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Saturday, April 5, 2014

आइये आज सम्मानित करें 'सिने पहेली' प्रतियोगिता के विजेताओं को...

'सिने पहेली 'पुरस्कार वितरण सभा


'सिने पहेली' के सभी चाहनेवालों को सुजॉय चटर्जी का एक बार फिर से प्यार भरा नमस्कार। जैसा कि आप जानते हैं कि 'सिने पहेली' के महामुकाबले के अनुसार श्री प्रकाश गोविन्द और श्री विजय कुमार व्यास इस प्रतियोगिता के संयुक्त महाविजेता बने हैं, और साथ ही श्री पंकज मुकेश, श्री चन्द्रकान्त दीक्षित और श्रीमती क्षिति तिवारी सांत्वना पुरस्कार के हक़दार बने हैं। आज के इस विशेषांक के माध्यम से आइये इन सभी विजेताओं को इनके द्वारा अर्जित पुरस्कारों से सम्मानित करें। यह है 'सिने पहेली' प्रतियोगिता का पुरस्कार वितरण अंक।



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से महाविजेता को मिलता है 5000 रुपये का नकद इनाम। क्योंकि प्रकाश जी और विजय जी संयुक्त महाविजेता बने हैं, अत: यह राशि आप दोनों में समान रूप से विभाजित की जाती है। 

श्री प्रकाश गोविन्द को 2500 रुपये की पुरस्कार राशि बहुत बहुत मुबारक़ हो! आपके बैंक खाते पर यह राशि ट्रान्सफ़र कर दी गई है।














रेडियो प्लेबैक इंडिया : प्रकाश जी, इस पुरस्कार को स्वीकार करते हुए आप अपने बारे में और 'सिने पहेली' के साथ आपके सफ़र के बारे में कुछ कहना चाहेंगे?

प्रकाश गोविन्द : जी ज़रूर कहना चाहूँगा। जहाँ तक अपनी बात है, 1992 में 'स्वतंत्र भारत' समाचार पत्र से बतौर संवाद सूत्र के रूप में शुरुआत, तत्पश्चात 'अमर उजाला' समाचार पत्र में संवाददाता, उसके बाद 'राष्ट्रीय सहारा दैनिक' से जुड़ा, आखिर में 'समाचार भारती' में उप-सम्पादक के रूप में कार्य किया। साथ ही जमकर स्वतंत्र लेखन भी। कई फीचर एजेंसियों के लिए नियमित लेखन। देश की अधिकाँश पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हुईं। कुछ वर्षों से ब्लॉग लेखन में भी सक्रिय रहा हूँ। वर्तमान में स्वयं का व्यवसाय एवं साथ ही एक NGO चला रहा हूँ। रूचियों में शामिल हैं अध्ययन, क्विज़, शतरंज, पेंटिंग, पर्यटन, गायन, और क्लासिक सिनेमा। 

'सिने पहेली' के साथ मेरा जुड़ाव बहुत ही अच्छा रहा। 100 सप्ताह कोई छोटा समय नहीं होता, बल्कि बहुत ही लम्बा समय था। मैं अपने आप को भाग्यशाली समझता हूँ कि शुरु से लेकर अन्त तक मैं इससे जुड़ा रह सका। 'सिने पहेली' सुलझाते हुए बहुत मज़ा आया। It was full of fun and  excitement. और पूरे सीरीज़ में आपने पहेलियों के स्तर को कायम रखा। हालाँकि मैं एक सिनेमा-प्रेमी हूँ और इससे जुड़ी बहुत सी बातों का ज्ञान है मुझे, पर 'सिने पहेली' में पूछे गये सभी सवालों के जवाब मुझे मालूम नहीं थे। सवालों के जवाब ढूंढने के लिए मुझे सिनेमा और संगीत की कुछ किताबें भी खरीदनी पड़ी (जो इस इनाम राशि से ज़्यादा हैं)। पर मुझे इसका कोई अफ़सोस नहीं है क्योंकि इन किताबों के माध्यम से बहुत सी नई जानकारियाँ मिलीं। सुजॉय जी ने बहुत मेहनत की है, और हर एपिसोड में कुछ नया कर दिखाया है। Hats off to him!"

रेडियो प्लेबैक इंडिया : बहुत बहुत धन्यवाद प्रकाश जी, और एक बार फिर से आपको बधाई!

और अब हम आमन्त्रित करते हैं दूसरे सह-महाविजेता विजय कुमार व्यास जी को। विजय जी, आप यह पुरस्कार स्वीकार करें! आपके बैंक खाते पर यह राशि ट्रान्सफ़र कर दी गई है।














रेडियो प्लेबैक इंडिया : आप से भी हम जानना चाहेंगे आपके बारे में और 'सिने पहेली' के बारे में आपकी प्रतिक्रिया भी जानना चाहते हैं।

विजय कुमार व्यास : पहेलियॉं खेलने में रूचि और उत्‍साह बचपन से ही रहा। स्‍कूल-कॉलेज के दिनों में खूब क्विज खेले परन्‍तु पत्र पत्रिकाओं में किस तरह भाग लिया जाता है, उस समय पता नहीं था। 1995 से पत्र पत्रिकाओं व समाचार पत्रों की पहेलियॉं खेलनी प्रारम्‍भ की। 'राष्‍ट्रदूत साप्‍ताहिक' पत्रिका में जब प्रथम पुरस्‍कार 25 रूपये हुआ करता था, तब मैंने अपनी पहली प्रतियोगिता जीती जो कि एक चित्र शीर्षक प्रतियोगिता थी। उसके बाद अब तक विभिन्‍न पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, टीवी क्विज, ऑनलाईन क्विज व अन्‍य मिलाकर लगभग 175 से अधिक बार प्रतियोगिताऍं जीत चुका हूँ एवं कुछ पत्रिकाओं में लघु आर्टिकल भी छपें हैं। मेरे परिवार के सभी लोग फिल्‍मों में रूचि रखतें हैं क्‍योंकि दादाजी फिल्‍म एवं गीत-संगीत प्रेमी थे। वे रेडियो में गाने सुन सुनकर लिखा करते थे। पिताजी भी 'बिनाका गीतमाला' का रजिस्‍टर बनाकर रखते थे। हालांकि अब मेरे दादाजी व पिताजी इस दुनिया में नहीं परन्‍तु मेरे संयुक्‍त परिवार में मेरे तीन चाचाजी एवं मेरे परिवार सहित हम कुल 21 सदस्‍य हैं।

बहरहाल, स्‍वयं के बारे में यही बताना चाहूँगा कि कॉलेज टॉप के साथ मास्‍टर ऑफ कॉमर्स की डिग्री प्राप्‍त करने के बाद मेरा चयन राजस्‍थान लोक सेवा आयोग के माध्‍यम से 18 वर्ष पूर्व राजकीय सेवा में हुआ। हालांकि कम्‍प्‍यूटर में मैंने कोई डिग्री हासिल नहीं की परन्‍तु मैंने इसे 1996 से ही अपना लिया और घर पर ही कम्‍प्‍यूटर सीखा। राजकीय सेवा के साथ-साथ पुस्‍तकें पढने, पहेलियॉं खेलने एवं कम्‍प्‍यूटर उपयोग मेरी दैनिक दिनचर्या में शामिल है। फिलहाल लगभग सभी विषयों की पुस्‍तकें घर पर लाता हूँ जिनमें मुख्‍यत: सिने ब्लिट्ज, स्‍टारडस्‍ट, फिल्‍म फेयर, यैस ओशो, कल्‍याण, क्रिकेट सम्राट, बालहंस, छोटूमोटू, अहा जिन्‍दगी, सुमन सौरभ, सरस सलिल, हंस, बिन्दिया, गृहशोभा इत्‍यादि है। अब तक लगभग सभी पत्रिकाओं की क्विज खेली और कईं बार विजेता रहा। इसके अतिरिक्‍त दैनिक भास्‍कर, राजस्‍थान पत्रिका, दैनिक नवज्‍योति, हिन्‍दुस्‍तान, द टाईम्‍स ऑफ इण्डिया एवं राष्‍ट्रदूत समाचार पत्रों के कईं क्विज/कॉन्‍टेस्‍ट में प्रथम स्‍थान प्राप्‍त किया। ऑनलाईन प्रतियोगिताओं में दैनिक भास्‍कर की WHO SAID IT, सबसे बडा मैच फिक्‍सर, Know & Go Contest तथा फोटो कॉन्‍टेस्‍ट जीता एवं सिम्‍पली जयपुर पत्रिका में भी फोटो कॉन्‍टेस्‍ट एवं मासिक पत्रिका 'फुल टेंशन' में भी कईं बार विजेता रहा।

रेडियोप्‍लेबैक के साथ यह ऑनलाईन सिने पहेली खेलना एक अद्भुत संस्‍मरण बन गया है। फेसबुक के माध्‍यम से इस लिंक पर पहुँचा और पहेली खेलना प्रारम्‍भ किया तो मात्र अपना फिल्‍मी ज्ञान जॉंचनें के लिए। प्रतियोगिता के तीसरे सेगमेंट के बीच से हिस्‍सा लेने के बावजूद सिने पहेली के नियम देखकर लगा कि यदि मेहनत की जाए तो इसमें आगे की पायदान पर पहुँचा जा सकता है। फिर क्‍या, प्रति सप्‍ताह अवकाश के दिन पहेली को परिजनों के साथ बैठकर हल करता। कभी किसी प्रश्‍न का उत्‍तर नहीं मिलता तो अपने फिल्‍म प्रेमी मित्रों से मदद लेता। इस सफर में बहुत से नए दोस्‍त बने।  ऑनलाईन नहीं बल्कि ऑफलाईन अर्थात अपने बीकानेर के ही, क्‍योंकि पहेलियों के उत्‍तर के लिए कई बार खूब घूमना पडता और इसी दौरान हर सप्‍ताह पता चलता रहा कि बीकानेर जैसे छोटे शहर में बहुत सारे फिल्‍म प्रेमी मौजूद है जिन्‍हें बहुत सी बातें बिना किसी इन्‍टरनेट या ऑंकडों के मुँह जुबानी याद है। पिछले कुछ महीनों से तो जो भी मिलता, वह पूछता '''कैसी चल रही है पहेली, कहॉं तक पहुँचे'' आदि।

हॉं, एक बात और कि सिने पहेली का प्रारम्‍भ से जॉंच किया तो पता चला कि लगभग सभी प्रतियोगियों ने सिने पहेली प्रारम्‍भ करने के बाद कोई ना कोई ऐपिसोड मिस किया है परन्‍तु मैंने जिस सैगमेन्‍ट से खेलना प्रारम्‍भ किया, उसके बाद बिना किसी ऐपिसोड मिस किये लगातार फाईनल तक अनवरत खेला। यहॉं तक कि मेरे साथ संयुक्‍त विजेता रहे प्रकाश जी ने भी एक पूरा सेगमेण्‍ट नहीं खेला। हालांकि प्रकाश जी ने जब खेलना छोडा तो पहेली का मजा कम होने लगा था परन्‍तु अप्रेल, 2013 से वे वापस आए और तब मेरे लिये यह एक चैलेन्‍ज जैसा हो गया। इस पहेली में मेरे द्वारा भाग नहीं लेने तक प्रकाश जी तीन सेगमेण्‍ट में प्रथम स्‍थान प्राप्‍त कर चुके थे परन्‍तु मेरे आने के बाद मैंनें 7 में से 5 सेगमेण्‍ट में प्रथम स्‍थान प्राप्‍त किया और यह मेरे लिए बहुत बडी उपलब्धि रही क्‍योंकि प्रकाश जी जैसे धुरन्‍धर खिलाडी की चुनौती को मैंनें सहर्ष स्‍वीकार करते हुए अपना शत प्रतिशत देने की कोशिश की और आप सभी की शुभकामनाओं से इस ऑनलाईन पहेली में उनके साथ संयुक्‍त विजेता बना।

सुजॉय जी के बारे में तो क्‍या कहना। जब भी पहेली आती और सबके सामने रखता तो सर्वप्रथम यही बात आती कि वाह ! पहेली बनाने वाले ने कितना दिमाग लगाया है और क्‍या क्‍या आईडिया, कहॉं कहॉं से लाते हैं। वाकई, सुजॉय जी की सभी पहेलियॉं रचनात्‍मक और दिलचस्‍प रही। आपके लिए तो बस यही कहूँगा कि सेगमेंट/महामुकाबला जीतने में बहुत पसीना आया । बडे ही रोचक प्रश्‍न बनाते हैं आप।  मेरे हिसाब से प्रतियोगियों को जितनी मेहनत प्रश्‍न के हल के लिए करनी पडी उससे कहीं अधिक मेहनत आपको प्रश्‍न बनाने में करनी पडी होगी।

इसके अतिरिक्‍त रेडियोप्‍लेबैक के सभी संचालकों का हार्दिक आभार जिन्‍होनें समय समय पर सभी प्रतियोगियों की काफी हौसलाअफजाई की और 100 सप्‍ताह से भी अधिक समय तक सफल आयोजन करने के साथ साथ प्रतियोगियों में समन्‍वय बनाकर इसे अविस्‍मरणीय बना दिया । पहेली के अन्‍य सभी साथी प्रतियोगियों का भी बहुत बहुत धन्‍यवाद जिनके कारण पहेली में रोचकता बनी रही, विशेषकर पंकज जी, क्षिति जी एवं चन्‍द्रकान्‍त जी का आभार और सांत्‍वना पुरस्‍कार जीतने पर बधाई । प्रकाश जी को संयुक्‍त विजेता बनने पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऍं। आशा है शीघ्र ही किसी मोड पर फिर मुलाकात होगी।

रेडियो प्लेबैक इंडिया : विजय जी, बहुत बहुत धन्यवाद आपका इन विचारों के लिए और एक बार फिर से आपको बधाई!

और अब श्री पंकज मुकेश, श्री चन्द्रकान्त दीक्षित और श्रीमती क्षिति तिवारी को हम प्रदान करना चाहेंगे पुरस्कार स्वरूप यह पुस्तक- 


यह पुरस्कार आपके डाक के पते पर भेज दिया जायेगा। अप्रैल माह के अन्त तक आपको यह पुस्तक प्राप्त होगी।

तो यह था 'सिने पहेली' प्रतियोगिता का पुरस्कार वितरण समारोह। आशा है आप सब को अच्छा लगा होगा। विजेताओं को एक बार फिर से बधाई देते हुए यह अंक यहीं समाप्त करते हैं, नमस्कार।


प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी

Thursday, January 31, 2013

गायक मुकेश फिल्म ‘अनुराग’ में बने संगीतकार


भारतीय सिनेमा के सौ साल – 34

स्मृतियों का झरोखा : ‘किसे याद रखूँ किसे भूल जाऊँ...’



 
भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों का झरोखा’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का पाँचवाँ गुरुवार है और नए वर्ष की नई समय सारिणी के अनुसार माह का पाँचवाँ गुरुवार हमने आमंत्रित अतिथि लेखकों के लिए सुरक्षित कर रखा है। आज ‘स्मृतियों का झरोखा’ का यह अंक आपके लिए पार्श्वगायक मुकेश के परम भक्त और हमारे नियमित पाठक पंकज मुकेश लिखा है। पंकज जी ने गायक मुकेश के व्यक्तित्व और कृतित्व पर गहन शोध किया है। अपने शुरुआती दौर में मुकेश ने फिल्मों में पार्श्वगायन से अधिक प्रयत्न अभिनेता बनने के लिए किये थे, इस तथ्य से अधिकतर सिनेमा-प्रेमी परिचित हैं। परन्तु इस तथ्य से शायद आप परिचित न हों कि मुकेश, 1956 में प्रदर्शित फिल्म ‘अनुराग’ के निर्माता, अभिनेता और गायक ही नहीं संगीतकार भी थे। आज के ‘स्मृतियों का झरोखा’ में पंकज जी ने मुकेश के कृतित्व के इन्हीं पक्षों, विशेष रूप से उनकी संगीतकार-प्रतिभा को रेखांकित किया है।


भारतीय सिनेमा अपने शताब्दी वर्ष की पूर्णता की ओर अग्रसर है। इस अवसर पर हम सिनेमा से जुड़े कुछ भूले-बिसरे तथ्यों, घटनाओं, कृतियों और लोगों का स्मरण कर रहे हैं। आज हम आपसे सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक मुकेश (मुकेशचन्द्र माथुर) के व्यक्तित्व के कुछ अन्य पक्षों पर चर्चा करेंगे। गायक मुकेश को दुनिया "दर्द भरे गीतों के सरताज गायक" की उपाधि से जानती है, मगर सच तो यह है कि वो केवल गायक ही नहीं बल्कि अभिनेता, निर्माता और संगीतकार भी थे। सर्वप्रथम वो परदे पर नज़र आये अपनी पहली फिल्म "निर्दोष"(1941) में नलिनी जयवन्त के साथ एक गायक और अभिनेता के रूप में। यह मुकेश जी का सौभाग्य था की उनको भी अपने आराध्य कुन्दनलाल सहगल की तरह उस दौर में गायक-अभिनेता बनने का मौका मिल गया और साथ ही उनको अपनी ज़िन्दगी का पहला एकल गीत- ‘दिल ही बुझा हुआ हो तो...’ और पहला अप्रदर्शित युगलगीत नलिनी जयवन्त के साथ गाया- ‘तुम्ही ने मुझको प्रेम सिखाया...’ और पहला प्रदर्शित युगल गीत- ‘मैं हूँ परी, बन की परी...’ गाने और अभिनीत करने का अवसर मिला। दरअसल मुकेश जब अक्टूबर 1939 में बम्बई (अब मुम्बई) आए थे तब उनका ध्येय गायक नहीं बल्कि अभिनेता बनना था। सहगल जी को सुन-सुन कर वे अच्छा गाने भी लगे थे। उनकी अभिनीत कुछ फिल्में हैं- ‘निर्दोष’ (1941), ‘दुःख-सुख’ (1942), ‘आदाब अर्ज़’ (1943), ‘माशूका’ (1953), ‘अनुराग’ (1956) और ‘आह’ (1953)। इन फिल्मों में से फिल्म ‘आह’ में उन्होने मेहमान कलाकार के रूप में गाड़ीवान की भूमिका में अभिनय किया था और गीत- "छोटी सी ये ज़िंदगानी...” का गायन भी किया था।

1956 में मुकेश ने ‘मुकेश फिल्म्स’ के बैनर तले अपनी एक फिल्म ‘अनुराग’ का निर्माण किया था। यह निर्माता के रूप में मुकेश की पहली फिल्म नहीं थी। इससे पहले भी वे निर्माता बन चुके थे। यह फिल्म इसलिए उल्लेखनीय मानी जाएगी कि इस फिल्म में मुकेश पहली बार संगीतकार बने। इससे पहले कि हम आपसे इस फिल्म के बारे में विस्तार से चर्चा करें, आपको फिल्म ‘अनुराग’ से मुकेश का संगीतबद्ध किया और गाया गीत- ‘किसे याद रखूँ किसे भूल जाऊँ...’ सुनवाते हैं। इस गीत को कैफ इरफानी ने लिखा है।

फिल्म ‘अनुराग’ : ‘किसे याद रखूँ किसे भूल जाऊँ...’ : स्वर और संगीत - मुकेश




फिल्म ‘अनुराग’ मुकेश द्वारा निर्मित पहली फिल्म नहीं थी। इससे पहले 1951 में उन्होने ‘डार्लिंग फिल्म’ के बैनर तले फिल्म ‘मल्हार’ का निर्माण किया था। परन्तु इस फिल्म के संगीतकार मुकेश स्वयं नहीं बल्कि उनके अभिन्न मित्र रोशन थे। मुकेश जी की गायन प्रतिभा तो अद्वितीय थी ही, अवसर मिलने पर उन्होने अपनी अभिनय और संगीत संयोजन की क्षमता को भी प्रदर्शित किया। फिल्म ‘अनुराग’ उनकी संगीत रचना की प्रतिभा को रेखांकित करने का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह फिल्म प्रेम त्रिकोण पर आधारित थी, जिसे निर्देशित किया था मधुसूदन नें। इस फिल्म के अन्य कलाकार थे- मृदुला, उषाकिरण, प्रतिमा, शिवराज, उमादेवी (टुनटुन) आदि। इसके गीत एच.एम.वी. रिकार्ड पर जारी हुए थे। आइए, अब हम आपको फिल्म ‘अनुराग’ का दूसरा बेहद लोकप्रिय गीत ‘तेरे बिन सूना सूना लागे इस दुनिया का मेला...’ सुनवाते हैं, जिसे मुकेश के संगीत निर्देशन में उनकी मुहबोली बहन लता मंगेशकर ने स्वर दिया था।

फिल्म ‘अनुराग’ : ‘तेरे बिन सूना सूना लागे...’ : स्वर – लता मंगेशकर : संगीत – मुकेश




फिल्म ‘अनुराग’ से पहले मुकेश एक पार्श्वगायक के रूप में सफल हो चुके थे। इसके साथ ही अभिनय के गुरों से भी परिचित हो चुके थे। ‘अनुराग’ से पहले भी वो करीब चार फिल्मों में अभिनय-गायन कर चुके थे, यद्यपि ये फिल्में बहुत ज्यादा कमाल नहीं दिखा सकीं। ये कहना अधिक उपयुक्त होगा कि कुछ मिला-जुला असर रहा, मगर इन सभी फिल्मों में अभिनय तथा उनके अन्य गीतों ने उन्हें खूब शोहरत दी। 1950 तक उनका फ़िल्मी सफ़र अपने शबाब पर था, दुनिया की नज़रों में उन्होंने खुद को एक सफल गायक के रूप स्थापित कर लिया था । गायकी में उनकी कामयाबी फिल्म ‘पहली नज़र’ (1945) से शुरू हुई, फिर ‘चेहरा’, ‘राजपूतानी’ (1946), ‘दो दिल’, ‘नीलकमल’, ‘तोहफा’ (1947), ‘आग’, ‘अनोखा प्यार’, ‘अनोखी अदा’, ‘मेला’, ‘वीणा’, ‘विद्या’ (1948), ‘अंदाज़’, ‘बरसात’, ‘शबनम’, ‘सुनहरे दिन’ (1950), तक रुकी नहीं। इस दौर में महान गायक मोहम्मद रफ़ी के साथ किशोर कुमार का भी आगमन हो चुका था, मगर शीर्ष पर नाम मुकेश का रहता। फिर क्या था, 1950 तक की कामयाबी ने उन्हें हर तरह के नए फैसले और प्रयोग करने की जैसे छूट भी दे दी थी। उस दौर में वो अपने अन्दर छुपी हर तरह की प्रतिभा को सामने लाने की कोशिश करते थे। गायकी की सफलता ने जैसे उनमें एक जुनून सा भर दिया जो उनके आन्तरिक बहुमुखी प्रतिभा को परदे पर लाने के लिए मजबूर कर देता था। अपने ख़ास दोस्त राज कपूर के कला, अभिनय या फिर फिल्म-निर्माण को देख कर शायद उनका भी मन करता होगा कि वो भी राज जैसा कुछ करें। कामयाबी का उत्साह इतना उफान पर था कि जब उन्हें फिल्म ‘माशूका’ (1953) का अनुबन्ध मिला तो फ़ौरन हस्ताक्षर कर दिया, जिसमें लिखे वाक्य "जब तक फिल्म ‘माशूका’ पूरी नहीं हो जाती वो किसी दूसरे निर्माता के फिल्म में गाना भी नहीं गायेंगे" को पढ़ना ही जैसे भूल गए। आइए यहाँ थोड़ा विराम लेकर हम आपको फिल्म ‘अनुराग’ का एक और गीत ‘पल भर ही की पहचान में परदेसी सनम से...’ सुनवाते हैं, जिसे लिखा गीतकार इन्दीवर ने।

फिल्म ‘अनुराग’ : ‘पल भर ही की पहचान में...’ : स्वर और संगीत – मुकेश




अति उत्साह में हस्ताक्षरित फिल्म ‘माशूका’ के अनुबन्ध के कारण मुकेश के फ़िल्मी सफ़र में बहुत बड़ा व्यवधान उत्पन्न हुआ। यहाँ तक की राज कपूर के लिए वो फिल्म ‘चोरी-चोरी’ और ‘श्री 420’ के गाने नहीं गा सके। 50 के दशक में ‘बावरे-नैन’, ‘आवारा’, ‘बादल’, ‘मल्हार’, आदि फिल्मों के सफल गीतों के बावजूद मुकेश, रफ़ी साहब से पीछे हो गए, जिनको कि 60 के दशक में किशोर कुमार ने पीछे छोड़ दिया। फिल्म ‘माशूका’ के गाने और अभिनय में कुल 3 साल लग गए। उसी दौरान वो फिल्म-निर्माण का निर्णय लेकर खाली समय में फिल्म ‘अनुराग’ के निर्माण की योजना बनानी शुरू की। चूँकि यह मुकेश की अपनी निर्माण संस्था ‘मुकेश फिल्म्स’ की फिल्म थी इसलिए वो कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक स्वतंत्र थे। अब हम आपको फिल्म ‘अनुराग’ का वह गीत सुनवाते हैं, जिसमें लता जी के स्वर की मधुरिमा है। गीत के बोल हैं- ‘नज़र मिला कर नज़र चुराना...’ और इसके गीतकार हैं कैफ इरफानी।



फिल्म ‘अनुराग’ : ‘नज़र मिला कर नज़र चुराना...’ : स्वर – लता मंगेशकर : संगीत – मुकेश




फिल्म ‘माशूका’ 1953 में प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म में मुकेश को अभिनय के लिहाज़ से कोई खास सफलता भी नहीं मिली, फिर भी गायकी की तुलना में उन्होने अभिनय को अभी तक सीने से लगाये रखा। निर्माता बनने का प्रयास उन्होंने ‘अनुराग’ से 2 साल पहले ही किया था जब वो फिल्म ‘मल्हार’ का निर्माण कर चुके थे। इस फिल्म के गाने बहुत ही लोकप्रिय हुए थे। ‘बड़े अरमान से रखा है बलम तेरी कसम...’ मुकेश और लता के आवाज़ से सजा ये गाना ‘मल्हार’ को हिट साबित करने में सहायक था। मुकेश हमेशा नए कलाकारों को मौका देने के पक्ष में रहते थे, इसीलिए ‘मल्हार’ में वो केवल गायक और निर्माता बने रहे। अभिनय के लिए चुना गया नए कलाकार अर्जुन और शम्मी को। मल्हार की सफलता ने उन्हें एक बार फिर से आगे फिल्मों में पैसा लगाने का फैसला लेने पर बाध्य कर दिया, और फिल्म ‘अनुराग’ के लगभग हर क्षेत्र का जिम्मा अपने सर ले लिया। फिर चाहे अभिनय हो, गायन हो, निर्माण हो या फिर संगीत का ही दायित्व क्यों न हो? दूसरे शब्दों में ‘अनुराग’ पूरी तरह से मुकेश पर आधारित फिल्म थी। ठीक इसी तरह संगीतकार बनने का फैसला उनका पहला नहीं था, ‘अनुराग’ से पहले भी उन्होंने कुछ गैर-फ़िल्मी गीत, नज़्म, गज़ल आदि स्वरबद्ध कर चुके थे, जैसे- ‘जियेंगे मगर मुस्कुरा न सकेंगे...’ (1952- कैफ इरफानी), ‘दो जुल्मी नैना हम पे जुलम करे...’ (कैफ इरफानी) इत्यादि। शायद यही वजह रही होगी कि उन्होने कैफ इरफानी को गीतकार के रूप में इन्दीवर के साथ ‘अनुराग’ में लिया। एक बार उन्होंने विविध भारती के अपने एक साक्षात्कार में कहा था- "हर एक गायक अपने में एक संगीतकार होता हैं। मगर एक संगीतकार जब गायक भी होता हैं तो उसके काम का महत्व बढ़ जाता है।" उदाहरण के लिए उन्होंने सचिनदेव बर्मन, सी रामचन्द्र आदि संगीतकारों का नाम लिया। अब आइये आपको सुनवाते हैं, इसी फिल्म का एक और गीत जिसे एक बार फिर आवाज़ दी है लता जी ने। गीत है- ‘जिसने प्यार किया उसका दुश्मन ज़माना...’ और इसे लिखा कैफ इरफानी ने।


फिल्म ‘अनुराग’ : ‘जिसने प्यार किया...’ : स्वर – लता मंगेशकर : संगीत – मुकेश




फिल्म ‘अनुराग’ को सेंसर सर्टिफिकेट 15 जून, 1956 कोमिला था। इस फिल्म में मुकेश ने कुल 9 गीतों को अपनी धुनों में पिरोया था और केवल दो गीतों में अपनी आवाज़ दी। चूँकि फिल्म प्रेम त्रिकोण पर आधारित थी और नायिकाएँ दो थी इसलिए महिला स्वर (लता जी का) का वर्चस्व था। फिल्म के अन्य गीत थे- ‘मन चल मन चंचल...’ (इन्दीवर), शमशाद बेगम और मधुबाला झावेरी का गाया ‘आज हम तुम्हे सुनाने वाले हैं...’ (इन्दीवर), मन्ना डे की आवाज़ में ‘हो सका दो दिलों का ना मेल रे...’ (इन्दीवर) तथा इन्दीवर का ही लिखा गीत ‘ये कैसी उलझन है...’। कुल मिला कर मुकेश का फिल्म ‘अनुराग’ बनाने का अनुभव बड़ा अच्छा रहा। बिना किसी परेशानी के फिल्म पूरी हुई। रिलीज़ भी हुई मगर बॉक्स आफ़िस पर एक असफल फिल्म साबित हुई। इस फिल्म के बाद मुकेश ने अभिनय, संगीत निर्देशन, निर्माण आदि से तौबा कर लिया और आजीवन केवल गायन पर पूरा ध्यान देने का फैसला कर लिया।


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘स्मृतियों का झरोखा’ के अन्तर्गत आज हमने अपने अतिथि लेखक पंकज मुकेश का खोजपूर्ण आलेख प्रस्तुत किया। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों का झरोखा’ के आगामी अंक में आपके लिए फिल्म-इतिहास के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। आप अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें radioplaybackindia@live.com पर भेजें।


शोध व आलेख : पंकज मुकेश 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   




Thursday, July 26, 2012

स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल -7


मैंने देखी पहली फिल्म

भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों के झरोखे से’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का चौथा गुरुवार है और आज बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ की। इस द्विसाप्ताहिक स्तम्भ के पिछले अंक में सुनीता शानू की देखी पहली फिल्म के संस्मरण के साझीदार रहे। आज का संस्मरण रेडियो प्लेबैक इण्डिया के नियमित पाठक बैंगलुरु के पंकज मुकेश का है। यह भी प्रतियोगी वर्ग की प्रविष्ठि है।

‘मैं ना भूलूँगा...’

मेरे जीवन की पहली फिल्म, जो सिनेमाघर में देखी, वो है- ‘हमसे है मुक़ाबला’। प्रभुदेवा और नगमा अभिनीत इस फिल्म में ए.आर. रहमान का संगीत था। रहमान हिन्दी फिल्मी दुनिया में उस समय नये-नये आए थे, अपनी 2-3 सफल फिल्मों (रोजा, बाम्बे आदि) के बाद। संगीत के साथ-साथ प्रभुदेवा का डांस वाकई कमाल का था। हिन्दी डबिंग के गीतकार पी.के. मिश्रा के गाने भी बहुत मक़बूल हुए थे। ये फिल्म मैंने अपने स्कूल के 2-4 दोस्तों के साथ बिना किसी इच्छा के, देखने गया था। बात उस समय की है जब यह फिल्म पहली बार परदे पर प्रदर्शित हुई और अपने शहर बनारस (वाराणसी) में लगी थी। टेलीविजन पर लगभग हर फिल्मों से सम्बन्धित कार्यक्रम जैसे-चित्रहार, countdaown शो इत्यादि में ‘हमसे है मुकाबला’ के गीत खूब प्रसारित होते थे। यह सब देख कर मन तो जरूर करता था की फिल्म देखी जाए, मगर सिनेमाघर में जा कर फिल्म देखना मेरे जैसे दसवीं कक्षा का विद्यार्थी होने तथा एक अध्यापक का पुत्र होने के नाते खुद को रोकना भी पड़ता था। कारण, कहीं पापा को बुरा न लगे। उस समय बच्चों का फ़िल्में देखना अच्छा नहीं माना जाता था और आज भी यही होता है।

२-३ महीनों बात एक अवसर मिला। वह १४अगस्त का दिन था। अगले दिन स्वतंत्रता दिवस के कारण जल्दी छुट्टी होनी थी। उस दिन हम सभी छात्र स्कूल जाते, कुछ कार्यक्रम होते, कुछ में भाग लेते, तिरंगा फहराते और फिर छुट्टी। मेरे कुछ सहपाठी लोग फिल्म देखने की योजना बना रहे थे। तभी किसी ने मुझसे पूछा- ‘क्या तुम हमारे साथ फिल्म देखने चलोगे’? मेरे लिए एक असमंजस की बात थी। आज तक कभी गया नहीं, मगर सुझाव बुरा भी नहीं था, फिर भी कहा- ‘पापा से पूछ कर बताऊंगा’। दोस्तों ने कहा- ‘ठीक है अगर चलना हो तो सारे कार्यक्रम के बाद हमारे साथ चलना, १२ से ३ वाला शो देखेंगे’। पूरा दिन बीत गया कि कैसे पापा से अनुमति मांगूं, फिल्म देखने की? क्या सोचेंगे? बच्चा कहीं बिगड़ तो नहीं रहा, कोई देशभक्ति फिल्म भी तो नहीं लगी है इस समय, जो अनुमति मांगने में मेरी मदद करे। कैसे कहूँ? फिर मैंने सोचा, कल ही तुरंत स्कूल में सारे कार्यक्रम समाप्त होते ही पापा को बता दूंगा। अगर हाँ कहेंगे, तो जाऊंगा। पापा मेरे उसी स्कूल में अध्यापक भी थे, तो कोई परेशानी भी नहीं हुई। जब पापा से कहा तो बोले- ‘कैसे जाओगे? मैंने सब कुछ सही सही बता दिया और पापा ने कहा- ‘जाओ मगर संभल कर जाना, और साथ में कुछ पैसे भी दिए। शायद पापा को लगा होगा कि बेटा कभी फिल्म देखने नहीं गया और आज पहली बार अनुरोध किया तो मना करना ठीक नहीं होगा। मैं बहुत खुश हुआ था। हम सभी लोग अपनी अपनी साइकल से अपने स्कूल के ड्रेस- सफ़ेद रंग के शर्ट, पैंट, पी.टी.शू वाले सफ़ेद जूते मोज़े और शर्ट की जेब पर लगे प्लास्टिक के एक तिरंगे प्रतीक समेत सिनेमाघर की ओर चल पड़े। १०:३० बजे स्कूल से रवाना हुए और बीच में इधर उधर घूमते-रुकते ११:३० बजे मलदहिया स्थित आनंद मंदिर सिनेमाघर। उन दिनों टिकट-दर ८, १०, और बालकनी का १२ रुपये हुआ करता था।

फिल्म शुरु होने से पहले हम सभी के मन में दो बातें उत्सुकतावश घर कर गई थी। पहली, ये कि फिल्म "हम से है मुकाबला" एक तमिल फिल्म "कादलन" का हिंदी रूपांतरण था, इस तरह से हिंदी में संवाद रूपान्तरण के कारण सभी पात्रों के होंठों के हिलने में अंतर मिलेगा, क्योंकि संवाद मूलतः तमिल भाषा में थे और अगर हिंदी में सभी संवाद बनाये गए होंगे तो किस तरह से तमिलभाषी लोग हिंदी बोल पा रहे हैं। दूसरी बात यह थी की इस फिल्म के दो गीत "उर्वशी उर्वशी..." तथा "मुक्काला मुकाबला होगा..." में प्रभुदेवा की नृत्य गति बहुत तेज़ थी और ऐसा हम लोग सोचते थे कि पहले इन दोनों गानों का पूरा डांस देखेंगे फिर सोचेंगे की ऐसा डांस हमारे हिंदी फिल्मों के कलाकार गोविंदा कर पायेंगे या नहीं, क्योंकि टेलीविजन पर केवल बेस्ट सीन ही दिखाते। फिल्म पूरी देखने के बाद यकीन हुआ कि प्रभुदेवा का "फास्ट डांस" में कोई मुकाबला नहीं कर सकता।

लीजिए, पंकज मुकेश की देखी पहली फिल्म ‘हमसे है मुक़ाबला’ से एक बेहद लोकप्रिय गीत- "उर्वशी उर्वशी..."

आपको पंकज मुकेश जी की देखी पहली फिल्म का संस्मरण कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। आप भी हमारे इस आयोजन- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ में भाग ले सकते हैं। आपका संस्मरण हम रेडियो प्लेबैक इण्डिया के इस अनुष्ठान में सम्मिलित तो करेंगे ही, यदि हमारे निर्णायकों को पसन्द आया तो हम आपको पुरस्कृत भी करेंगे। आज ही अपना आलेख और एक चित्र हमे swargoshthi@gmail.com पर मेल करें। जिन्होने आलेख पहले भेजा है, उन प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपना एक चित्र भी भेज दें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Saturday, July 21, 2012

पार्श्वगायक मुकेश के जन्मदिवस पर विशेष प्रस्तुति


सावन का महीना और मुकेश का अवतरण


हिन्दी फिल्मों में १९४१ से १९७६ तक सक्रिय रहने वाले मशहूर पार्श्वगायक स्वर्गीय मुकेश फिल्म-संगीत-क्षेत्र में अपनी उत्कृष्ठ स्तर की गायकी के लिए हमेशा याद किये जाते रहे हैं। हिन्दी फिल्मों में उन्हें सर्वाधिक ख्याति उनके गाये दर्द भरे नगमों से मिली। इसके अलावा उन्होने कई ऐसे गीत भी गाये हैं, जो राग आधारित गीतों की श्रेणी में आते हैं। २२ जुलाई, २०१२ को मुकेश जी का ८८-वां सालगिरह है। आज उनके जन्मदिवस की पूर्वसंध्या पर रेडियो प्लेबैक इंडिया के नियमित पाठक और मुकेश के अनन्य भक्त पंकज मुकेश, इस विशेष आलेख के माध्यम से मुकेश के गाये गीतों की चर्चा कर रहे हैं। साथ ही आपको सुनवा रहे हैं उनके गाये कुछ सुमधुर गीत।


मित्रों, मानसून के आने से ऋतुओं की रानी वर्षा, अपने पूरे चरम पर विराजमान है। दरअसल सावन के महीने और पार्श्वगायक मुकेश के बीच सम्बन्ध बहुत ही गहरा है। मुकेश जी की बहन चाँद रानी के अनुसार २२जुलाई, १९२३ को रविवार का दिन था, धूप खिली थी और मुकेश के जन्म के साथ ही अचानक सावन की रिमझिम बूँदें बरस पड़ीं और पूरा माहौल खुशनुमा हो गया। आइये शुरुआत करते हैं उन्हीं के गाये एक गीत से जो अक्सर घर पर किसी बच्चे के जन्म पर गया जाता है और हर माता-पिता अपने नवजात शिशु से ऐसी ही आशाएं लगाते होंगे जो इस गीत में विद्यमान है।

फिल्म ‘मन मन्दिर’ : "ऐ मेरे आँखों के पहले सपने..." : सहगायिका लता मंगेशकर 


आज पूरे भारतवर्ष में मुकेश को "दर्द भरे गीतों का जादूगर" कहा जाता है मगर राग आधारित गीतों से भी उनका लगाव रहा है। जब किसी एक साक्षात्कार में मुकेश जी से पूछा गया कि- "आप ने यूं तो सैकड़ों गाने गाये हैं मगर आप को किस तरह के गीत सबसे ज्यादा पसंद हैं?" इस पर उनका जवाब था- "अगर मुझे दस लाइट सॉंग (हलके फुल्के गाने) मिले और एक सैड (दर्द भरा गीत) मिले तो मैं दस लाइट छोड़कर एक सैड पसंद करूँगा और अगर मुझे दस सैड गाने मिले और एक क्लासिकल (शास्त्रीय), तो मैं दस सैड छोड़ कर एक क्लासिकल पसंद करूँगा!" तो आइये उन्ही का गाया एक राग आधारित गीत सुनवाते हैं। १९४८ में नौशाद के संगीत निर्देशन की एक फिल्म थी ‘अनोखी अदा’। इस फिल्म में मुकेश ने राग दरबारी कान्हड़ा पर आधारित एक बेहद सुरीला गाना गाया था- ‘कभी दिल दिल से टकराता तो होगा...’। इस राग पर आधारित जो भी स्तरीय गीत अब तक बने हैं, उनमें यह गीत भी शामिल है। फिल्म में मुकेश के गाये इस गीत का एक दूसरा संस्करण भी है, जिसे शमशाद बेगम ने गाया है। कहने की जरूरत नहीं है कि गीत के दोनों संस्करण में दरबारी के सुर स्पष्ट उभर कर आते हैं।

फिल्म ‘अनोखी अदा’ : ‘कभी दिल दिल से टकराता तो होगा...’ : राग दरबारी कान्हड़ा पर आधारित



यह भी एक विचित्र संयोग है कि मुकेश ने राग तिलक कामोद पर आधारित लगभग ७-८ गाने गाये हैं और ये सभी गाने बहुत लोकप्रिय हुए है। अब आइये आपको सुनवाते हैं, राग तिलक कामोद पर आधारित उनके प्रारंभिक दौर का एक सुमधुर गीत, जो उनके जीवन का पहला हिट गीत- "दिल जलता है तो जलने दे" (पहली नज़र) के आने से कुछ महीने पहले का है। फ़िल्म 'मूर्ति' का यह गीत राग तिलक कामोद पर आधारित है और इस गीत में उनकी सह-गायिकाएँ है- खुर्शीद और हमीदा बानो। संगीत बुलो सी रानी का है।

फिल्म ‘मूर्ति’ : "बदरिया बरस गई उस पार..." : राग तिलक कामोद पर आधारित



दोस्तों, समय सावन के महीने का है और मुकेश जी का जन्म भी इसी महीने में हुआ था, तो क्यूँ न सावन के मौसम पर उनका कोई गीत सुन लें। ऐसे अवसर के लिए सबसे पहला गीत जो हर किसी संगीत-प्रेमी या मुकेश-प्रेमी के मन में आता होगा, वह है फ़िल्म 'मिलन' का गीत "सावन का महीना पवन करे सोर..."। इस गीत के शुरुआत में आपने मुकेश और लता के बीच का संवाद जरूर पसंद किया होगा। कितने आश्चर्य की बात है कि लता जी "शोर" शब्द का सही उच्चारण कर रही हैं, मगर मुकेश हैं कि उन्हें "शोर" के बजाय "सोर" कहने के लिए आग्रह कर रहे हैं। दरअसल फिल्म की कहानी के अनुसार ही ऐसा संवाद रखा गया है, जिसमें नायक गाँव का एक भोला-भाला, अनपढ़ इंसान है जो नायिका को गाने की शिक्षा दे रहा है, और पूरे उत्तर भारत के गाँवों के लोग 'श' को 'स' उच्चारण करते है, जिसको परदे पर और परदे के पीछे बखूबी प्रस्तुत किया गया है। इस गीत से जुड़ी परदे के पीछे की एक और बात मैं आप सब को बताना चाहता हूँ। हमारे साथी राजीव श्रीवास्तव (लेखक, कवि, गीतकार और फिल्मकार) जब संगीतकार-जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के प्यारेलाल जी से पूछा तो पता चला कि जब ये गीत रिकॉर्ड होना था, उसी दौरान मुकेश जी को दिल का दौरा पड़ गया। अस्पताल से उपचार के बाद गाना रिकॉर्ड होना था, सभी तैयारियां हो गई। लता और मुकेश दोनों ने अभ्यास कर लिया। मगर आज हम इस गीत को जिस प्रकार सुनते हैं, शायद उसका प्रारूप ऐसा न होता, अगर मुकेश जी न होते। असल में जब नायक, नायिका को गाने का अभ्यास करा रहा था, उस समय आलाप, नायक को अर्थात्‍ मुकेश जी को लेना था। मगर उनकी बीमारी को ध्यान में रखते हुए संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी में यह हिम्मत नहीं हुई कि आलाप के लिए उनसे आग्रह करें, जो मुकेश के लिए कष्टदायक हो सकता था। मगर मुकेश जी संगीत के प्रति समर्पित जीवट के गायक थे। वो इस बात को भली-भांति जान गए और अभ्यास के दौरान लता से शर्त भी रख ली कि अगर मेरा आलाप उपयुक्त नहीं हुआ तो वो लता को १०० रुपये देंगे, नहीं तो लता देंगी। संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी को इस बात की बिलकुल भनक भी नहीं हुई कि कुछ बदलाव भी होने वाला है। गाना रिकॉर्ड होने से ठीक पहले वायदे के मुताबिक मुकेश जी ने अपने बटुवे से १०० रुपये का एक नोट निकाल कर, लता को चुपके से इशारा करते हुए शर्ट की जेब में डाल लिया। गाना शुरू हुआ, दोनों लोग गाने लगे, पहला अंतरा अपने अनुसार हुआ मगर जैसे ही दूसरा अंतरा पूरा हुआ, मुकेश जी ने आलाप लेना शुरू कर दिया। यह निश्चित किया गया था कि आलाप के स्थान पर वाद्य यंत्रों से भर दिया जाएगा। मुकेश के आलाप करते ही सब चौंक गए, किन्तु रेकार्डिंग जारी रहा। गाने की रेकॉर्डिंग समाप्त होने पर पता चला कि संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल यही चाहते भी थे। राग पहाड़ी पर आधारित यह गीत आप भी सुनिए।

फिल्म ‘मिलन’ : "सावन का महीना पवन करे सोर..." राग पहाड़ी पर आधारित

दोस्तों, मुकेश जी को जहाँ हम दर्द भरे गीतों का गायक मानते हैं, वहीँ संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी उन्हें "अपने गीतों का सही गवैया" मानते हैं। जब फिल्म सरस्वती चन्द्र का गीत "चन्दन सा बदन चंचल चितवन..." मुकेश की आवाज़ में रिकॉर्ड होना तय हुआ तो किसी शास्त्रीय गायक ने कल्याणजी से कहा- "हम जैसे सुरों के साधक बसों में धक्के खाते फिरते है और मुकेश एक फिल्मी पार्श्वगायक होकर मर्सिडीज़ में कैसे चलते हैं? उस वक्त तो कल्याणजी चुप रहे, मगर गाना रिकॉर्ड होने के बाद जब उन्हें सुनाया तो बोले "अब समझ में आया मुकेश मर्सिडीज़ में क्यों चलते हैं”? मुकेश बिना किसी ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) के राग आधारित गीत खूब गा लेते थे। दरअसल ये मुकेश जी का शास्त्रीय संगीत के प्रति लगाव ही था जो ऐसे गीत उनके होंठ लगते ही सुसज्जित हो उठते हैं। गायन की जो कुछ भी शिक्षा उन्होंने पायी, वो शुरुआती दिनों (१९४०-१९४५) में पंडित जगन्नाथ जी से मिली। अब आपको जो गीत सुनाया जा रहा है, वह राग कल्याण पर आधारित है।

फिल्म ‘सरस्वती चन्द्र’ : "चन्दन सा बदन चंचल चितवन..." : राग कल्याण पर आधारित



संगीतकार रोशन और गायक मुकेश न केवल फ़िल्मी दुनिया में एक दूसरे के व्यावसायिक तौर पर मित्र थे अपितु दोनों बचपन में एक ही विद्यालय के सहपाठी भी थे। जब भी कभी कोई विद्यालय में संगीत, नाटक इत्यादि कार्यक्रम का आयोजन होता, दोनों लोग ज़रूर शरीक होते। जहाँ मुकेश गीत गाते वहीँ रोशन संगीत की बागडोर सँभालते, उनका बखूबी साथ निभाते थे। तो आइये क्यूँ न एक बहुत ही लोकप्रिय गीत सुना जाये जो इन दो कलाकारों द्वारा सृजित किया गया है। इस गीत के बनने का किस्सा बड़ा ही दिलचस्प है। इन्दीवर के लिखे इस गीत के लिए रोशन ने कुछ धुन तैयार की थी मगर उन्हें कुछ पसंद नहीं आ रहा था। यूँ लगता था मानो कुछ कमी है, कुछ नया होना चाहिए जो उस समय के माझी, नाव, नदी आदि गीतों की धुनों से अलग हो। करीब पूरा महीना बीत गया मगर कुछ बात नहीं बनी। ऐसे में अचानक एक दिन रोशन, मुकेश और इन्दीवर के साथ अपना हारमोनियम लेकर कार से सैर पर निकले। एक जगह तालाब दिखा तो बैठ कर कुछ क्षण बिताने का मन हुआ। रोशन ने जैसे ही अपना पांव तालाब के शीतल जल में डाला, अचानक दोनों साथियों से बोल पड़े- "धुन बन रही है", जल्दी से कार से हारमोनियम लाये और वहीँ बैठे तीनों ने मिल कर गीत के संगीत की रचना कर डाली। अगले ही दिन स्टूडियो में जाकर यह गीत रिकॉर्ड हो गया। यह गीत लोक-धुन की सोंधी खुशबू से सराबोर है।

फिल्म ‘अनोखी रात’ : “ओह रे ताल मिले नदी के जल में..." : लोक संगीत पर आधारित

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मुकेश के गाये गीतों में राग-आधारित अनेक गीत लोकप्रिय हुए। इन गीतों में राग भैरवी और तिलक कामोद के स्वरों में गाये गीतों की संख्या अधिक हैं। ये दोनों राग उनकी आवाज़ में बहुत अच्छे भी लगते हैं। अब चलते-चलते राग भैरवी के सुरों पर आधारित एक प्यारा सा गीत आपको सुनाते हैं। यह गीत 1966 की फिल्म तीसरी कसम का है, जिसे मुकेश ने अपना स्वर दिया था। बीच-बीच में राज कपूर की आवाज भी है। इस गीत में लोक संगीत का स्पर्श है और भैरवी के स्वर भी मौजूद हैं।

फिल्म ‘तीसरी कसम’ : “दुनिया बनाने वाले..." : राग भैरवी पर आधारित

शोध व आलेख- पंकज मुकेश

इसी गीत के साथ हम सब गायक मुकेश को अपनी भावांजलि अर्पित करते है। अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए radioplaybackindia@live.com पर मेल भेजें।

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