। बन्दिश का स्थायी स्थापित करने के बाद कलासाधक अपनी लयकारी का पक्ष प्रदर्शित करते हैं। यह लयकारी दुगुन, तिगुन। चौगुन, से लेकर अठगुन और आड़, कुवाड़ सहित अनेक क्लिष्ट लय में की जाती है। इस क्रिया में विभिन्न मात्राओं से आरम्भ करके सीधी या तिहाई के साथ लयकारी की जाती है। यह प्रदर्शन कलाकार अपनी क्षमता, प्रतिभा और रियाज़ के बल पर करते हैं। बन्दिश के अगले भाग में उपज का काम किया जाता है। इस भाग में रचना के शब्दों को विभिन्न प्रकार के बोलबाँट से सुसज्जित करते हुए प्रदर्शित किया जाता है। उपज बोलबाँट का कलात्मक कार्य श्रोताओं के लिए आनन्ददायक होता है। इस प्रकार स्वर, लय, ताल और पद के साहित्य के समन्वय से ध्रुपद बन्दिश की संरचना की जाती है। गायन के दौरान ताल देने के लिए पखावज की संगति की जाती है। आम तौर पर ध्रुपद रचनाएँ चौताल, तीव्रा, सूल, धमार आदि तालों में गायी जाती है। समर्थ कलासाधक लम्बी मात्राओं के क्लिष्ट ताल, जैसे- ब्रह्म, रुद्र, लक्ष्मी, मत्त, शेष आदि तालों में भी गायन प्रस्तुत करते हैं। वर्तमान ध्रुपद गायकी के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं युगल गायक गुण्डेचा बन्धु (रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा), जिन्हें संगीत की शिक्षा विख्यात साधक उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर और रुद्रवीणा के सुप्रसिद्ध वादक उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर से प्राप्त हुई। ध्रुपद के ‘डागुरवाणी’ गायन में दीक्षित इन कलासाधकों से आज सुनिए, राग भूपाली, सूल ताल में निबद्ध एक ध्रुपद रचना।


राग भूपाली ध्रुपद : ‘शंकरसुत गणेश विघ्नविनाशन गौरीनन्दन...’ : गुण्डेचा बन्धु : सूल ताल




फिल्मों में ध्रुपद संगीत का उपयोग लगभग नहीं के बराबर मिलता है। काफी छानबीन के बाद 1943 में प्रदर्शित फिल्म ‘तानसेन’ का एक गीत उपलब्ध हुआ है, जो ध्रुपद शैली के अनुकूल है। यह फिल्म बादशाह अकबर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन के जीवन पर आधारित थी। तानसेन के जीवन के बारे में उपलब्ध कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और कुछ किंवदन्तियों के आधार पर रचे गए फिल्म के कथानक पर फिल्म का निर्माण किया गया था। प्रमुख भूमिकाओं में कुन्दनलाल सहगल और खुर्शीद प्रस्तुत किये गए थे। नायक और नायिका दोनों ही अभिनय के साथ-साथ गायन में भी कुशल थे। चूँकि यह फिल्म एक महान संगीतज्ञ के जीवन पर केन्द्रित थी, अतः फिल्म के सभी गीत विभिन्न रागों पर आधारित थे। फिल्म के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश ने इन्हीं गीतों में एक गीत ध्रुपद शैली के अनुकूल रखा था। ऐसी मान्यता है कि तानसेन अपने समय की ध्रुपद गायकी में सर्वश्रेष्ठ थे। कुन्दनलाल सहगल के गाये इस गीत में परम्परागत भारतीय संगीत की कुछ विशेषताओ को इंगित किया गया है। ऐसी मान्यता है कि ध्रुपद अंग का यह गीत तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास की रचना है। यह अनूठा गीत राग कल्याण और ताल चौताल में निबद्ध किया गया है। आप फिल्म ‘तानसेन’ का यह ध्रुपद गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग कल्याण ध्रुपद : ‘सप्तसुरन तीन ग्राम गाओ सब गुणीजन...’ : कुन्दनलाल सहगल : चौताल





संगीत पहेली



‘स्वरगोष्ठी’ के 204वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको ध्रुपद अंग के ही एक गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 210वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – प्रस्तुति के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम बताइए।
 

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 31 जनवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 206वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 202वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको ध्रुपद अंग में पण्डित उदय भवालकर द्वारा प्रस्तुत आलाप का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- ध्रुपद शैली और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- पखावज अथवा मृदंग। वाद्य शहनाई और सितार। इस बार पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिना माधवी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों जारी है हमारी नई लघु श्रृंखला- ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’। इस श्रृंखला के अन्तर्गत वर्तमान में भारतीय संगीत की जो भी शैलियाँ प्रचलन में हैं, उनका सोदाहरण परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। यदि आप भी संगीत के किसी भी विषय पर हिन्दी में लेखन की इच्छा रखते हैं तो हमसे सम्पर्क करें। हम आपकी प्रतिभा को निखारने का अवसर देंगे। आगामी श्रृंखलाओं के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के आगामी अंकों में आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


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