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Thursday, January 5, 2017

परीशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए.. पेश-ए-नज़र है अल्लामा इक़बाल का दर्द मेहदी हसन की जुबानी

महफ़िल ए कहकशाँ 18



दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज पेश है मोहम्मद अल्लामा इकबाल की लिखी गज़ल मेहदी हसन की आवाज़ में|  



मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 

स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी






इस ऑडियो को आप यहाँ से डाउनलोड भी कर सकते हैं| लिंक पर राइट क्लिक करके सेव एज का आप्शन चुनें|
allamaiqbal.mp3

Wednesday, July 14, 2010

बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की.. नारी-मन में मचलते दर्द को दिल से उभारा है परवीन और मेहदी हसन ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #९२

"नारी-मन की व्यथा को अपनी मर्मस्पर्शी शैली के माध्यम से अभिव्यक्त करने वाली पाकिस्तानी शायरा परवीन शाकिर उर्दू-काव्य की अमूल्य निधि हैं।" - यह कहना है सुरेश कुमार का, जिन्होंने "परवीन शाकिर" पर "खुली आँखों में सपना" नाम की पुस्तक लिखी है। सुरेश कुमार आगे लिखते हैं:

बीसवीं सदी के आठवें दशक में प्रकाशित परवीन शाकिर के मजमुआ-ए-कलाम ‘खुशबू’ की खुशबू पाकिस्तान की सरहदों को पार करती हुई, न सिर्फ़ भारत पहुँची, बल्कि दुनिया भर के उर्दू-हिन्दी काव्य-प्रेमियों के मन-मस्तिष्क को सुगंधित कर गयी। सरस्वती की इस बेटी को भारतीय काव्य-प्रेमियों ने सर-आँखों पर बिठाया। उसकी शायरी में भारतीय परिवेश और संस्कृति की खुशबू को महसूस किया:

ये हवा कैसे उड़ा ले गयी आँचल मेरा
यूँ सताने की तो आदत मेरे घनश्याम की थी


परवीन शाकिर की शायरी, खुशबू के सफ़र की शायरी है। प्रेम की उत्कट चाह में भटकती हुई, वह तमाम नाकामियों से गुज़रती है, फिर भी जीवन के प्रति उसकी आस्था समाप्त नहीं होती। जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए, वह अपने धैर्य का परीक्षण भी करती है।

कमाल-ए-ज़ब्त को खुद भी तो आजमाऊँगी
मैं अपने हाथ से उसकी दुलहन सजाऊँगी


प्रेम और सौंदर्य के विभिन्न पक्षों से सुगन्धित परवीन शाकिर की शायरी हमारे दौर की इमारत में बने हुए बेबसी और विसंगतियों के दरीचों में भी अक्सर प्रवेश कर जाती है-

ये दुख नहीं कि अँधेरों से सुलह की हमने
मलाल ये है कि अब सुबह की तलब भी नहीं


पाकिस्तान की इस भावप्रवण कवयित्री और ख़्वाब-ओ-ख़याल के चाँद-नगर की शहज़ादी को बीसवीं सदी की आखिरी दहाई रास नहीं आयी। एक सड़क दुर्घटना में उसका निधन हो गया। युवावस्था में ही वह अपनी महायात्रा पर निकल गयी।

कोई सैफो हो, कि मीरा हो, कि परवीन उसे
रास आता ही नहीं चाँद-नगर में रहना

परवीन शाकिर के मौत की बरसी पर "स्टार न्युज़ एजेंसी" ने यह खबर छापी थी:

आज परवीन शाकिर की बरसी है...परवीन शाकिर ने बहुत कम अरसे में शायरी में वो मुकाम हासिल किया, जो बहुत कम लोगों को ही मिल पाता है. कराची (पाकिस्तान) में २४ नवंबर १९५२ को जन्म लेने वाली परवीन शाकिर की ज़िन्दगी २६ दिसंबर १९९४ को इस्लामाबाद के कब्रस्तान की होने तक किस-किस दौर से गुज़री...ये सब उनकी चार किताबों खुशबू, खुद कलामी, इनकार और माह तमाम की सूरत में हमारे सामने है...माह तमाम उनकी आखिरी यादगार है...

२६ दिसंबर १९९४ को इस्लामाबाद में एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई थी. जिस दिन परवीन शाकिर को कब्रस्तान में दफ़नाया गया, उस रात बारिश भी बहुत हुई, लगा आसमान भी रो पड़ा हो...सैयद शाकिर के घराने का ये रौशन चराग इस्लामाबाद के कब्रस्तान की ख़ाक में मिल गया हो, लेकिन उसकी रौशनी और खुशबू अदब की दुनिया में रहती दुनिया तक कायम रहेगी..

परवीन की मौत के बाद उनकी याद में एक "क़िता-ए-तारीख" की तख्लीक की गई थी:

सुर्ख फूलों से ढकी तुरबत-ए-परवीन है आज
जिसके लहजे से हर इक सिम्त है फैली खुशबू
फ़िक्र-ए-तारीख-ए-अजल पर यह कहा हातिफ़ ने
फूल! कह दो "है यही बाग-ए-अदब की खुशबू


उपरोक्त पंक्तियाँ "तनवीर फूल" की पुस्तक "धुआँ धुआँ चेहरे" में दर्ज हैं।

परवीन शाकिर अच्छी-खासी पढी-लिखी थीं। अच्छी-खासी कहने से अच्छा है कि कहूँ अव्वल दर्जे की शिक्षित महिला थीं क्योंकि उनके पास एक नहीं तीन-तीन "स्नातकोत्तर" की डिग्रियाँ थीं.. वे तीन विषय थे - अंग्रेजी साहित्य, लिग्विंसटिक्स एवं बैंक एडमिनिस्ट्रेशन। वे नौ वर्ष तक शिक्षक रहीं, उसके बाद वे प्रशासनिक सेवा का हिस्सा बन गईं। १९८६ में उन्हें CBR का सेकेंड सेक्रेटरी नियुक्त किया गया। उन्होंने कई सारी किताबें लिखीं। उनकी पहली किताब "खुशबू" ने उन्हें "अदमजी" पुरस्कार दिलवाया। आगे जाकर उन्हें पाकिस्तान के सर्वोच्च पुरस्कार "प्राईड ऑफ परफ़ोरमेंश" से भी नवाज़ा गया। पहले-पहल परवीन "बीना" के छद्म नाम से लिखा करती थीं। वे "अहमद नदीम क़ासमी" को अपना उस्ताद मानती थीं और उन्हें "अम्मुजान" कहकर पुकारती थीं। परवीन का निकाह डाक्टर नसिर अहमद से हुआ था लेकिन परवीन की दुखद मौत से कुछ दिनों पहले हीं उन दोनों का तलाक हो गया।

यह था परवीन का संक्षिप्त परिचय। इनके बारे में अगर ज्यादा जान हो तो यहाँ जाएँ। मैं अगर सही हूँ और जहाँ तक मुझे याद है, हमारी इस महफ़िल में आज से पहले किसी शायरा की आमद नहीं हुई थी यानि कि परवीन पहली शायरा हैं, जिनके नाम पर पूरी की पूरी महफ़िल सजी है। हमें इस बात का गर्व है कि देर से हीं सही लेकिन हमें किसी शायरा की इज़्ज़त-आफ़जाई करने का मौका तो मिला। हम आगे भी ऐसी कोशिश करते रहेंगे क्योंकि ग़़ज़ल की दुनिया में शायराओं की कमी नहीं।

परवीन की शायरी अपने-आप में एक मिसाल है। इनकी गज़लों के एक-एक शेर मुखर हैं। मन तो हुआ कि सारी गज़लें यहाँ डाल दूँ लेकिन जगह अनुमति नहीं देती। इसलिए बगिया से कुछ फूल चुनकर लाया हूँ। खुशबू कैसी है, कितनी मनभावन है यह जानने के लिए आपको इन फूलों को चुमना होगा, गुनना होगा:

आज तो उस पे ठहरती ही न थी आंख ज़रा
उसके जाते ही नज़र मैंने उतारी उसकी

तेरे सिवा भी कई रंग ख़ुशनज़र थे मगर
जो तुझको देख चुका हो वो और क्या देखे

मेरे बदन को नमी खा गई अश्कों की
भरी बहार में जैसे मकान ढहता है

सर छुपाएँ तो बदन खुलता है
ज़ीस्त मुफ़लिस की रिदा हो जैसे

तोहमत लगा के माँ पे जो दुश्मन से दाद ले
ऐसे सुख़नफ़रोश को मर जाना चाहिये


परवीन शाकिर के बारे में ज्यादा कुछ न कह सका क्योंकि मेरी "तबियत" आज मेरा साथ नहीं दे रही। पहले तो लगा कि आज महफ़िल-ए-ग़ज़ल सजेगी हीं नहीं, लेकिन "मामूल" से पीछे हटना मुझे नहीं आता, इसलिए जितना कुछ हो पाया है, वही लेकर आपके बीच आज हाज़िर हूँ। उम्मीद करता हूँ कि आप मेरी मजबूरी समझेंगे और बाकी दिनों की तरह आज भी महफ़िल को ढेर सारा प्यार नसीब होगा। चलिए तो अब आज की ग़ज़ल की ओर रूख कर लेते हैं। इस ग़ज़ल को अपनी मखमली आवाज़ से मुकम्मल किया है ग़ज़लगायकी के बादशाह मेहदी हसन साहब ने। यूँ तो मेहदी साहब ने बस ३ हीं शेर गाए हैं, लेकिन मैंने पूरी ग़ज़ल यहाँ उपलब्ध करा दी है, ताकि बचे हुए शेरों की ज़ीनत भी खुलकर सामने आए। तो पेश-ए-खिदमत है आज की ग़ज़ल:

कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की
उस ने ख़ुश्बू की तरह मेरी पज़ीराई की

कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने
बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की

वो कहीं भी गया लौटा तो मेरे पास आया
बस यही बात है अच्छी मेरे हरजाई की

तेरा पहलू तेरे दिल की तरह आबाद रहे
तुझ पे गुज़रे न ____ शब-ए-तन्हाई की

उस ने जलती हुई पेशानी पे जो हाथ रखा
रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "पालकी" और शेर कुछ यूँ था-

मेरे बाज़ुओं में थकी-थकी, अभी महव-ए-ख़्वाब है चांदनी
न उठे सितारों की पालकी, अभी आहटों का गुज़र न हो

पिछली महफ़िल की शोभा बनीं नीलम जी। आपने अपने खास अंदाज में हमें धमका भी दिया.. आपकी यह अदा हमें बेहद पसंद आई। नीलम जी के बाद महफ़िल की शम्मा शरद जी के सामने ले जाई गई। इस बार शरद जी का अंदाज़ अलहदा-सा था और उन्होंने स्वरचित शेरों के बजाय नीरज के शेरों से महफ़िल को रौशन किया। भले हीं शरद जी दूसरे रास्ते पर निकल गए हों लेकिन मंजु जी ने अपनी लीक नहीं छोड़ी.. उन्होंने तो स्वरचित शेर हीं पेश करना सही समझा। इंदु जी, आपने सही कहा.. बशीर बद्र साहब और हुसैन बंधु ये तीनॊं ऐसी हस्तियाँ हैं, जिन्हें उनके हक़ की मक़बूलियत हासिल नहीं हुई। मनु जी, कुछ और भी कह देते.. खैर आप ठहरे "रमता जोगी".. आप किसकी सुनने वाले :) अवध जी, आपने "नीरज" की नज़्म याद दिलाकर महफ़िल में चार चाँद लगा दिए। शन्नो जी, ग़ज़ल और आलेख आपके पसंद आए, हमें इससे ज्यादा और क्या चाहिए। अमित जी, हमारी महफ़िल तो इसी कोशिश में है कि फ़नकार चाहे जो भी हो, अगर अच्छा है तो उसे अंधकार से प्रकाश में आना चाहिए। सीमा जी, इस बार एक हीं शेर.. ऐसा क्यों? और इस बार आपने देर भी कर दी है। अगली बार से ऐसा नहीं चलेगा :) अवनींद्र जी, आप आए नहीं थे तो मुझे लगा कि कहीं फिर से नाराज़ तो नहीं हो गएँ.. अच्छा हुआ कि नीलम जी ने पुकार लगाई और आप खुद को रोक न सके। अगली बार से यही उपाय चाहिए होगा क्या? :)

बातों के बाद अब बारी है पिछली महफ़िल के शेरों की:

सोचता था कैसे दम दूं इन बेदम काँधों को अपने
पिता ने काँधे से लगाया जब ,मेरी पालकी को अपने (नीलम जी)

जैसे कहार लूट लें दुल्हन की पालकी
हालत वही है आजकल हिन्दोस्तान की (नीरज)

अल्लाउदीन से मिलने गई जब रानी पदमनी ,
उसे हर पालकी में नजर आई रानी पदमनी (मंजु जी)

पर तभी ज़हर भरी गाज एक वोह गिरी
पुंछ गया सिंदूर तार तार हुई चुनरी
और हम अजान से, दूर के मकान से
पालकी लिए हुए कहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे (नीरज)

उसे लेकर गयी पालकी जहाँ उसकी कोई कदर न थी
जो जहान था उसके लिये उसकी नजर कहीं और थी. (शन्नो जी)

शब्द की नित पालकी उतरी सितारों की गली में
हो अलंकॄत गंध के टाँके लगाती हर कली में (राकेश खंडेलवाल )

मन की पालकी मैं वेदना निढाल सी
अश्क मैं डूबी हुई भावना निहाल सी (अवनींद्र जी)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, June 2, 2010

बेदर्द मैंने तुझको भुलाया नहीं हनोज़... कुछ इस तरह जोश की जिंदादिली को स्वर दिया मेहदी हसन ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८६

दैनिक जीवन में आपका ऐसे इंसानों से ज़रूर पाला पड़ा होगा जिनके बारे में लोग दो तरह के ख्यालात रखते हैं, मतलब कि कुछ लोग उन्हें नितांत हीं शरीफ़ और वफ़ादार मानते हैं तो वहीं दूसरे लोगों की नज़र में उनसे बड़ा अवसरवादी कोई नहीं। हमारे आज के शायर की हालत भी कुछ ऐसी हीं है। कहीं कुछ लोग उन्हें राष्ट्रवादी मानते हैं तो कुछ उन्हें "छिपकली की तरह रंग बदलने वाला" छद्म-राष्ट्रवादी। उनका चरित्र-चित्रण करने के लिए जहाँ एक और "अली सरदार जाफरी" का "कहकशां"(धारावाहिक) है तो वहीं "प्रकाश पंडित" की "जोश और उनकी शायरी"(पुस्तक)। जी हाँ हम जोश की हीं बात कर रहे हैं। जोश अकेले ऐसे शायर हैं जिनकी अच्छाईयाँ और बुराईयाँ बराबर-मात्रा में अंतर्जाल पर उपलब्ध है, इसलिए समझ नहीं आ रहा कि मैं किसका पक्ष लूँ। अगर "कहकशां" देखकर कोई धारणा निर्धारित करनी हो तब तो जोश ने जो भी किया वह समय की माँग थी। उनके "पाकिस्तान-पलायन" के पीछे उनकी मजबूरी के अलावा कुछ और न था। जान से प्यारा "देश" उन्हें बस इसलिए छोड़ना पड़ा क्योंकि उनके परिवार-वालों ने उनका जीना मुहाल कर दिया था। जाते-जाते उन्होंने नेहरू (जो कि जोश के जिगरी दोस्त थे) के सामने अपनी मजबूरियों का हवाला दिया। तब नेहरू ने उन्हें बीच का रास्ता दिखाते हुए कहा कि आप जाओ लेकिन साल में तीन महिने हिन्दुस्तान में गुजारना, इससे आपका यह अपराध-बोध भी जाता रहेगा कि आपने हिन्दुस्तान छोड़ दिया है। लेकिन एक बार पाकिस्तान जाने के बाद यह हो न पाया। यह था "अली सरदार जाफरी" का मत। इस मुद्दे पर "प्रकाश" कुछ नहीं कहते, लेकिन इस मुद्दे पर "अंतर्जाल" चुप नहीं। मुझे कहीं यह पढने को मिला कि "जोश" पाकिस्तान इसलिए गए थे क्योंकि "वहां उन्हें रिक्शा चलाने के लाइसेंस मिले, कुछ सिनेमाघरों में हिस्सेदारी मिली और शासकों के कशीदे काढ़ने के लिए मोटी रकम। " साथ हीं साथ पाकिस्तान के मुख्य मार्शल लॉ प्रशासक सिकंदर मिर्ज़ा उनके बहुत बड़े प्रशंसक थे। लेकिन दु:ख की बात यह है कि मिर्जा के पतन के बाद पाकिस्तान में जोश को गद्दार कहकर सार्वजनिक रूप से दुत्कारा गया। इसलिए कई बार उन्होंने भारत लौटने की कोशिश भी की। कहा जाता है कि "तब स्वर्गीय मौलाना आजाद अड़ गए, वे एक ही शर्त पर जोश के भारत लौटने पर सहमत थे कि लौटने पर उन्हें जेल में रखा जाए।" अब यह किस हद तक सच है यह मालूम नहीं लेकिन अगर आप इस वाक्ये पर नज़र दौड़ाएँगे तो ऊपर कही बात पर यकीन करने का मन न होगा:

जोश साहिब और मौलाना आज़ाद भी दोस्त थे तथा वह प्राय: आज़ाद साहिब से मिलने जाते रहते थे। एक बार जब वह मौलाना से मिलने गए, तो वह अनेक सियासी लोगों में घिरे हुए थे। दस-बीस मिनट इंतज़ार के बाद जोश साहिब ने यह शेर कागज़ पर लिखकर उनके सचिव को दिया और उठकर चल पड़े—

नामुनासिब है ख़ून खौलाना
फिर किसी और व़क्त मौलाना

जोश अभी बाहरी गेट तक भी नहीं पहुंचे थे कि सचिव भागे आगे आए और रुकने को कहा। जोश साहिब ने मुड़कर देखा। मौलाना कमरे के बाहर खड़े मुस्कुरा रहे थे।

यानि कि जोश और मौलाना में अच्छी दोस्ती थी, फिर मौलाना क्योंकर यह चाहने लगें कि जोश को जेल में डाल दिया जाए। यही तो दिक्कत है.... दो अलग तरह के विचार अंतर्जाल पर चक्कर काट रहे हैं और मुझे इन दोनों विचारों को पढकर कोई निष्कर्ष निकालना है। अब मुझमें इतना तो सामर्थ्य नहीं कि कुछ अपनी तरफ़ से कह सकूँ या कोई निर्णय हीं दे सकूँ इसलिए मुझे जो भी हासिल हुआ है आप सबके सामने रख रहा हूँ। सबसे पहले जोश का परिचय (सौजन्य: प्रकाश पंडित):

शबीर हसन खां जोश का जन्म ५ दिसम्बर, १८९४ ई. को मलीहाबाद (जिला लखनऊ) के एक जागीरदार घराने में हुआ। परदादा फ़कीर मोहम्मद ‘गोया’ अमीरुद्दौला की सेना में रिसालदार भी थे और साहित्यक्षेत्र के शहसवार भी। एक ‘दीवान’, (ग़ज़लों का संग्रह) और गद्य की एक प्रसिद्ध पुस्तक ’बस्ताने-हिकमत’ यादगार छोड़ी। दादा मोहम्द अहमद खाँ ‘अहमद’ और पिता बशीर अहमद ख़ाँ ‘बशीर’ भी अच्छे शायर थे। यों जोश ने उस सामन्ती वातावरण में पहला श्वास लिया जिसमें काव्यप्रवृत्ति के साथ साथ घमंड स्वेच्छाचार, अहं तथा आत्मश्लाघा अपने शिखर पर थी। गाँव का कोई व्यक्ति यदि तने हुए धनुष की तरह शरीर को दुहरा करके सलाम न करता था तो मारे कोडों के उसकी खाल उधेड़ दी जाती थी। ज़ाहिर है कि जन्म लेते ही ‘जोश’ इस वातावरण से अपना पिंड न छुड़ा सकते थे, अतएव उनमें भी वही ‘गुण’ उत्पन्न हो गए जो उनके पुरखों की विशेषता थी। इस वातावरण में पला हुआ रईसज़ादा जिसे नई शिक्षा से पूरी तरह लाभान्वित होने का बहुत कम अवसर मिला और जिसके स्वभाव में शुरू ही से उद्दण्डता थी, अत्यन्त भावुक और हठी बन गया। युवावस्था तक पहुँचते-पहुँचते उनके कथनानुसार वे बड़ी सख्ती से रोज़े-नमाज़ के पाबंद हो चुके थे। नमाज़ के समय सुगन्धित धूप जलाते और कमरा बन्द कर लेते थे। दाढ़ी रख ली और चारपाई पर लेटना और मांस खाना छोड़ दिया था और भावुकता इस सीमा पर पहुँच चुकी थी कि बात-बात पर उनके आँसू निकल आते थे। इस मंजिल पर पहुँचकर उनकी भावुकता ने उनके सामाजिक सम्बन्धों पर कुठाराघात किया। उन्होंने अपने पिता से विद्रोह किया। जोश लिखते हैं- "मेरे पिता ने बड़ी नर्मी से मुझे समझाया, फिर धमकाया, मगर मुझ पर कोई असर न हुआ। मेरी बग़ावत बढ़ती ही चली गई। नतीजा यह हुआ कि मेरे बाप ने वसीयतनामा लिखकर मेरे पास भेज दिया कि अगर अब भी मैं अपनी जिद पर कायम रहूँगा तो सिर्फ १०० रुपये माहवार वज़ीफ़े के अलावा कुल ज़ायदाद से महरूम कर दिया जाऊँगा लेकिन मुझ पर इसका कोई असर न हुआ"

जोश ने घर पर उर्दू फारसी की पाठ्य पुस्तकें पढ़ीं। फिर अंग्रेजी शिक्षा के लिए सीतापुर स्कूल, जुबली स्कूल लखनऊ और सेंट पीटर कॉलेज आगरा और अलीगढ़ में भी प्रविष्ट हुए, लेकिन पूरी तरह कहीं भी न पढ़ सके। अपनी शायरी के लटके बारे में वे कहते हैं कि "मैंने नौ बरस की उम्र से शेर कहना शुरू कर दिया था। शेर कहना शुरू कर दिया था-यह बात मैंने खिलाफ़े-वाक़ेआ और ग़लत कही है। क्योंकि यह किसी इन्सान की मज़ाल नहीं कि वह खुद से शेर कहे। शेर अस्ल में कहा नहीं जाता, वो तो अपने को कहलवाता है। इसलिए यही तर्ज़े-बयान अख़्तियार करके मुझे यह कहना चाहिए कि नौ बरस की उम्र से शेर ने मुझसे अपने को कहलावाना शुरू कर दिया था। जब मेरे दूसरे हम-सिन (समवयस्क) बच्चे पतंग उड़ाते और गोलियाँ खेलते थे, उस वक़्त किसी अलहदा गोशे (एकान्त स्थान) में शेर मुझसे अपने को कहलवाया करता था।" उस समय उनकी आयु २३-२४ वर्ष की थी जब उन्होंने पहले ‘उमर ख़य्याम’ और फिर ‘हाफ़िज़’ की शायरी का अध्ययन किया। फ़ारसी भाषा के ये दोनों महान कवि अपने काल के विद्रोही कवि थे। अध्ययन का अवसर मिलने पर जोश मिल्टन, शैले, बायरन और वर्डजवर्थ से भी प्रभावित हुए और आगे चलकर गेटे, दांते, शॉपिनहार, रूसों और नित्शे से भी। विशेषकर नित्शे से वे बुरी तरह प्रभावित हुए। नित्शे, गेटे के बाद वाली पीढ़ी का दार्शनिक साहित्यकार था, जिसने जर्मनी में एक जबरदस्त राज्य और केन्द्रीय शक्ति का समर्थन किया और हर प्रकार के नैतिक सिद्धान्त अहिंसा और समानता को अस्वीकार किया। जोश ने नित्शे के हर विचार को अपनी नीति और नारा बना लिया और अपनी हर रचना पर बिस्मिल्लाह (ख़ुदा के नाम से शुरू करता हूँ) के स्थान पर ब-नामे कुब्वतों बयात (शक्ति तथा जीवन के नाम) लिखना शुरू कर दिया। इन सबके अतिरिक्त देश की राजनैतिक परिस्तिथियों ने भी उन पर सीधा प्रभाव डाला और उनकी विद्रोही प्रवृत्ति को बड़ी शक्ति मिली। अंग्रेजी राज्य में बुरी तरह पिसी जा रही देश की जनता ने उनके नारों को उठा लिया और इस तरह उन्हें शायर-ए-इंकलाब की उपाधि हासिल हुई।

जोश का स्वभाव बागी था और इसमें कोई दो राय भी नहीं है। वह किसी भी एक निज़ाम से कभी संतुष्ट नहीं हुए। हैदराबाद में निज़ाम दक्कन की मुलाज़मत में होते हुए, उसी के ख़िलाफ़ एक स़ख्त नज़्म लिख दी। जिस पर उन्हें चौबीस घंटे के अंदर-अंदर हैदराबाद छोड़ देने का आदेश मिला। अगर प्रकाश पंडित की मानें तो जोश साहब अपनी कही बात पर कभी भी टिकते नहीं थे। जोश साहब के विचारों का यह परस्पर विरोध उनकी पूरी शायरी में मौजूद है और इसकी गवाही देते हैं ‘अ़र्शोफ़र्श’ (धरती-आकाश) ‘शोला-ओ-शबनम (आग और ओस) संबलों-सलासिल (सुगन्धित घास और ज़ंजीरें) इत्यादि उनके कविता-संग्रहों के नाम। और उनकी निम्नलिखित रूबाई से तो उनकी पूरी शायरी के नैन-नक्श सामने आ जाते हैं;

झुकता हूँ कभी रेगे-रवाँ की जानिब,
उड़ता हूँ कभी कहकशाँ की जानिब,
मुझ में दो दिल हैं, इक मायल-ब-ज़मीं,
और एक का रुख़ है आस्माँ की जानिब।


रेगे-रवाँ - बहती हुई रेत
कहकशाँ - आकाशगंगा
मायल-ब-जमीं- धरती की ओर जिसका रूख है

न सिर्फ जोश साहब के विचारों में परस्पर विरोध था, बल्कि उनकी शायरी में छुपे भावों और शायरी के स्तर में भी कभी-कभी आसमान-जमीन का अंतर दिख पड़ता है। अगर आपसे कहा जाए कि जिस शायर ने आज की गज़ल लिखी है उसी की कलम से कभी "मोरे जोबना का देखो उभार" भी निकला था तो आप निस्संदेह हीं दंग रह जाएँगे। अगर मेरी बात पर आपको यकीन न हो तो यहाँ जाएँ। खैर उन सब बातों पर चर्चा कभी और करेंगे अभी तो आज की गज़ल का लुत्फ़ उठाने का समय है। हाँ, जोश के बारें आप क्या ख्याल रखते हैं, अपनी टिप्पणियों के माध्यम से यह जरूर बताईयेगा।

आज हम जो गज़ल लेकर आप सबके सामने हाज़िर हुए हैं उन्हें अपनी आवाज़ से मुकम्मल किया है "मेहदी हसन" साहब ने। तो पेश-ए-खिदमत है यह गज़ल:

नक़्श-ए-ख़याल दिल से मिटाया नहीं हनोज़
बेदर्द मैंने तुझको भुलाया नहीं हनोज़

तेरी हीं जुल्फ़-ए-नाज़ का अब तक असीर हूँ,
यानि किसी के दाम में आया नहीं हनोज़

या दस-बा-खैर (?) जिसपे कभी थी तेरी नज़र
वो दिल किसी से मैंने लगाया नहीं हनोज़

वो सर जो तेरी राहगुज़र में था सज्दा-रेज़
मैं ने किसी क़दम पे झुकाया नहीं हनोज़

बेहोश हो के जल्द तुझे होश आ गया
मैं ______ होश में आया नहीं हनोज़

मर कर भी आयेगी ये सदा क़ब्र-ए-"जोश" से
बेदर्द मैंने तुझको भुलाया नहीं हनोज़




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "सूफ़ी" और शेर कुछ यूँ था-

ये रुपहली छाँव, ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफ़ी का तसव्वुर, जैसे आशिक़ का ख़याल

इस शब्द को सबसे पहले पहचाना "सीमा" जी ने लेकिन शेर लेकर सबसे पहले हाज़िर हुए अवनींद्र जी।
ये रहे अवनींद्र जी के शेर:

मेरी मुहब्बत पे इतनी हैरत न जताओ
आशिक़ सी फितरत है सूफी न बनाओ (स्वरचित )...... माशा-अल्लाह! इस इश्क़ पर वारा जाऊँ!!

जिस तरह पत्थर पे घिस के रंग हिना देती है
आशिकी हद से जो गुजरे सूफी बना देती है ... पहले शेर में हद मालूंम थी शायद जो इस शेर में टूट गई :)

और ये सारे शेर सीमा जी ने पेश किए:

जिसे पा सका न ज़ाहिद जिसे छू सका न सूफ़ी,
वही तीर छेड़ता है मेरा सोज़-ए-शायराना (मुईन अहसन जज़्बी)

ज़ाहिद को तआज्जुब है, सूफ़ी को तहय्युर है।
सद-रस्के-तरीक़त है, इक लग़ज़िशे-मस्ताना॥ (असग़र गोण्डवी)

डाक्टर अनुराग साहब, आपका दस्तखत, आपकी उपस्थिति इस मंच पर देखकर मैं बता नहीं सकता कि मुझे कितनी खुशी हासिल हुई है। आप तो शेर-ओ-शायरी और त्रिवेणियों के उस्ताद हैं फिर खाली हाथ इस महफ़िल में आने का सबब? अगली बार ऐसा नहीं चलेगा :)

नीलम जी, तो इस तरह आप भी शेरो-शायरी के कुरूक्षेत्र में उतर हीं गईं। चलिए अच्छा है, अवनींद्र जी को टक्कर देने के लिए एक और रथी/महारथी की जरूरत थी। यह रहा आपका शेर, जो मुझे खासा पसंद आया:

तेरी ये इबादत सूफी न बना दे मुझको
मेरी ये हसरत,इन्सां ही नजर आऊँ तुझको (स्वरचित)

शन्नो जी, आप भी कमर कस लीजिए। नीलम जी मैदान में उतर चुकी हैं। यह रहा आपकी तरकश का तीर:

हर शख्श जो शायरी करते हुये रोता है
वह दिल सूफी न होगा तो क्या होगा..?

सारे शायरों ने अपनी तरफ से "सूफ़ी" का सही अर्थ जानने की पूरी कोशिश की , लेकिन मुझे लगता है कि अभी भी कुछ छूट रहा है, इसलिए यह लिंक यहाँ डाले देता हूँ:
http://en.wikipedia.org/wiki/Sufism

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, May 19, 2010

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं.. मेहदी साहब के सुपुत्र ने कुछ इस तरह उभारा फ़राज़ की ख्वाहिशों को

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८४

पाकिस्तान से खबर है कि अस्वस्थ होने के बावजूद मेहदी हसन एक बार फिर अपनी जन्मभूमि पर आना चाहते हैं। राजस्थान के शेखावटी अंचल में झुंझुनूं जिले के लूणा गांव की हवा में आज भी मेहदी हसन की खुशबू तैरती है। देश विभाजन के बाद लगभग २० वर्ष की उम्र में वे लूणा गांव से उखड़ कर पाकिस्तान चले गये थे, लेकिन इस गांव की यादें आज तक उनका पीछा करती हैं। वक्त के साथ उनके ज्यादातर संगी-साथी भी अब इस दुनिया को छोड़कर जा चुके हैं, लेकिन गांव के दरख्तों, कुओं की मुंडेरों और खेतों में उनकी महक आज भी महसूस की जा सकती है।

छूटी हुई जन्मस्थली की मिट्टी से किसी इंसान को कितना प्यार हो सकता है, इसे १९७७ के उन दिनों में झांक कर देखा जा सकता है, जब मेहदी हसन पाकिस्तान जाने के बाद पहली बार लूणा आये और यहां की मिट्टी में लोट-पोट हो कर रोने लगे। उस समय जयपुर में गजलों के एक कार्यक्रम के लिए वे सरकारी मेहमान बन कर जयपुर आये थे और उनकी इच्छा पर उन्हें लूणा गांव ले जाया गया था। कारों का काफिला जब गांव की ओर बढ़ रहा था, तो रास्ते में उन्होंने अपनी गाड़ी रुकवा दी। काफिला थम गया। सड़क किनारे एक टीले पर छोटा-सा मंदिर था, जहां रेत में लोटपोट हो कर वे पलटियां खाने लगे और रोना शुरू कर दिया। कोई सोच नहीं सकता था कि धरती माता से ऐसे मिला जा सकता है। ऐसा लग रहा था, जैसे वे मां की गोद में लिपट कर रो रहे हों।इस दृश्य के गवाह रहे कवि कृष्ण कल्पित बताते हैं, ‘वह भावुक कर देने वाला अदभुत दृश्य था। मेहदी हसन का बेटा भी उस समय उनके साथ था। वह घबरा गया कि वालिद साहब को यह क्या हो गया? हमने उनसे कहा कि धैर्य रखें, कुछ नहीं होगा। धीरे-धीरे वह शांत हो गये। बाद में उन्होंने बताया कि यहां बैठ कर वे भजन गया करते थे।’ मेहदी हसन ने तब यह भी बताया था कि पाकिस्तान में अब भी उनके परिवार में सब लोग शेखावटी में बोलते हैं। शेखावटी की धरती उन्हें अपनी ओर खींचती है।

मेहदी हसन के साथ इस यात्रा में आये उनके बेटे आसिफ मेहदी भी अब पाकिस्तान में गजल गाते हैं और बाप-बेटे का एक साझा अलबम भी है – “दिल जो रोता है’।


उपरोक्त पंक्तियाँ हमने "ईश मधु तलवार" से उधार ली हैं। ऐसा करने के हमारे पास दो कारण थे। पहला यह कि उम्र के जिस पड़ाव पर मेहदी साहब आज खड़े हैं, वहाँ से वापस लौटना या फिर पीछे मुड़कर देखना अब नामुमकिन-सा दिख पड़ता है, इसलिए हमारा कर्त्तव्य बनता है कि किसी भी बहाने मेहदी साहब को याद किया जाए और याद रखा जाए। रही बात दूसरे कारण की तो हमारी आज की महफ़िल जिस गज़ल के सहारे बन-संवरकर तैयार हुई है, उसे अपनी आवाज़ से तरोताज़ा करने वाले और कोई नहीं इन्हीं मेहदी साहब के सुपुत्र आसिफ मेहदी हैं(इनका ज़िक्र ऊपर भी आया है)। मुझे पक्का यकीन है कि आसिफ मेहदी के बारे में बहुत हीं कम लोगों को जानकारी होगी। तो हम हीं कुछ बताए देते हैं। आसिफ ने अपने अब्बाजान और अपने एक रिश्तेदार ग़ुलाम क़ादिर की देखरेख में महज १३ साल की उम्र में गाने की शुरूआत कर दी थी। इन्होंने अपना पहला कार्यक्रम १९८३ में लास एंजिल्स में दिया था, जहाँ पर इनके साथ मेहदी साहब भी थे। कहते हैं कि मेहदी साहब ने इन्हें बीच में हीं रोककर गाने से मना कर दिया था और कहा था कि इनकी आवाज़ औरतों जैसी जान पड़ रही है, इसलिए जब तक ये मर्दाना आवाज़ में नहीं गाते, तब तक इन्हें सर-ए-महफ़िल गाना नहीं चाहिए। अब्बाजान की डाँट का आसिफ की गायिकी पर क्या असर हुआ, यह कहने की कोई ज़रूरत नहीं। १९९९ में मिला "निगार अवार्ड" उनकी प्रतिभा का जीता-जागता नमूना है। पाकिस्तान की ६० से भी ज्यादा फिल्मों में गा चुके आसिफ अब हिन्दुस्तानी फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाना चाहते हैं। साथ हीं साथ आसिफ आजकल के युवाओं के बीच गज़लों की घटती लोकप्रियता से भी खासे चिंतित प्रतीत होते हैं। इन दोनों मुद्दों पर उनके विचार कुछ इस प्रकार हैं:

पाकिस्तानी गजल गायक आसिफ मेहदी कहते हैं कि युवा श्रोताओं के गजलों से दूर होने के लिए मीडिया जिम्मेदार है। प्रख्यात गजल गायक मेहदी हसन के बेटे मेहदी ने एस साक्षात्कार में आईएएनएस से कहा, "मीडिया जोर-शोर से पॉप संगीत को प्रोत्साहित कर रही है और इसे वह कुछ ऐसे रूप में प्रस्तुत कर रही है कि युवा इसे सुनने के अलावा और कुछ महसूस ही न कर सकें।" मेहदी ने कहा, "मैं अपनी ओर से गजलों को उनके शुद्ध रूप में प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रहा हूं। मैं गजल समारोहों में युवा श्रोताओं की संख्या बढ़ाने के लिए पाकिस्तान और भारत में विभिन्न मंचों पर बात कर रहा हूं। 'रूट्स 2 रूट्स'(एक प्रकार का गज़ल समारोह) के साथ मेरा सहयोग महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने मेरे वालिद (मेहदी हसन) और उनके प्रसिद्ध साथियों गुलाम अली, फरीदा खानम और इकबाल बानो जैसे गजल गायकों के अमर संगीत को प्रोत्साहित करने में मेरी मदद की है।" अपने पिता जैसी ही आवाज के मालिक मेहदी अब बॉलीवुड में अपनी शुरुआत करने को तैयार हैं। मेहदी कहते हैं कि उनके पास बॉलीवुड की कई फिल्मों में गाने के प्रस्ताव हैं। वह कहते हैं कि वह लंबे समय से हिंदी फिल्मों में गाना चाहते थे। उन्हें उम्मीद है कि वह जल्दी ही यह शुरुआत कर सकेंगे।

हम दुआ करते हैं कि हिन्दुस्तानी फिल्में जल्द हीं आसिफ साहब की आवाज़ से नवाजी जाएँ। यह तो हुई गायक की बात, अब बारी है इस गज़ल के गज़लगो की, तो यह गज़ल जिनकी लेखनी की उपज है, उनके बारे में कुछ भी कहना पहाड़ को जर्रा कहने के जैसा होगा। इसलिए खुद कुछ न कहके प्रख्यात लेखक "शैलेश जैदी" को हम यह काम सौंपते हैं।

नौशेरा में जन्मे अहमद फ़राज़ जो पैदाइश से हिन्दुस्तानी और विभाजन की त्रासदी से पाकिस्तानी थे उर्दू के उन कवियों में थे जिन्हें फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के बाद सब से अधिक लोकप्रियता मिली।पेशावर विश्वविद्यालय से उर्दू तथा फ़ारसी में एम0ए0 करने के बाद पाकिस्तान रेडियो से लेकर पाकिस्तान नैशनल सेन्टर के डाइरेक्टर,पाकिस्तान नैशनल बुक फ़ाउन्डेशन के चेयरमैन और फ़ोक हेरिटेज आफ़ पाकिस्तान तथा अकादमी आफ़ लेटर्स के भी चेयरमैन रहे।भारतीय जनमानस ने उन्हें अपूर्व सम्मान दिया,पलकों पर बिठाया और उनकी ग़ज़लों के जादुई प्रभाव से झूम-झूम उठा। मेरे स्वर्गीय मित्र मख़मूर सईदी ने, जो स्वयं भी एक प्रख्यात शायर थे,अपने एक लेख में लिखा था -"मेरे एक मित्र सैय्यद मुअज़्ज़म अली का फ़ोन आया कि उदयपूर की पहाड़ियों पर मुरारी बापू अपने आश्रम में एक मुशायरा करना चाहते हैं और उनकी इच्छा है कि उसमें अहमद फ़राज़ शरीक हों।मैं ने अहमद फ़राज़ को पाकिस्तान फ़ोन किया और उन्होंने सहर्ष स्वीकृति दे दी।शान्दार मुशायरा हुआ और सुबह चर बजे तक चला। मुरारी बापू श्रोताओं की प्रथम पक्ति में बैठे उसका आनन्द लेते रहे।"

"फ़िराक़", "फ़ैज़" और "फ़राज़" लोक मानस में भी और साहित्य के पार्खियों के बीच भी अपनी गहरी साख रखते हैं।इश्क़ और इन्क़लाब का शायद एक दूसरे से गहरा रिश्ता है। इसलिए इन शायरों के यहां यह रिश्ता संगम की तरह पवित्र और अक्षयवट की तरह शाख़-दर-शाख़ फैला हुआ है। रघुपति सहाय फ़िराक़ ने अहमद फ़राज़ के लिए कहा था-"अहमद फ़राज़ की शायरी में उनकी आवाज़ एक नयी दिशा की पहचान है जिसमें सौन्दर्यबोध और आह्लाद की दिलकश सरसराहटें महसूस की जा सकती हैं" फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को फ़राज़ की रचनाओं में विचार और भावनाओं की घुलनशीलता से निर्मित सुरों की गूंज का एहसास हुआ और लगा कि फ़राज़ ने इश्क़ और म'आशरे को एक दूसरे के साथ पेवस्त कर दिया है।और मजरूह सुल्तानपूरी ने तो फ़राज़ को एक अलग हि कोण से पहचाना । उनका ख़याल है कि "फ़राज़ अपनी मतृभूमि के पीड़ितों के साथी हैं।उन्ही की तरह तड़पते हैं मगर रोते नहीं।बल्कि उन ज़ंजीरों को तोड़ने में सक्रिय दिखायी देते हैं जो उनके समाज के शरीर को जकड़े हुए हैं।"फ़राज़ ने स्वय भी कहा था -

मेरा क़लम तो अमानत है मेरे लोगों की।
मेरा क़लम तो ज़मानत मेरे ज़मीर की है॥

देशभक्त की भावना से ओत-प्रोत इस शेर को सुनने के बाद लाज़िमी हो जाता है कि हम एक प्यार-भरा शेर देख लें क्योंकि आज की की गज़ल बड़ी हीं रूमानी है और रूमानियत को रौ में लाने के लिए माहौल में मिसरी तो घोलनी हीं पड़ेगी:

जिस सिम्त भी देखूँ नज़र आता है के तुम हो
ऐ जान-ए-जहाँ ये कोई तुम सा है के तुम हो


और अब वह समय आ गया है, जिसका हमें बेसब्री से इंतज़ार था। तो ज़रा भी देर न करते हुए हम सुनते हैं फिल्म "जन्नत की तलाश" से ज़ुल्फ़िकार अली के द्वारा संगीतबद्ध की गई यह गज़ल:

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को ____ ठहर के देखते हैं

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं

सुना है उसके बदन की तराश ऐसी है
के फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "बूटा" और शेर कुछ यूँ था-

इस दुनिया के बाग में
शूली जैसा हर बूटा है।

इस शब्द के साथ महफ़िल में हाज़िर हुए "रोमेंद्र" जी। हुजूर, आपने इस शब्द को पहचाना तो ज़रूर, लेकिन हमें आपसे शेर की भी दरकार थी। खैर कोई बात नहीं.. पहली मर्तबा था, इसलिए हम आपको माफ़ करते हैं ;) अगली बार से इस बात का भी ध्यान रखिएगा।

अवनींद्र जी, कमाल है..... इस बार आप शेर से हटकर नज़्म पर आ गए। वैसे रचना है बड़ी प्यारी:

अपने मंदिर की खातिर
नौचती रही
तुम मेरे
बाग़ का हर बूटा
और मैं
परेशां रहा
कि भूले से
कोई शूल
तेरे हाथो न चुभ जाये

शरद जी, सच कहूँ तो मैंने इसी शेर के कारण बूटा शब्द को गायब किया था। और वाह! आपने मेरे दिल की बात जान ली:

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग तो सारा जाने है। (आपने यहाँ तू लिखा है.. यानि कि सही शब्द को हीं गुल कर दिया :) )

शन्नो जी, मंजु जी और नीलम जी, आपने "बूटा" को साड़ी पर जड़े "बूटे" की तरह लिया है, जबकि इस नज़्म में बूटा का अर्थ था फूल.. इसलिए मैं आप लोगों के शेर यहाँ पेश नहीं कर रहा। इस बार मुझे माफ़ कीजिएगा। और अगली बार से यह ध्यान दीजिएगा कि कौन-सा शब्द किस अर्थ में इस्तेमाल हुआ है। या फिर फूल की तरह, मुझे समझ नहीं आ रहा। फिर भी मैं आप तीनों के शेर यहाँ रख रहा हूँ। अब महफ़िल के सुधि श्रोतागण हीं इन शेरों का फ़ैसला करेंगे:

स्याह चादर पे चाँद संग आ मुस्कुराते हैं
खामोश आलम में झांक कर टिमटिमाते हैं
आसमा में टंके सितारे लगते हैं जैसे बूटा
रात के अलविदा कहते ही गुम हो जाते हैं. (शन्नो जी)

जब लाल साड़ी पर उकेरा था बूटा,
दिलवर !तब हर साँस ने तेरा नाम जपा . (मंजु जी)

बूटा बूटा जो नोचा उस जालिम ने आसमानों से
लहू लहू वो हुआ उस कातिल के अरमानों से. (नीलम जी)

सीमा जी, आपने बूटा पर कई सारे शेर पेश किए। मुझे उन सारे शेरों में से यह शेर (पंक्तियाँ) सबसे ज्यादा पसंद आया:

मेरी मुहब्बत का ख़्वाब, चमेली का बूटा
जिसके नीचे हकीकत का 'काला नाग' रहता है। (कमल )

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, March 17, 2010

कब से हूँ क्या बताऊँ जहां-ए-ख़राब में.. चचा ग़ालिब की हालत बयां कर रहे हैं मेहदी हसन और तरन्नुम नाज़

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७५

यूसुफ़ मिर्जा,

मेरा हाल सिवाय मेरे ख़ुदा और ख़ुदाबंद के कोई नहीं जानता। आदमी कसरत-ए-ग़म से सौदाई हो जाते हैं, अक़्‍ल जाती रहती है। अगर इस हजूम-ए-ग़म में मेरी कुव्वत मुतफ़क्रा में फ़र्क आ गया हो तो क्या अजब है? बल्कि इसका बावर न करना ग़ज़ब है। पूछो कि ग़म क्या है?

ग़म-ए-मर्ग, ग़म-ए-‍फ़िराक़, ग़म-ए-रिज़्क, ग़म-ए-इज्ज़त? ग़म-ए-मर्ग में क़िलआ़ नामुबारक से क़ताअ़ नज़र करके, अहल-ए-शहर को गिनता हूँ। ख़ुदा ग़म-ए-फ़िराक को जीता रखे। काश, यह होता कि जहाँ होते, वहाँ खुश होते। घर उनके बेचिराग़, वह खुद आवारा। कहने को हर कोई ऐसा कह सकता है़, मगर मैं अ़ली को गवाह करके कहता हूँ कि उन अमावत के ग़म में और ज़ंदों के ‍फ़िराक़ में आ़लम मेरी नज़र में तीर-ओ-तार है। हक़ीक़ी मेरा एक भाई दीवाना मर गया। उसकी बेटी, उसके चार बच्चे, उनकी माँ, यानी मेरी भावज जयपुर में पड़े हुए हैं। इन तीन बरस में एक रुपया उनको नहीं भेजा। भतीजी क्या कहती होगी कि मेरा भी कोई चच्चा है। यहाँ अग़निया और उमरा के अज़दवाज व औलाद भीख माँगते फिरें और मैं देखूँ।

इस मुसीबत की ताब लाने को जिगर चाहिए। अब ख़ास दुख रोता हूँ। एक बीवी, दो बच्चे, तीन-चार आदमी घर के, कल्लू, कल्यान, अय्याज़ ये बाहर। मदारी के जोरू-बच्चे बदस्तूर, गोया मदारी मौजूद है। मियाँ घम्मन गए गए महीना भर से आ गए कि भूखा मरता हूँ। अच्छा भाई, तुम भी रहो। एक पैसे की आमद नहीं। बीस आदमी रोटी खाने वाले मौजूद। मेहनत वह है कि दिन-रात में फुर्सत काम से कम होती है। हमेशा एक फिक्र बराबर चली जाती है। आदमी हूँ, देव नहीं, भूत नहीं। इन रंजों का तहम्मुल क्योंकर करूँ? बुढ़ापा, जोफ़-ए-क़वा, अब मुझे देखो तो जानो कि मेरा क्या रंग है। शायद कोई दो-चार घड़ी बैठता हूँ, वरना पड़ा रहता हूँ, गोया साहिब-ए-फ़राश हूँ, न कहीं जाने का ठिकाना, न कोई मेरे पास आने वाला। वह अ़र्क जो ब-क़द्र-ए-ताक़त, बनाए रखता था, अब मुयस्सर नहीं।

सबसे बढ़कर, आमद आमद-ए-गवर्नमेंट का हंगामा है। दरबार में जाता था, ख़लह-ए-फ़ाख़िरा पाता था। वह सूरत अब नज़र नहीं आती। न मक़बूल हूँ, न मरदूद हूँ, न बेगुनाह हूँ, न गुनहगार हूँ, न मुख़बिर, न मुफ़सिद, भला अब तुम ही कहो कि अगर यहाँ दरबार हुआ और मैं बुलाया जाऊँ त नज़र कहाँ से लाऊँ। दो महीने दिन-रात खन-ए-जिगर खाया और एक क़सीदा चौंसठ बैत का लिखा। मुहम्मद फ़ज़ल मुसव्विर को दे दिया, वह पहली दिसंबर को मुझे दे देगा।

क्या करूँ? किसके दिल में अपना दिल डालूँ?


अभी जो हमने आपके पेश-ए-नज़र किया, वह और कुछ नहीं बल्कि किन्हीं यूसुफ़ मियाँ के नाम ग़ालिब का ख़त था। ग़ालिब के अहवाल (हालात) की जानकारी ग़ालिब के ख़तों से बखूबी मिलती है। इसलिए क्यों ना आज की महफ़िल में ग़ालिब के ख़तों का हीं मुआयना किया जाए। तो पेश है टुकड़ों में ग़ालिब के ख़त:

यह ख़त उन्होंने तब लिखा मालूम होता है, जब दिल्ली में अंग्रेजी फ़ौज़ों और हैज़ा दोनों का एक साथ आक्रमण हुआ था। ग़ालिब लिखते हैं:

पाँच लश्कर का हमला पै दर पै इस शहर पर हुआ। पहला बाग़ियों का लश्कर, उसमें पहले शहर का एतबार लुटा। दूसरा लश्कर ख़ाकियों का, उसमें जान-ओ-माल-नामूस व मकान व मकीन व आसमान व ज़मीन व आसार-ए-हस्ती सरासर लुट गए। तीसरा लश्कर का, उसमें हज़ारहा आदमी भूखे मरे।

चौथा लश्कर हैज़े का, उसमें बहुत-से पेट भरे मरे। पाँचवाँ लश्कर तप का, उसमें ताब व ताक़त अ़मूमन लुट गई। मरे आदमी कम, लेकिन जिसको तप आई, उसने फिर आज़ा में ताक़त न पाई। अब तक इस लश्कर ने शहर से कूच नहीं किया।

मेरे घर में दो आदमी तप में मुब्तिला हैं, एक बड़ा लड़का और एक मेरा दरोग़ा। ख़ुदा इन दोनों को जल्द सेहत दे।

जब शहर में बाढ आई तो ग़लिब ने लिखा:

मेंह का यह आलम है कि जिधर देखिए, उधर दरिया है। आफ़ताब का नज़र आना बर्क़ का चमकना है, यानी गाहे दिखाई दे जाता है। शहर में मकान बहुत गिरते हैं। इस वक़्त भी मेंह बरस रहा है। ख़त लिखता तो हूँ, मगर देखिए डाकघर कब जावे। कहार को कमल उढ़ाकर भेज दूँगा।

आम अब के साल ऐसे तबाह हैं कि अगर बमुश्किल कोई शख़्स दरख़्त पर चढ़े और टहनी से तोड़कर वहीं बैठकर खाए, तो भी सड़ा हुआ और गला हुआ पाए।

अंग्रेजों के हाथों कत्ल हुए अपने परिचितों का मातम करते हुए ग़ालिब लिखते हैं:

यह कोई न समझे कि मैं अपनी बेरौनक़ी और तबाही के ग़म में मरता हूँ। जो दुख मुझको है उसका बयान तो मालूम, मगर उस बयान की तरफ़ इशारा करता हूँ। अँग्रेज़ की क़ौम से जो इन रूसियाह कालों के हाथ से क़त्ल हुए, उसमें कोई मेरा उम्मीदगाह था और कोई मेरा शफ़ीक़ और कोई मेरा दोस्त और कोई मेरा यार और कोई मेरा शागिर्द, कुछ माशूक़, सो वे सबके सब खाक़ में मिल गए।

एक अज़ीज़ का मातम कितना सख्त होता है! जो इतने अज़ीज़ों का मातमदार हो, उसको ज़ीस्त क्योंकर न दुश्वार हो। हाय, इतने यार मरे कि जो अब मैं मरूँगा तो मेरा कोई रोने वाला भी न होगा।

एक और ख़त में ग़ालिब अपना दुखड़ा इस तरह व्यक्त करते हैं:

मेरा शहर में होना हुक्काम को मालूम है, मगर चूँकि मेरी तरफ़ बादशाही दफ्तर में से या मुख़बिरों के बयान से कोई बात पाई नहीं गई, लिहाज़ा तलबी नहीं हुई। वरना जहाँ बड़े-बड़े जागीरदार बुलाए हुए या पकड़े हुए आए हैं, मेरी क्या हक़ीकत थी। ग़रज़ कि अपने मकान में बैठा हूँ, दरवाजे से बाहर निकल नहीं सकता।

सवार होना या कहीं जाना तो बहुत बड़ी बात है। रहा यह कि कोई मेरे पास आवे, शहर में है कौन जो आवे? घर के घर बे-चराग़ पड़े हैं, मुजरिम सियासत पाए जाते हैं, जर्नेली बंदोबस्त 11 मई से आज तक, यानी 5 सितंबर सन् 1857 तक बदस्तूर है। कुछ नेक व बद का हाल मुझको नहीं मालूम, बल्कि हनूजल ऐसे अमूर की तरफ़ हुक्काम की तवज्जोह भी नहीं।

देखिए अंजाम-ए-कार क्या होता है। यहाँ बाहर से अंदर कोई बगैर टिकट का आने-जाने नहीं पाता। तुम ज़िनहार यहाँ का इरादा न करना। अभी देखना चाहिए, मुसलमानों की आबादी का हुक्म होता है या नहीं।

और अब ये जान लेते हैं कि ग़ालिब के ये ख़त आखिर छपे कैसे? तो इस बारे में "ग़ालिब के पत्र" नामक किताब की भूमिका में लिखा है:

उनकी आयु के अंतिम वर्षों में उनके एक शिष्य चौधरी अब्दुल गफ़ूर सुरूर ने उनके बहुत से पत्र एकत्र किए और उनको छापने के लिए ग़ालिब से आज्ञा माँगी। परंतु ग़ालिब इस बात पर सहमत न हुए। सुरूर के साथ-साथ ही मुंशी शिवनारायण 'आराम' और मुंशी हरगोपाल तफ़्ता ने भी इसी प्रकार की आज्ञा माँगी। ग़ालिब ने १८ नवंबर को मुंशी शिवनारायण को लिखा :

'उर्दू खतूत जो आप छपवाना चाहते हैं, यह भी ज़ायद बात है। कोई पत्र ही ऐसा होगा कि जो मैंने क़लम संभालकर और दिल लगाकर लिखा होगा। वरना सिर्फ़ तहरीर सरसरी है। क्या ज़रूरत है कि हमारे आपस के मुआमलात औरों पर ज़ाहिर हों। खुलासा यह कि इन रुक्क़आत का छापा मेरे खिलाफ़-ए-तबअ है।’

ऐसा प्रतीत होता है क मुंशी शिवनारायण और तफ़्ता ने ग़ालिब के पत्रों के छापने का इरादा छोड़ दिया। चौधरी अब्दुल ग़फूर सुरूर शायद इस कारण से रुक गए कि कुछ और पत्र मिल जाएँ। इस बात का अभी तक पता नहीं चला कि किस तरह मुंशी गुलाम ग़ौस ख़ाँ बेखबर ने ग़ालिब के पन्नों को छापने की आज्ञा ले ली। बल्कि बेख़बर की फरमाइश के अनुसार ग़ालिब ने अपने कुछ दोस्तों और शिष्यों को लिखकर अपने पत्रों की नकलें उनको भेजीं। ग़ालिब ने पत्रों के छापने की इजाज़त तो दे दी थी, परंतु वह चाहते यह थे कि इस संग्रह में उनके निजी पत्र शामिल न किए जाएँ।

इन ख़तों के बाद ग़ालिब के शेरों पर नज़र दौड़ा लिया जाए। यह तो सबपे जाहिर है कि ग़ालिब के शेर ख़तों से भी ज्यादा जानलेवा हैं:

बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना

हैफ़ उस चार गिरह कपड़े की क़िस्मत 'ग़ालिब'
जिसकी क़िस्मत में हो आशिक़ का गिरेबां होना


ग़ालिब के ख़त हुए, एक-दो शेर हो गए तो फिर आज की गज़ल क्योंकर पीछे रहे। तो आप सबों की खिदमत में पेश है "नक़्श फ़रियादी" एलबम से "मेहदी हसन" और "तरन्नुम नाज़" की आवाज़ों में ग़ालिब की यह सदाबहार गज़ल। गज़ल सुनाने से पहले हम इस बात का यकीन दिलाते चलें कि बस ग़ालिब हीं एक वज़ह हैं, जिस कारण से हम हर कड़ी में दूसरे फ़नकारों( जैसे कि यहाँ पर तरन्नुम नाज़) के बारे में कुछ बता नहीं पा रहे, क्या करें ग़ालिब से छूटें तो और कहीं ध्यान जाए, हाँ लेकिन एकबारगी ग़ालिब पर श्रृंखला खत्म होने दीजिए फिर हम रही सही सारी कसर पूरी कर देंगे। फिर भी अगर आपको कोई शिकायत हो तो टिप्पणियों के माध्यम से हमें इसकी जानकारी दें और अगर शिकायत न हों तो ऐसे हीं लुत्फ़ उठाते रहें। क्या ख्याल है?:

कब से हूँ क्या बताऊँ जहां-ए-ख़राब में
शब-हाए-हिज्र को भी रखूँ गर हिसाब में

ता फिर न इन्तज़ार में नींद आये उम्र भर
आने का ___ कर गये आये जो ख़्वाब में

मुझ तक कब उनकी बज़्म में आता था दौर-ए-जाम
साक़ी ने कुछ मिला न दिया हो शराब में

’ग़ालिब' छूटी शराब, पर अब भी कभी-कभी
पीता हूँ रोज़-ए-अब्र-ओ-शब-ए-माहताब में




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "तालीम" और शेर कुछ यूँ था-

पर्तौ-ए-खुर से है शबनम को फ़ना की तालीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होने तक

बहुत दिनों के बाद किसी ने सीमा जी को पछाड़ा। शरद जी "शान-ए-महफ़िल" बनने की बधाई स्वीकारें। और सीमा जी संभल जाईये.. आपसे मुकाबले के लिए शरद जी मैदान में उतर चुके हैं। यह रही शरद जी की पेशकश:

कहीं रदीफ़, कहीं काफ़िया, कहीं मतला,
शे’र के दाँव-पेच मक्ता-ओ-बहर क्या है ?
अगर मिले मुझे तालीम देने वाला कोई
तो देखना मैं बताऊंगा फिर ग़ज़ल क्या है ? (स्वरचित)

निर्मला जी और सुमित जी, महफ़िल में आने और प्रस्तुति पसंद करने के लिए आप दोनों का तह-ए-दिल से शुक्रिया।

मंजु जी बढिया लिखा है आपने। हाँ, शिल्प पर थोड़ा और काम कर सकती थीं आप, लेकिन कोई बात नहीं। ये रही आपकी पंक्तियाँ:

उनकी निगाहों से तालीम का सबक लेते हैं पर ,
जीवन के पन्ने को भरने के लिए सागर - सी स्याही भी कम पड़ जाती है . (स्वरचित)

नीलम जी और शन्नो जी, आप दोनों के कारण महफ़िल रंगीन बन पड़ी है। अपना प्यार (और डाँट-डपट भी) इसी तरह बनाए रखिएगा। शन्नो जी, मैं कोई गुस्सैल इंसान नहीं जिससे आप इतनी डरती रहें। आप दोनों से बस यही दरख्वास्त है कि बातों के साथ-साथ(या फिर बातों से ज्यादा) शेरो-शायरी को तवज्जो दिया करें (यह एक दरख्वास्त है, धमकी मत मान लीजियेगा...और हाँ नाराज़ भी मत होईयेगा)। ये रहीं आप दोनों की पंक्तियाँ क्रम से: (पहले शन्नो जी, फिर नीलम जी)

हरफन मौला ने पूरी तालीम से रखी दूरी
दवाओं से भी पहचान थी उनकी अधूरी
नीम हकीम खतरे जान बनकर ही सही
एक दिन उन्होंने की अपनी तमन्ना पूरी. (स्वरचित)

तालीम तो देना पर इतना इल्म भी देना उनको
बुजुर्गों कोदिलसे सिजदे का शऊर भी देना उनको (स्वरचित)

सीमा जी, आपके आने के बाद हीं मालूम पड़ता है कि महफ़िल जवान है, इसलिए कभी नदारद मत होईयेगा। ये रहे आपके शेर:

मकतब-ए-इश्क़ ही इक ऐसा इदारा है जहाँ
फ़ीस तालीम की बच्चों से नहीं ली जाती. (मुनव्वर राना)

दुनिया में कहीं इनकी तालीम नहीं होती
दो चार किताबों को घर में पढ़ा जाता है (बशीर बद्र)

अवनींद्र जी, महफ़िल के आप नियमित सदस्य हो चुके हैं। यह हमारे लिए बड़ी हीं खुशी की बात है। ये रहीं आपकी स्वरचित पंक्तियाँ:

तालीम तो ली थी मगर शहूर न आया
संजीदगी से चेहरे पे कभी नूर न आया
तह पड गयी जीभ मैं कलमा रटते रटते
तहजीब का इल्म फिर भी हुज़ूर न आया (स्वरचित )

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, February 10, 2010

खुशबू उड़ाके लाई है गेशु-ए-यार की.. अपने मियाँ आग़ा कश्मीरी के बोलों में रंग भरा मुख्तार बेग़म ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७०

मने अपनी महफ़िल में इस मुद्दे को कई बार उठाया है कि ज्यादातर शायर अपनी काबिलियत के बावजूद पर्दे के पीछे हीं रह जाते हैं। सारी की सारी मक़बूलियत इन नगमानिगारों के शेरों को, उनकी गज़लों को अपनी आवाज़ से मक़बूल करने वाले फ़नकारों के हिस्से में जाती है। लेकिन आज की महफ़िल में स्थिति कुछ अलग है। हम आज एक ऐसी फ़नकारा की बात करने जा रहे हैं जिनकी बदौलत एक अव्वल दर्ज़े की गायिका और एक अव्वल दर्ज़े की नायिका हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी अवाम को नसीब हुई। इस अव्वल दर्ज़े की गायिका से हम सारे परिचित हैं। हमने कुछ महिनों पहले इनकी दो नज़्में आपके सामने पेश की थीं। ये नज़्में थीं- जनाब अतर नफ़ीस की लिखी "वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया" और जनाब फ़ैयाज हाशमी की "आज जाने की जिद्द न करो"। आप अब तक समझ हीं गए होंगे कि हम किन फ़नकारा की बातें कर रहे हैं। वह फ़नकारा जिनकी गज़ल से आज की महफ़िल सजी है,वो इन्हीं जानीमानी फ़नकारा की बड़ी बहन हैं। तो दोस्तों छोटी बहन का नाम है- "फ़रीदा खानुम" और बड़ी बहन यानि की आज की फ़नकारा का नाम है "मुख्तार बेग़म"। मुख्तार बेग़म यूँ तो उतना नाम नहीं कमा सकीं, जितना नाम फ़रीदा का हुआ, लेकिन फ़रीदा को फ़रीदा बनाने में इनका बड़ा हीं हाथ था। फ़रीदा जब महज सात साल की थीं तभी उन्होंने अपनी बड़ी बहन मुख्तार बेग़म से "खयाल" सीखना शुरू कर दिया था। अब यह तो सभी जानते हैं कि फ़रीदा के गायन में "खयाल" का क्या स्थान है। इतना हीं नहीं.. ऐसी कई सारी गज़लें(जैसे कि आज की गज़ल हीं) और नज़्में हैं जिन्हें पहले मुख्तार बेग़म ने गाकर एक रास्ते की तामीर की और बाद में उसी रास्ते पर और उस रास्ते पर बने इनके पद-चिह्नों पर चलकर फ़रीदा खानुम ने गायिकी के नए आयाम स्थापित किए। यह अलग बात है कि आज के संगीत-रसिकों को इनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं ,लेकिन एक दौर था(१९३० और ४० के दशक में) जब इनकी गिनती चोटी के फ़नकारों में की जाती थी। मेहदी हसन साहब ने जिस वक्त गाना शुरू किया था, उस वक्त बेग़म अख्तर, उस्ताद बरकत अली खान और मुख़्तार बेग़म गज़ल-गायिकी के तीन स्तंभ माने जाते थे। इस बात से आप मुख्तार बेग़म की प्रतिभा का अंदाजा लगा सकते हैं। चलिए लगे हाथों हम मुख्तार बेग़म का एक छोटा-सा परिचय दिए देते हैं।

लोग इन्हें बस एक गायिका के तौर पर जानते हैं, लेकिन ये बँटवारे के पहले हिन्दुस्तानी फिल्मों की एक जानीमानी अभिनेत्री हुआ करती थीं। इन्होंने ३० और ४० के दशक में कई सारी फिल्मों में काम किया था, जिनमें "हठीली दुल्हन", "इन्द्र सभा", "हिन्दुस्तान" , "कृष्णकांत की वसीयत", "मुफ़लिस आशिक़", "आँख का नशा", "औरत का प्यार", "रामायण", "दिल की प्यास" और "मतवाली मीरा" प्रमुख हैं। १९४७ में पाकिस्तान चले जाने के बाद इन्होंने किसी भी फिल्म में काम नहीं किया, लेकिन ये गज़ल-गायिकी करती रहीं।

अभी हमने गायिका(फ़रीदा खानुम) की बात की, अब वक्त है उस नायिका की, जिसे लोग "रानी मुख्तार" के नाम से जानते हैं और वो इसलिए क्योंकि उस नायिका को नासिरा से रानी इन्होंने हीं बनाया था। नासिरा का जन्म इक़बाल बेग़म की कोख से ८ दिसम्बर १९४६ को लाहौर में हुआ था। नासिरा के अब्बाजान मुख्तार बेग़म के यहाँ ड्राईवर थे। अब चूँकि नासिरा के घर वाले उसका लालन-पालन करने में सक्षम नहीं थे इसलिए मुख्तार बेग़म ने उसे गोद ले लिया। मुख्तार बेग़म चाहती थीं कि नासिरा उन्हीं की तरह एक गायिका बने लेकिन नासिरा गायन से ज्यादा नृत्य की शौकीन थी। और इसलिए इन्होंने नासिरा को उस्ताद गु़लाम हुसैन और उस्ताद खुर्शीद से नृत्य की शिक्षा दिलवाई। एक दिन जब जानेमाने निर्देशक "अनवर कमाल पाशा" मुख्तार बेग़म के घर अपनी अगली फिल्म "सूरजमुखी" के फिल्मांकन के सिलसिले में आए तो उनकी नज़र नासिरा पर पड़ी और उन्होंने अपनी फिल्म में नासिरा से काम करवाने का निर्णय ले लिया। और इस तरह नासिरा फिल्मों में आ गईं। इस फिल्म में मुख्तार बेग़म ने गाने भी गाए थे। नासिरा को चूँकि मुख्तार बेग़म रानी बेटी कहकर पुकारती थीं, इसलिए नासिरा को रानी मुख्तार का नाम मिल गया। वैसे आपको शायद हीं यह पता हो कि जानीमानी अभिनेत्री और गायिका "नूर जहां" को यह नाम मुख्तार बेग़म ने हीं दिया था, जो कभी "अल्लाह वसई" हुआ करती थीं।

आज की फ़नकारा के बारे में ढेर सारी बातें हो गईं। अब क्यों न हम आज की गज़ल के गज़लगो से भी रूबरू हो लें। तो आज की गज़ल के गज़लगो कोई और नहीं "मुख्तार बेग़म" के पति जनाब "आग़ा हश्र कश्मीरी" हैं। "आग़ा" साहब का शुमार पारसी थियेटर के स्थापकों में किया जाता है। इन्होंने शेक्सपियर के "मर्चेंट आफ़ वेनीस" का जो उर्दू रूपांतरण किया था, वह आज भी उर्दू की एक अमूल्य कॄति के तौर पर गिनी जाती है.. और उस पुस्तक का नाम है "यहूदी की बेटी"। हमें इस बात का पक्का यकीन है कि आप इस पुस्तक से जरूर वाकिफ़ होंगे, भले हीं आप यह न जानते हों कि इसकी रचना "आग़ा" साहब ने हीं की थी। आग़ा साहब के बारे में बाकी बातें कभी अगली कड़ी में कड़ेंगे, अभी हम उनका लिखा एक शेर देख लते हैं:

वो मुक़द्दर न रहा और वो ज़माना न रहा
तुम जो बेगाने हुए, कोई यगाना न रहा।


इस शेर के बाद अब पेश है कि आज की वह गज़ल जिसके लिए हमने यह महफ़िल सजाई है। इस गज़ल को हमने "औरत का प्यार" फिल्म से लिया है, जिसका निर्देशन श्री ए० आर० करदर साहब ने किया था। यह गज़ल राग दरबारी में संगीतबद्ध की गई है। तो चलिए गज़ल की मासूमियत, गज़ल की रूमानियत के साथ-साथ इस राग की बारीकियों से भी रूबरू हो लिया जाए:

चोरी कहीं खुले ना नसीम-ए-बहार की,
खुशबू उड़ाके लाई है गेशु-ए-यार की।

गुलशन में देखकर मेरे मस्त-ए-शबाब को,
शरमाई जा रही है जवानी बहार की।

ऐ मेरे दिल के चैन मेरे दिल की रोशनी,
और सुबह कई दे शब-ए-इंतज़ार की।

जुर्रत तो देखिएगा नसीम-ए-बहार की,
ये भी बलाएँ लेने लगी जुल्फ़-ए-यार की।

ऐ ’हश्र’ देखना तो ये है चौदहवीं का चाँद,
या आसमां के हाथ में _____ यार की।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "मिज़ाज" और पंक्तियाँ कुछ इस तरह थीं -

मेरी ज़िन्दगी के चिराग का, ये मिज़ाज कुछ नया नहीं
अभी रोशनी अभी तीरगी, ना जला हुआ ना बुझा हुआ

बड़े हीं मिज़ाज से "मिज़ाज" शब्द की सबसे पहले शिनाख्त शरद जी ने की। शरद जी इस बार आपके अंदाज बदले-बदले से हैं। हर बार की तरह आपका खुद का लिखा शेर किधर है। चलिए कोई बात नहीं.. मुदस्सर हुसैन साहब का यह शेर भी किसी मामले में कम नहीं है:

गए दिनों में मुहब्बत मिज़ाज उसका था
मगर कुछ और ही अन्दाज़ आज उसका था।

निर्मला जी, हौसला-आफ़जाई के लिए आपका तहे-दिल से शुक्रिया। आप अपनी ये दुआएँ इसी तरह हमपे बनाए रखिएगा।

मंजु जी, क्या बात है! भला ऐसा कौन-सा हुजूर है, जिसका मिज़ाज इतनी खुशामदों के बाद भी नहीं बन रहा। अब और कितनी मिन्नतें चाहिए उसे:

मौहब्बत का मिजाज उनका अब तक ना बन सका ,
मेरे हजूर!क्या खता है हम से कुछ तो अर्ज कर . (स्वरचित)

सुमित जी, यह क्या... बस इसी कारण से आप हमारी महफ़िल से लौट जाते थे क्योंकि आपको दिए गए शब्द पर शेर नहीं आता था। आपको पता है ना कि यहाँ पर किनका लिखा शेर डालना है, ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। जब आप खुद कुछ लिख न पाएँ तो दूसरे का शेर हीं पेश कर दिया करें। जैसा कि आपने इस बार किया है:

कोइ हाथ भी ना मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।

ये रहे आपके पूछे हुए शब्दों के अर्थ:
पुख़्ताकार: निपुण
तीर ख़ता होना: तीर निशाने से चूक जाना

शन्नो जी, ऐसी क्या नाराज़गी थी कि आपने हमारी महफ़िल से मुँह हीं मोड़ लिया था। अब हम यह कितनी बार कितनों से कहें कि इस महफ़िल का जो संचालन कर रहा है (यानि कि मैं) वो खुद हीं इस लायक नहीं कि धुरंधरों के सामने टिक पाए.. फिर भी उसमें इतनी जिद्द है कि वो महफ़िल लेकर हर बार हाज़िर होता है। जब आपको किसी महफ़िल में शरीक होना हो तो इसमें कोई हानि नहीं कि आप खुद को भी एक धुरंधर मान बैठें, हाँ अगर आप किसी गज़ल की कक्षा में हैं तब आप एक शागिर्द बन सकती हैं। उम्मीद करता हूँ कि आप मेरी बात समझ गई होंगी। तो इसी खुशी में पेश है आपका यह ताज़ा-तरीन शेर:

जिन्दगी के मिजाज़ अक्सर बदलते रहते हैं
और हम उसे खुश करने में ही लगे रहते हैं.

लगता है कि पिछली महफ़िल में कही गई मेरी कुछ बातों से सीमा जी और शामिख साहब नाराज़ हो गएँ। अगर ऐसी बात है तो मैं मुआफ़ी चाहता हूँ। लौट आईये.. आप दोनों। आपके बिना यह महफ़िल अधूरी है।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, September 25, 2009

क्या टूटा है अन्दर अन्दर....इरशाद के बाद महफ़िल में गज़ल कही "शहज़ाद" ने...साथ हैं "खां साहब"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #४८

पिछली कड़ी में पूछे गए दो सवालों में से एक सवाल था "गुलज़ार" साहब के उस मित्र का नाम बताएँ जिसने गुलज़ार साहब के बारे में कहा था कि "कहीं पहले मिले हैं हम"। जहाँ तक हमें याद है हमने महफ़िल-ए-गज़ल की ३६वीं कड़ी में उन महाशय का परिचय "मंसूरा अहमद" के रूप में दिया था। जवाब के तौर पर सीमा जी, शरद जी और शामिख जी में बस सीमा जी ने हीं "मंसूरा अहमद" लिखा, बाकियों ने "मंसूरा" को शायद टंकण में त्रुटि समझकर "मंसूर" कर दिया। चाहते तो हम "मंसूर" को गलत उत्तर मानकर अंकों में कटौती कर देते, लेकिन हम इतने भी बुरे नहीं। इसलिए आप दोनों को भी पूरे अंक मिल रहे हैं। लेकिन आपसे दरख्वास्त है कि आगे से ऐसी गलती न करें। वैसे अगर आपने कहीं "मंसूर अहमद" पढ रखा है तो कृप्या हमें भी अवगत कराएँ ताकि हमें उनके बारे में और भी जानकारी मिले। अभी तो हमारे पास उन कविताओं के अलावा कुछ नहीं है। हाँ तो इस बात को मद्देनज़र रखते हुए पिछली कड़ी के अंकों का हिसाब कुछ यूँ बनता है: सीमा जी: ४ अंक, शरद जी: २ अंक, शामिख जी: १ अंक। अब बारी है आज के प्रश्नों की| तो ये रहे प्रतियोगिता के नियम और उसके आगे दो प्रश्न: ५० वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। अगर आपने पिछली कड़ियों को सही से पढा होगा तो आपको जवाब ढूँढने में मुश्किल नहीं होगी, नहीं तो आपको थोड़ी मेहनत करनी होगी। और हाँ, हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद २ अंक और उसके बाद हर किसी को १ अंक मिलेंगे। इन १० कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की ५ गज़लों की फरमाईश कर सकता है, वहीं दूसरे स्थान पर आने वाला पाठक अपनी पसंद की ३ गज़लों को सुनने का हक़दार होगा। इस तरह चुनी गई आठ गज़लों को हम ५३वीं से ६०वीं कड़ी के बीच पेश करेंगे। और साथ हीं एक बात और- जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) अपनी बहन "दिना" की जगह पर एक कार्यक्रम पेश करके संगीत की दुनिया में उतरने वाली एक फ़नकारा जिसे १९७४ में रीलिजे हुई एक फ़िल्म के टाईटल ट्रैक ने रातोंरात स्टार बना दिया। फ़नकारा के साथ-साथ उस फिल्म की भी जानकारी दें।
२) दो गायक बंधु जिनकी प्रसिद्धि के साथ भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का भी नाम जुड़ा है और जिनके बारे में कई लोगों को लगता है कि हसरत जयपुरी उनके पिता है। उन दोनों के साथ-साथ उनके पिता का भी नाम बताएँ।


आज हम जिस गज़ल को लेकर इस महफ़िल में हाज़िर हुए हैं, उस गज़ल को अपनी सधी हुई आवाज़ से सजाने वाले फ़नकार की तबियत आजकल कुछ नासाज़ चल रही है। यूँ तो इस फ़नकार की एक गज़ल हम आपको पहले हीं सुनवा चुके हैं, लेकिन उस समय हमने इनके बारे में ज्यादा बातें नहीं की थी या यूँ कहिए कि हम उस कड़ी में बस उनका जीवन-वृंतात हीं समेट पाए थे। हमने सोचा कि क्यों न आज कुछ हटकर बातें की जाए। इस लिहाज़ से उनके स्वास्थ्य के बारे में बात करना सबसे जरूरी हो जाता है। २९ मार्च २००९ को उनके बारे में नवभारत टाईम्स में यह खबर आई थी: १९२७ में राजस्थान के लूना में जन्मे मेहदी हसन नौ बरस पहले पैरलाइसिस के चलते मौसिकी से दूर हो गए थे। फिलहाल, वह फेफड़ों के संक्रमण के कारण पिछले डेढ़ महीने से कराची के आगा खान यूनिवर्सिटी अस्पताल में भर्ती हैं, लेकिन जल्दी ही उन्हें छुट्टी मिलने वाली है क्योंकि उनका परिवार मेडिकल बिल भरने में असमर्थ है। उनके बेटे आरिफ हसन ने कराची से को दिए इंटरव्यू में कहा, एक बार हिन्दुस्तान आना चाहते हैं। लता से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी गजल के इस बादशाह के मुरीदों में शामिल हैं। आरिफ ने बताया, लताजी को उनकी बीमारी के बारे में पता चला तो उन्होंने मुंबई आकर इलाज कराने की पेशकश की। उन्होंने खुद सारा खर्च उठाने की भी बात कही। उनके भतीजे आदिनाथ ने हमें फोन किया था। उन्होंने बताया कि २००२ में तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने भी पत्र लिखकर हसन के जल्दी ठीक होने की कामना की थी। उन्होंने भी हिन्दुस्तान सरकार की ओर से हरसंभव मदद का प्रस्ताव रखा था। आरिफ ने कहा, हसन साहब ने फन की सौदेबाजी नहीं की लिहाजा पैसा कभी जोड़ नहीं पाए। रेकॉर्डिंग कंपनियों से मिलने वाला पैसा ही आय का मुख्य जरिया था जो उस समय बहुत कम होता था। शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचने पर भी उन्हें सीखने का जुनून रहा। उनका कहना है कि संगीत तो एक समंदर की तरह है जितना इसमें उतरा, उतना ही अपने अज्ञान का पता चलता है। अफज़ल सुभानी ,जो अपने बारे में कहते हैं कि "पाकिस्तान से बाहर का मैं पहला शागिर्द हूं, जिसे मेहदी हसन साहब ने गंडा बांध कर विधिवत शिष्य बनाया है", मेहदी साहब की हालत से बड़े हीं परेशान नज़र आते हैं। मेहदी साहब की बात चलने पर कुछ याद करके वो कहते हैं: मुझे आज भी याद है, जब हमने उनके लकवाग्रस्त होने के बाद फोन पर बात की थी। मैं उनकी महान आवाज़ नहीं पहचान पाया। मैं रो पड़ा। लकवा ने उनके वोकल कॉर्डस पर असर डाला था. पर बहुत ही कम समय में वो समय भी आया जब उन्होंने अपनी उसी आवाज़ में घोषणा की “मेरी आवाज़ वापस आ गई है”, मैंने उन्हें इतना खुश कभी नहीं सुना।" आखिर कौन होगा जिसे मेहदी साहब की फ़िक्र न होगी। हमारे हिन्दुस्तान, पाकिस्तान या यूँ कहिए कि पूरे विश्व के लिए वे एक धरोहर के समान हैं। हमारी तो यही दुआ है कि वे फिर से उसी रंग में वापस आ जाएँ, जिसके लिए उन्हें जाना जाता है।

आकाशवाणी से प्रकाशित एक भेंटवार्ता के दौरान मन्ना डे साहब से जब यह पूछा गया कि "इतनी अधिक सफलता, लोकप्रियता, पुरस्कार, मान-सम्मान सभी कुछ मिलने के बाद भी क्या आपके मन में कोई इच्छा ऐसी है जो अभी भी पूरी नहीं हुई है"। तो उनका उत्तर कुछ यूँ था: हां! दो इच्छाएं अभी भी मेरे मन में हैं। एक तो यह कि मैं अपने अंतिम समय में मोहम्मद रफ़ी के गाये गीतों को सुनता रहूं, और दूसरी यह कि मैं कभी मेहदी हसन की तरह ग़ज़ल गा सकूं| संगीत की देवी के दो लाडले बेटों को इस कदर याद करना खुद मन्ना दा की संगीत-साधना को दर्शाता है। इसी तरह की एक भेंटवार्ता में मेहदी साहब से जब यह पूछा गया था कि "क्या मुल्कों को बाँटने वाली सरहदें बेवजह हैं?" तो उन्होंने कहा था कि "हाँ बेकार की चीज़े हैं ये सरहदें, पर जो अल्लाह को मंज़ूर होता है वही होता है"। वैसे भी संगीत-प्रेमियों के लिए सरहद कोई मायने नहीं रखती और यही कारण है कि हम भी फ़नकारों से यही उम्मीद रखते हैं कि उनकी गायकी में सरहदों की सोच उभरती नहीं होगी। यूँ तो कई जगहों पर और कई बार मेहदी साहब ने यह तमन्ना ज़ाहिर की है कि वे हिन्दुस्तान आना चाहते हैं(क्योंकि हिन्दुस्तान उनकी सरजमीं है, उनका अपना मुल्क है जिसकी गोद में उन्होंने अपना बचपन गुजारा है), फिर भी कुछ लोग यह कहते हैं कि मेहदी साहब तरह-तरह के विवादास्पद बयान देकर हिंदुस्तान के कुछ श्रेष्ठतम कलाकारों की बेइज्जती का प्रयास करते रहे हैं। हम यहाँ पर कोई निष्कर्ष नहीं निकालना चाहते लेकिन उन घटनाओं को लोगों के सामने रखनें में कोई बुराई नहीं है। "शहंशाहे-गज़ल - मेहदी हसन" शीर्षक से प्रकाशित एक आलेख में ऐसे हीं कुछ वाक्यात जमा हैं(सौजन्य: सृजनगाथा): उनका एक बयान कि "हिंदुस्तान में किसी को गाना ही नहीं आता है", विश्व प्रसिद्ध गायक मोहम्मद रफ़ी को आहत कर गया था; जबकि उनका दूसरा बयान कि "हिंदुस्तान की गायिकाएं कोठेवाली गायिकाएं हैं", स्वर-सम्राज्ञी लता मंगेश्कर को भी दुखी कर गया था। प्रख्यात संगीतकार निर्देशक ख़्य्याम से तो मेहदी हसन की ज़बरदस्त झड़प अनगिनत प्रतिष्ठित कलाकारों के सामने ही हो गयी थी। मेहदी हसन ने ख़य्याम से मशहूर गायक मुकेश के बारे में कह दिया था कि "ख़य्याम साहब, आप जैसे गुणी म्यूज़िक डायरेक्टर को एक बेसुरे आदमी से गीत गवाने की क्या ज़रूरत है"। ख़य्याम ने सरेआम मेहदी हसन को बहुत बुरी तरह डांट दिया था और बात बिगड़ती देखकर कुछ महत्वपूर्ण कलाकारों ने ख़य्याम और मेहदी हसन को एक-दूसर से काफ़ी दूर हटा दिया।" हमारा मानना है कि हर फ़नकार के साथ अच्छी और बुरी दोनों तरह की बातें जुड़ी होती हैं। फ़नकार का व्यक्तित्व जिस तरह का भी हो, हमें बस उसकी फ़नकारी से मतलब रखना चाहिए। अगर फ़नकार दिल से अच्छा हो तो वह एक तरह से अपना हीं भला करता है, नहीं तो सभी जानते हैं कि प्रशंसकों की याद्दाश्त कितनी कम होती है! चलिए, हसन साहब (खां साहब) के बारे में बहुत बातें हो गईं। हम अब आज की गज़ल के गज़लगो को याद कर लेते हैं। इस गज़ल को लिखा है "फ़रहत शहज़ाद" ने, जिनकी कई सारी गज़लें मेहदी हसन साहब ने गाई हैं। हम जल्द हीं इनके बारे में भी आलेख लेकर हाज़िर होंगे। आज बस उनके लिखे इस शेर से काम चला लेते हैं:

फ़ैसला तुमको भूल जाने का,
एक नया ख्वाब है दीवाने का।


और यह रही आज़ की गज़ल। "नियाज़ अहमद" के संगीत से सनी इस गज़ल को हमने लिया है "कहना उसे" एलबम से। तो आनंद लीजिए हमारी आज की पेशकश का:

क्या टूटा है अन्दर अन्दर क्यूँ चेहरा कुम्हलाया है
तन्हा तन्हा रोने वालो कौन तुम्हें याद आया है

चुपके चुपके सुलग़ रहे थे याद में उनकी दीवाने
इक तारे ने टूट के यारो क्या उनको समझाया है

रंग बिरंगी इस महफ़िल में तुम क्यूँ इतने चुप चुप हो
भूल भी जाओ पागल लोगो क्या खोया क्या पाया है

शेर कहाँ है ख़ून है दिल का जो लफ़्ज़ों में बिखरा है
दिल के ज़ख़्म दिखा कर हमने महफ़िल को गर्माया है

अब 'शहज़ाद' ये झूठ न बोलो वो इतना बेदर्द नहीं
अपनी चाहत को भी परखो गर इल्ज़ाम लगाया है




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

मुसीबत का पहाड़ आखिर किसी दिन कट ही जायेगा
मुझे सर मार कर ___ के मर जाना नहीं आता ...


आपके विकल्प हैं -
a) दीवार , b) पत्थर, c) तेशे, d) आरी

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "आईना" और शेर कुछ यूं था -

वो मेरा आईना है मैं उसकी परछाई हूँ,
मेरे ही घर में रहता है मुझ जैसा ही जाने कौन....

निदा फ़ाज़ली साहब के इस शेर को सबसे पहले सही पहचाना सीमा जी ने। सीमा जी, आप पिछली न जाने कितनी कड़ियों से हमारी महफ़िल की शान बनी हुई हैं। आगे भी ऐसा हीं हो, यही दुआ है। आपने कुछ शेर महफ़िल के सुपूर्द किए:

हर एक चेहरे को ज़ख़्मों का आईना न कहो|
ये ज़िन्दगी तो है रहमत इसे सज़ा न कहो| (राहत इन्दौरी)

यही कहा था मेरे हाथ में है आईना
तो मुझपे टूट पड़ा सारा शहर नाबीना। (अहमद फ़राज़)

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में
आईना हमें देख के हैरान सा क्यूँ है। (शहरयार)

सीमा जी के बाद महफ़िल में हाज़िरी लगाई शरद जी ने। आपने अपने विशेष अंदाज में दो शेर पेश किए:

पुराने आइने में शक्ल कुछ ऐसी नज़र आई
कभी तिरछी नज़र आई कभी सीधी नज़र आई
लुटी जब आबरु उसकी तो मैं भी चुप लगा बैठा
मग़र फिर ख्वाब में अपनी बहन बेटी नज़र आई। (आह!!!)

शामिख जी, आपकी पेशकश भी कमाल की रही। ये रही बानगी:

बस उसी दिन से खफा है वो मेरा इक चेहरा
धूप में आइना इक रोज दिखाया था जिसे। (कुँवर बेचैन)

अब मोहब्बत की जगह दिल में ग़मे-दौरां है
आइना टूट गया तेरी नज़र होने तक। (कृष्ण बिहारी नूर)

मंजु जी, वाकई चेहरा ज़िंदगी का सच बतलाता है। आप अपनी बात कहने में सफ़ल हुई हैं:

चेहरा है आईना जिन्दगी का ,
सच है बतलाता जिन्दगी का।

अवध जी, आपने महफ़िल में पहली मर्तबा तशरीफ़ रखा, इसलिए आपका विशेष स्वागत है। आपने "अनवर" और "आशा सचदेव" के बारे में जो कुछ हमसे पूछा है, उसका जवाब देने में हम असमर्थ हैं। कारण यह कि अनवर साहब के व्यक्तिगत साईट पर भी ऐसा कुछ नहीं लिखा। आप यहाँ देखें। साथ हीं पेश है आपका यह शेर:

आइना देख अपना सा मुंह ले कर रह गए.
साहेब को दिल न देने पे कितना गुरूर था.

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, August 4, 2009

कैसे छुपाऊँ राज़-ए-ग़म...आज की महफ़िल में पेश हैं "मौलाना" के लफ़्ज़ और दर्द-ए-"अज़ीज़"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३५

पिछली महफ़िल में किए गए एक वादे के कारण शरद जी की पसंद की तीसरी गज़ल लेकर हम हाज़िर न हो सके। आपको याद होगा कि पिछली महफ़िल में हमने दिशा जी की पसंद की गज़लों का ज़िक्र किया था और कहा था कि अगली गज़ल दिशा जी की फ़ेहरिश्त से चुनी हुई होगी। लेकिन शायद समय का यह तकाज़ा न था और कुछ मजबूरियों के कारण हम उन गज़लों/नज़्मों का इंतजाम न कर सके। अब चूँकि हम वादाखिलाफ़ी कर नहीं सकते थे, इसलिए अंततोगत्वा हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि क्यों न आज अपने संग्रहालय में मौजूद एक गज़ल हीं आप सबके सामने पेश कर दी जाए। हमें पूरा यकीन है कि अगली महफ़िल में हम दिशा जी को निराश नहीं करेंगे। और वैसे भी हमारी आज़ की गज़ल सुनकर उनकी नाराज़गी पल में छू हो जाएगी, इसका हमें पूरा विश्वास है। तो चलिए हम रूख करते हैं आज़ की गज़ल की ओर जिसे मेहदी हसन साहब की आवाज़ में हम सबने न जाने कितनी बार सुना है लेकिन आज़ हम जिन फ़नकार की आवाज़ में इसे आप सबके सामने पेश करने जा रहे हैं, उनकी बात हीं कुछ अलग है। आप सबने इनकी मखमली आवाज़ जिसमें दर्द का कुछ ज्यादा हीं पुट है, को फिल्म डैडी के "आईना मुझसे मेरी पहली-सी सूरत माँगे" में ज़रूर हीं सुना होगा। उसी दौरान की "वफ़ा जो तुमसे कभी मैने निभाई होती", "फिर छिड़ी बात रात फूलों की", "ज़िंदगी जब भी तेरी बज़्म में" या फिर "ना किसी की आँख का" जैसी नज़्मों में इनकी आवाज़ खुलकर सामने आई है। मेहदी हसन साहब के शागिर्द इन महाशय का नाम पंकज़ उधास और अनूप जलोटा की तिकड़ी में सबसे ऊपर लिया जाता है। ९० के दशक में जब गज़लें अपने उत्तरार्द्ध पर थी, तब भी इन फ़नकारों के कारण गज़ल के चाहने वालों को हर महीने कम से कम एक अच्छी एलबम सुनने को ज़रूर हीं नसीब हो जाया करती थीं।

जन्म से "तलत अब्दुल अज़ीज़ खान" और फ़न से "तलत अज़ीज़" का जन्म १४ मई १९५५ को हैदराबाद में हुआ था। इनकी माँ साजिदा आबिद उर्दू की जानीमानी कवयित्री और लेखिका थीं, इसलिए उर्दू अदब और अदीबों से इनका रिश्ता बचपन में हीं बंध गया था। इन्होंने संगीत की पहली तालीम "किराना घराना" से ली थी, जिसकी स्थापना "अब्दुल करीम खान साहब" के कर-कलमों से हुई थी। उस्ताद समाद खान और उस्ताद फ़याज़ अहमद से शिक्षा लेने के बाद इन्होंने मेहदी हसन की शागिर्दगी करने का फ़ैसला लिया और उनके साथ महफ़िलों में गाने लगे। शायद यही कारण है कि मेहदी साहब द्वारा गाई हुई अमूमन सारी गज़लों के साथ इन्होंने अपने गले का इम्तिहान लिया हुआ है। हैदराबाद के "किंग कोठी" में इन्होंने सबसे पहला बड़ा प्रदर्शन किया था। लगभग ५००० श्रोताओं के सामने इन्होंने जब "कैसे सुकूं पाऊँ" गज़ल को अपनी आवाज़ से सराबोर किया तो मेहदी हसन साहब को अपने शागिर्द की फ़नकारी पर यकीन हो गया। स्नातक करने के बाद ये मुंबई चले आए जहाँ जगजीत सिंह से इनकी पहचान हुई। कुछ हीं दिनों में जगजीत सिंह भी इनकी आवाज़ के कायल हो गए और न सिर्फ़ इनके संघर्ष के साथी हुए बल्कि इनकी पहली गज़ल के लिए अपना नाम देने के लिए भी राज़ी हो गए। "जगजीत सिंह प्रजेंट्स तलत अज़ीज़" नाम से इनकी गज़लों की पहली एलबम रीलिज हुई। इसके बाद तो जैसे गज़लों का तांता लग गया। तलत अज़ीज़ यूँ तो जगजीत सिंह के जमाने के गायक हैं, लेकिन इनकी गायकी का अंदाज़ मेहदी हसन जैसे क्लासिकल गज़ल-गायकी के पुरोधाओं से मिलता-जुलता है। आज की गज़ल इस बात का साक्षात प्रमाण है। लगभग १२ मिनट की इस गज़ल में बस तीन हीं शेर हैं, लेकिन कहीं भी कोई रूकावट महसूस नहीं होती, हरेक लफ़्ज़ सुर और ताल में इस कदर लिपटा हुआ है कि क्षण भर के लिए भी श्रवणेन्द्रियाँ टस से मस नहीं होतीं। आज तो हम एक हीं गज़ल सुनवा रहे हैं लेकिन आपकी सहायता के लिए इनकी कुछ नोटेबल एलबमों की फ़ेहरिश्त यहाँ दिए देते हैं: "तलत अज़ीज़ लाईव" , "इमेजेज़", "बेस्ट आफ़ तलत अज़ीज़", "लहरें", "एहसास", "सुरूर", "सौगात", "तसव्वुर", "मंज़िल", "धड़कन", "शाहकार", "महबूब", "इरशाद", "खूबसूरत" और "खुशनुमा"। मौका मिले तो इन गज़लों का लुत्फ़ ज़रूर उठाईयेगा... नहीं तो हम हैं हीं।

चलिए अब गुलूकार के बाद शायर की तरफ़ रूख करते हैं। इन शायर को अमूमन लोग प्रेम का शायर समझते हैं, लेकिन प्रोफ़ेसर शैलेश ज़ैदी ने इनका वह रूप हम सबके सामने रखा है, जिससे लगभग सभी हीं अपरिचित थे। ये लिखते हैं: भारतीय स्वाधीनता के इतिहास में हसरत मोहानी (१८७५-१९५१) का नाम भले ही उपेक्षित रह गया हो, उनके संकल्पों, उनकी मान्यताओं, उनकी शायरी में व्यक्त इन्क़लाबी विचारों और उनके संघर्षमय जीवन की खुरदरी लयात्मक आवाजों की गूंज से पूर्ण आज़ादी की भावना को वह ऊर्जा प्राप्त हुई जिसकी अभिव्यक्ति का साहस पंडित जवाहर लाल नेहरू नौ वर्ष बाद १९२९ में जुटा पाये. प्रेमचंद ने १९३० में उनके सम्बन्ध में ठीक ही लिखा था "वे अपने गुरु (बाल गंगाधर तिलक) से भी चार क़दम और आगे बढ़ गए और उस समय पूर्ण आज़ादी का डंका बजाया, जब कांग्रेस का गर्म-से-गर्म नेता भी पूर्ण स्वराज का नाम लेते काँपता था. मुसलमानों में गालिबन हसरत ही वो बुजुर्ग हैं जिन्होंने आज से पन्द्रह साल क़ब्ल, हिन्दोस्तान की मुकम्मल आज़ादी का तसव्वुर किया था और आजतक उसी पर क़ायम हैं. नर्म सियासत में उनकी गर्म तबीअत के लिए कोई कशिश और दिलचस्पी न थी" हसरत मोहानी ने अपने प्रारंभिक राजनीतिक दौर में ही स्पष्ट घोषणा कर दी थी "जिनके पास आँखें हैं और विवेक है उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि फिरंगी सरकार का मानव विरोधी शासन हमेशा के लिए भारत में क़ायम नहीं रह सकता. और वर्त्तमान स्थिति में तो उसका चन्द साल रहना भी दुशवार है." स्वराज के १२ जनवरी १९२२ के अंक में हसरत मोहनी का एक अध्यक्षीय भाषण दिया गया है. यह भाषण हसरत ने ३० दिसम्बर १९२१ को मुस्लिम लीग के मंच से दिया था- "भारत के लिए ज़रूरी है कि यहाँ प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली अपनाई जाय. पहली जनवरी १९२२ से भारत की पूर्ण आज़ादी की घोषणा कर दी जाय और भारत का नाम 'यूनाईटेड स्टेट्स ऑफ़ इंडिया' रखा जाय." ध्यान देने की बात ये है कि इस सभा में महात्मा गाँधी, हाकिम अजमल खां और सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे दिग्गज नेता उपस्थित थे. सच्चाई यह है कि हसरत मोहानी राजनीतिकों के मस्लेहत पूर्ण रवैये से तंग आ चुके थे. एक शेर में उन्होंने अपनी इस प्रतिक्रिया को व्यक्त भी किया है-

लगा दो आग उज़रे-मस्लेहत को
के है बेज़ार अब इस से मेरा दिल

हसरत मोहानी का मूल्यांकन भारतीय स्वाधीनता के इतिहास में अभी नहीं हुआ है. किंतु मेरा विश्वास है कि एक दिन उन्हें निश्चित रूप से सही ढंग से परखा जाएगा.
जनाब हसरत मोहानी का दिल जहाँ देश के लिए धड़कता था, वहीं माशुका के लिए भी दिल का एक कोना उन्होंने बुक कर रखा था तभी तो वे कहते हैं कि:

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है,
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है।


उन्नाव के पास मोहान में जन्मे "सैयद फ़ज़ल उल हसन" यानि कि मौलाना हसरत मोहानी ने बँटवारे के बाद भी हिन्दुस्तान को हीं चुना और मई १९५१ में लखनऊ में अपनी अंतिम साँसें लीं। ऐसे देशभक्त को समर्पित है हमारी आज़ की महफ़िल-ए-गज़ल। मुलाहज़ा फ़रमाईयेगा:

कैसे छुपाऊं राजे-ग़म, दीदए-तर को क्या करूं
दिल की तपिश को क्या करूं, सोज़े-जिगर को क्या करूं

शोरिशे-आशिकी कहाँ, और मेरी सादगी कहाँ
हुस्न को तेरे क्या कहूँ, अपनी नज़र को क्या करूं

ग़म का न दिल में हो गुज़र, वस्ल की शब हो यूं बसर
सब ये कुबूल है मगर, खौफे-सेहर को क्या करूं

हां मेरा दिल था जब बतर, तब न हुई तुम्हें ख़बर
बाद मेरे हुआ असर अब मैं असर को क्या करूं




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

अपनी तबाहियों का मुझे कोई __ नहीं,
तुमने किसी के साथ मोहब्बत निभा तो दी...


आपके विकल्प हैं -
a) दुःख, b) रंज, c) गम, d) मलाल

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "रूह" और शेर कुछ यूं था -

रुह को दर्द मिला, दर्द को ऑंखें न मिली,
तुझको महसूस किया है तुझे देखा तो नहीं।

इस शब्द पर सबसे पहले मुहर लगाई दिशा जी ने, लेकिन सबसे पहले शेर लेकर हाज़िर हुए सुजाय जी। सुजाय जी आपका हमारी महफ़िल में स्वागत है, लेकिन यह क्या रोमन में शेर...देवनागरी में लिखिए तो हमें भी आनंद आएगा और आपको भी।

अगले प्रयास में दिशा जी ने यह शेर पेश किया:

काँप उठती है रुह मेरी याद कर वो मंजर
जब घोंपा था अपनों ने ही पीठ में खंजर

शरद जी का शेर कुछ यूँ था:

हरेक रूह में इक ग़म छुपा लगे है मुझे,
ए ज़िन्दगी तू कोई बददुआ लगे है मुझे।

हर बार की तरह इस बार भी शामिख जी ने हमें शायर के नाम से अवगत कराया। इसके साथ-साथ मुजफ़्फ़र वारसी साहब की वह गज़ल भी प्रस्तुत की जिससे यह शेर लिया गया है:

मेरी तस्वीर में रंग और किसी का तो नहीं
घेर लें मुझको सब आ के मैं तमाशा तो नहीं

ज़िन्दगी तुझसे हर इक साँस पे समझौता करूँ
शौक़ जीने का है मुझको मगर इतना तो नहीं

रूह को दर्द मिला, दर्द को आँखें न मिली
तुझको महसूस किया है तुझे देखा तो नहीं

सोचते सोचते दिल डूबने लगता है मेरा
ज़हन की तह में 'मुज़फ़्फ़र' कोई दरिया तो नही.

शामिख साहब, आपका किन लफ़्ज़ों में शुक्रिया अदा करूँ! गज़ल के साथ-साथ आपने ’रूह’ शब्द पर यह शेर भी हम सबके सामने रखा:

हम दिल तो क्या रूह में उतरे होते
तुमने चाहा ही नहीं चाहने वालों की तरह

’अदा’ जी वारसी साहब के रंग में इस कदर रंग गईं कि उन्हें ’रूह’ लफ़्ज़ का ध्यान हीं नहीं रहा। खैर कोई बात नहीं, आपने इसी बहाने वारसी साहब की एक गज़ल पढी जिससे हमारी महफ़िल में चार चाँद लग गए। उस गज़ल से एक शेर जो मुझे बेहद पसंद है:

सोचता हूँ अब अंजाम-ए-सफ़र क्या होगा
लोग भी कांच के हैं राह भी पथरीली है

रचना जी, मंजु जी और सुमित जी का भी तह-ए-दिल से शुक्रिया। आप लोग जिस प्यार से हमारी महफ़िल में आते है, देखकर दिल को बड़ा हीं सुकूं मिलता है। आप तीनों के शेर एक हीं साँस में पढ गया:

नाम तेरा रूह पर लिखा है मैने
कहते हैं मरता है जिस्म रूह मरती नहीं।
रूह काँप जाती है देखकर बेरुखी उनकी
अरे! कब आबाद होगी दिल लगी उनकी।
रूह को शाद करे,दिल को जो पुरनूर करे,
हर नज़ारे में ये तन्जीर कहाँ होती है।

मनु जी, आप तो गज़लों के उस्ताद हैं। शेर कहने का आपका अंदाज़ औरों से बेहद अलहदा होता है। मसलन:

हर इक किताब के आख़िर सफे के पिछली तरफ़
मुझी को रूह, मुझी को बदन लिखा होगा

कुलदीप जी ने जहाँ वारसी साहब की एक और गज़ल महफ़िल-ए-गज़ल के हवाले की, वहीं जॉन आलिया साहब का एक शेर पेश किया, जिसमें रूह आता है:

रूह प्यासी कहां से आती है
ये उदासी कहां से आती है।

शामिख साहब के बाद कुलदीप जी धीरे-धीरे हमारी नज़रों में चढते जा रहे हैं। आप दोनों का यह हौसला देखकर कभी-कभी दिल में ख्याल आता है कि क्यों न महफ़िल-ए-गज़ल की एक-दो कड़ियाँ आपके हवाले कर दी जाएँ। क्या कहते हैं आप। कभी इस विषय पर आप दोनों से अलग से बात करेंगे।

चलिए इतनी सारी बातों के बाद आप लोगों को अलविदा कहने का वक्त आ गया है। अगली महफ़िल तक के लिए खुदा हाफ़िज़!
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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