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Saturday, March 18, 2017

चित्रकथा - 10: हिन्दी फ़िल्मों में शहीद भगत सिंह का प्रिय देशभक्ति गीत


अंक - 10

हिन्दी फ़िल्मों में शहीद भगत सिंह का प्रिय देशभक्ति गीत

मेरा रंग दे बसंती चोला...



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 

23 मार्च का दिन हर भारतीय के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। आज ही के दिन सन् 1931 में सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को शहीदी प्राप्त हुई थी। 1919 में जलियाँवाला बाग़ के जघन्य हत्याकांड की दर्दनाक यादें बालपन से भगत सिंह के मन में घर कर गई थी। और 1928 में जब लाला लाजपत राय की ब्रिटिश लाठीचार्ज की वजह से मृत्यु हो गई तब भगत सिंह और उनके साथियों का ख़ून खौल उठा। अपने देशवासियों को न्याय दिलाना उनके जीवन का एकमात्र मक्सद बन गया। जेनरल सौन्डर्स को गोलियों से भून कर इन तीन जवानों ने देश के अपमान का बदला लिया। अमर शहीद हो गए भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु। ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ आप तीनों अमर शहीदों को करती है झुक कर सलाम। आज ’चित्रकथा’ में प्रस्तुत है शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह के मनपसन्द देशभक्ति गीत "मेरा रंग दे बसंती चोला" का इतिहास और एक नज़र डालें उन हिन्दी फ़िल्मों पर जिनमें इस गीत को शामिल किया गया है।




स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में 'काकोरी काण्ड' के बारे में तो आपने ज़रूर सुना ही होगा। 9 अगस्त
1925 में पंडित राम प्रसाद बिसमिल और उनके क्रान्तिकारी साथियों ने मिल कर शाहजहानपुर-लखनऊ ट्रेन लूटने की घटना को 'काकोरी काण्ड' के नाम से जाना जाता है। सभी 19 क्रान्तिकारी पकड़े गए, जेल हुई। इसके करीब दो साल बाद की बात है। अर्थात्‍ साल 1927 की बात। बसन्त का मौसम था। लखनऊ के केन्द्रीय कारागार (Lucknow Central Jail) के 11 नंबर बैरक में ये 19 युवा क्रान्तिकारी एक साथ बैठे हुए थे। इनमें से किसी ने पूछा, "पंडित जी, क्यों न हम बसन्त पर कोई गीत बनायें?" और पंडित जी और साथ बैठे सारे जवानों ने मिल कर एक ऐसे गीत की रचना कर डाली जो इस देश के स्वाधीनता संग्राम का एक अभिन्न अंग बन कर रह गया। और वह गीत था "मेरा रंग दे बसन्ती चोला, माये रंग दे", मूल लेखक पंडित राम प्रसाद बिसमिल। सह-लेखक की भूमिका में उनके मित्रगण थे जिनमें प्रमुख नाम हैं अश्फ़ाकुल्लाह ख़ान, ठाकुर रोशन सिंह, सचिन्द्र नाथ बक्शी और राम कृष्ण खत्री। अन्य 14 साथियों के नाम तो उपलब्ध नहीं हैं, पर उनका भी इस गीत की रचना में अमूल्य योगदान अवश्य रहा होगा! इस गीत के मुखड़े का अर्थ है "ऐ माँ, तू हमारे चोले, या पगड़ी को बासन्ती रंग में रंग दे"; इसका भावार्थ यह है कि ऐ धरती माता, तू हम में अपने प्राण न्योछावर करने की क्षमता उत्पन्न कर। बासन्ती रंग समर्पण का रंग है, बलिदान का रंग है। बिसमिल ने कितनी सुन्दरता से बसन्त और बलिदान को एक दूसरे से मिलाकार एकाकार कर दिया है! इस गीत ने आगे चल कर ऐसी राष्ट्रीयता की ज्वाला प्रज्वलित की कि जन-जागरण और कई क्रान्तिकारी गतिविधियों का प्रेरणास्रोत बना। यहाँ तक कि शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह का पसन्दीदा देशभक्ति गीत भी यही गीत था, और 23 मार्च 1931 के दिन फाँसी की बेदी तक पैदल जाते हुए वो इसी गीत को गाते चले जा रहे थे। आश्चर्य की बात है कि वह भी बसन्त का ही महीना था। भले ही इस गीत को राम प्रसाद बिसमिल ने लिखे हों, पर आज इस गीत को सुनते ही सबसे पहले शहीद भगत सिंह का स्मरण हो आता है। 

हिन्दी सवाक्‍ फ़िल्मों का निर्माण भी उसी वर्ष से शुरू हो गया था जिस वर्ष भगत सिंह शहीद हुए थे। पर
ब्रिटिश शासन की पाबन्दियों की वजह से कोई भी फ़िल्मकार भगत सिंह के जीवन पर फ़िल्म नहीं बना सके। देश आज़ाद होने के बाद सन्‍ 1948 में सबसे पहले 'फ़िल्मिस्तान' ने उन पर फ़िल्म बनाई 'शहीद', जिसमें भगत सिंह की भूमिका में नज़र आये दिलीप कुमार। पर इस फ़िल्म में "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" गीत को शामिल नहीं किया गया। फ़िल्म का एकमात्र देश भक्ति गीत था राजा मेहन्दी अली ख़ाँ का लिखा "वतन की राह में वतन के नौजवाँ शहीद हों"। फ़िल्म के अन्य सभी गीत नायिका-प्रधान गीत थे। इसके बाद 1954 में जगदीश गौतम निर्देशित फ़िल्म बनी 'शहीद-ए-आज़म भगत सिंह' जिसमें प्रेम अदीब, जयराज, स्मृति बिस्वास प्रमुख ने काम किया। इस फ़िल्म में भी "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" गीत के शामिल होने की जानकारी नहीं है, हाँ, बिसमिल के लिखे "सरफ़रोशी की तमन्ना..." को ज़रूर इसमें शामिल किया गया था रफ़ी साहब की आवाज़ में। इसके बाद सन्‍ 1963 में बनी के. एन. बनसल निर्देशित 'शहीद भगत सिंह' जिसमें नायक की भूमिका में शम्मी कपूर नज़र आये। फ़िल्म के गीत लिखे क़मर जलालाबादी और ज्ञान चन्द धवन ने तथा संगीत दिया हुस्नलाल भगतराम ने। फ़िल्म के सभी गीत देशभक्ति थे, और बिसमिल के लिखे दो गीत शामिल किये गये - "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है" और "मेरा रंग दे बसन्ती चोला"। दोनों गीत मोहम्मद रफ़ी और साथियों की आवाज़ों में थे। इस फ़िल्म को सफलता नहीं मिली, पर इसके ठीक दो साल बाद, 1965 में मनोज कुमार अभिनीत फ़िल्म 'शहीद' ने कमाल कर दिखाया। फ़िल्म ज़बरदस्त कामयाब रही और महेन्द्र कपूर, मुकेश और राजेन्द्र मेहता के गाये "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत बना। इस फ़िल्म को कई राष्ट्रीय पुरसकारों से सम्मानित किया गया, जिनमें शामिल थे 'सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म', राष्ट्रीय एकता पर बनी सर्वश्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म का 'नरगिस दत्त पुरस्कार', तथा 13-वीं राष्ट्रीय पुरस्कारों में 'सर्वश्रेष्ठ कहानी' का पुरस्कार। 



नई पीढ़ी के कई फ़िल्मकारों ने भी भगत सिंह पर कई फ़िल्में बनाई। साल 2002 में इक़बाल ढिल्लों 
निर्मित व सुकुमार नायर निर्देशित फ़िल्म आई 'शहीद-ए-आज़म', जिसमें भगत सिंह की भूमिका में नज़र आये सोनू सूद। फ़िल्म को लेकर विवाद का जन्म हुआ और पंजाब-हरियाणा हाइ कोर्ट के निर्देश पर फ़िल्म का प्रदर्शन बन्द किया गया। इस वजह से फ़िल्म को ज़्यादा नहीं देखा गया। फ़िल्म के गीत पंजाबी रंग के थे पर "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" ऐल्बम से ग़ायब था। इसी साल, 2002 में बॉबी देओल नज़र आये भगत सिंह के किरदार में और फ़िल्म का शीर्षक था '23 मार्च 1931: शहीद'। इस फ़िल्म में "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" को आवाज़ दी भुपिन्दर सिंह, वीर राजिन्दर और उदित नारायण ने। संगीत दिया आनन्द राज आनन्द ने तथा फ़िल्म के अन्य गीत लिखे देव कोहली ने। साल 2002 में तो जैसे भगत सिंह के फ़िल्मों की लड़ी ही लग गई। इसी वर्ष एक और फ़िल्म आई 'दि लीजेन्ड ऑफ़ भगत सिंह', जिसमें शहीदे आज़म की भूमिका में नज़र आये अजय देवगन। ए. आर. रहमान के संगीत निर्देशन में सोनू निगम और मनमोहन वारिस का गाया "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" काफ़ी लोकप्रिय हुआ और 1965 में बनी 'शहीद' के उस गीत के बाद इसी संस्करण को लोगों ने हाथोंहाथ ग्रहण किया। एक और बार "मेरा रंग दे..." लेकर आए रूप कुमार राठौड़, हरभजन मान और मोहम्मद सलामत। संगीतकार जयदेव कुमार के संगीत में यह फ़िल्म ’शहीद भगत सिंह’ का गीत है, लेकिन यह फ़िल्म ठीक किस वर्ष प्रदर्शित हुई इसमें संशय है। इन तमाम संस्करणों में इन फ़िल्मों के गीतकारों ने अपनी तरफ़ बोल जोड़े हैं। बिसमिल के मूल मुखड़े को आधार बना कर अन्तरों और शुरुआती पंक्तियों में नए बोल डाले गए हैं। 1965 की फ़िल्म ’शहीद’ के गीत में प्रेम धवन, ’दि लिगेंड ऑफ़ भगत सिंह’ के गीत में समीर, और जयदेव कुमार स्वरबद्ध गीत में नक्श ल्यालपुरी साहब का योगदान है। बिसमिल के मूल गीत के बोल ये रहे...

मेरा रंग दे बसंती चोला, माए रंग दे 
मेरा रंग दे बसंती चोला 

दम निकले इस देश की खातिर बस इतना अरमान है
एक बार इस राह में मरना सौ जन्मों के समान है 
देख के वीरों की क़ुरबानी अपना दिल भी बोला
मेरा रंग दे बसंती चोला ...

जिस चोले को पहन शिवाजी खेले अपनी जान पे
जिसे पहन झाँसी की रानी मिट गई अपनी आन पे 
आज उसी को पहन के निकला हम मस्तों का टोला 
मेरा रंग दे बसंती चोला ...

बड़ा ही गहरा दाग है यारों जिसका देश ग़ुलाम है
वो जीना भी क्या जीना है अपना देश ग़ुलाम है
सीने में जो दिल था यारों आज बना है शोला
मेरा रंग दे बसंती चोला ...


और फिर साल 2006 में आई राकेश ओमप्रकाश मेहरा निर्मित व निर्देशित आमिर ख़ान की फ़िल्म 'रंग दे बसन्ती', जो भगत सिंह के बलिदान का एक नया संस्करण था, आज की युवा पीढ़ी के नज़रिए से। फ़िल्म बेहद कामयाब रही। ए. आर. रहमान के संगीत में फ़िल्म के सभी गीत बेहद मशहूर हुए। जिस तरह से भगत सिंह की कहानी का यह एक नया संस्करण था, ठीक वैसे ही इस फ़िल्म में "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" को भी एक नया जामा पहनाया गया। जामा पहनाने वाले गीतकार प्रसून जोशी "थोड़ी सी धूल मेरी, धरती की मेरे वतन की, थोड़ी सी ख़ुशबू बौराई सी मस्त पवन की, थोड़ी से धोंकने वाली धक धक धक साँसे, जिनमें हो जुनूं जुनूं वो बूंदे लाल लहू की, ये सब तू मिला मिला ले, फिर रंग तू खिला खिला ले, और मोहे तू रंग दे बसन्ती यारा, मोहे तू रंग दे बसन्ती"।


आपकी बात

’चित्रकथा’ के पिछले अंक में हमने गीतकार शकील बदायूंनी के लिखे प्रसिद्ध फ़िल्मी होली गीतों की चर्चा की थी। इसके संदर्भ में हमारे पाठक प्रवीण गुप्ता जी ने कहा है, "शकील बदायूंनी तो भारत की आत्मा को पहचानते थे और उसके गुण गाते रहे। ये वो महान गीतकार थे जिन्हें शासन की ओर से उचित प्रतिष्ठा अभी तक नहीं मिली।" प्रवीण जी, आपका बहुत बहुत आभार इस टिप्पणी के लिए। और इस अंक की अब तक की कुल रीडरशिप 140 है, और आप सभी को हमारा धन्यवाद। आगे भी बने रहिए ’चित्रकथा’ के साथ।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, January 21, 2017

चित्रकथा - 3: महेन्द्र कपूर के गाए देश-भक्ति गीत


अंक - 3

महेन्द्र कपूर के गाए देश-भक्ति गीत


भारत की बात सुनाता हूँ...



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आते हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के तीसरे अंक में आपका हार्दिक स्वागत है।  

आगामी 26 जनवरी को राष्ट्र अपना 68-वाँ गणतन्त्र दिवस मनाने जा रहा है। इस शुभवसपर पर हम आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं। राष्ट्रीय पर्वों पर फ़िल्मी देश-भक्ति के गीतों का चलन शुरु से ही रहा है। और एक आवाज़ जिनके बिना ये पर्व अधूरे से लगते हैं, वह आवाज़ है गायक महेन्द्र कपूर की। उनकी बुलन्द पर सुरीली आवाज़ पाकर जैसे देश-भक्ति की रचनाएँ जीवन्त हो उठती थीं। आइए आज के इस विशेषांक में महेन्द्र कपूर के गाए फ़िल्मी देश भक्ति गीतों की चर्चा करें।




मारे देश के देशभक्तों और वीर सपूतों ने अपने अपने तरीकों से इस मातृभूमि की सेवा की है। और
इस राह में हमारे फ़िल्मी गीतकार, संगीतकार और गायकों का योगदान सराहनीय रहा है। गायकों की बात करें तो महेन्द्र कपूर ने अपनी बेशकीमती आवाज़ के माध्यम से देशभक्ति का अलख जगाया है जिसका प्रमाण समय-समय पर उनकी आवाज़ में हमें मिला है। भले सुनहरे दौर के शीर्षस्थ गायकों में सहगल, रफ़ी, तलत, किशोर, मुकेश और मन्ना डे के साथ महेन्द्र कपूर का नाम नहीं लिया गया, पर इसमें कोई संदेह नहीं कि देशभक्ति गीत गाने की कला में उनसे ज़्यादा पारदर्शी कोई नहीं। महेन्द्र कपूर की आवाज़ में देशभक्ति रस के गीत इतने जीवन्त, इतने प्रभावशाली लगते हैं कि वतन-परस्ती का जस्बा और बुलन्द हो जाता है। महेन्द्र कपूर की इसी ख़ूबी का कई संगीतकारों ने बख़ूबी इस्तमाल किया है जब जब उन्हें देशभक्ति के गीतों की ज़रूरत पड़ी अपनी फ़िल्मों में। इस देश पर शहीद होने वाले, इस देश की सेवा करने वाले और देशभक्ति की अग्नि प्रज्वलित करने वाले वतन परस्तों के पैग़ाम को आवाज़ तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण काम करती आई है महेन्द्र कपूर की गाई हुई देशभक्ति की कालजयी रचनाएँ।

कुछ समय पहले जब मैंने महेन्द्र कपूर साहब के सुपुत्र रुहान (रोहन) कपूर से उनके पिता के बारे में
बातचीत की, तब उनसे मैंने यह सवाल किया था कि उन्हें कैसा लगता है जब 26 जनवरी और 15 अगस्त को पूरा देश उनके पिता के गाए देशभक्ति गीतों को सुनते हैं, गुनगुनाते हैं, गर्व से सीना चौड़ा हो जाता है और कभी कभी आँखें नम हो जाती हैं, तब उन्हें कैसा लगता है? इसके जवाब में रुहान जी ने कहा, "उनकी आवाज़ को सुनना तो हमेशा ही एक थ्रिलिंग् एक्स्पीरिएन्स रहता है, लेकिन ये दो दिन मेरे लिये बचपन से ही बहुत ख़ास दिन रहे हैं। उनकी जोशिली और बुलंद आवाज़ उनकी मातृभूमि के लिये उनके दिल में अगाध प्रेम और देशभक्ति की भावनाओं को उजागर करते हैं। और उनकी इसी ख़ासियत ने उन्हें 'वॉयस ऑफ़ इण्डिया' का ख़िताब दिलवाया था। वो एक सच्चे देशभक्त थे और मुझे नहीं लगता कि उनमें जितनी देशभक्ति की भावना थी, वो किसी और लीडर में होगी। He was a human par excellence! अगर मैं यह कहूँ कि वो मेरे सब से निकट के दोस्त थे तो ग़लत न होगा। I was more a friend to him than anybody on planet earth। हम दुनिया भर में साथ साथ शोज़ करने जाया करते थे और मेरे ख़याल से हमने एक साथ हज़ारों की संख्या में शोज़ किये होंगे। वो बहुत ही मिलनसार और इमानदार इंसान थे, जिनकी झलक उनके सभी रिश्तों में साफ़ मिलती थी।"

शोज़ की बात चल पड़ी है तो महेन्द्र कपूर ने ’विविध भारती’ के ’जयमाला’ कार्यक्रम में फ़ौजी जवानों को संबोधित करते हुए एक बार कहा था, "हम सब इस देश के निवासी हैं, हम सभी को यह देश बहुत प्यारा है। हमें इस पर मान है और होना भी चाहिए क्योंकि पूरी दुनिया में ऐसा देश और कहीं नहीं है। मैं जब भी बाहर यानी फ़ौरेन जाता हूँ, देश की यादें साथ लेकर जाता हूँ, और इस गाने से हर प्रोग्राम शुरु करता हूँ।" और यह गाना है फ़िल्म ’पूरब और पश्चिम’ का, "है प्रीत जहाँ की रीत सदा, मैं गीत वहाँ के गाता हूँ, भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ"। इस फ़िल्म के इस सर्वाधिक लोकप्रिय गीत के अलावा महेन्द्र कपूर की आवाज़ से सजे दो और देशभक्ति गीत थे, "दुल्हन चली बहन चली तीन रंग की चोली" (लता के साथ) और "पूर्वा सुहानी आई रे" (लता और मनहर के साथ)।

भले हमने पहले ’पूरब और पश्चिम’ की बात कर ली, पर महेन्द्र कपूर, मनोज कुमार और देशभक्ति गीत की तिकड़ी की यह पहली फ़िल्म नहीं थी। इस तिकड़ी की पहली फ़िल्म थी 1965 की ’शहीद’ जिसमें मनोज कुमार ने शहीद भगत सिंह की भूमिका अदा की थी। महेन्द्र कपूर, मुकेश और राजेन्द्र मेहता का गाया "मेरा रंग दे बसन्ती चोला माय रंग दे" अत्यधिक लोकप्रिय हुआ था। बाद में समय समय पर इस गीत के कई संस्करण बने पर ’शहीद’ फ़िल्म के इस गीत का स्थान हमेशा शीर्षस्थ रहा। इसके दो वर्ष बाद मनोज कुमार लेकर आए अपनी अगली फ़िल्म ’उपकार’। इस गीत में महेन्द्र कपूर के गाए "मेरे देश की धरती सोना उगले" ने तो इतिहास रच डाला। इस गीत के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। और फिर आया 1970 जब ’पूरब और पश्चिम’ प्रदर्शित हुई।

70 के दशक में भी मनोज कुमार और महेन्द्र कपूर की जोड़ी बरक़रार रही हालाँकि इस दशक में मनोज कुमार ने देशभक्ति की कोई फ़िल्म नहीं बनाई। 1970 की फ़िल्म ’होली आई रे’ में महेन्द्र कपूर का गाया
"चल चल रे राही चल रे" भले सीधे-सीधे देशभक्ति गीत ना हो, पर देश की उन्नति के लिए सही राह पर चलने का सीख ज़रूर देती है। इसी तरह से 1972 की फ़िल्म ’शोर’ में आंशिक रूप से देशभक्ति गीत "जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह शाम" में मन्ना डे और श्यामा चित्तर के साथ महेन्द्र कपूर ने अपनी जोशिली आवाज़ मिलाई और इस गीत को एक सुमधुर अंजाम दिया। और फिर आया 1981 का साल और प्रादर्शित हुई ’क्रान्ति’। और एक बार फिर से मनोज कुमार और महेन्द्र कपूर ने देशभक्ति गीतों की परम्परा को आगे बढ़ाया। महेन्द्र कपूर की एकल आवाज़ में "अब के बरस तुझे धरती की रानी कर देंगे" ने सिद्ध किया कि 80 के दशक में भी उनसे बेहतर देशभक्ति गीत गाने वाला दूसरा कोई नहीं। इसी फ़िल्म में लता मंगेशकर, मन्ना डे, शैलेन्द्र सिंह और नितिन मुकेश के साथ "दिलवाले तेरा नाम क्या है, क्रान्ति क्रान्ति" गीत में महेन्द्र कपूर की आवाज़ की गूंज दिल को छू गई। ’क्रान्ति’ के बाद मनोज कुमार की देशभक्ति की फ़िल्में दर्शकों के दिलों को छू न सकी और फ़िल्में फ़्लॉप होती गईं। ऐसी ही एक फ़्लॉप फ़िल्म थी 1989 की ’क्लर्क’ जिसमें महेन्द्र कपूर के दो देशभक्ति गीत थे; पहला लता मंगेशकर के साथ "झूम झूम कर गाओ रे, आज पन्द्रह अगस्त है" तथा दूसरा गीत उनकी एकल आवाज़ में था "कदम कदम बढ़ाए जा, ख़ुशी के गीत गाएजा"। इस गीत को भी पहले कई कलाकारों ने गाया होगा, पर महेन्द्र कपूर की बुलन्द आवाज़ ने इस गीत के जस्बे को आसमाँ तक पहुँचा दिया।

महेन्द्र कपूर ने केवल मनोज कुमार ही की फ़िल्मों में देशभक्ति गीत गाए हैं ऐसी बात नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार महेन्द्र कपूर का गाया पहला फ़िल्मी देशभक्ति गीत आया था 1959 की फ़िल्म ’नवरंग’ में। कहना ज़रूरी है कि ’सोहनी महिवाल’ के बाद ’नवरंग’ ही वह फ़िल्म थी जिसमें महेन्द्र कपूर के गाए गीतों ने उन्हें पहली-पहली बड़ी सफलता दिलाई थी। भरत व्यास के लिखे देशभक्ति गीत "ना राजा रहेगा, ना रानी रहेगी, यह दुनिया है फ़ानी फ़ानी रहेगी, ना जब एक भी ज़िन्दगानी रहेगी, तो माटी सबकी कहानी कहेगी" को गा कर महेन्द्र कपूर ने पहली बार देशभक्ति गीत की उनकी अपार क्षमता का नमूना प्रस्तुत किया था। इस गीत में छत्रपति शिवाजी और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जैसे वीरों का उल्लेख मिलता है। इस फ़िल्म के बाद 1963 की फ़िल्म ’कण कण में भगवान’ में महेन्द्र कपूर को देशभक्ति गीत गाने का मौका मिला। गीतकार एक बार फिर भरत व्यास। इनका लिखा और शिवराम कृष्ण का स्वरबद्ध किया यह गीत था "भारत भूमि महान है, तीर्थ इसके प्राण, चारों दिशा में चौमुख दीप से इसके चारों धाम है"। 

1965 में ’शहीद’ के अलावा एक और उल्लेखनीय फ़िल्म थी ’सिकन्दर-ए-आज़म’ जिसमें रफ़ी साहब का गाया "वो भारत देश है मेरा" सर्वश्रेष्ठ देशभक्ति गीतों में शामिल होने वाला गीत था। इसी फ़िल्म में महेन्द्र कपूर ने भी एक सुन्दर देशभक्ति गीत गाया "ऐ माँ, तेरे बच्चे कई करोड़..."। अगर रफ़ी साहब के गीत में भारत का गुणगान हुआ है तो राजेन्द्र कृष्ण के लिखे महेन्द्र कपूर के इस गीत में देश के लिए मर मिटने का जोश जगाया गया है। संगीतकार हंसराज बहल का इस गीत के लिए महेन्द्र कपूर की आवाज़ को चुनना उचित निर्णय था। हमारी महान संस्कृति ने हमारी इस धरती को दिए हैं अनगिनत ऐसी संताने जो इस देश पर मत मिट कर हमें भी इसी राह पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। अपनी शौर्य और पराक्रम की गाथा से हमें देश पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने की पाठ पढ़ाते हैं। और ऐसी ही महामानवों की अमर गाथा को अपनी आवाज़ से और ओजस्वी बना दिया है महेन्द्र कपूर ने। 1972 में एक देशभक्ति फ़िल्म बनी थी ’भारत के शहीद’ के शीर्षक से। देशभक्ति गीतों के गुरु प्रेम धवन को गीतकार-संगीतकार के रूप में लिया गया। इस फ़िल्म में यूं तो कई देशभक्ति गीत थे, पर सर्वाधिक लोकप्रिय गीत सिद्ध हुआ महेन्द्र कपूर का गाया "संभालो ऐ वतन वालों, वतन अपना संभालो"। इन्हीं की आवाज़ में इस फ़िल्म के दो और गीत थे "मोहनदास करमचन्द गांधी, परम पुजारी अहिंसा के" और "इधर सरहद पे बहता है लहू अपने जवानों का"। 1975 में युद्ध पर बनी फ़िल्म ’आक्रमण’ में आशा भोसले के साथ मिलकर महेन्द्र कपूर ने एक देशभक्ति क़व्वाली गाई जिसके बोल थे "पंजाबी गाएंगे, गुजराती गाएंगे, आज हम सब मिल कर क़व्वाली गाएंगे"। सीधे-सीधे देशभक्ति गीत ना होते हुए भी राष्ट्रीय एकता की भावना को बढ़ावा देता है यह गीत।

80 के दशक में महेन्द्र कपूर के कई देशभक्ति गीत सुनाई दिए। ’होली आई रे’, ’उपकार’ और ’पूरब और पश्चिम’ में कल्याणजी-आनन्दजी संगीतकार थे तो ’शोर’ और ’क्रान्ति’ में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल। 80 के दशक में लक्ष्मी-प्यारे ने महेन्द्र कपूर से कई गीत गवाए। 1981 की ’क्रान्ति’ के बाद 1982 की फ़िल्म ’राजपूत’ में मनहर और हेमलता के साथ उनका गाया "सबने देश का नाम लिया, हमने दिल को थाम लिया" गीत था। 1985 की फ़िल्म ’सरफ़रोश’ में भी लक्ष्मी-प्यारे ने कपूर साहब से देशभक्ति गीत गवाए जिसके बोल थे "तन्दाना तन्दाना, याद रखना भूल ना जाना, वीर अमर शहीदों की यह क़ुरबानी, देश भक्त भगत सिंह की यह कहानी"। इस गीत में सुरेश वाडकर ने भी अपनी आवाज़ मिलाई। 1987 की फ़िल्म ’वतन के रखवाले’ में तो एल.पी. ने महेन्द्र कपूर से फ़िल्म का शीर्षक गीत ही गवा डाला, जिसके सुन्दर बोल थे "जिस धरती के अंग अंग पर रंग शहीदों ने डाले, उस धरती को दाग़ लगे ना देख वतन के रखवाले"। ये बोल थे मजरूह सुल्तानपुरी के।

एक और संगीतकार जिनके लिए महेन्द्र कपूर ने बहुत से गाए हैं, वो हैं रवि। फ़िल्म ’हमराज़’ में "ना मुंह छुपा के जियो और ना सर झुका के जियो" को देशभक्ति गीत तो नहीं कहा जा सकता, पर सर उठा कर जीने की सलाह ज़रूर दी गई है। आगे चल कर 80 के दशक में बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्मों में रवि साहब के संगीत निर्देशन में महेन्द्र कपूर ने बहुत से गीत गाए जिनमें कुछ देशभक्ति गीत भी थे। 1984 की फ़िल्म ’आज की आवाज़’ में शीर्षक गीत सहित दो देशभक्ति गीत थे। शीर्षक गीत "आज की आवाज़ जाग ऐ इंसान" और दूसरा गीत था "रो रो कर कहता है हिमालय और गंगा का पानी, आज़ादी पा कर भी हमने क़दर ना इसकी जानी, भारत तो है आज़ाद हम आज़ाद कब कहलाएंगे, कभी रामराज के दिन अब आयेंगे कि ना आयेंगे"। गीतकार हसन कमाल। 1987 की फ़िल्म ’आवाम’ में भी रवि का संगीत था जिसमें हसन कमाल ने "रघुपति राघव राजा राम" गीत को आगे बढ़ाते हुए लिखा है "ऐ जननी ऐ हिन्दुस्तान तेरा है हम पर अहसान, तेरी ज़मीं पर जनम लिया जब मैं बढ़ी तब अपनी शान, तन मन धन तुझपे कुरबान कोटी कोटी है तुझको प्रणाम, रघुपति राघव राजा राम"। इस गीत को महेन्द्र कपूर और आशा भोसले ने गाया था।

बी. आर. चोपड़ा ने 1983 में ’मज़दूर’ शीर्षक से एक फ़िल्म बनाई थी जिसके संगीत के लिए राहुल देव बर्मन को साइन करवा कर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया था। और पंचम ने भी चोपड़ा साहब की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए महेन्द्र कपूर के लिए तैयार किया एक देशभक्ति गीत। एक बार फिर हसन कमाल के लिखे इस गीत ने धूम मचाई। गीत के बोल थे "हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा माँगेंगे, एक बाग़ नहीं एक खेत नहीं हम सारी दुनिया माँगेंगे..."। मज़दूरों की आवाज़ बन कर महेन्द्र कपूर की आवाज़ ऐसी गूंजी कि फ़िल्म के फ़्लॉप होने के बावजूद यह गीत रेडियो पर सालों तक देशभक्ति गीतों के कार्यक्रम में बजता रहा। 1984 में एक कमचर्चित फ़िल्म आई थी ’आज के शोले’ जिसमें सत्यम और कमलकान्त का संगीत था। इस फ़िल्म के शुरुआती सीन में ही महेन्द्र कपूर का गाया एक देशभक्ति गीत था जिसके बोल हैं "वतन की आबरू पर जान देने वाले जागे हैं, हमारे देश के बच्चे ज़माने भर से आगे हैं, लेके सर हथेली पर ये नन्ही नन्ही जाने, आज चली है दुनिया से ये ज़ुल्म का नाम मिटाने"।

इस तरह से महेन्द्र कपूर ने हर दौर के गीतकारों और संगीतकारों के लिए देशभक्ति गीत गाए। सी. रामचन्द्र, शिवराम कृष्ण, हंसराज बहल, प्रेम धवन, कल्याणजी-आनन्दजी, रवि, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल, राहुल देव बर्मन, उत्तम-जगदीश के संगीत में महेन्द्र कपूर की बुलन्द आवाज़ ने भरत व्यास, प्रेम धवन, मजरूह, इन्दीवर, हसन कमाल, संतोष आनन्द जैसे गीतकारों की रचनाओं को अमर बना दिया। जब जब वतन की आन-बान और यशगाथा के वर्णन करने की बात आती थी किसी गीत में, तब तब महेन्द्र कपूर की आवाज़ जैसे और प्रखर हो उठती थी, और पूरे जोश के साथ निकल पड़ती थी उनकी ज़ुबान से।

आपकी बात

’चित्रकथा’ की पहली कड़ी को आप सभी ने सराहा, जिसके लिए हम आपके आभारी हैं। इस कड़ी की रेडरशिप 13 जनवरी तक 154 आयी है। हमारे एक पाठक श्री सुरजीत सिंह ने यह सुझाव दिया है कि क्यों ना इसे हिन्दी और अंग्रेज़ी, दोनों भाषाओं में प्रकाशित की जाए! सुरजीत जी, आपका सुझाव बहुत ही अच्छा है, लेकिन फ़िलहाल समयाभाव के कारण हम ऐसा कर पाने में असमर्थ हैं। भविष्य में अवकाश मिलने पर हम इस बारे में विचार कर सकते हैं, पर इस वक़्त ऐसा संभव नहीं, इसके लिए हमें खेद है।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!


शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, January 16, 2016

"हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं....", क्या परेशानी थी मनोज कुमार को इस गीत से?


एक गीत सौ कहानियाँ - 74
 

'हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 74-वीं कड़ी में आज जानिए 1965 की फ़िल्म ’गुमनाम’ के मशहूर गीत "हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं..." के बारे में जिसे मोहम्मद रफ़ी ने गाया था। बोल हसरत जयपुरी के और संगीत शंकर-जयकिशन का।

महमूद व मनोज कुमार
बात उस वक़्त की है जब महमूद इतना बड़ा नाम हो गया था कि हिन्दी सिनेमा के बड़े-बड़े स्टार महमूद के साथ काम करने से कतराने लगे थे। कहते थे कि अगर इनके साथ हमारा सीन होगा तो ये खा जाएगा हमें! इसलिए बहुत से स्टार्स तो महमूद को अपनी फ़िल्म से निकलवाने या उनके सीन कम करने के लिए निर्माता, निर्देशक और वित्तदाताओं पर दबाव भी डाल दिया करते थे। 1965 की सुपरहिट फ़िल्म ’गुमनाम’ में भी यही हुआ। राजा नवाथे द्वारा निर्देशित और एन.एन. सिप्पी द्वारा निर्मित फ़िल्म ’गुमनाम’ के शुरुआती मसौदे में महमूद वाला किरदार था ही नहीं। वह तो वित्तदाताओं की ज़िद थी कि फ़िल्म की सफलता के लिए इसमें महमूद का होना ज़रूरी है, इसलिए उनके लिए भी रोल निकाला जाए! नहीं है तो लिखो, ऐसा हुकुम था। मनोज कुमार और प्राण इस फ़िल्म के लिए फ़ाइनल हो चुके थे। दोनों ने ही फ़िल्म में महमूद को लिए जाने का विरोध किया, लेकिन वित्तदाताओं और एन.एन. सिप्पी की ज़िद के सामने उनकी चली नहीं। और फ़िल्म में महमूद के लिए रोल लिखवाया गया। फ़िल्म की शूटिंग् शुरू हुई और महमूद पर एक गाना भी फ़िल्माया गया, "हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं..."। गाना फ़िल्माये जाने के बाद जब देखा गया तो मनोज कुमार ने फिर एक बार एन.एन. सिप्पी से कहा कि यह गाना हटा दो, यह गाना बड़ा घटिया है, इससे फ़िल्म का स्तर गिर रहा है। एन.एन. सिप्पी जब नहीं माने तो मनोज कुमार ने अपनी बात को सिद्ध करने के लिए मशहूर निर्देशक और अपने करीबी दोस्त राज खोसला के लिए फ़िल्म का एक स्पेशल शो रखवाया। इसे देख कर राज खोसला ने भी महमूद के गाने को फ़िल्म से हटाने का सुझाव दिया। लेकिन फिर भी एन. एन. सिप्पी नहीं माने। अब सिप्पी साहब के इस रवैये के बाद मनोज कुमार ने तो यहाँ तक कह दिया कि अगर महमूद का यह गाना रहा तो यह फ़िल्म तीन हफ़्ते भी नहीं चल पाएगी। 1965 में जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई तो इसने कामयाबी के कई रेकॉर्ड तोड़ दिए। पूरी फ़िल्म के दौरान जिस महमूद से प्रॉबलेम थी, उसी महमूद को साल के फ़िल्मफ़ेयर में Best Supporting Actor  के लिए नामांकित किया गया, और उन पर फ़िल्माया गीत "हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं", इस गीत ने तो धूम मचा दी। यह गीत महमूद के साथ-साथ इस फ़िल्म की पहचान भी बन गया।


हरिन्द्रनाथ और रफ़ी
इस गीत में महमूद का जितना योगदान था, उतना ही बड़ा योगदान मोहम्मद रफ़ी साहब के गायकी की भी थी। महमूद के अंदाज़ को ध्यान में रखते हुए रफ़ी साहब ने इस गीत जिस तरह का अंजाम दिया इसमें कोई शक़ नहीं कि इस गीत की सफलता के लिए महमूद का जितना श्रेय है, उतना ही श्रेय रफ़ी साहब को भी जाता है। साथ ही श्रेय गीतकार हसरत जयपुरी और संगीतकार शंकर-जयकिशन को भी तो जाता ही है। इस गीत की लोकप्रियता का आलम यह था कि इस फ़िल्म के रिलीज़ होने के चार साल बाद 1969 में इस गीत का एक अंग्रेज़ी संस्करण बनाया गया जिसे रफ़ी साहब की ही आवाज़ में रेकॉर्ड किया गया और HMV ने 45 RPM का ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड जारी किया, जिसकी रेकॉर्ड संख्या है N79866 और रेकॉर्ड का शीर्षक है ’The She I Love'। इस अंग्रेज़ी संस्करण को लिखा था हरिन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने और संगीत एक बार फिर शंकर जयकिशन का ही था। ये हरिन्द्रनाथ च्ट्टोपाध्याय वो ही हैं जिन्होंने समय-समय पर हिन्दी फ़िल्मों में अभिनय के साथ-साथ कुछ अंग्रेज़ी गीत भी लिखे हैं। फ़िल्म ’जुली’ का प्रीति सागर का गाया "My heart is beating" भी उन्हीं का लिखा गीत है। अशोक कुमार अभिनीत यादगार फ़िल्म ’आशिर्वाद’ का हिट गीत "रेल गाड़ी" भी उन्हीं की रचना है। फ़िल्म ’बावर्ची’ में पिताजी की भूमिका में हरिन्द्रनाथ जी ने "भोर आई गया अन्धियारा" गीत में थोड़ा अंश गाया भी है। रफ़ी के साहब के विदेशी स्टेज शोज़ के लिए अक्सर वो उन्हें अंग्रेज़ी में गीत लिख कर दिया करते थे उनके हिन्दी गीतों की धुनों पर जिन्हें सुन कर विदेशी ऑडिएन्स ख़ुशी से झूम उठा करते। ख़ैर, हम बात कर रहे थे "हम काले हैं..." के अंग्रेज़ी संस्करण की। तो ये रहे इस संस्करण के बोल -

The she I love is a beautiful beautiful dream come true,
I love her, love her, love her, love her, so will you.
The she I love is a beautiful beautiful dream come true.

Because she thinks its pleases me,
Like a cat a rat she seizes me,
She tickles me, she teases me,
She warms me up, she freezes me.
I love her, love her, love her, love her, what shall I do?
The she I love is a beautiful beautiful dream come true.

O she is a flower lovely and rare,
Her beautiful body seems to bear,
The magical mood of morning air,
And black as night is her raven hair,
I love her, love her, love her, love her, my love is true,
The she I love is a beautiful beautiful dream come true. 


फिल्म 'गुमनाम' के इस गीत और इसी गीत की धुन पर बने अँग्रेजी गाने के वीडियो अब आप देखिए और सुनिए। पहले गीत का अँग्रेजी संस्करण और फिर फिल्म 'गुमनाम' के मूल गीत का वीडियो देखिए। 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Monday, August 17, 2009

मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती...गुलशन बावरा ने लिखा इस असाधारण गीत से इतिहास

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 174

र आज है तिरंगे के तीसरे रंग, यानी कि हरे रंग की बारी। हरा रंग है संपन्नता का, ख़ुशहाली का। "ख़ुशहाली का राज है, सर पे तिरंगा ताज है, ये आज का भारत है ओ साथी आज का भारत है"। जी हाँ दोस्तों, इस बात में कोई शक़ नहीं कि देश प्रगति के पथ पर क्रमश: अग्रसर होता जा रहा है। हरित क्रांति से देश में खाद्यान्न की समस्या बड़े हद तक समाप्त हुई है। लेकिन अब भी देश की आबादी का एक ऐसा हिस्सा भी है जिसे दो वक़्त की रोटी नसीब नहीं। इस तिरंगे का हरा रंग उस दिन सार्थक होगा जिस दिन देश में कोई भी आदमी भूखा न होगा। आज तिरंगे के हरे रंग को सलामी देते हुए हमने जिस गीत को चुना है उस गीत से बेहतर शायद ही कोई और गीत होगा इस मौके के लिए। फ़िल्म 'उपकार' का सदाबहार देश भक्ति गीत "मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती" आप ने हज़ारों बार सुना होगा, आज भी सुनिए, रोज़ सुनिए, क्योंकि इस तरह के गीत रोज़ रोज़ नहीं बनते। यह एक ऐसा देश भक्ति गीत है जिसने एक इतिहास रचा है। शायद ही कोई स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस का पर्व होगा जो इस गाने के बग़ैर मनाया गया होगा! इस गीत में भारत के एक साधारण गाँव की दैनन्दिन जीवन शैली, किसानों की दिन चर्या को दर्शाया गया है, लेकिन देश भक्ति के रंग में ढाल कर। मनोज कुमार देश भक्ति फ़िल्मों के बादशाह माने जाते हैं। उनका नाम भारत कुमार भी पड़ गया था। फ़िल्म 'शहीद' के बाद 'उपकार', 'पूरब और पश्चिम', और 'क्रांति' जैसी कई कामयाब देश भक्ति फ़िल्मों का उन्होने निर्माण किया। फ़िल्म 'उपकार' के इस गीत को सुनते हुए हमारा दिल इस बात पर गर्व अनुभव करता है कि हम ने इस देश की मिट्टी में जन्म लिया।

फ़िल्म 'उपकार' की बाक़ी बातें हम फिर किसी दिन करेंगे, आज सिर्फ़ इस गीत के बारे में कहने को जी चाह रहा है। इस फ़िल्म में कई गीतकार थे जैसे कि क़मर जलालाबादी, इंदीवर और गुलशन बावरा। प्रस्तुत गीत गुल्शन बावरा का लिखा हुआ है और शायद यह उनके फ़िल्मी सफ़र का सब से ख़ास गीत रहा होगा। गायक महेंद्र कपूर साहब को तो थी ही महारथ हासिल देश भक्ति के गानें गाने की। और संगीतकार कल्यानजी-आनंदजी ने क्या संगीत संयोजन किया है इस गीत में, कमाल है! किसी गाँव का एक पूरा दिन हमारी आँखों के सामने ला खड़ा कर दिया है सिर्फ़ संगीत और ध्वनियों की सहायता से। इस संगीतकार जोड़ी की जितनी तारीफ़ की जाये इस गीत के लिए, कम ही होगी! तभी तो जब आनंदजी विविध भारती पर पधारे थे तो 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में उनसे इस गीत से संबंधित विस्तृत जानकारी ली गयी थी, जो आज हम ख़ास आप के लिए यहाँ पर प्रस्तुत कर रहे हैं।

प्र: आप की फ़िल्म 'उपकार', जो 'हिट', बड़ी 'सुपर डुपर हिट' रही, उसमें एक गाना है "मेरे देश की धरती सोना उगले", उसमें भी बहुत सारे 'साउंड एफ़ेक्ट्स' हैं।

क्या है कि मनोज जी की यह पहली पिक्चर थी। उनका काम हम ने देखा हुआ नहीं था, नहीं तो हम लोग क्या करते हैं कि पहले हम 'डिरेक्टर' का, उसका 'ऐंगल' क्या है, उसकी 'टेकिंग्‍' क्या है, हर 'डिरेक्टर' की एक 'ऐंगल' होती है, इस तरह से इनका कोई काम देखने को नहीं मिला था। 'हिमालय की गोद में' में उनके साथ काम किया था लेकिन ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला था कि इनका ये है, ऐसा है। तो वो सेठ जी बुलाते थे हम लोगों को। 'सेठ जी, मैं गाँव का आदमी हूँ और सुबह से शाम तक मुझे ये चाहिए कि एक गाने में सब कुछ आ जाए'। हमने कहा, 'सुबह से शाम, मतलब? समझे नहीं कि क्या चाहिए'। बोले कि 'गाँव में मैं किसान आदमी हूँ, शाम तक खेती में जो काम होता है, उसमें सब कुछ चाहता हूँ और यह वतन की बात है, देश की धरती की बात है'। तो बोले कि 'ठीक है, गाँव में तो आप भी रहे हैं, जो हम देंगे वो कर के लायेंगे क्या आप?' एक दूसरे की छेड़-खानी हम लोग आपस में बहुत करते थे। कोई बुरा नहीं मानता था, एक दूसरे के काम से लिए हम ऐसा बोलते थे। वह गाना जो हुआ, उसमें हम ने सारे 'एफ़ेक्ट्स' डाले। पंछियों की चहचहाहट, फिर वह लहट का चलना, बैलों का चलना, फिर ये, वो, सब कुछ, और ये करने के बाद, काफ़ी 'टाइम' लगा इसमें, क्योंकि 'एफ़ेक्ट्स' में काफ़ी 'टाइम' लग जाता है।

प्र: कितने घंटे लगे थे इस गाने को रिकार्ड करने में?

इस गाने में 'पार्ट्स' भी थे, तो इस गाने को सवेरे से 'स्टार्ट' किए थे, कुछ १६-१८ घंटे लगे होंगे, only in recording, उससे पहले 'रिहर्सल' होता रहा।


प्र: लेकिन 'फ़ाइनल प्रोडक्ट' जो मिला आप को...

क्योंकि सब कुछ चाहिए था उसमें। कोरस में गानेवाले भी चाहिए, बैल की आवाज़ भी चाहिए, लहट की भी आवाज़ आनी चाहिए, उसी 'टाइम' पे 'सिंगर' की भी आवाज़ आनी चाहिए, महेंद्र कपूर जी की आवाज़ थी बड़ी मज़बूत, वो टिके रहे 'लास्ट' तक। इस गाने की रिकार्डिंग्‍ से पहले एक बात बनी थी कि "इस देश की धरती" कि "मेरे देश की धरती"? ये सब छोटी छोटी बातें हैं, पहले यह लिखा गया था कि "इस देश की धरती सोना उगले"। बोले कि एक तो "उगले" शब्द लोग समझेंगे नही, वो बोले कि 'नहीं, यहाँ तो समझते हैं, आप के वहाँ नहीं समझते होंगे'। 'ठीक है, लेकिन "इस देश की धरती" में 'फ़ीलिंग्स्‍' नहीं आती है, "मेरे" में ज़्यादा अपनापन का अहसास होता है'। तो इस पर बहस चल रही थी कि "इस" रखें कि "मेरे" रखें। 'सिटिंग्‍' चलती रही कि "इस" रखें कि "मेरे" रखें, "मेरे" रखें कि "इस" रखें। युं करते करते आख़िर में "मेरे देश की धरती", और इस गाने ने...

प्र: इतिहास रच दिया!

इतिहास रच दिया!!!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. कल का एपिसोड समर्पित होगा गीतकार गुलज़ार को.
2. सलिल चौधरी है संगीतकार.
3. मुखड़े में एक से नौ के बीच के एक अंक का जिक्र है.

पिछली पहेली का परिणाम -
दिशा जी अब एक बार फिर आप नंबर १ हो गयी हैं, १४ अंकों के लिए बधाई. वाकई इतने आसान गीत को तो यूं झट से पहचान लिया जाना चाहिए थे...खैर हम ये मान के चलें कि हर कोई शरद जी या स्वप्न जी जैसा धुरंधर नहीं हो सकता :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, August 1, 2009

रहा गर्दिशों में हरदम मेरा इश्क का सितारा...मनोज कुमार की पीडा और रफी साहब की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 158

"याद न जाये बीते दिनों की, जाके न आए जो दिन, दिल क्यों बुलाए उन्हे दिल क्यों बुलाए"। दोस्तों, फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की यादें इतनी पुरअसर हैं, इतने सुरीले हैं, कि उन्हे भुला पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। भले ही वो दिन फिर वापस नहीं आ सकते, लेकिन ग्रामोफ़ोन रिकार्ड्स, कैसेट्स और सीडीज़ के माध्यम से उन सुरीले दिनों की यादों को क़ैद कर लिया गया है जो सदियों तक उन सुरीले ज़माने की और उस दौर से गुज़रे कलाकारों की सुर साधना से दुनिया की फिजाओं को महकाती रहेंगी। इन सुर साधकों में से एक नाम मोहम्मद रफ़ी साहब का है, जिनकी कल पुण्य तिथि थी। आज ही के दिन सन् १९८० में वो हम से बिछड़ गये थे। जब भी रफ़ी साहब के गाये गीतों की महफ़िल सजती है तो यह दिल ग़मगीन हो जाता है यह सोचकर कि उपरवाले ने इतनी जल्दी क्यों उन्हे हम से अलग कर दिया! अभी तो मानो बस महफ़िल शुरु ही हुई थी, ३० साल पूरे होने जा रहे हैं उनके गये हुए, पर दिल तो आज भी बस यही कहता है उन्ही के गाये 'साज़ और आवाज़' फ़िल्म के उस गीत के बोलों में ढलकर कि "दिल की महफ़िल सजी है चले आइए, आप की बस कमी है चले आइए"। रफ़ी साहब की कमी न आज तक पूरी हो सकी है और लगता नहीं कि आगे भी हो पायेगी। ख़ैर, इन दिनों आप सुन रहे हैं लघु शृंखला 'दस चेहरे एक आवाज़ - मोहम्मद रफ़ी' के अंतर्गत रफ़ी साहब के गाये गानें अलग अलग अभिनेताओं पर फ़िल्माये हुए। आज बारी है अभिनेता मनोज कुमार की। मनोज कुमार के लिए मुकेश और महेन्द्र कपूर ने काफ़ी प्लेबैक किया है, लेकिन रफ़ी साहब के भी कई शानदार गानें हैं जिन पर मनोज साहब ने अभिनय किया है। ऐसी ही एक फ़िल्म है 'दो बदन' जिसके गानें सदाबहार नग़मों में स्थान पाते है। इसी फ़िल्म से आज सुनिये "रहा गर्दिशों में हर दम मेरे इश्क़ का सितारा, कभी डगमागायी कश्ती कभी खो गया किनारा"। रफ़ी साहब ने दो और मशहूर गीत इस फ़िल्म में गाये थे "भरी दुनिया में आख़िर दिल को समझाने कहाँ जायें" और "नसीब में जिसके जो लिखा था", जिन्हे हम फिर कभी आप को सुनवाने की कोशिश करेंगे।

फ़िल्म 'दो बदन' आयी थी सन् १९६६ में जिसका निर्माण किया था शमसुल हुदा बिहारी ने। जी हाँ, ये वही गीतकार एस. एच. बिहारी साहब ही हैं। बिहारी साहब ने बतौर फ़िल्म निर्देशक भी अपना हाथ आज़माया था, फ़िल्म थी 'जोगी'। राज खोसला के निर्देशन में मनोज कुमार के साथ आशा पारेख 'दो बदन' में नायिका के रूप में और सिमि गरेवाल सह-नायिका के रूप में नज़र आयीं थीं। सिमि गरेवाल को इस फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार भी मिला था। इस फ़िल्म के गीत संगीत के लिए संगीतकार रवि, गीतकार शक़ील बदायूनी ("नसीब में जिसके जो लिखा था") और गायिका लता मंगेशकर ("लो आ गयी उनके याद") भी फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार के लिए मनोनीत हुए थे। दोस्तों, आज का यह गीत सुनने से पहले जान लेते हैं संगीतकार रवि साहब की बातें रफ़ी साहब के बारे में, जो उन्होने कहे थे विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' शृंखला में - "यह १९४७ की बात है। मैं दिल्ली में था, जश्न-ए-जमुरीयत के मौक़े पर दो कलाकारों को बुलाया गया था - मोहम्मद रफ़ी और मुकेश। मैने पता किया कि वो कहाँ पर ठहरे हुए हैं। पता चला कि फ़तेहपुरी में 'कोरोनेशन होटल' में ठहरे हैं। मैं उनसे मिलने जा रहा था कि किसी ने कहा कि जब वे सुनेंगे कि मैं भी गायक बनने के ख़्वाब से उनसे मिलने गया हूँ तो कहेंगे कि 'हमारे ही पेट पर लात मारने आये हो?' मैने कहा कि 'मैं कहूँगा उनसे कि मैं 'म्युज़िक डिरेक्टर' बनना चाहता हूँ'। तो उसने कहा कि वो पूछेंगे कि ''नोटेशन' आता है क्या?', 'पहले सहायक बनना पड़ेगा', वगेरह वगेरह। ख़ैर, मेरी पहली ही फ़िल्म 'वचन' में उन्होने गाना गाया था "एक पैसा दे दो बाबू"। मैने सोचा कि उनको बता दूँ कि एक बार मैं उनसे दिल्ली में मिलने गया था, लेकिन फिर नहीं बताया। बहुत अच्छे आदमी थी। उस ज़माने में लता का 'रेट' था ५००० रूपए प्रति गीत। एक बार मैं उनके पास गया गाना लेकर और कहा कि 'रफ़ी साहब, गाना अच्छा है पर पैसे नहीं हैं'। उन्होने ज़हीर को बुलाया और कहा कि 'ये जो भी देंगे ले लेना'। एक बार अमरिका से वापस आकर कहने लगे कि 'अमरिका में मैने तुम्हारा फ़लाना गाना गाया, बहुत पसंद किया लोगों ने, मुझे भी अच्छा लगा'।" तो लीजिए दोस्तों, रफ़ी और रवि के संगम से उत्पन्न फ़िल्म 'दो बदन' का नग़मा सुनिये जो फ़िल्माया गया था मनोज कुमार पर। कल रफी साहब की पुण्यतिथि पर रफी साहब के लिए कुछ कहना चाहता था कह न पाया, आज कहता हूँ नौशाद साहब के शब्द उधार लेकर -

"दुखी थे लाख पर तेरी सूरत से हर मुसीबत टल जाता था,
तेरी आवाज़ के शबनम से ग़म का हर धूल धुल जाता था,
तू ही था प्यार का एक साज़ इस नफ़रत की दुनिया में,
गनीमत थी कि एक प्यार का साज़ तो था इस नफ़रत की दुनिया में!"




और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. एक मस्ती भरा गीत रफी साहब का गाया.
2. कलाकार हैं -सदाबहार "देवानंद".
3. मुखडा ख़तम होता है इस शब्द से -"दीवाना".

कौन सा है आपकी पसदं का गीत -
अगले रविवार सुबह की कॉफी के लिए लिख भेजिए (कम से कम ५० शब्दों में ) अपनी पसंद को कोई देशभक्ति गीत और उस ख़ास गीत से जुडी अपनी कोई याद का ब्यौरा. हम आपकी पसंद के गीत आपके संस्मरण के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश करेंगें.


पिछली पहेली का परिणाम -
आज फिर बिगुल बजाने का दिन है. ढोल नगाडे बज रहे हैं हमें मिल गयी है हमारी दूसरी विजेता स्वप्न मंजूषा जी के रूप में. बहुत बहुत बधाई आपको. वैसे ये तो लगभग तय ही था. मज़ा तो अब आएगा, ये देखना दिलचस्प होगा कि हमारे तीसरे विजेता पराग जी होंगे या फिर दिशा जी, मनु जी भी हो सकते हैं, एरोशिक (?) भी या फिर डार्क होर्स सुमित भी....स्वप्न जी आप अपनी पसंद के ५ गीत सोचिये और दूर से मज़ा लीजिये इस नए संग्राम का.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, December 8, 2008

निर्माता-निर्देशकों के लिए सफलता की गैरंटी था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीत


बात होती है सदी के नायक की, नायिका की, पर अगर हम बात करें बीती सदी के सबसे सफलतम संगीतकार की, तो बिना शक जो नाम जेहन में आता है वो है - संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का. १९६३ में फ़िल्म "पारसमणी" से शुरू हुआ संगीत सफर बिना रुके चला अगले चार दशकों तक. बदलते समय के साथ ख़ुद को बदलकर हर पीढी के मिजाज़ को ध्यान में रख ये संगीत के महारथी चलते रहे अनथक और लिखते रहे निरंतर कमियाबी की नयी इबारतें. पल पल रंग बदलती, हर नए शुक्रवार नए रूप में ढलती फ़िल्म इंडस्ट्री में इतने लंबे समय तक चोटी पर अपनी जगह बनाये रखने की ये मिसाल लगभग असंभव सी ही प्रतीत होती है. और किस संगीतकार की झोली में आपको मिलेंगी इतनी विविधता. शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीत, लोक गीतों में ढले ठेठ भारतीय गीत, पाश्चात्य संगीत में बसे गीत, भजन, मुजरा, डिस्को -जैसा मूड वैसा संगीत, और वो भी सरल, सुमधुर, "कैची" और "क्लास".परफेक्शन ऐसा कि कोई ढूंढें भी तो कोई कमी न मिले. आम आदमी की जुबान पर तो उनके गीत यूँ चढ़ जाते थे जैसे बस उन्हीं के मन की धुन हो कोई. मेलोडी ही उनके गीतों की आत्मा रही. सहज धुन में सरल सी बात और संयोजन (जो अमूमन प्यारेलाल जी का होता था) सौ प्रतिशत बेजोड़.

३७ सालों तक उनका नाम रजत पटल पर इस शान से आता था जैसे उनका संगीत ही फ़िल्म का तुरुप का इक्का हो, कभी कभी तो फ़िल्म के निर्माता नायक नायिका से बढ़कर इस बात का प्रचार करते थे कि फ़िल्म में संगीत एल पी का है. वो एक ऐसा नाम थे जो सफलता की गैरंटी का काम करते थे. तभी तो हर नए पुराने निर्माता निर्देशकों की वो पहली पसंद हुआ करते थे. शायद ही कोई ऐसा बड़ा बैनर हो फ़िल्म जगत में जिनके साथ उनका रिश्ता न जुडा हो. राजश्री फ़िल्म, राज खोंसला, राज कपूर, सुभाष घई, जे ओम् प्रकाश, मनमोहन देसाई, मोहन कुमार, मनोज कुमार आदि केवल कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनके साथ एल पी का बेहद लंबा और बेहद कामियाब रिश्ता रहा है. अब ज़रा इस सूची में शामिल निर्देशकों की फिल्मों पर एक नज़र डालते हैं -

राज खोंसला ने एस डी, ओ पी नय्यर और रवि के साथ काम करने के बाद फ़िल्म "अनीता" में पहले बार एल पी को आजमाया. सामाजिक विषयों पर फ़िल्म बनाने वाले राज ने "मेरा गाँव मेरा देश", "मैं तुलसी तेरे आंगन की", "दो रास्ते" और "दोस्ताना" जैसी फिल्में बनायीं जिनके लिए एल पी तुम बिन जीवन, सोना ले जा रे, हाय शरमाऊं, ये रेशमी जुल्फें, बिंदिया चमकेगी, दिल्लगी ने दी हवा, जैसे सरल और मिटटी से जुड़े गीत दिए. राज खोंसला ने एक बार एक सभा में कहा था कि यदि आपके पास एल पी है तो आपको और कुछ नही चाहिए. सदी के सबसे बड़े शो मैन कहे जाने वाले राज कपूर ने शंकर जयकिशन के साथ बहुत लंबा सफर तय किया. पर एक समय ऐसा भी आया जब राज साहब की महत्वकांक्षी फ़िल्म "मेरा नाम जोकर" की असफलता के बाद पहली बार राज साहब अपनी नई फ़िल्म "बॉबी" को लेकर शंकित थे. फ़िल्म नई पीढी को टारगेट कर बनाई जानी थी तो संगीत में भी उस समय का "फील" मिलना चाहिए था. राज साहब ने चुनाव किया एल पी का, जो उनका सबसे बढ़िया निर्णय साबित हुआ. फ़िल्म का एक एक गीत श्रोताओं के दिलो जहेन पर छा गया. ज़रा गौर फरमायें फ़िल्म इन गीतों में बसे मुक्तलिफ़ रंगों की. एक ही फ़िल्म में बुल्ले शाह का सूफी अंदाज़ "मैं नई बोलना", मस्ती भरा शोख "हम तुम एक कमरे में बंद हो", युवाओं की बोलचाल वाला "मुझे कुछ कहना है", गोवा के संगीत का जायका "गे गे गे साहिबा", पहली मोहब्बत का पहला सरूर "मै शायर तो नही" और टूटे दिल की दर्द भरी सदा "अखियों को रहने दे". क्या नही दिया उस फ़िल्म में एल पी ने. राज साहब के साथ फ़िर आई "सत्यम शिवम् सुन्दरम" और "प्रेम रोग" दोनों ही बेहद अलग कैनवस की फ़िल्म थी और देखिये वहां भी बाज़ी मार गए एल पी हर बार की तरह.

फ़िल्म "दोस्ती" से शुरू हुआ राजश्री फिल्म्स के साथ उनका सफर ८ सालों तक चला. कुछ लोग मानते हैं कि इस बैनर के साथ एल पी हमेशा अपना "सर्वश्रेष्ट" काम दिया. जे ओम् प्रकाश की रोमांटिक फिल्मों के लिए उन्होंने ऐसा समां बांधा कि आज भी संगीत प्रेमी उन फिल्मों में लता रफी के गाये दोगानों के असर से मुक्त नही हो पाये. मनोज कुमार की देशभक्ति और भावनाओं से ओत प्रेत फिल्मों (शोर, रोटी कपड़ा और मकान, और क्रांति) के लिए एल पी ने एक प्यार का नग्मा, पानी रे पानी, महंगाई मार गई, जिन्दगी की न टूटे लड़ी जैसे आम आदमी के मन को छूने वाले गीत दिए. तो वहीँ सुभाष घई की फिल्में जो बहुत बड़े स्तर पर निर्मित होती थी और जहाँ संगीत में मेलोडी की गुंजाईश बहुत होती थी वहां भी एल पी अपना भरपूर जलवा दिखाया. "हीरो", "मेरी ज़ंग", और "खलनायक" में उनका फॉर्म जबरदस्त रहा तो वहीँ "क़र्ज़" में घई को आर डी के फ्लेवर का संगीत चाहिए था और उन्हें शक था कि क्या एल पी एक पॉप सिंगर के जीवन पर आधारित इस विषय में जहाँ संगीत का सबसे अहम् रोल था, न्याय कर पायेंगें या नही. पर एल पी सारे कयासों को एक तरफ़ कर "ओम् शान्ति ओम्", "पैसा ये पैसा", जैसे थिरकते गीत दिए तो रफी साहब के गाये "दर्दे दिल" के साथ पहली बार उन्होंने ग़ज़ल को पाश्चात्य फॉर्म में ढाल कर दुनिया के सामने रखा. "एक हसीना थी..." (ख़ास तौर पर वो गीटार का पीस)को क्या कोई संगीत प्रेमी कभी भूल सकता है. इस मूल गीत को आज भी सुनें तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. (किशोर दा को भी सलाम).

फार्मूला फिल्मों के शिल्पी मनमोहन देसाई की नाटकीय फिल्मों में भी एल पी का संगीत पूरे शबाब पर दिखा. तो मोहन कुमार की फिल्में तो कह सकते हैं कि उनके संगीत के बल पर ही आज तक याद की जाती हैं. इसके अलावा भी एल पी ने महेश भट्ट, रामानंद सागर, यश चोपडा, बी आर चोपडा, फिरोज खान, जे पी दत्ता, जैसे निर्देशकों के साथ भी लाजावाब काम किया. दक्षिण के निर्देशकों की भी वही पहली पसंद रहे हमेशा. एल वी प्रसाद से लेकर टी रामाराओ तक जिस किसी ने भी उनका साथ थामा वो उन्ही के होके रह गए...ऐसा कौन सा जादू था एल पी के संगीत में, ये हम आपको बताएँगे इस शृंखला की अगली कड़ी में. फिलहाल आपको छोड़ते हैं इन यादगार नग्मों की बाँहों में.




Monday, July 14, 2008

"नैना बरसे रिमझिम रिमझिम" - संजय पटेल ने ताज़ा किया एक मार्मिक संस्मरण, संगीत के महान फनकार मदन मोहन को आवाज़ की श्रद्दांजलि

Mangeshkar christened him 'The Emperor Of Ghazals'. She should know because it is in her voice that Madan Mohan created all those masterpieces that set an impossibly high standard for ghazals in films. The irony of the fact is that Madan Mohan couldn't combine class and mass appeal the way an S.D.Burman or Shanker-Jaikishan could. He composed the only way he knew to - with great respect for each of his tunes.

दोस्तो, आज मदन मोहन जी की ३३ वीं पुन्यतिथि है, इस अवसर पर उन्हें याद कर रहे हैं आवाज़ के पारखी संजय पटेल, जानिए उन्हीं की जुबानी ये मार्मिक संस्मरण, जो जुडा है एक अमर गीत " नैना बरसे " से....

मदन मोहन के गीत नैना बरसे रिमझिम रिमझिम से जुड़ा एक मार्मिक संस्मरण.
- संजय पटेल

जब हमारे मन में संगीतकार मदन मोहन का स्मरण आता है तब स्वतः ही यह बात स्थापित हो जाती है कि हम उस सुरीले दौर की बात कर रहे हैं जब संगीत में शोर कम और माधुर्य अधिक हुआ करता था। इसका मतलब ये भी नहीं कि वैसा दौर बाद में नहीं आया लेकिन यह निर्विवाद है कि मदन मोहन की बलन का संगीतकार परिदृश्य पर उपस्थित नहीं हुआ। मदनजी को ग़ज़लों का बादशाह कहा जाता है। पोएट्री की उनकी समझ बेमिसाल थी और संगीत की लाजवाब। यही वजह है कि ग़ज़ल जैसी मासूम काव्य विधा मदन मोहन के गीतों में आकर विलक्षण बन जाती है। यह समय का दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि मदन मोहन नाक़ामयाब फ़िल्मों के क़ामयाब संगीतकार कहलाए। बात स्पष्ट है कि फ़िल्में ज़रूर पिट गई होंगी लेकिन मदन मोहन का संगीत अजर अमर बन गया।

मदन मोहन के संगीत का जादू कुछ ऐसा अद्भुत है कि आप एक गीत पर रूक कर रह ही नहीं सकते। यदि आप "हम प्यार में जलने वालों को चैन कहॉं, आराम कहॉं (जेलर)' सुन रहे हैं तो लगता है कि यही मदनजी की श्रेष्ठ रचना है लेकिन जैसे ही आपके कानों पर भैरवी में निबद्ध फ़िल्म भाई-भाई का गीत "कदर जाने ना मोरा बालमवा' पड़ता है तो आप पिछले गीत को भूल जाते हैं। शास्त्रीय संगीत हर एक के बूते का नहीं होता इस लिहाज़ से फ़िल्म संगीत एक सामान्य व्यक्ति की ज़िंदगी में सुरीलापन घोलने का बड़ा काम करता है। ज़रा सोचिये यदि मदनजी जैसे संगीतकार फ़िल्म विधा की ओर न आकर शास्त्रीय संगीत की ओर चले जाते तो आप हम जैसे संगीतप्रेमियों का क्या होता।

आज जिस गीत की चर्चा हम कर रहे हैं वह फ़िल्म”वो कौन थी’ से लिया गया है और मुखड़ा आपका मेरा सबका जाना पहचाना है ... "नैना बरसे रिमझिम रिमझिम' सुनने को यह एक बहुत सामान्य गीत है लेकिन जब इसकी पृष्ठभूमि मालूम होती है तो वाकई हमारी आँखों से भी दुःख का बादल बरसने लगता है। हुआ यूँ कि मदनजी के भाई प्रकाश दिल्ली से मुंबई के बीच रेल से यात्रा कर रहे थे। एकदम स्थान तो याद नहीं आ रहा लेकिन यात्रा के दौरान कुछ कुख्यात लुटेरों ने प्रकाशजी की हत्या कर दी। मदनजी अपने सहयोगी घनश्यामजी के साथ भरे मन और थकान भरी सड़क यात्रा से घटना स्थल तक पहुँचे और अपने भाई की लाश को लेकर मुंबई लौटे। अंतिम संस्कार करने के बाद मदन मोहन कुछ ऐसी विचित्र मानसिक स्थिति में आए कि उन्होंने अपने आपको दो-तीन दिनों के लिए अपने कक्ष में बंद कर लिया। जब कुछ समय बीत गया तो परिजन चिंतित हुए और घनश्यामजी को आगामी रिकार्डिंग्स के डेट्स को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ा। हिम्मत करके घनश्यामजी ने मदनजी का दरवाज़ा खटखटाया और उन्हें बताया कि इस फ़िल्म के गीत की रिकार्डिंग के लिए आज के लिये ही स्टूडियो और लताजी को बुक किया हुआ है। घनश्यामजी ने परिस्थिति के मद्देनज़र पूछा कि क्या स्टूडियो की बुकिंग कैंसल करके लताजी को ख़बर कर दूँ? मदनजी का उत्तर चौंकाने वाला था ! उन्होंने कहा नहीं घनश्याम रेकॉर्डिंग आज ही होगी।

ज़रा सोचिये जिस व्यक्ति ने अपने प्रिय भाई को महज़ तीन दिन पहले गंवाया हो वह संगीत कैसे रच सकता है। लेकिन यदि वह व्यक्ति मदन मोहन है तो सब कुछ संभव है। उसी भरे मन से मदन मोहन स्टूडियो पहुँचते हैं रिकार्डिंग शुरू होती है और ये लाजवाब गाना हम संगीतप्रेमियों की अमानत बन जाता है। ये क़िस्सा सुनने के बाद इस गीत को सुनिये तो आपको लगेगा कि दुनिया जहान का सारा दर्द इस गीत में आ समाया है। "नैना बरसे रिमझिम रिमझिम' ये रिमझिम कहीं न कहीं मदनजी के भाई के दुःखद स्मरण की रिमझिम है। कहीं न कहीं मन में समोया दर्द उघाड़ रही है। मदन मोहन के संगीत में लता मंगेशकर की गायकी कुछ अलग ही रंग और अंदाज़ अख़्तियार कर लेती है। १९५६ से लेकर १९७५ तक लताजी ने न जाने कितने गीत मदनजी के संगीत निर्देशन में गाए हैं लेकिन इस गीत में लताजी गीतकार राजा मेहंदी अली ख़ाँ के शब्दों को जैसे अपने गायकी का अमृत स्पर्श प्रदान कर रही है। ऑर्केस्ट्रा और लताजी की गायकी का ब्लेंडिंग मदन मोहन के संगीत में कुछ ऐसा होताहै कि वे एक दूसरे का पूरक बन जाता है। न ये तोला ऊपर न वह माशा नीचे। संगीत को सुने तो मदनजी सुनाई देते हैं, लताजी को सुनें तो लताजी सुनाई देती हैं। कोई एक दूसरे को ओवरलैप नहीं करता है। इस गीत में भी ये सारी ख़ूबियॉं चमकती दिखाई देती हैं।मदन मोहन के संगीत का एक जादू यह भी है कि हो सकता है आप उनकी रचे गीत/ग़ज़ल के शब्द भूल जाएँ लेकिन धुन नहीं भूल सकते. अपने जीवन काल में 93 फ़िल्मों के 612 गीतों को संगीतबध्द करने वाले इस महान संगीत सर्जक ने कुछ ऐसी अनमोल धुनें संगीत प्रेमियों को दी हैं जिन्हें कालातीत ही कहना होगा.समय बदलेगा,रहन-सहन,खानापीना,फ़ैशन,इंसानी फ़ितरतें और बदलेगा हमारी ज़ुबान की तमीज़ लेकिन नहीं बदलेगा मदन मोहन के संगीत का अलौकिक सिलसिला ...हम सब के मन को मालामाल करता हुआ. ...


(मदन मोहन और लता जी जब भी मिले संगीत का नया इतिहास बना)

आइये संगीतकार मदन मोहन को याद करते हुए देखते हैं उन्हीं का रचा,फ़िल्म "वो कौन थी" का यह गीत जो मनोज कुमार और साधना पर फिल्माया गया है.



MADAN MOHAN - "THE UNFORGETABLE" ( A LIFE BRIEF ) ( SOURCE - INTERNET )

Madan Mohan was the son of Rai Bahadur Chunnilal, one of the big names of the 30's and 40's, and a partner in Bombay Talkies and then Filmistan. Madan Mohan was sent to Dehradun to join the army on the insistence of his father. Once he was posted at Delhi, he quit the Army and went to Lucknow to do what he wanted to do, to join All India Radio. His musical roots strengthened in Lucknow because he came across famous people like Ustad Faiyyaz Khan, Ustad Ali Akbar Khan, Roshan Ara Begum, Begum Akhtar, Siddheshwari Devi, and Talat Mehmood, all renowned names in the field of classical music and ghazal singing. He carried their influence with him always, which was clearly evident by his music compositions in his career, and one of the main reasons why he excelled in aesthetic composition inspite of having no formal training in music.
A patriotic Song


Madan Mohan came to Bombay in the late 40's, and assisted S. D. Burman and Shyam Sunder for a brief spell, for films being made by filmistan studios. Madan's first big independant break was Aankhen in 1950. After his film 'Aankhen' Madan and Lata became a great team together and Lata sang for almost all his films. Lata Mangeshkar was the last word for him. The sweetness Madan achieved here in Lata Mangeshkar’s voice is something rare in his repertory. It was never enough that there was enough of only Lata in a Madan tune. Lata used to call Madan ‘Ghazal Ka Shehzadaa’. ‘Woh chup rahen to mere dil ke daag jalte hain’ from the film Jahan Ara and ‘Maine rang li aaj chunariya’ from Dulhan Ek Raat Ki are some others of his compositions. He scored for a theme in mime like Chetan Anand's Heer Ranjha.

Madan Mohan made excellent use of voices of Talat Mahmood and Mohd. Rafi as well. His favourite lyricists were Raja Mehndi Ali Khan, Rajendra Krishan, and Kaifi Azmi. Majrooh Sultanpuri and Sahir Ludhianvi also wrote for him for a few films. Madan’s light compositions have the same individualistic quality as his serious songs. What's more none of his contemporaries had the knack of picking the right instruments for the right song.

Madan Mohan was totally different from the Punjab school of composers dominating Hindi film Music in the late l94O and early 195O's. Even O.P. Naiyyar, for all his sheen of modernity displayed traces of his Punjabi roots but not once could you scent the 'dehati’ Punjabi at work in a Madan Mohan composition. The Punjab school produced some of the finest music in our films. But always you got the impression that it was music literally rooted in the Punjab soil. Here is where Madan Mohan was diametrically different. He was the artistic aristocrat at work. The son of Rai Bahadur Chuni Laal, the Filmistan chief, at work. Madan Mohan's best music belonged to the drawing room that is why Madan had problems consistently equating with the masses. He was essentially a composer for the classes.

Every composer had a favorite raga, Madan had none. Look at the flair and imagination with which he scored for a theme in mime like Chetan Anand's Heer Ranjha. Sachin Dev Burman paid Madan Mohan the ultimate tribute; ‘ I could not have scored Heer Ranjha with half the felicity Madan Mohan did.’ Madan Mohan was still a struggling composer when he created his masterly tunes. And it is when you are struggling that you really create. Later, at least in the l970's, one felt Madan became rather stylized. In other words, he was, composing to live up to his reputation as the ‘Ghazal King’, which cramped his style in the matter of being a freewheeler composer, - a must for films.

He died on July 14th, in the year 1975. He did not live to see the success of two of his very big hits 'Mausam' and 'Laila Majnu'. Most Popular films of Madan Mohan are 'Ashiyana, Madhosh, Baghi, Bhai Bhai, Mastane, Gateway Of India, Dekh Kabeera Roya, Adalat, Chacha Zindabad, Manmauji, Sanjog, Woh Kaun Thi, Jahan Ara, Ghazal, Sharabi, Mera Saaya, Neela Akash, Ek Kali Muskayi, Chirag, Dastak, Heer Ranjha, Haste Zakhma, Mausam, etc.

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