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Monday, May 25, 2009

सफल 'हुई' तेरी आराधना - अंतिम कडी

अब तक आपने पढ़ा -

आनंद आश्रम से शुरू हुआ सफ़र...., हावड़ाब्रिज से कश्मीर की कली तक... ,रोमांटिक फिल्मों के दौर में आराधना की धूम..., और अमर प्रेम, अजनबी और अनुराग जैसी कामियाब फिल्मों का सफ़र अब पढें आगे....


शक्ति सामंत को समर्पित 'आवाज़' की यह प्रस्तुति "सफल हुई तेरी आराधना" एक प्रयास है शक्तिदा के 'फ़िल्मोग्राफी' को बारीक़ी से जानने का और उनके फ़िल्मों के सदाबहार 'हिट' गीतों को एक बार फिर से सुनने का। पिछले अंक में हमने ज़िक्र किया था १९७४ की फ़िल्म 'अजनबी' का। आइए अब आगे बढ़ते हैं और क़दम रखते हैं सन १९७५ में। यह साल भी शक्तिदा के लिए एक महत्वपूर्ण साल रहा, इसी साल आयी फ़िल्म 'अमानुष' जिसका निर्माण व निर्देशन दोनो ही उन्होने किया। पहली बार बंगला के सर्वोत्तम नायक उत्तम कुमार को लेकर उन्होने यह फ़िल्म बनायी, साथ में थीं उनकी प्रिय अभिनेत्री शर्मिला। इसी फ़िल्म के बारे में बता रहे हैं ख़ुद शक्तिदा - "१९७२ में कलकत्ता में 'नक्सालाइट' का बहुत ज़्यादा 'प्राबलेम' शुरु हो गया था। कलकत्ता फ़िल्म इंडस्ट्री का बुरा हाल था। उससे पहले उत्तमदा ने एक 'पिक्चर' यहाँ बनाई थी 'छोटी सी मुलाक़ात' जो शायद अच्छी नहीं चली थी, या जो भी थी, 'He couldn't establish himself yet'। तो एक दिन रात को उन्होने ऐसे ही कह दिया कि 'क्या मैं दोबारा यहाँ पे आ नहीं सकता हूँ?' मैने कहा 'ज़रूर, मैं आपको लेकर एक 'पिक्चर' बनाउँगा'। तो मैने सोचा कि यह बंगला 'पिक्चर' है तो ज़्यादातर 'आर्टिस्ट्स' वहीं के ले लूँ। कुछ यहाँ के 'आर्टिस्ट्स' को छोड़कर सब वहाँ के 'आर्टिस्ट्स' को मैने लिया। और भगवान की दया से वह पिक्चर भी चल पड़ी।"

'अमानुष' फ़िल्म की 'शूटिंग भी रोमांच से भरा हुआ था। इस फ़िल्म को 'शूट' करने के लिए शक्तिदा अपनी पूरी टीम को लेकर बंगाल के सामुद्रिक इलाके 'सुंदरबन' गए जो 'रायल बेंगाल टाइगर' के लिए प्रसिद्ध है। पूरी टीम के लिए वह एक अविस्मरणीय यात्रा रही। वहाँ पर सिर्फ़ एक ऐसी जगह थी जहाँ शेर नहीं आ सकते थे। एक छोटा सा द्वीप जिसके चारों तरफ़ सिर्फ़ पानी ही पानी। वहाँ पर १५० लोगों के रहने लायक तंबू लगाये गये थे और 'मोटर बोट्स' की सहायता से सामानों का आवाजाही हो रहा था। उन लोगों ने साफ़ देखा की पानी में छोटी छोटी 'शार्क' मछलियाँ तैर रही हैं। इसलिए उन्हे यह निर्देश था कि कोई भी पानी में ना उतरें। साथ ही यह भी बताया गया था कि रात में कोई तंबू से बाहर ना निकले, यहाँ तक कि हाथ भी तंबू से बाहर ना निकालें क्युंकि एक ताज़े माँस के टुकड़े के लिए ख़ूंखार शेर पानी में डुबकी लगाए छुपे होते हैं। 'अमानुष' के शुरुआती दिनों में शक्तिदा उत्तम कुमार के घर ख़ूब जाया करते थे। उन्ही के घर पर वो गायक संगीतकार श्यामल मित्रा से मिले, और वहीं पर उन्होने श्यामलदा से निवेदन किया कि वो इस फ़िल्म के गीतों को स्वरबद्ध करें। श्यामल मित्रा इस बात पर राज़ी हुए कि गीतों के बोल अच्छे स्तर के होने चाहिए।

गीत: दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा (अमानुष)


'अमानुष' फ़िल्म में गीत लिखे थे इंदीवर साहब ने। कितनी अजीब बात है कि 'अमानुष' के इस 'हिट' गीत के लिए गीतकार इंदीवर और गायक किशोर कुमार को 'फ़िल्म-फ़ेयर अवार्ड' से सम्मानित किया गया, लेकिन संगीतकार श्यामल मित्रा वंचित रह गये। ख़ुशी फिर भी इस बात की रही कि हिंदी फ़िल्मों के पहली ब्रेक में ही उन्होने अपार सफलता हासिल की। हिंदी फ़िल्मों में आने से पहले वे बंगाल के जानेमाने गायक और संगीतकार बन चुके थे। फ़िल्म 'अमानुष' में इस तरह के असाधारण गाने लिखने के बाद शक्तिदा इंदीवर साहब के 'फ़ैन' बन गए। लेकिन क्या आपको पता है कि इंदीवर का लिखा कौन सा गाना शक्तिदा को सबसे ज़्यादा पसंद था? वह गीत था १९५४ की फ़िल्म 'बादबान' का। यह गीत सुनने से पहले आपको यह भी बता दें कि इस फ़िल्म के संवाद और स्क्रीनप्ले शक्तिदा ने ख़ुद लिखे थे जो उन दिनो निर्देशक फणी मजुमदार के सहायक के रूप में काम कर रहे थे बौम्बे टाकीज़ में। बौम्बे टाकीज़ की आर्थिक अवस्था बहुत ख़राब हो चुकी थी। यह फ़िल्म इस कंपनी में काम करने वाले मज़दूरों के लिए बनाई गयी थी, जिसके लिए किसी भी कलाकार ने कोई पैसे नहीं लिए। अशोक कुमार, देव आनंद, लीला चिटनिस, उषा किरन जैसे कलाकारों ने इस फ़िल्म में काम किया था। संगीतकार थे तिमिर बरन और एस. के पाल। अभी उपर इंदीवर के लिखे जिस गीत का ज़िक्र हम कर रहे थे, उसे गाया था गीता दत्त ने, और एक वर्ज़न हेमन्त कुमार की आवाज़ में भी था। सुनिए गीताजी की वेदना भरी आवाज़ में "कैसे कोई जीये ज़हर है ज़िंदगी"।

गीत: कैसे कोई जियें ज़हर है ज़िंदगी (बादबान)


अमानुष के बाद ७० के दशक के आख़िर के चंद सालों में भी शक्तिदा के फ़िल्मों का जादू वैसा ही बरक़रार रहा। निर्माता-निर्देशक के रूप मे १९७७ मे उनकी फ़िल्म आयी 'आनंद आश्रम' जो 'अमानुष' की ही तरह बंगाल के पार्श्वभूमि पर बनाया गया था। इस फ़िल्म का निर्माण बंगला में भी किया गया था, और इस फ़िल्म मे भी उत्तम कुमार और शर्मिला टैगोर ने अभिनय किया था। बतौर निर्माता, शक्तिदा ने १९७६ मे फ़िल्म 'बालिका बधु' का निर्माण किया, जिसका एक बार फिर बंगाल की धरती से ताल्लुख़ था। शरतचंद्र की बंगला उपन्यास पर आधारित इस फ़िल्म को निर्देशित किया था तरु मजुम्दार ने और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे सचिन और रजनी शर्मा। गाने लिखे आनंद बक्शी ने और संगीत दिया राहुल देव बर्मन ने। इस फ़िल्म मे आशा भोसले, मोह्द रफ़ी, किशोर कुमार, अमित कुमार और चंद्राणी मुखर्जी ने तो गीत गाये ही थे, ख़ास बात यह है कि इस फ़िल्म मे आनद बक्शी, आर.डी. बर्मन और उनके सहायक और गायक सपन चक्रवर्ती ने भी गानें गाये, और वह भी अलग अलग एकल गीत। इस फ़िल्म का मशहूर होली गीत हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' मे आपको सुनवा ही चुके हैं। बतौर निर्देशक, शक्तिदा ने १९७६ मे 'महबूबा', १९७७ में 'अनुरोध' और १९७९ मे 'दि ग्रेट गैम्बलर' जैसी सफल फ़िल्मों का निर्देशन किया। ये सभी फ़िल्में अपने ज़माने की सुपरहिट फ़िल्में रहीं हैं। वह दौर ऐसा था दोस्तों कि सफल फ़िल्में कहें या शक्तिदा की फ़िल्में कहें, मतलब एक ही निकलता था।

गीत: आप के अनुरोध पे मैं यह गीत सुनाता हूँ (अनुरोध)


८० के दशक के आते आते फ़िल्मों का मिज़ाज बदलने लगा था। कोमलता फ़िल्मों से विलुप्त होती जा रही थी और उनकी जगह ले रहा था 'ऐक्शन' फ़िल्में। बावजूद इस बदलती मिज़ाज के, शक्तिदा ने अपना वही अंदाज़ बरक़रार रखा। इस दशक मे जिन हिंदी फ़िल्मों के वो निर्माता-निर्देशक बने, वो फ़िल्में थीं 'बरसात की एक रात', 'अय्याश', और 'आर-पार'। इन फ़िल्मों के अलावा उन्होने 'आमने सामने', 'मैं आवारा हूँ', 'पाले ख़ान' और 'आख़िरी बाज़ी' जैसी फ़िल्मों का निर्माण किया, तथा 'ख़्वाब', 'आवाज़', और 'अलग अलग' जैसी फ़िल्मों का निर्देशन भी किया। ९० के दशक मे 'गीतांजली' फ़िल्म के वो निर्माता-निर्देशक रहे, तथा 'आँखों में तुम हो' का निर्माण किया व 'दुश्मन' का निर्देशन किया।

शक्ति दा आज इतनी दूर चले गये हैं लेकिन जो काम वो कर गये हैं, उसकी लौ हमेशा नयी पीढ़ी को राह दिखाती रहेगी, नये फ़िल्मकारों को अच्छी फ़िल्में बनाने की प्रेरणा प्रदान करती रहेगी। दूसरे शब्दों में उनकी आराधना ज़रूर सफल होगी। चलते चलते उनकी फ़िल्म 'आनंद आश्रम' के शीर्षक गीत का मुखड़ा याद आ रहा है "सफल वही जीवन है, औरों के लिए जो अर्पण है"। शक्तिदा ने भी अपना पूरा जीवन फ़िल्म जगत को और पूरे समाज को सीख देनेवाली अच्छी अच्छी फ़िल्में देते हुए गुज़ार दिये। शक्तिदा को हिंद युग्म की तरफ़ से भावभीनी श्रद्धाजंली।

५ अंकों के इस पूरे आलेख को तैयार करने में विविध भारती के निम्नलिखित कार्यक्रमों से जानकारियाँ बटोरी गयीं:

१. युनूस ख़ान द्वारा प्रस्तुत शक्तिदा को श्रद्धांजलि - "सफल होगी तेरी आराधना"
२. कमल शर्मा से की गयी शक्तिदा की लम्बी बातचीत - "उजाले उनकी यादों के"
३. शक्तिदा द्वारा प्रस्तुत फ़ौजी भाइयों के लिए "विशेष जयमाला" कार्यक्रम


प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी
समाप्त



Friday, May 15, 2009

सफल "हुई" तेरी आराधना (भाग ४), शक्ति सामंता का मुक्कमल फ़िल्मी सफ़र

अब तक आपने पढ़ा -

आनंद आश्रम से शुरू हुआ सफ़र....

हावड़ाब्रिज से कश्मीर की कली तक...

रोमांटिक फिल्मों के दौर में आराधना की धूम...

अब आगे...

दोस्तों, शक्ति सामंत की सुरीली फ़िल्म यात्रा की एक और कड़ी के साथ हम हाज़िर हुए हैं आज। शक्तिदा के इस सुरीले सफ़र के हमसफ़र बनकर पिछली कड़ी तक हम पाँव रख चुके थे ७० के दशक में। इससे पहले कि हम शक्तिदा और राजेश खन्ना की दूसरी फ़िल्म का ज़िक्र शुरु करें, 'आराधना' के एक और गाने की शूटिंग से संबधित बात हम आपको बताना चाहेंगे। यह बात शक्तिदा ने विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में फ़ौजी भाइयों को बताया था - "मुझे याद है कि कुल्लू मनाली में राजेश खन्ना और शर्मीला टैगोर के साथ मुझे एक गाना फ़िल्माना था। वो लोग तैयार होके १० बजे के करीब लोकेशन पर पहुँचते थे और ११ बजे पूरी वादी पर अंधेरा छा जाता था। बहुत कोशिशों के बाद भी जब वो लोग ७ बजे लोकेशन पर नहीं पहुँचे तो एक दिन मैनें दोनो को सोने ही नहीं दिया और ५ बजे 'मेक-अप' कराके ७ बजे लोकेशन पर ले गया। और उसके बाद ११ - ११:३० बजे तक हम लोग शूटिंग करते रहे। उसके बाद 'पैक-अप' करके उनको छोड़ दिया। उस दिन तो वो लोग मुझसे बहुत नाराज़ हुए, दो दिन तक मुझसे बात तक नहीं की, लेकिन जब उसका रेज़ल्ट उन्होने स्क्रीन पर देखा तो दोनो ही ख़ुशी से झूम उठे। वह गीत मैं आप लोगों के सामने पेश करता हूँ।"

गीत: कोरा क़ाग़ज़ था यह मन मेरा (आराधना)


१९७० में शक्तिदा के निर्माण व निर्देशन में राजेश खन्ना एक बार फिर नज़र आये' फ़िल्म 'कटी पतंग' में। 'आराधना' की व्यापक सफलता के बाद राजेश खन्ना एक 'स्टार' बन चुके थे। 'कटी पतंग' में राजेश खन्ना की नायिका बनीं आशा पारिख। इस फ़िल्म के ज़रिए एक बार फिर शक्तिदा और राजेश खन्ना ने सफलता की ऊँचाइयों को छूआ। आनंद बक्शी और राहूल देव बर्मन की नयी नयी जोड़ी ने जैसे चारों ओर तहलका मचा दिया इस फ़िल्म के गीतों के ज़रिये। किशोर कुमार की आवाज़ भी शक्तिदा के फ़िल्मों के संपर्क में आकर एक नयी ताज़गी और जवानी के साथ सामने आयी। "प्यार दीवाना होता है मस्ताना होता है", "यह जो मोहब्बत है यह उनका है काम" और "आज न छोड़ेंगे बस हमझोली" जैसे गाने किशोरदा के सदाबहार गीतों के एल्बम मे अक्सर जगह पाते हैं। इसी फ़िल्म में एक अनोखा गीत था जो फ़िल्म की खलनायिका बिंदु पर फ़िल्माया गया था। आशा भोंसले की आवाज़ में "मेरा नाम है शबनम, प्यार से लोग मुझे शब्बो कहते हैं" अपने आप में अनूठा है, अपने जैसा एकमात्र गीत है। गीत संवाद की शक्ल में है, जिसमें बिंदु आशा पारिख को 'ब्लैक-मेल' करते हुए डराती है। सुनिए यह गीत आज बहुत दिनो के बाद!

गीत: मेरा नाम है शबनम (कटी पतंग)


'कटी पतंग' की सफलता के जश्न अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि शक्तिदा की अगली फ़िल्म 'अमर प्रेम' आ गयी १९७१ में और एक बार फिर से वही कामयाबी की कहानी दोहरायी गई। इस बार 'आराधना' की जोड़ी यानी राजेश और शर्मीला साथ आये। 'अमर प्रेम' की कहानी आधारित थी विभुति भुशण बंदोपाध्याय की उपन्यास पर। यह फ़िल्म १९७० की अरबिंदो मुखर्जी की बंगला फ़िल्म 'निशिपद्म' का हिंदी रीमेक था। एक अच्छे घर के नौजवान लड़के की एक वेश्या के प्रति पवित्र प्रेम की कहानी है 'अमर प्रेम' जो मानवीय मूल्यों और संबंधों का एक बार फिर से मूल्यांकन करने पर हमें मजबूर कर देता है। आनंद बक्शी, राहूल देव बर्मन और किशोर कुमार की अच्छी-ख़ासी तिकड़ी बन चुकी थी और इस फ़िल्म के गाने भी ऐसे गूंजे कि अब तक उनकी गूंज सुनाई देती है। तो यहाँ पर भी वही गुंजन पेश-ए-ख़िदमत है।

गीत: चिंगारी कोई भड़के तो सावन उसे बुझाये (अमर प्रेम)


'अमर प्रेम' के साथ १९७१ में शक्ति सामंत के निर्माण व निर्देशन में दूसरी फ़िल्म आयी 'जाने अंजाने'। शम्मी कपूर, विनोद खन्ना और लीना चंदावरकर अभिनीत इस फ़िल्म के संगीतकार थे शंकर जयकिशन एवं गीतकार थे हसरत जयपुरी। रंजन घोष की कहानी और व्रजेन्द्र गौड़ के संवाद थे इस फ़िल्म में। हम आपको पहले बता चुके हैं कि ये दोनो शक्तिदा के अच्छे दोस्तों में से थे। फ़िल्म की एक और ख़ास बात यह है कि इस फ़िल्म में गीतकार गुलशन बावरा और संगीतकार कानु राय ने अभिनय किया था। फ़िल्म के कम से कम तीन गाने ख़ूब चर्चित हुए थे - किशोर कुमार का गाया शीर्षक गीत "जाने अंजाने लोग मिले मिला ना कोई अपना", मन्ना डे का गाया शास्त्रीय राग पर आधारित "छम छम बाजे रे पायलिया", और लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी का गाया एक लोकप्रिय युगल गीत भी था इस फ़िल्म में, क्यों ना आज यहाँ पर सुने वही युगल गीत!

गीत: तेरी नीली नीली आँखों के दिल पे तीर चल गए (जाने अंजाने)


१९७२ में शक्ति सामंत ने बनाई फ़िल्म 'अनुराग'। विनोद मेहरा, मौसमी चटर्जी, राजेश खन्ना, नूतन और अशोक कुमार के जानदार और भावुक अभिनय से यह फ़िल्म सजी थी। फ़िल्म की कहानी दिल को छू लेनेवाली थी। नेत्रदान के विषय को बहुत ही सुंदर और असरदार तरीके से प्रस्तुत किया है शक्तिदा ने इस फ़िल्म के ज़रिए। सचिन देव बर्मन के संगीत की मिठास इस फ़िल्म के गीतों में महसूस किया जा सकता है। इनमें उन्होने बंगाल की भटियाली लोक संगीत का ऐसा मधुर फ़िल्मीकरण किया है कि लोक संगीत की मिठास भी बरकरार है और हल्के फुल्के फ़िल्मी गीत का भी रंग मौजूद है इन गानों में। ऐसा ही एक गीत लताजी की आवाज़ में पेश है यहाँ। गीतकार हैं आनंद बक्शी।

गीत: नींद चुराये चैन चुराये डाका डाले तेरी बंसी (अनुराग)


शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की एक मशहूर बंगला उपन्यास रही है 'चरित्रहीन'। १९७४ में जब निर्माता देवेश घोष ने इस कहानी पर फ़िल्म बनाने की सोची तो फ़िल्म के निर्देशक के रूप में शक्तिदा को चुना गया। संजीव कुमार, शर्मीला टैगोर एवं योगिता बाली अभिनीत इस फ़िल्म को काफ़ी सराहना मिली थी। कहानी कुछ ऐसी थी कि शर्मीला एक सीधी सादी लड़की है जो संजीव कुमार से मिलती है और दोनो को एक दूसरे से प्यार हो जाता है। लेकिन संजीव कुमार की शादी एक दूसरी लड़की योगिता बाली से हो जाती है। एक लम्बे अरसे के बाद जब संजीव शर्मीला से मिलता है तो तब तक शर्मीला एक वेश्या बन चुकी होती है। संजीव कुमार के बुरे दिनों में शर्मीला ही उसकी मदद करती है। फ़िल्म बौक्स औफ़िस पर ठीक ठाक रही। फ़िल्म के गाने लिखे आनंद बक्शी साहब ने और संगीत था राहुल देव बर्मन का। इसी साल शक्तिदा ने राजेश खन्ना और ज़ीनत अमान को लेकर अपने बैनर तले बनाई फ़िल्म 'अजनबी'। इस फ़िल्म में भी बक्शी साहब और पंचम के गीत संगीत गूंजे और बस आज तक गूंजते ही जा रहे हैं। इस फ़िल्म के एक गीत के बारे में और बक्शी-पंचम की जोड़ी के बारे में शक्तिदा ने उसी जयमाला में कहा था - "जो गीत आप लोग सुनते हैं, पसंद करते हैं, उसके पीछे कितनी मेहनत होती है वह शायद आप लोग नहीं जानते! लोग अकसर मुझसे पूछते हैं कि आप हमेशा आनंद बक्शी और आर.डी. बर्मन को ही क्यों लेते हैं? ये दोनो 'सिचुएशन' सुनने के बाद इतने घुलमिल जाते हैं कि वह गीत तैयार होकर जब हमारे सामने आता है तो सिर्फ़ गीत ही नहीं रहता, बल्कि फ़िल्म की कहानी का एक अंग बन जाता है। 'अजनबी' फ़िल्म में ज़ीनत अमान और राजेश खन्ना पर फ़िल्माये गए इस गीत में भी कुछ ऐसी ही बात है।"

गीत: हम दोनो दो प्रेमी दुनिया छोड़ चले (अजनबी)


दोस्तों, शक्ति सामंत की फ़िल्मी यात्रा इतनी लम्बी है कि हम उनके फ़िल्मों और उनके मधुर गीत संगीत में ग़ोते लगाते हुए बस बहते ही चले जा रहे हैं पिछले कुछ हफ़्तों से। शक्तिदा के फ़िल्मी सफ़र की कहानी जारी रहेगी अगले अंक में भी। बने रहिए 'हिंदयुग्म' पर 'आवाज़' के साथ!

प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी

Friday, April 24, 2009

सफल "हुई" तेरी अराधना...शक्ति सामंत पर विशेष (भाग 3)

दोस्तों, शक्ति सामंत के फ़िल्मी सफ़र को तय करते हुए पिछली कड़ी में हम पहुँच गए थे सन् १९६५ में जिस साल आयी थी उनकी बेहद कामयाब फ़िल्म 'कश्मीर की कली'। आज हम उनके सुरीले सफ़र की यह दास्तान शुरु कर रहे हैं सन् १९६६ की फ़िल्म 'सावन की घटा' के एक गीत से। इस फ़िल्म का निर्माण और निर्देशन, दोनो ही शक्तिदा ने किया था और इस फ़िल्म में भी नय्यर साहब का ही संगीत था।

गीत: आज कोई प्यार से दिल की बातें कह गया (सावन की घटा)


"आज कोई प्यार से दिल की बातें कह गया, मैं तो आगे बढ़ गयी पीछे ज़माना रह गया"। एस. एच. बिहारी के लिखे इस गीत के बोल जैसे शक्तिदा को ही समर्पित थे। 'हावड़ा ब्रिज', 'चायना टाउन', और 'कश्मीर की कली' जैसी 'हिट' फ़िल्मों के बाद इसमें कोई शक़ नहीं रहा कि शक्तिदा फ़िल्म जगत में बहुत ऊपर पहुँच चुके थे। उनका नाम भी बड़े बड़े फ़िल्म निर्माता और निर्देशकों की सूची में शामिल हो गया। और साल दर साल उनकी प्रतिभा और सफलता साथ साथ परवान चढ़ती चली गयी। 'सावन की घटा' के अगले ही साल, यानी कि १९६७ में एक और मशहूर फ़िल्म आयी 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' जिसके गीत संगीत ने तो हंगामा मचा दिया। शम्मी कपूर, शंकर जयकिशन और मोहम्मद रफ़ी की तिकड़ी पहले से ही लोकप्रियता के चरम शिखर पर पहुँच चुकी थी। इस फ़िल्म ने उनकी मुकुट पर एक और चमकता हीरा जड़ दिया। शक्तिदा किसी विदेशी शहर को आधार बनाकर एक फ़िल्म बनाना चाहते थे। उनके अनुसार उस ज़माने में पैरिस को लेकर लोगों में बहुत ज़्यादा दिलचस्पी थी और यूरोप के सबसे ख़ास शहर के रूप में भारतीय इसे मानते थे। इसलिए इस फ़िल्म के लिए पैरिस को ही चुना गया। उन्होने यह भी कहा था कि इस फ़िल्म की कहानी में कोई ख़ास बात नहीं थी, फ़िल्म चली अपने किस्मत के बलबूते। फ़िल्म के गीतों के लिए पैरिस से ही नर्तकियों को लिया गया था। एक फ़्रेंच निर्माता ने जब यह फ़िल्म देखी तो उन्होने शक्तिदा से अनुरोध किया कि वो उन्हे इस फ़िल्म के कुछ दृश्य उनकी अपनी फ़िल्म में इस्तेमाल करने की अनुमती दे दें। 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' के शूटिंग से जुड़ा एक मज़ेदार क़िस्सा शक्तिदा ने फ़ौजी भाइयों के लिए प्रसारित विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में बताया था। हुआ यूँ कि वो लोग पैरिस में फ़िल्म की शूटिंग कर रहे थे। उन दिनो 'जंगली' और 'संगम' के गानें पूरी दुनिया में धूम मचा रहे थे। एक दिन शक्तिदा, जयकिशन और शम्मी कपूर एक 'रेस्तोराँ' में बैठे हुए थे कि अचानक कुछ लोगों ने उन्हे घेर लिया और तब तक नहीं छोड़ा जब तक कि जयकिशन और शम्मी कपूर ने उनको "आइ आइ या करूँ मैं क्या सुकू सुकू" गाना नहीं सुनाया। 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' के जिस गाने को वो उन दिनों फ़िल्मा रहे थे वह गाना था यह...

गीत: आसमान से आया फ़रिश्ता (ऐन ईवनिंग इन पैरिस)


साल १९६९। उस समय राजेश खन्ना राजेश खन्ना नहीं बने थे। उन्होने कुछ दो तीन फ़िल्मों में काम किया था, लेकिन वो फ़िल्में बहुत ज़्यादा मशहूर नहीं हो पायी थी। जब 'आराधना' की कहानी शक्तिदा के दिमाग़ में आयी, तो उन्हे लगा कि इस कहानी पर एक सफ़ल फ़िल्म तभी बनायी जा सकती है अगर नायक की भूमिका में कोई नया अभिनेता हो। उन्होने राजेश खन्ना का अभिनय देख रखा था और उन्हे उनका अभिनय काफ़ी पसंद भी आया था। जब उन्होने राजेश खन्ना से 'आराधना' में काम करने की बात की तो पहले पहले तो वो ज़्यादा ख़ुश नहीं हुए क्योंकि उनका किरदार 'इंटर्वल' से पहले ही मर जाता है और उनका डबल रोल काफ़ी देर बाद शुरु होता है। उन्हे लगा कि यह नायिका प्रधान फ़िल्म है जो उन्हे कामयाबी नहीं दिला सकती। लेकिन शक्तिदा ने उन्हे हर तरीके से समझाया, यहाँ तक कहा कि अगर फ़िल्म नाकामयाब भी होती है तो भी उन्हे उनके पूरे पैसे मिल जाएंगे। आख़िरकार राजेश खन्ना राज़ी हो गए और फ़िल्म का निर्माण शुरु हो गया। शक्तिदा ने बहुत ही कम बजट में यह फ़िल्म बना डाली और जब फ़िल्म प्रदर्शित हुई तो वो लखपति बन गए। 'आराधना' मुंबई के 'बांद्रा टाकीज़' में रिलीज़ हुई थी। मद्रास के एक सिनेमाघर में यह फ़िल्म लगातार दो साल तक चली। इस फ़िल्म ने राजेश खन्ना के रूप में फ़िल्म जगत को दिया उसका पहला 'सुपर स्टार'। शर्मिला टैगोर के स्टाइल को भी उस युग की युवतियों ने गले लगाया। और इसी फ़िल्म से शुरुआत हुई राजेश खन्ना, आनंद बख्शी, सचिन देव बर्मन और किशोर कुमार के टीम की।

गीत: मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू (आराधना)


'आराधना' की बातें इतनी ज़्यादा हैं दोस्तों कि केवल एक गीत सुनवाकर हम आगे नहीं बढ़ सकते, भले ही एक और अंक हमें बढ़ाने पड़ जाए। तो हुआ यूँ कि शुरुआत में यह तय हुआ था कि रफ़ी साहब बनेंगे राजेश खन्ना की आवाज़। लेकिन उन दिनो रफ़ी साहब एक लम्बी विदेश यात्रा पर गए हुए थे। इसलिए शक्तिदा ने किशोर कुमार का नाम सुझाया। उन दिनो किशोर देव आनंद के लिए गाया करते थे, इसलिए सचिनदा पूरी तरह से शंका-मुक्त नहीं थे कि किशोर गाने के लिए राज़ी हो जाएंगे। शक्तिदा ने किशोर को फ़ोन किया, जो उन दिनों उनके दोस्त बन चुके थे बड़े भाई अशोक कुमार के ज़रिए। किशोर ने जब गाने से इनकार कर दिया तो शक्तिदा ने कहा, "नखरे क्यूँ कर रहा है, हो सकता है कि यह तुम्हारे लिए कुछ अच्छा हो जाए"। आख़िर में किशोर राज़ी हो गए। शुरु शुरु में सचिनदा बतौर गीतकार शैलेन्द्र को लेना चाह रहे थे, लेकिन यहाँ भी शक्तिदा ने सुझाव दिया कि क्यूँ ना सचिनदा की जोड़ी उभरते गीतकार आनंद बख्शी के साथ बनाई जाए। और यहाँ भी उनका सुझाव रंग लाया। जब तक रफ़ी साहब अपनी विदेश यात्रा से लौटते, इस फ़िल्म के करीब करीब सभी गाने रिकार्ड हो चुके थे सिवाय दो गीतों के, जिन्हे फिर रफ़ी साहब ने गाया। इनमें से एक गीत का संगीत राहुल देव बर्मन ने तैयार किया था क्युंकि सचिनदा की तबीयत उन दिनों कुछ ठीक नहीं चल रही थी। तो क्यूँ ना यहाँ पर वही गीत सुन लिया जाए!

गीत: बाग़ों में बहार है (आराधना)


'आराधना' में किशोर कुमार का गाया "रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना" उस ज़माने के लिहाज़ से काफ़ी 'बोल्ड' गीत था। सचिनदा ने इस गीत के लिए पहले जो धुन बनाई थी, उसमें किशोर कुमार को कुछ कमी सी लग रही थी, यानी कि जिस नशीले अंदाज़ की ज़रूरत थी वह नहीं आ पा रही थी। तब किशोरदा ने ही इसकी धुन को थोड़ा सा 'मॊर्डन' बना दिया जो बर्मन दादा को भी पसंद आया। अब बारी थी इस गाने के फ़िल्मांकन की। शक्तिदा साधारणतः अपने फ़िल्मों के रिकार्ड किए हुए गाने रात के वक़्त सुना करते थे और उनके फ़िल्मांकन के बारे में योजनाएँ बनाया करते थे। इस गीत के लिए उनके दिमाग़ में एक ख्याल आया कि क्यूँ ना इस गीत को एक ही 'शौट' में फ़िल्माया जाए! उन्होने एक काग़ज़ का पन्ना लिया और उस पर तीन अक्षर लिखे - ए, बी, सी। 'ए' नायक के लिए, 'बी' नायिका के लिए, और 'सी' कैमरे के लिए। और इस तरह से वो अपने मन ही मन में गाने का पूरा फ़िल्मांकन क़ैद कर लिया। उन्होने एक गोलाकार 'ट्राली' का इंतज़ाम किया और फ़िल्मालय स्टुडियो में इस गीत को फ़िल्मा लिया गया। शुरु शुरु में कई लोगों ने उनके इस एक शौट वाले विचार का विरोध किया था। किसी ने यहाँ तक कहा भी था कि "इसका दिमाग़ ख़राब हो गया है जो इतना अच्छा गाना एक ही शौट में ले रहा है"। उस समय सभी के सवालों का शक्तिदा ने एक ही जवाब दिया था कि "जब रात को गाना सुन रहा था तो समझ ही नहीं आया कि कहाँ 'कट' करूँ"। और इस तरह से यह गीत हिंदी फ़िल्म जगत का पहला गाना बन गया जिसे केवल एक ही शौट में फ़िल्माया गया था। तो चलिए हम भी इस गीत की मादकता और नशीलेपन का आनंद उठाते हैं।

गीत: रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना (आराधना)


'आराधना' की कामयाबी सिर्फ़ शक्ति सामंत की कामयाबी नहीं थी, बल्कि राजेश खन्ना, शर्मिला टैगोर, आनंद बख्शी, किशोर कुमार जैसे तमाम कलाकारों के लिए यह फ़िल्म यादगार साबित हुई। इस फ़िल्म की कामयाबी के झंडे को लहराते हुए शक्तिदा ने प्रवेश किया ७० के दशक में। १९७० में उनके निर्देशन में फ़िल्म आयी 'पगला कहीं का'। निर्माता थे अजीत चक्रवर्ती। शम्मी कपूर और आशा पारेख अभिनीत इस फ़िल्म में शंकर जयकिशन ने एक बार फिर से 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' की तरह अपने सुरीले संगीत के जलवे बिखेरे हसरत जयपुरी के लिखे और लता मंगेशकर, आशा भोसले, मोहम्मद रफ़ी और मन्ना डे के गाए गीतों के ज़रिए। इस फ़िल्म का एक गीत ऐसा था जो हमें कभी उसे भुलाने नहीं देता। आप समझ गए होंगे कि हमारा इशारा किस तरफ़ है, जी हाँ, लताजी और रफ़ी साहब का गाया 'डबल वर्ज़न' गीत "तुम मुझे युँ भुला ना पायोगे"।

गीत: तुम मुझे युं भुला ना पायोगे (पगला कहीं का)


"तुम मुझे युँ भुला ना पायोगे, जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे संग संग तुम भी गुनगुनायोगे"। इसमें कोई शक़ नहीं कि शक्तिदा के फ़िल्मों के गीतों को आज भी लोग बड़े प्यार से गुनगुनाते हैं, याद करते हैं। रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में यही गानें तो हैं जो हमारे सुख दुख के साथी हैं। ना कभी हम इन गीतों को भुला सकते हैं और ना ही इन गानों और इनके फ़िल्मों से जुड़े कलाकारों को। और शायद यही वजह है कि आज हम 'आवाज़' के इस मंच पर शक्ति सामंत को याद कर रहे हैं, उन्हे श्रद्धांजली अर्पित कर रहे हैं। पहले हमने सोचा था कि इस श्रद्धांजली को हम चार भागों में पोस्ट करेंगे, लेकिन शक्तिदा के फ़िल्मों की सूची इतनी लम्बी है और इन फ़िल्मों के गाने इतने प्यारे हैं कि हम बड़ी मुशकिल में पड़ गए कि किस फ़िल्म को छोड़ें, और किस फ़िल्म का ज़िक्र करें। इसलिए हमने तय किया है कि हम इस श्रद्धांजली को तब तक जारी रखेंगे जब तक शक्तिदा के सभी फ़िल्मों का ज़िक्र हम इत्मीनान से कर नहीं लेते। चौथे भाग के साथ हम बहुत जल्द वापस आयेंगे, तब तक पढ़ते रहिए और सुनते रहिए 'आवाज़'।

प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी

Saturday, April 11, 2009

सफल 'हुई' तेरी आराधना...शक्ति सामंत पर विशेष (भाग 1)


ज़िन्दगी की आख़िरी सच्चाई है मृत्यु। जो भी इस धरती पर आता है, उसे एक न एक दिन इस फ़ानी दुनिया को छोड़ कर जाना ही पड़ता है। लेकिन कुछ लोग यहाँ से जा कर भी नहीं जाते, हमारे दिलों में बसे रहते हैं, हमेशा हमेशा के लिए, और जिनकी यादें हमें रह रह कर याद आती हैं। अपनी कला और प्रतिभा के ज़रिये ऐसे लोग कुछ ऐसा अमिट छाप छोड़ जाते हैं इस दुनिया में कि जो मिटाये नहीं मिट सकते। उनका यश इतना अपार होता है कि सूरज चाँद की तरह जिनकी रोशनी युगों युगों तक, बल्कि अनंतकाल तक प्रकाशमान रहती है। ऐसे ही एक महान कलाकार, फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध निर्माता एवं निर्देशक शक्ति सामंत अब हमारे बीच नहीं रहे। गत ९ अप्रैल को मुंबई में ८३ वर्ष की आयु में उन्होने इस दुनिया-ए-फ़ानी को अलविदा कह कर अपनी अनंत यात्रा पर चले गये। लेकिन वो हमेशा जीवंत रहेंगे, हमारे दिलों में सदा राज करेंगे अपनी अनगिनत मशहूर फ़िल्मों और उन 'हिट' फ़िल्मों के सुमधुर गीतों के ज़रिये। मेरी तरफ़ से, 'आवाज़' की तरफ़ से, और 'आवाज़' के सभी पाठकों तथा श्रोताओं की तरफ़ से स्वर्गीय शक्ति सामंत को हम श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं।

गीत: सारा प्यार तुम्हारा मैने बांध लिया है आँचल में (आनंद आश्रम)


शक्ति सामंत का जन्म बंगाल के बर्धमान में हुआ था। उनके पिता एक इंजिनीयर थे जिनकी एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उस वक़्त शक्तिजी केवल डेढ़ साल के थे। पढ़ाई के लिए उन्हे उत्तर प्रदेश के बदायुँ में उनके चाचा के पास भेज दिया गया। देहरादून से अपनी 'इंटरमिडीयट' पास करने के बाद उन्होने कलकत्ते जाकर 'इंजिनीयरिंग एंट्रान्स' की परीक्षा दी और अव्वल भी आये। लेकिन जब वो भर्ती के लिए गये तो उन्हे यह कह कर वापस कर दिया गया कि वह परीक्षा केवल बंगाल, बिहार और ओड़िसा के छात्रों के लिए थी और वो यु.पी से आये हुए थे। दुर्भाग्य यहीं पे ख़तम नहीं हुई। जब वो वापस यु.पी गये तो वहाँ पर सभी कालेजों में भर्ती की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी थी। उनका एक साल बिना किसी वजह के बरबाद हो गया। उनके चाचा के कहने पर शक्ति उनके साथ उनके काम में हाथ बँटाने लग गये। साथ ही साथ वो थियटर और ड्रामा के अपने शौक को भी पूरा करते रहे। एक रात जब वो थियटर के रिहर्सल से घर देर से लौटे तो उनके चाचा ने उन्हे कुछ भला बुरा सुनाया। उन्हे उनका वह बर्ताव पसंद नहीं आया और उन्होने अपने चाचा का घर हमेशा के लिए छोड़ दिया।

गीत: काहे को रोये चाहे जो होये सफल होगी तेरी आरधना (आराधना)


अपने चाचा के घर से निकलने के बाद शक्ति मुंबई के आस-पास काम की तलाश कर रहे थे क्युंकि उन्हे पता था कि उनका अंतिम मुक़ाम यह कला-नगरी ही है। उन्हे दापोली में एक 'ऐंग्लो हाई स्कूल' में नौकरी मिल गई। यहाँ से मुंबई स्टीमर से एक घंटे में पहुँची जा सकती थी। उस स्कूल के छात्र ज़्यादातर अफ़्रीकन मुस्लिम थे और २३-२४ साल की आयु के थे, जब कि वो ख़ुद २१ साल के थे। शक्ति ने देखा कि स्कूल में छात्रों की चहुँमुखी विकास के लिए साज़-ओ-सामान का बड़ा अभाव है। उन्होने स्कूल के प्रिन्सिपल से इस बात का ज़िक्र किया और छात्रों के लिए खेल-कूद के कई चीज़ें खरीदवाये। छात्र शक्ति के इस अंदाज़ से मुतासिर हुए और उनके अच्छे दोस्त बन गये। अपने चाचा के साथ काम करते हुए शक्ति को महीने के ३००० रुपय मिलते थे, जब कि यहाँ उन्हे केवल १३० रुपय मिलते। उसमे से ३० रुपय खर्च होते और १०० रुपय वो बचा लेते। फ़िल्म जगत में कुछ करने की उनकी दिली तमन्ना उन्हे हर शुक्रवार मुंबई खींच ले जाती। शुक्रवार शाम को वो स्टीमर से मुंबई जाते, वहाँ पर काम ढ़ूंढ़ते और फिर सोमवार की सुबह वापस आ जाते। वो कई फ़िल्म निर्मातायों से मिले, लेकिन वह राजनैतिक हलचल का समय था। देश के बँटवारे के बाद बहुत सारे कलाकार पाक़िस्तान चले गये थे। फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए बुरा वक़्त चल रहा था। शक्ति अंत में जाकर दादामुनि अशोक कुमार से मिले, जो उनके पसंदीदा अभिनेता भी थे, और जो उन दिनो 'बॊम्बे टॊकीज़' से जुड़े हुए थे। दादामुनि ने उन्हे इस शर्त पर सहायक निर्देशक के तौर पर 'बॊम्बे टॊकीज़' में रख लिया कि उन्हे कोई तनख्वाह नहीं मिलेगी, सिवाय दोपहर के खाने और चाय के। शक्ति राज़ी हो गये। यु.पी में रहने की वजह से उनकी हिंदी काफ़ी अच्छी थी। इसलिए वहाँ पर फनी मजुमदार के बंगला में लिखे चीज़ों को वो हिंदी में अनुवाद किया करते। इस काम के लिए उन्हे पैसे ज़रूर दिये गये। कुछ दिनो के बाद शक्ति ने अशोक कुमार से अपने दिल की बात कही कि वो मुंबई दरसल अभिनेता बनने आये हैं। पर उनकी प्रतिभा और व्यक्तित्व को समझकर दादामुनि ने उनसे अभिनय में नहीं बल्कि फ़िल्म निर्माण के तक़नीकी क्षेत्र में हाथ आज़माने के लिए कहा। दोस्तों, क्या आप जानते हैं कि शक्ति सामंत ने सबसे पहली बार किस फ़िल्म की 'शूटिंग' देखी थी? वह एक गाना था फ़िल्म 'मशाल' का। जब उन्होने देखा कि एक तांगे को एक टेबल के उपर स्थिर रखा गया है और 'फ़्रेम' में सिर्फ़ घूमते हुए पहिये को दिखाया जा रहा है तो उन्हे बड़ी हैरत हुई। क्या आप सुनना नहीं चाहेंगे इस गीत को? सुनिये मन्न डे की आवाज़ में "ऊपर गगन विशाल" इसी फिल्म मशाल से.

गीत: ऊपर गगन विशाल (मशाल)


अभिनय करने कि चाहत अभी पूरी तरह से बुझी नहीं थी शक्ति सामंत के दिल में। वो फ़िल्मों में छोटे-मोटे रोल निभाकर इस शौक को पूरा कर लेते थे। उनके अनुसार उन्हे हर फ़िल्म में पुलिस इंस्पेक्टर का रोल दे दिया जाता था और एक ही संवाद हर फ़िल्म में उन्हे कहना पड़ता कि "फ़ॊलो कार नम्बर फ़लाना, इंस्पेक्टर फ़लाना स्पीकींग"। फ़िल्म जगत से जुड़े रहने की वजह से कई बड़ी हस्तियों से उनकी जान-पहचान होने लगी थी। दो ऐसे बड़े लोग थे गुरु दत्त और लेखक ब्रजेन्द्र गौड़। गौड़ साहब को फ़िल्म 'कस्तुरी' निर्देशित करने का न्योता मिला, लेकिन किसी दूसरी कंपनी की फ़िल्म में व्यस्त रहने की वजह से इस दायित्व को वो ठीक तरह से निभा नहीं पा रहे थे। इसलिए उन्होने शक्ति सामंत से उन्हे इस फ़िल्म मे उनकी मदद करने को कहा। सामंत साहब ने इस काम के २५० रुपय लिए थे। किसी फ़िल्म से यह उनकी पहली कमाई थी। 'कस्तुरी' १९५४ की फ़िल्म थी जिसमें संगीत था पंकज मल्लिक का। शक्ति सामंत की कहानी को आगे बढ़ाने से पहले आइए सुनते चलें इसी फ़िल्म का एक गीत पंकज मल्लिक की आवाज़ में जिसे ब्रजेन्द्र गौड़ ने ही लिखा था।

गीत: काहे हुआ नादान मनवा (कस्तुरी)


गीतकार और निर्माता एस. एच. बिहारी तथा लेखक दरोगाजी 'इंस्पेक्टर' नामक फ़िल्म के निर्माण के बारे में सोच रहे थे। फ़िल्म को 'प्रोड्यूस' करवाने के लिए वो लोग नाडियाडवाला के पास जा पहुँचे। नाडियाडवाला ने कहा कि इस कहानी पर सफल फ़िल्म बनाने के लिए मशहूर और महँगे अभिनेतायों जैसे कि अशोक कुमार, प्राण वगैरह को लेना पड़ेगा। बजट का संतुलन बिगड़ न जाये इसलिए उन लोगों ने इस फ़िल्म के लिए किसी नये निर्देशक को नियुक्त करने की सोची ताकी निर्देशक के लिए ज़्यादा पैसे न खर्चने पड़े। और इस तरह से शक्ति सामंत ने अपनी पहली फ़िल्म 'इंस्पेक्टर' का निर्देशन किया जो रिलीज़ हुई सन १९५६ में पुष्पा पिक्चर्स के बैनर तले। फ़िल्म 'हिट' रही और इस फ़िल्म के बाद उन्हे फिर कभी पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। इस फ़िल्म के गाने भी ख़ासा पसंद किये गये। इस फ़िल्म के संगीतकार थे हेमन्त कुमार। उन्ही की आवाज़ में इस फ़िल्म का एक सदाबहार नग्मा यहाँ पर पेश है - "दिल छेड़ कोई ऐसा नग़मा जिसे सुन ज़माना खो जाये, ये आह मेरी दुनिया के लिये सपनों का तराना हो जाये"। इस गीत का एक एक शब्द जैसे शक्ति सामंत के लिए ही उस वक़्त लिखी गई थी। उनकी फ़िल्मों को देख कर ज़माना उनमें आज भी खो जाता हैं, उनकी फ़िल्मों के मधुर गीतों में आज भी अपने दिल का कोई तराना ढ़ूंढ़ते हैं लोग।

गीत: दिल छेड़ कोई ऐसा नग्मा (इंस्पेक्टर)


शक्ति सामंत ने काम तो पहले 'इंस्पेक्टर' का ही शुरु किया था लेकिन उनकी दूसरी फ़िल्म 'बहू' पहले प्रदर्शित हो गई। साल था १९५५। करण दीवान और उषा किरण अभिनीत इस फ़िल्म के संगीतकार भी हेमन्त कुमार ही थे। तलत महमूद और गीता दत्त की आवाज़ों में इस फ़िल्म का एक युगलगीत आपको सुनवाये बग़ैर मैं आगे नहीं बढ़ सकता क्युंकि यह गीत इतना ख़ूबसूरत है कि एक बहुत लम्बे अरसे के बाद इस गीत को सुनने का मौका आप भी छोड़ना नहीं चाहेंगे।

गीत: ठंडी हवाओं में तारों की छायों में आज बलम मेरा डोले जिया (बहू)


'बहू' और 'इंस्पेक्टर' में शक्ति सामंत के निर्देशन की काफ़ी प्रशंसा हुई और वो सही माईने मे दुनिया के नज़र में आये। पुष्पा पिक्चर्स ने 'इंस्पेक्टर' की कामयाबी से ख़ुश होकर शक्ति सामंत को अपनी अगली फ़िल्म 'हिल स्टेशन' को निर्देशित करने का फिर एक बार मौका दिया। इस फ़िल्म में मुख्य कलाकार थे प्रदीप कुमार और बीना राय। और एक बार फिर हेमन्त कुमार का संगीत। १९५७ की इस फ़िल्म का एक बहुत ही मीठा, बहुत ही सुरीला गीत गाया था लता मंगेशकर और हेमन्त कुमार ने। सुनते चलिये इस गीत को।

गीत: नयी मंज़िल नयी राहें नया है महरबान अपना (हिल स्टेशन)


"नयी मंज़िल नयी राहें नया है मेहरबान अपना, न जाने जाके ठहरेगा कहाँ यह कारवाँ अपना", दोस्तों, शक्ति सामंत के जीवन का कारवाँ तो ठहर गया है हमेशा हमेशा के लिए, लेकिन जैसा कि शुरु में ही मैने कहा था कि कला और कलाकार कभी नहीं मरते, कला कालजयी होता है, वक्त उसको छू भी नहीं सकता। शक्ति सामंत की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है दोस्तों, बहुत जल्द इस लेख और शक्ति-दा के फ़िल्मों के कुछ और सुमधुर गीतों के साथ हम फिर वापस आयेंगे।


(पढ़िए-सुनिए इस संगीतमयी आलेखमाला की दूसरी किस्त)


प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी

Wednesday, March 11, 2009

सुनिए सपन चक्रवर्ती की आवाज़ में एक दुर्लभ होली गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 20
होली विशेषांक
वाज़ के आप सभी पाठकों और श्रोताओं को रंगों के इस त्यौहार होली पर हमारी ओर से बहुत बहुत शुभकामनाएँ. होली का यह त्यौहार आपके जीवन को और रंगीन बनाए, आपके सभी सात रंगोंवाले सपने पूरे हों, ऐसी हम कामना करते हैं. दोस्तों, हिन्दी फिल्मों में जब भी कभी होली की 'सिचुयेशन' आयी है, तो फिल्मकारों ने उन उन मौकों पर अच्छे अच्छे से होली गीत बनाने की कोशिश की है और उनका फ़िल्मांकन भी बडे रंगीन तरीके से किया है. या यूँ कहिए की हिन्दी फिल्मी गीतों में होली पर बेहद खूबसूरत खूबसूरत गाने बने हैं जिन्हे होली के दिन सुने बिना यह त्यौहार अधूरा सा लगता है. और आज होली के दिन 'ओल्ड इस गोल्ड' में अगर हम कोई होली गीत ना सुनवाएँ तो शायद आप में से कई श्रोताओं को हमारा यह अंदाज़ अच्छा ना लगे. इसलिए आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में पेश है होली की हुडदंग. यूँ तो होली पर बने फिल्मी गीतों की कोई कमी नहीं है, एक से एक 'हिट' होली गीत हमारे पास हैं, लेकिन 'ओल्ड इस गोल्ड' की यह रवायत है की हम उसमें ऐसे गीत शामिल करते हैं जो कुछ अलग "हट्के" हो, थोडे अनोखे हो, कोई अलग बात हो. इसलिए हमने जो होली गीत चुना है वो ना तो फिल्म "शोले" का है और ना ही फिल्म "पराया धन" का, ना वो "मदर इंडिया" का है, और ना ही "मशाल" का. यह गीत है 1976 में बनी फिल्म "बालिका वधु" का. इससे पहले की इस गीत से संबंधित कुछ बातें आपको बताएँ, क्यूँ ना थोड़ी देर के लिए हिन्दी फिल्मों में होली गीतों के इतिहास में झाँक लिया जाए! 30 के दशक में फिल्मी होली गीतों के बारे में तो मैं कुछ ढूँढ नहीं पाया, लेकिन क्योंकि उस वक़्त ठुमरी का काफ़ी चलन था फिल्म संगीत में और ठुमरी का अर्थ ही है कृष्ण से संबंधित गीत, तो ज़ाहिर है की ठुमरी के रूप में ज़रूर होली गीत भी रहे होंगे. जो सबसे पुराना होली गीत मुझे प्राप्त हुआ वो है 1940 की फिल्म "होली" में ए आर ओझा और सितारा का गाया "फागुन की रुत आई रे", जिसके संगीतकार थे खेमचंद प्रकाश. और फिर लता मंगेशकर का पहला गाना "पा लागूँ कर ज़ोरी रे, श्याम मोसे ना खेलो होरी" भी तो एक होली गीत था, फिल्म "आप की सेवा में", जो आई थी 1947 में. 1950 की फिल्म "जोगन" में गीता रॉय ने बहुत सारे मीरा भजन गाये, साथ ही साथ पंडित इंद्रा के लिखे दो होरी गीत भी गाये जिनके बोल थे “चंदा खेले आँख मिचोली बदली से नदी किनारे, दुल्हन खेले फागुन होली पिया करो ना हमसे ठिठोली” और “डारो रे रंग डारो रे रसिया फागुन के दिन आए रे”. गीता रॉय की ही आवाज़ में 1953 की फिल्म "लाडली" में एक होली गीत था “बाट चलत नयी चुनरी रंग डारी, हे तोहे बेदर्दी बनवारी”. और फिर 1957 में "मदर इंडिया" में शक़ील बदयुनीं ने लिखा “होली आई रे कन्हाई रंग छलके सुना दे ज़रा बाँसुरी”. यह गीत बेहद मशहूर हो गया और इसके बाद तो जैसे फिल्मों में होली गीतों का तांता लग गया.

तो इतनी जानकारी के बाद अब हम वापस आते हैं बालिका वधु फिल्म के होली गीत पर. शक्ति सामंता ने इस फिल्म का निर्माण किया था इसी नाम से लिखी गयी शरतचंद्रा चट्टोपाध्याय की प्रसिद्ध बांग्ला उपन्यास के आधार पर. तरु मजूमदार निर्देशित इस फिल्म के मुख्य कलाकार थे सचिन और रजनी शर्मा. गाने लिखे आनंद बक्शी ने और संगीतकार थे राहुल देव बर्मन. इस फिल्म में आशा भोंसले, मोहम्मद रफी, किशोर कुमार,अमित कुमार और चंद्राणी मुखेर्जी ने तो गीत गाए ही थे, ख़ास बात यह है कि इस फिल्म में आनंद बक्शी,राहुल देव बर्मन और उनके सहायक सपन चक्रवर्ती ने भी गाने गाए, और वो भी अलग अलग एकल गीत. प्रस्तुत होली गीत सपन चक्रवर्ती और साथियों की आवाज़ों में है. राहुल देव बर्मन अगर चाहते तो किसी भी नामी गायक से इस गीत को गवा सकते थे. लेकिन उन्हे लगा कि गाँव की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म के होली गीत के गायक की आवाज़ कुछ ऐसी अलग होनी चाहिए, एक ऐसी आवाज़ जो धरती के बहुत करीब लगे, लोक संगीत और ख़ास कर होली पर गाए जानेवाले लोकसंगीत के गायक की तरह लगे. बस, पंचम दा ने अपने सहायक और गायक सपन चक्रवर्ती से यह गीत गवा लिया और सचमुच उन्होने जैसा सोचा था, सपन चक्रवर्ती की आवाज़ ने बिल्कुल वैसा ही जादू कर डाला इस गीत में. आज भले ही यह गीत दूसरे होली गीतों की तुलना में बहुत ज़्यादा सुनाई ना दे, लेकिन होली पर बना यह एक अनूठा फिल्मी गीत है, और हमें पूरा यकीन है कि हमारी यह पसंद आपकी भी पसंद होगी. तो सुनिए "आओ रे आओ खेलो होली बिरज में".



गीत सुनकर मस्ती छा गयी होगी...है न...भाई अब होली हो और कोई छेड़खानी या मस्ती न हो तो क्या है मज़ा. "ओल्ड इस गोल्ड" के तेंदुलकर की उपाधि से सम्मानित हमारे प्रिय मनु "बे-तक्ख्ल्लुस" जी लाये हैं कुछ कार्टूनों के गुलाल और गुब्बारे. चलिए तैयार हो जाईये भाई....होली है....

पहला गुब्बारा आपके लिए है "तन्हा" जी


नीलम जी आप कहाँ जा रही हैं बच के


अरे भाई इन्होने तो मुझे भी नहीं छोडा


सुजॉय आप कहाँ छुपे बैठे हैं रंग जाईये आज आप भी इस रंग में



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. दिलीप कुमार और नलनी जयवंत पर फिल्मांकित है ये गीत.
२. टीम है शैलेन्द्र, शंकर जयकिशन, लता और तलत की.
३. गीत में शब्द युगल है - "फूल खिले".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
उज्जवल जी, आचार्य जी और मनु जी...गलत जवाब....दूसरा सूत्र देखिये...कटी पतंग नाम का कोई धरावाहिक नहीं आता :). चलिए होली में सब माफ़ है.ये होली गीत कैसा लगा अवश्य बताईयेगा.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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