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Thursday, February 25, 2010

हर शाम शाम-ए-ग़म है, हर रात है अँधेरी...शेवन रिज़वी का दर्द और तलत का अंदाज़े बयां

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 356/2010/56

'दस महकती ग़ज़लें और एक मख़मली आवाज़' की आज की कड़ी में फिर एक बार शायर शेवन रिज़्वी का क़लाम पेश-ए-ख़िदमत है। दोस्तों, तलत महमूद ने "शाम-ए-ग़म" पर बहुत सारे गीत गाए हैं। दो जो सब से ज़्यादा मशहूर हुए, वो हैं "शाम-ए-ग़म की क़सम आज ग़मगीं हैं हम, आ भी जा" और "फिर वही शाम, वही ग़म, वही तन्हाई है, दिल को समझाने तेरी याद चली आई है"। हमने इन दो गीतों का ज़िक्र यहाँ इसलिए किया क्योंकि आज जिस ग़ज़ल की बारी है इस महफ़िल में, वह भी 'शाम-ए-ग़म' से ही जुड़ा हुआ है। जैसा कि हमने बताया शेवन रिज़्वी की लिखी हुई ग़ज़ल, तलत साहब की आवाज़ और संगीत है हाफ़िज़ ख़ान का। जी हाँ, वही हाफ़िज़ ख़ान, जो ख़ान मस्ताना के नाम से गाने गाया करते थे, ठीक वैसे ही जैसे सी. रामचन्द्र चितलकर के नाम से। ख़ैर, यह ग़ज़ल है फ़िल्म 'मेरा सलाम' का, जो बनी थी सन् १९५७ में। इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे भारत भूषण और बीना राय। तलत साहब ने इस फ़िल्म में आज की इस ग़ज़ल के अलावा एक और मशहूर ग़ज़ल गाई थी "सलाम तुझको ऐ दुनिया अब आख़िरी है सलाम, छलकने वाला है अब मेरी ज़िंदगी का जाम"। दोस्तों, तलत साहब पर केन्द्रित इस शृंखला में हम ना केवल उनकी गाई ग़ज़लें सुनवा रहे हैं, बल्कि उनसे जुड़ी हुई तमाम बातें भी बताते जा रहे हैं। आज पेश है उन्ही के द्वारा प्रस्तुत 'जयमाला' कार्यक्रम का एक अंश जिसमें वो बात कर रहे हैं कुंदन लाल सहगल साहब की। "कुंदन लाल सहगल की हस्ती किसी तारीफ़ की मोहताज नहीं। सभी गायकों की तरह मैं भी उनका पुजारी रहा हूँ। उनके गीतों से मुझे इश्क़ है। अपना अक़ीदा है कि अल्लाह ताला ने आसमान-ओ-ज़मीन के जितने सुर, लय, और दर्द थे, उनके गले में भर दिया था। सहगल साहब से मेरी पहली मुलाक़ात कलकत्ते में हुई थी, जब उनकी फ़िल्म 'मेरी बहन' की शूटिंग् चल रही थी, और मेरी न्यु थिएटर्स में नई नई एंट्री हुई थी। वह पहली मुलाक़ात आज भी मेरे ज़हन में है।" दोस्तों, सहगल साहब के गीतों से इश्क़ की बात जो तलत साहब ने कही, यह शायद उसी इश्क़ का नतीजा कह लीजिए या सहगल साहब का आशिर्वाद कि तलत साहब आगे चलकर इस देश के प्रथम श्रेणी के गायक बनें।

संगीतकार हाफ़िज़ ख़ान और गायक तलत महमूद की अगर एक साथ बात करें, तो श्री पंकज राग द्वारा लिखित किताब 'धुनों की यात्रा' से हमें पता चला कि तलत ने अपने कुछ बेहद ख़ूबसूरत गीत हाफ़िज़ ख़ान के संगीत निर्देशन में गाए, और इस तथ्य की ओर कम ही लोगों का ध्यान गया है। यह एक रोचक तथ्य है कि एच. एम. वी के तलत के 'रेयर जेम्स' कैसेट्स में सर्वाधिक संख्या (तीन) हाफ़िज़ ख़ान की स्वरबद्ध रचनाओं की है। 'मेहरबानी' के "मिटने दे मेरी ज़िंदगी" और 'लकीरें' के "दिल की धड़कन पे गा" के अलावा 'मेरा सलाम' का सुदर, दर्द भरा "हर शाम शाम-ए-ग़म है" भी इस संकलन में शामिल है। तीनों ही गीत शेवन रिज़्वी के लिखे हुए हैं और इन सभी गीतों में इंटरल्युड्स में वायलिन का तीव्र उपयोग संवेदना को उभारने के लिए बड़े सशक्त तरीके से किया गया है। इसी फ़िल्म में आशा भोसले और तलत का गाया दोगाना "हसीन चाँद सितारों का वास्ता आ जा" धीमी लहराती लय का बड़ा लोकप्रिय गीत रहा था। इस गीत में वाद्य यंत्रों का प्रयोग अत्यंत हल्का और न्यूनतम रखा गया है जो गीत को और असरदार बनाता है। इस गीत को हम फिर किसी दिन के लिए सुरक्षित रखते हैं, और आइए अब सुना जाए आज की ग़ज़ल, जिसके कुल चार शेर इस तरह से हैं-

हर शाम शाम-ए-ग़म है हर रात है अंधेरी,
अपना नहीं है कोई क्या ज़िंदगी है मेरी।

ग़म सहते सहते ग़म की तकदीर बन गया हूँ,
जा ऐ बहार-ए-दुनिया हालत ना पूछ मेरी।

कामान-ए-ज़िंदगी में कुछ भी नहीं बचा है,
एक दर्द रह गया है और एक याद तेरी।

खुशियों का एक दिन भी आया ना ज़िंदगी में,
पछता रहा हूँ मैं तो दुनिया में आके तेरी।



क्या आप जानते हैं...
- कि तलत महमूद और दिलीप कुमार ६० के दशक में रोज़ाना बान्द्रा जीमखाना के बैडमिंटन कोर्ट में मिला करते थे। यही नहीं दिलीप साहब का पूरा परिवार तलत और उनकी पत्नी के बेहद क़रीब थे और अक्सर ये लोग मिला करते थे।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मतले में शब्द हैं - "सावन", बताईये ग़ज़ल के बोल.-३ अंक.
2. इस बेहद खूबसूरत ग़ज़ल के संगीतकार कौन हैं - ३ अंक.
3. इस फिल्म का एक युग्म गीत ओल्ड इस गोल्ड में बज चुका है, उसमें भी 'सावन" शब्द था मुखड़े में, फिल्म का नाम बताएं- २ अंक.
4. इस गज़ल के शायर कौन हैं - सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

विशेष सूचना - यदि आप ओल्ड इस गोल्ड में कोई विशेष गीत सुनना चाहते हैं या पेश करने के इच्छुक हैं, या कोई भी अन्य जानकारी हमारे साथ बांटना चाहते हैं तो हमें oig@hindyugm.com पर भी संपर्क कर सकते हैं

पिछली पहेली का परिणाम-
अवध जी अब आप भी डबल फिगर में आ चुके हैं, बधाई...इंदु जी एकदम सही जवाब है और क्लू देने के बाद भी कोई दूसरा सामने नहीं आया, ताज्जुब है :), अवध जी आपकी पसंद के ये दोगाना भी जरूर बजेगा यहाँ, थोडा सा इन्तेज़ार बस...अरे शरद जी आप भी हाज़िर हैं...बहुत बढ़िया २ अंक सुरक्षित.
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, February 23, 2010

गर तेरी नवाज़िश हो जाए...अंदाज़े मुहब्बत और आवाजे तलत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 354/2010/54

'दस महकती ग़ज़लें और एक मख़मली आवाज़' शृंखला की यह है चौथी कड़ी। १९५४ में तलत महमूद के अभिनय व गायन से सजी दो फ़िल्में आईं थी - 'डाक बाबू' और 'वारिस'। इनके अलावा बहुत सारी फ़िल्मों में इस साल उनकी आवाज़ छाई रही जैसे कि 'मिर्ज़ा ग़ालिब', 'टैक्सी ड्राइवर', 'अंगारे', 'सुबह का तारा', 'कवि', 'मीनार', 'सुहागन', 'औरत तेरी यही कहानी', और 'गुल बहार'। आज की कड़ी के लिए हमने चुना है फ़िल्म 'गुल बहार' की एक ग़ज़ल "गर तेरी नवाज़िश हो जाए"। संगीतकार हैं धनीराम और ख़य्याम। इस फ़िल्म में तीन गीतकारों ने गीत लिखे हैं - असद भोपाली, जाँ निसार अख़्तर और शेवन रिज़्वी। प्रस्तुत ग़ज़ल के शायर हैं शेवन रिज़्वी। नानुभाई वकील निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे शक़ीला, हेमन्त और कुलदीप कौर। दोस्तों, जमाल सेन और स्नेहल भाटकर की तरह धनीराम भी एक बेहद कमचर्चित संगीतकार रहे। यहाँ तक कि उन्हे बी और सी-ग्रेड की फ़िल्में भी बहुत ज़्यादा नहीं मिली। फिर भी जितना भी काम उन्होने किया है, जितने भी धुनें उन्होने बनायी हैं, वे सब फ़िल्म संगीत धरोहर के कुछ ऐसे अनमोल रतन हैं कि उनके योगदान को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता। धनीराम फ़िल्म जगत में दाख़िल हुए थे १९४५ में जब पंडित अमरनाथ ने उनसे फ़िल्म 'झुमके' का "तेरे बग़ैर भी दिलशाद कर तो सकता हूँ" और 'धमकी' का "अपने कोठे मैं खड़ी" जैसे गीत गवाया था। गायक के रूप में धनीराम को निराशा ही हाथ लगी। बतौर संगीतकार उनकी पहली फ़िल्म थी १९४८ की 'पपीहा रे'। उसके बाद १९५३ में उनकी अगली फ़िल्म आई 'धुआँ', जिसका संगीत धनीराम ने वसंत देसाई के साथ शेयर किया, ठीक वैसे ही जैसे कि आज के गीत का संगीत उन्होने शेयर किया ख़य्याम साहब के साथ। धनीराम के सब से चर्चित फ़िल्म रही 'डाक बाबू' ('५४), लेकिन इस फ़िल्म के संगीत की भी उतनी चर्चा नहीं हुई जितनी कि होनी चाहिए थी। धनीराम के करीयर की कुछ और महत्वपूर्ण फ़िल्मों के नाम हैं - 'गुल बहार', 'रूप बसंत', 'शाही चोर', 'आँख का नशा', 'शाही बाज़ार', 'तक़दीर', 'बाजे घुँघरू', 'मेरी बहन', और 'आवारा लड़की'। (सौजन्य: धुनो की यात्रा - पंकज राग)।

दोस्तों, हमने इस शृंखला की पिछली कड़ियों में आपको बताया कि किस तरह से तलत महमूद संगीत की दुनिया से जुड़े और कैसे उनके अभिनय की भी पारी शुरु हुई थी कलकत्ता के न्यु थिएटर्स में। फ़िल्मी प्लेबैक में उनकी एंट्री किस तरह से हुई यह हम आपको कल की कड़ी में बताएँगे। आज बात करते हैं उनके ग़ज़ल गायकी की। तलत साहब की आवाज़ में संगीतकारों को ग़ज़ल गायकी के सभी गुण दिखाई देते थे। उनका उच्चारण और अदायगी बिल्कुल पर्फ़ेक्ट हुआ करती थी, ना कम ना ज़्यादा। उनका एक्स्प्रेशन, उनके जज़्बात, उनका स्टाइल कुछ ऐसा था कि जो किसी भी दूसरे गायक में नहीं मिलता था। उनकी आवाज़ में जो मिठास, जो कोमलता, और जो दर्द था, वही उनको दूसरे गायकों की भीड़ से अलग करती थी। जब वो फ़िल्म जगत में आए तब उनके जैसे आवाज़-ओ-अंदाज़ वाला कोई भी गायक नहीं था। इसलिए एक ताज़े हवा के झोंके की तरह उनकी एंट्री हुई और आज तक उनके जैसी आवाज़ वाला कोई भी नहीं जन्मा। 'ग़ज़लों के बादशाह' के रूप में तलत साहब जाने गए, और जल्द ही वो एक 'लिविंग् लीजेण्ड' के रूप में माने गए। आज भले वो हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ के जलवे आज भी बरक़रार है। ६० के दशक के अंत में फ़िल्म संगीत ने जब करवट बदली, ग़ज़लों और सॊफ़्ट रोमांटिक गीतों का चलन कम होने लगा, तब तलत साहब को यह बदलाव रास नहीं आया और उन्होने अपना पूरा ध्यान ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लों में लगा दिया। ८० के दशक में भी उनकी गाई हुई ग़ज़लों के रिकार्ड्स जारी हुए हैं। इस शृंखला में भी हम उन्ही में से एक ग़ज़ल आपको सुनवाएँगे, लेकिन आज प्रस्तुत है फ़िल्म 'गुल बहार' की यह ग़ज़ल, जिसके चार शेर इस तरह से हैं -

गर तेरी नवाज़िश हो जाए गर तेरा इशारा हो जाए,
हर मौज सहारा दे जाए तूफ़ान किनारा हो जाए।

तुम हम से जफ़ाएँ करते हो, और हम ये दुआएं देते हैं,
जो हाल हमारा है इस दम वह हाल तुम्हारा हो जाए।

हम इश्क़ के मारे दुनिया में इतनी सी तमन्ना रखते हैं,
दामन जो तुम्हारा हाथ आए जीने का सहारा हो जाए।

परदा तो हटा दो चेहरे से वीरानें गुलिस्ताँ बन जाएँ,
जलवा जो दिखा दो तो रोशन क़िस्मत का सितारा हो जाए।



क्या आप जानते हैं...
धनीराम और दक्षिण के संगीतकार आर सुदर्शन ने मिलकर ए वी एम् की फिल्म "लड़की" में संगीत दिया था, इस फिल्म में गीता दत्त की आवाज़ एक खूबसूरत गीत था "बाट चलत नयी चुनरी रंग डाली". इन्हीं शब्दों को "रानी रूपमती" (१९५९) में रफ़ी और कृष्णराव चोनकर ने भैरवी में भी खूब गाया था

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

1. मतले में ये दो शब्द हैं - "ख्याल" और "करार", बताईये ग़ज़ल के बोल.-३ अंक.
2. इस शायर का नाम वही है जो "मैंने प्यार किया" में सलमान खान का स्क्रीन नाम था, इस गीतकार का पूरा नाम बताएं- २ अंक.
3. इस गीत के संगीतकार ने १९३७ में फिल्म जीवन ज्योति से शुरूआत की थी इनका नाम बताएं- २ अंक.
4. इस गज़ल की फिल्म का नाम क्या है, अभी कुछ सालों पहले फिर इसी नाम की एक फिल्म बनी थी जिसमें "एक दिन तेरी राहों में..." जैसा सुपर हिट गाना था- सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
इस बार निशाना एक दम सटीक है इंदु जी, अरे आप तो जवानों को मात दे रही हैं, आपको बू... कहने की जुर्रत भला हम कैसे कर सकते हैं, अवध जी की तस्वीर कल पहली बार देखी, आप भी खासे जवाँ हैं जनाब. आप दोनों को बधाई...शरद जी स्वागत है आपके २ अंक भी सुरक्षित...बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, March 1, 2009

यार बादशाह...यार दिलरुबा...कातिल आँखों वाले....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 10

ओ पी नय्यर. एक अनोखे संगीतकार. आशा भोसले को आशा भोंसले बनाने में ओ पी नय्यर के संगीत का एक बडा हाथ रहा है, इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता, और यह बात तो आशाजी भी खुद मानती हैं. आशा और नय्यर की जोडी ने फिल्म संगीत को एक से एक नायाब नग्में दिए हैं जो आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने कि उस समय थे. यहाँ तक कि नय्यर साहब के अनुसार वो ऐसे संगीतकार रहे जिन्हे ता-उम्र सबसे ज़्यादा 'रायल्टी' के पैसे मिले. आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में आशा भोंसले और ओ पी नय्यर के सुरीले संगम से उत्पन्न एक दिलकश नग्मा आपके लिए लेकर आए हैं. सन 1967 में बनी फिल्म सी आइ डी 909 का यह गीत हेलेन पर फिल्माया गया था. जब जोडी का ज़िक्र हमने किया तो एक और जोडी हमें याद आ रही है, हेलेन और आशा भोसले की. जी हाँ दोस्तों, हेलेन पर फिल्माए गये आशाजी के कई गाने हैं जो मुख्य रूप से 'क्लब सॉंग्स', 'कैबरे सॉंग्स', 'डिस्को', या फिर मुज़रे हैं. फिल्म सी आइ डी 909 का यह गीत भी एक 'क्लब सॉंग' है.

सी आइ डी 909 में कई गीतकारों ने गीत लिखे, जैसे कि अज़ीज़ कश्मीरी, एस एच बिहारी, वर्मा मलिक और शेवन रिज़वी. यह गीत रिज़वी साहब का लिखा हुआ है. इस गीत की अवधि उस ज़माने के साधारण गीतों की अवधि से ज़्यादा है. 5 'मिनिट' और 55 'सेकेंड्स' के इस गीत का 'प्रिल्यूड म्यूज़िक' करीब करीब 1 'मिनिट' और 35 'सेकेंड्स' का है और यही वजह है इस गीत की लंबी अवधि का. 'प्रिल्यूड म्यूज़िक' के बाद गाने का 'रिदम' बिल्कुल ही बदल जाती है और गीत शुरू हो जाता है. गीत के 'इंटरल्यूड म्यूज़िक' में अरबिक संगीत की झलक मिलती है. इस गाने के 'रेकॉर्डिंग' से जुडा एक किस्सा आप को बताना चाहेंगे दोस्तों. हुआ यूँ कि इस गाने की 'रेकॉर्डिंग' शुरू होनेवाली थी जब नय्यर साहब को उनके घर से संदेश आया कि उनके बेटे का 'आक्सिडेंट' हो गया है. नय्यर साहब विचलित नहीं हुए और ना ही उन्होने इस बात की किसी को भनक तक पड़ने दी और जब गाने की 'फाइनल रेकॉर्डिंग' खत्म हो गयी तब जाकर उन्होने आशा भोंसले को यह बात बताई. यह बात सुनकर आशाजी ने उन्हे बहुत डांटा. यह घटना उजागर करती है नय्यर साहब की अपने काम के प्रति लगन और निष्ठा को. तो नय्यर साहब के इसी लगन और मेहनत को सलाम करते हुए सुनिए सी आइ डी 909 फिल्म का गीत "यार बादशाह यार दिलरुबा".



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. इत्तेफाक से अगला गीत भी आशा और ओ पी नय्यर की जबरदस्त जोड़ी का है.पर ये कोई क्लब गीत न होकर रोमांटिक अंदाज़ का है.
२. मजरूह सुल्तानपुरी के बोलों को परदे पर अभिनीत किया है आशा पारेख ने. नायक है जोय मुख़र्जी.
३. मुखड़े में शब्द है -"तस्वीर"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का कोई भी सही जवाब नहीं दे पाया ताज्जुब है, जबकि गीत इतना मशहूर है...खैर आज के लिए शुभकामनायें

प्रस्तुति - सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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