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Sunday, October 26, 2014

‘रस के भरे तोरे नैन...’ : SWARGOSHTHI – 191 : THUMARI BHAIRAVI




स्वरगोष्ठी – 191 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 10 : ठुमरी भैरवी

‘आ जा साँवरिया तोहें गरवा लगा लूँ, रस के भरे तोरे नैन...’





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर पिछले दस सप्ताह से जारी 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ श्रृंखला के इस समापन अंक में आज आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः कृष्णमोहन मिश्र और संज्ञा टण्डन की ओर से हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हमने आपको कुछ ऐसी पारम्परिक ठुमरियों का रसास्वादन कराया जिन्हें फिल्मों में भी शामिल किया जा चुका है। पिछले अंक में हमने आपसे एक ऐसी ठुमरी पर चर्चा की थी, जिसमें नायिका की आँखों के सौन्दर्य का बखान किया गया है। परन्तु आज की ठुमरी में नायक की आँखों के आकर्षण का रसपूर्ण चित्रण किया गया है। आज हम जिस ठुमरी पर चर्चा करेंगे, वह है- ‘आ जा साँवरिया तोहे गरवा लगा लूँ, रस के भरे तोरे नैन...’। प्रत्यक्ष रूप से तो यह ठुमरी श्रृंगार रस प्रधान है किन्तु कुछ समर्थ गायक-गायिकाओं ने इसे कृष्णभक्ति से तो कुछ ने नायिका के विरह भाव से जोड़ा है। इन सभी भावों की अभिव्यक्ति के लिए राग भैरवी के अलावा भला और कौन सा राग हो सकता है? इस श्रृंखला में हमने आपके लिए पारम्परिक ठुमरी के एक या दो उदाहरण तथा उसके फिल्मी संस्करण का एक उदाहरण प्रस्तुत किया है, किन्तु श्रृंखला की इस समापन कड़ी में आज की ठुमरी- ‘रस के भरे तोरे नैन...’ के परम्परागत स्वरूप के हम चार उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। दरअसल 1905 में गौहर जान की गायकी से लेकर आधुनिक काल में गिरिजा देवी की गायकी के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए हम पिछली पूरी एक शताब्दी के दौरान ठुमरी गायकी की यात्रा को रेखांकित भी कर रहे हैं। आप इस ठुमरी का रसास्वादन गौहर जान, रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी, गिरिजा देवी और हीरादेवी मिश्र की आवाज़ों में करेंगे। 



मारी आज की ठुमरी- ‘रस के भरे तोरे नैन...’ की पहली गायिका हैं, अपने समय की सुप्रसिद्ध गायिका, गौहर जान। 26 जून 1873 को जन्मीं गौहर जान, आर्मेनियन माता-पिता की सन्तान थीं। हालाँकि उनकी माँ विक्टोरिया का जन्म भारत में ही हुआ था और उनका विवाह 1872 में विलियम रावर्ट के साथ हुआ था। विक्टोरिया भारतीय गायन और नृत्य शैली में पारंगत थी। रावर्ट के साथ विवाह सम्बन्ध टूटने के बाद विक्टोरिया ने अपने एक संगीत के कद्रदान खुर्शीद से निकाह कर लिया और बनारस आ बसीं। उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार किया और खुद का नाम बदल कर मालिका जान कर लिया और अपनी बेटी को गौहर जान नाम दिया। गौहर को ठुमरी, दादरा और गजल गायन में खूब शोहरत मिली। भारत का पहला डिस्क, ग्रामोफोन कम्पनी ने जो जारी किया, वह उनकी आवाज़ में ख़याल गायन का था, जो राग जोगिया में निबद्ध था। 1902 में जारी हुए इस पहले रिकॉर्ड से लेकर 1920 तक उनके लगभग 600 रेकॉर्ड्स बाजार में आए। हिन्दी, उर्दू के अलावा उन्होंने, बांग्ला, गुजराती, मराठी, तमिल, अरबी, पश्तो, फ्रेंच, और अँग्रेजी भाषाओं में भी गीत गाये थे। उन दिनों ग्रामोफोन कम्पनी के चलन के अनुसार गौहर जान अपनी हर रिकॉर्डिंग का समापन इस संवाद के साथ करती थी– 'My name is Gauha Jaan' (मेरा नाम गौहर जान है)। गायिका गौहर जान (1873-1930) की आवाज़ में ठुमरी- ‘रस के भरे तोरे नैन...’ जिसे अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, ग्रामोफोन कम्पनी ने इसकी रिकॉर्डिंग 1905 में की थी।


ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : गायिका गौहर जान




बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जो ठुमरी गायिकाएँ संगीत-रसिकों की सिरमौर बनीं थी उनमें शीर्ष पर एक ही नाम था, रसूलन बाई (1902-1974) का। बात जब बोल-बनाव ठुमरी की हो तो रसूलन बाई का ज़िक्र आवश्यक हो जाता है। पूरब अंग की गायकी- ठुमरी, दादरा, होरी, चैती, कजरी आदि शैलियों की अविस्मरणीय गायिका रसूलन बाई बनारस (वाराणसी) की रहने वाली थीं। संगीत के संस्कार इन्हें अपनी नानी से विरासत में मिले थे। रसूलन बाई के संगीत को निखारने में उस्ताद आशिक खाँ, नज्जू मियाँ और टप्पा गायकी के अन्वेषक मियाँ शोरी के खानदान के शम्मू खाँ का बहुत बड़ा योगदान था। पूरब अंग की भावभीनी गायकी की चैनदारी, बोल-बनाव के लहजे, कहन के खास ढंग और ठहराव, यह सारे गुण रसूलन बाई की गायकी में था। टप्पा तो जैसे रसूलन बाई के लिए ही बना था। बारीक मुरकियाँ और मोतियों की लड़ियों जैसी तानों पर उन्हें कमाल हासिल था। उनकी गायी ठुमरी भैरवी- ‘रस के भरे तोरे नैन...’, आप सुनिए और श्रृंगार रस की सार्थक अनुभूति कीजिए।


ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : गायिका रसूलन बाई




जिस अवधि में गायिका रसूलन बाई सक्रिय थीं, लगभग उसी अवधि में ठुमरी के भक्ति और आध्यात्मिक भाव को उकेरने में सिद्ध गायिका सिद्धेश्वरी देवी का यश भी चरम पर था। पूरब अंग की ठुमरियों के लिए विख्यात बनारस के संगीत-प्रेमियों में सिद्धेश्वरी देवी का नाम आदर से लिया जाता था। संगीत-प्रेमियों के बीच वे ‘ठुमरी क्वीन’ के नाम से पहचानी जाती थीं। उनकी संगीत संगीत-शिक्षा बचपन में गुरु सियाजी महाराज से हुई थी। निःसन्तान होने के कारण सियाजी दम्पति ने सिद्धेश्वरी को गोद ले लिया और संगीत की शिक्षा के साथ-साथ उनका पालन-पोषण भी किया। बाद में उनकी शिक्षा बड़े रामदास जी से भी हुई। बनारस की गायिकाओं में सिद्धेश्वरी देवी, काशी बाई और रसूलन बाई समकालीन थीं। 1966 में उन्हें ‘पद्मश्री’ सम्मान से अलंकृत किया गया था। नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत संगीत-शिक्षा प्रदान करने के लिए उन्हें 1965 में दिल्ली के श्रीराम भारतीय कला केन्द्र आमंत्रित किया गया। लगभग बारह वर्षों तक केन्द्र में कार्य करते हुए 1977 में सिद्धेश्वरी देवी का निधन हुआ। 1989 में फिल्मकार मणि कौल ने सिद्धेश्वरी देवी के जीवन और संगीत पर एक वृत्तचित्र ‘सिद्धेश्वरी’ का निर्माण किया था। आइए, आज की इसी ठुमरी को सिद्धेश्वरी जी के स्वरों में एक अलग ही अंदाज़ में सुनते हैं।


ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : गायिका सिद्धेश्वरी देवी 




उप-शास्त्रीय संगीत को वर्तमान में संगीत के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कराने में विदुषी गिरिजा देवी के योगदान को सदियों तक स्मरण किया जाता रहेगा। आयु के नौवें दशक में भी सक्रिय गिरिजा देवी का जन्म 8 मई, 1929 को कला और संस्कृति की राजधानी वाराणसी (तत्कालीन बनारस) में हुआ था। पिता रामदेव राय जमींदार थे और संगीत से उनका विशेष लगाव था। मात्र पाँच वर्ष की गिरिजा के लिए उन्होने संगीत-शिक्षा की व्यवस्था कर दी थी। एक साक्षात्कार में गिरिजा देवी ने स्वीकार किया है कि उनके प्रथम गुरु उनके पिता ही थे। गिरिजा देवी के प्रारम्भिक संगीत-गुरु पण्डित सरयूप्रसाद मिश्र थे। नौ वर्ष की आयु में पण्डित श्रीचन्द्र मिश्र से उन्होंने संगीत की विभिन्न शैलियों की शिक्षा प्राप्त की। नौ वर्ष की आयु में ही एक हिन्दी फिल्म ‘याद रहे’ में गिरिजा देवी ने अभिनय भी किया था। गिरिजा देवी का विवाह 1946 में एक व्यवसायी परिवार में हुआ था। उन दिनों कुलीन विवाहिता स्त्रियों द्वारा मंच प्रदर्शन अच्छा नहीं माना जाता था। परन्तु सृजनात्मक प्रतिभा का प्रवाह भला कौन रोक सका है? 1949 में गिरिजा देवी ने अपना पहला प्रदर्शन इलाहाबाद के आकाशवाणी केन्द्र से दिया। यह देश की स्वतंत्रता के तत्काल बाद का उन्मुक्त परिवेश था, जिसमें अनेक रूढ़ियाँ टूट रहीं थीं। संगीत के क्षेत्र में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे और पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने स्वतंत्रता से पहले ही भारतीय संगीत को जनमानस में प्रतिष्ठित करने का जो अभियान छेड़ा था, उसका सार्थक परिणाम आज़ादी के बाद नज़र आने लगा था। गिरिजा देवी को भी अपने युग की रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा। 1949 में रेडियो से अपने गायन का प्रदर्शन करने के बाद गिरिजा देवी ने 1951 में बिहार के आरा में आयोजित एक संगीत सम्मेलन में अपना गायन प्रस्तुत किया। इसके बाद गिरिजा देवी की अनवरत संगीत-यात्रा जो आरम्भ हुई, वह आज तक जारी है। गिरिजा देवी ने स्वयं को केवल मंच-प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि संगीत के शैक्षणिक और शोध कार्यों में भी अपना योगदान किया। 80 के दशक में उन्हें कोलकाता स्थित आई.टी.सी. संगीत रिसर्च अकादमी ने आमंत्रित किया। वहाँ रह कर उन्होने न केवल कई योग्य शिष्य तैयार किये, बल्कि शोधकार्य भी कराये। इसी प्रकार 90 के दशक में गिरिजा देवी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जुड़ीं और अनेक विद्यार्थियों को प्राचीन संगीत परम्परा की दीक्षा दी। गिरिजा देवी को 1972 में ‘पद्मश्री’, 1977 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1999 में ‘पद्मभूषण’ और 2010 में संगीत नाटक अकादमी का फेलोशिप जैसे प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किये गए। गिरिजा देवी आधुनिक और स्वतन्त्रता से पूर्व काल के संगीत की विशेषज्ञ और संवाहिका हैं। ऐसी विदुषी के स्वरों में आप यह ठुमरी सुनिए और स्वर, रस, भाव की सुखानुभूति कीजिए।


ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : विदुषी गिरिजा देवी




श्रृंखला के शीर्षक के अनुसार अब हम प्रस्तुत करेंगे पारम्परिक ठुमरी- ‘रस के भरे तोरे नैन...’ का फिल्मी प्रयोग। इस परम्परागत ठुमरी को उपशास्त्रीय गायिका हीरादेवी मिश्र ने अपने स्वरों से एक अलग रंग में ढाल दिया है। 1978 में प्रदर्शित मुज़फ्फर अली की फिल्म ‘गमन’ में इस ठुमरी को शामिल किया गया था। मूलतः श्रृंगार रस प्रधान ठुमरी में संगीतकार जयदेव और गायिका हीरादेवी मिश्र ने श्रृंगार के साथ-साथ भक्तिरस का समावेश अत्यन्त कुशलता से करके ठुमरी को एक अलग रंग दे दिया है। गायिका हीरादेवी मिश्र पूरब अंग की ठुमरी, दादरा, कजरी, चैती आदि की अप्रतिम गायिका थीं। मुजफ्फर अली जैसे कुछेक फ़िल्मकारों ने उनकी प्रतिभा का फिल्मों में उपयोग किया। फिल्म ‘गमन’ के लिए इस ठुमरी के प्रारम्भ में एक पद ‘अरे पथिक गिरधारी सो इतनी कहियों टेर...’ जोड़ कर भक्तिरस का समावेश जिस सुगढ़ता से किया गया है, वह अनूठा है। फिल्म के संगीतकार जयदेव ने ठुमरी के मूल स्वरुप में कोई परिवर्तन नहीं किया किन्तु सारंगी, बाँसुरी और स्वरमण्डल के प्रयोग से ठुमरी की रसानुभूति में वृद्धि कर दी है। इस गीत के सुनने के बाद कुछ पलों तक कुछ और सुनने की इच्छा नहीं होगी। इसे सुन कर आपको राग भैरवी के प्रभाव की सार्थक अनुभूति अवश्य होगी। आइए सुनते हैं, श्रृंगार और भक्तिरस के अनूठे मेल से युक्त आज के कड़ी की और लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ की यह समापन प्रस्तुति- ‘रस के भरे तोरे नैन...’


ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : फिल्म गमन : हीरादेवी मिश्र : संगीत – जयदेव




और अब प्रस्तुत है, इस श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के दसवें अंक के आलेख और गीतों का समन्वित श्रव्य संस्करण। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार की सक्रिय सदस्य संज्ञा टण्डन ने अपनी भावपूर्ण आवाज़ से सुसज्जित किया है। आप इस प्रस्तुति का रसास्वादन कीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन...’ : फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी : वाचक स्वर - संज्ञा टण्डन






आज की पहेली 



‘स्वरगोष्ठी’ के 191वें अंक की पहेली में आज हम आपको सात दशक से भी पहले की एक फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 200वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) और वर्ष 2014 का विजेता घोषित किया जाएगा। 




1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – यह रचना किस ताल में निबद्ध है?


आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 1 नवम्बर, 2014 को मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 193वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 189वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ की गायी एक लोकप्रिय ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग सिन्धु भैरवी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर मिन्नेसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस, जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी प्रयोग पर चर्चा कर रहे हैं। आज इस श्रृंखला की यह समापन प्रस्तुति थी। इस श्रृंखला के स्वरूप पर हमे अनेक पाठकों और श्रोताओ के बहुमूल्य सुझाव प्राप्त हुए है। इन सभी सुझाव पर हम नये वर्ष से अपनी प्रस्तुतियों में आवश्यक संशोधन करने जा रहे हैं। यदि आपने अभी तक अपने सुझाव और फरमाइशें नहीं भेजी हैं तो आविलम्ब हमें भेज दें। अगले रविवार 2 नवम्बर 2014 को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।  



वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, October 19, 2014

‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : SWARGOSHTHI – 190 : THUMARI SINDHU BHAIRAVI




स्वरगोष्ठी – 190 में आज


फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 9 : ठुमरी सिन्धु भैरवी


विरहिणी नायिका की व्यथा : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’






‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी साथी प्रस्तुतकर्त्ता संज्ञा टण्डन के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इन दिनों हमारी जारी श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के नौवें अंक में आज हमने एक ऐसी पारम्परिक ठुमरी का चयन किया है, जिसे कई सुविख्यात गायक-गायिकाओं ने गाया है। इसके अलावा इस ठुमरी के अन्तरों को परिवर्तित कर फिल्म संगीत के रूप में भी आकर्षक प्रयोग किया गया है। इस श्रृंखला में आप कुछ ऐसी पारम्परिक ठुमरियों का रसास्वादन भी कर रहे हैं जिन्हें फिल्मों में कभी यथावत तो कभी परिवर्तित अन्तरे के साथ इस्तेमाल किया जा चुका है। फिल्मों मे शामिल ऐसी ठुमरियाँ अधिकतर पारम्परिक ठुमरियों से प्रभावित होती हैं। आज की ठुमरी का पारम्परिक संस्करण भारतीय संगीत के शीर्षस्थ संगीतज्ञ उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ की आवाज़ में प्रस्तुत है और फिल्मी ठुमरी सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक येशुदास की आवाज़ में है। इस श्रृंखला की अन्य कड़ियों की तरह आज के अंक को भी प्रायोगिक रूप से श्रव्य माध्यम में प्रस्तुत किया जा रहा है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की प्रमुख सहयोगी संज्ञा टण्डन की आवाज़ में पूरा आलेख और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। हमारे इस प्रयोग पर आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिएगा। 
 


स्वरगोष्ठी के आज के अक में हम आपके लिए लेकर आए हैं राग सिन्धु भैरवी की विख्यात ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ के विविध प्रयोगों पर एक चर्चा। इस ठुमरी को सर्वाधिक प्रसिद्धि तब मिली, जब इसे उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों का योगदान मिला। उन्होने इस ठुमरी को अपना स्वर देकर कालजयी बना दिया। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ का जन्म 1902 में पराधीन भारत में पंजाब के कसूर में हुआ था जो अब पाक़िस्तान में है। उनके पिता अली बक्श ख़ान तत्कालीन पश्चिम पंजाब प्रान्त के एक संगीत परिवार से सम्बन्धित थे और ख़ुद भी एक जाने-माने गायक थे। बड़े ग़ुलाम अली ने 7 वर्ष की उम्र में ही अपने चाचा काले खाँ से सारंगी वादन और गायन सीखना शुरु किया। काले ख़ाँ साहब के निधन के बाद बड़े ग़ुलाम अली अपने पिता से संगीत सीखते रहे। बड़े ग़ुलाम अली ने अपनी स्वर-यात्रा का आरम्भ सारंगी वादक के रूप में किया और कलकत्ता में आयोजित उनकी पहली संगीत-सभा में ही उन्हें लोकप्रियता मिली। ली। बाद में उन्होने अपनी गायन प्रतिभा से भी संगीत-प्रेमियों को प्रभावित किया। उनके गले की मिठास, गायकी का अंदाज़, हरकतें, आदि ने उन्हें शीर्ष स्थान पर बिठा दिया। आइए, आज सबसे पहले उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों में सुनते हैं आज की ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’


ठुमरी सिंधु भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ




श्रृंगार रस के विरह पक्ष को उकेरने में पूर्ण समर्थ इस ठुमरी को अनेक गायक-गायिकाओं ने अलग-अलग ढंग से गाया है। वर्तमान में भारतीय संगीत की हर शैली पर समान रूप से अधिकार रखने वाले संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती और विदुषी पद्मा तलवलकर सहित अनेक संगीत साधकों ने भी गाया है और अलग-अलग रंग दिये हैं। वर्ष 1977 में वासु चटर्जी की फिल्म ‘स्वामी’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म के संगीतकार राजेश रोशन थे। उन्होने फिल्म के एक प्रसंग में सिंधु भैरवी की इस पारम्परिक ठुमरी का उपयोग किया था। परन्तु ठुमरी के इस फिल्मी स्वरूप में भैरवी के अलावा बीच-बीच में कुछ अन्य रागों- जोगिया, पीलू आदि की अनुभूति भी होती है। सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक येसुदास ने इस ठुमरी को बड़े ही कोमल अंदाज में गाया है। राजेश रोशन के पिता, संगीतकार रोशन ने अपने समय की फिल्मों में पारम्परिक खयाल, ठुमरी आदि का खूब उपयोग किया था। फिल्म ‘स्वामी’ में इस ठुमरी को शामिल करने की प्रेरणा राजेश रोशन को सम्भवतः अपने पिता से मिली हो। ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ के इस फिल्मी रूप का आनन्द आप भी लीजिए।


ठुमरी सिंधु भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : येशुदास : फिल्म - स्वामी




और अब प्रस्तुत है, इस श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के नौवें अंक के आलेख और गीतों का समन्वित श्रव्य संस्करण। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार की सक्रिय सदस्य संज्ञा टण्डन ने अपनी भावपूर्ण आवाज़ से सुसज्जित किया है। आप इस प्रस्तुति का रसास्वादन कीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी सिन्धु भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 9 : वाचक स्वर – संज्ञा टण्डन 






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 190वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक पारम्परिक ठुमरी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस प्रस्तुति में आपको किस राग की झलक मिलती है?

2 – इस ठुमरी की गायिका की आवाज को पहचानिए और हमें उनका नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 192वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 188वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुविख्यात गायिका इकबाल बानो की आवाज में प्रस्तुत पारम्परिक ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग पीलू और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- आठ/सोलह मात्रा का ताल। पहेली में सुनवाए गए गीतांश में ताल बहुत स्पष्ट नहीं था। इसलिए जिन पाठकों ने मात्रा के अनुसार अनुमान लगा कर कहरवा, जत या अन्य तालों का उल्लेख किया है उन्हें हमने सही मान लिया है। पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह ने केवल एक प्रश्न का सही उत्तर दिया है, अतः उन्हें एक अंक मिलेंगे। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।



आपकी और अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’। इस श्रृंखला में हमने एक नया प्रयोग किया है। ‘स्वरगोष्ठी’ के परम्परागत आलेख, चित्र और गीत-संगीत के आडियो रूप के साथ-साथ सम्पूर्ण आलेख, गीतों के साथ श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। हमारे अनेक पाठक हर सप्ताह अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। आप भी इस अंक पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। आप अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को इस लघु श्रृंखला के समापन अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का स्वागत करेंगे।

वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र



अपना मनपसन्द स्तम्भ पढ़ने के लिए दीजिए अपनी राय



नए साल 2015 में शनिवार के नियमित स्तम्भ रूप में आप कौन सा स्तम्भ पढ़ना सबसे ज़्यादा पसन्द करेंगे?

1.  सिने पहेली (फ़िल्म सम्बन्धित पहेलियों की प्रतियोगिता)

2. एक गीत सौ कहानियाँ (फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया से जुड़े दिलचस्प क़िस्से)

3. स्मृतियों के स्वर (रेडियो (विविध भारती) साक्षात्कारों के अंश)

4. बातों बातों में (रेडियो प्लेबैक इण्डिया द्वारा लिये गए फ़िल्म व टीवी कलाकारों के साक्षात्कार)

5. बॉलीवुड विवाद (फ़िल्म जगत के मशहूर विवाद, वितर्क और मनमुटावों पर आधारित श्रृंखला)


अपनी राय नीचे टिप्पणी में अथवा cine.paheli@yahoo.com या radioplaybackindia@live.com पर अवश्य बताएँ।

Sunday, October 5, 2014

‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’ : SWARGOSHTHI – 188 : THUMARI BHAIRAVI



स्वरगोष्ठी – 188 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 7 : ठुमरी भैरवी

पण्डित भीमसेन और सहगल की आवाज़ में सुनिए लौकिक और आध्यात्मिक भाव का बोध कराती यह कालजयी ठुमरी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया के साप्ताहिक स्तम्भ स्वरगोष्ठी के मंच पर मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी साथी प्रस्तुतकर्त्ता संज्ञा टण्डन के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का अभिनन्दन करता हूँ। इन दिनों जारी हमारी श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी के सातवें अंक में आज हम एक कालजयी पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी संस्करण के साथ उपस्थित हैं। इस श्रृंखला में आप कुछ ऐसी पारम्परिक ठुमरियों का रसास्वादन कर रहे हैं जिन्हें फिल्मों में कभी यथावत तो कभी परिवर्तित अन्तरे के साथ इस्तेमाल किया गया। फिल्मों मे शामिल ऐसी ठुमरियाँ अधिकतर पारम्परिक ठुमरियों से प्रभावित होती हैं। रेडियो प्लेबैक इण्डिया के कुछ स्तम्भ केवल श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत किये जाते हैं तो कुछ स्तम्भ आलेख और चित्र, दृश्य माध्यम के साथ और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत होते हैं। इस श्रृंखला से हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। श्रृंखला के अंकों को हम प्रायोगिक रूप से दोनों माध्यमों में प्रस्तुत कर रहे हैं। रेडियो प्लेबैक इण्डिया की प्रमुख सहयोगी संज्ञा टण्डन की आवाज़ में पूरा आलेख और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। हमारे इस प्रयोग पर आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिएगा। आज के अंक में हम अवध के नवाब वाजिद अली शाह की सुविख्यात ठुमरी- बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय... का गायन पारम्परिक और फिल्मी दोनों रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। ठुमरी का पारम्परिक गायन पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में और फिल्मी रूप, फिल्म स्ट्रीट सिंगर मेँ कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में प्रस्तुत किया गया है। जिन पाठकों को देवनागरी लिपि पढ़ने मेँ असुविधा होती है उनके लिए संज्ञा टण्डन की आवाज़ मेँ प्रस्तुत आलेख और गीतों का श्रव्य रूप अवश्य रुचिकर होगा। 


नवाब वाजिद अली शाह
 चौथे से लेकर छठें दशक तक की हिन्दी फिल्मों के संगीतकारों ने राग आधारित गीतों का प्रयोग कुछ अधिक किया था। उन दिनों शास्त्रीय मंचों पर या ग्रामोफोन रेकार्ड के माध्यम से जो बन्दिशें, ठुमरी, दादरा आदि बेहद लोकप्रिय होती थीं, उन्हें फिल्मों में कभी-कभी यथावत और कभी अन्तरे बदल कर प्रयोग किये जाते रहे। चौथे दशक के कुछ संगीतकारों ने फिल्मों में परम्परागत ठुमरियों का बड़ा स्वाभाविक प्रयोग किया था। फिल्मों में आवाज़ के आगमन के इस पहले दौर में राग आधारित गीतों के गायन के लिए सर्वाधिक यश यदि किसी गायक को प्राप्त हुआ, तो वह कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल ही थे। उन्होने 1938 में प्रदर्शित ‘न्यू थियेटर’ की फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ में शामिल पारम्परिक ठुमरी- ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’ गाकर उसे कालजयी बना दिया। आज के अंक में हम आपसे भैरवी की इसी ठुमरी से जुड़े कुछ तथ्यों पर चर्चा करेंगे।

अवध के नवाब वाजिद अली शाह संगीत, नृत्य के प्रेमी और कला-संरक्षक के रूप में विख्यात थे। नवाब 1847 से 1856 तक अवध के शासक रहे। उनके शासनकाल में ही ठुमरी एक शैली के रूप में विकसित हुई थी। उन्हीं के प्रयासों से कथक नृत्य को एक अलग आयाम मिला और ठुमरी, कथक नृत्य का अभिन्न अंग बनी। नवाब ने 'कैसर' उपनाम से अनेक गद्य और पद्य की रचनाएँ भी की थी। इसके अलावा ‘अख्तर' उपनाम से दादरा, ख़याल, ग़ज़ल और ठुमरियों की भी रचना की थी। 7 फरवरी, 1856 को अंग्रेजों ने जब उन्हें सत्ता से बेदखल किया और बंगाल के मटियाबुर्ज नामक स्थान पर नज़रबन्द कर दिया तब उनका दर्द ठुमरी भैरवी –‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ में अभिव्यक्त हुआ। नवाब वाजिद अली शाह की यह ठुमरी इतनी लोकप्रिय हुई कि तत्कालीन और परवर्ती शायद ही कोई शास्त्रीय या उपशास्त्रीय गायक हो जिसने इस ठुमरी को न गाया हो। 1936 के लखनऊ संगीत सम्मलेन में जब उस्ताद फैयाज़ खाँ ने इस ठुमरी को गाया तो श्रोताओं की आँखों से आँसू निकल पड़े थे। इसी ठुमरी को पण्डित भीमसेन जोशी ने अनूठे अन्दाज़ में गाया, तो विदुषी गिरिजा देवी ने बोल-बनाव से इस ठुमरी का अध्यात्मिक पक्ष उभारा है। फिल्मों में भी इस ठुमरी के कई संस्करण उपलब्ध हैं। 1938 में बनी फिल्म 'स्ट्रीट सिंगर' में कुन्दनलाल सहगल के स्वरों में यह ठुमरी भैरवी सर्वाधिक लोकप्रिय हुई। लेकिन सहगल साहब की आवाज़ में यह ठुमरी सुनने से पहले हम प्रस्तुत कर रहे है, पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में इस ठुमरी का पारम्परिक अंदाज।  


ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ : पण्डित भीमसेन जोशी 




फिल्म 'स्ट्रीट सिंगर' में कुन्दनलाल सहगल
चौथे और पाँचवें दशक की फिल्मों में रागदारी संगीत की उन रचनाओं को शामिल करने का चलन था जिन्हें संगीत के मंच पर अथवा ग्रामोफोन रेकार्ड के माध्यम से लोकप्रियता मिली हो। फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ में इस ठुमरी को शामिल करने का उद्येश्य भी सम्भवतः यही रहा होगा। परन्तु किसे पता था कि लोकप्रियता की कसौटी पर यह फिल्मी संस्करण, मूल पारम्परिक ठुमरी की तुलना में कहीं अधिक चर्चित हो जाएगा। इस ठुमरी का साहित्य दो भावों की सृष्टि करता है। इसका एक लौकिक भाव है और दूसरा आध्यात्मिक। फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ में सहगल द्वारा प्रस्तुत इस ठुमरी को अपार लोकप्रियता मिली, वहीं उन्होने इस गीत में दो बड़ी ग़लतियाँ भी की है। इस बारे में उदयपुर के ‘राजस्थान साहित्य अकादमी’ द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘मधुमती’ में एक लेख प्रकाशित हुआ था जिसके कुछ अंश हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।

“बहुधा कुछ उक्तियाँ, फिकरे या उदाहरण लोककण्ठ में इस प्रकार समा जाते हैं कि कभी-कभी तो उनका आगा-पीछा ही समझ में नहीं आता, कभी यह ध्यान में नहीं आता कि वह उदाहरण ही गलत है, कभी उसके अर्थ का अनर्थ होता रहता है और पीढी-दर-पीढी हम उस भ्रान्ति को ढोते रहते हैं जो लोककण्ठ में आ बसी है। ‘देहरी भई बिदेस...’ भी ऐसा ही उदाहरण है जो कभी था नहीं, किन्तु सुप्रसिद्ध गायक कुन्दनलाल सहगल द्वारा गायी गई कालजयी ठुमरी में भ्रमवश इस प्रकार गा दिये जाने के कारण ऐसा फैला कि इसे गलत बतलाने वाला पागल समझे जाने के खतरे से शायद ही बच पाये।

पुरानी पीढी के वयोवृद्ध गायकों को तो शायद मालूम ही होगा कि वाजिद अली शाह की शरीर और आत्मा के प्रतीकों को लेकर लिखी रूपकात्मक ठुमरी ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’ सदियों से प्रचलित है जिसके बोल लोककण्ठ में समा गये हैं– ‘चार कहार मिलि डोलिया उठावै मोरा अपना पराया छूटो जाय...’ आदि। उसमें यह भी रूपकात्मक उक्ति है– ‘देहरी तो परबत भई, अँगना भयो बिदेस, लै बाबुल घर आपनो मैं चली पिया के देस...’। जैसे पर्वत उलाँघना दूभर हो जाता है वैसे ही विदेश में ब्याही बेटी से फिर देहरी नहीं उलाँघी जाएगी, बाबुल का आँगन बिदेस बन जाएगा। यही सही भी है, बिदेस होना आँगन के साथ ही फबता है, देहरी के साथ नहीं, वह तो उलाँघी जाती है, परबत उलाँघा नहीं जा सकता, अतः उसकी उपमा देहरी को दी गई। हुआ यह कि गायक शिरोमणि कुन्दनलाल सहगल किसी कारणवश बिना स्क्रिप्ट के अपनी धुन में इसे यूँ गा गये ‘अँगना तो पर्वत भया देहरी भई बिदेस...’ और उनकी गायी यह ठुमरी कालजयी हो गई। सब उसे ही उद्धृत करेंगे। बेचारे वाजिद अली शाह को कल्पना भी नहीं हो सकती थी कि बीसवीं सदी में उसकी उक्ति का पाठान्तर ऐसा चल पड़ेगा कि उसे ही मूल समझ लिया जाएगा। सहगल साहब तो ‘चार कहार मिल मोरी डोलिया सजावैं...’ भी गा गये जबकि कहार डोली उठाने के लिए लगाये जाते हैं, सजाती तो सखियाँ हैं। हो गया होगा यह संयोगवश ही अन्यथा हम तो कालजयी गायक सहगल के परम- प्रशंसक हैं।”

वर्ष 1938 में ‘न्यू थियेटर’ द्वारा निर्मित फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ के निर्देशक फणी मजुमदार थे। फिल्म के संगीत निर्देशक रायचन्द्र (आर.सी.) बोराल ने अवध के नवाब वाजिद अली शाह की इस कृति के लिए कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ को चुना। फिल्म में सहगल साहब ने अपनी गायी इस ठुमरी पर स्वयं अभिनय किया है। उनके साथ अभिनेत्री कानन देवी हैं। हालाँकि उस समय पार्श्वगायन की शुरुआत हो चुकी थी, परन्तु फिल्म निर्देशक फणी मजुमदार ने गलियों में पूरे आर्केस्ट्रा के साथ इस ठुमरी की सजीव रिकार्डिंग और फिल्मांकन किया था। एक ट्रक के सहारे माइक्रोफोन सहगल साहब के निकट लटकाया गया था और चलते-चलते यह ठुमरी और दृश्य रिकार्ड हुआ था। सहगल ने भैरवी के स्वरों का जितना शुद्ध रूप इस ठुमरी गीत में किया है, फिल्म संगीत में उतना शुद्ध रूप कम ही पाया जाता है। आप सुनिए, कुन्दनलाल सहगल के स्वरों में यह ठुमरी।


ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ : कुन्दनलाल सहगल : फिल्म – स्ट्रीट सिंगर




और अब प्रस्तुत है, इस श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के सातवें अंक के आलेख और गीतों का समन्वित श्रव्य संस्करण। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार की सक्रिय सदस्य संज्ञा टण्डन ने अपनी भावपूर्ण आवाज़ से सुसज्जित किया है। आप इस प्रस्तुति का रसास्वादन कीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी भैरवी : ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’ : फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 7 : वाचक स्वर – संज्ञा टण्डन




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 188वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक पुरानी ठुमरी का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 190वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस ठुमरी अंश में आपको किस राग की झलक मिलती है?

2 – इस गीतांश में किस ताल का प्रयोग हुआ है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 190वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 186वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको विश्वविख्यात गायक पण्डित भीमसेन जोशी जी की बुलन्द गायकी का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए इसी अंक में प्रस्तुत पारम्परिक ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ठुमरी की स्थायी की पंक्ति है- 'बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...'।  इस अंक की पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर मिन्नेसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस, जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


कुछ अपनी कुछ आपकी

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’। इस श्रृंखला में हमने एक नया प्रयोग किया है। ‘स्वरगोष्ठी’ के परम्परागत आलेख, चित्र और गीत-संगीत के आडियो रूप के साथ-साथ सम्पूर्ण आलेख, गीतों के साथ श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। हमारे अनेक पाठक हर सप्ताह अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। आप भी इस अंक पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। आप अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों की हम प्रतीक्षा करेंगे।

वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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