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Wednesday, February 24, 2010

तेरा ख़याल दिल को सताए तो क्या करें...तलत साहब को उनकी जयंती पर ढेरों सलाम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 355/2010/55

ज २४ फ़रवरी है, फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध पार्श्व गायक तलत महमूद साहब का जनमदिवस। उन्ही को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ख़ास पेशकर इन दिनों आप सुन रहे हैं 'दस महकती ग़ज़लें और एक मख़मली आवाज़'। दोस्तों, इस शृंखला में हमने दस ऐसे लाजवाब ग़ज़लों को चुना है जिन्हे दस अलग अलग शायर-संगीतकार जोड़ियों ने रचे हैं। अब तक हमने साहिर - सचिन, मजरूह - जमाल सेन, नक्श ल्यायलपुरी - स्नेहल, और शेवन रिज़्वी - धनीराम/ख़य्याम की रचनाएँ सुनवाए हैं। आज एक और नायाब जोड़ी की ग़ज़ल पेश-ए-ख़िदमत है। यह जोड़ी है प्रेम धवन और पंडित गोबिन्दराम की। लेकिन आज की ग़ज़ल का ज़िक्र अभी थोड़ी देर में हम करेंगे, उससे पहले आपको हम बताना चाहेंगे कि किस तरह से तलत महमूद साहब ने अपना पहला फ़िल्मी गीत रिकार्ड करवाया था। तलत महमूद जब बम्बई में जमने लगे थे तब एक अफ़वाह फैल गई कि वो गाते वक़्त नर्वस हो जाते हैं। उनके गले की लरजिश को नर्वसनेस का नाम दिया गया। इससे उनके करीयर पर विपरीत असर हुआ। तब संगीतकार अनिल बिस्वास ने यह बताया कि उनके गले की यह कम्पन ही उनकी आवाज़ की खासियत है। जब तलत महमूद ने कोशिश कर के बिना कम्पन के गीत गाना शुरु किया तो अनिल दा उनसे बेहद नाराज़ हो गए, और कहा कि मुझे तुम्हारे गले की वह लरजिश ही चाहिए और उसी लरजिश की वजह से मैंने तुम्हे अपना गाना दिया है। इससे तलत साहब का हौसला बढ़ा और अनिल दा के संगीत निर्देशन में फ़िल्म 'आरज़ू' के लिए उनका पहला फ़िल्मी गीत "अए दिल मुझे ऐसी जगह ले चल" रिकार्ड हुआ। उसके बाद तलत साहब ने पीछे मुड़कर दुबारा नहीं देखा और एक के बाद एक बेहतरीन गीत और ग़ज़लें गाते चले गए, और उनके गाए इन बेमिसाल मोतियों की फ़ेहरैस्त लम्बी, और लम्बी होती चली गई।

अब आते हैं हम आज की ग़ज़ल पर। जैसा कि हमने बताया, आज की ग़ज़ल के शायर हैं प्रेम धवन और मौसीक़ार हैं पंडित गोबिन्दराम। फ़िल्म 'नक़ाब' की यह ग़ज़ल है "तेरा ख़याल दिल को सताए तो क्या करें"। पंडित गोबिन्दराम फ़िल्म संगीत के दूसरी पीढ़ी के संगीतकार थे, जिन्होने बहुत सारी फ़िल्मों में संगीत दिया है। सन् १९३७ में फ़िल्म 'जीवन ज्योति' से अपनी पारी की आग़ाज़ करने वाले गोबिन्दराम ने आरम्भिक फ़िल्मों (ख़ूनी जादूगर, हिम्मत, आबरू, पगली, सहारा, सलमा) से ही अपना सिक्का जमा लिय था। संगीत और लोकप्रियता की दृष्टि से फ़िल्म 'दो दिल' ('४७) गोबिन्दराम की सफल फ़िल्मों में अन्यतम है। रीदम और लयकारी पंडित जी के संगीत के ख़ास पहलू हैं। कोरल एफ़ेक्ट्स का उन्होने बड़े सृजनात्मक अंदाज़ में इस्तेमाल दिखाया है। यह जो आज की हमारी फ़िल्म है 'नक़ाब', यही गोबिन्दराम की अंतिम महत्वपूर्ण फ़िल्म थी। मधुबाला और शम्मी कपूर अभिनीत लेखराज भाकरी की १९५५ की इस फ़िल्म में गोबिन्दराम ने लता से कई सुंदर गीत गवाए जैसे कि "ऐ दिल की लगी कुछ तू ही बता", "मेरे सनम तुझे मेरी क़सम", "हम तेरी सितम का कभी शिकवा ना करेंगे" आदि। लता-रफ़ी का गाया "कब तक उठाएँ और ये ग़म इंतज़ार का" भी एक लोकप्रिय रचना है। पर इस फ़िल्म का सब से मक़बूल गीत है तलत साहब का गाया हुआ आज की प्रस्तुत ग़ज़ल। आइए दोस्तों, पंडित गोबिन्दराम, प्रेम धवव और तलत महमूद को अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए यह ग़ज़ल सुनें, जिसके तीन शेर कुछ इस तरह से हैं -

तेरा ख़याल दिल को सताए तो क्या करें,
दम भर हमें क़रार ना आए तो क्या करें।

जब चांद आए तारों की महफ़िल झूम के,
दिल बार बार तुझको बुलाए तो क्या करें।

कटती नहीं है रात अब तेरे फ़िराक़ में,
हम दिलजलॊं को नींद ना आए तो क्या करें।



क्या आप जानते हैं...
कि जब के. आसिफ़ ने 'मुग़ल-ए-आज़' फ़िल्म की योजना बनाई थी तो संगीतकार के रूप में पहले पंडित गोबिन्दराम को ही चुना था। लेकिन उस समय यह फ़िल्म नहीं बन सकी। बाद में जब इस फ़िल्म को नए सिरे से शुरु किया गया तब तक गोबिन्दराम फ़िल्म जगत को छोड़ चुके थे।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

1. मतले में ये दो शब्द हैं - "जिदगी" और "अँधेरी", बताईये ग़ज़ल के बोल.-३ अंक.
2. खान मस्ताना के नाम से गाने वाले गायक हैं इस गीत के संगीतकार, किस नाम से उन्हें क्रेडिट दिया गया है- ३ अंक.
3. फिल्म के नायक थे भारत भूषण, नायिका का नाम बताएं- २ अंक.
4. इस गज़ल के शायर कौन हैं - सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
वाह वाह मज़ा आया, शरद जी आपके हैं २७ अंक अब तक, इंदु जी पीछे हैं १२ अंकों पर और अवध जी उनके ठीक पीछे, देखें पहले कौन शतक बनाता है

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, September 26, 2009

इतना भी बेकसों को न आसमान सताए...पंडित गोविन्दराम के सुरों के लिए स्वर मिलाये लता ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 214

"मुझसे चलता है सर-ए-बज़्म सुखन का जादू,
चांद ज़ुल्फ़ों के निकलते हैं मेरे सीने से,
मैं दिखाता हूँ ख़यालात के चेहरे सब को,
सूरतें आती हैं बाहर मेरे आइने से।

हाँ मगर आज मेरे तर्ज़-ए-बयाँ का ये हाल,
अजनबी कोई किसी बज़्म-ए-सुखन में जैसे,
वो ख़यालों के सनम और वो अलफ़ाज़ के चांद,
बेवतन हो गए अपने ही वतन में जैसे।

फिर भी क्या कम है, जहाँ रंग ना ख़ुशबू है कोई,
तेरे होंठों से महक जाते हैं अफ़कार मेरे,
मेरे लफ़ज़ों को जो छू लेती है आवाज़ तेरी,
सरहदें तोड़ के उड़ जाते हैं अशार मेरे।

तुझको मालूम नहीं या तुझे मालूम भी हो,
वो सिया बख़्त जिन्हे ग़म ने सताया बरसों,
एक लम्हे को जो सुन लेते हैं तेरा नग़मा,
फिर उन्हें रहती है जीने की तमन्ना बरसों।

जिस घड़ी डूब के आहंग में तू गाती है,
आयतें पढ़ती है साज़ों की सदा तेरे लिए,
दम ब दम ख़ैर मनाते हैं तेरी चंग़-ओ-रबाब,
सीने नए से निकलती है दुआ तेरे लिए।

नग़मा-ओ-साज़ के ज़ेवर से रहे तेरा सिंगार,
हो तेरी माँग में तेरी ही सुरों की अफ़शाँ,
तेरी तानों से तेरी आँख में रहे काजल की लक़ीर,
हाथ में तेरे ही गीतों की हिना हो रखशाँ।"

बरसों पहले शायर और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने कुछ इसी तरह से बाँधा था उस गायिका के तारीफ़ों का पुल जिनकी आवाज़ कानों में ही नहीं बल्कि अंतरात्मा में मिसरी घोल देती है, जिसे सुन कर मन की हर पीड़ा दूर हो जाए, जिस आवाज़ की शीतल छाँव के नीचे बैठ कर इंसान ज़िंदगी की दुख तकलीफ़ों को पल में भूल जाए, और जिस आवाज़ की सुरगंगा में नहाकर मन पवित्र हो जाए, ६ दशकों से हवाओं में अमृत घोलती आ रही उस गायिका को आप और हम लता मंगेशकर के नाम से जानते हैं।

'मेरी आवाज़ ही पहचान है' शृंखला के तहत इन दिनों आप सुन रहे हैं लता मंगेशकर के गाए गुज़रे ज़माने के कुछ ऐसे भूले बिसरे नग़में जो बेहद दुर्लभ हैं और जिन्हे हमें उपलब्ध करवाया है नागपुर निवासी अजय देशपाण्डे जी ने, जिनका हम दिल से आभारी हैं। उनके भेजे हुए गीतों में से आज की कड़ी के लिए हम ने जिस गीत को चुना है वह है सन्‍ १९४९ की फ़िल्म 'भोली' का। दोस्तों, कल जो गीत आप ने सुना था वह गीता बाली पर फ़िल्माया गया था, और संयोग वश आज का गीत भी उन्ही का है। फ़िल्म 'भोली' के मुख्य कलाकार थे प्रेम अदीब और गीता बाली। मुरली मूवीज़ के बैनर तले बनी इस फ़िल्म को निर्देशित किया था राम दर्यानी ने। पंडित गोबिन्दराम थे इस फ़िल्म के संगीतकार और गानें लिखे आइ. सी. कपूर ने। पंडित गोबिन्दराम गुज़रे ज़माने के उन प्रतिभाशाली संगीतकारों में से हैं जिनकी आज चर्चा ना के बराबर होती है। क्या आप जानते हैं कि संगीतकार सी. रामचन्द्र जिन दो संगीतकारों से प्रभावित हुए थे उनमें से एक थे सज्जाद हुसैन और दूसरे थे गोबिन्दराम। पंडित गोबिन्दराम ने अपनी फ़िल्मी यात्रा शुरु की थी सन् १९३७ में। फ़िल्म थी 'जीवन ज्योति'। ४० के दशक के शुरुआती सालों में उनकी चर्चित फ़िल्में रहीं १९४१ की 'हिम्मत' और १९४३ की तीन फ़िल्में - 'आबरू', 'सलमा', और 'पगली'। जब गोबिन्दराम के श्रेष्ठ फ़िल्मों का ज़िक्र होता है तो 'भोली' और 'माँ का प्यार' फ़िल्मों का ज़िक्र किए बग़ैर बात ख़तम नहीं समझी जा सकती। 'माँ का प्यार' भी इसी साल, यानी कि १९४९ में बनी थी और इस फ़िल्म में भी लता जी के गीत थे। नूरजहाँ के अंदाज़ में लता जी ने इस फ़िल्म के गीत गाए और पहली बार यह साबित भी कर दिया था कि वो कितनी भी ऊँची पट्टी पर गा सकती हैं। 'माँ का प्यार' फ़िल्म का लता जी का गाया हुआ एक प्रसिद्ध गीत है "तूने जहाँ बना कर अहसान क्या किया है"। लेकिन आज हम सुनने जा रहे हैं फ़िल्म 'भोली' से एक दर्दीला गीत, "इतना भी बेक़सों को ना आसमाँ सताए, के दिल का दर्द लब पे फ़रियाद बन के आए", सुनिए!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. 3 अंकों के लिए बूझिये लता का गाया ये गीत.
२. इस नाम की कम से कम दो फिल्में बाद में बनी एक में अमिताभ थे नायक संगीत रविन्द्र जैन का था तो दूसरी फिल्म में थे राज कुमार और दिलीप कुमार.
३. मुखड़े में शब्द है -"भंवर".

पिछली पहेली का परिणाम -
पराग जी बोनस अंकों का फायदा देखिये....आप सीधे ३३ अंकों पर पहुँच गए हैं...यानी मंजिल के कुछ और करीब. शरद जी और पूर्वी जी दिखाईये ज़रा सी और फुर्ती जी....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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