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Tuesday, May 12, 2009

वाइस ऑफ़ हेवन - कोई बोले राम-राम, कोई खुदाए........नुसरत फ़तेह अली खान.

बात एक एल्बम की # 06

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - नुसरत फतह अली खान और जावेद अख्तर.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - "संगम" - नुसरत फतह अली खान और जावेद अख्तर

आलेख प्रस्तुतीकरण - नीरज गुरु "बादल"

आज फिर नुसरत जी पर लिखने बैठा हूँ, समझ नहीं आता है कि क्या करूँ जो इस शख्स का नशा मुझ पर से उतर जाए. इनका हर सुर खुमारी का वो आलम लेकर आता है कि बस आँखें बंद हो जाती हैं, शरीर के कस-बल ढीले पड़ जाते हैं और एक गहरी ध्यान-मुद्रा में चला जाता हूँ. फिर लगता है कि कोई भी मुझे छेड़े नहीं. पर यह दुनिया है बाबा.....वो मुझे नहीं छोड़ती और यह नुसरत साहब मुझसे नहीं छूटते हैं. आज यही कशमकश मैं आपके साथ बाँटने निकला हूँ.

आज जिस नुसरत साहब को हम जानते हैं, उन्हें पाकिस्तानी मौसिकी का रत्न कहा जाता है, बात बड़ी लगती है-सही भी लगती है, पर मेरी नज़र में उन्हें विश्व-संगीत की अमूल्य धरोहर कहा जाए तो कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी. सूफियाना गायन ऐसा है कि कोई भी उसका दीवाना हो जाए, पर यह दीवानगी पैदा करने के लिए ही उस खुदा ने नुसरत जी को हमारे बीच भेजा था. उन्होंने क़व्वाली के ज़रिये, इस सूफियाना अंदाज़ को, जो इस भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ हिस्सों में ही मक़बूल था, दुनिया भर को दीवाना बनाने का काम किया है. उनकी क़व्वाली गायन का अंदाज़ ऐसा कि सुनने वाला तो नशे में खो ही जाता है, और जो उन्हें सामने गाता हुआ देखता है, तो यह नशा उसके साथ ता-उम्र के लिए ही ठहर जाता है. फिर आप लाख कोशिशे कर लें, नशा न उतरता है - न कहीं जाता है.

आम तौर पर क़व्वाली के बारे में माना जाता है कि यह सूफी संतों की मज़ारों पर गायी जाने वाली भक्ति गायन की एक विधा है, जिसका एक सीमित दायरा है. इसका एक खास तबका है और असर भी वहीँ तक सीमित है. यह ठीक भी है और एक हद तक सही भी था, पर १९३१ में फिल्मों के आगमन ने क़व्वाली की शक्ल ही बदल दी, अब क़व्वाली खुदा-ए-आलम, खुदा-ए-इश्क से बाहर आकर और भी नए मायने लिए अपने एक खास तबके से आगे निकल कर अन्य लोगों की भी हो गई. नए साज, नए उपकरण, नया माहौल, नए प्रयोगों ने क़व्वाली की दशा-दिशा ही बदल दी.

उसी दौर में एक शख्स ने बड़े चुपचाप अपना परिचय दिया, नुसरत फतह अली खान, पहले तो अपने पिता की शागिर्दी की फिर पिता के बाद अपने चचा उस्ताद मुबारक अली खान की शागिर्दी की, पहली बार मंच चचा ने ही दिया, पर १९७१ में चचा उस्ताद मुबारक अली खान की म्रत्यु के बाद जब नुसरत जी ने अपनी क़व्वाली पार्टी बनाई तो जैसे क़व्वाली के एक नए युग की शुरुआत हुई. इस पार्टी का नाम रखा गया,"नुसरत फ़तेह अली खान-मुजाहिद मुबारक अली खान एंड पार्टी".मुजाहिद उनके चचा के सुपुत्र. इस पार्टी ने अपना पहला कार्यक्रम, रेडियो पाकिस्तान के वार्षिक संगीत समारोह,"जश्न-ए-बहारा" के लिए दिया और क़व्वाली अपने घर से निकलकर दुनिया को अपना बनाने के लिए चल पड़ी.

बाद में ८० के दशक में बर्मिंघम-इंग्लैंड की कम्पनी -ओरियंटल स्टार ऐजेंसी ने नुसरत जी को साइन किया तो जैसे उनके लिए दुनिया के दरवाज़े खुल गए या और भी बेहतर कहूँ तो कह सकता हूँ कि उन्होंने अपने दरवाज़े दुनिया में संगीत के दीवानों के लिए खोल दिए. पीटर ग्रेबियल के "द लास्ट टेम्पटेशन ऑफ़ क्राइस्ट" ने उन्हें पश्चिम के घर-घर तक पहुंचा दिया. उसके बाद तो जैसे ख्याल-ध्रुपद में रचे-बसे सुरों की बरसात ही शुरू हो गई हो,"रियल वर्ल्ड","मस्त-मस्त","स्टार राईस","द प्रेयर सायकल"......और फिर आप गिनते जाइये-गुनगुनाते जाइये. गिनिस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड के मुताबिक उनके क़व्वाली पर १२५ एल्बम हैं, इनमें उनके इस दुनिया-ए-फानी से रूखसती के बाद जारी एल्बम शामिल नहीं हैं. आप नशे का अन्दाज़ा लगा सकते हैं.

हिंदी फिल्मों में उन्होंने,"और प्यार हो गया",जिसमें वह खुद रूबरू थें,"कच्चे धागे", और विशेषकर "धड़कन" जिसकी क़व्वाली में "...धड़कन-धड़कन-धड़कन" का आरोह-अवरोह आप अपनी रूह तक महसूस कर सकते हैं. एक बेहद सतही फिल्म में इतना उच्च कोटी का गायन, संगीत रसिज्ञों को चौका देता है. दरअसल यही है नुसरत जी का कमाल. उन्होंने अपनी गायकी पर - क़व्वाली पर ढेरों प्रयोग किये, दुनिया के हर साज़ और मौसिकी के हर रंग को उन्होंने अपने लिए इस्तेमाल किया,पर कभी भी उसके चलते किसी भी कमतरी से कोई समझौता नहीं किया. इस फिल्म का यह गायन इसका सर्वश्रेष्ठ उदहारण है. तब जब उन्हें कोई "बाब मेर्लो ऑफ़ पाकिस्तान" या "एल्विस ऑफ़ ईस्ट" कहाता है तो मुझे बड़ा दुःख होता है.नुसरत जी, नुसरत जी हैं, उन्हें वही रहने दो, तुलना ज़रूरी है क्या?

हाँ,जब कोई उन्हें "वाइस ऑफ़ हेवन" कहता है तो बड़ा ही सुखद लगता है. खुदा की इस आवाज़ को और क्या कहेगें आप. एक लम्बी सूची है, उनके सुर-स्वर से सजी रचनाओं की. सोचता हूँ इस पर बात करूँ या उस पर बात करूँ. सब एक से बढ़कर एक धुनें हैं, राग हैं, ख्याल है, ध्रुपद हैं, उर्दू है, पंजाबी है, कहीं-कहीं अरबी-फ़ारसी भी है, दुनिया भर की लोक धुनों पर किये गए प्रयोग हैं, परम्परा और आधुनिक वाद्यों का संगम है, कई बार लगता है कि अरे, ऐसा भी है. सुनते-सुनते मुहँ से बेसाख्ता निकल पड़ता है तो सिर्फ एक ही लफ्ज़ - वाह. अगर आपने नुसरत जी के पापुलर एल्बम ही सुने हैं तो मेरी गुजारिश है कि और भी ढूंढे इस महान गायक की गायकी को और अपना जीवन धन्य बना लें, आखिर यह आवाज़ है जन्नत की-उस परवरदिगार की, जिसे कहा गया है -"वाइस ऑफ़ हेवन".

चलिए लौटते हैं हमारे फीचर्ड एल्बम की तरफ जहाँ नुसरत साहब का साथ दे रहे हैं गीतकार जावेद अख्तर. इसी "संगम" का रचा "आफरीन आफरीन" हम सुन चुके हैं, आज सुनिए दो और शानदार ग़ज़लें -

अब क्या सोचें क्या होना है....(इस ग़ज़ल में नुसरत साहब ने एक ऐसा माहौल रचा है जो आज की अनिश्चिताओं से भरी दुनिया में निर्णय लेने वाले हर शख्स के मन में पैदा होती है. ये गायिकी बेमिसाल है)



और अब सुनिए इसके ठीक विपरीत प्यार के उस पहले दौर की दास्ताँ इस गीत में -
आप से मिलके हम कुछ बदल से गए....



आने वाले सप्ताह में बातें करेंगे इस एल्बम के दूसरे फनकार जावेद अख्तर साहब की और सुनेंगें कुछ और रचनाएँ इसी एल्बम से. तब तक के लिए इजाज़त.


"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार नीरज गुरु. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.


Tuesday, May 5, 2009

आफ़रीन आफ़रीन...कौन न कह उठे नुसरत साहब की आवाज़ और जावेद साहब को बोलों को सुन...

बात एक एल्बम की # 05

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - नुसरत फतह अली खान और जावेद अख्तर.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - "संगम" - नुसरत फतह अली खान और जावेद अख्तर



उन दिनों मैं राजस्थान की यात्रा पर था, जहाँ एक बस में मैंने उसके घटिया ऑडियो सिस्टम में खड़खड़ के बीच, "आफरीन-आफरीन.." सुना था. ज़्यादा समझ में नहीं आया पर धुन कहीं अन्दर जाकर समां गई- वहीँ गूँजती रही. फिर जब उदयपुर की एक म्यूजिक शाप पर फिर उसी धुन को सुना जो अबकी बार कहीं ज़्यादा बेहतर थी तो एक नशा-सा छा गया. यह आवाज़ थी जनाब नुसरत फतह अली भुट्टो साहब की. क्या शख्सियत, आवाज़ में क्या रवानगी, क्या खनकपन, क्या लहरिया, क्या सुरूर और क्या अंदाज़ गायकी का, जैसे खुदा खुद ज़मी पर उतर आया हो.

मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जब नुसरत साहब गाते होगें, खुदा भी वहीँ-कहीं आस-पास ही रहता होगा, उन्हें सुनता हुआ मदहोश-सा. धन्य हैं वो लोग, जो उस समय वहां मौजूद रहें होगें. उनकी आवाज़-उनका अंदाज़, उनका वो हाथों को हिलाना, चेहरे पर संजीदगी, संगीत का उम्दा प्रयोग, यह सब जैसे आध्यात्म की नुमाइंदगी करते मालूम देते हैं. दुनिया ने उन्हें देर से पहचाना, पर जब पहचाना तो दुनिया भर में उनके दीवानों की कमी भी नहीं रहीं. १९९३ में शिकागो के विंटर फेस्टिवल में वो शाम आज भी लोगो को याद हैं जहाँ नुसरत जी ने पहली बार राक-कंसर्ट के बीच अपनी क़व्वाली का जो रंग जमाया,लोग झूम उठे-नाच उठे, उस 20 मिनिट की प्रस्तुति का जादू ता-उम्र के लिए अमेरिका में छा गया. वहीं उन्होंने पीटर ग्रेबियल के साथ उनकी फिल्म्स को अपनी आवाज़ दी और उनके साथ अपना अल्बम "शहंशाह" भी निकाला. नुसरत साहब की विशेषता थी पूर्व और पश्चिम के संगीत का संगम करके उसे सूफियाना अंदाज़ में पेश करना. क़व्वाली को उन्होंने एक नया मुकाम दिया. संगीत की सभी शैलियों को आजमाते हुए भी उन्होंने सूफियाना अंदाज़ नहीं छोडा और न ही कोई छेड़-छाड़ की खुद से. दुनिया यूँ ही उनकी दीवानी नहीं है. क़व्वाली के तो वे बे-ताज बादशाह थे.

कव्वालों के घराने में 13 अक्तूबर 1948 को पंजाब के फैसलाबाद में जन्मे नुसरत फतह अली को उनके पिता उस्ताद फतह अली खां साहब जो स्वयं बहुत मशहूर और मार्रुफ़ कव्वाल थे, ने अपने बेटे को इस क्षेत्र में आने से रोका था और खानदान की 600 सालों से चली आ रही परम्परा को तोड़ना चाहा था पर खुदा को कुछ और ही मंजूर था, लगता था जैसे खुदा ने इस खानदान पर 600 सालों की मेहरबानियों का सिला दिया हो, पिता को मानना पड़ा कि नुसरत की आवाज़ उस परवरदिगार का दिया तोहफा ही है और वो फिर नुसरत को रोक नहीं पाए और आज इतिहास हमारे सामने है.

जब नुसरत जी गुरु नानक की वाणी,"कोई कहे राम-राम,कोई खुदाए...."को अपनी आवाज़ देते हैं तो तो सुनने वाला मदहोशी में डूब जाता है. ऐसा निराला अंदाज़, दुनिया भर में जो लोग पंजाबी-उर्दू और क़व्वाली नहीं भी समझ पाते थें, पर उनकी आवाज़ और अंदाज़ के दीवानें थें. उन्हीं दीवानों में से एक -"गुडी", जो स्वयं एक मशहूर कम्पोजर और निर्माता रहे हैं, ने नुसरत जी को समझने के लिए अनुवादक का सहारा लिया और इस गायक को समझा. फिर दोनों दीवानों ने मिलकर एक अल्बम."डब क़व्वाली" के नाम से भी निकाला. गुडी ने नुसरत साहब के काम को दुनिया भर में फैलाया.गुडी बड़ी विनम्रता से कहते हैं,"यह उनके लिए बड़े भावनात्मक पल रहे हैं." इसी अल्बम में "बैठे-बैठे,कैसे-कैसे...." सुनिए,शुरुआती ३० सेकेण्ड ही काफी हैं, नशे में डूब जाने के लिए. पूर्व और पश्चिम में के आलौकिक फ्यूजन में भी उन्होंने अपना पंजाबीपन और सूफियाना अंदाज़ नहीं छोडा और फ्यूजन को एक नई परिभाषा दी. उन्होंने सभी सीमाओं से परे जाकर गायन किया. खाने के बेहद शौकीन नुसरत जी ने सिर्फ इस मामले में अपने डाक्टरों की कभी नहीं सुनी. जी भरकर गाया और जी भरकर खाया. महान सूफी संत और कवि रूमी की कविता को नुसरतनुमा अंदाज़ में क़व्वाली की शक्ल में सुनना, दावे से कहता हूँ कि बयां को लफ्ज़ नहीं मिलेगें. जिबरिश करने को जी चाहेगा. नुसरत और रूमी, मानो दो रूह मिलकर एक हो गई हों. बस आप सुनते चले जाएँ और कहीं खोते चले जाए.

मैं लिखता चला जाऊं और आप इस गायक को सुनते चले जाएँ और सब सुध-बुध खो बैठे, ऐसा हो सकता है.सुनिए,"मेरा पिया घर आया....","पिया रे-पिया रे.....","सानु एक पल चैन...","तेरे बिन.....","प्यार नहीं करना...." "साया भी जब साथ छोड़ जाये....","साँसों की माला पे...."और न जाने ऐसे कितने गीत हैं, ग़ज़ल हैं, कव्वालियाँ है, दुनिया भर का संगीत खुद में समेटे हुए, इस गायक को यदि नहीं सुना हो सुनने निकलिए, हिंदी फिल्मों से, पंजाबी संगीत से, सूफी संगीत से, फ्यूजन से कहीं भी चले जाइए, यह गायक, नुसरत फतह अली भुट्टो, आपको मिल जायेगा, आपको मदहोश करने के लिए-आपको अध्यात्मिक शांति दिलाने के लिए.....हर जगह -हर रूप में मौजूद है नुसरत साहब. इन्हें आप किसी भी नामी म्यूजिक -शाप में "वर्ल्ड-म्यूजिक" की श्रेणी में ही पायेगें. 16 अगस्त १९९७ को जब नुसरत साहब ने दुनिया-ए-फानी को अलविदा कहा, विश्व-संगीत में एक गहरा शोक छा गया. पश्चिम ने शोक में डूबकर कहा, पाकिस्तान ने दुनिया को जो अनमोल रत्न दिया था, आज हम उसे खो बैठे हैं और उनके पूर्व वालों की जैसे सिसकियाँ ही नहीं टूट रहीं हो, उन्हें लगा जैसे उनके बीच से खुदा की आवाज़ ही चली गई है.

नुसरत साहब पर और बातें होंगीं पर फिलहाल बढ़ते हैं इस माह के फीचर्ड अल्बम की तरफ. अपने पाकिस्तानी अल्बम्स से भारत में धूम मचाने के बाद नुसरत साहब को जब बॉलीवुड में फिल्म का न्योता मिला तो उन्होंने शायर के मामले में अपनी पसंद साफ़ कर दी कि वो काम करेंगें तो सिर्फ जावेद अख्तर साहब के साथ. इसी जोड़ी ने एक बहतरीन अल्बम में भी एक साथ काम किया, जिसे शीर्षक दिया गया - "संगम", दो मुल्कों के दो बड़े फनकारों का संगम और क्या आश्चर्य जो इस अल्बम का एक एक गीत अपने आप में एक मिसाल बन जाये तो...

तो चलिए शुरुआत करते हैं "संगम" के सबसे हिट गीत "अफरीन अफरीन" से. क्या बोल लिखे हैं जावेद साहब ने और अपनी धुन और गायिकी से नुसरत साहब ने इस गीत को ऐसी रवानगी दी है कि गीत ख़तम होने का बाद भी इसका नशा नहीं टूटता. "आफरीन-आफरीन" सूफी कलाम में एक बड़ा मुकाम रखती है. इसे ऑडियो में सुनना एक आध्यात्मिक अनुभव से गुजरना होता है तो विजुअल में देखना एक आलौकिक अनुभव से गुजरना होता है. एक ही तर्ज़ के दो अनुभव, लिखने को शब्द नहीं मिलते हैं, कहने को कुछ बचता नहीं है. तो बस सुनते हैं हमारी फीचर्ड एल्बम संगम से ये पहला तराना -



साप्ताहिक आलेख - नीरज गुरु "बादल"



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार नीरज गुरु. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.


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