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Sunday, January 10, 2016

पहेली के महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ : SWARGOSHTHI – 252 : RAG NAND, MALKAUNS AND TILANG





स्वरगोष्ठी – 252 में आज

राग नन्द, सम्पूर्ण मालकौंस और तिलंग

संगीत पहेली की तीनों महिला विजेताओं क्षिति, विजया और हरिणा का अभिनन्दन






‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का नए वर्ष के दूसरे अंक में कृष्णमोहन मिश्र की ओर से हार्दिक अभिनन्दन है। पिछले अंक में हमने आपसे ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के बीते वर्ष की कुछ विशेष गतिविधियों की चर्चा की थी। साथ ही पहेली के चौथे महाविजेता डॉ. किरीट छाया के व्यक्तित्व से परिचित कराया था और उनकी पसन्द का संगीत भी सुनवाया था। इस अंक में भी हम गत वर्ष की कुछ अन्य गतिविधियों का उल्लेख करने के साथ ही संगीत पहेली के प्रथम तीन महाविजेताओं की घोषणा करेंगे और उनका सम्मान भी करेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के पाठक और श्रोता जानते हैं कि इस स्तम्भ के प्रत्येक अंक में संगीत पहेली के माध्यम से हम हर सप्ताह भारतीय संगीत से जुड़े तीन प्रश्न देकर आपसे दो प्रश्नों का उत्तर पूछते हैं। आपके दिये गये सही उत्तरों के प्राप्तांकों की गणना दो स्तरों पर की जाती है। ‘स्वरगोष्ठी’ की दस-दस कड़ियों को पाँच श्रृंखलाओं (सेगमेंट) में बाँट कर और फिर वर्ष के अन्त में सभी पाँच श्रृंखलाओं के प्रतिभागियों के प्राप्तांकों की गणना की जाती है। वर्ष 2015 की संगीत पहेली में चार प्रतिभागी नियमित रूप से भाग लेते रहे। 250वें अंक की पहेली के परिणाम आने तक शीर्ष के चार महाविजेता चुने गए। 56 अंक अर्जित कर वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया चौथे महाविजेता बने। 84 अंक पाकर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने तीसरे, 90 अंक के साथ पेंसिलवानिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया ने दूसरे और 92 अंक के साथ जबलपुर, मध्यप्रदेश की क्षिति तिवारी ने पहले महाविजेता होने का सम्मान प्राप्त किया। यह तथ्य भी रेखांकन के योग्य हैं कि सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाली तीनों प्रतिभागी महिलाएँ हैं और संगीत की कलाकार और शिक्षिका भी है।



संगीत पहेली की तीसरी महाविजेता बनीं हैं, हैदराबाद की सुश्री डी. हरिणा माधवी। “संगीत जीवन का विज्ञान है”, इस सिद्धान्त को केवल मानने वाली ही नहीं बल्कि अपने जीवन में उतार लेने वाली हरिणा जी दो विषयों की शिक्षिका का दायित्व निभा रही हैं। हैदराबाद के श्री साईं स्नातकोत्तर महाविद्यालय में विगत 15 वर्षो से स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं को लाइफ साइन्स पढ़ा रही हैं। इसके साथ ही स्थानीय वासवी कालेज ऑफ म्यूजिक ऐंड डांस से भी उनका जुड़ाव है, जहाँ विभिन्न आयुवर्ग के विद्यार्थियों का मार्गदर्शन भी करती हैं। हरिणा जी को प्रारम्भिक संगीत शिक्षा अपनी माँ श्रीमती वाणी दुग्गराजू से मिली। आगे चल कर अमरावती, महाराष्ट्र के महिला महाविद्यालय की संगीत विभागाध्यक्ष श्रीमती कमला भोंडे से विधिवत संगीत सीखना शुरू किया। हरिणा जी के बाल्यावस्था के एक और संगीत गुरु एम.वी. प्रधान भी थे, जो एक कुशल तबला वादक भी थे। इनके अलावा हरिणा जी ने गुरु किरण घाटे और आर. डी. जी. कालेज, अकोला के संगीत विभागाध्यक्ष श्री नाथूलाल जायसवाल से भी संगीत सीखा। हरिणा जी ने मुम्बई के अखिल भारतीय गन्धर्व महाविद्यालय से संगीत अलंकार की शिक्षा प्राप्त की है। आज के इस विशेष अंक में हम आपको सुश्री डी. हरिणा माधवी की आवाज़ में राग नन्द में दो खयाल प्रस्तुत कर रहे हैं। विलम्बित खयाल एकताल में निबद्ध है, जिसके बोल हैं, ‘ढूँढ बन सइयाँ...’। द्रुत खयाल की बन्दिश तीनताल में निबद्ध है, जिसके बोल हैं, ‘धन धन भाग नन्द को...’। आप यह दोनों रचनाएँ सुनिए।

राग नन्द : विलम्बित और द्रुत खयाल : डी. हरिणा माधवी


दूसरी महाविजेता का गौरव प्राप्त किया है, पेंसिलवेनिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया। संगीत की साधना में पूर्ण समर्पित विजया जी ने लखनऊ स्थित भातखण्डे संगीत महाविद्यालय (वर्तमान में विश्वविद्यालय) से संगीत विशारद की उपाधि प्राप्त की है। बचपन में ही उनकी प्रतिभा को पहचान कर उनके पिता, विख्यात रुद्रवीणा वादक और वीणा मन्दिर के प्राचार्य श्री पी.डी. शाह ने कई तंत्र और सुषिर वाद्यों के साथ-साथ कण्ठ संगीत की शिक्षा भी प्रदान की। श्री शाह की संगीत परम्परा को उनकी सबसे बड़ी सुपुत्री विजया जी ने आगे बढ़ाया। आगे चलकर विजया जी को अनेक संगीत गुरुओं से मार्गदर्शन मिला, जिनमें आगरा घराने के उस्ताद खादिम हुसेन खाँ की शिष्या सुश्री मिनी कापड़िया, पण्डित लक्ष्मण प्रसाद जयपुरवाले, सुश्री मीनाक्षी मुद्बिद्री और सुविख्यात गायिका श्रीमती शोभा गुर्टू प्रमुख नाम हैं। विजया जी संगीत साधना के साथ-साथ ‘क्रियायोग’ जैसी आध्यात्मिक साधना में भी संलग्न रहती हैं। उन्होने अपने गायन का प्रदर्शन मुम्बई, लन्दन, सैन फ्रांसिस्को, साउथ केरोलिना, न्यूजर्सी, और पेंसिलवानिया में किया है। सम्प्रति विजया जी पेंसिलवानिया के अपने स्वयं के संगीत विद्यालय में हर आयु के विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा प्रदान कर रही हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ पहेली की दूसरी महाविजेता के रूप में अब हम आपको विजया जी का गाया एक भजन सुनवाते है। यह भक्तिपद राग सम्पूर्ण मालकौंस के सुरों की चाशनी से पगा हुआ है। रूपक ताल में निबद्ध भक्तकवि सूरदास की इस रचना के बोल हैं, ‘अबके माधव मोहें उबार...’। लीजिए, सुनिए और विजया जी को बधाई दीजिए।

राग सम्पूर्ण मालकौंस : भजन : ‘अबके माधव मोहें उबार...’ : विजया राजकोटिया


संगीत पहेली के कुल 100 अंको में से 92 अंक अर्जित कर वर्ष 2015 की संगीत पहेली में प्रथम महाविजेता होने का सम्मान प्राप्त करने वाली जबलपुर, मध्यप्रदेश की श्रीमती क्षिति तिवारी की संगीत शिक्षा लखनऊ और कानपुर में सम्पन्न हुई। लखनऊ के भातखण्डे संगीत महाविद्यालय से गायन में प्रथमा से लेकर विशारद तक की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की। बाद में इस संस्थान को विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ, जहाँ से उन्होने संगीत निपुण और उसके बाद ठुमरी गायन मे तीन वर्षीय डिप्लोमा भी प्राप्त किया। इसके अलावा कानपुर के वरिष्ठ संगीतज्ञ पण्डित गंगाधर राव तेलंग जी के मार्गदर्शन में खैरागढ़, छत्तीसगढ़ के इन्दिरा संगीत कला विश्वविद्यालय की संगीत स्नातक और स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। क्षिति जी के गुरुओं में डॉ. गंगाधर राव तेलंग के अलावा पण्डित सीताशरण सिंह, पण्डित गणेशप्रसाद मिश्र, डॉ. सुरेन्द्र शंकर अवस्थी, डॉ. विद्याधर व्यास और श्री विनीत पवइया प्रमुख हैं। क्षिति को स्नातक स्तर पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से ग्वालियर घराने की गायकी के अध्ययन के लिए छात्रवृत्ति भी मिल चुकी है। कई वर्षों तक लखनऊ के महिला कालेज और जबलपुर के एक नेत्रहीन बच्चों के विद्यालय मे माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा देने के बाद वर्तमान में जबलपुर के ‘महाराष्ट्र संगीत महाविद्यालय’ में वह संगीत गायन की शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं। खयाल, ठुमरी और भजन गायन के अलावा उन्होने प्रोफेसर कमला श्रीवास्तव से गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत लोक संगीत भी सीखा है, जिसे अब वह अपने विद्यार्थियों को बाँट रही हैं। क्षिति जी कथक नृत्य और नृत्य नाटिकाओं में गायन संगत की विशेषज्ञ हैं। सुप्रसिद्ध नृत्यांगना कुमकुम धर और नृत्यांगना विधि नागर के कई कार्यक्रमों में अपनी इस प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुकी हैं। आज के इस विशेष अंक में श्रीमती क्षिति तिवारी राग तिलंग में बन्दिश की एक ठुमरी को अपना स्वर दे रही हैं। त्रिताल में बँधी इस ठुमरी के बोल हैं, ‘देखी देखी कान्हा झूठी तोरी बात...’। लीजिए, अब आप यह ठुमरी सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग तिलंग : ठुमरी : ‘देखी देखी कान्हा झूठी तोरी बात...’ : क्षिति तिवारी



संगीत पहेली  


‘स्वरगोष्ठी’ के 252वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्म संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का आभास हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका का नाम हमे बता सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 16 जनवरी, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 254वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता  


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 250 की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ द्वारा शहनाई पर प्रस्तुत राग भैरवी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ

सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं- जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल (एन.जे.) से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। । पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात  


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज आप वर्ष 2015 के महाविजेताओं के अभिनन्दन समारोह के साक्षी बने। अगले अंक से हम ‘स्वरगोष्ठी’ पर एक नई श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं, जिसका शीर्षक होगा – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव और फरमाइश हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





Sunday, November 22, 2015

आफताब-ए-मौसिकी फ़ैयाज़ खाँ : SWARGOSHTHI – 245 : USTAD FAIYAZ KHAN



स्वरगोष्ठी – 245 में आज

संगीत के शिखर पर – 6 : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ

संगीत जगत के आकाश पर चमकते सूर्य – उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरमयी श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की छठीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की छठीं कड़ी में हम आज ‘आफताब-ए-मौसिकी’ अर्थात संगीत जगत के सूर्य के नाम से विख्यात, आगरा रँगीला घराने के सिरमौर गायक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के व्यक्तित्व और कृतित्व की संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं। आज हम आपको उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में पहले राग तिलंग में नोम-तोम का आलाप, राग ललित में एक द्रुत खयाल और राग भैरवी का एक दादरा सुनवाएँगे।


भारतीय संगीत के प्रचलित घरानों में जब भी आगरा घराने की चर्चा होगी तत्काल एक नाम जो उभर कर हमारे सामने आता है, वह है- आफताब-ए-मौसिकी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ का। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हम इन्हीं महान गायक कलासाधक को स्मरण कर रहे हैं। पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध के जिन संगीतज्ञों की गणना हम शिखर-पुरुष के रूप में करते हैं उस्ताद फ़ैयाज़ खान उन्ही में से एक थे। ध्रुवपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा, सभी शैलियों की गायकी पर उन्हें कुशलता प्राप्त थी। प्रकृति ने उन्हें घन, मन्द्र और गम्भीर कण्ठ का उपहार तो दिया ही था, उनके शहद से मधुर स्वर श्रोताओं पर रस-वर्षा कर देते थे। फ़ैयाज़ खाँ का जन्म ‘आगरा रँगीले घराना’ के नाम से विख्यात ध्रुवपद गायकों के परिवार में हुआ था। दुर्भाग्य से फ़ैयाज़ खाँ के जन्म से लगभग तीन मास पूर्व ही उनके पिता सफदर हुसैन खाँ का इन्तकाल हो गया। जन्म से ही पितृ-विहीन बालक को उनके नाना ग़ुलाम अब्बास खाँ ने अपना दत्तक पुत्र बनाया और पालन-पोषण के साथ-साथ संगीत-शिक्षा की व्यवस्था भी की। यही बालक आगे चल कर आगरा घराने का प्रतिनिधि बना और भारतीय संगीत के अर्श पर आफताब बन कर चमका। फ़ैयाज़ खाँ की विधिवत संगीत शिक्षा उस्ताद ग़ुलाम अब्बास खाँ से आरम्भ हुई, जो फ़ैयाज़ खाँ के गुरु और नाना तो थे ही, गोद लेने के कारण पिता के पद पर भी प्रतिष्ठित हो चुके थे। फ़ैयाज़ खाँ के पिता का घराना ध्रुपदियों का था, अतः ध्रुवपद अंग की गायकी इन्हें संस्कारगत प्राप्त हुई। आगे चल कर फ़ैयाज़ खाँ ध्रुवपद के ‘नोम-तोम’ के आलाप में इतने दक्ष हो गए थे कि संगीत समारोहों में उनके समृद्ध आलाप की फरमाइश हुआ करती थी। आइए आपको भी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में राग ‘तिलंग’ में नोम-तोम का आलाप सुनवाते हैं।


राग तिलंग : नोम-तोम आलाप : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ




फ़ैयाज़ खाँ के नाना का घराना खयाल गायकों का था। नाना ने बचपन से ही कठोर रियाज़ कराया। संगीत के घरानों में संगीत-शिक्षा के लिए एक कठोर व्रत का पालन शिष्य से कराया जाता है, जिसे ‘चिल्ला’ कहा जाता है। इस व्रत के अनुसार शिष्य को निरन्तर बारह वर्षों तक प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक संगीत का अभ्यास करना होता है। प्रशिक्षण की इस अवधि में फ़ैयाज़ खाँ ने स्वर-साधना, ध्रुवपद और होरी गायन का कठिन अभ्यास किया। 25 वर्ष की आयु तक वे लोकप्रिय होने लगे थे। उनकी गायकी पर अपने नाना ग़ुलाम अब्बास खाँ के अतिरिक्त तत्कालीन महान गायक नत्थन खाँ, जयपुर के अब्दुल खाँ और सेनिया घराने के अमीर खाँ का भी प्रभाव था। आइए अब हम आपको उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में राग ललित में द्रुत तीनताल का एक खयाल सुनवाते हैं, जिसके बोल हैं –“तड़पत हूँ जैसे जल बिन मीन...”।


राग ललित : ‘तड़पत हूँ जैसे जल बिन मीन...’ : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ




पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक के चार दशकों तक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ देश में आयोजित होने वाले संगीत समारोहों के प्राण हुआ करते थे। संगीत-प्रेमियों को सम्मोहित कर लेने की अद्भुत क्षमता उनकी गायकी में थी। उस दौर में उन्हें जनसामान्य की ओर से ‘महफिल के बादशाह’ के नाम से पुकारा जाता था। 1930 के आसपास उस्ताद ने कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर के निवास स्थान जोरासांकों ठाकुरबाड़ी में आयोजित संगीत समारोह में भाग लिया था। समारोह के दौरान वे रवीन्द्रनाथ ठाकुर से अत्यन्त प्रभावित हुए और उन्हें “हिंदुस्तान का सबसे बड़ा शायर” की उपाधि दे दी। अपने प्रभावशाली संगीत से उन्होने देश के सभी संगीत केन्द्रों में खूब यश अर्जित किया। उनकी ख्याति के कारण बड़ौदा राज-दरबार में संगीतज्ञ के रूप में उनकी नियुक्ति हुई। 1938 में उन्हे मैसूर दरबार से “आफताब-ए-मौसिकी” (संगीत के सूर्य) की उपाधि से नवाजा गया। उस्ताद की गायकी में जवारीदार स्वर, राग दरबारी का गान्धार, राग श्री का ऋषभ और अनूठी लयकारी श्रोताओं को सम्मोहित करती थी। बोलतान में गीत की पंक्तियों का चमत्कारिक प्रदर्शन किया करते थे। वे स्वर, भाषा, अर्थ, भाव, लय सभी का भरपूर आनन्द लेकर गाते थे। ध्रुवपद और खयाल गायकी में दक्ष होने के साथ-साथ ठुमरी-दादरा गायन में भी वे अत्यन्त कुशल थे। फ़ैयाज़ खाँ ने कलकत्ता (अब कोलकाता) में भैया गनपत राव और मौजुद्दीन खाँ से ठुमरी-दादरा सुना था और संगीत की इस विधा से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। ठुमरी के दोनों दिग्गजों से प्रेरणा पाकर फ़ैयाज़ खाँ ने इस विधा में भी दक्षता प्राप्त की। खाँ साहब ठुमरी और दादरा के बीच उर्दू के शे’र जोड़ कर चार चाँद लगा देते थे। इसके साथ ही टप्पे की तानों को भी वे ठुमरी गाते समय जोड़ लिया करते थे। उनके द्वारा गायी गई उपशास्त्रीय रचनाओं में- “ना बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी....”, “पानी भरे री कौन अलबेली...” आदि आज भी संगीत प्रेमियों का बीच अत्यन्त लोकप्रिय है। इस आलेख को विराम देने से पहले आइए आपको सुनवाते हैं, उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में राग भैरवी में निबद्ध अत्यन्त लोकप्रिय दादरा। खाँ साहब का निधन 5 नवम्बर, 1950 को हुआ था। इसी माह उनकी पुण्यतिथि भी थी, इस अवसर पर हम उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ को समस्त संगीत-प्रेमियों की ओर से श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए आज यहीं विराम लेते हैं।


राग भैरवी दादरा : ना बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’ : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ





 संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 245वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक तंत्र-वाद्य संगीत रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 250 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) के विजेताओं के साथ ही वार्षिक विजेताओं की घोषणा भी की जाएगी।


1 – वाद्ययंत्र पर कौन सा राग बजाया जा रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस वाद्ययंत्र की आवाज़ है? वाद्य का नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 28 नवम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 247वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


 पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 243वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुविख्यात वायलिन-वादिका डॉ. एन. राजम् का वायलिन पर बजाया राग जोग का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – जोग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – द्रुत तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य – वायलिन या बेला।

इस बार की पहेली के प्रश्नों का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


 अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ के आज के अंक में हमने आपसे ध्रुपद, खयाल, ठुमरी, दादरा आदि सभी गान-शैली के शिखर पर प्रतिष्ठित उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के व्यक्तित्व और कृतित्व पर संक्षिप्त चर्चा की है। अगले अंक में एक अन्य विधा के शिखर पर प्रतिष्ठित व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





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