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Saturday, May 21, 2016

"तू मुझे सुना मैं तुझे सुनाऊँ अपनी प्रेम कहानी...", दो दोस्तों के इस गीत के बहाने ज़िक्र आनन्द बक्शी और यश चोपड़ा के दोस्ती की


एक गीत सौ कहानियाँ - 82
 

'तू मुझे सुना मैं तुझे सुनाऊँ अपनी प्रेम कहानी...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 82-वीं कड़ी में आज जानिए 1989 की मशहूर फ़िल्म ’चाँदनी’ के गीत "तू मुझे सुना मैं तुझे सुनाऊँ अपनी प्रेम कहानी..." के बारे में जिसे सुरेश वाडकर और नितिन मुकेश ने गाया था। बोल आनन्द बक्शी के और संगीत शिव-हरि का। 

  
फ़िल्म-संगीत में दोस्ती के गानें 70 के दशक में काफ़ी लोकप्रिय हुए थे। "यारी है इमान मेरा...", "ये दोस्ती
सुरेश वाडकर और नितिन मुकेश
हम नहीं तोड़ेंगे...", "तेरे जैसा यार कहाँ, कहाँ ऐसा याराना...", "बने चाहे दुश्मन ज़माना हमारा, सलामत रहे दोस्ताना हमारा...", "दीये जलते हैं, फूल खिलते हैं...", "सात अजूबे इस दुनिया में आठवीं अपनी जोड़ी...", "एक रास्ता दो राही..." जैसे गाने अपने ज़माने के मशहूर गीत रहे हैं। 80 के दशक में भी दोस्ती भरे गीतों का सिलसिला जारी रहा। किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी, मुकेश और मन्ना डे ने रिले-रेस का बैटन अगली पीढ़ी के गायकों को सौंप दिया। मोहम्मद अज़ीज़, शब्बीर कुमार, सुरेश वाडकर, नितिन मुकेश, सूदेश भोसले जैसे गायक अब दोस्ती के गीत गाने लगे। "कुछ भी नहीं रहता दुनिया में लोगों रह जाती है दोस्ती" (ख़ुदगर्ज़), "तेरी मेरी यारी दोस्ती हमारी भगवान को पसन्द है अल्लाह को है प्यारी" (दाता), "इमली का बूटा बेरी का पेड़..." (सौदागर) आदि गीत भी ख़ूब चले थे। यश चोपड़ा की 1989 की फ़िल्म ’चाँदनी’ में भी दो दोस्तों पर एक गीत फ़िल्माया गया था, गीत दोस्ती पर तो नहीं था पर दो दोस्त एक दूसरे से अपनी अपनी प्रेम कहानी सुनाने का अनुरोध कर रहे हैं। गीत का महत्व है क्योंकि दोनों एक ही लड़की से प्यार कर रहे हैं पर इस बात से दोनों अनजान हैं। आनन्द बक्शी का लिखा हुआ नितिन मुकेश (ॠषी कपूर) और सुरेश वाडकर (विनोद खन्ना) का गाया यह गीत है "तू मुझे सुना मैं तुझे सुनाऊँ अपनी प्रेम कहानी, कौन है वो, कैसी है वो तेरे सपनों की रानी?" यह आश्चर्य की बात है कि सुरेश वाडकर कभी ॠषी कपूर का स्क्रीन वॉयस हुआ करते थे, इस हिसाब से सुरेश की आवाज़ ॠषी पर सजने चाहिए थे, पर इस गीत में ऐसा नहीं किया गया।


दोस्ती के इस गीत के बहाने आज चर्चा करने जा रहे हैं यश चोपड़ा और आनन्द बक्शी के दोस्ती की। बक्शी
साहिर लुधियानवी और यश चोपड़ा
साहब के पुत्र राकेश बक्शी के एक अंग्रेज़ी में लिखे लेख से इस दोस्ती का ख़ुलासा हुआ था। भले यश जी और बक्शी साहब ने साथ में 1989 में ही पहली बार काम किया ’चाँदनी’ में, पर दोनों एक दूसरे को बहुत पहले से ही जानते थे। अक्सर फ़िल्मी फ़ंक्शन और पार्टियों में दोनों की मुलाक़ातें होती थीं। उस समय दोनों स्थापित हो चुके थे। यश चोपड़ा का परिचय आनन्द बक्शी से एक नए अन्दाज़ में उस दिन हुआ जिस दिन यश जी के गीतकार साहिर लुधियानवी ने उनसे कहा कि कभी आप आनन्द बक्शी से भी गाने लिखवाइए, वो भी अच्छा लिखते हैं! यश साहब को हैरानी हुई कि साहिर साहब उनके चहेते गीतकार होते हुए भी वो बक्शी साहब का नाम सुझा रहे हैं उनकी फ़िल्मों के लिए। यश जी ने कभी उनसे किसी अन्य गीतकार की परामर्श नहीं माँगी थी और वो साहिर साहब के गीतों से बहुत संतुष्ट थे। और तो और बक्शी साहब ने भी कभी भी यश जी से उन्हें अपनी फ़िल्म में गीत लिखने का मौका देने के लिए कभी भी नहीं कहा। शायद बक्शी साहब यह जानते थे कि साहिर साहब यश जी के पसन्दीदा गीतकार हैं और दोस्त भी, और बक्शी साहब इस बात का सम्मान करते थे। यश चोपड़ा के शब्दों में "बक्शी जी एक बहुत नेक इंसान थे और सर्वोपरि गीतकार भी। बहुत अच्छे अच्छे कवि, शायर और गीतकार आए हैं, पर केवल एक फ़िल्मी गीतकार जो एक बेहतरीन शायर भी हैं, वो हैं सिर्फ़ आनन्द बक्शी!"


यश चोपड़ा के शब्दों में, "एक दिन मेरे पास एक गुल्शन राय आए जो मुझसे अपनी फ़िल्म निर्देशित करवाना
आनन्द बक्शी
चाहते थे। उसमें संगीत आर. डी. बर्मन का था। गुल्शन जी या फिर पंचम, मुझे अभी ठीक से याद नहीं, ने मुझे सुझाव दिया कि गाने लिखवाने के लिए आनन्द बक्शी साहब को साइन करवाया जाए। मुझे ख़ुशी हुई और मैं बक्शी साहब से मिल कर उन्हे इस फ़िल्म में गीत लिखवाने का न्योता दे आया। वो राज़ी भी हो गए बिना कोई सवाल पूछे। लेकिन जैसे ही मैं घर लौटा, मुझे अपराध बोध हुआ और साहिर साहब के लिए बुरा लगा। आख़िर साहिर साहब लम्बे समय से मेरे लिए गीत लिखते चले आ रहे थे और वो मेरे पुराने दोस्त भी थे। इसलिए मुझे उनके साथ ही काम करना चाहिए, ऐसा मुझे लगा, बावजूद इसके कि एक बार साहिर साहब ने ही मुझे बक्शी साहब से गीत लिखवाने के बारे में ज़िक्र किया था। मैं निर्णय ले लिया कि मैं बक्शी साहब के पास जाकर माफ़ी माँग लूँगा। शर्मिन्दा चेहरा लिए मैं बक्शी साहब के पास पहुँचा और माफ़ी माँगते हुए पूरी बात बताई। बक्शी साहब इतने अच्छे स्वभाव के थे कि वो ख़ुश होते हुए कहा कि मैं चाहता था कि आप साहिर साहब के साथ ही काम करें। मुझे लगता है कि साहिर साहब ने कभी बक्शी जी को गीत लेखन के बारे में बारीक़ियाँ बताई थी और उन्हें निर्माता-निर्देशकों से मिलवाया था 1956 से 1964 के दौरान जब बक्शी साहब संघर्षरत थे। बक्शी साहब ने आगे यह भी कहा कि भले हम साथ काम ना करें पर इससे हमारी दोस्ती में कोई असर नहीं पड़नी चाहिए, हम दोस्त बने रहेंगे। मैं तो यही कहूँगा कि मैंने आनन्द बक्शी जैसा आदमी अपनी ज़िन्दगी में नहीं देखा। उन्होंने कभी राजनीति नहीं की, कभी किसी के बारे में ख़राब बातें नहीं की, कभी दूसरे गीतकारों की आलोचना नहीं की। वो बस अपना गाना लिखते और चले जाते बिना इधर उधर की बातें किए। उपरवाले ने जब साहिर साहब को हमसे छीन लिया, तभी मैं दोबारा बक्शी साहब के दरवाज़े जा पहुँचा अपनी फ़िल्म में गीत लिखवाने के लिए। उनके साथ ’चाँदनी’ मेरी पहली फ़िल्म थी। और क्या गाने उन्होंने मुझे दिए इस फ़िल्म में! अविस्मरणीय! उन्होंने आगे चलकर मेरे कई फ़िल्मों में गाने लिखे, और मेरे बेटे आदित्य की पहली और दूसरी निर्देशित फ़िल्मों में भी। हमने साथ में ’चाँदनी’ (1989), 'लम्हे’ (1991), 'परम्परा’ (1992), ’डर’ (1993), ’दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे’ (1995), 'दिल तो पागल है’ (1997), 'मोहब्बतें’ (2000), और ’मुझसे दोस्ती करोगे!’ (2002) में काम किया। 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, June 29, 2014

सुरीली बाँसुरी के पर्याय पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया




स्वरगोष्ठी – 174 में आज

व्यक्तित्व – 4 : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया


‘देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए...’ 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ की चौथी कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी लघु श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ के अन्तर्गत हम आपसे संगीत के कुछ असाधारण संगीत-साधकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्होंने मंच, विभिन्न प्रसारण माध्यमों अथवा फिल्म संगीत के क्षेत्र में लीक से हट कर उल्लेखनीय योगदान किया है। हमारी आज की कड़ी के व्यक्तित्व हैं, विश्वविख्यात बाँसुरी वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया, जिन्होने एक साधारण सी दिखने वाली बाँस की बाँसुरी के मोहक सुरों के बल पर पूरे विश्व में भारतीय संगीत की विजय-पताका को फहराया है। चौरसिया जी की बाँसुरी ने शास्त्रीय मंचों पर तो संगीत प्रेमियों को सम्मोहित किया ही है, फिल्म संगीत के प्रति भी उनका लगाव बना रहा। उन्होने सुप्रसिद्ध सन्तूर वादक पण्डित शिवकुमार शर्मा के साथ मिलकर शिव-हरि नाम से कई फिल्मों में संगीत निर्देशन भी किया है। आज के अंक में हम आपके लिए चौरसिया जी द्वारा प्रस्तुत राग हंसध्वनि की एक रचना, बंगाल की एक चर्चित लोक धुन और शिव-हरि के रूप में रचे बेहद सफल फिल्म ‘सिलसिला’ का एक गीत भी प्रस्तुत करेंगे। यह भी उल्लेखनीय है कि इसी सप्ताह 1 जुलाई को पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया अपनी आयु के 77 वर्ष पूर्ण कर 78वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार इस महान संगीत-साधक को जन्मदिवस के उपलक्ष्य में शत-शत मंगलकामनाएँ अर्पित करता है।
 



भारतीय संगीत के अनेक साधकों ने विश्व-संगीत के मंच पर अपने संगीत की उत्कृष्ठता को सिद्ध किया है। इन्हीं में एक नाम बाँसुरी वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया का भी शामिल है। बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष (1911-1960) ने इस वाद्य को लोकमंच से शास्त्रीय संगीत के मंच पर प्रतिष्ठित करने का जो प्रयास किया था, पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया ने उसे पूर्णता दी। यह भी आश्चर्यजनक है कि ऐसी महान प्रतिभा का जन्म संगीतज्ञ या संगीत-प्रेमी परिवार में नहीं हुआ था। हरिप्रसाद जी का जन्म 1 जुलाई, 1938 को इलाहाबाद के एक ऐसे परिवार में हुआ था, जहाँ सभी सदस्य कुश्ती के शौकीन थे। उनके पिता स्वयं कुशल पहलवान थे और चाहते थे कि उनका पुत्र भी कुश्ती के दाँव-पेंच सीखे। बालक हरिप्रसाद पिता के साथ अखाड़ा जाते तो थे किन्तु उनका मन इस कार्य में कभी नहीं लगा। उनका बाल-मन तो सुरीली ध्वनियों की ओर आकर्षित होता था। ईश्वर ने उन्हें सांगीतिक प्रतिभा प्रतिभा से युक्त कर इस धरा पर भेजा था। कुश्ती के अखाड़े के बजाय उनका मन पड़ोस के संगीत शिक्षक पण्डित राजाराम के पास अधिक लगता था। बालक हरिप्रसाद को पण्डित राजाराम ने संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा दी। इसके बाद वाराणसी के सुविख्यात गुरु पण्डित भोलानाथ जी से बाँसुरी वादन की विधिवत शिक्षा प्राप्त की और 19 वर्ष की आयु के होने तक बाँसुरी-वादन में इतने कुशल हो गए कि उनकी नियुक्ति रेडियो में हो गई। 1957 में उनकी पहली तैनाती ओडिसा स्थित कटक केन्द्र पर बाँसुरी-वादक के रूप में हुई। यहाँ वे लगभग तीन वर्ष तक रहे। इस दौरान उन्होने अनेक संगीतज्ञों को सुना और क्षेत्रीय संगीत का अध्ययन भी किया। आइए, यहाँ थोड़ा विराम लेकर पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया का बजाया राग हंसध्वनि में दो रचनाएँ सुनवाते हैं। राग हंसध्वनि अत्यन्त मधुर राग है, जो उत्तर और दक्षिण, दोनों संगीत पद्यतियों में समान रूप से लोकप्रिय है। इस राग में पण्डित जी द्वारा प्रस्तुत पहली मध्य लय की रचना सितारखानी ताल में और दूसरी द्रुत तीनताल में निबद्ध है।


राग हंसध्वनि : मध्यलय सितारखानी और द्रुतलय तीनताल की रचनाएँ : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया




वर्ष 1960 में हरिप्रसाद जी का स्थानान्तरण रेडियो कटक केन्द्र से मुम्बई केन्द्र पर हो गया। मुम्बई आ जाने के बाद उन्हें अपने संगीत को अभिव्यक्ति देने के लिए और अधिक विस्तृत फ़लक मिल गया और यहाँ आ जाने के बाद संगीत के क्षेत्र में उनकी प्रतिभा को एक नई पहचान मिली। अब उन्हें प्रतिष्ठित संगीत सभाओं में मंच-प्रदर्शन के लिए आमंत्रित किया जाने लगा था। यहीं रहते हुए उनका सम्पर्क मैहर घराने के संस्थापक और सन्त-संगीतज्ञ उस्ताद अलाउद्दीन खाँ की सुपुत्री विदुषी अन्नपूर्णा देवी से हुआ। इनका मार्गदर्शन पाकर हरिप्रसाद जी के वादन में भरपूर निखार आया। उन्होने रागों के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों के लोक-संगीत का भी गहन अध्ययन किया था। आज भी विभिन्न संगीत-समारोहों में अपने बाँसुरी-वादन को विराम देने से पहले वे कोई लोकधुन अवश्य प्रस्तुत करते हैं। आइए, अब हम आपको बाँसुरी पर पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया द्वारा प्रस्तुत बंगाल की अत्यन्त लोकप्रिय भटियाली धुन सुनवाते हैं। पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया द्वारा प्रस्तुत इस भटियाली धुन के साथ तबला संगति पण्डित योगेश समसी ने की है।


भटियाली धुन : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया : तबला संगति – योगेश समसी




बाँस से बनी बाँसुरी सम्भवतः सबसे प्राचीन स्वर-वाद्य है। महाभारत काल से पहले भी बाँसुरी का उल्लेख मिलता है। विष्णु के कृष्णावतार को तो ‘मुरलीधर’, ‘बंशीधर’, ‘वेणु के बजइया’ आदि नामों से सम्बोधित भी किया गया है। श्रीकृष्ण से जुड़ी तमाम पौराणिक कथाएँ बाँसुरी के गुणगान से भरी पड़ी हैं। यह एक ऐसा सुषिर वाद्य है जो लोक, सुगम से लेकर शास्त्रीय मंचों पर भी सुशोभित है। भारतीय संगीत के क्षेत्र में अनेक बाँसुरी के साधक हुए हैं, जिन्होने इस साधारण से दिखने वाले सुषिर वाद्य को असाधारन गरिमा प्रदान की है। वर्तमान में पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया बाँसुरी के ऐसे साधक हैं जिन्होने देश-विदेश में इस वाद्य को प्रतिष्ठित किया है। देश-विदेश के अनेकानेक सम्मान और पुरस्कारों से अलंकृत पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया ने सुप्रसिद्ध संतूर-वादक पण्डित शिवकुमार शर्मा के साथ जोड़ी बना कर वर्ष 1989 से फिल्मों में भी संगीत देना आरम्भ किया। शिव-हरि के नाम से इन दिग्गज संगीतज्ञों ने चाँदनी, विजय, सिलसिला, लम्हे, डर, फासले आदि फिल्मों में अनेक लोकप्रिय गीत दिये हैं। आज के इस अंक में हम आपको पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया और पण्डित शिवकुमार शर्मा के साथ मिल कर बनी संगीतकार जोड़ी द्वारा चर्चित हिन्दी फिल्म ‘सिलसिला’ का बेहद लोकप्रिय गीत- ‘देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए...’ सुनवाते हैं। गीतकार जावेद अख्तर के लिखे इस गीत को लता मंगेशकर और किशोर कुमार ने स्वर दिया है। इस गीत से रेखांकित करने योग्य एक तथ्य यह भी जुड़ा है कि गीत में मध्यम और निषाद स्वर रहित राग भूपाली के स्वर तो मौजूद हैं, किन्तु राग के स्वरों का चलन राग भूपाली अथवा देशकार के अनुसार नहीं है। लीजिए, अब आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


फिल्म – सिलसिला : ‘देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए...’ : लता मंगेशकर और किशोर कुमार : गीतकार – जावेद अख्तर





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 174वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत में एक रागबद्ध खयाल रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 180वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – खयाल का यह अंश सुन कर राग पहचाइए और हमे राग का नाम बताइए।

2 – गीत का यह अंश सुन कर गायक कलाकार को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 176वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 172वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ के एक गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ललित और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक मन्ना डे और लता मंगेशकर। इस अंक के दोनों प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपसे सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा की। इसके साथ ही हमने शास्त्रीय, लोक और फिल्म संगीत के क्षेत्र में किए गए कार्यों को रेखांकित किया। अगले अंक से हम कुछ ऋतु प्रधान रागों का की चर्चा करेंगे। यह अंक आपको कैसा लगा, हमें अवश्य बताइए। आप भी अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों की प्रतीक्षा करेंगे।
 




एक आवश्यक सूचना

अपने संगीत-प्रेमी पाठकों और श्रोताओ को कुछ नयेपन का अनुभव कराने के लिए ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के कुछ कार्यक्रमों को हम yourlisten के सहयोग से आडियो रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारा यह प्रयोग आपको कैसा लगा? अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें swargoshthi@gmail.com , radioplaybackindia@live.com अथवा cine.paheli@yahoo.com पर अवश्य लिखें। आपके सुझाव के आधार पर हम अपने कार्यक्रमों को और अधिक बेहतर रूप दे सकेंगे।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Thursday, March 10, 2011

तेरा करम ही तेरी विजय है....यही तो सार है गीता का और यही है मन्त्र जीवन के हर खेल का भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 610/2010/310

खेलकूद और ख़ास कर क्रिकेट की चर्चा करते हुए आज हम आ पहुँचे हैं लघु शृंखला 'खेल खेल में' की दसवीं और अंतिम कड़ी पर। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार और हार्दिक स्वागत है इस सप्ताह की आख़िरी नियमित कड़ी में। विश्वकप क्रिकेट में आपने 'प्रुडेन्शियल कप ट्रॊफ़ी' की बात ज़रूर सुनी होगी। आख़िर क्या है प्रुडेन्शियल कप, आइए आज इसी बारे में कुछ बातें करते हैं। जैसा कि आप जानते हैं पहला विश्वकप १९७५ में खेला गया था। इसकी शुरुआत ७ जून १९७५ को हुई थी। इसके बाद दूसरा और तीसरा विश्वकप भी इंगलैण्ड में ही आयोजित हुआ था और इन तीनों प्रतियोगिताओं को प्रुडेन्शियल कप का नाम दिया गया, इनके प्रायोजक प्रुडेन्शियल कंपनी के नाम पर। इन मैचों में हर टीम को ६० ओवर मिलते बल्लेबाज़ी के लिए, खेल दिन के वक़्त होता था, और खिलाड़ी सफ़ेद कपड़े पहनते और गेंद लाल रंग के हुआ करते थे। जिन आठ देशों ने पहला विश्वकप खेला था, उनके बारे में हम बता ही चुके हैं, आज इतना ज़रूर कहना चाहेंगे कि दक्षिण अफ़्रीका को खेल से बाहर रखा गया था 'अपारथेड' (वर्ण-विद्वेष) की वजह से। पहला विश्वकप वेस्ट इंडीज़ ने जीता था ऒस्ट्रेलिया को १७ रनों से हराकर। १९७९ के विश्वकप से ICC ट्रॊफ़ी लागू हुई और टेस्ट नहीं खेलने वाले देशों को भी विश्वकप में भाग लेने की अनुमति हो गई। श्रीलंका और कनाडा दो ऐसे देश थे। वेस्ट इंडीज़ दूसरी बार के लिए विश्वकप जीता, इस बार इंगलैण्ड को फ़ाइनल में ९२ रनों से हराकर। और इस विश्वकप के तुरंत बाद इस प्रतियोगिता को चार सालों में एक बार आयोजित करने का भी निर्णय ले लिया गया। १९८३ का विश्वकप भी इंगलैण्ड में ही खेला गया, और ज़िमबाबवे इस बार से विश्वकप में दाख़िल हो गया। इस विश्वकप से 'फ़ील्डिंग् सर्कल' का नियम लागू हुआ, जो स्टम्प्स से ३० यार्ड, यानी २७ मीटर की दूरी पर होता है। इस सर्कल के भीतर चार फ़ील्डर रह सकते हैं। कपिल देव की टीम ने वेस्ट इंडीज़ को फ़ाइनल में हराकर इतिहास कायम कर दिया था। तो दोस्तों, ये थी कुछ बातें प्रुडेन्शियल कप की, यानी पहले तीन विश्वकप क्रिकेट शृंखलाओं की।

'खेल खेल में' शृंखला की पहली कड़ी में हमने जो गीत सुनवाया था, उससे हमें यही संदेश मिला था कि दूसरों पर विजय प्राप्त करने से पहले हमें अपने आप पर जीत हासिल करना आवश्यक है। फिर उसके बाद अगले आठ अंकों में हमने अलग अलग तरह के गानें सुनवाए, जिनमें प्रतियोगिता की बातें थीं, किसी को चुनौती देने की बात थी, कहीं किसी को सीधा टक्कर दिया जा रहा था तो कभी ज़िंदगी में पास-फ़ेल की बातें भी हो रही थीं। और एक आध गीतों से तो ओवर-कॊन्फ़िडेन्स की बू भी आ रही थी। लेकिन आज हम फिर एक बार कुछ कुछ अपने पहले अंक के गीत के भाव की तरफ़ वापस जा रहे हैं, और एक ऐसा गाना आपको सुनवाने जा रहे हैं, जिसमें वही उपदेश दिया गया है जो सैंकड़ों साल पहले महाभारत की युद्ध भूमि में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था - "कर्मण्येवाधिकारस्ते माफलेषु कदाचन"। जी हाँ, बस कर्म करते जाओ, फल की चिंता मत करो। इसी का एक आधुनिक संस्करण अभी हाल ही में आमिर ख़ान ने दिया था '३ इडियट्स' फ़िल्म में - "कामयाब नहीं काबिल होने के लिए पढ़ो, कामयाबी झक मार के पीछे आयेगी"। आज हम आपको सुनवा रहे हैं फ़िल्म 'विजय' से "दुनिया बनी है जब से, गीता बोले तब से, तेरा करम ही तेरी विजय है"। आनंद बक्शी के बोल और शिव हरि का संगीत। इस गीत के दो संस्करण है, एक आशा भोसले की आवाज़ में और एक महेन्द्र कपूर का गाया हुआ। जहाँ आशा जी वाला वर्ज़न थोड़ा धीमा है, महेन्द्र कपूर वाले वर्ज़न में ज़्यादा जोश है और एक देशभक्ति गीत वाला रंग है, ठीक वैसा ही जैसा कि महेन्द्र कपूर साहब देश भक्ति रचनाएँ गाते आये हैं। और इसी के साथ 'खेल खेल में' शृंखला को समाप्त करने की हमें इजाज़त दीजिए। २०११ विश्वकप क्रिकेट के सभी खिलाड़ियों को, और आप सभी क्रिकेट प्रेमियों को हम शुभकामनाएँ देते हैं, और आख़िर में यही कहते हैं कि "May the best team win!!!" नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि गायक महेन्द्र कपूर ने १९५६ की फ़िल्म 'दीवाली की रात' में अपना पहला गीत गाया था "तेरे दर की भीख माँगी है दाता", जिसे मधुकर राजस्थानी ने लिखा तथा स्नेहल भाटकर ने स्वरबद्ध किया था। वैसे १९५५ की फ़िल्म 'मधुर मिलन' के गीत "जोरु ने निकाला है दीवाला" मेम रफ़ी साहब व अन्य गायकों के साथ महेन्द्र कपूर की भी आवाज़ शामिल थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 01/शृंखला 12
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - ये एक गैर फ़िल्मी ठुमरी है.

सवाल १ - किसकी आवाज़ है, पहचानिये - १ अंक
सवाल २ - ये गायिका किस मशहूर अभिनेत्री की माँ थी - ३ अंक
सवाल ३ - इस पहली महिला संगीतकारा ने एक फिल्म निर्माण कंपनी की स्थापना की, क्या था उनकी इस कंपनी का नाम - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी अब ५ श्रृंखलाओं में विजयी होकर श्याम कान्त जी से आगे निकल आये हैं जो ४ सीरिस में विजेता रहे थे, वैसे श्याम कान्त जी इन दिनों कहाँ गायब हैं, पता नहीं, अगर वो होते तो मुकाबल और रोचक होता, श्याम जी नयी शृंखला शुरू हो रही है, आईये फिर से सक्रिय हो जाईये....वैसे अंजाना जी और विजय जी भी अमित जी को कड़ी टक्कर दे रहे हैं इसमें कोई शक नहीं....नयी शृंखला के लिए सभी को शुभकामनाये

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, January 17, 2010

ये कहाँ आ गए हम...यूँ हीं जावेद साहब के लिखे गीतों को सुनते सुनते

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 317/2010/17

स्वरांजली' की आज की कड़ी में हम जन्मदिन की मुबारक़बाद दे रहे हैं गीतकार, शायर और पटकथा व संवाद लेखक जावेद अख्तर साहब को। लेकिन अजीब बात यह कि जिन दिनों में जावेद साहब पटकथा और संवाद लिखा करते थे, उन दिनों मे वो गानें नहीं लिखते थे, और जब उन्होने बतौर गीतकर अपना सिक्का जमाया, तो पटकथा लिखना लगभग बंद सा कर दिया। जब यही सवाल उनसे पूछा गया तो उनका जवाब था - "यह सही है कि जब मैं फ़िल्में लिखता था, उस वक़्त मैं गानें नहीं लिखता था। लेकिन हाल ही में मैंने अपने बेटे फ़रहान के लिए फ़िल्म 'लक्ष्य' का स्क्रिप्ट लिखा है, एक और भी लिखा है, सोच रहा हूँ कि किसे दूँ (हँसते हुए)! कुछ फ़िल्में हैं जिनमें मैंने स्क्रिप्ट और गानें, दोनों लिखे हैं, जैसे कि 'सागर', जैसे कि 'मिस्टर इंडिया', जैसे कि 'अर्जुन'। मुझे स्क्रिप्ट लिखते हुए थकान सी महसूस हो रही थी, कुछ ख़ास अच्छा नहीं लग रहा था। और अब गानें लिखने में ज़्यादा मज़ा आ रहा है, और दिल से लिख रहा हूँ। इसलिए सोचा कि जब तक फ़िल्मे लिखने का जज़्बा फिर से ना जागे, तब तक गीत ही लिखूँगा।" दोस्तों, एक रचनाकार के रूप में जावेद साहब का पुनर्जनम हुआ सलीम जावेद की जोड़ी बिखर जाने के बाद, जब निर्देशक रमण कुमार ने उनसे अपनी फ़िल्म 'साथ साथ' के गानें लिखवाए। लेकिन इस फ़िल्म से पहले यश चोपड़ा के अनुरोध पर जावेद साहब ने फ़िल्म 'सिलसिला' में तीन गीत लिखे जो बेहद कामयाब हुए और ये गाने आज एवरग्रीन हिट्स में शोभा पाते हैं। इनमें से एक गीत है "देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए", दूसरा गीत था "नीला आसमान सो गया" और तीसरा गाना था "ये कहाँ आ गए हम युं ही साथ साथ चलते"। आइए आज जावेद साहब को जन्मदिन की शुभकामनाएँ देते हुए यही तीसरा गीत सुनें, जिसे गाया है सुरों की मल्लिका लता मंगेशकर और अभिनय के शहंशाह अमिताभ बच्चन ने।

विविध भारती को दिए गए एक साक्षात्कार में जावेद अख़तर साहब ने बताया था कि वो गीतकारिता में कैसे आए। "मैं गीतकार नहीं था, ज़बरदस्ती बना दिया गया। मैं तो फ़िल्में लिखा करता था। यश जी एक दिन मेरे घर अए, वो मुझसे उनकी फ़िल्म 'सिलसिला' के लिए एक गीत लिखवाना चाहते थे। मैंने साफ़ इंकार कर दिया, कहा कि मैं पोएट्री सिर्फ़ अपने लिए लिखा करता हूँ, फ़िल्म के लिए नहीं लिख सकता। लेकिन वो तो पीछे ही पड़ गए। इसलिए न चाहते हुए भी मैं एक गीत लिखने के लिए राज़ी हो गया। मैंने उनसे कहा कि मुझे इसके लिए कोई क्रेडिट नहीं चाहिए क्योंकि मैंने सोचा कि वो लोग मुझे एक ट्युन सुना देंगे और मुझसे उस पर गाना लिखने की उम्मीद करेंगे, अगर लिख ना पाया तो क्या होगा? मुझे फिर यश जी ने शिव-हरि से एक दिन मिलवा दिया। वो धुन सुनाते गए और शाम तक मैं "देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए" लिख चुका था। मैंने ५०० से ज़्यादा गानें लिखे हैं पर यह गीत मेरे लिए आज भी बहुत स्पेशल है। मैंने 'सिलसिला' में कुल ३ गीत लिखे, युं कह सकते हैं कि मुंह में ख़ून लग गया था। शबाना जी को "ये कहाँ आ गए हम" बहुत पसंद है, वो अकसर इसे गुनगुनाती हैं।" दोस्तों, यह गीत ही इतना ज़बरदस्त है कि इसकी बातें इतनी आसानी से ख़त्म नहीं हो सकती। अब हम आपको इस गीत के बनने की कहानी बताते हैं इस गीत के संगीतकार जोड़ी शिव-हरि के पंडित शिव कुमार शर्मा के शब्दों में जो उन्होने कहे थे विविध भारती के 'संगीत सरिता' कार्यक्रम के तहत 'मेरी संगीत यात्रा' शृंखला के दौरान। "आप ने एक चीज़ नोटिस की होगी कि यह एक 'अन्युज़ुयल' गाना है। मैं आपको इसका बैकग्राउंड बताउँगा कि यह गाना कैसे बना। शुरु में यश जी ने कहा कि मैं कुछ ऐसा करना चाहता हूँ कि हीरो अपने ख़यालों में बैठा हुआ है और कुछ पोएट्री लिख रहा है, या पोएट्री रीसाइट कर रहा है, कुछ शेर, और बीच में कुछ आलाप ले आएँगे, लता जी का ऐसा कुछ। तो इस तरह का सोच कर के शुरु किया कि थोड़ा म्युज़िक रहेगा, थोड़ी शेर-ओ-शायरी होगी, और फिर कुछ बीच में आलाप आएगा। यह बिल्कुल नहीं सोचा था कि इस तरह का गाना बनेगा। बनते बनते, जैसा होता था कि उस ज़माने में अमिताभ बच्चन, अभी भी उतने ही बिज़ी हैं, उस ज़माने की क्या बात कहें, कि वो १२-१ बजे जब उनकी शूटिंग् की शिफ़्ट ख़त्म होती थी, तो वो आते थे। और फिर आकर के हमारे साथ बैठते थे क्योंकि उन्होने गानें भी गाए हैं, होली का जो गाना है, और "नीला आसमान"। तो यह गाना जब बनने लगा तो उसकी शुरुआत ऐसे ही हुई, बनते बनते कुछ उसमें धुन का ज़िक्र जब आया, तो जावेद अख़तर साहब बैठे हुए थे, तो बीच में उनकी ही सारी नज़्में हैं जो बच्चन साहब ने पढ़े हैं। तो जब एक धुन गुनगुना रहे थे हम लोगोँ ने सोचा कि इसके उपर बोल आ जाएं तो कैसा लगेगा। तो धीरे धीरे जब बोल आया तो लगा कि अस्थाई बन गई। ऐसा करते करते कि ये जो नज़्म है, जो शेर पढ़ रहे हैं, उसको हम ऐसा इस्तेमाल करते हैं कि जैसे इंटर्ल्युड म्युज़िक होता है, जैसे 'इंट्रोडक्शन म्युज़िक' होता है। ऐसे करते करते इसकी शक्ल ऐसी बनीं। और वो एक ऐसा 'अन्युज़ुयल' गाना बन गया कि पोएट्री और गाना साथ में चल रहा है, लेकिन वो एक के साथ एक जुड़ा हुआ है, और वो बात आगे बढ़ रही है। तो इस क़िस्म के, मेरे ख्याल में इस किस्म का गाना फिर किसी ने दुबारा कोशिश ही नहीं की और इसमें हमनें कोरस का भी अच्छा इस्तेमाल किया था। तो वो पूरा जो उसका माहौल बना है, वह आज इस गाने को बने हुए इतने साल हो गए हैं, लेकिन अभी भी वह फ़्रेश लगता है।" बिल्कुल सही दोस्तों, आइए अब हम भी इस फ़्रेश गीत का आनंद उठाते हैं, सुर कोकिला और अभिनय के शहंशाह की आवाज़ों के साथ, और साथ ही जावेद साहब को एक बार फिर से जनमदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ!



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

क्या होता है सपनों का टूट जाना,
वही समझे जिसने हो ये दर्द पाला,
उड़कर तो आना चाहूँ तेरे पास पर,
पैरों बेडी गले पड़ी रिवाजों की माला...

अतिरिक्त सूत्र - फिल्म जगत के सबसे पहले सिंगिंग सुपर स्टार को समर्पित है ये स्वरांजली

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी आपने खुद ही कहा कि जो गीत आपने चुना वो गोल्ड तो है पर ओल्ड नहीं, शरद जी यहाँ सही निकले, बधाई जनाब २ अंक हुए आपके और...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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