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Sunday, December 1, 2019

राग मालकौंस : SWARGOSHTHI – 445 : RAG MALKAUNS






स्वरगोष्ठी – 445 में आज

नौशाद की जन्मशती पर उनके राग – 1 : राग मालकौंस

“मन तड़पत हरिदर्शन को आज...”





नौशाद और मोहम्मद रफी
पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से शुरू हो रही हमारी नई श्रृंखला – “नौशाद की जन्मशती पर उनके राग” में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान रहे नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा करेंगे। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद अली का जन्म हुआ था। इस तिथि के अनुसार दिसम्बर, 2019 को नौशाद का एक सौवाँ जन्मदिन पड़ता है। इस उपलक्ष्य में हम “स्वरगोष्ठी” के दिसम्बर मास के प्रत्येक अंक में नौशाद के कुछ राग आधारित ऐतिहासिक गीत प्रस्तुत करेंगे। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करते थे। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठने लगे। वहाँ वह साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए मायानगरी बम्बई (अब मुम्बई) की ओर रुख किया।



घर से भाग कर नौशाद बम्बई (अब मुम्बई) पहुँचे। कुछ समय तक भटकते रहे। एक दिन न्यू पिक्चर कम्पनी में संगीत वादकों के चयन के लिए प्रकाशित विज्ञापन के आधार पर नौशाद बड़ी उम्मीद लेकर ग्राण्ट रोड स्थित कम्पनी के कार्यालय पहुँचे। वहाँ उस समय के जाने-माने संगीतकार उस्ताद झण्डे खाँ वादकों का इण्टरव्यू ले रहे थे। नौशाद ने भी खाँ साहब को कुछ सुनाया। उन्होने बाद में आने को कह कर नौशाद को रुखसत किया। उसी इण्टरव्यू में नौशाद की भेंट गुलाम मोहम्मद से हुई, जो आगे चलकर पहले उनके सहायक बने और फिर बाद में स्वतंत्र संगीतकार भी हुए। बहरहाल, उस्ताद झण्डे खाँ ने नौशाद को पियानो वादक के रूप में चालीस रुपये और गुलाम मोहम्मद को तबला व ढोलक वादक के रूप में साठ रुपये मासिक वेतन पर रख लिया। और इस तरह नौशाद का प्रवेश फिल्म संगीत के क्षेत्र में हुआ।

राग मालकौंस भैरवी थाट का एक लोकप्रिय राग है। अब हम आपको सुनवाते है, राग मालकौंस का एक आकर्षक फिल्मी रूपान्तरण। संगीतकार नौशाद ने फिल्म ‘बैजू बावरा’ के लिए एक कालजयी भक्तिगीत रचा था। नौशाद की भक्तिरस प्रधान गीतों की रचनात्मक कुशलता के बारे में फिल्म संगीत के इतिहासकार पंकज राग, अपनी पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ में लिखते हैं- “नौशाद के संगीत के दो पहलू रहे हैं- एक तो शास्त्रीय आधार का सरस, सुगम्य रूपान्तरित लोकसंगीत और दूसरा शास्त्रीय आधारित आभिजात्य संगीत जिसमें कभी मुगलिया या लखनऊ की नवाबी संस्कृति की खूबसूरत भंगिमाएँ रहती थीं, तो कभी ईश्वर की आराधना करता उदात्त भक्ति-संगीत। साहित्य में भक्ति-साहित्य भले ही लोकरंजक और लोकसंस्कृति से प्रेरित रहा हो, पर नौशाद के भक्ति-गीतों में शुद्ध, गम्भीर शास्त्रीय सुर ही लगे हैं। नौशाद के संगीत की मूल प्रवृत्ति भारतीय शास्त्रीय संगीत-परम्परा की तरह ही कलावादी रही है।” फिल्म ‘बैजू बावरा’ के भक्तिपरक गीत यदि नौशाद को शिखर तक ले जाते हैं, वहीं गायक मुहम्मद रफी को उनके भावपूर्ण गायन के लिए प्रथम श्रेणी के गायकों में शामिल कराते हैं। प्रस्तुत है, गीतकार शकील बदायूनी, संगीतकार नौशाद और गायक मुहम्मद रफी द्वारा सृजित आस्था, समर्पण और पुकार से युक्त फिल्म ‘बैजू बावरा’ का यह गीत। आप इस गीत का आस्वादन करें। 

राग मालकौंस : ‘मन तड़पत हरिदर्शन को आज...’ : मुहम्मद रफी : फिल्म - बैजू बावरा


राग मालकौंस की गणना भैरवी थाट के अन्तर्गत की जाती है। इसमें ऋषभ और पंचम स्वर वर्जित होता है। अतः इसकी जाति औड़व-औड़व होती है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग मालकौंस में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। इस राग का गायन-वादन रात्रि के तीसरे प्रहर में सर्वाधिक अनुकूल होता है। इस राग का चलन तीनों सप्तकों में समान रूप से किया जाता है। औड़व जाति के इस इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग मालकौंस सागर की भाँति है। विविध नदियों का मानों इसमें समागम है। इसके मन्द्र धैवत को षडज मान कर यदि मालकौंस के स्वरों का प्रयोग किया जाए तो राग भूपाली का दर्शन होने लगता है। मन्द्र निषाद को जब षडज मान कर मालकौंस के स्वरों का प्रयोग किया जाता है तब राग मेघ मल्हार का आभास होने लगता है। इसी प्रकार गान्धार स्वर को यदि षडज मान कर प्रयोग किया जाए तो राग दुर्गा और मध्यम को षडज मान कर चलने पर राग धानी की झलक मिलने लगती है। राग मालकौंस में षडज स्वर आधार है। राग मालकौंस में कोमल ऋषभ और पंचम स्वर के न होने से मध्यम के साथ शेष तीनों कोमल स्वर गान्धार, धैवत और निषाद के मिलाप से गाम्भीर्य कायम होता है।

राग मालकौंस अत्यधिक संवेदनशील तथा गम्भीर आत्म-अभिव्यक्ति का अनुभव प्रदान करने वाला राग है। यह मध्यम स्वर प्रधान राग है और रात्रि 12 से 1 बजे के बीच अपनी अभिव्यक्ति के प्रभाव से वातावरण को गम्भीर बनाने में सक्षम है। पण्डित श्रीकुमार मिश्र के शोध के अनुसार इस राग के स्वर-भाव से युक्त संवेदनशील व गम्भीर नाद की परमाणु ऊर्जा अनेक मानसिक और शारीरिक समस्याओं के निदान में सक्षम सिद्ध हो सकती है। वायोकेमिकल प्रासेस के असन्तुलन के कारण उत्पन्न मानसिक विकृतियाँ, आनुवांशिक गुणों, अवगुणों की छाप से युक्त सन्तानों के ऊपर उपयुक्त या अनुपयुक्त परिस्थितियों के प्रभावानुसार उत्पन्न मानसिक या शारीरिक विकृतियाँ, विषाद, क्रोध, चिन्ताविकृति, निद्राभ्रमण, नर्वसनेस, मानसिक संघर्ष, नकारात्मक मनोवृत्ति, तनावविकृति, दिवास्वप्न आदि रोगों में राग मालकौंस उपयोगी है। इसके साथ ही अनेक मनोदैहिक रोगों के उपचार में भी मालकौंस के स्वर सर्वथा उपयोगी हो सकते हैं। अब आप राग मालकौंस की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के स्वर में सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की की अनुमति दें।

राग मालकौंस : ‘नन्द के छैला ढीठ लंगरवा...’ : पण्डित दतात्रेय विष्णु पलुस्कर



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 445वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1954 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष की अन्तिम पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत को किस ताल में निबद्ध किया गया है, हमें ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस उस्ताद गायक का स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 7 दिसम्बर, 2019 की मध्यरात्रि तक अपने पते के साथ भेज सकते हैं। इसके बाद आपका उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 447 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 443वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – श्री, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – पारुल घोष

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो-दो अंक मिलते हैं। सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हमारी नई श्रृंखला “नौशाद की जन्मशती पर उनके राग” की पहली कड़ी में आज आपने राग मालकौंस का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के स्वर में इस राग में संक्षिप्त खयाल रचना का रसास्वादन किया। नौशाद के राग मालकौंस पर आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए मोहम्मद रफी के स्वर में फिल्म “बैजू बावरा” का एक गीत प्रस्तुत किया। अगले अंक में हम एक नई श्रृंखला का शुभारम्भ करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। आप सभी संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि आप हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग मालकौंस : SWARGOSHTHI – 445 : RAG MALKAUNS : 1 दिसम्बर, 2019 

Sunday, November 9, 2014

‘आज गावत मन मेरो झूम के...’ : SWARGOSHTHI – 193 : RAG DESI


स्वरगोष्ठी – 193 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 2 : राग देसी

पण्डित पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ ने राग देसी के स्वरों में गाया फिल्म बैजू बावरा का युगल गीत





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी नई लघु श्रृंखला, जिसका शीर्षक है- ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के दूसरे अंक में आज हम आपसे 1953 की फिल्म ‘बैजू बावरा’ के एक गीत- ‘आज गावत मन मेरो...’ पर चर्चा करेंगे। इस श्रेष्ठतम संगीत रचना का सृजन अपने समय की दो दिग्गज सांगीतिक विभूतियों, पण्डित डी.वी. (दत्तात्रेय विष्णु) पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ द्वारा किया गया था। यह गीत राग देसी अथवा देसी तोड़ी के फिल्मी प्रयोग का अच्छा उदाहरण है। इसके साथ ही राग देसी के स्वरूप को समझने के लिए इस अंक में हम आपको शाम चौरासी घराने के शीर्षस्थ युगल गायक उस्ताद सलामत अली खाँ और उस्ताद नज़ाकत अली खाँ की आवाज़ में राग देसी की एक मोहक खयाल रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 
 


हिन्दी फिल्मों के संगीत का इतिहास 1953 में प्रदर्शित संगीत-प्रधान फिल्म ‘बैजू बावरा’ के उल्लेख के बिना अधूरा ही रहेगा। संगीतकार नौशाद को भारतीय संगीत के रागों के प्रति कितनी श्रद्धा थी, इस फिल्म के गीतों को सुन कर स्पष्ट हो जाता है। अपने समय के जाने-माने संगीतज्ञों को फिल्म संगीत के मंच पर लाने में नौशाद अग्रणी रहे हैं। आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में हम फिल्म ‘बैजू बावरा’ के एक गीत के माध्यम से प्रकृति के रंगों को बिखेरने में सक्षम राग ‘देसी’ अथवा ‘देसी तोड़ी’ पर चर्चा करेंगे।

पण्डित डी.वी. पलुस्कर 
उस्ताद अमीर खाँ 
अकबर के समकालीन कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और कुछ दन्तकथाओं के मिश्रण से बुनी 1953 में एक फिल्म- ‘बैजू बावरा’ प्रदर्शित हुई थी। ऐतिहासिक कथानक और उच्चस्तर के संगीत से युक्त अपने समय की यह एक सफलतम फिल्म थी। इस फिल्म को आज छह दशक बाद भी केवल इसलिए याद किया जाता है कि इसका गीत-संगीत भारतीय संगीत के रागों पर केन्द्रित था। फिल्म के कथानक के अनुसार अकबर के समकालीन सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास के शिष्य तानसेन सर्वश्रेष्ठ थे। परन्तु उनके संगीत पर दरबारी प्रभाव आ चुका था। उन्हीं के समकालीन स्वामी हरिदास के ही शिष्य माने जाने वाले बैजू अथवा बैजनाथ थे, जिसका संगीत मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था। फिल्म के कथानक का निष्कर्ष यह था कि संगीत जब राज दरबार की दीवारों से घिर जाता है, तो उसका लक्ष्य अपने स्वामी की प्रशस्ति तक सीमित हो जाता है, जबकि मुक्त प्राकृतिक परिवेश में पनपने वाला संगीत ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण होता है। राग देसी के स्वरों से पगा जो गीत आज हमारी चर्चा में है, उसका फिल्मांकन बादशाह अकबर के दरबार में किया गया था। तानसेन और बैजू बावरा के बीच एक सांगीतिक प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। अकबर बादशाह ने श्रेष्ठता के निर्णय के लिए यह शर्त रखी कि जिसके संगीत के असर से पत्थर पिघल जाएगा वही गायक सर्वश्रेष्ठ कहलाएगा। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस प्रतियोगिता में तानसेन की तुलना में बैजू बावरा की श्रेष्ठता सिद्ध हुई थी। आज का गीत फिल्म के इसी प्रसंग में प्रस्तुत किया गया था। इस गीत में अपने समय के दो दिग्गज गायक उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु (डी.वी.) पलुस्कर ने अपना स्वर दिया था। आइए पहले इस गीत को सुनते हैं, फिर इस चर्चा को आगे बढ़ाएँगे।


राग – देसी : फिल्म – बैजू बावरा : ‘आज गावत मन मेरो झूम के...’: स्वर – पण्डित डी.वी. पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ





अभी आपने जो युगल गीत सुना, वह तीनताल में निबद्ध है। परदे पर तानसेन के लिए उस्ताद अमीर खाँ ने और बैजू बावरा के लिए पण्डित पलुस्कर जी ने स्वर दिया था। मित्रों, इन दोनों कलासाधकों का व्यक्तित्व और कृतित्व इतना विशाल है कि ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में मात्र कुछ पंक्तियों में समेटा नहीं जा सकता। भविष्य में इन संगीतज्ञों पर हम अलग से चर्चा करेंगे। फिल्मी परम्पराओं के अनुसार इस गीत के रिकार्ड पर गीतकार, शकील बदायूनी और संगीतकार, नौशाद के नाम अंकित हैं। अपने समय के इन दो दिग्गज संगीतज्ञों की उपस्थिति में नौशाद साहब किस प्रकार उन्हें निर्देशित कर पाए होंगे यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। वर्षों पहले एक साक्षात्कार में नौशाद जी ने स्वयं इस गीत की चर्चा करते हुए बताया था कि उन्होने दोनों दिग्गज संगीतज्ञों को फिल्म के प्रसंग की जानकारी दी और गाने के बोल दिये। उन्होने आपस में सलाह-मशविरा कर राग-ताल तय किये और फिर रिकार्डिंग शुरू हो गई। इस गीत के आरम्भिक लगभग 1 मिनट 45 सेकेण्ड की अवधि में दोनों गायकों ने ‘तुम्हरे गुण गाउँ...’ पंक्तियों के माध्यम से विलम्बित खयाल की झलक और शेष भाग में द्रुत खयाल का रूप प्रदर्शित किया है। गीत के अन्तिम भाग में तानसेन के तानपूरा का तार टूट जाता है, जबकि बैजू द्रुत लय की तानें लगाते रहते हैं। फिल्म में उनकी तानों के असर से काँच के पात्र में रखा पत्थर पिघलने लगता है।

उस्ताद सलामत और नज़ाकत अली खाँ 
आइए, अब कुछ चर्चा राग देसी के बारे में करते है। दिन के दूसरे प्राहर में गाये-बजाये जाने वाले इस राग को देसी के अलावा देसी तोड़ी अथवा देस तोड़ी भी कहते हैं। यह आसावरी थाट का राग है। इसकी जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल होते है, जबकि धैवत और निषाद स्वर शुद्ध रूप में भी प्रयोग किया जाता है। इसमे शुद्ध धैवत के स्थान पर कोमल धैवत का प्रयोग किया जाता है, शेष सभी स्वर राग देस के समान ही प्रयोग किया जाता है। फिल्म ‘बैजू बावरा’ में इस राग का संक्षिप्त किन्तु अत्यन्त मुखर प्रयोग किया गया था। आइए, अब हम आपको शाम चौरासी घराने के संवाहक उस्ताद सलामत अली और नज़ाकत अली खाँ के युगल स्वरों में राग देसी में एक खयाल सुनवाते हैं। शाम चौरासी ध्रुपदियों का घराना रहा है। अविभाजित पंजाब का होशयारपुर ज़िला शाम चौरासी घराने का मुख्य केन्द्र था। सोलहवीं शताब्दी में मियाँ चाँद खाँ और मियाँ सूरज खाँ ने इस घराने की बुनियाद रखी थी। यह दोनों तानसेन के समकालीन थे। इसी घराने के उस्ताद विलायत अली खाँ के सुपुत्र थे, उस्ताद सलामत अली और नज़ाकत अली खाँ। इन दोनों भाइयों को युगल गायन में खूब प्रसिद्धि मिली। विभाजन के बाद यह दोनों भाई लाहौर चले गए। रागदारी संगीत की इस मशहूर जोड़ी की आवाज़ में अब आप सुनिए राग देसी का खयाल। तीनताल में निबद्ध इस खयाल के बोल हैं- ‘म्हारे घर आयो जी साँवरे...’। आप यह रचना सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग - देसी : ‘म्हारे घर आयो जी साँवरे...’ : तीनताल : उस्ताद सलामत अली खाँ और नज़ाकत अली खाँ






आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 193वें अंक की पहेली में आज हम आपको लगभग छः दशक पुरानी एक फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 200वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का और सभी पाँच श्रृंखलाओं में सर्वाधिक अंक पाने वाले प्रतिभागी को वर्ष 2014 का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – यह रचना किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 15 नवम्बर, 2014 को मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 195वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 191वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1943 में प्रदर्शित फिल्म ‘रामराज्य’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भीमपलासी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


पिछली श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की पिछली श्रृंखला (अंक 181 से 190 तक) की संगीत पहेली के विभिन्न प्रतिभागियों के प्राप्तांकों का विवरण निम्नलिखित है। सर्वाधिक अंक के प्राप्तकर्त्ता इस श्रृंखला के विजेता घोषित किए जाते हैं।

1 – विजया राजकोटिया, पेंसिलवानिया, अमेरिका – 20 अंक – प्रथम

2 – क्षिति तिवारी, जबलपुर, मध्य प्रदेश – 20 अंक – प्रथम

3 – डी. हरिणा माधवी, हैदराबाद – 17 अंक – द्वितीय

4 - दिनेश कृष्णजोइस, मिन्नेसोटा, अमेरिका – 8 अंक – तृतीय

उपरोक्त सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम भारतीय शास्त्रीय संगीत के विद्वानों द्वारा फिल्मों के लिए गाये गए गीतों पर चर्चा कर रहे हैं। वर्ष 2015 से ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखलाओं के बारे में हमे अनेक पाठकों और श्रोताओ के बहुमूल्य सुझाव प्राप्त हो रहे हैं। इन सभी सुझाव पर विचार-विमर्श कर हम नये वर्ष से अपनी प्रस्तुतियों में आवश्यक संशोधन करने जा रहे हैं। यदि आपने अभी तक अपने सुझाव और फरमाइश नहीं भेजी हैं तो आविलम्ब हमें भेज दें। अगले रविवार 16 नवम्बर 2014 को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


 

Sunday, February 17, 2013

छठें प्रहर के कुछ आकर्षक राग



स्वरगोष्ठी-108 में आज 

राग और प्रहर – 6

‘तेरे सुर और मेरे गीत...’ : रात्रि के अन्धकार को प्रकाशित करते राग 


‘स्वरगोष्ठी’ के 108वें अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का इस मंच पर हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इन दिनों ‘स्वरगोष्ठी’ में विभिन्न आठ प्रहरों के रागों पर चर्चा जारी है। पिछले अंक में हमने पाँचवें प्रहर के कुछ राग प्रस्तुत किये थे। आज हम आपके सम्मुख छठें प्रहर के कुछ आकर्षक राग लेकर उपस्थित हुए हैं। छठाँ प्रहर अर्थात रात्रि का दूसरा प्रहर, रात्रि 9 बजे से लेकर मध्यरात्रि तक की अवधि को माना जाता है। हमारे देश में अधिकतर संगीत सभाएँ पाँचवें और छठें प्रहर में आयोजित होती हैं, इसलिए इस प्रहर के राग संगीत-प्रेमियों के बीच अधिक लोकप्रिय हैं। छठें प्रहर के रागों में आज हम आपके लिए राग बिहाग, गोरख कल्याण, बागेश्री और मालकौंस की कुछ चुनी हुई रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे।

ठाँ प्रहर अर्थात रात्रि के दूसरे प्रहर में निखरने वाला एक राग है, गोरख कल्याण। इस राग के गायन-वादन से कुछ ऐसी अनुभूति होने लगती है मानो श्रृंगार रस के दोनों पक्ष- संयोग और वियोग, साकार हो गया हो। यह राग खमाज थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग को दो प्रकार से प्रयोग किया जाता है। कुछ विद्वान इसे औड़व-षाड़व तो कुछ औड़व-औड़व जाति के रूप में प्रयोग करते हैं। दोनों स्थितियों में राग के आरोह में षडज, ऋषभ, मध्यम, पंचम और धैवत (सभी शुद्ध) स्वरों का प्रयोग होता है। परन्तु अवरोह में पहली स्थिति में षडज, कोमल निषाद, धैवत, पंचम, मध्यम और ऋषभ स्वरों का तथा दूसरी स्थिति में इन्हीं स्वरों में से पंचम हटा कर प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। अब हम आपको राग गोरख कल्याण में द्रुत तीनताल की एक बन्दिश सुनवाते हैं, जिसके बोल हैं- ‘विनती नहीं मानी सइयाँ...’। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, पटियाला घराने की गायकी में सिद्ध कलासाधक पण्डित जगदीश प्रसाद।


राग गोरख कल्याण : ‘विनती नहीं मानी सइयाँ...’ : पण्डित जगदीश प्रसाद


आज का दूसरा बेहद लोकप्रिय राग है, बागेश्री। कुछ लोग इसे बागेश्वरी नाम से भी सम्बोधित करते हैं, किन्तु वरिष्ठ गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के अनुसार इस राग का सही नाम बागेश्री ही होना चाहिए। काफी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला यह राग कर्नाटक संगीत के नटकुरंजी राग से काफी मिलता-जुलता है। राग बागेश्री में पंचम स्वर का अल्पत्व प्रयोग होता है। षाड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में ऋषभ वर्जित होता है। कुछ विद्वान आरोह में पंचम का प्रयोग न करके औड़व-सम्पूर्ण रूप में इस राग को गाते-बजाते हैं। इसमें गान्धार और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यह राधा का सर्वप्रिय राग माना जाता है। आज हम आपको राग बागेश्री में एक अनूठी प्रस्तुति की रिकार्डिंग सुनवाते हैं। 2 दिसम्बर, 2011 को ‘ब्रह्मनाद’ शीर्षक से वाद्य संगीत का एक उत्सव आयोजित हुआ था। इस आयोजन में पूरे देश से 1094 सितार वादकों की सहभागिता थी और इन्होने सितार पर राग बागेश्री का समवेत वादन प्रस्तुत किया था। लीजिए, आप भी इस अनूठी प्रस्तुति के साक्षी बनें।


राग बागेश्री : 1094 सितार वादकों की समवेत प्रस्तुति : ब्रह्मनाद


छठें प्रहर की अवधि जैसे-जैसे बीतती है, रात्रि का अन्धकार और अधिक घना होता जाता है। जैसे ही हम मध्यरात्रि की ओर बढ़ते हैं, राग मालकौंस का परिवेश हमारे सामने उपस्थित हो जाता है। भैरवी थाट, औड़व-औड़व जाति के राग मालकौंस में ऋषभ और पंचम स्वर वर्जित होता है। गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। राग प्रस्तुति के समय कोमल स्वरों पर आन्दोलन किया जाता है, विशेष रूप से आलाप के समय। इस पूर्वांग प्रधान राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग में यदि कोमल निषाद के स्थान पर शुद्ध निषाद का प्रयोग कर दिया जाए तो यह राग चन्द्रकौंस हो जाता है। आइए, अब हम आपको राग मालकौंस में एक बेहद मोहक रचना सुनवाते हैं। द्रुत तीनताल में निबद्ध इस बन्दिश के बोल हैं- ‘नन्द के छैला ढीठ लंगरवा...’। इसे प्रस्तुत किया है, युग-प्रवर्तक संगीतज्ञ पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के प्रतिभावान पुत्र और संगीतज्ञ पण्डित दतात्रेय विष्णु पलुस्कर ने।


राग मालकौंस : ‘नन्द के छैला ढीठ लंगरवा...’ : पण्डित दतात्रेय विष्णु पलुस्कर


छठें प्रहर में प्रस्तुत किये जाने वाले रागों में एक अत्यन्त लोकप्रिय और मोहक राग बिहाग है। कुछ विद्वान इस राग का प्राचीन नाम विहंग कहते हैं। कर्नाटक संगीत का राग विहाग उत्तर भारतीय संगीत के राग बिहाग के समतुल्य है। इस राग को कुछ विद्वान बिलावल थाट के अन्तर्गत तो कुछ कल्याण थाट के अन्तर्गत मानते हैं। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं किया जाता। अवरोह में इन दोनों स्वरों का प्रयोग तो होता है, किन्तु कमजोर। अवरोह में दोनों मध्यम का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। आज के इस अंक से विराम लेने से पहले हम आपको राग बिहाग के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाएँगे। 1959 में संगीत विषयक कथानक पर एक फिल्म बनी थी- ‘गूँज उठी शहनाई’। फिल्म के संगीतकार बसन्त देसाई ने फिल्म में एक गीत- ‘तेरे सुर और मेरे गीत...’ को राग बिहाग के स्वरों में पिरोया था। लता मंगेशकर ने यह गीत दादरा ताल में बड़े माधुर्य के साथ गाया था। आप यह गीत सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग बिहाग : ‘तेरे सुर और मेरे गीत...’ : फिल्म - गूँज उठी शहनाई : लता मंगेशकर



आज की पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ के 108वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के 110वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 - इस गीत को किस गायक कलाकार ने स्वर दिया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 110वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 

‘स्वरगोष्ठी’ के 106ठें अंक में हमने आपको 1964 में बनी फिल्म ‘चित्रलेखा’ से एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग कामोद और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल सितारखानी अथवा पंजाबी। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर बैंगलुरु के पंकज मुकेश और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने एक ही प्रश्न का सही जवाब दिया है। इन्हें एक अंक से ही सन्तोष करना होगा। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनो लघु श्रृंखला ‘राग और प्रहर’ जारी है। आगामी अंक में हम आपके साथ रात्रि के तीसरे प्रहर अर्थात मध्यरात्रि से लेकर रात्रि लगभग तीन बजे के मध्य प्रस्तुत किये जाने वाले रागों पर चर्चा करेंगे। प्रत्येक रविवार को प्रातः साढ़े नौ बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के कृष्णमोहन मिश्र साथ उपस्थित होते हैं। आप सब संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि इस सांगीतिक अनुष्ठान में आप भी हमारे सहभागी बनें। आपके सुझाव और सहयोग से हम इस स्तम्भ को और अधिक उपयोगी स्वरूप प्रदान कर सकते हैं।


कृष्णमोहन मिश्र 





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