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Saturday, April 8, 2017

चित्रकथा - 13: हिन्दी फ़िल्मों में किशोरी अमोनकर


अंक - 13

हिन्दी फ़िल्मों में किशोरी अमोनकर

"मेघा झर झर बरसत रे..." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 


पिछले सोमवार दिनांक 3 अप्रैल 2017 को शास्त्रीय संगीत की सुप्रसिद्ध गायिका पद्मविभूशण किशोरी अमोनकर (आमोणकर) का 84 वर्ष की आयु में देहावसन हो जाने से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन जगत को गहरी हानी पहुँची है। शास्त्रीय संगीत जगत में किशोरी जी का जो स्थान रिक्त हुआ है, उसकी पूर्ति हो पाना असंभव है। संयोग से आगामी सोमवार 10 अप्रैल को किशोरी जी का जन्मदिवस है। आइए आज ’चित्रकथा’ में स्वर्गीया किशोरी अमोनकर जी को श्रद्धा-सुमन अर्पित करें उनकी गाई उन रचनाओं को याद करते हुए जिन्होंने फ़िल्म-संगीत के धरोहर को समृद्ध किया है।



किशोरी अमोनकर (10 अप्रैल 1932 - 3 अप्रैल 2017)

फ़िल्म-संगीत के धरोहर को समृद्ध करने में जितना योगदान फ़िल्मी गायक-गायिकाओं का है, उतना ही योगदान उन शास्त्रीय-संगीत जगत के गायक-गायिकाओं का भी है जिन्होंने अपनी गिनी-चुनी रचनाओं से ना केवल रसिकों के दिलों में रस घोला है बल्कि फ़िल्म-संगीत का स्तर बहुत ऊँचा कर दिया है। शास्त्रीय गायिकाओं में शोभा गुर्टू, बेगम परवीन सुल्ताना, लक्ष्मी शंकर, सरस्वती राणे, हीरा देवी मिश्र के साथ-साथ किशोरी अमोनकर का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। भले किशोरी जी ने केवल दो फ़िल्मों में अपनी आवाज़ दी है, लेकिन उनकी गाई हुई ये चन्द रचनाएँ किसी ख़ज़ाने से कम नहीं। इन फ़िल्मों के गीतों की चर्चा शुरु करने से पहले कुछ ग़लतफ़हमियों को दूर करना बहुत ज़रूरी है। जहाँ इन्टरनेट से हमें बहुत सी जानकारियाँ मिलती है, वहीं ग़लत जानकारियों का भण्डार भी है इन्टरनेट। कई जगहों पर यह लिखा हुआ मिलता है कि किशोरी अमोनकर ने पहली बार 1946 की फ़िल्म ’पृथ्वीराज संयोगिता’ में गीत गाए हैं जो कि ग़लत है। यह सच है कि 1933 की इसी शीर्षक से बनी फ़िल्म में "किशोरी" नामक गायिका के गाए कुछ गीत हैं, लेकिन ये किशोरी अमोनकर नहीं बल्कि किशोरी पाठक हैं। एक और ग़लत धारणा है कि 1952 की फ़िल्म ’सिस्कियाँ’ में भी किशोरी जी ने गीत गाए हैं। ये दरसल "किशोरी" नामक किसी अन्य गायिका की आवाज़ में हैं और यह फ़िल्म कभी प्रदर्शित नहीं हुई।

10 अप्रैल 1932 को बम्बई में जन्मीं किशोरी अमोनकर ने संगीत की पहली शिक्षा अपनी माँ मोगुबाई कुर्डिकर से ली जो जयपुर-अतरौली घराने की जानीमानी गायिका थीं। साथ ही भिंडीबाज़ार घराने के अंजनी मालपेकर से भी उन्होंने तालीम ली। पारम्परिक रागों में निबद्ध ख़याल गायकी में उन्होंने महरथ हासिल की। भजन और ठुमरी में भी किशोरी अमोनकर का कोई सानी नहीं। एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका के रूप में वो 60 के दशक के शुरु में प्रतिष्ठित हुईं। 1964 में वी. शान्ताराम एक नृत्यप्रधान फ़िल्म बना रहे थे ’गीत गाया पत्थरों ने’। अपनी पुत्री राजश्री और अभिनेत्र जीतेन्द्र को उन्होंने इस फ़िल्म में लौन्च किया। ’झनक झनक पायल बाजे’ में एक से बढ़ कर एक शास्त्रीय-संगीत जगत के फ़नकारों के द्वारा फ़िल्म के गीतों को सजाने के बाद ’गीत गाया पत्थरों ने’ के शीर्षक गीत के लिए उन्होंने किशोरी अमोनकर को चुना। उन दिनों फ़िल्म-संगीत अपने पूरे शबाब पर थी। हर गायिका की तरह किशोरी के मन में भी फ़िल्म में गाने की इच्छा जागृत हुई। उनकी माँ और गुरुजी ने उन्हें समझाया कि उनके परिवार के लिए गीत-संगीत व्यवसाय नहीं बल्कि साधना है और इसलिए उन्हें फ़िल्मी गायन से दूर रहना चाहिए। पर किशोरी की तीव्र इच्छा थी फ़िल्म में गाने की। इसलिए उन्होंने अपनी माँ और गुरुजी के सुझाव को नज़रंदाज़ कर वी. शान्ताराम की फ़िल्म में मिले मौके को हाथोंहाथ ग्रहण कर लिया। 

राजश्री का सुन्दर नृत्य और उस पर किशोरी अमोनकर की मनमोहक आवाज़, असर तो होना ही था। हसरत जयपुरी के लिखे और कमचर्चित संगीतकार रामलाल द्वारा स्वरबद्ध इस गीत के दो संस्करण थे। एक तो किशोरी जी का गाया एकल, और दूसरा संस्करण एक युगल गीत था आशा भोसले और महेन्द्र कपूर की आवाज़ों में। जब इन दो संस्करणों में त्लनात्मक समीक्षा हुई तब किशोरी अमोनकर के गाए संस्करण को दिग्गजों ने ऊँचा स्थान दिया। इस गीत में राग दुर्गा की छाया थी जिसमें किशोरी जी को अपनी स्वरभाषा के ज्ञान को शब्दभाषा में ढालना था। बेहद ख़ूबसूरती के साथ फ़िल्म का यह शीर्षक गीत "गीत गाया पत्थरों ने..." उन्होंने गाया जो 1965 के बिनाका गीतमाला के वार्षिक कार्यक्रम के दसवें पायदान का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत बना। इस कामयाबी के बावजूद किशोरी अमोनकर ने फ़िल्म जगत से अपने सारे रिश्ते समाप्त करने का निर्णय लिया। इसके दो कारण थे। पहला कारण यह था कि जब ’गीत गाया पत्थरों ने’ गीत कामयाब हुई, तब उनकी माँ ने उन्हें चेतावनी दे दी कि अगर उसने फिर कभी किसी फ़िल्म के लिए गाया तो वो उसे अपने दो तानपुरों को छूने तक नहीं देंगी। किशोरी जी को अपनी ग़लती का अहसास हुआ। लेकिन सिर्फ़ यही एक कारण नहीं था फ़िल्म जगत से मुंह मोड़ने का। जैसा कि हम सभी जानते हैं उन दिनों फ़िल्म जगत में लौबी हुआ करती थी। जानेमाने संगीत इतिहासकार वामनराव हरि देशपाण्डे ने एक लेख में लिखा है कि किशोरी और उनकी माँ का इस फ़िल्म में गाने को लेकर कड़वा अनुभव रहा जब उन्होंने इस गीत के ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड्स को सभी दुकानों से यकायक ग़ायब होते हुए देखा। वैसे भी वो फ़िल्मी गायन के क्षेत्र में नहीं रहतीं, लेकिन कुछ प्रभावशाली लोगों द्वारा उन्हें अलग-थलग करने की साज़िश ने उनके दिल को बहुत ज़ोर का ठेस पहुँचाया। शक़ की उंगली लता मंगेशकर की तरफ़ उठी, पर सबूत के अभाव में इसकी पुष्टि कभी नहीं हो सकी। लेकिन ऐसा कई गायिकाओं के साथ हो चुका है। इस फ़िल्म के बाद किशोरी अमोनकर ने अपना पूरा ध्यान शास्त्रीय संगीत में लगा दिया और दिन दुगुनी रात चौगुनी उन्नति करती चली गईं। 

’गीत गाया पत्थरों ने’ बनने के 26 वर्ष बाद किशोरी अमोनकर फिर एक बार फ़िल्म जगत में क़दम रखे। इस बार फ़िल्मकार थे गोविन्द निहलानी। 1982 की अपनी फ़िल्म ’विजेता’ में शास्त्रीय संगीत का प्रयोग करने वाले गोविन्द निहलानी ने 1990 में अपनी फ़िल्म ’दृष्टि’ के लिए एक शास्त्रीय गायिका की आवाज़ लेने की सोच रहे थे। उन्हीं के शब्दों में यह फ़िल्म ग्यारह आंदोलनों में बनाया गया था और हर एक आन्दोलन के लिए एक सांकेतिक गीत था। इसके लिए उन्होंने किशोरी अमोनकर से गीत और आलाप गवाने का निर्णय लिया। लेकिन अमोनकर तो फ़िल्मों से दूर जा चुकी थीं। गोविन्द निहलानी ने जब उन्हें फ़िल्म की कहानी सुनाई और यह भी कहा कि वो अपने गीत ख़ुद कम्पोज़ कर सकती हैं, तब किशोरी अमोनकर को कहानी भी पसन्द आई और ख़ुद के रचे गीतों को गाने की बात से ख़ुश होकर फ़िल्म स्वीकार कर ली। फ़िल्म की कहानी में वैवाहिक विवाद और एक्स्ट्रामैरिटल अफ़ेअर्स के प्रसंगों को सुन कर अमोनकर ने निहलानी के सामने यह शर्त रख दी कि उनके किसी भी गीत को प्रेम-संपादन (lovemaking) दृश्य के पार्श्व में नहीं रखा जाएगा। उनकी सारी शर्तों तो निहलानी मान गए। अमोनकर जुट गईं फ़िल्म की धुनों को तैयार करने में। गीतों के लिए बोल थे वसन्त देव ने जिन्होंने ’उत्सव’ फ़िल्म में कई सुन्दर गीत लिखे थे। किशोरी अमोनकर के लिए इस फ़िल्म में संगीत देना एक बड़ी चुनौती थी। इसका मुख्य कारण था उनके जयपुर घराने के शैली का अनम्य या दृढ़ होना। ताल, अलंकार और स्वरूप, सभी बहुत दृढ़ होते हैं इस घराने के। ऐसे में एक फ़िल्मी संगीतकार न होते हुए अपने संगीत को फ़िल्म के संगीत के लिए ढाल पाना आसान काम नहीं था। और फिर समय की भी सीमा थी।

’दृष्टि’ फ़िल्म में तीन गीत और तीन आलाप थे। पहला गीत "मेघा झर झर बरसत रे..." को किशोरी अमोनकर ने राग मलहार की शैली में स्वरबद्ध किया है। गीत के बीच बीच में आलाप बेहद सुन्दर बन पड़े हैं। यूं तो इस फ़िल्म में कई आलाप उन्होंने गाए हैं जिनका प्रयोग पाश्वसंगीत के रूप में किया गया है, लेकिन इस गीत के भीतर गाए हुए आलाप बेहद सुन्दर हैं। ऐसे ही एक आलाप का प्रयोग गोविन्द निहलानी ने एक लम्बे प्रेम-संपादन वाले दृश्य के लिए कर लिया और किशोरी अमोनकर को दिए अपने वादे से मूकर गए। फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद जब किशोरी जी ने फ़िल्म देखी तो उन्हें ज़बरदस्त झटका लगा। उनकी माँ ग़ुस्से से आग-बबूला हो गईं। अमोनकर ने अन्तिम फ़ैसला ले लिया अब चाहे कुछ भी हो जाए, वो फ़िल्म जगत फिर कभी वापस नहीं आएँगी। फ़िल्म की दूसरी रचना थी रघुनन्दन पांशिकर के साथ गाया उनका युगल गीत "सावनिया संझा में अंबर झर आई, का चाल चलत काम राधा भरमाई"। यह भी वर्षा का गीत है। इस गीत को मुख्य रूप से रघुनन्दन जी ने ही गाया है जबकि किशोरी जी की आवाज़ आलापों में सुनाई देती है। रघुनन्दन मराठी मंच के प्रसिद्ध अभिनेता प्रभाकर पांशिकर के पुत्र हैं। 11 वर्ष की आयु में उन्होंने संगीत की विधिवत शिक्षा लेनी शुरु कर दी थी। पंडित वसन्तराव कुलकर्णी से शुरुआती तालीम लेने के बाद उन्होंने जयपुर-अतरौली घराने की विधिवत तालीम किशोरी अमोनकर से लेनी शुरु की। अगले 17 वर्षों तक वो किशोरी जी के शिष्य बने रहे और उन्हीं की निगरानी में संगीत की सेवा करते रहे। इस तरह से जब ’दृष्टि’ में एक शास्त्रीय युवा गायक (इरफ़ान ख़ान) के पार्श्वगायन के लिए एक पुरुष आवाज़ की ज़रूरत पड़ी तो किशोरी जी ने अपने शिष्य को गाने का मौक़ा दिया और इस तरह से गुरु-शिष्य की जोड़ी ने गीत-संगीत का ऐसा समा बाँधा कि यह गीत फ़िल्म-संगीत के ख़ज़ाने का एक अनमोल नगीना बन गया।

’दृष्टि’ फ़िल्म का समापन फ़िल्म के नायक निखिल (शेखर कपूर) और नायिका संध्या (डिम्पल कापड़िया) के समुन्दर के किनारे बैठे हुए एक दृश्य से होता है जिसमें निखिल संध्या से पूछ रहे हैं कि उनके रिश्ते में आख़िर दिक्कत क्या थी जो एक दूसरे से इतना दूर कर दिया। समुन्दर किनारे बैठे वो बारिश का आनन्द ले रहे हैं और पार्श्व में चार अन्तरों का एक गीत चल रहा है। गीत के बोल इशारा कर रहे हैं कि वो एक दूसरे के साथ पुनर्मिलन के लिए तैयार हैं। यह संवाद के माध्यम से बोला नहीं जाता, लेकिन समाप्ति का यह गीत इसी तरफ़ इशारा कर रहा है। इस अन्तिम गीत के बोल हैं "एक ही संग हुते जो हम और तुम काहे बिछुड़ा रे" जिसे सुनते हुए हमें "ज्योति कलश छलके" गीत की याद आ जाती है। वैसे "ज्योति कलश छलके" राग देशकर पर आधारित है। किशोरी जी की आवाज़ में चार अन्तरों का यह गीत राग भूपाली पर आधारित है। इस गीत को छोटा ख़याल (अविलम्बित ख़याल) भी कहा जा सकता है। फ़िल्म के मुख्य भाव को उजागर करता यह गीत किशोरी अमोनकर के दिलकश आलापों और संगीत के तालों से सुसज्जित होकर जैसे रसों और भावनाओं का संचार कर रहे हों। वसन्त देव के छोटे-छोटे बोल गीत की सुन्दरता पे चार चाँद लगाते हैं। इस गीत से फ़िल्म समाप्त होता है। वैसे इसी गीत का एक और संस्करण भी है जिसमें किसी साज़ का प्रयोग नहीं हुआ है। निखिल और संध्या के एक दूसरे से अलग होने वाले दृ्श्य के बाद यह संस्करण पार्श्व में बजता है। जैसा कि ’गीत गाया पत्थरों ने’ फ़िल्म के गीत के बाद किशोरी जी ने कहा कि उन्होंने अपने स्वरभाषा को शब्दभाषा के साथ मिलाया है, इस गीत में भी वही प्रयोग सुनाई देता है। गीत का करुण रस किशोरी अमोनकर के स्वरभाषा से पूर्णता को प्राप्त करता है।


किशोरी अमोनकर ने केवल दो फ़िल्मों में अपनी आवाज़ दी और एक फ़िल्म में संगीत दिया। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के लौहस्तंभ किशोरी अमोनकर का इन दो फ़िल्मों में योगदान कला की दृष्टि से अद्वितीय है, अतुलनीय है। फ़िल्म जगत हमेशा ॠणी रहेगी उनकी जिन्होंने अपनी पारस प्रतिभा से इन दोनों फ़िल्मों के संगीत को स्वर्णिम बना दिया। किशोरी अमोनकर भले एक फ़िल्मी पार्श्वगायिका नहीं थीं, लेकिन बस इन चार गीतों के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि उनका मुकाम फ़िल्मी पार्श्वगायिकाओं से बहुत उपर है।



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, September 13, 2015

राग मारवा और मारूबिहाग : SWARGOSHTHI – 235 : RAG MARAVA & MARUBIHAG



स्वरगोष्ठी – 235 में आज


रागों का समय प्रबन्धन – 4 : दिन के चौथे प्रहर के राग


राग मारवा की बन्दिश - 'गुरु बिन ज्ञान नाहीं पावे...'




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे दिन के चौथे प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के एक प्रमुख राग मारवा की बन्दिश सुविख्यात गायक उस्ताद राशिद खाँ के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही फिल्म संगीतकार रामलाल का स्वरबद्ध किया राग मारूबिहाग पर आधारित, फिल्म ‘सेहरा’ का एक गीत मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनवा रहे हैं।



भारतीय संगीत में रागों के गायन-वादन का समय निर्धारण करने के लिए शास्त्रकारों ने अनेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। पिछले अंकों में हमने अध्वदर्शक स्वर और वादी-संवादी स्वर के आधार पर रागों के समय निर्धारण की प्रक्रिया पर चर्चा की थी। आज हम आपसे दिन के चौथे प्रहर के रागों पर चर्चा कर रहे हैं। इस प्रहर के अन्त में ही सायंकालीन सन्धिप्रकाश रागों का समय आता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार मध्यम स्वर के प्रकार से सन्धिप्रकाश रागों का निर्धारण भी किया जा सकता है। सन्धिप्रकाश काल उस समय को कहा जाता है, जब अन्धकार और प्रकाश का मिलन होता है। यह स्थिति चौबीस घण्टे की अवधि में दो बार उत्पन्न होती है। प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश और सायंकालीन सन्धिप्रकाश जिसे गोधूलि बेला भी कहते हैं। प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश रागों में शुद्ध मध्यम स्वर की तथा सायंकालीन सन्धिप्रकाश रागों में रागों में तीव्र मध्यम की प्रधानता होती है। भैरव, कलिंगड़ा, जोगिया आदि प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश रागों में शुद्ध मध्यम और मारवा, श्री, पूरिया आदि सायंकालीन सन्धिप्रकाश रागों में तीव्र मध्यम स्वर का प्रयोग होता है।

दिन के चौथे प्रहर में गाने-बजाने वाले रागों में तीव्र मध्यम स्वर की प्रधानता होती है। इस प्रहर के दो ऐसे ही राग का उदाहरण आज के अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं। इस प्रहर का एक प्रमुख राग ‘मारवा’ है। यह मारवा थाट का आश्रय राग है। इसकी जाति षाडव-षाडव होती है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में 6-6 स्वरों का प्रयोग होता है। राग मारवा में पंचम स्वर वर्जित होता है। ऋषभ स्वर कोमल, मध्यम स्वर तीव्र और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर धैवत होता है। अन्य रागों की तुलना में राग मारवा शुष्क और चंचल प्रकृति का राग है। इस राग में विलम्बित खयाल और मसीतखानी गते कम प्रचलित हैं। इस राग का प्रयोग करते समय तानपूरे का प्रथम तार मन्द्र निषाद में मिलाया जाता है, क्योंकि इस राग में शुद्ध मध्यम और पंचम दोनों स्वर वर्जित होते हैं। आपको हम इस राग का तीनताल में निबद्ध एक खयाल सुनवाते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, रामपुर सहसवान घराने की गायकी के संवाहक उस्ताद राशिद खाँ।


राग मारवा : “गुरु बिन ज्ञान नाहीं पावे...” : उस्ताद राशिद खाँ




राग मारवा के अलावा दिन के चौथे प्रहर के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- मुल्तानी, पटदीप, कोलहास, रत्नदीप, श्रीवन्ती, धौलश्री, मयूर बसन्त, पूर्वी, मारू बिहाग आदि। अब हम आपको एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं जो राग मारू बिहाग पर आधारित है। अभी आपने मारवा थाट का राग मारवा सुना जिसे, परमेल प्रवेशक राग भी कहा जाता है, क्योंकि इसके बाद कल्याण थाट के राग गाये जाते हैं। राग मारूबिहाग कल्याण थाट का राग है। इसे सन्धिप्रकाश राग भी कहा जाता है। यह राग औडव-सम्पूर्ण जाति का है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। राग में तीव्र मध्यम स्वर का प्रयोग मुख्यतः किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। राग मारूबिहाग में कल्याण और बिहाग रागों का मिश्रण होता है। इस राग में तीव्र मध्यम के साथ शुद्ध मध्यम का प्रयोग भी होता है। तीव्र मध्यम आरोह और अवरोह दोनों में किया जाता है, जबकि शुद्ध मध्यम केवल आरोह में षडज के साथ प्रयोग होता है। इस राग का चलन तीनों सप्तकों में समान रूप से होता है। 1963 में वी. शान्ताराम के निर्देशन में फिल्म ‘सेहरा’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म के संगीतकार वाराणसी के कुशल शहनाई-वादक रामलाल ने कई गीत रागों में बाँधे थे। राग मारूबिहाग पर आधारित यह गीत भी इस फिल्म में शामिल था। गीत में लता मंगेशकर और मुहम्मद रफी ने युगल-स्वर दिया था। आप राग मारूबिहाग की स्पष्ट छाया इस गीत में मिलती है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग मारूबिहाग : “तुम तो प्यार हो सजना...” : लता मंगेशकर और मुहम्मद रफी : फिल्म – सेहरा





संगीत पहेली - 235



‘स्वरगोष्ठी’ के 235वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको पुनः एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 240 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस गीतांश में किस राग की छाया है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायक और गायिका की आवाज़ को पहचान सकते हैं? यदि हाँ, तो उनके नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 19 सितम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 237वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 231वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘नौबहार’ के एक गीत का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – भीमपलासी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका – लता मंगेशकर

इस बार की पहेली में तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाली हमारी नियमित प्रतिभागी हैं, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और जबलपुर से क्षिति तिवारी। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ जारी है। अगले अंक में हम रात्रि के प्रथम प्रहर के कुछ रागों पर चर्चा करेंगे और आपको कुछ रागबद्ध रचनाएँ भी सुनवाएँगे। इस श्रृंखला के लिए आप अपनी पसन्द के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



 

Sunday, July 14, 2013

स्वरगोष्ठी में आज : राग भूपाली के दो रंग

  
स्वरगोष्ठी – 128 में आज

भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति – 8

राग भूपाली पर आधारित एक मनभावन गीत- ‘पंख होते तो उड़ आती रे...’


इन दिनों ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक मंच ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’। इस श्रृंखला की आठवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों की इस संगोष्ठी में उपस्थित हूँ और आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपको राग-आधारित कुछ ऐसे फिल्मी गीत सुनवा रहे हैं, जो छः दशक से भी पूर्व के हैं। रागों के आधार के कारण ये गीत आज भी सदाबहार गीत के रूप में हमारे बीच प्रतिष्ठित हैं। परन्तु इनके संगीतकार हमारी स्मृतियों में धूमिल हो गए हैं। इस श्रृंखला को प्रस्तुत करने का हमारा उद्देश्य यही है कि इन कालजयी, राग आधारित गीतों के माध्यम से हम उन भूले-बिसरे संगीतकारों को स्मरण करें। आज के अंक में हम आपको भारतीय संगीत के एक अत्यन्त मधुर राग ‘भूपाली’ पर आधारित, फिल्म ‘सेहरा’ का एक गीत सुनवाएँगे और इस गीत के विस्मृत संगीतकार रामलाल का स्मरण करेंगे। इसके साथ ही हम सुविख्यात सितार वादक उस्ताद शाहिद परवेज़ द्वारा प्रस्तुत राग ‘भूपाली’ की एक रचना का आनन्द भी लेंगे।


लता मंगेशकर
वाराणसी के शहनाई और बाँसुरी वादकों के परिवार में जन्मे रामलाल चौधरी संगीतकार बनने की लालसा लेकर 1944 में बम्बई (अब मुम्बई) आए और विख्यात अभिनेता पृथ्वीराज कपूर द्वारा संचालित ‘पृथ्वी थियेटर’ के तत्कालीन संगीतकार राम गांगुली के सहायक बन गए। राज कपूर की पहली फिल्म ‘आग’ के संगीतकार राम गांगुली ही थे। इस फिल्म के गीतों में रामलाल ने बाँसुरी का रंग भर कर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। फिल्म के एक बेहद लोकप्रिय गीत- ‘ज़िन्दा हूँ इस तरह कि गम-ए-ज़िन्दगी नहीं...’ की संवेदनशीलता को बढ़ाने में बाँसुरी संगति की भूमिका अविस्मरणीय थी। पृथ्वी थियेटर और राम गांगुली के साथ किये गए काम से प्रभावित होकर वी. शान्ताराम ने अपनी फिल्म कम्पनी में नियुक्त कर लिया। ‘प्रभात’ की लगभग सभी फिल्मों में रामलाल की बाँसुरी और शहनाई के स्वर गूँजे। 1950 तक उन्होने उस समय के लगभग सभी बड़े संगीतकारों, आर.सी. बोराल, बसन्त देसाई, नौशाद, सी. रामचन्द्र, गुलाम मोहम्मद आदि के साथ काम किया। 1950 में राज कपूर और वैजयन्तीमाला अभिनीत फिल्म ‘तांगेवाला’ में उन्हें संगीतकार बनने का सुअवसर मिला, परन्तु यह फिल्म पूरी ही न हो सकी। 1956 में एक बार फिर संगीतकार बनने का सुअवसर मिला, फिल्म ‘नकाबपोश’ के माध्यम से। यह फिल्म प्रदर्शित हुई और इसके गीत सराहे भी गए। इसी वर्ष प्रदर्शित फिल्म ‘हुस्नबानों’ में भी रामलाल का संगीत था। रामलाल के संगीत से सजी उस दौर की कुछ अन्य फिल्में हैं- नागलोक (1957), माया मछेन्द्र (1960), और राजमहल (1961)। इसी बीच एक शहनाई वादक के जीवनवृत्त पर निर्मित और 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ में उन्होने विख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ के साथ शहनाई बजाई थी। फिल्म अत्यन्त सफल हुई, किन्तु रामलाल को समुचित श्रेय न मिल सका। वी. शान्ताराम उनकी प्रतिभा से परिचित थे ही, उन्होने रामलाल को अपनी फिल्म ‘सेहरा’ का संगीत निर्देशन सौंप दिया। 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘सेहरा’ का संगीत कालजयी सिद्ध हुआ। इस फिल्म के गीतों में रागों का स्पर्श इतना लुभावना था कि सभी गीत हिट हुए, किन्तु फिल्म के एक गीत- ‘पंख होते तो उड़ आती रे...’ में राग भूपाली के सुरों का स्पर्श देकर उन्होने इसे सदाबहार बना दिया। इस गीत की जितनी मधुर धुन है, लता मंगेशकर ने उतने ही कौशल से इसे गाया भी है। आज हमारी चर्चा में यही गीत है। इस गीत की विशेषताओं पर हमारी यह चर्चा जारी रहेगी, उससे पहले आप इस गीत का आनन्द लीजिए।


राग भूपाली : फिल्म सेहरा : ‘पंख होते तो उड़ आती रे...’ : संगीतकार रामलाल



उस्ताद शाहिद परवेज़
फिल्म ‘सेहरा’ के गीतों की उत्कृष्ठता से प्रभावित होकर वी. शान्ताराम ने अपनी अगली फिल्म ‘गीत गाया पत्थरों ने’ के संगीत का दायित्व भी रामलाल को सौंपा। संगीत की दृष्टि से यह फिल्म भी हिट हुई। इस फिल्म के शीर्षक गीत को सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर ने स्वर दिया था। इसी के साथ फिल्म में पण्डित शिवकुमार शर्मा ने भी अपने सन्तूर का योगदान किया था। बस, इन्हीं कुछ गिनी-चुनी फिल्मों में ही इस प्रतिभावान संगीतकार का संगीत हम सुन पाए। आज हम आपसे फिल्म ‘सेहरा’ के जिस गीत की चर्चा कर रहे हैं, वह राग भूपाली के आधार वाला एक उत्कृष्ट गीत है। आइए, अब थोड़ी चर्चा राग भूपाली के बारे में करते हैं। कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला यह राग औड़व-औड़व जाति का होता है। अर्थात, इसके आरोह-अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह और अवरोह में मध्यम और निषाद स्वर वर्जित होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। इस राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। इसका गायन-वादन रात्रि के प्रथम प्रहर में उपयुक्त माना जाता है। कुछ विद्वान इसे भूप कल्याण के नाम से भी पुकारते हैं। इसे गाते-बजाते समय राग देशकार से बचाना पड़ता है। आइए अब हम आपको राग भूपाली में निबद्ध सितार पर एक मोहक रचना सुनवाते हैं। उस्ताद शाहिद परवेज़ खाँ देश के जाने-माने सितार वादक हैं। प्रस्तुत रचना में उन्होने मध्य और द्रुत लय की तीनताल में अनूठा वादन किया है। आप इस सितार वादन का आनन्द लीजिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भूपाली : सितार पर मध्य व द्रुत तीनताल की गत और झाला : उस्ताद शाहिद परवेज 




आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 128वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक खयाल रचना के आलाप का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 130वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – आलाप के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह खयाल किस राग में निबद्ध है?

2 – इस आलाप के गायक कलाकारों की आवाज़ पहचान कर उनके नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 130वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से या swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 126वें अंक की पहेली में हमने आपको विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वरों में एक बन्दिश का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बागेश्री अथवा बागेश्वरी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- द्रुत तीनताल। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ के आगामी अंक में हम एक और लोकप्रिय राग पर आधारित एक सदाबहार फिल्मी गीत, इसके विस्मृत संगीतकार और इसी राग में निबद्ध एक मोहक खयाल रचना पर चर्चा करेंगे। अगले अंक में इस श्रृंखला की अगली कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की प्रतीक्षा करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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