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Wednesday, December 15, 2010

उस्ताद शफ़कत अली खान की आवाज़ में राधा की "नदिया किनारे मोरा गाँव" की पुकार कुछ अलग हीं असर करती है

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०६

पिछले कुछ हफ़्तों से अगर आपने महफिल को ध्यान से देखा होगा तो महफ़िल पेश करने के तरीके में हुए बदलाव पर आपकी नज़र ज़रूर गई होगी। पहले महफ़िल देर-सबेर १० बजे तक पूरी की पूरी तैयार हो जाती थी और फिर उसके बाद उसमें न कुछ जोड़ा जाता था और न हीं उससे कुछ हटाया जाता था। लेकिन अब १०:३० तक महफ़िल का एक खांका हीं तैयार हो पाता है, जिसमें उस दिन पेश होने वाली नज़्म/ग़ज़ल होती है, उसके बोल होते हैं, फ़नकार के बारे में थोड़ी-सी जानकारी होती है एवं पिछली महफ़िल के गायब हुए शब्द और शेर का ज़िक्र होता है। और इस तरह महफ़िल जब पाठकों, दर्शकों और श्रोताओं के लिए खोल दी जाती है, उस वक़्त महफ़िल खुद पूरी तरह से रवानी पर नहीं होती। ऐसा लगता है मानो दर्शक फ़नकारों का प्रदर्शन देख रहे हैं लेकिन उस वक़्त मंच पर दरी, चादर, तकिया भी सही से नहीं सजाए गए हैं। ऐसे समय में जो दर्शक एवं श्रोता महफ़िल से लौट जाते हैं और दुबारा नहीं आते, वो महफ़िल का सही मज़ा नहीं ले पाते, उनसे बहुत कुछ छूट जाता है। इसलिए मैं आप सभी प्रियजनों से आग्रह करूँगा कि भले हीं आप बुधवार की सुबह महफ़िल का आनंद ले चुके हों, फिर भी बुधवार की शाम या अगली सुबह महफ़िल का एक और चक्कर ज़रूर लगा लें.. महफ़िल पूरी तरह से सजी हुई आपको तभी नज़र आएगी। इसी दरख्वास्त के साथ आज की महफ़िल का शुभारंभ करते हैं।

आज की महफ़िल में हम जो नज़्म लेकर हाज़िर हुए हैं, वह शायद ठुमरी है। इसे ठुमरी मानने के दो कारण हैं:
१) इसे जिस फ़नकार ने गाया है वो ज्यादातर ख्याल एवं ठुमरी हीं गाते हैं।
२) इसी नाम की एक और नज़्म श्री भीमसेन जोशी की आवाज़ में मुझे सुनने को मिली और वह नज़्म एक ठुमरी है, राग "मिश्र पुली" में
लेकिन मैं "शायद" शब्द का हीं इस्तेमाल करूँगा, क्योंकि मुझे कहीं यह लिखा नहीं मिला कि "उस्ताद शफ़क़त अली खान" ने "नदिया किनारे मोरा गाँव" नाम की एक ठुमरी गाई है। वैसे इस गाने के बारे में मेरा शोध अभी खत्म नहीं हुआ है, जैसे हीं मुझे कुछ और जानकारी मिलती है, मैं पूरी महफ़िल को उससे अवगत करा दूँगा।

हाँ तो हम इतना जान चुके हैं कि आज के फ़नकार का नाम "उस्ताद शफ़कत अली खान" है। शुरू-शुरू में मैंने जब इनका नाम सुना तो मैं इन्हें "शफ़कत अमानत अली खान" हीं मान बैठा था, लेकिन इनकी आवाज़ सुनने पर मुझे अपनी हीं सोच हजम नहीं हुई। इनकी आवाज़ का टेक्सचर "शफ़कत अमानत अली खान" ("फ़्युज़न" वाले) से काफी अलग है। इनके कई गाने (ठुमरी, ख्याल..) सुनने और इनके बारे में और ढूँढने के बाद मुझे सच का पता चला। लीजिए आप भी जानिए कि ये कौन हैं (सौजन्य: एक्सडॉट २५)

१७ जून १९७२ को पाकिस्तान के लाहौर में जन्मे शफ़कत अली खान पूर्वी पंजाब के शाम चौरासी घराने से ताल्लुक रखते हैं। इस घराने का इतिहास तब से है जब हिन्दुस्तान में मुग़ल बादशाह अकबर का शासन था। इस घराने की स्थापना दो भाईयों चाँद खान और सूरज खान ने की थी। शफ़कत अली खान के पिताजी उस्ताद सलामत अली खान और चाचाजी उस्ताद नज़ाकत अली खान.. दोनो हीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जाने जाते हैं और ये दोनों शाम चौरासी घराने के दसवीं पीढी के शास्त्रीय गायक हैं।

शफ़क़त ने महज ७ साल की उम्र में अपनी हुनर का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया था। अपनी गायकी का पहला जौहर इन्होंने १९७९ में लाहौर संगीत उत्सव में दिखलाया। अभी तक ये यूरोप के कई सारे देशों मसलन फ़्रांस, युनाईटेड किंगडम, इटली, जर्मनी, हॉलेंड, स्पेन एवं स्वीटज़रलैंड (जेनेवा उत्सव) के महत्वपूर्ण कन्सर्ट्स में अपना परफ़ॉरमेंश दे चुके हैं। हिन्दुस्तान, पाकिस्तान एवं बांग्लादेश में तो ये नामी-गिरामी शास्त्रीय गायक के रूप में जाने जाते है हीं, अमेरिका और कनाडा में भी इन्होंने अपनी गायकी से धाक जमा ली है। १९८८ और १९९६ में स्मिथसोनियन इन्स्टिच्युट में, १९८८ में न्यूयार्क के मेट्रोपोलिटन म्युज़ियम के वर्ल्ड म्युज़िक इन्स्टिच्युट में एवं १९९१ में मर्किन कन्सर्ट हॉल में दिए गए इनके प्रदर्शन को अभी भी याद किया जाता है।

शफ़कत को अभी तक कई सारे पुरस्कारों और सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है। १९८६ में इन्हें "सर्वश्रेष्ठ युवा शास्त्रीय गायक" के तौर पर लाहौर का अमिर खुसरो पुरस्कार मिला था। आगे चलकर १९८७ में इन्हें पाकिस्तान के फ़ैज़लाबाद विश्वविद्यालय ने "गोल्ड मेडल" से सम्मानित किया। ये अभी तक दुनिया की कई सारी रिकार्ड कंपनियों के लिए गा चुके हैं, मसलन: निम्बस (युके), इ०एम०आई० (हिन्दुस्तान), एच०एम०वी० (युके), वाटरलिली एकॉसटिक्स (युएसए), वेस्ट्रॉन (हिन्दुस्तान), मेगासाउंड (हिन्दुस्तान), कीट्युन प्रोडक्शन (हॉलैंड), प्लस म्युज़िक (हिन्दुस्तान) एवं फोक़ हेरिटेज (पाकिस्तान)। गायकी के क्षेत्र में ये अभी भी निर्बाध रूप से कार्यरत हैं।

चलिए तो हम और आप सुनते हैं उस्ताद की आवाज़ में "नदिया किनारे मोरा गाँव":

संवरिया मोरे आ जा रे,
तोहू बिन भई मैं उदास रे.. हो..
आ जा रे.

नदिया किनारे मोरा गाँव..
आ जा रे संवरिया आ जा..
नदिया किनारे मोरा गाँव..

साजन प्रीत लगाकर
अब दूर देश मत जा
आ बस हमरे _____ अब
हम माँगे तू खा..

नदिया किनारे मोरा गाँव रे.
संवरिया रे

ऊँची अटरिया चंदन केंवरिया
राधा सखी रे मेरो नाँव
नदिया किनारे मोरा गाँव..

ना मैं माँगूं सोना, चाँदी
माँगूं तोसे प्रीत रे..
बलमा मैका छाड़ गए
यही जगत की रीत रे..

नदिया किनारे मोरा गाँव रे..




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "फ़लक" और शेर कुछ यूँ था-

जो फूल खुशबू गुलाब में है,
ज़मीं, फ़लक, आफ़ताब में है

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

फलक पे जितने सितारे हैं वो भी शर्माए
ओ देने वाले मुझे इतनी जिन्दगी दे दे

उसका चेहरा आंसुओं से धुआं धुआं सा हुआ,
फलक पे चाँद तारों मैं गुमशुदा सा हुआ,
उसके साथ बीता ख़ुशी का हर लम्हा,
उसीकी याद से ग़मों का कारवाँ सा हुआ !! -अवनींद्र जी

है जिसकी कीमत हर एक कण मे ,खुदा वही है
है जिसने की,झुक के इबादत,फलक है उसका,खुदा वही है. - नीलम जी

जैसे फलक पर चाँद चांदनी संग चमचमा रहा.
वैसे ही खुदा फूलों की खुशबू बन जग महका रहा. - मंजू जी

ये किसको देख फ़लक से गिरा है गश खा कर
पड़ा ज़मीं पे जो नूरे-क़मर को देखते हैं. - शेख इब्राहीम ज़ौक़

कहते है जिंदगी है फकत चार दिनों की
क्या पता फलक में कितना इंतज़ार हो. - शन्नो जी

यूँ तो पिछली महफ़िल की शुरूआत हुई शन्नो जी की टिप्पणी से, जिसमें उन्होंने गायब शब्द पर एक शेर भी कहा था, लेकिन बदकिस्मती से एक बार फिर वह शान-ए-महफ़िल बनने से चूक गईं। चूक हुई सही शब्द पहचानने में.. शब्द था "फ़लक" और उन्होंने "तलक" समझकर शेर तक सुना डाला। अवनींद्र जी ने सही शब्द की शिनाख्त की और आगे आने वाले ग़ज़ल-प्रेमियों के लिए शेर कहने का रास्ता खोल दिया। "फ़लक" पर शेर/रूबाई कहकर आप शान-ए-महफ़िल भी साबित हुए। आपके बाद जहाँ नीलम जी एवं मंजू जी अपने स्वरचित शेरों के साथ महफ़िल का हिस्सा बनीं, वही अवध जी ने बड़े-बड़े शायरों के शेर सुनाकर महफ़िल में चार चाँद लगा दिए। हमें कुहू जी एवं पूजा जी का भी प्रोत्साहन हासिल हुआ। तो यूँ कुल मिलाकर सभी दोस्तों ने हमारी पिछली महफ़िल को सफल बना्या। इसके लिए हम आप सबके तह-ए-दिल से आभारी हैं।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, November 24, 2010

मोहब्बत की कहानी आँसूओं में पल रही है.. सज्जाद अली ने शहद-घुली आवाज़ में थोड़ा-सा दर्द भी घोल दिया है

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०३

माफ़ी, माफ़ी और माफ़ी... भला कितनी माफ़ियाँ माँगूंगा मैं आप लोगों से। हर बार यही कोशिश करता हूँ कि महफ़िल-ए-ग़ज़ल की गाड़ी रूके नहीं, लेकिन कोई न कोई मजबूरी आ हीं जाती है। इस बार घर जाने से पहले यह मन बना लिया था कि आगे की दो-तीन महफ़िलें लिख कर जाऊँगा, लेकिन वक़्त ने हीं साथ नहीं दिया। घर पर अंतर्जाल की कोई व्यवस्था नहीं है, इसलिए वहाँ से महफ़िलों की मेजबानी करने का कोई प्रश्न हीं नहीं उठता था। अंत में मैं हार कर मन मसोस कर रह गया। तो इस तरह से पूरे तीन हफ़्ते बिना किसी महफ़िल के गुजरे। अब क्या करूँ!! फिर से माफ़ी माँगूं? मैं सोच रहा हूँ कि हर बार क्षमा-याचना करने से अच्छा है कि पहले हीं एक "सूचना-पत्र" महफ़िल-ए-ग़ज़ल के दरवाजे पर चिपका दूँ कि "मैं महफ़िल को नियमित रखने की यथा-संभव कोशिश करूँगा, लेकिन कभी-कभार अपरिहार्य कारणों से महफ़िल अनियमित हो सकती है। इसलिए किसी बुधवार को १०:३० तक आपको महफ़िल खाली दिखे या कोई रौनक न दिखे, तो मान लीजिएगा कि इसके मेजबान को ऐन मौके पर कोई बहुत हीं जरूरी काम निकल आया है। फिर उस बुधवार के लिए मुझे क्षमा करके अगले बुधवार को महफ़िल की राह जरूर ताकिएगा, क्योंकि महफ़िल आएगी तो बुधवार को हीं और ९:३० से १०:३० के बीच किसी भी वक़्त। अगर आप ऐसा करते हैं तो मैं आप सभी का आभारी रहूँगा। धन्यवाद!"

चलिए तो आज की महफ़िल में शमा जलाते हैं। आज की महफ़िल जिस नज़्म से सजने वाली है, जिस नज़्म के नाम है... उस नज़्म को अपनी आवाज़ से मक़बूल किया है पाकिस्तान के बहुत हीं जाने-माने सेमि-क्लासिकल एवं पॉप गायक, अभिनेता , निर्माता और निर्देशक सज्जाद अली ने। आपको शायद याद हो कि पिछले साल ९ दिसम्बर को हमने "शामिख फ़राज़" जी के आग्रह पर "अहमद फ़राज़" की ग़ज़ल "अब के बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिले" सुनवाई थी, जिसे इन्हीं सज्जाद साहब ने गाया था। उस वक़्त हमने इनका छोटा-सा परिचय दिया था। तो पहले उसी परिचय से शुरूआत करते हैं:

सज्जाद अली के अब्बाजान साजन(वास्तविक नाम: शफ़क़त हुसैन) नाम से मलयालम फिल्में निर्देशित किया करते हैं। ७० के दशक से अबतक उन्होंने लगभग ३० फिल्में निर्देशित की हैं। मज़े की बात यह है कि खुद तो वे हिन्दुस्तान में रह गए लेकिन उनके दोनों बेटों ने पाकिस्तान में खासा नाम कमाया। जैसे कि आज की गज़ल के गायक सज्जाद अली पाकिस्तान के जानेमाने पॉप गायक हैं, वहीं वक़ार अली एक जानेमाने संगीतकार। सज्जाद अली का जन्म १९६६ में कराची के एक शिया मुस्लिम परिवार में हुआ था। बचपन से हीं इन्हें संगीत की शिक्षा दी गई। शास्त्रीय संगीत में इन्हें खासी रूचि थी। उस्ताद बड़े गुलाम अली खान, उस्ताद बरकत अली खान, उस्ताद मुबारक अली खान, मेहदी हसन खान, गुलाम अली, अमानत अली खान जैसे धुरंधरों के संगीत और गायिकी को सुनकर हीं इन्होंने खुद को तैयार किया। इनका पहला एलबम १९७९ में रीलिज हुआ था, जिसमें इन्होंने बड़े-बड़े फ़नकारों की गायिकी को दुहराया। उस एलबम के ज्यादातर गाने "हसरत मोहानी" और "मोमिन खां मोमिन" के लिखे हुए थे। यूँ तो इस एलबम ने इन्हें नाम दिया लेकिन इन्हें असली पहचान मिली पीटीवी की २५वीं सालगिरह पर आयोजित किए गए कार्यक्रम "सिलवर जुब्ली" में। दिन था २६ नवंबर १९८३. "लगी रे लगी लगन" और "बावरी चकोरी" ने रातों-रात इन्हें फर्श से अर्श पर पहुँचा दिया। एक वो दिन था और एक आज का दिन है...सज्जाद अली ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। अप्रेल २००८ में "चहार बलिश" नाम से इन्होंने अपना एलबम रीलिज किया, जिसमें "चल रैन दे"(यह गाना वास्तव में जुलाई २००६ में मार्केट में आया था और इस गाने ने उस समय खासा धूम मचाया था) भी शामिल है। इनके बारे में इससे ज्यादा क्या कहा जाए कि खुद ए०आर०रहमान इन्हें "ओरिजिनल क्रोसओवर" मानते हैं।

रहमान इन्हें "ओरिजिनल क्रोसओवर" मानते हैं और कहते हैं कि: "From the realm of the classical, he metamorphosed into one of the brightest lights of Pakistani pop.Always striking the right note, and never missing a beat, even the most hardened purist has to give Sajjad his due. This man can breathe life in a Ghazal even as he puts the V back into verve. He is one of the very few singers in Pakistan who seems a complete singer. As far as skill is concerned I feel nobody compares to Sajjad Ali. He is simply too good at everything he chooses to create." यानि कि "शास्त्रीय संगीत के साम्राज्य से चलकर सज्जाद ने पाकिस्तानी पॉप की चमकती-धमकती दुनिया में भी अपनी पकड़ बना ली है। ये हमेशा सही नोट लगाते हैं और एक भी बीट इधर-उधर नहीं करते, इसलिए जो "प्युरिस्ट" हैं उन्हें भी सज्जाद का महत्व जानना चाहिए। ये ग़ज़लों में जान फूँक देते हैं और गानों में जोश का संचार करते हैं। ये पाकिस्तान के उन चुनिंदे गायकों में से हैं जिन्हें एक सम्पूर्ण गायक कहा जा सकता है। जहाँ तक योग्यता की बात है तो मेरे हिसाब से सज्जाद अली की कोई बराबरी नहीं कर सकता। ये जो भी करते हैं, उसमें शिखर तक पहुँच जाते हैं।"

सज्जाद अली के बारे में हंस राज हंस कहते हैं कि "अगर मेरा पुनर्जन्म हो तो मैं सज्जाद अली के रूप में जन्म लेना चाहूँगा।" तो इतनी काबिलियत है इस एक अदने से इंसान में।

"विकिपीडिया" पर अगर देखा जाए तो इनके एलबमों की फेहरिश्त इतनी लंबी है कि किसे चुनकर यहाँ पेश करूँ और किसे नहीं, यह समझ नहीं आता। फिर भी मैं कुछ हिट सिंगल्स की लिस्ट दिए देता हूँ:

बाबिया, चल उड़ जा, कुछ लड़कियाँ मुझे, चीफ़ साब, माहिवाल, तस्वीरें, जादू, झूले लाल, चल झूठी, दुआ करो, प्यार है, पानियों में, सोहनी लग दी, सिन्ड्रेला, तेरी याद, ऐसा लगा, कोई नहीं, ना बोलूँगी (रंगीन), चल रैन दे (जिसका ज़िक्र हमने पहले भी किया है), पेकर (२००८)

कुछ सालों से सज्जाद गायकी की दुनिया में नज़र नहीं आ रहे थे, लेकिन अच्छी खबर ये है कि अभी हाल में हीं इन्होंने "शोएब मंसूर" की आने वाली फिल्म "बोल" के लिए एक गाना रिकार्ड किया है। इसी अच्छी खबर के साथ चलिए हम अब आज की नज़्म की ओर रूख करते हैं।

हम अभी जो नज़्म सुनवाने जा रहे हैं उसे हमने "सिन्ड्रेला" एल्बम से लिया है, जो २००३ में रीलिज हुई थी। इस नज़्म में सज्जाद अली की आवाज़ की मिठास आपको बाँधे रखेगी, इसका मुझे पूरा यकीन है। नज़्म का उनवान है "पानियों में"..

पानियो में चल रही हैं,
कश्तियाँ भी जल रही हैं,
हम किनारे पे नहीं हैं.. हो..

ज़िंदगी की _______,
है मोहब्बत की कहानी,
आँसूओं में पल रही है... हो..

जो कभी मिलते नहीं हैं,
मिल भी जाते हैं कहीं पर,
ना मिलें तो ग़म नहीं है.. हो..

दूर होते जा रहे हैं,
ये किनारे, वो किनारे,
ना तुम्हारे, ना हमारे... हो..




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "बिछड़" और शेर कुछ यूँ था-

ईंज मैं रोई, जी मैं बिछड़ के खोई,
कूंज (गूंज) तड़प दीदार बिना

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

मुझसे बिछड़ के ख़ुश रहते हो
मेरी तरह तुम भी झूठे हो (बशीर बद्र)

बिछड़ कर हम से कहाँ जाओगे
तासीर हमारी वापिस ले आएगी (मंजु जी)

शायद कोई रोयेगा अपनी कब्र पर भी
बिछड़ जाने की रस्म निभानी ही होगी (शन्नो जी)

बिछड़ के भी वो मुझसे दूर रह न सका
आंख से बिछड़ा और दामन मैं रह गया (अवनींद्र जी)

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों मैं मिले
जैसे सूखे हुए कुछ फूल किताबों मैं मिले (अहमद फ़राज़)

हर बार की तरह पिछली महफ़िल में भी मैं शब्द गायब करना भूल गया। सजीव जी ने इस बात की जानकारी दी। सजीव जी, आपका धन्यवाद! वैसे उस महफ़िल की शोभा बनीं पूजा जी (शायद पहली बार :) ).. पूजा जी, इस उपलब्धि के लिए आपको ढेरों बधाईयाँ। मंजु जी, जन्मदिवस की बधाईयों को स्वीकार करते हुए मैं आपको तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ। आपने मेरे लिए जो पंक्तियाँ लिखीं, जो दुआएँ दीं (जीवेत शरद: शतम) उसकी प्रशंसा के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। ताज मैंने नहीं पहनाया, ताज आपने मुझे पहनाया है। शन्नो जी, आप सबसे थोड़ा-बहुत मजाक कर लूँ, इतना हक़ तो मुझे है हीं। है ना? :) पंजाबी तो मुझे भी नहीं आती (आ जाती, अगर कोई पंजाबन मिल जाती मुझे.. लेकिन मिली हीं नहीं :) ) , इसलिए तो आप सबसे कहा था कि रिक्त स्थानों की पूर्ति कर दें। लेकिन यह नज़्म भी "तन्हा" हीं रह गई, किसी ने भी इसे पूरा करके इसका साथ नहीं दिया। खैर, लगता है कि अब किसी पंजाबन को हीं ढूँढ कर कहना होगा कि बताओ हमारे "राहत" भाईसाब क्या कह रहे हैं और उन पंक्तियों का अर्थ क्या निकलता है। हा हा.. अवनींद्र जी, आप देर आए, लेकिन आए तो सही.. आपके बिना महफ़िल में कमी-सी रह जाती। ये क्या, आपको अहमद फ़राज़ साहब का नाम नहीं याद आ रहा था। कोई बात नहीं, आप हीं के लिए हमने आज के पोस्ट में अहमद साहब की उसी ग़ज़ल का लिंक दिया है, वहाँ जाकर ग़ज़ल पढ लें, सुन लें और उनके बारे में जान भी लें। यह आपके लिए गृह-कार्य है। करेंगे ना? :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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