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Thursday, August 6, 2009

गाइए लता का गीत और बनिए आवाज़ का नया सुर-तारा - नया आग़ाज़

कैरिऑकि ट्रैक पर अपना हुनर दिखाने का सुनहर मौका

हममें से ऐसे बहुत होंगे जिनको बचपन से ही गाने का शौक रहा होगा। घूमते वक़्त- नहाते वक़्त या कहीं यात्रा करते वक़्त अपने सुकूँ के क्षणों में फिल्मी गीतों की पंक्तियाँ हम सभी की ज़ुबान पर ज़रूर तैरी होंगी। बहुत से लोगों ने अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों में संगीत के साथ यानी कैरिऑके ट्रैक पर अपनी गायक-कला का लोहा भी ज़रुर मनवाया होगा। हम ऐसे ही गायकों को इससे भी आगे एक और मंच दे रहे हैं। हिन्द-युग्म आज से एक नई प्रतियोगिता 'आवाज़ सुर-तारा' का आग़ाज़ कर रहा है, जिसके माध्यम से शौकिया तौर पर गाने वालों को भी एक मंच मिलेगा। यह आयोजन प्रतिमाह किया जायेगा और नग़द इनाम भी दिया जायेगा। इस आयोजन में हम किसी चर्चित हिन्दी फिल्मी गीत के कैरिऑकि (Kara-oke) ट्रैक पर गायकों से गाने को कहेंगे, सबसे बढ़िया प्रविष्टि को माह का 'आवाज़ सुर-तारा' घोषित किया जायेगा और रु 1000 का नग़द इनाम दिया जायेगा। गौरतलब है कि आवाज़ के इसी मंच पर मई माह से प्रत्येक माह महान कवियों की कविताओं को संगीतबद्ध करने की प्रतियोगिता 'गीतकास्ट' का आयोजन किया जा रहा है।

'आवाज़ सुर-तारा' प्रतियोगिता में हमें अधिकाधिक इनपुट आवाज़ की दैनिक पाठिका स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा' की ओर से मिल रहा है। हमारे स्थाई श्रोताओं को मालूम है कि हिन्द-युग्म अक्टूबर 2007 से इंटरनेट के माध्यम से गीतों को कम्पोज करने की प्रतियोगिता करता आ रहा है। विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली 2008 में हिन्द-युग्म अपना पहला एल्बम भी ज़ारी कर चुका है। 2008 का संगीतबद्ध सत्र बहुत सफल रहा, जिसमें हिन्द-युग्म ने 4 जुलाई 2008 से 31 दिसम्बर 2008 तक प्रत्येक शुक्रवार को एक संगीतबद्ध गीत का विश्वव्यापी उद्‍घाटन किया।

हिन्द-युग्म के पास गायकों-संगीतकारों-गीतकारों की अच्छी फ़ौज़ है, लेकिन हम इसमें लगातार बढोत्तरी के आकांक्षी हैं, इसलिए हम इस प्रतियोगिता के माध्यम से भी नये गायकों की अपनी खोज ज़ारी रखना चाहते हैं, ताकि संगीतबद्ध गीतों के आने वाले सत्रों के लिए हम इनका इस्तेमाल कर सकें और किसी भी तरह के गीत को गाने के लिए हमारे पास गायकों का आभाव न हो।

दुनिया में हर जगह शुरूआत को महिलाओं से करने की परम्परा है, इसलिए हम भी पहले महीने में स्त्री-स्वर के गीत से इस प्रतियोगिता की शुरूआत कर रहे हैं। और स्त्री-स्वरों में लता मंगेशकर की आवाज़ श्रेष्ठ हैं।

प्रतियोगिता में भाग लेने के नियम और शर्तें-

1) प्रतियोगिता के दो चरण होंगे।
2) पहले चरण में अपनी पसंद की लता के किसी कैरिऑकि ट्रैक पर या हमारे द्वारा दिये गये तीन कैरिऑके ट्रैकों में से किसी भी एक पर अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करके हमें भेजने होगी।
3) पहले चरण (राउंड) से हम उन गायकों को चुनेंगे जिनमें संभावनाएँ अधिक होंगी।
4) चयनित प्रतिभागियों को दूसरे राउंड में गाने के लिए 1 या 2 ट्रैक दिये जायेंगे, जिसमें से किसी एक पर अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करके हमें भेजना होगा। दूसरे चरण में हमारे द्वारा दिये गये कैरिऑकि ट्रैक पर ही आपको गाना होगा।
5) पहले चरण के लिए रिकॉर्डिंग को mp3 (128kbps) फॉर्म में हमें podcast.hindyugm@gmail.com पर ईमेल द्वारा भेजना होगा।
6) कैरिऑके ट्रैक क्या होते हैं और उनपर रिकॉर्डिंग कैसे करते हैं- जानने के लिए क्लिक करें
7) इस प्रतियोगिता में हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र में भाग ले चुके गायक-गायिका भाग नहीं ले सकेंगे।
8) जजमेंट-टीम में बॉलीवुड-फेम के कुछ गायक भी शामिल हैं।

यदि आपके पास कोई ट्रैक नहीं है तो हम लता मंगेशकर द्वारा गाये गये तीन फिल्मी गीतों के कैरिऑकि ट्रैक दे रहे हैं, जिसमें से किसी एक पर आपको अपनी आवाज़ डब करके 31 अक्टूबर 2009 तक भेजनी है। कैरिऑके ट्रैक को बजाने, रिकॉर्ड तथा मिक्स करने का काम कनाडा निवासियों संतोष शैल, हरदीप बक्षी और अमर ने किया है।

1॰ परदेस जा के परदेसिया (फिल्म- अर्पण)


2॰ शीशा हो या दिल हो (फिल्म- आशा)


3॰ वो भूली दास्ताँ लो फिर याद आ गई (फिल्म- संजोग)


आपको जो ट्रैक पसंद आये, उसे निम्नलिखित लिंकों से डाउनलोड कर लें, साथ ही साथ आप गीत के बोलों को रोमन(हिन्दी) या देवनागरी(हिन्दी) में देखना चाहें तो उसे भी डाउनलोड कर लें।

Pardes Ja ke PardesiaSheesha Ho Ya
Wo Bhooli DastanGeet ke Bol (Lyrics)


इस अंक की प्रायोजक- स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा'

Tuesday, July 14, 2009

वो भूली दास्ताँ लो फिर याद आ गयी....और फिर याद आई संगीतकार मदन मोहन की

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 141

दन मोहन के संगीत की सुरीली धाराओं के साथ बहते बहते आज हम आ पहुँचे हैं 'मदन मोहन विशेष' की अंतिम कड़ी पर। आज है १४ जुलाई, आज ही के दिन सन् १९७५ में मदन साहब इस दुनिया को हमेशा के लिए छोड़ गये थे। विविध भारती के वरिष्ठ उद्‍घोषक कमल शर्मा के शब्दों में - "मदन मोहन के धुनों की मोहिनी में कभी प्रेम का समर्पण है तो कभी मादकता से भरी हैं, कभी विरह की वेदना है और कभी स्वर लहरी से भर देती हैं दिल को, जिसका मध्यम मध्यम नशा है। मदन मोहन के शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीतों में साज़ों की अनर्थक ऐसी भीड़ भी नहीं है जिससे गाने की आत्मा ही खो जाये। उनके धुनों की स्वरधारा पर्वत से उतरती है और सुर सरिता में विलीन हो जाती है। धाराओं में धारा समाने लगते हैं, और ऐसी ही एक धारा में नहाकर आत्मा तृप्त हो जाती हैं। व्यक्तिगत अनुभव के स्तर पर हर श्रोता को कोई संगीतकार, गीतकार या गायक दूसरों से ज़्यादा पसंद आते हैं जिनकी कोई मौलिकता उन्हे प्रभावित कर जाती हैं। मदन मोहन के संगीत में भी मौलिकता है। फ़िल्म संगीत एक कला होने के साथ साथ एक व्यावसाय भी है जिसमें कई बार कलाकारों को समझौता करना पड़ता है। मदन मोहन जैसे संगीतकार को भी कहीं कहीं समझौता करना पड़ा है, लेकिन कल्पनाशील संगीतकार वो है जो कोई ना कोई रास्ता निकाल लेता है और हर बार अपना छाप छोड़ जाता है। मदन मोहन उनमें से एक हैं।" आज इस विशेष प्रस्तुति के अंतिम अध्याय में हमें याद आ रही है वो भूली दास्ताँ जिसे दशकों पहले लता मंगेशकर ने बयाँ किया था राजेन्द्र कृष्ण के शब्दों में, १९६१ की फ़िल्म 'संजोग' के प्रस्तुत गीत में। दर्द का ऐसा असरदार फ़ल्सफ़ा हर रोज़ बयाँ नहीं होता। और यही वजह है कि यह गीत मदन मोहन के 'मास्टर-पीस' गीतों में गिना जाता है।

प्रमोद चक्रवर्ती निर्देशित 'संजोग' के मुख्य कलाकार थे प्रदीप कुमार और अनीता गुहा। दोस्तों, आप को याद होगा कि 'मदन मोहन विशेष' का पहला गीत "बैरन नींद न आये" (चाचा ज़िंदाबाद) भी अभिनेत्री अनीता गुहा पर ही फ़िल्माया गया था। सही में यह संजोग की ही बात है कि इस शृंखला का अंतिम गीत फिर एक बार अनीता गुहा पर फ़िल्माया हुआ है। इस फ़िल्म के सभी गीत बेहद सुरीले भी हैं और लोकप्रिय भी, लेकिन प्रस्तुत गीत में कुछ ऐसी बात है कि जो इसे दूसरे गीतों के मुकाबिल दो क़दम आगे को रखती है। यह मदन मोहन और लता जी के हौंटिंग मेलडीज़ का एक बेमिसाल नग़मा है जो दिल को उदास भी कर देता है और साथ ही इसका सुरीलापन मन को एक अजीब शांति भी प्रदान करता है। और्केस्ट्रेशन की तो क्या बात है, शुरुवाती संगीत अद्‍भुत है, पहले इंटर्ल्युड में सैक्सोफ़ोन पुर-असर है, कुल मिलाकर पूरा का पूरा गीत एक मास्टरपीस है। "बड़े रंगीन ज़माने थे, तराने ही तराने थे, मगर अब पूछता है दिल वो दिन थे या फ़साने थे, फ़कत एक याद है बाक़ी, बस एक फ़रियाद है बाक़ी, वो ख़ुशियाँ लुट गयीं लेकिन दिल-ए-बरबाद है बाक़ी"। सच दोस्तों, कहाँ गये वो सुरीले दिन, फ़िल्म संगीत का वह सुनहरा युग! आज मदन मोहन हमारे बीच नहीं हैं, जुलाई का यह भीगा महीना बड़ी शिद्दत से उनकी याद हमें दिलाता है, पर आँखें नम करने का हक़ हमें नहीं है क्यूंकि उन्ही का एक गीत हम से यह कहता है कि "मेरे लिए न अश्क़ बहा मैं नहीं तो क्या, है तेरे साथ मेरी वफ़ा मैं नहीं तो क्या"। हिंद युग्म की तरफ़ से मदन मोहन की संगीत साधना को प्रणाम!



पिछले वर्ष हमने मदन मोहन साहब को याद किया था संजय पटेल जी के इस अनूठे आलेख के माध्यम से. आज फिर एक बार जरूर पढें और सुनें ये भी.
नैना बरसे रिमझिम रिमझिम.....इस गीत से जुडा है एक मार्मिक संस्मरण


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. माउथ ओरगन की धुन इस गीत की खासियत है.
2. राहुल देव बर्मन ने बजायी थी वह धुन इस गीत में.
3. मस्ती से भरे इस गीत के एक अंतरे में "काज़ी" का जिक्र है.

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी, मात्र ४ अंक पीछे हैं अब आप अपनी मंजिल से, बहुत बहुत बधाई....पता नहीं हमारी स्वप्न मंजूषा जी कहाँ गायब हैं, पराग जी भी यही सवाल कर रहे हैं. जी पराग जी आपने सही कहा ये गीत रेडियो पर बहुत सुना गया है पर हमें तो यही लगता है कि यह गीत उस श्रेणी का है जिसे जितनी भी बार सुना जाए मन नहीं भरता.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, March 17, 2009

एक मंजिल राही दो, फिर प्यार न कैसे हो....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 25

दोस्तों,'ओल्ड इस गोल्ड' की एक और कडी के साथ हम हाज़िर हैं. हमें बेहद खुशी है कि आप इस शृंखला को पसंद कर रहे हैं. और यकीन मानिए, आपके लिए इन गीतों को खोजने में और इन गीतों से जुडी जानकारियाँ इकट्टा करने में भी हमें उतना ही आनंद आ रहा है. इस शृंखला के स्वरूप के बारे में अगर आप कोई भी सुझाव देना चाहते हैं, या किसी तरह का कोई बदलाव चाहते हैं तो हमें बे-झिझक बताईएगा. अगर आप किसी ख़ास गीत को इस शृंखला में सुनना चाहते हैं तो भी हमें बता सकते हैं. और अगर फिल्म संगीत के सुनहरे दौर के किसी गीत से जुडी कोई दिलचस्प बात आप जानते हैं तो भी हमें ज़रूर बताएँ, हमें बेहद खुशी होगी आपकी दी हुई जानकारी को यहाँ पर शामिल करते हुए. तो आइए अब ज़िक्र छेडा जाए आज के गीत का. आज का गीत लता मंगेशकर और मुकेश की आवाज़ों में एक बेहद खूबसूरत युगल गीत है जिसमें यह बताया जारहा है कि अगर मंज़िल एक है, तो फिर ऐसे मंज़िल को तय करनेवाले दो राही के दिलों में प्यार कैसे ना पनपे. अब इसके आगे शायद मुझे और कुछ बताने की ज़रूरत नहीं, आप ने गीत का अंदाज़ा ज़रूर लगा लिया होगा!

जी हाँ, 1961 में बनी फिल्म "संजोग" के इस गीत को लिखा था राजेंदर कृष्ण ने और संगीत में पिरोया था मदन मोहन साहब ने. प्रमोद चक्रवर्ती निर्देशित इस फिल्म में प्रदीप कुमार और अनीता गुहा ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई. यह गीत मदन मोहन के स्वरबद्ध दूसरे गीतों से बहुत अलग हट्के है. आम तौर पर उनके गीतों में साज़ों का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल नहीं होता था. लेकिन इस गीत में उन्होने अच्छे ख़ासे 'ऑर्केस्ट्रेशन' का प्रयोग किया. कई साज़ प्रयोग में लाए गये. शायद खुश-मिज़ाज और खुश-रंग इस गीत की यही ज़रूरत थी. पहले और तीसरे 'इंटरल्यूड' में 'सॅक्सफोन' का खूबसूरत प्रयोग हुया है, तो दूसरे 'इंटरल्यूड' में 'वोइलिन' और 'अकॉर्डियन' इस्तेमाल में लाया गया है. कुल मिलाकर इस गीत का संगीत संयोजन बेहद सुरीला और चमकदार है जिसे सुनकर दिल खुश हो जाता है. तो अब आप भी खुश हो जाइए और सुनिए यह गीत.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. रफी साहब का एक बेहद यादगार नग्मा.
२. मजरूह के बोल और एस डी बर्मन साहब का बेमिसाल संगीत.
३. पहला अंतरा इस शब्द से शुरू होता है -"देखा".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
अभिषेक जी, एकदम सही जवाब. नीरज जी, धन्येवाद सहित बधाई, पी एन जी एकदम आसान हुई तो पहेली का मज़ा क्या :) प्रेमेन्द्र जी, स्वागत आपका.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




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