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Sunday, September 13, 2015

राग मारवा और मारूबिहाग : SWARGOSHTHI – 235 : RAG MARAVA & MARUBIHAG



स्वरगोष्ठी – 235 में आज


रागों का समय प्रबन्धन – 4 : दिन के चौथे प्रहर के राग


राग मारवा की बन्दिश - 'गुरु बिन ज्ञान नाहीं पावे...'




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे दिन के चौथे प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के एक प्रमुख राग मारवा की बन्दिश सुविख्यात गायक उस्ताद राशिद खाँ के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही फिल्म संगीतकार रामलाल का स्वरबद्ध किया राग मारूबिहाग पर आधारित, फिल्म ‘सेहरा’ का एक गीत मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनवा रहे हैं।



भारतीय संगीत में रागों के गायन-वादन का समय निर्धारण करने के लिए शास्त्रकारों ने अनेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। पिछले अंकों में हमने अध्वदर्शक स्वर और वादी-संवादी स्वर के आधार पर रागों के समय निर्धारण की प्रक्रिया पर चर्चा की थी। आज हम आपसे दिन के चौथे प्रहर के रागों पर चर्चा कर रहे हैं। इस प्रहर के अन्त में ही सायंकालीन सन्धिप्रकाश रागों का समय आता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार मध्यम स्वर के प्रकार से सन्धिप्रकाश रागों का निर्धारण भी किया जा सकता है। सन्धिप्रकाश काल उस समय को कहा जाता है, जब अन्धकार और प्रकाश का मिलन होता है। यह स्थिति चौबीस घण्टे की अवधि में दो बार उत्पन्न होती है। प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश और सायंकालीन सन्धिप्रकाश जिसे गोधूलि बेला भी कहते हैं। प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश रागों में शुद्ध मध्यम स्वर की तथा सायंकालीन सन्धिप्रकाश रागों में रागों में तीव्र मध्यम की प्रधानता होती है। भैरव, कलिंगड़ा, जोगिया आदि प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश रागों में शुद्ध मध्यम और मारवा, श्री, पूरिया आदि सायंकालीन सन्धिप्रकाश रागों में तीव्र मध्यम स्वर का प्रयोग होता है।

दिन के चौथे प्रहर में गाने-बजाने वाले रागों में तीव्र मध्यम स्वर की प्रधानता होती है। इस प्रहर के दो ऐसे ही राग का उदाहरण आज के अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं। इस प्रहर का एक प्रमुख राग ‘मारवा’ है। यह मारवा थाट का आश्रय राग है। इसकी जाति षाडव-षाडव होती है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में 6-6 स्वरों का प्रयोग होता है। राग मारवा में पंचम स्वर वर्जित होता है। ऋषभ स्वर कोमल, मध्यम स्वर तीव्र और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर धैवत होता है। अन्य रागों की तुलना में राग मारवा शुष्क और चंचल प्रकृति का राग है। इस राग में विलम्बित खयाल और मसीतखानी गते कम प्रचलित हैं। इस राग का प्रयोग करते समय तानपूरे का प्रथम तार मन्द्र निषाद में मिलाया जाता है, क्योंकि इस राग में शुद्ध मध्यम और पंचम दोनों स्वर वर्जित होते हैं। आपको हम इस राग का तीनताल में निबद्ध एक खयाल सुनवाते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, रामपुर सहसवान घराने की गायकी के संवाहक उस्ताद राशिद खाँ।


राग मारवा : “गुरु बिन ज्ञान नाहीं पावे...” : उस्ताद राशिद खाँ




राग मारवा के अलावा दिन के चौथे प्रहर के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- मुल्तानी, पटदीप, कोलहास, रत्नदीप, श्रीवन्ती, धौलश्री, मयूर बसन्त, पूर्वी, मारू बिहाग आदि। अब हम आपको एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं जो राग मारू बिहाग पर आधारित है। अभी आपने मारवा थाट का राग मारवा सुना जिसे, परमेल प्रवेशक राग भी कहा जाता है, क्योंकि इसके बाद कल्याण थाट के राग गाये जाते हैं। राग मारूबिहाग कल्याण थाट का राग है। इसे सन्धिप्रकाश राग भी कहा जाता है। यह राग औडव-सम्पूर्ण जाति का है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। राग में तीव्र मध्यम स्वर का प्रयोग मुख्यतः किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। राग मारूबिहाग में कल्याण और बिहाग रागों का मिश्रण होता है। इस राग में तीव्र मध्यम के साथ शुद्ध मध्यम का प्रयोग भी होता है। तीव्र मध्यम आरोह और अवरोह दोनों में किया जाता है, जबकि शुद्ध मध्यम केवल आरोह में षडज के साथ प्रयोग होता है। इस राग का चलन तीनों सप्तकों में समान रूप से होता है। 1963 में वी. शान्ताराम के निर्देशन में फिल्म ‘सेहरा’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म के संगीतकार वाराणसी के कुशल शहनाई-वादक रामलाल ने कई गीत रागों में बाँधे थे। राग मारूबिहाग पर आधारित यह गीत भी इस फिल्म में शामिल था। गीत में लता मंगेशकर और मुहम्मद रफी ने युगल-स्वर दिया था। आप राग मारूबिहाग की स्पष्ट छाया इस गीत में मिलती है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग मारूबिहाग : “तुम तो प्यार हो सजना...” : लता मंगेशकर और मुहम्मद रफी : फिल्म – सेहरा





संगीत पहेली - 235



‘स्वरगोष्ठी’ के 235वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको पुनः एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 240 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस गीतांश में किस राग की छाया है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायक और गायिका की आवाज़ को पहचान सकते हैं? यदि हाँ, तो उनके नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 19 सितम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 237वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 231वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘नौबहार’ के एक गीत का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – भीमपलासी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका – लता मंगेशकर

इस बार की पहेली में तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाली हमारी नियमित प्रतिभागी हैं, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और जबलपुर से क्षिति तिवारी। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ जारी है। अगले अंक में हम रात्रि के प्रथम प्रहर के कुछ रागों पर चर्चा करेंगे और आपको कुछ रागबद्ध रचनाएँ भी सुनवाएँगे। इस श्रृंखला के लिए आप अपनी पसन्द के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



 

Sunday, March 31, 2013

अतिथि संगीतज्ञ का पृष्ठ : पण्डित श्रीकुमार मिश्र



स्वरगोष्ठी – 114 में आज
अतिथि संगीतकार का पृष्ठ
स्वर एक राग अनेक 



‘स्वरगोष्ठी’ के आज के इस विशेष अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने सभी संगीत-प्रेमी पाठकों और श्रोताओं का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, आज का यह अंक एक विशेष अंक है। विशेष इसलिए कि यह अंक संगीत-जगत के एक जाने-माने संगीतज्ञ प्रस्तुत कर रहे हैं। दरअसल इस वर्ष के कार्यक्रमों की समय-सारिणी तैयार करते समय ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ ने माह के पाँचवें रविवार की ‘स्वरगोष्ठी’ किसी संगीतज्ञ लेखक से प्रस्तुत कराने का निश्चय किया था। आज माह का पाँचवाँ रविवार है और आपके लिए आज का यह अंक देश के जाने-माने इसराज व मयूर वीणा-वादक और संगीत-शिक्षक पण्डित श्रीकुमार मिश्र प्रस्तुत कर रहे है। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक के लिए उन्होने तीन ऐसे राग- पूरिया, सोहनी और मारवा का चयन किया है, जिनमें समान स्वरों का प्रयोग किया जाता है। लीजिए, श्रीकुमार जी प्रस्तुत कर रहे हैं, इन तीनों रागों में समानता और कुछ अन्तर की चर्चा, जिनसे इन रागों में और उनकी प्रवृत्ति में अन्तर आ जाता है। 

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा संचालित ‘स्वरगोष्ठी’ के संगीत-मंच पर संगीतानुरागियों से कुछ बातचीत करने का आज मुझे अवसर दिया गया है, इसके लिए मैं, श्रीकुमार मिश्र इस स्तम्भ के सम्पादक-मण्डल को धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ। आज मैं आपका ध्यान भारतीय संगीत के खजाने के तीन ऐसे रागों की तरफ आकर्षित करूँगा, जिनमें प्रयोग किये जाने वाले स्वर-समूह तो समान होते हैं, किन्तु उनके नाम, प्रवृत्ति और भाव में पर्याप्त भेद होता है। ऐसा ही एक स्वर-समूह है-

सा नी रे(कोमल) ग म(तीव्र) ध नी सां

ये स्वर-समूह तीन रागों- पूरिया, मारवा और सोहनी में प्रयुक्त होते हैं। जब तीनों रागों में स्वर एक है तो भाव अलग-अलग क्यों है? आज के आलेख में हम इसी ‘क्यों’ का उत्तर खोजने का प्रयास करते हैं। जब व्यक्ति दुःखी होकर भारी मन से अभिव्यक्ति देता है तो उसकी आवाज़ अपेक्षाकृत धीमी होती है। ये स्वर इस आवाज़ में राग पूरिया कायम करते हैं। इसी प्रकार जब क्लान्त और व्यथित मन को विश्रान्ति की तलाश होती है तब वह मध्यम आवाज़ में इन स्वरों का उच्चार करेगा, तब मारवा का रूप बनता है। और जब पीड़ा से त्रस्त होकर चीख-चीख कर पुकारने लगे तो यही स्वर राग सोहनी की उत्पत्ति करते हैं। राग पूरिया में वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद है। गान्धार व्यथा को उभारता है और निषाद थोड़ी देर के लिए शान्ति व एकाग्रता प्रदान कर देता है। भावानुसार पूरिया में विलम्बित रचनाएँ अत्यन्त भावपूर्ण प्रतीत होती हैं। इस राग के गायन-वादन का समय सूर्यास्त के बाद होता है। राग पूरिया में मींड़ के द्वारा भावों को एकसूत्र में रखा जाता है। आपके समक्ष राग पूरिया का स्वरूप और भाव स्पष्ट करने के उद्देश्य मैं आपको विख्यात गायक उस्ताद राशिद खाँ का गाया इस राग में एक खयाल सुनवाता हूँ।


राग पूरिया : ‘फूलवन की सेज बिछाओ...’ : उस्ताद राशिद खाँ



राग पूरिया में प्रयोग किये जाने वाले स्वरों को राग मारवा में भी प्रयोग किया जाता है, परन्तु इसकी प्रवृत्ति और भाव में पूरिया की तुलना में काफी अन्तर आता है। राग मारवा का वादी स्वर धैवत तथा संवादी स्वर ऋषभ होता है। धैवत स्वर उलझन से युक्त व्यथित व क्लान्त मन की अभिव्यक्ति कर देता है और ऋषभ (अपनी मूल श्रुति से उतरा हुआ) मन को शान्ति और विश्रान्ति प्रदान कर देता है। मारवा राग में मध्यलय की रचनाओं का प्रयोग अधिक स्पष्ट भाव कायम करता है। मारवा एक राग का नाम है और थाट का नाम भी होता है और राग मारवा, थाट मारवा का आश्रय राग माना जाता है। यह सूर्यास्त के समय प्रस्तुत किया जाने वाला राग होता है। राग पूरिया की तुलना में राग मारवा में मींड़ के बजाय सीधे स्वरों का सपाट प्रयोग अधिक करके भाव स्पष्ट किया जाता है। इस राग के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए मैं चाहूँगा कि आप सुप्रसिद्ध गायक पण्डित जसराज के स्वरों में राग मारवा की एक भक्तिपरक रचना सुनिए और राग की भावानुभूति कीजिए।


राग मारवा : ‘चरण प्रीत करुणानिधान की...’ : पण्डित जसराज





राग पूरिया और मारवा की तरह राग सोहनी में भी समान स्वरों का प्रयोग किया जाता है, किन्तु इसके प्रभाव और भावाभिव्यक्ति में पर्याप्त अन्तर हो जाता है। राग सोहनी का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। धैवत पीड़ा की अभिव्यक्ति करने में समर्थ होता है। ‘नी सां रें (कोमल) सां’ की स्वर संगति से तीव्र पुकार का वातावरण निर्मित होता है। संवादी गान्धार कुछ देर के लिए इस उत्तेजना को शान्त कर सुकून देता है। वास्तव में वादी और संवादी स्वर राग के प्राणतत्त्व होते हैं, जिनसे रागों के भावों का सृजन होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में राग सोहनी के भाव अधिक स्पष्ट होते हैं। इस राग में मींड़ एवं गमक को कसे हुए ढंग से मध्यलय में प्रस्तुत करने से राग का भाव अधिक मुखरित होता है। अब चलते-चलते तीनों रागों- पूरिया, मारवा और सोहनी के स्वरों के चलन पर एक दृष्टि डालते हैं, जिससे एक ही स्वर के बावजूद रागों में उत्पन्न होने वाले अन्तर स्पष्ट हो जाएँगे।आप इन स्वर-संयोजनों का तुलनात्मक अवलोकन कीजिए और उसके बाद राग सोहनी की एक रचना पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वरों में सुनिए।

राग पूरिया : नी रे(कोमल) ग, म(तीव्र) ध ग म(तीव्र) ग, म(तीव्र) रे(कोमल) ग s रे(कोमल) सा

राग मारवा : नी रे(कोमल) ग म(तीव्र) ध s, म(तीव्र) ग, रे(कोमल), ग रे(कोमल) सा

राग सोहनी : ग s म(तीव्र) ध नी सां s नी ध नी ध, म(तीव्र) ग, ग म(तीव्र) ध ग म(तीव्र) ग, रे(कोमल) सा

राग सोहनी के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए अब आप इस राग में निबद्ध एक रचना सुनिए, जिसे पण्डित कुमार गन्धर्व ने प्रस्तुत किया है।


राग सोहनी : ‘रंग न डारो श्याम जी...’ : पण्डित कुमार गन्धर्व





आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 114वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत-अंश किस ताल में निबद्ध किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 116वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से या swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ के 112वें अंक में हमने आपको 1996 की एक संगीतप्रधान फिल्म ‘सरदारी बेगम’ से ठुमरी अंग का एक होली गीत सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग पीलू और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर बैंगलुरु के पंकज मुकेश, जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का 


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर पिछले दो अंकों से विशेष अवसर के कारण हमारे लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’ के आगामी अंकों को हमे दो सप्ताह का विराम देना पड़ा। अगले रविवार को हम इस श्रृंखला को जारी रखते हुए आपको एक और रागमाला गीत सुनवाएँगे और उस गीत पर आपसे चर्चा भी करेंगे। प्रत्येक रविवार को प्रातः साढ़े नौ बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ उपस्थित होते हैं। आप सब संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि इस सांगीतिक अनुष्ठान में आप भी हमारे सहभागी बनें। आपके सुझाव और सहयोग से हम इस स्तम्भ को और अधिक उपयोगी स्वरूप प्रदान कर सकते हैं।


आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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