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Sunday, July 28, 2013

उस्ताद विलायत खाँ से सुनिए राग शंकरा


  
स्वरगोष्ठी – 130 में आज

भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति – 10

राग शंकरा पर आधारित एक अनूठा गीत

‘बेमुरव्वत बेवफा बेगाना-ए-दिल आप हैं...’


इन दिनों आप ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ का रसास्वादन कर रहे हैं। इस लघु श्रृंखला की दसवीं और समापन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों की इस संगोष्ठी में उपस्थित हूँ और आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत अब तक हम आपको राग-आधारित कुछ ऐसे फिल्मी गीत सुनवा चुके हैं, जो छः दशक से भी पूर्व की अवधि के हैं। रागों के आधार के कारण ये आज भी सदाबहार गीत के रूप में हमारे बीच प्रतिष्ठित हैं। परन्तु इनके संगीतकार हमारी स्मृतियों में धूमिल हो गए हैं। इस श्रृंखला को प्रस्तुत करने का हमारा उद्देश्य यही है कि इन कालजयी, राग आधारित गीतों के माध्यम से हम उन भूले-बिसरे संगीतकारों को स्मरण करें। आज के अंक में हम आपको 1966 की फिल्म ‘सुशीला’ का राग शंकरा पर आधारित एक सदाबहार गीत सुनवाएँगे और इस गीत के संगीतकार सी. अर्जुन के बारे में आपको कुछ जानकारी देंगे। इसके साथ ही विश्वविख्यात सितार वादक उस्ताद विलायत खाँ का का बजाया राग शंकरा का एक आकर्षक गत भी सुनवाएँगे। 

सी. अर्जुन
र्ष 1966 में श्री विनायक चित्र द्वारा निर्मित और महेन्द्र प्राण द्वारा निर्देशित फिल्म ‘सुशीला’ प्रदर्शित हुई थी। मधुर गीतों के कारण यह फिल्म अत्यन्त सफल हुई थी। फिल्म के संगीतकार थे सी. अर्जुन, जिनकी प्रतिभा का उचित मूल्यांकन फिल्म संगीत के क्षेत्र में नहीं हुआ। 1 सितम्बर, 1933 को सिन्ध (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्में सी. अर्जुन को संगीत अपने गायक पिता से विरासत में प्राप्त हुआ था। विभाजन के समय यह परिवार बड़ौदा आकर बस गया। सी. अर्जुन ने आरम्भ में कुछ समय तक रेलवे की नौकरी भी की, लेकिन संगीत के क्षेत्र में कुछ कर गुजरने के उद्देश्य से नौकरी छोड़ कर तत्कालीन बम्बई का रुख किया और यहाँ आकर संगीतकार बुलों सी. रानी के सहायक बन गए। उन दिनों गजलों के संगीत संयोजन में बुलों सी. रानी बड़े माहिर माने जाते थे। सी. अर्जुन ने गजल-संयोजन की कला उन्हीं से सीखी थी। स्वतंत्र संगीतकार के रूप में सी. अर्जुन की 1960 में प्रदर्शित प्रथम हिन्दी फिल्म ‘रोड नम्बर 303’ थी। इस फिल्म के गीत बेहद मोहक सिद्ध हुए। 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘मैं और मेरा भाई’ में सी. अर्जुन अपनी गजल-संयोजन की प्रतिभा को रेखांकित करने में सफल हुए।

मुबारक बेगम
इस फिल्म के गीतकार जाँनिसार अख्तर थे। गीतकार और संगीतकार की इस जोड़ी ने इसके बाद कई फिल्मों में आकर्षक और लोकप्रिय गज़लों से फिल्म संगीत को समृद्ध किया। फिल्म ‘मैं और मेरा भाई’ में जाँनिसार अख्तर की लिखी, आशा भोसले और मुकेश के स्वरों में गायी सदाबहार गजल- ‘मैं अभी गैर हूँ मुझको अभी अपना न कहो...’ ने सी. अर्जुन को अमर बना दिया। इस फिल्म के बाद उन्होने अपनी फिल्मों में स्तरीय गज़लों का सिलसिला जारी रखा। 1964 की फिल्म ‘पुनर्मिलन’ में- ‘पास बैठो तबीयत बहल जाएगी...’, 1965 की फिल्म ‘एक साल पहले’ में- ‘नज़र उठा कि ये रंगीं समाँ रहे न रहे...’ और 1966 में ‘चले हैं ससुराल’ जैसी कम बजट की फिल्म को भी उन्होने- ‘हमने तेरी वफ़ा का जफ़ा नाम रख दिया...’ जैसी लोकप्रिय गजल से सँवार कर अपनी प्रतिभा का रेखांकन किया। गज़लों के श्रेष्ठ संगीतकार के रूप में सी. अर्जुन की सबसे सफल और लोकप्रिय 1966 की ही फिल्म थी ‘सुशीला’। इस फिल्म में उन्हें एक बार फिर जाँनिसार अख्तर का साथ मिला। इस फिल्म के सभी गीतों को अपार ख्याति मिली। गायिका मुबारक बेगम की आवाज़ में फिल्म की एक गजल- ‘बेमुरव्वत बेवफा बेगाना-ए-दिल आप हैं...’ तो आज भी सदाबहार है। राग शंकरा पर आधारित यह गजल जाँनिसार अख्तर की शायरी और सी. अर्जुन के उत्कृष्ट संगीत के लिए सदा याद रखा जाएगा। लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ के आज के समापन अंक के लिए हमने राग शंकरा पर आधारित यही गीत चुना है। लीजिए, पहले आप यह गीत सुनिए।


राग शंकरा : फिल्म सुशीला : ‘बेमुरव्वत बेवफा बेगाना-ए-दिल आप हैं...’ : संगीत सी. अर्जुन 



उस्ताद विलायत खाँ
राग शंकरा भारतीय संगीत का एक गम्भीर प्रकृति का राग है। मयूर वीणा के सुविख्यात वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार, यह राग मानव की अन्तर्व्यथा को आध्यात्म से जोड़ने वाले भावों की अभिव्यक्ति के लिए समर्थ होता है। औड़व-षाड़व जाति के राग शंकरा के आरोह में ऋषभ और मध्यम तथा अवरोह में मध्यम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। उत्तरांग प्रधान इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी तार सप्तक का षडज स्वर होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर में यह राग गाने-बजाने की परम्परा है। इस राग के स्वरूप के बारे में विद्वानो में कुछ मत-भिन्नता भी है। कुछ विद्वान इस राग को औड़व-औड़व जाति का मानते हैं, अर्थात आरोह और अवरोह, दोनों में ऋषभ और मध्यम स्वर का प्रयोग नहीं करते। एक अन्य मतानुसार केवल मध्यम स्वर ही वर्जित होता है। वर्तमान में राग शंकरा का औड़व-षाड़व जाति ही अधिक प्रचलित है। आइए, अब हम आपको तंत्रवाद्य सितार पर एक मोहक गत सुनवा रहे हैं। विश्वविख्यात सितार-वादक उस्ताद विलायत खाँ से सभी संगीत-प्रेमी परिचित हैं। राग शंकरा की तीनताल में निबद्ध यह रचना उन्हीं की कृति है। आप इस आकर्षक सितार-वादन की रसानुभूति कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग शंकरा : सितार पर तीनताल की गत : वादक उस्ताद विलायत खाँ 




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 130वें अंक की पहेली में आज हम आपको सुषिर वाद्य पर एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। इस अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – वाद्य संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह भारतीय संगीत की कौन सी विधा अथवा शैली है?

2 – संगीत के इस अंश में किन तालों का प्रयोग किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 130वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 128वें अंक की पहेली में हमने आपको खयाल अंग में आलाप का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मियाँ की मल्हार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- पण्डित राजन और साजन मिश्र। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ का यह समापन अंक था। आगामी अंक में हम आपसे भारतीय संगीत की एक ऐसी शैली पर चर्चा करेंगे जो उपशास्त्रीय संगीत और लोक संगीत के क्षेत्र में समान रूप से लोकप्रिय है। अगले अंक में इस नई लघु श्रृंखला की अगली कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की प्रतीक्षा करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, November 11, 2012

नवोदित संगीत प्रतिभाओ के ताज़गी भरे स्वर


स्वरगोष्ठी - विशेष अंक में आज 

उत्तर प्रदेश की बाल, किशोर और युवा संगीत प्रतिभाएँ- देवांशु, पूजा, अपूर्वा और भैरवी


‘उत्तर प्रदेश के सुरीले स्वर’ 
देवांशु घोष को पुरस्कृत करते हुए 
महामहिम राज्यपाल
अन्य कला-विधाओं की भाँति पारम्परिक संगीत का विस्तार भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक होता रहा है। संगीत की नवोदित प्रतिभाओं को खोजने, प्रोत्साहित करने और उनकी प्रतिभा को सही दिशा देने में कुछ संस्थाएँ संलग्न हैं। इनमें एक नाम जुड़ता है, लखनऊ की संस्था ‘संगीत मिलन’ का। संगीत की शिक्षा, शोध और प्रचार-प्रसार में यह संस्था विगत ढाई दशक से संलग्न है। पिछले दिनों संस्था ने पूरे उत्तर प्रदेश में बाल, किशोर और युवा वर्ग की संगीत प्रतिभाओं को खोजने का अभियान चलाया, जिसका समापन गत रविवार को प्रदेश के महामहिम राज्यपाल बी.एल. जोशी के हाथों विजेता बच्चों को पुरस्कृत करा कर हुआ। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के विशेष अंक में हम इस प्रतिभा-खोज प्रतियोगिता में चुनी गईं संगीत प्रतिभाओं की गायकी से आपका परिचय कराएँगे।


न्नीसवीं शताब्दी के उत्तर प्रदेश में संगीत-शिक्षा के अनेक केन्द्र थे। वर्तमान समय में भी यह प्रदेश संगीत-शिक्षा की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस विस्तृत प्रदेश में समय-समय पर नवोदित संगीत प्रतिभाओं को खोजने का अभियान सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर चलता ही रहता है। गैर-सरकारी स्तर पर पिछले दिनों संगीत-संस्था 'संगीत मिलन' ने प्रतिभ खोज का यह अभियान सफलतापूर्वक सम्पादित किया। पूरे उत्तर प्रदेश से तीन आयु-वर्ग में संगीत प्रतिभाओं को खोजना, सरल नहीं था, किन्तु संस्था के कर्मठ कार्यकर्ताओं- मिलन देवनाथ, अरुंधति चौधरी, प्रदीप नारायण, मंजुला रॉय, मनीषा सक्सेना, अंजना मिश्रा, तरुण तपन भट्टाचार्य आदि ने लगभग चार मास के अथक श्रम से इस अभियान को सफल बनाया।

देवांशु घोष 
यह प्रतियोगिता तीन चरणों में सम्पन्न हुई। प्रथम चरण में प्रदेश के नौ केन्द्रों- गाजियाबाद, मथुरा, आगरा, बरेली, कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, वाराणसी और गोरखपुर में प्रतिभाओं का चयन किया गया। प्रथम चरण की प्रतियोगिता में पूरे प्रदेश से लगभग ४०० बाल, किशोर और युवा संगीत-विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। इनमें से ७८ का चयन दूसरे चरण की प्रतियोगिता के लिए किया गया। दूसरे चरण की प्रतियोगिता का आयोजन २८ अक्तूबर से २ नवम्बर के बीच लखनऊ में हुआ, जिसमें अन्तिम चरण के लिए २४ प्रतिभागियों को कुना गया। ३ नवम्बर को आयोजित अन्तिम चरण की प्रतियोगिता के दौरान प्रतिभागियो का उत्साह चरम पर था। उन्होने अपनी प्रतिभा का बढ़-चढ़ कर प्रदर्शन किया। वरिष्ठ शिक्षकों और संगीतज्ञों के एक दल ने मूल्यांकन कर विभिन्न पुरस्कारों के लिए इनका योग्यता के अनुसार निर्धारण किया। तीनों वर्गों में सर्वाधिक अंक अर्जित कर वाराणसी के देवांशु घोष ने ‘उत्तर प्रदेश के सुरीले स्वर’ (Classical Voice of Uttar Pradesh) का खिताब जीता। १० से १४ वर्ष आयु के बाल वर्ग के अन्तर्गत आने वाले देवांशु ने प्रतियोगिता के अन्तिम चरण में राग शंकरा का विलम्बित खयाल ‘हर हर महादेव...’ और द्रुत खयाल ‘तान तलवार ले...’ का गायन प्रस्तुत कर निर्णायकों समेत सभी दर्शकों को चकित कर दिया। देवांशु द्वारा राग शंकरा की प्रस्तुति का आप भी आनन्द लीजिए-

‘उत्तर प्रदेश की आवाज़’ : देवांशु घोष : वाराणसी : राग शंकरा



पूजा तिवारी 
बाल वर्ग में अन्तिम चरण की प्रतियोगिता के लिए कुल नौ बच्चों- आयुष श्रीवास्तव, शशांक दीक्षित, शाश्वत विश्वकर्मा और ऐश्वर्या गोपन (सभी कानपुर), भरत अंकित और देवांशु घोष (दोनों वाराणसी), चाहत मल्होत्रा और पूजा तिवारी (दोनों लखनऊ) तथा आरुल सेठ (गाजियाबाद) का चयन हुआ था। इनमें तीनों वर्गों में सर्वोच्च अंक पाकर देवांशु घोष तो ‘उत्तर प्रदेश के सुरीले स्वर’ बन ही चुके थे, इसके उपरान्त अधिकतम अंक अर्जित कर लखनऊ की पूजा तिवारी ने बालवर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इसी क्रम में वाराणसी के भरत अंकित को दूसरा और लखनऊ की चाहत मल्होत्रा को बाल वर्ग में तीसरा स्थान प्राप्त हुआ। आइए, बाल वर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त पूजा तिवारी से राग मधुवन्ती सुनते हैं, जिसे उन्होने अन्तिम चयन के दौरान प्रस्तुत किया था। पूजा ने राग मधुवन्ती में दो खयाल प्रस्तुत किये। विलम्बित रचना के बोल थे- ‘लाल के नैना अंजन सोहे...’ और द्रुत खयाल के बोल थे- ‘पवन पुरवाई...’। बाल वर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली इस बालिका की प्रस्तुति में स्पष्ट शब्दोच्चार का गुण भी आपको परिलक्षित होगा।


बाल वर्ग में प्रथम : पूजा तिवारी : लखनऊ : राग मधुवन्ती



अपूर्वा तिवारी
१५ से १९ वर्ष आयु अर्थात किशोर वर्ग में अन्तिम प्रतियोगिता के लिए सात प्रतियोगियों का चयन हुआ, जिनमें वाराणसी से चार- अपूर्वा तिवारी, चारुलता मुखर्जी, पूर्णेश भागवत और विलीना पात्रा, लखनऊ से दो- महिमा तिवारी और सृष्टि पाण्डेय तथा कानपुर से एकमात्र अपूर्वा भट्टाचार्य ने अन्तिम चरण में अपनी-अपनी प्रतिभा का श्रेष्ठ प्रदर्शन किया। यह भी एक संयोग ही था कि किशोर वर्ग में प्रथम, द्वितीय और तृतीय, तीनों स्थानों पर वाराणसी के प्रतियोगियों का आधिपत्य रहा। यही नहीं पूरे उत्तर प्रदेश से अन्तिम प्रतियोगिता के लिए चुने गए २४ प्रतियोगियों में वाराणसी और कानपुर से सात-सात तथा लखनऊ से छः प्रतिभागी थे। इस तथ्य से यह भी स्पष्ट होता है कि प्रदेश के इन तीन नगरों में संगीत-शिक्षण की व्यवस्था सन्तोषजनक है। किशोर वर्ग की अन्तिम प्रतियोगिता में प्रथम स्थान अपूर्वा तिवारी को, द्वितीय स्थान पूर्णेश भागवत को और तृतीय स्थान विलीना पात्रा को मिला। प्रथम स्थान प्राप्त अपूर्वा ने अन्तिम चरण में राग चन्द्रकौंस के दो खयाल क्रमशः ‘आवत ब्रज की नार...’ और ‘गोकुल गाँव के छोरा...’ का जैसा मोहक गायन प्रस्तुत किया था, उन्हें अब आप भी सुनिए। 

किशोर वर्ग में प्रथम : अपूर्वा तिवारी : वाराणसी : राग चन्द्रकौंस


बी. भैरवी

प्रदेश स्तर पर आयोजित इस संगीत-प्रतिभा-प्रतियोगिता के युवा वर्ग में २० से २४ वर्ष आयु के संगीत-प्रतिभाओं ने हिस्सा लिया। इस वर्ग में अन्तिम चरण के लिए लखनऊ से दो, देविका रॉय और शैलेन्द्र यादव, कानपुर से भी दो, अपर्णा द्विवेदी और सीता यादव, बरेली से जयश्री मुखर्जी, वाराणसी से बी. भैरवी, आगरा से शीतल चौहान, इलाहाबाद से विनीता श्रीवास्तव का चयन किया गया था। इन प्रतियोगियों के बीच काँटे की टक्कर रही। अन्ततः इस वर्ग में प्रथम स्थान की हकदार वाराणसी की बी. भैरवी बनीं। द्वितीय स्थान आगरा की शीतल चौहान को और तृतीय स्थान लखनऊ की देविका रॉय ने प्राप्त किया। प्रथम पुरस्कार पाने वाली बी. भैरवी ने अन्तिम चरण की प्रतियोगिता में राग पूरिया धनाश्री में दो चटकदार खयाल प्रस्तुत कर सबका मन मोह लिया था। इस प्रस्तुति में विलम्बित खयाल के बोल थे- ‘बलि बलि जाऊँ...’ और द्रुत तीनताल की अत्यन्त लोकप्रिय बन्दिश ‘पायलिया झनकार मोरी...’ थी। बी. भैरवी की गायी राग पूरिया धनाश्री की इन दोनों रचनाओं का रसास्वादन आप भी कीजिए। 


युवा वर्ग में प्रथम : बी. भैरवी : वाराणसी : राग पूरिया धनाश्री 


महामहिम राज्यपाल के साथ विजेता बच्चे
इन विजयी संगीत-प्रतिभाओं के अलावा प्रथम चरण की प्रतियोगिता प्रदेश के जिन अलग-अलग केन्द्रों पर आयोजित हुई थी, उन केन्द्रों पर सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों को भी पुरस्कृत किया गया। नगर की श्रेष्ठ प्रतिभा के रूप में पुरस्कृत इन प्रतिभाओं ने पुरस्कार वितरण समारोह के अवसर पर प्रदेश के महामहिम राज्यपाल बी.एल. जोशी के सम्मुख अलग-अलग रागों की बन्दिशों से पिरोयी एक आकर्षक रागमाला प्रस्तुत कर सबका मन मोह लिया। इस प्रस्तुति के प्रतिभागी थे, शीतल चौहान (आगरा), पूजा तिवारी (लखनऊ), अपूर्वा तिवारी (वाराणसी), आरुल सेठ (गाजियाबाद), सीता यादव (कानपुर), विनीत श्रीवास्तव (इलाहाबाद), जयश्री मुखर्जी (बरेली) तथा कृतिका (गोरखपुर)। महामहिम राज्यपाल ने विजेताओं को पुरस्कृत करते हुए इस तथ्य पर आश्चर्य व्यक्त किया कि अधिकांश प्रतिभाएँ पारम्परिक संगीत परिवार के नहीं हैं। उन्होने संस्था के कार्यकर्त्ताओं की भरपूर सराहना भी की।

संगीत प्रतिभाओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ का उपहार 

‘संगीत मिलन’ द्वारा आयोजित संगीत प्रतियोगिता के बाल, किशोर और युवा वर्ग के सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएँ। आप सबको हम अपने साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ की सहर्ष सदस्यता प्रदान करते हैं। आप सब निरन्तर हमारे सम्पर्क में रहें और समय-समय पर अपनी प्रगति से हमें अवगत कराते रहें। आप अपने कार्यक्रमों के चित्र, आडियो, वीडियो आदि हमे भेजिए, विशेष अवसरों पर हम उनका उपयोग करेंगे। आपकी सांगीतिक गतिविधियाँ ‘स्वरगोष्ठी’ अथवा हमारे अन्य नियमित स्तम्भ में शामिल कर हमें खुशी होगी। नीचे दिये गए ई-मेल पर आप बेहिचक हमसे सम्पर्क कर सकते हैं।  


आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ का आज का यह अंक विशेष अंक है, जिसके माध्यम से हमने संगीत के कुछ नवोदित हस्ताक्षरों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया है। इसलिए इस अंक में हम पहेली नहीं दे रहे हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक से पहेलियों का सिलसिला पूर्ववत जारी रहेगा। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा swargoshthi@gmail.com  या  radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ जारी है। इस अंक में हमने आपसे कुछ नवोदित प्रतिभाओं परिचय कराया है। इसके लिए हमने जारी श्रृंखला को एक सप्ताह का विराम दिया है। ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में अपनी जारी श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के अन्तर्गत हम प्रस्तुत करेंगे, एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी भैरवी- ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय...’। यह ठुमरी आप पण्डित भीमसेन जोशी, विदुषी गिरिजा देवी, पण्डित राजन-साजन मिश्र और फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ में चर्चित गायक-अभिनेता कुन्दनलाल सहगल के स्वरों में सुनेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में रविवार, प्रातः ९-३० बजे हम इसी मंच पर पुनः मिलेंगे। अब हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


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