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Sunday, November 2, 2014

वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ : SWARGOSHTHI – 192 : RAG BHIMPALASI


स्वरगोष्ठी – 192 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 1 : राग भीमपलासी

संगीतज्ञ पण्डित शंकरराव व्यास और गायिका सरस्वती राणे की जोड़ी ने राग भीमपलासी के स्वरों में रचा एक मधुर गीत




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हम एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे है। इस श्रृंखला का शीर्षक है- ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के पहले अंक में आज हम आपसे 1943 की फिल्म ‘रामराज्य’ के एक गीत- ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ की चर्चा करेंगे। इस गीत का सृजन अपने समय की दो दिग्गज सांगीतिक विभूतियों, संगीतकार पण्डित शंकरराव व्यास और किराना घराने की चर्चित गायिका सरस्वती राणे द्वारा हुआ था। राग भीमपलासी के फिल्मी प्रयोग का यह एक अच्छा उदाहरण है। इसके साथ ही राग भीमपलासी स्वरूप को समझने के लिए इस अंक में हम आपको शीर्षस्थ गायिका गंगूबाई हंगल की आवाज़ में राग भीमपलासी की एक मोहक रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 
 


हात्मा गाँधी ने अपने जीवनकाल में एकमात्र फिल्म ‘रामराज्य’ देखी थी। 1943 में प्रदर्शित इस फिल्म का निर्माण प्रकाश पिक्चर्स ने किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक अपने समय के जाने-माने संगीतज्ञ पण्डित शंकरराव व्यास थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी, व्यासजी की कुशलता केवल फिल्म संगीत निर्देशन के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि शास्त्रीय गायन, संगीत शिक्षण और ग्रन्थकार के रूप में भी सुरभित हुई। फिल्म ‘रामराज्य’ में पण्डित जी ने राग भीमपलासी के स्वरों में एक गीत ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ संगीतबद्ध किया था। इस गीत को किराना घराने के संस्थापक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की सुपुत्री और सुप्रसिद्ध गायिका सरस्वती राणे ने स्वर दिया था। आज पहले हम इस गीत के संगीतकार पण्डित शंकरराव व्यास और उसके बाद विदुषी सरस्वती राणे के व्यक्तित्व-कृतित्व पर चर्चा करेंगे।

शंकरराव व्यास 
कोल्हापुर में 23 जनवरी, 1898 को पुरोहितों के परिवार में जन्मे शंकरराव व्यास के पिता गणेश पन्त, कथावाचक के साथ-साथ संगीत-प्रेमी भी थे। संगीत के संस्कार उन्हें अपने पिता से ही प्राप्त हुए। दुर्भाग्यवश जब शंकरराव आठ वर्ष के थे तब उनके पिता का देहान्त हो गया। पिता के देहान्त के बाद वे अपने चाचा श्रीकृष्ण सरस्वती के आश्रित हुए। उन्हीं दिनों पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर भारतीय संगीत को उसकी दयनीय स्थिति से उबारने के लिए पूरे महाराष्ट्र में भ्रमण कर रहे थे और उनकी अगली योजना पूरे देश में संगीत के प्रचार-प्रसार की थी। बालक शंकरराव के संगीत-ज्ञान और उत्साह देख कर पलुस्कर जी ने उन्हें अपने साथ ले लिया। पलुस्कर जी द्वारा स्थापित गान्धर्व विद्यालय में ही उन्होने ९ वर्ष तक संगीत शिक्षा प्राप्त की और अहमदाबाद के राष्ट्रीय विद्यालय में संगीत शिक्षक हो गए। इसी बीच पलुस्कर जी ने लाहौर में संगीत विद्यालय की स्थापना की और शंकरराव को वहीं प्रधानाचार्य के पद पर बुला लिया। लाहौर में संगीत विद्यालय विधिवत स्थापित हो जाने और सुचारु रूप से संचालित होने के बाद वे अहमदाबाद आए और यहाँ भी ‘गुजरात संगीत विद्यालय’ की स्थापना की। 1934 में उन्होने गन्धर्व संगीत महाविद्यालय स्थापित किया। इस बीच उन्होने संगीत शिक्षण के साथ-साथ संगीत सम्मेलनों में भाग लेना भी जारी रखा।

1938 में 40 वर्ष की आयु में शंकरराव व्यास ने फिल्म संगीत के क्षेत्र में पदार्पण किया। 1938 में रमणलाल बसन्तलाल के उपन्यास पर बनी फिल्म ‘पूर्णिमा’ में कई गीत गाये थे। गायन के साथ-साथ फिल्मों की संगीत रचना के क्षेत्र में भी उनका वर्चस्व कायम हो चुका था। व्यास जी के संगीतबद्ध, भक्ति प्रधान और नीति पधान गीत गली-गली गूँजने लगे थे। 1940 में ‘सरदार’, ‘नरसी भगत’ और 1942 में ‘भरतमिलाप’ फिल्मों के गीत लोकप्रियता के शिखर पर थे। इसी समय 1943 में प्रकाश पिक्चर्स की फिल्म ‘रामराज्य’ प्रदर्शित हुई थी। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के दौर में प्रदर्शित फिल्म ‘रामराज्य’ में दर्शकों को गाँधीवादी रामराज्य की परिकल्पना परिलक्षित हो रही थी। इस फिल्म के राग आधारित गीत भी अत्यन्त जनप्रिय हुए थे, विशेष रूप से फिल्म में लव और कुश चरित्रों पर फिल्माया गया गीत ‘भारत की एक सन्नारी की हम कथा सुनाते हैं...’ और राजमहल में फिल्माया गया गीत ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’। पण्डित शंकरराव व्यास ने इन दोनों गीतों को क्रमशः काफी और भीमपलासी के स्वरों में बाँधा था। आज हमारी चर्चा में रमेश चन्द्र गुप्ता के लिखे, शंकरराव व्यास के संगीतबद्ध किए और सरस्वती राणे के गाये गीत ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ ही है। आइए, पहले हम यह गीत सुनते हैं।


राग भीमपलासी : ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ : फिल्म – रामराज्य : स्वर – सरस्वती राणे : संगीत – पण्डित शंकरराव व्यास





सरस्वती राणे 
अभी आपने जो गीत सुना वह अपने समय की विख्यात गायिका सरस्वती राणे के स्वरों में था। इनका जन्म 4 अक्टूबर, 1913 को महाराष्ट्र के मिरज में हुआ था। किराना घराने के संस्थापक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ और तारा बाई की सन्तान सरस्वती राणे को संगीत विरासत में मिला था। 1930 में पति से अलग होने के बाद तारा बाई ने अपने पाँच सन्तानों का स्वयं पालन-पोषण किया। सरस्वती ने अपने पिता से प्राप्त संगीत शिक्षा को अपने बड़े भाई सुरेशबाबू माने और बड़ी बहन हीराबाई बड़ोदकर के मार्गदर्शन से आगे बढ़ाया। उन दिनों संगीत के मंचों पर हीराबाई और सरस्वती के जुगलबन्दी प्रस्तुतियाँ खूब चर्चित हो गई थी। सरस्वती राणे का मंच-पदार्पण सात वर्ष की आयु में संगीत प्रधान नाटकों के माध्यम से हुआ था। 1929 में मराठी रंगमंच के सितारे बालगन्धर्व जैसे कलाकारों के साथ अभिनय और गाने का उन्हें अवसर मिला। 1933 से रेडियो पर गाने का अवसर मिला जो 1990 तक जारी रहा। 1943 में जब उन्होने फिल्म ‘रामराज्य’ के लिए पार्श्वगायन किया था, उस समय सरस्वती राणे लोकप्रियता के शिखर पर थीं।

राग ‘भीमपलासी’ भारतीय संगीत का एक ऐसा राग है, जिसमें भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ खिल उठती है। यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात आरोह में पाँच स्वर- सा, (कोमल), म, प, नि (कोमल), सां और अवरोह में सात स्वर- सां नि (कोमल), ध, प, म (कोमल), रे, सा प्रयोग किए जाते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह काफी थाट का राग है और इसका वादी और संवादी स्वर मध्यम और तार सप्तक का षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर मध्यम के स्थान पर पंचम का प्रयोग भी किया जाता है। ‘भीमपलासी’ के गायन-वादन का समय दिन का चौथा प्रहर होता है।

गंगूबाई हंगल 

आइए, अब हम आपको राग भीमपलासी की ही एक आकर्षक बन्दिश सुनवाते हैं। यह किराना घराने की गायकी में शीर्षस्थ विदुषी गंगूबाई हंगल की एक रिकार्डिंग है। 5 मार्च, 1913 को धारवाड़, कर्नाटक में उनका जन्म हुआ था। बाल्यावस्था में उन्हें अपनी माँ से दक्षिण भारतीय संगीत पद्यति की शिक्षा मिली। 1928 में उनका परिवार हुबली स्थानान्तरित हो गया। जाने-माने संगीतविद् सवाई गन्धर्व से उत्तर भारतीय संगीत में दक्षता प्राप्त करने से पूर्व किन्नरी वीणा वादक कृष्ण आचार्य और दत्तोपन्त देसाई से संगीत की शिक्षा ग्रहण की थी। पण्डित भीमसेन जोशी इनके गुरूभाई थे। गंगूबाई हंगल ने संगीत को आत्मसात करने के लिए कठिन साधना की थी। भारत के उच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मभूषण’ से 1971 में और ‘पद्मविभूषण’ से 2002 में अलंकृत किया गया था। 21 जुलाई, 2009 को इस महान गायिका का हुबली में निधन हुआ था। अब आप विदुषी गंगूबाई हंगल की आवाज़ में राग भीमपलासी की यह खयाल रचना सुनिए। इस प्रस्तुति में उनके गायन में उनकी सुपुत्री कृष्णा हंगल ने सहयोग किया है। आप राग भीमपलासी का रसास्वादन कीजिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भीमपलासी : ‘गरवा हरवा डारो री...’ : विदुषी गंगूबाई हंगल : तीनताल 






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 192वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छः दशक से भी पहले की एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा तथा वर्ष 2014 में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी को वार्षिक विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में आपको किस राग का आभास होता है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 194वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 190वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी राग भैरवी की ठुमरी ‘रस के भरे तोरे नैन...’ का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका विदुषी गिरिजा देवी। पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से नई लघु श्रृंखला ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मों गीत’ आरम्भ हुई है। पहले की तरह इस श्रृंखला के बारे में भी आपके सुझाव आमंत्रित हैं। नए वर्ष से ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के अन्तर्गत आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हों, हमे आविलम्ब लिखें। आप अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, May 26, 2013

राग भीमपलासी के सुरों में पिरोया एक कालजयी गीत


स्वरगोष्ठी – 122 में आज
भूले-बिसरे संगीतकार की अमर कृति- 2

सरस्वती राणे ने गाया ‘रामराज्य’ का गीत- ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की अमर कृति’ के दूसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का अभिनन्दन करता हूँ। आज के अंक में हम आपको राग भीमपलासी पर आधारित फिल्म 'रामराज्य' एक ऐसा गीत सुनवाएँगे जो सात दशक बाद भी प्रायः हम सुनते रहते हैं। परन्तु इसके संगीतकार पण्डित शंकरराव व्यास के बारे में हम अनभिज्ञ हैं।  


हात्मा गाँधी ने अपने जीवनकाल में एकमात्र फिल्म ‘रामराज्य’ देखी थी। 1943 में प्रदर्शित इस फिल्म का निर्माण प्रकाश पिक्चर्स ने किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक अपने समय के जाने-माने संगीतज्ञ पण्डित शंकरराव व्यास थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी, व्यासजी की कुशलता केवल फिल्म संगीत निर्देशन के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि शास्त्रीय गायन, संगीत शिक्षण और ग्रन्थकार के रूप में भी सुरभित हुई थी। फिल्म ‘रामराज्य’ के साथ कई उल्लेखनीय तथ्य जुड़े हुए हैं, जिनमें एक यह भी तथ्य है कि पण्डित शंकरराव व्यास ने पार्श्वगायक मन्ना डे से पहली बार इस फिल्म में दो गीत गवाए थे। इसी फिल्म में पण्डित जी ने राग भीमपलासी के स्वरों में गीत- ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ भी संगीतबद्ध किया था। आज हमारी गोष्ठी में यही गीत, राग और इसके रचनाकार, चर्चा के विषय होंगे।

शंकरराव व्यास
कोल्हापुर में 23 जनवरी, 1898 को पुरोहितों के परिवार में जन्मे शंकरराव व्यास के पिता गणेश पन्त, कथा-वाचक के साथ संगीत-प्रेमी भी थे। संगीत के संस्कार उन्हें अपने पिता से ही प्राप्त हुए। दुर्भाग्यवश जब शंकरराव आठ वर्ष के थे तब उनके पिता का देहान्त हो गया। पिता के देहान्त के बाद वे अपने चाचा श्रीकृष्ण सरस्वती के आश्रित हुए। उन्हीं दिनों पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर भारतीय संगीत को दयनीय स्थिति से उबारने के लिए पूरे महाराष्ट्र में भ्रमण कर रहे थे और उनकी अगली योजना पूरे देश में संगीत के प्रचार-प्रसार की थी। बालक शंकरराव के संगीत-ज्ञान और उत्साह को देख कर पलुस्कर जी ने उन्हें अपने साथ ले लिया। पलुस्कर जी द्वारा स्थापित गान्धर्व विद्यालय में ही उन्होने 9 वर्षों तक संगीत शिक्षा प्राप्त की और अहमदाबाद के राष्ट्रीय विद्यालय में संगीत शिक्षक हो गए। इसी बीच पलुस्कर जी ने लाहौर में संगीत विद्यालय की स्थापना की और शंकरराव को वहीं प्रधानाचार्य के पद पर बुला लिया। लाहौर में संगीत विद्यालय विधिवत स्थापित हो जाने और सुचारु रूप से संचालित होने के बाद वे अहमदाबाद आए और यहाँ ‘गुजरात संगीत विद्यालय’ की स्थापना भी की। 1934 में उन्होने गान्धर्व संगीत महाविद्यालय की स्थापना की। इस बीच उन्होने संगीत शिक्षण के साथ-साथ संगीत सम्मेलनों में भाग लेना भी जारी रखा।

सरस्वती राणे
1938 में 40 वर्ष की आयु में शंकरराव व्यास ने फिल्म संगीत के क्षेत्र में पदार्पण किया। 1938 में रमणलाल बसन्तलाल के उपन्यास पर बनी फिल्म ‘पूर्णिमा’ में कई गीत गाये थे। गायन के साथ-साथ फिल्मों की संगीत रचना के क्षेत्र में भी उनका वर्चस्व कायम हो चुका था। व्यास जी के संगीतबद्ध, भक्ति प्रधान और नीति प्रधान गीत गली-गली गूँजने लगे थे। 1940 में ‘सरदार’, ‘नरसी भगत’ और 1942 में ‘भरतमिलाप’ फिल्मों के गीत लोकप्रियता के शिखर पर थे। इसी समय 1943 में प्रकाश पिक्चर्स की फिल्म ‘रामराज्य’ प्रदर्शित हुई। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के दौर में प्रदर्शित फिल्म ‘रामराज्य’ में दर्शकों को गाँधीवादी रामराज्य की परिकल्पना परिलक्षित हो रही थी। इस फिल्म के राग आधारित गीत अपने समय में बेहद लोकप्रिय हुए थे, विशेष रूप से फिल्म में लव और कुश चरित्रों के पर फिल्माया गया गीत ‘भारत की एक सन्नारी की हम कथा सुनाते हैं...’ और राजमहल में फिल्माया गया गीत ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’। पण्डित शंकरराव व्यास ने इन दोनों गीतों को क्रमशः राग काफी और भीमपलासी के स्वरों में बाँधा था। आइए, अब हम प्रस्तुत करते हैं, सरस्वती राणे के गाये, रमेश चन्द्र गुप्ता के लिखे, शंकरराव व्यास के संगीतबद्ध किए और राग भीमपलासी के स्वरों की चाशनी में पगे गीत ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’


राग भीमपलासी : फिल्म रामराज्य : ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ : संगीत – शंकरराव व्यास



अश्विनी भिड़े देशपाण्डे
राग ‘भीमपलासी’ भारतीय संगीत का एक ऐसा राग है, जिसमें भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ खिल उठती है। यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात आरोह में पाँच स्वर- सा, (कोमल), म, प, नि (कोमल), सां और अवरोह में सात स्वर- सां नि (कोमल), ध, प, म (कोमल), रे, सा प्रयोग किए जाते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह काफी थाट का राग है और इसका वादी और संवादी स्वर क्रमशः मध्यम और तार सप्तक का षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर मध्यम के स्थान पर पंचम का प्रयोग भी किया जाता है। भीमपलासी के गायन-वादन का समय दिन का चौथा प्रहर होता है। कर्नाटक संगीत पद्यति में ‘भीमपलासी’ के समतुल्य राग है ‘आभेरी’। ‘भीमपलासी’ एक ऐसा राग है, जिसमें खयाल-तराना से लेकर भजन-ग़ज़ल की रचनाएँ संगीतबद्ध की जाती हैं। श्रृंगार और भक्ति रस की अभिव्यक्ति के लिए यह वास्तव में एक आदर्श राग है। आइए अब हम आपको इसी राग में कण्ठ संगीत का एक मोहक उदाहरण सुनवाते हैं। सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे ने राग भीमपलासी, तीनताल में निबद्ध एक मोहक द्रुत खयाल प्रस्तुत किया है। आप इस रचना में फिल्म 'रामराज्य' के उपरोक्त गीत के स्वरों को पहचानने का प्रयास कीजिए और मुझे, इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भीमपलासी : ‘जा जा रे अपने मन्दिरवा...’ विदुषी अश्विनी भिड़े




आज की पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ के 122वें अंक की पहेली में आज हम आपको पाँचवें दशक के उत्तरार्द्ध में बनी एक फिल्म के राग आधारित एक गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 130वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 123वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से या swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली और श्रृंखला के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ के 120वें अंक की पहेली में हमने आपको 1942 में प्रदर्शित फिल्म ‘भक्त सूरदास’ से लिये गए गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने ही दिया है। प्रकाश जी को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। 120वें अंक की पहेली की समाप्ति पर इस श्रृंखला (सेगमेंट) के प्रथम चार प्रतिभागियों के प्राप्तांक निम्नवत रहे-
1. श्रीमती क्षिति तिवारी, जबलपुर – 16 अंक

2. श्री प्रकाश गोविन्द, लखनऊ – 15 अंक

3. डॉ. पी.के. त्रिपाठी, जौनपुर – 12 अंक

4. श्री पंकज मुकेश, बैंगलुरु – 8 अंक


झरोखा अगले अंक का 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘एक कालजयी गीत, जिसने संगीतकार को अमर बना दिया’ के अब तक के दो अंकों में हमने आपसे देश की आज़ादी से पूर्व के राग आधारित फिल्म संगीत पर चर्चा की है। अगले अंक में हम आज़ादी के तत्काल बाद के फिल्म संगीत की जानकारी आपसे बाँटेंगे। अगले अंक में एक और विस्मृत संगीतकार के राग आधारित चर्चित गीत के साथ रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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