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Saturday, May 6, 2017

चित्रकथा - 17: नक़्श ल्यालपुरी के लिखे 60 मुजरे (भाग-2)


अंक - 17

नक़्श ल्यालपुरी के लिखे 60 मुजरे - भाग 2

"क़दर तूने ना जानी, बीती जाए जवानी..." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 



एक बार ’विविध भारती’ के एक साक्षात्कार में गीतकार नक़्श ल्यालपुरी साहब ने फ़रमाया था कि उन्होंने क़रीब 60 मुजरे लिखे हैं जो कि अलग-अलग रंग, अलग-अलग मिज़ाज के हैं। उन्होंने श्रोताओं से इन्हें सुनने का भी सुझाव दिया था। यह बात मेरे अवचेतन मन में बरसों से चली आ रही थी। हाल ही में नक़्श साहब की मृत्यु के बाद यह बात फिर से मुझे याद आ गई और मैंने यह निर्णय लिया कि उनके सुझाये इन 60 मुजरों को खोज निकालना ज़रूरी है। जुट गया शोध पर। और इसी शोध का नतीजा है आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक। पिछले सप्ताह इस लेख का पहला भाग आपने पढ़ा था; आज प्रस्तुत है इस लेख का दूसरा व अन्तिम भाग।




1977 में एक फ़िल्म आई थी ’महाबदमाश’। इस फ़िल्म में विनोद खन्ना और नीतू सिंह मुख्य भूमिकाओं में थे। रवीन्द्र जैन के संगीत में इस फ़िल्म में नक़्श ल्यालपुरी ने गीत लिखे। सिचुएशन के मुताबिक एक पार्टी में नीतू सिंह विनोद खन्ना को शराब का सहारा लेकर अपनी तरफ़ आकर्षित करने का प्रयास कर रही है। पारम्परिक मुजरा शैली का गीत ना होते हुए भी सिचुएशन और भाव गीत के बोलों को मुजरा जैसा बना दिया है। मुखड़ा है - "अभी ज़रा सी देर में ये रात गुनगुनाएगी, ये धड़कनों की लय कोई हसीं धुन सुनाएगी, न तुझको नींद आएगी, न मुझको नींद आएगी, मेरे क़रीब आके पी, ये फ़ासला मिटा के पी"। एक अन्तरे में नक़्श साहब लिखते हैं "जो तू कहे तो झूमके महकती ज़ुल्फ़ खोल दूँ, सनम तेरी शराब में लबों का रंग घोल दूँ, तेरी नज़र नज़र पे मैं ये दिल का फूल तोड़ दूँ, मेरे क़रीब आके पी..."। अब तक जितने भी मुजरों की हमने बातें की, हर एक मुजरा दूसरे मुजरे से अलग है। यहाँ तक कि शब्दों का दोहराव भी दिखाई नहीं दिया किसी में। इसी साल एक फ़िल्म आई थी ’वोही बात’, इसमें एक ग़ज़ल नक़्श साहब ने लिखी है, लेकिन शायद इसे एक मुजरे की तरह फ़िल्माया नहीं गया है, हालाँकि इसमें दर्द एक मुजरे वाली का ज़रूर छुपा हुआ है। ग़ज़ल के तीन शेर अर्ज़ है - "ज़हर देता है मुझे कोई दवा देता है, जो भी मिलता है मेरे ग़म को बढ़ा देता है।" "क्यों सुलगती है मेरे दिल में पुरानी यादें,कौन बूझती हुई शोलों को हवा देता है।" "हाल हँस-हँस के बुलाता है कभी बाहों में, कभी माज़ी मुझे रो रो सदा देता है।"

’नूरी’ 1979 की एक उल्लेखनीय फ़िल्म रही। फ़िल्म का शीर्षक गीत और "चोरी चोरी कोई आए" गीत ख़ूब चले। इसी फ़िल्म में नक़्श साहब ने बस एक मुजरा लिखा था "क़दर तूने ना जानी, बीती जाए जवानी"। ख़य्याम साहब के संगीत में सारंगी, घुंघरू और तबले की झंकारों से सुसज्जित आशा भोसली का गाया यह मुजरा सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मी मुजरों में से एक है। पारम्परिक मुजरा शैली में निबद्ध इस मुजरे में नक़्श साहब को उम्दा काम करने का मौक़ा मिला। इस ख़ुशमिज़ाज मुजरे के तीन अन्तरे हैं, सभी में मुखड़े की पुष्टि की गई है। मुजरे वाली नायक को अपनी ओर आकृष्ट कर रही है पर नायक है कि उसे कोई क़द्र ही नहीं। "प्यासे हैं ज़ुल्फ़ों के साये, कब तक दिल में आग छुपायें, जागे रात सुहानी, क़दर तूने ना जानी..."। नायक को पत्थर-दिल कह कर संबोधित करती हुई आगे गाती है, "तोहे मन का मीत बनाया, पत्थर से शीशा टकराया, मैंने की नादानी, क़दर तूने ना जानी..."। और तीसरे अन्तरे में फिर वही घुंघरू टूटने की बात जो नक़्श साहब ने 1972 की ’बाज़ीगर’ फ़िल्म के मुजरे में की थी। "यूं नाची के घुंघरू तोड़े, मेहन्दी वाले हाथ भी जोड़े, तूने एक ना मानी, क़दर तूने ना जानी..."। 1980 में ’पूजा और पायल’ में संगीतकार कमलकान्त के संगीत में नक़्श ल्यालपुरी ने कुछ गीत लिखे थे जिनमें एक मुजरा था आशा भोसले का गाया हुआ। इस मुजरे का स्ट्रक्चर नक़्श साहब ने बिल्कुल अलग रखा है। मुजरा शुरु होता है शुरुआती बोलों से - "रंग हूँ नूर हूँ निखार हूँ मैं, यानी कुदरत का शाहकार हूँ मैं, मेरी चाहत में लुट गई दुनिया, तेरी चाहत में बेक़रार हूँ मैं"। और फिर बदलते रीदम के साथ मुखड़ा शुरु होता है "चमेली बन जाऊँगी गुलाब बन जाऊँगी, बोतला छुपा ले वे शराब बन जाऊँगी"। इसके बाद दो अन्तरे हैं इस मुजरे के। पहला अन्तरा है - "दे दे प्यार निशानी मेरे दिलबरजानी, तेरे पहलू में जागे मेरी चंचल जवानी, ये दिल तेरा ये जाँ तेरी, एक बार सुनूँ जो हाँ तेरी, मैं शोख़ी बन जाऊँगी हिजाब बन जाऊँगी"। और दूसरे अन्तरे में नक़्श साहब लिखते हैं - "मेरा रूप सजा दे मेरे सपने जगा दे, मुझे बाहों में लेके मेरा तन महका दे, ये तन्हाई ये रात कहाँ, फिर होठों पर ये बात कहाँ, ख़याल बन जाऊँगी, मैं ख़्वाब बन जाऊँगी..."। इन बोलों पर ग़ौर करने पर पता चलता है कि नक़्श साहब ने हर मुजरे में कुछ नया लिखने की इमानदार कोशिश की है और इसमें कोई संदेह नहीं है कि हर मुजरा पिछले मुजरों से अलग सुनाई देती है।

1981 की एक ख़ूबसूरत फ़िल्म थी ’दर्द’। ख़ैय्याम और नक़्श ल्यालपुरी के गीत-संगीत की एक माइलस्टोन फ़िल्म थी यह। "न जाने क्या हुआ जो तूने छू लिया", "प्यार का दर्द है मीठा मीठा" और "अह्ल-ए-दिल यूं भी निभा लेते हैं" और "ऐसी हसीन चाँदनी पहले देखी नहीं" जैसे गीतों ने रसिकों के दिल को छू लिया। लेकिन इस फ़िल्म में एक मुजरा गीत भी था जिसकी तरफ़ लोगों का ध्यान नहीं गया। आशा भोसले की आवाज़ में इस मुजरे का संगीत संय़ोजन हमें ’उमरावजान’ के मुजरों की याद दिला जाती है। ख़ास तौर से इसके शुरुआती संगीत और अन्तराल संगीत में "दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए" की झलक साफ़ मिलती है। नक़्श साहब ने भी इसे एक ग़ज़ल की शक्ल में पेश किया है। मुखड़े का शेर है "क़ुबूल कीजिए पहले सलाम आँखों का, फिर आप चाहें तो हाज़िर है जाम आँखों का"। ग़ज़ल के बाकी के शेर हैं - "दिलों में शम्मा सी रोशन हुई मोहब्बत की, हुआ है आँखों से जब भी कलाम आँखों का"; "निगाहे नाज़ से बहला के लूट लेती है, ख़बर है आपको ये भी है आँखों का"; "मैं बेक़रार हूँ ले लीजिए मुझको बाहों में, खुली किताब है जाना पयाम आँखों का"। ऐसा प्रतीत होता है कि इस फ़िल्म के निर्माता ने ख़य्याम साहब और नक़्श साहब के सामने शर्त रख दी होगी कि उन्हें ’उमरावजान’ जैसी कोई मुजरा ग़ज़ल चाहिए। तभी इस एक ग़ज़ल में दोनों ने मिल कर "दिल चीज़ क्या है..." के संगीत और "इन आँखों की मस्ती के..." के बोलों को एकाकार कर दिया है। कुल मिला कर एक अच्छी ग़ज़ल है।

शंकर-जयकिशन के स्वरबद्ध गीतों में मुजरा शैली के गीत ज़्यादा सुनने को नहीं मिलते। जयकिशन की मृत्यु के बाद शंकर अकेले ही संगीत देते चले जा रहे थे ’शंकर-जयकिशन’ के ही नाम से। 1982 में उन्होंने ’ईंट का जवाब पत्थर’ फ़िल्म में संगीत दिया जिसके गीत नक़्श ल्यालपुरी ने लिखे। इस फ़िल्म में दो मुजरे थे आशा भोसले की आवाज़ में। पहला मुजरा था "सौ बार कहा दिल ने एक बार इधर देखो, तुम हमको मुहब्बत से बस एक नज़र देखो"। कोठे पर जो लड़कियाँ मुजरा करती हैं, वो भले अपने चेहरे पर ख़ुशी का मुखौटा पहनी रहती हों, पर हक़ीक़त कुछ और ही है। उनके दिल में भी किसी का सच्चा प्यार पाने की प्यास होती है। हर रोज़ उसे न जाने कितने ही नज़रें देखा करती हैं, पर सच्चा प्यार कोई नहीं करता। नक़्श साहब ने एक मुजरे वाली के इसी दर्द, इसी दिली ख़्वाहिश को इस मुजरे में बयाँ की है। "ज़ुल्फ़ों में बसी ख़ुशबू आँखों में हया आई, आईना जहाँ देखा कहने लगी अंगड़ाई, महबूब से मिलना है कुछ और सँवर देखो, सौ बार कहा दिल ने..."। नक़्श साहब के लिखे गीतों का असर महफ़िल को लहराने पर मजबूर करती है, ठीक वैसे ही जैसा कि उन्होंने ने ही इस मुजरे में लिखा है - "जादू सा जगाया है घुंघरू की सदाओं ने, मधोश किया है सब आँचल की हवाओं ने, लहराने लगी महफ़िल नग़मों का असर देखो, सौ बार कहा दिल ने..."। एक सच्चे प्रेमी पर वो अपना सब कुछ निसार कर सकती है, इस भावना को तीसरे अन्तरे में उजागर किया गया है - "इस दिल में तमन्ना है जाँ तुमपे लुटाने की, कीमत है बहुत अपनी नज़रों में ज़माने की, बेमोल ही बिक जायें तुम हँसके अगर देखो, सौ बार कहा दिल ने..."। इस फ़िल्म का दूसरा मुजरा है "हम दर्द-ए-मोहब्बत की दिल को न सज़ा देते, तुम इतनी सितमगर हो पहले ही बता देते"। प्यार में धोखा खाने के बाद टूटा हुआ दिल लेकर नायिका कोठे पर मुजरा करती है और अपने दिल का हाल बयाँ करती है। नक़्श साहब ने इसे ग़ज़ल के रूप में पेश किया है। शंकर-जयकिशन के आकर्षक संगीत में पिरोयी हुई यह ग़ज़ल दिल को छू जाती है। बाक़ी के शेर हैं - "जब जश्न की महफ़िल को रंगीन बनाना था, फूलों की जगह अपनी ज़ख़्मों को सजा देते"; "अच्छा ही किया तुमने ख़ुद तोड़ दिया रिश्ता, तुम हमको सिवा ग़म के देते भी तो क्या देते"; "शामिल न मगर होते हम तेरी गुनाहों में, परदा तेरे चेहरे से महफ़िल में उठा देते"।

1986 की फ़िल्म ’काला सूरज’ में बप्पी लाहिड़ी का संगीत था। अधिकांश गीत शैली शैलेन्द्र ने लिखे, एक गीत कुलवन्त जानी और एक गीत नक्श ल्यालपुरी ने लिखे। नक़्श साहब का लिखा गीत एक क़व्वाली है जिसे नरेन्द्र चंचल और साथियों ने गाया है। एक पुरुष क़व्वाली होते हुए भी इसका मुजरे से संबंध है क्योंकि क़व्वाली के सामने मध्यएशियाई शैली में दो नर्तकी नृत्य करती हुईं दिखाई दे रही हैं जो वहाँ मौजूद दर्शकों व श्रोताओं का मन मोह रही है, ठीक वैसे जैसे एक मुजरेवाली करती है। और क़व्वाली का भाव भी मुजरे वाले अंदाज़ का ही है। शुरुआती पंक्तियाँ हैं "मेरी इल्तेजा है साक़ी तू पिला नज़र मिला के, मेरी प्यास बढ़ गई है तेरी अंजुमन में आके, आँखों की सारी मस्तियाँ मय में मेरी निचोड़ दे", और फिर क़व्वाली का मुखड़ा है "दो घूंट पिला दे साक़िया, बाकी मेरे ते रोड़ दे"। पूरी क़व्वाली में शराब और शबाब की बातें जारी रहती है। 1987 की फ़िल्म ’जागो हुआ सवेरा’ में संगीतकार सोनिक-ओमी के निर्देशन में अनुराधा पौडवाल का गाया एक मुजरा था "देख पतली कमरिया मचल गयो सैंया, मैंने डाली नजरिया फ़िसल गयो सैंया"। 80 के ही दशक में नक़्श ल्यालपुरी ने संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के साथ एक फ़िल्म में काम किया था जिसका शीर्षक था ’माँग सजा दो मेरी’। फ़िल्म रिलीज़ भी हुई थी पर हैरत उर अफ़सोस की बात यह कि आज इस फ़िल्म के डिटेल्स न किसी डेटाबेस में मिलता है और ना ही इसके गानें यू-ट्युब पर उपलब्ध हैं। खोज बीन करने पर फ़िल्म के गीतों के मुखड़े तो पता चले पर कलाकारों के नामों का कुछ पता न चल सका। इसी फ़िल्म में नक़्श साहब ने एक मुजरा लिखा था जिसके बारे में उन्हीं की ज़बानी पढ़िए - "’माँग सजा दो मेरी’ में एक लाइन थी "सर-ए-अंजुमन मेरा हाथ थाम लेना, ज़रा सोच क्या कहेगा ज़माना", लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने कहा कि यह जो ’सर-ए-अंजुमन’ लफ़्ज़ है, यह बहुत भारी है और मुझे इसे किसी और लफ़्ज़ से रिप्लेस कर देना चाहिए। इसलिए मैंने दो तीन और शेर लिखे और रेकॉर्डिंग् के स्टुडियो में पहुचा। मैंने अपने लिखे नए शेर उनको सुनाए। तब उन लोगों ने कहा कि गाते गाते इस तरह रवाँ हो गया है कि वो ख़ुद ही इसे रिप्लेस करना नहीं चाहते।"

90 के दशक में नक़्श साहब का लिखा कोई फ़िल्मी मुजरा नहीं आया। पर 1998 में ’Asha & Khayyam' ऐल्बम के लिए उन्होंने एक ख़ूबसूरत मुजरा लिखा। ग़ज़ल का मुखड़ा "लोग मुझे पागल कहते हैं गलियों में बाज़ारों में, मैंने प्यार किया मुझको चुनवा दो दीवारों में"। इस मुजरे में नायिका जैसे निडर हो कर अपने प्यार का इज़हार कर रही है और आगे अपने मशहूर होने की बात करती है, "हर पनघट पर मेरे फ़साने चौबारों में ज़िक्रा मेरा, मेरी ही बातें होती हैं बस्ती में चौबारों में"। दुनिया से कहती है कि न जाने कितने शोलों पर चल कर अपने प्यार की वफ़ा को क़ायम रखा, इसका कुछ तो दाद मिले - "दुनिया वालों कुछ तो मुझको मेरी वफ़ा की दाद मिले, मैंने दिल के फूल खिलाए शोलों में अंगारों में"। आगे नक़्श साहब लिखते हैं - "गीत है या आहों का धुआँ है नग़मा है या दिल की तड़प, इतना दर्द कहाँ से आया साज़ों की झनकारों में"। 2002 में ’शहीद भगत सिंह’ फ़िल्म के लिए जयदेव कुमार के संगीत निर्देशन में उन्होंने फिर एक बार एक मुजरा लिखा। कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ में यह मुजरा है "छुप-छुप के ज़माने से महफ़िल में मेरी आना, ये कैसी मोहब्बत है तू कैसा है दीवाना"। सारंगी, सितारे और तबले से एक सुन्दर समा बांधा है जयदेव कुमार ने। साथ ही नक़्श साहब का ग़ज़लनुमा अंदाज़-ए-बयाँ के क्या कहने। इस ग़ज़ल के तमाम शेर इस प्रकार हैं - "कुछ अपनी सुना मुझको कुछ सुन ले मेरे दिल की, तू इतना क़रीब आके क्यों मुझसे है बेगाना"; "सौ बार क़सम खायी सौ बार क़सम तोड़ी, फिर मुझसे कोई वादा करके ना मू कर जाना"; "दुश्मन है मोहब्बत के अपने भी पराये भी, हर बात इशारों में मुमकिन नहीं समझाना"।

साल 2005 में नौशाद के संगीत और नक़्श ल्यालपुरी और सैयद गुलरेज़ के गीतों से सजी फ़िल्म आई थी ’ताज महल’। इस फ़िल्म के लिए भी नक़्श साहब ने एक मुजरा लिखा "इश्क़ की दास्ताँ सारी महफ़िल सुने, इश्क़ दिल में छुपाना ज़रूरी नहीं"। इश्क़ का गुणगान किया गया है इस मुजरे में। कविता कृष्णमूर्ति और प्रीति उत्तम की गाई यह युगल-गीत बेहद ख़ूबसूरत बन पड़ा है। मुजरा, ग़ज़ल और क़व्वाली, तीनों रंग इस रचना में महसूस किए जा सकते हैं। नौशाद और नक़्श साहब ने बेहद ख़ूबसूरत तरीक़े से पूरे गीत को सजाया-सँवारा है। मुखड़े के शेर से पहले शुरुआती शेर है "दिल के अरमानों की शम्मा जलाए बैठे हैं, उनकी तसवीर को दिल में छुपाए बैठे हैं"। पुरानी मशहूर क़व्वाली "ये इश्क़ इश्क़ है" की तरह इसमें भी इश्क़ की ही बातें हैं। "इश्क़ अहसास है, दिल की आवाज़ है, सुन ले सारा ज़माना ज़रूरी नहीं। इश्क़ दिल में रहेगा तो घुट जाएगा, इश्क़ को यूं मिटाना ज़रूरी नहीं। इश्क़ मिटता नहीं है महकता है ये, इश्क़ शोला है दिल में दहकता है ये, सबका दामन जलाना ज़रूरी नहीं। इश्क़ ऐलान है इश्क़ तूफ़ान है, तौबा तौबा ना समझे वो नादान है, आग दिल में दबाना ज़रूरी नहीं। इश्क़ दिल के धड़कने की पहचान है, इश्क़ बेबाक हो जाए बदनाम है, हाल-ए-दिल यूं सुनाना ज़रूरी नहीं।" आख़िर में क़व्वाली के अन्त में जिस तरह से दो पक्षों में लड़ाई होती है, उसी अंदाज़ में जंग होती है - "इश्क़ कोई राज़ नहीं, इश्क़ आवाज़ नहीं, इश्क़ ख़ामोश ना हो, इश्क़ बदनाम ना हो, इश्क़ गुमनाम ना हो, इश्क़ बदनाम ना हो, इश्क़ दुनिया को दिखा ले, उनकी आँखों में छुपा ले, उनके दिल में भी वजह है, खुल के जीने में मज़ा है, अदा है नशा है..."। नक़्श ल्यालपुरी के लिखे इन तमाम मुजरों पे ग़ौर करने के बाद वाक़ई यह अहसास होता है कि जो बात उन्होंने ’विविध भारती’ के उस साक्षात्कार में कही थी, उसमें कितनी सच्चाई थी। आज नक़्श साहब हमारे बीच नहीं हैं, पर उनके लिखे ये अलग-अलग रंगों के मुजरे नई पीढ़ी के गीतकारों को प्रोत्साहित करते रहेंगे हमेशा कुछ नया करने के लिए। एक ही विषय पर न जाने कितने अलग तरह के गीत लिखे जा सकते हैं यह नक़्श साहब ने हमें सिखाया है।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, April 22, 2017

चित्रकथा - 15: नक़्श लायलपुरी के लिखे 60 मुजरे (भाग - 1)


अंक - 15

नक़्श लायलपुरी के लिखे 60 मुजरे - भाग 1

"भरोसा कर लिया जिस पर, उसी ने हमको लूटा है..." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 



एक बार ’विविध भारती’ के एक साक्षात्कार में गीतकार नक़्श लायलपुरी साहब ने फ़रमाया था कि उन्होंने क़रीब 60 मुजरे लिखे हैं जो कि अलग-अलग रंग, अलग-अलग मिज़ाज के हैं। उन्होंने श्रोताओं से इन्हें सुनने का भी सुझाव दिया था। यह बात मेरे अवचेतन मन में बरसों से चली आ रही थी। हाल ही में नक़्श साहब की मृत्यु के बाद यह बात फिर से मुझे याद आ गई और मैंने यह निर्णय लिया कि उनके सुझाये इन 60 मुजरों को खोज निकालना ज़रूरी है। जुट गया शोध पर। और इसी शोध का नतीजा है आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक। मेरी तरफ़ से यह नक़्श साहब को श्रद्धांजलि है। मैं इसमें कितना कामयाब हुआ हूँ, इसका फ़ैसला आप लेंगे। आज प्रस्तुत है इस लेख का पहला भाग।




ह आज से दस साल पहले, वर्ष 2006, की बात होगी जब ’विविध भारती’ के ’उजाले उनकी यादों के’ में नक़्श लायलपुरी साहब तशरीफ़ लाए थे। बातों बातों में उन्होंने कमल शर्मा जी से कहा था - "मैंने क़रीब 60 मुजरे लिखे हैं। अगर कभी हो सके तो पेशेन्स के साथ उन्हें सुनिएगा। आपको 60 अलग फ़्लेवर और 60 अलग रंग मिलेंगे उनमें।" उस दिन मेरे मन में यह ख़याल आया था कि काश नक़्श साहब के इस सुझाव पर अमल किया जा सकता! दिन निकलते चले गए, पर यह बात मेरे अवचेतन मन में दर्ज हो चुकी थी। कई बार सोचा कि मैं ख़ुद ही इस पर शोध करूँ और ढूंढ़ निकालूँ नक़्श साहब के लिखे सभी मुजरों को। पर किसी न किसी वजह से संभव नहीं हो सका। वक़्त किसी के लिए नहीं रुकता। नक़्श साहब हाल ही में दुनिया-ए-फ़ानी को छोड़ चले गए अपने अख़िरी सफ़र पर। उनके जाने के बाद वह पुराना ख़याल फिर एक बार मेरे दिल में मचल उठा है। आइए ज़रा नज़दीक से नज़र डालें नक़्श लायलपुरी साहब के लिखे तमाम मुजरा शैली के गीतों पर।

नक़्श लायलपुरी ने फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखा था 1952 में फ़िल्म ’जग्गु’ में केवल एक गीत लिख कर। ग़ौर तलब बात यह है कि यह एक गीत मुजरा शैली का ही गीत था। हंसराज बहल के संगीत में आशा भोसले का गाया यह गीत है "अगर तेरी आँखों से आँखें मिला दूँ, मैं क़िस्मत जगा दूँ, मुक़द्दर बना दूँ"। गीत के संगीत में पारम्परिक मुजरा संगीत की झलक ना होकर मध्यएशियाई संगीत की झलक मिलती है। "निगाहें बदल दूँ, निशाना बदल दूँ, जो चाहूँ तो सारा ज़माना बदल दूँ, मोहब्बत की राह पर चलना सिखा दूँ, मैं क़िस्मत जगा दूँ..." और "है जिनकी जवानी उन्हीं का ज़माना, जो चाहे अगर मेरी दुनिया में आना, ज़मीं तो ज़मीं आसमाँ पे बिठा दूँ, मैं क़िस्मत जगा दूँ..." जैसे बोल इसे मुजरा शैली का गीत बनाता है शब्द और भाव की दृष्टि से। नक़्श साहब की दूसरी फ़िल्म ’घमंड’ जो 1955 में आई थी, उसमें भी एक मुजरा गीत था। राजकुमारी की आवाज़ में गुल्शन सूफ़ी की यह रचना एक मुजरा गीत था जिसके बोल थे "जब से उलझे नैन मुझे दिन रैन नहीं है चैन, सजनवा नैनों की गली में आजा, ओ मोरे राजा"। पिछले गीत में जहाँ नायिका नायक को अपनी ओर आकर्षित करती हुई ख़ुद की बढ़ाई कर रही है, वहीं दूसरी तरफ़ ’घमंड’ फ़िल्म के इस मुजरे में नायिका अपने नायक को उसके पास आने की ग़ुज़ारिश कर रही है। इस तरह से ये दोनों गीत बिल्कुल अलग रंग के होते हुए भी एक ही अंजाम की तरफ़ बढ़ रहे हैं।

1958 में एक फ़िल्म आई थी ’अजी बस शुक्रिया’ जिसमें रोशन का संगीत था और गीत लिखे फ़ारुख़ क़ैसर ने। लेकिन नक़्श साहब के दो मुखड़े इस फ़िल्म के लिए लिए गए जिनमें से एक मुजरा था। क़िस्सा आख़िर क्या था, जानिए नक़्श साहब की ज़ुबानी - "मैं रोशन साहब के साथ सिर्फ़ एक ही फ़िल्म कर सका। एक और फ़िल्म थी जिसमें मेरे लिखे दो मुखड़े इस्तमाल किए गए। दरसल क्या हुआ कि मेरे दो मुखड़े रोशन साहब के पास पड़े हुए थे। वो उन्हें ’अजी बस शुक्रिया’ में इस्तमाल करना चाहते थे। लेकिन फ़िल्म के डिरेक्टर मोहम्मद हुसैन चाहते थे कि फ़ारुख़ क़ैसर फ़िल्म के गीत लिखे। रोशन और फ़ारुख़ क़ैसर कई बार सिटिंग् की पर फ़ारुख़ साहब जो कुछ लिख रहे थे वो सब रोशन साहब को पसन्द नहीं आ रही थी। एक दिन रोशन साहब मेरे पास आए और कहने लगे कि वो वह फ़िल्म छोड़ रहे हैं क्योंकि वो गीतों के बोलों से ख़ुश नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें मेरे लिखे दो मुखड़े पसन्द है और वो उनका इस्तमाल करना चाहते हैं। मैंने ख़ुशी ख़ुशी वो मुखड़े उन्हें दे दिए और फ़ारुख़ क़ैसर ने उनके अन्तरे लिखे। कुछ दिनों बाद मुझे दो वाउचर मिले 250 रुपये प्रति मुखड़ा। इन दो गीतों में एक मुजरा था "बेदर्दी नज़रें मिला के कहदे क्या है तेरी मर्ज़ी" और दूसरा गीत था "सारी सारी रात तेरी याद सताये"। मीनू मुमताज़ पर फ़िल्माया गया यह मुजरा काफ़ी हिट हुआ था पर इस मुजरे के गीतकार के रूप में फ़ारुख़ क़ैसर का नाम ही जुड़ा हुआ है जबकि पंच लाइन नक़्श साहब का दिया हुआ है।


इसके अगले ही साल 1959 में स्टण्ट फ़िल्म आई ’सर्कस क्वीन’। मोहम्मद शफ़ी के संगीत में नक़्श साहब का लिखा मुजरा गाया मुबारक बेगम ने। ’जग्गु’ फ़िल्म के गीत की तरह इसे भी एक आधुनिक मुजरा कह सकते हैं जो एक पार्टी में पेश की जा रही है। "ओहो दिल वाले, निगाहें मिला ले, दिल के दामन को रंगी बना ले"। इसकी धुन में भी मध्यएशियाई रंग शामिल है। इस गीत के तीन अन्तरे हैं - "नैन तीखे हैं क़ातिल निगाहें, मेरी फूलों सी नाज़ुक हैं बाहें, चाल बहकी हुई, ज़ुल्फ़ें महकी हुई, मेरे मुखड़े पे झूमे उजाले...", "आ हसीनों की महफ़िल में आके, देख ले दो घड़ी मुस्कुरा के, साज़ दिल का उठा गीत ख़ुशियों के गा, झूम कर ज़िन्दगी का मज़ा ले...", "ज़िन्दगी है सफ़र जीने वाले, हँसते-हँसते गुज़र जीने वाले, होके मस्ती में जी, है यही ज़िन्दगी, कर ना दिल को ग़मों के हवाले..." - पहले दो अन्तरों में नायिका नायक को अपनी तरफ़ आकर्षित कर रही हैं तो तीसरे अन्तरे में आकर्षण के साथ-साथ ज़िन्दगी का फ़ल्सफ़ा भी बता रही है। इस तरह से इस मुजरे में नक़्श साहब ने जीवन-दर्शन का भी समावेश कर दिया है।

एक अरसे के बाद 1968 में नक़्श साहब के लिखे गीतों से सजी फ़िल्म आई ’तेरी तलाश में’ जिसमें सपन-जगमोहन के स्वरबद्ध गीत काफ़ी सराहे गए। इस फ़िल्म में आशा भोसले का गाया एक मुजरा गीत था "राज़-ए-दिल हमसे कहो, हम तो कोई ग़ैर नहीं, यूं परेशाँ ना रहो हम तो कोई ग़ैर नहीं"। अब तक के नक़्श साहब के मुजरों में ख़ुशी का रंग था, पर इस ग़ज़ल में उन्होंने दर्द भर दिया है। ग़ज़ल के बाक़ी दो शेर हैं - "महकी महकी सी ये तन्हाई गिला करती है, ग़ैर तुम भी न रहो हम तो कोई ग़ैर नहीं", और "किसी हमदर्द को कुछ दर्द बटा लेने दो, दर्द तन्हा ना सको हम तो कोई ग़ैर नहीं"। 1972 की फ़िल्म ’बाज़ीगर’ में नक़्श साहब ने दो मुजरे लिखे। एक बार फिर सपन-जगमोहन का संगीत और आशा भोसले की आवाज़। "आज आया है तू मेरा महमान बनके, तुझको जाने ना दूँगी मैं"। गीत का सिचुएशन क़रीब क़रीब ’शोले’ फ़िल्म के "जब तक है जान, जाने-जहाँ मैं नाचूंगी" गीत जैसा ही है। या फिर ’मेरा गाँव मेरा देश’ फ़िल्म के "मार दिया जाए छोड़ दिया जाए" गीत जैसी। दुश्मन के डेरे पर नायिका नाचती हुई यह गीत गा रही है; एक अन्तरे में नक़्श साहब लिखते हैं - "तेरे हाल पे रहम ना खाऊँगी, मैं तो खेल के होली तेरे ख़ून से, बरसों की आग बुझाऊंगी, यही है मेरी मर्ज़ी..."। यह गीत पारम्परिक मुजरा जैसा नहीं है, लेकिन इसी फ़िल्म का अन्य गीत "मेरी झूम के नाची जवानी तो घुंघरू टूट गए, मैंने छेड़ी जो दिल की कहानी घुंघरू टूट गए"। आशा भोसले ही की आवाज़ में इस मुजरे को सुनते हुए ख़याल आया कि 80 के दशक में क़तील शिफ़ई का लिखा मशहूर मुजरा "मोहे आई ना जग से लाज, मैं इतना ज़ोर से नाची आज कि घुंघरू टूट गए" में बोलों की समानता है।


1973 में फ़िल्म आई ’प्रभात’ जिसमें मदन मोहन का संगीत था। इसमें नक़्श ल्यालपुरी को गीत लिखने का मौक़ा मिला। नक़्श साहब ने उसी साक्षात्कार में बताया था कि इस फ़िल्म में उन्होंने दो मुजरे लिखे जिन पर बिहार की जनता ने सिनेमाघरों में स्क्रीन पर सिक्के उछाले। लता मंगेशकर की आवाज़ में पहला मुजरा है "भरोसा कर लिया जिस पर, उसी ने हमको लूटा है, कहाँ तक नाम गिनवाएँ सभी ने हमको लूटा है"। ग़ौर करने लायक बात है कि इस मुजरे में नक़्श साहब ने मुजरा करने वाली के दिल के दर्द को उजागर किया है कि उसे हर किसी ने बस लूटा ही है। ’तेरी तलाश में’ फ़िल्म के मुजरे में जिस दर्द की छाया हमने देखी थी वह नायक का दर्द था, जबकि इस मुजरे में नायिका का दर्द छुपा है। एक अन्तरे में नक़्श साहब कहते हैं, "जो लुटते मौत के हाथों तो कोई ग़म नहीं होता, सितम इस बात का है ज़िन्दगी ने हमको लूटा है"। इसी तरह का कुछ उन्होंने ’दिल की राहें’ की ग़ज़ल में भी कहा था, "बोझ होता जो ग़मों का तो उठा भी लेते, ज़िन्दगी बोझ बनी हो तो उठायें कैसे"। ख़ैर, ’प्रभात’ फ़िल्म का एक और मुजरा है "साक़िया क़रीब आ, नज़र मिला"। लता जी की ही आवाज़ में शास्त्रीय संगीत आधारित इस मुजरे को मदन मोहन के अद्‍भुत संगीत ने जितना निखारा है, उतना ही न्याय नक़्श ल्यालपुरी के असरदार बोलों ने किया है। "प्यासी कहीं ना रह जाए मेरे शबाब की रातें, दिल को मेरे न बहला तू करके शराब की बातें, तुझको ख़ुदा का वास्ता शराब ना शराब ना, साक़िया क़रीब आ..." - पहले अन्तरे में नायिका शराब को ना कह रही है तो दूसरे अन्तरे में शराब पिलाने की बात होती है और तीसरे अन्तरे में तो नायिका ख़ुद शराब पीने की बात करती है। वो कहती है, "दिल भी जवाँ है पहलु में तू भी है पास जानेजाँ, ढलने लगी है शोलों में होठों की प्यास जानेजाँ, इतनी सी है इल्तिजा मुझे पीला पीला, साक़िया क़रीब आ..."।

70 के दशक के शुरुआती किसी साल में संगीतकार मदन मोहन के संगीत में नक़्श साहब ने दो मुजरे लिखे थे संभवत: ’रहनुमा’ फ़िल्म के लिए जो बन्द हो गई। लेकिन गाने आशा भोसले की आवाज़ में रेकॉर्ड हो चुके थे। 6 मिनट 38 सेकन्ड्स अवधि का पहला मुजरा था "हम होश लुटा कर महफ़िल में जब उनका नज़ारा कर बैठे, घबरा के उन्हें तन्हाई में मिलने का इशारा कर बैठे"। इस मुजरे में पूरी की पूरी एक कहानी छुपी हुई है। पहले अन्तरे में नक़्श साहब बताते हैं कि किस तरह से उस तवायफ़ को किसी ने अपना हाथ दिया और किस तरह से वो उसके प्यार में पड़ गई। "हाथों में जो उनका हाथ आया, आंखों में नशा सा छाने लगा, सौ बार झुकीं बोझल पलकें, माथे पे पसीना आने लगा, मिलते ही किसी बेगाने से हम वादा वफ़ा का कर बैठे।" दूसरे अन्तरे में दोनों के और ज़्यादा क़रीब आने की बात कही गई है, तन से तन का मेल हुआ, पर जल्द ही तवायफ़ का मोह भंग हुआ। "दिल से दिल की बातें भी हुईं, छुप छुप के मुलाक़ातें भी हुईं, कुछ फूल तमन्ना की महके, रंगीन कई रातें हुईं, इक रोज़ हमें मालूम हुआ हम ख़ून-ए-तमन्ना कर बैठे"। और अन्तिम अन्तरे में तवायफ़ के टूटे दिल के संभल जाने के प्रयास का चित्रण हुआ है। "उल्फ़त की मिली यह हमको सज़ा, हर ग़म को अकेले सहना पड़ा, शिकवे लबों पे आई मगर पत्थर की चुप रहना पड़ा, क्या जाने उन्हें हम क्या समझे जो उनपे भरोसा कर बैठे"। दूसरा मुजरा है "आज की शाम पहलू में तू, तेरा जाम ख़ाली है क्यों?"। संगीत संयोजन को सुन कर अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि यह मदन मोहन की रचना है। सुन कर लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के संगीत की याद आ जाती है। "ज़ुल्फ़ की घटा खुली बिखर गई, शाम और भी ज़रा निखर गई, दिल की धड़कनों में रंग आ गया, तू मिला तो ज़िन्दगी सँवर गई, कैसे कहूँ मेरे लिए लायी है क्या आज की शाम..."। 

संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के प्यारेलाल के भाई गणेश के संगीत निर्देशन में 1975 में एक फ़िल्म आई थी ’बदनाम’। इस फ़िल्म में नक़्श ल्यालपुरी ने एक मुजरा लिखा था जिसे आशा भोसले ने गाया - "महफ़िल मेरी रातें मेरी दुनिया करे बातें मेरी, शीशे की जवानी आके मेरे सोनिया, नशे दियाँ बोतलाँ"। पंजाबी शब्दों का सुन्दर इस्तमाल नक़्श साहब ने इस मुजरे में किया। गीत फ़िल्माया गया था लक्ष्मी छाया पर जिन पर "मार दिया जाए कि छोड़ दिया जाए" फ़िल्माया गया था। गणेश के संगीत में एल-पी की छाया मिलती है। फ़िल्म के ना चलने से यह गीत भी गुमनाम रह गया। संगीतकार सपन-जगमोहन के साथ नक़्श लायलपुरी ने बहुत अच्छा काम किया है। 1976 में नक़्श-सपन-जगमोहन की एक और फ़िल्म आई ’कागज़ की नाव’। इसमें आशा भोसले का गाया एक बेहद ख़ूबसूरत मुजरा था जो शास्त्रीय संगीत पर आधारित था। "ना जैयो रे सौतन घर सैंया, रुक जा मैं रो रो पड़ूँ तोरे पैंया" निस्सन्देह एक उच्चस्तरीय मुजरा गीत है। अन्तरे में नक़्श साहब लिखते हैं - "जादू भी जाने टोना भी जाने, नजरिया से दिल को पिरोना भी जाने, हँस के मिले दूर होना भी जाने, तू ही ना माने ना माने, ना जैयो रे सौतन घर सैंया..."। गीत की ख़ास बात यह है कि गीत मुजरे वाली कोठे पे गा रही है, पर बोल पत्नी की ज़ुबाँ से निकलने वाले बोल हैं जो अपने पति को सौतन के घर जाने से रोक रही है। इस तरह से विरोधाभास का सुन्दार उदारहण है यह गीत। कितने सुन्दर शब्दों में नक़्श साहब दूसरा अन्तरा कहते हैं, "तन से लुभाये, अदाओं से लूटे, पल में वो माने तो पल में ही रूठे, बैरन की होती हैं सब रूप झूठे, तू ही ना जाने..."।

1977 में एक फ़िल्म आई थी ’महाबदमाश’। इस फ़िल्म में विनोद खन्ना और नीतू सिंह मुख्य भूमिकाओं में थे। रवीन्द्र जैन के संगीत में इस फ़िल्म में नक़्श लायलपुरी ने गीत लिखे। सिचुएशन के मुताबिक एक पार्टी में नीतू सिंह विनोद खन्ना को शराब का सहारा लेकर अपनी तरफ़ आकर्षित करने का प्रयास कर रही है। पारम्परिक मुजरा शैली का गीत ना होते हुए भी सिचुएशन और भाव गीत के बोलों को मुजरा जैसा बना दिया है। मुखड़ा है - "अभी ज़रा सी देर में ये रात गुनगुनाएगी, ये धड़कनों की लय कोई हसीं धुन सुनाएगी, न तुझको नींद आएगी, न मुझको नींद आएगी, मेरे क़रीब आके पी, ये फ़ासला मिटा के पी"। एक अन्तरे में नक़्श साहब लिखते हैं "जो तू कहे तो झूमके महकती ज़ुल्फ़ खोल दूँ, सनम तेरी शराब में लबों का रंग घोल दूँ, तेरी नज़र नज़र पे मैं ये दिल का फूल तोड़ दूँ, मेरे क़रीब आके पी..."। अब तक जितने भी मुजरों की हमने बातें की, हर एक मुजरा दूसरे मुजरे से अलग है। यहाँ तक कि शब्दों का दोहराव भी दिखाई नहीं दिया किसी में। इसी साल एक फ़िल्म आई थी ’वोही बात’, इसमें एक ग़ज़ल नक़्श साहब ने लिखी है, लेकिन शायद इसे एक मुजरे की तरह फ़िल्माया नहीं गया है, हालाँकि इसमें दर्द एक मुजरे वाली का ज़रूर छुपा हुआ है। ग़ज़ल के तीन शेर अर्ज़ है - "ज़हर देता है मुझे कोई दवा देता है, जो भी मिलता है मेरे ग़म को बढ़ा देता है।" "क्यों सुलगती है मेरे दिल में पुरानी यादें,कौन बूझती हुई शोलों को हवा देता है।" "हाल हँस-हँस के बुलाता है कभी बाहों में, कभी माज़ी मुझे रो रो सदा देता है।"


आज बस इतना ही, इस लेख का दूसरा व अन्तिम भाग आप पढ़ पाएंगे अगले सप्ताह।



आख़िरी बात

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शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



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