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Saturday, November 5, 2011

कुछ एल पी गीतों की क्वालिटी तो आजकल के डिजिटल रेकॉर्डिंग् से भी उत्तम थी -विजय अकेला

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 66 गीतकार विजय अकेला से बातचीत उन्हीं के द्वारा संकलित गीतकार जाँनिसार अख़्तर के गीतों की किताब 'निगाहों के साये' पर (भाग-२)
भाग ०१ यहाँ पढ़ें

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! 'शनिवार विशेषांक' मे पिछले सप्ताह हम आपकी मुलाकात करवा रहे थे गीतकार विजय अकेला से जिनसे हम उनके द्वारा सम्पादित जाँनिसार अख़्तर साहब के गीतों के संकलन की किताब 'निगाहों के साये' पर चर्चा कर रहे थे। आइए आज बातचीत को आगे बढ़ाते हुए आनन्द लेते हैं इस शृंखला की दूसरी और अन्तिम कड़ी।

सुजॉय - विजय जी, नमस्कार और एक बार फिर आपका स्वागत है 'आवाज़' के मंच पर।

विजय अकेला - धन्यवाद! नमस्कार!

सुजॉय - विजय जी, पिछले हफ़्ते आप से बातचीत करने के साथ साथ जाँनिसार साहब के लिखे आपकी पसन्द के तीन गीत भी हमनें सुने। क्यों न आज का यह अंक अख़्तर साहब के लिखे एक और बेमिसाल नग़मे से शुरु की जाये?

विजय अकेला - जी ज़रूर!

सुजॉय - तो फिर बताइए, आपकी पसन्द का ही कोई और गीत।

विजय अकेला - फ़िल्म 'नूरी' का शीर्षक गीत सुनवा दीजिए। ख़य्याम साहब की तर्ज़, लता जी और नितिन मुकेश की आवाज़ें।

गीत - आजा रे आजा रे ओ मेरे दिलबर आजा (नूरी)


सुजॉय - विजय जी, पिछले हफ़्ते हमारी बातचीत आकर रुकी थी इस बात पर कि जाँनिसार साहब के गीतों के ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड्स तो आपको मिल गए, पर समस्या यह आन पड़ी कि इन्हें सूना कहाँ जाये क्योंकि ग्रामोफ़ोन प्लेयर तो आजकल मिलते नहीं हैं। तो किस तरह से समस्या का समाधान हुआ?

विजय अकेला - जी, ये रेकॉर्ड्स सुनना बहुत ज़रूरी था क्योंकि गानों को करेक्टली और शुद्धता के साथ छापना भी तो इस किताब को छापने की एक अहम वजह थी बिना किसी ग़लती के!

सुजॉय - बिल्कुल! ऑथेन्टिसिटी बहुत ज़रूरी है।

विजय अकेला - जी!

सुजॉय - तो फिर रेकॉर्ड प्लेयर का इंतज़ाम हुआ?

विजय अकेला - प्लेयर का इंतज़ाम करना ही पड़ा। महंगी क़ीमत देनी पड़ी।

सुजॉय - महंगी क़ीमत देनी पड़ी, मतलब ऐन्टिक की दुकान में मिली?

विजय अकेला - जी, ठीक समझे आप। मगर एक एक लफ़्ज़ को सौ सौ बार सुन कर पर्फ़ेक्ट होने के बाद ही किताब में लिखा।

सुजॉय - जी जी, क्योंकि ऑडियो क्वालिटी अच्छी नहीं होगी।
विजय अकेला - बिल्कुल सही। पर हमेशा नहीं, कुछ गीतों की क्वालिटी तो आजकल के डिजिटल रेकॉर्डिंग् से भी उत्तम थी।

सुजॉय - सही है! क्या है कि उन गीतों में गोलाई होती थी, आजकल के गीतों में शार्पनेस है पर राउण्डनेस ग़ायब हो गई है, इसलिए ज़्यादा तकनीकी लगते हैं और जज़्बाती कम। ख़ैर, विजय जी, यहाँ पर जाँनिसार साहब के लिखे एक और गीत की गुंजाइश बनती है। बताइए कौन सा गीत सुनवाया जाये?

विजय अकेला - "आँखों ही आँखों में इशारा हो गया", फ़िल्म 'सी.आई.डी' का गीत है।

सुजॉय - नय्यर साहब के संगीत में रफ़ी साहब और गीता दत्त की आवाज़ें।

गीत - आँखों ही आँखों में इशारा हो गया (सी.आई.डी)


सुजॉय - विजय जी, 'निगाहों के साये' किताब का विमोचन कहाँ और किनके हाथों हुआ?

विजय अकेला - जुहू के 'क्रॉसरोड' में गुलज़ार साहब के हाथों हुआ। जावेद अख़्तर साहब और ख़य्याम साहब भी वहाँ मौजूद थे।

सुजॉय - विजय जी, हम अपने पाठकों के लिए यहाँ पर पेश करना चाहेंगे वो शब्द जो गुलज़ार साहब और जावेद साहब नें आपके और आपके इस किताब के बारे में कहे हैं।

विजय अकेला - जी ज़रूर!

गुलज़ार - मुझे ख़ुशी इस बात की है कि यह रवायत अकेला नें बड़ी ख़ूबसूरत शुरु की है ताकि उन शायरों को, जिनके पीछे काम करने वाला कोई नहीं था, या जिनका लोगों नें नेग्लेक्ट किया, या जिनपे राइटर्स ऐसोसिएशन काम करती या ऐसी कोई ऑरगेनाइज़ेशन काम करती, उन शायरों के कलाम को सम्भालने का एक सिलसिला शुरु किया, वरना फ़िल्मों में लिखा हुआ कलाम या फ़िल्मों में लिखी शायरी को ऐसा ही ग्रेड दिया जाता था कि जैसे ये किताबों के क़ाबिल नहीं है, ये तो सिर्फ़ फ़िल्मों में है, बाक़ी आपकी शायरी कहाँ है? ये हमेशा शायरों से पूछा जाता था। यह एक बड़ा ख़ूबसूरत क़दम अकेला नें उठाया है कि जिससे वो शायरी, जो कि वाक़ई अच्छी शायरी है, जो कभी ग़र्द के नीचे दब जाती या रह जाती, उसका एक सिलसिला शुरु हुआ है और उसका आग़ाज़ उन्होंने जाँनिसार अख़्तर साहब से, और बक्शी साहब से किया है, और भी कई शायर जिनका नाम उन्होंने लिया, जैसे राजेन्द्र कृष्ण है, और भी बहुत से हैं, ताकि उनका काम सम्भाला जा सके।


जावेद अख़्तर - सबसे पहले तो मैं विजय अकेला का ज़िक्र करना चाहूँगा, जिन्होंने इससे पहले ऐसे ही बक्शी साहब के गीतों को जमा करके एक किताब छापी थी और अब जाँनिसार अख़्तर साहब के १५१ गीत उन्होंने जमा किए हैं और उसे किताब की शक्ल में 'राजकमल' नें छापा है। ये बहुत अच्छा काम कर रहे हैं और हमारे जो पुराने गीत हैं और मैं उम्मीद करता हूँ कि इसके बाद जो दूसरे शायर हैं, राजेन्द्र कृष्ण हैं, राजा मेहन्दी अली हैं, शैलेन्द्र जी हैं, मजरूह साहब हैं, इनकी रचनाओं को भी वो संकलित करने का इरादा करेगें


सुजॉय - विजय जी, गुलज़ार साहब और जावेद साहब के विचार तो हमने जाने, और यह भी पता चला कि आगे आप किन गीतकारों पर काम करना चाहते हैं। फ़िल्हाल जाँनिसार साहब का लिखा कौन सा गीत सुनवाना चाहेंगे?


विजय अकेला - 'रज़िया सुल्तान' का "ऐ दिल-ए-नादान"

गीत - ऐ दिल-ए-नादान (रज़िया सुल्तान)


सुजॉय - विजय जी, बहुत अच्छा लगा आपसे बातचीत कर, आपकी इस किताब के लिए और इस साहसी प्रयास के लिए हम आपको बधाई देते हैं, पर एक शिकायत है आपसे।

विजय अकेला - वह क्या?

सुजॉय - आप फ़िल्मों में बहुत कम गीत लिखते हैं, ऐसा क्यों?

विजय अकेला - अब ज़्यादा लिखूंगा। सुजॉय - हा हा, चलिए इसी उम्मीद के साथ आज आपसे विदा लेते हैं, बहुत बहुत धन्यवाद और शुभकामनाएँ।

विजय अकेला - शुक्रिया बहुत बहुत!

तो ये थी बातचीत गीतकार विजय अकेला से उनके द्वारा सम्पादित जाँनिसार अख़्तर के गीतों के संकलन की किताब 'निगाहों के साये' पर। अगले सप्ताह फिर किसी विशेष प्रस्तुति के साथ उपस्थित होंगे, तब तक के लिए अनुमति दीजिये, पर आप बने रहिये 'आवाज़' के साथ! नमस्कार!

Saturday, October 29, 2011

जाँनिसार अख्तर की पोयट्री में क्लास्सिकल ब्यूटी और मॉडर्ण सेंसब्लिटी का संतुलन था - विजय अकेला की पुस्तक से

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 65
गीतकार विजय अकेला से बातचीत उन्हीं के द्वारा संकलित गीतकार जाँनिसार अख़्तर के गीतों की किताब 'निगाहों के साये' पर (भाग-१)

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! 'शनिवार विशेषांक' के साथ मैं एक बार फिर हाज़िर हूँ। दोस्तों, आपनें इस दौर के गीतकार विजय अकेला का नाम तो सुना ही होगा। जी हाँ, वो ही विजय अकेला जिन्होंने 'कहो ना प्यार है' फ़िल्म के वो दो सुपर-डुपर हिट गीत लिखे थे, "एक पल का जीना, फिर तो है जाना" और "क्यों चलती है पवन... न तुम जानो न हम"; और फिर फ़िल्म 'क्रिश' का "दिल ना लिया, दिल ना दिया" गीत भी तो उन्होंने ही लिखा था। उन्हीं विजय अकेला नें भले ही फ़िल्मों में ज़्यादा गीत न लिखे हों, पर उन्होंने एक अन्य रूप में भी फ़िल्म-संगीत जगत को अपना अमूल्य योगदान दिया है। गीतकार आनन्द बक्शी के गीतों का संकलन प्रकाशित करने के बाद हाल ही में उन्होंने गीतकार जाँनिसार अख़्तर के गीतों का संकलन प्रकाशित किया है, जिसका शीर्षक है 'निगाहों के साये'। आइए आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हम विजय अकेला जी से बातचीत करें और जानने की कोशिश करें इस पुस्तक के बारे में।

सुजॉय - विजय जी, बहुत बहुत स्वागत है आपका 'आवाज़' के इस मंच पर। मैं सुजॉय चटर्जी, आप का इस मंच पर स्वागत करता हूँ, नमस्कार!

विजय अकेला - नमस्कार सुजॉय जी!

सुजॉय - सबसे पहले मैं आपको बधाई देता हूँ 'निगाहों के साये' के प्रकाशित होने पर। आगे कुछ कहने से पहले मैं आपको यह बता दूँ कि जाँनिसार साहब का लिखा यह जो गीत है न "ये दिल और उनकी निगाहों के साये", यह बचपन से मेरा पसन्दीदा गीत रहा है।

विजय अकेला - जी, बहुत ही सुकून देने वाला गीत है, और संगीत भी उतना सुकूनदायक है इस गीत का।

सुजॉय - क्या इस किताब के लिए यह शीर्षक 'निगाहों के साये' आप ही नें सुझाया था?

विजय अकेला - जी हाँ।

सुजॉय - यही शीर्षक क्यों?

विजय अकेला - क्योंकि यह उनका न केवल एक हिट गीत था, बल्कि कोई भी इस गीत से उन्हें जोड़ सकता था। यही शीर्षक मुझे सब से बेहतर लगा।

सुजॉय - तो चलिए इसी गीत को सुनते हैं, फ़िल्म 'प्रेम पर्बत' का यह गीत है लता जी की आवाज़ में, जयदेव का संगीत है।
गीत - ये दिल और उनकी निगाहों के साये (प्रेम पर्बत)


सुजॉय - अच्छा विजय जी, यह बताइए कि आप नें संकलन के लिए आनन्द बक्शी जी के बाद जाँनिसार साहब को ही क्यों चुना?

विजय अकेला - बक्शी जी ही की तरह जाँनिसार साहब की भी फ़िल्मी गानों की कोई किताब नहीं आई थी। जाँनिसार साहब भी एक ग़ज़ब के शायर हुए हैं और मैं उनसे मुतासिर रहा हूँ, इसलिए मैंने उन्हें चुना। गोल्डन ईरा उनकी वजह से महकी है, रोशन हुई है ऐसा मैं मानता हूँ।

सुजॉय - विजय जी, इससे पहले कि मैं आप से अगला सवाल पूछूँ, मैं अपने पाठकों की जानकारी के लिए यहाँ पर 'निगाहों के साये' किताब की भूमिका में वो शब्द प्रस्तुत करता हूँ जो किसी समाचार पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं इसी किताब के बारे में।

'निगाहों के साये' मशहूर शायर जाँनिसार अख़्तर की फ़िल्मी यात्रा का एक ऐसा संकलन है जिसमें ग़ज़लों की रवानी है तो गीतों की मिठास भी और भावनाओं का समन्दर है तो जलते हुए जज़्बात भी। इसीलिए इस संकलन के फ़्लैप पर निदा फ़ाज़ली नें लिखा है: "जाँनिसार अख़्तर एक बाहेमियन शायर थे। उन्होंने अपनी पोयेट्री में क्लासिकल ब्यूटी और मॉडर्ण सेंसब्लिटी का ऐसा संतुलन किया है कि उनके शब्द ख़ासे रागात्मक हो गए हैं।" १९३५-३६ में ही जाँनिसार अख़्तर तरक्के पसंद आंदोलन का एक हिस्सा बन गए थे। सरदार जाफ़री, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और साहिर लुधियानवी की तरह अख़्तर साहब फ़िल्मी दुनिया के इल्मी शायर थे। विजय अकेला द्वारा संपादित यह संकलन कई अर्थों में विशिष्ट है। २१८ गीतों को तिथिवार सजाया गया है। पहला गीत 'शिकायत' फ़िल्म से है जिसकी रचना १९४८ में हुई थी और अंतिम गीत 'रज़िया सुल्तान' से है जिसे शायर नें १९८३ में रचा था। यानी ३५ वर्षों का इतिहास इस संकलन में है। कई ऐसी फ़िल्मों के नग़में भी इस संग्रह मे हैं जो अप्रदर्शित रहीं जैसे 'हम हैं राही प्यार के', 'मर्डर ऑन हाइवे', 'हमारी कहानी'। यह विजय अकेला का साहसिक प्रयास ही है कि ऐसी दुर्लभ सूचनाएँ इस पुस्तक में पढ़ने को मिलती हैं। इसके साथ डॉ. गोपी चंद नारंग का संस्मरण 'इंकलाबों की घड़ी' है, जावेद अख़्तर के साथ बातचीत के अंश, नैनिताल और भोपाल से जाँनिसार अख़्तर की बेगम सजिया अख़्तर के लिखे दो ख़त, हसन कमाल की बेबाक टिप्पणी, ख़य्याम का भाव से भरा लेख, सपन (जगमोहन) की भावभीनी श्रद्धांजलि आदि इस पुस्तक में दी गई हैं।


सुजॉय - तो दोस्तों, अब आपको अंदाज़ा हो गया होगा कि विजय जी के इस पुस्तक का क्या महत्व है गुज़रे ज़माने के अनमोल नग़मों के शौकीनों के लिए। अच्छा विजय जी, बातचीत को आगे बढ़ाने से पहले क्यों न एक गीत सुन लिया जाये अख़त्र साहब का लिखा हुआ और आपकी पसंद का भी?


विजय अकेला - ज़रूर, 'छू मंतर' का "ग़रीब जान कर मुझको न तुम मिटा देना"

सुजॉय - वाह! "तुम्ही ने दर्द दिया है तुम्ही दवा देना", आइए सुनते हैं रफ़ी साहब की आवाज़ और नय्यर साहब की तर्ज़।

गीत - ग़रीब जान कर मुझको न तुम मिटा देना (छू मंतर)


सुजॉय - विजय जी, आपके इस पुस्तक के बारे में तो हमनें उस समाचार पत्र में छपे लेख से जान लिया, पर यह बताइए कि हर एक गीत के पूरे-पूरे बोल आपनें कैसे प्राप्त किए? किन सूत्रों का आपनें सहारा लिया?

विजय अकेला - CDs तो जाँनिसार साहब की फ़िल्मों के जैसे मार्केट में थे ही नहीं, एक 'रज़िया सुल्तान' का मिला, एक 'नूरी' का, एक 'सी.आई.डी' का, बस, और नहीं।

सुजॉय - जी, तो फिर बाकी आपनें कहाँ ढूंढे?

विजय अकेला - मुझे फ़िल्म-हिस्टोरियन सी. एम. देसाई साहब के पास जाना पड़ा। फिर आकाशवाणी की लाइब्रेरी में जहाँ FM पे मैं जॉकी भी हूँ, और फिर आख़िर में जावेद (अख़्तर) साहब के भाई शाहीद अख़्तर के पास गया जिनको जाँनिसार साहब नें अपने रेकॉर्ड्स, फ़ोटोज़, रफ़ बूक्स वगेरह दे रखी थी, और जिन्होंने उन्हें सम्भाल कर रखा भी था।

सुजॉय - सुनार को ही सोने की पहचान होती है।

विजय अकेला - मगर रेकॉर्ड्स मिलने के बाद प्रोब्लेम यह आई कि इन्हें कहाँ सुनी जाए, कोई रेकॉर्ड-प्लेयर तो है नहीं आज!

सुजॉय - बिल्कुल! पर आपकी यह समस्या का समाधान कैसे हुआ, यह हम जानेंगे अगली कड़ी में। और भी कुछ सवाल आप से पूछने हैं, लेकिन आज बातचीत को यहीं विराम देंगे, लेकिन उससे पहले जाँनिसार साहब का लिखा आपकी पसंद का एक और गीत सुनना चाहेंगे।

विजय अकेला - "मैं तुम्ही से पूछती हूँ मुझे तुमसे प्यार क्यों है"

सुजॉय - बहुत ख़ूब! 'ब्लैक कैट' फ़िल्म का गीत है, एन. दत्ता का संगीत है, लता जी की आवाज़, सुनते हैं।
गीत - मैं तुम्ही से पूछती हूँ मुझे तुमसे प्यार क्यों है (ब्लैक कैट)


तो दोस्तों, यह थी बातचीत गीतकार विजय अकेला से उनके द्वारा संकलित व सम्पादित गीतकार जाँनिसार अख़्तर के गीतों की किताब 'निगाहों के साये' से सम्बंधित। इस बातचीत का दूसरा व अन्तिम भाग आप तक पहुँचाया जायेगा अगले सप्ताह इसी स्तंभ में। आज अनुमति दीजिये, और हमेशा बने रहिए 'आवाज़' के साथ। नमस्कार!

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