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Thursday, December 30, 2010

तू मेरा जानूँ है तू मेरा हीरो है.....८० के दशक का एक और सुमधुर युगल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 560/2010/260

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! देखिए, गुज़रे ज़माने के सुमधुर गीतों को सुनते और गुनगुनाते हुए हम आ पहुँचे हैं इस साल २०१० के 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की अंतिम कड़ी पर। आज ३० दिसंबर, यानी इस साल का आख़िरी 'ओल्ड इज़ गोल्ड'। जैसा कि इन दिनों आप इस स्तंभ में सुन और पढ़ रहे हैं फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की कुछ सदाबहार युगल गीतों से सजी लघु शृंखला 'एक मैं और एक तू', आज ८० के दशक के ही एक और लैण्डमार्क डुएट के साथ हम समापन कर रहे हैं इस शृंखला का। यह वह गीत है दोस्तों जिसने लता और आशा के बाद की पीढ़ी के पार्श्वगायिकाओं का द्वार खोल दिया था। इस नयी पीढ़ी से हमारा मतलब है अनुराधा पौड़वाल, अल्का याज्ञ्निक, साधना सरगम और कविता कृष्णमूर्ती। आज हम चुन लाये हैं अनुराधा और मनहर उधास की आवाज़ों में १९८३ की फ़िल्म 'हीरो' का गीत "तू मेरा जानू है... मेरी प्रेम कहानी का तू हीरो है"। युं तो इस गीत से पहले भी अनुराधा ने कुछ गीत गाये थे, लेकिन इस गीत ने उन्हें पहली बार अपार सफलता दी जिसके बाद उन्हें पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। 'एक दूजे के लिए' ही की तरह 'हीरो' भी एक कामयाब युवा फ़िल्म है, और इस फ़िल्म के ज़रिए जैकी श्रॊफ़ और मीनाक्षी शेषाद्री ने फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखा था। 'हीरो' के गीतों की अपार कामयाबी ने एक बार फिर साबित किया कि ८० के दशक में भी एल.पी का संगीत उतना ही पुरअसर है जितना पिछले दो दशकों में था "निंदिया से जागी बहार" की शास्त्रीयता से भरी सुमधुर धुन, रेशमा की आवाज़ में कलेजे को चीर कर रख देने वाली "लम्बी जुदाई", लता-मनहर का गाया "प्यार करने वाले कभी डरते नहीं", तथा अनुराधा-मनहर के गाये दो गीत - "तू मेरा जानू है" और "डिंग डॊंग" जैसे गीतों के लिए एल. पी को बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

दोस्तों, आज पहली बार 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर अनुराधा और मनहर की आवाज़ें गूंज रही है। ऐसे में आइए आज अनुराधा पौडवाल द्वारा प्रस्तुत 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम का एक अंश पढ़ते हैं जिसमें वो बता रही हैं कि फ़िल्म जगत में उनका पदार्पण किस तरह से हुआ था। विविध भारती के सौजन्य से यह रहा वह अंश - "फ़ौजी भाइयों को मेरा संगीतमय नमस्कर! आज यह अवसर आप से बातें करने का, अपने गानें सुनाने का मिला है उसे मैं शिव जी का प्रसाद कहूँ तो सही होगा। जैसा कि बहुत से सुनने वाले शायद जानते हैं कि मेरे शोहर, श्री अरुण पौडवाल एक ज़माने में एस. डी. बर्मन के ऐसिस्टैण्ट भी रहे। बात युं हुई कि 'अभिमान' फ़िल्म का 'बैकग्राउण्ड म्युज़िक' रेकॊर्ड किया जा रहा था। सोच विचार हो रहा था कि एक 'पर्टिकुलर सिचुएशन' में कौन सा श्लोक रखा जाए। दादा ने अरुण से कहा कि तुम महाराष्ट्रियन हो और तुम्हारे घरों में बड़े बुज़ुर्ग बहुत अच्छे अच्छे श्लोक रिसाइट करते हैं। तो कल कोई श्लोक घर से लेके आना। मेरी क़िस्मत को मंज़ूर था और ईश्वर की कृपा मुझ पर होनी थी कि अरुण जी के मन में यह ख़याल आया कि क्यों ना यह श्लोक अनुराधा से, यानी मुझसे अपने टेप रेकोर्डर पे घर से ही रेकोर्ड करके ले जाऊँ! दादा ने श्लोक सुना और मेरे लिये प्लेबैक की दुनिया के दरवाजे खुल गये। उन्होंने श्लोक सुनते ही पूछा, 'कौन है ये?' दादा ने कहा कि शायद मैंने ऐसी ही आवाज़ में ऐसा ही श्लोक सोचा था जो बरबस तुम मेरे सामने ले आये। अरुण जी से कहा, अभी बुलाओ इस आवाज़ को। जब अरुण ने कहा कि यह आवाज़ अनुराधा की है, मेरी वाइफ़ की है, तो दादा और भी ख़ुश हुए। और शिव जी का प्रसाद मुझे ऐसा मिला कि दिन-ओ-दिन आप लोगों का प्यार और सुनने वालों की चाहत आज मुझे यहाँ तक ले आई है।" हाँ तो दोस्तों, ये थी अनुराधा जी के शब्द जो रेकॊर्ड हुए थे १९८७ में विविध भारती के स्टुडिओ में। और अब फ़िल्म 'हीरो' का वही हिट गीत जिसे शायद आपने कुछ दिनों से नहीं सुना होगा, लीजिए ८० के दशक की यादें फिर एक बार ताज़ा कर लीजिए इस गीत के माध्यम से। और इसी के साथ 'एक मैं और एक तू' शृंखला सम्पन्न होती है। हमें उम्मीद है कि ३० के दशक से लेकर ८० के दशक के ये १० युगल गीत आपको पसंद आये होंगे। आप अपने विचार और सुझाव हमारे ईमेल पते oig@hindyugm.com पर अवश्य लिख भेजिएगा। हमें इंतज़ार रहेगा। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की अगली कड़ी अब अगले साल ही पेश होगी। अरे अरे घबराइए नहीं, अगले साल, यानी कि इसी रविवार, २ जनवरी की शाम को। नये साल की ढेरों हार्दिक शुभकामनाओं के साथ अब हमें इजाज़त दीजिए, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि अनुराधा पौडवाल ने अपना पहला फ़िल्मी एकल गीत गाया था संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत निर्देशन में, हेमा मालिनी - शशि कपूर अभिनीत फ़िल्म 'आप बीती' में।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 01/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - खुद संगीतकार है इस युगल गीत में गायक.

सवाल १ - किस संगीतकार की बात है यहाँ - १ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी को बधाई हमारी ७ वीं शृंखला में वो विजेता हुए हैं. अमित जी कल तो आपका अंदाजा गलत हो गया..खैर कोई बात नहीं, नयी शृंखला के लिए सभी को शुभकामनाएँ

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, March 10, 2010

पुरवा सुहानी आई रे...थिरक उठते है बरबस ही कदम इस गीत की थाप सुनकर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 369/2010/69

'गीत रंगीले' शृंखला की नौवीं कड़ी के लिए आज हमने जिस गीत को चुना है, उसमें त्योहार की धूम भी है, गाँव वालों की मस्ती भी है, लेकिन साथ ही साथ देश भक्ति की भावना भी छुपी हुई है। और क्यों ना हो जब भारत कुमार, यानी कि हमारे मनोज कुमार जी की फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' का गाना हो, तो देश भक्ति के भाव तो आने ही थे! आइए आज सुनें इसी फ़िल्म से "पूर्वा सुहानी आई रे"। लता मंगेशकर, महेन्द्र कपूर, मनहर और साथियों की आवाज़ें हैं, गीत लिखा है संतोष आनंद ने और संगीतकार हैं कल्याणजी-आनंदजी। गीत फ़िल्माया गया है मनोज कुमार, विनोद खन्ना, भारती और सायरा बानो पर। आइए आज गीतकार व कवि संतोष आनंद जी की कुछ बातें की जाए! दोस्तों, कभी कभी सफलता दबे पाँव आने के बजाए दरवाज़े पर दस्तक देकर आती है। मूलत: हिंदी के जाने माने कवि संतोष आनंद को फ़िल्मी गीतकार बनने पर ऐसा ही अनुभव हुआ होगा! कम से कम गीत लिख कर ज़्यादा नाम और इनाम पाने वाले गीतकारों में शुमार होता है संतोष आनंद का। मनोज कुमार ने 'पूरब और पश्चिम' में उनसे सब से पहले फ़िल्मी गीत लिखवाया था "पूर्वा सुहानी आई रे"। यह गीत उनके जीवन में ऐसे सुगंधित और शीतल पुरवा की तरह आई कि वो तो शोहरत की ऊँचाइयों तक पहुँचे ही, सुनने वाले भी झूम उठे। इसके बाद बनी फ़िल्म 'शोर' और संतोष आनंद ने चटखारे लेते हुए लिखा "ज़रा सा उसको छुआ तो उसने मचा दिया शोर"। इस गीत ने बहुत शोर मचाया, हालाँकि इसी फ़िल्म में उन्होने एक गम्भीर दार्शनिक गीत भी लिखा था जो आज तक उतना ही लोकप्रिय है जितना उस समय हुआ था। जी हाँ, "एक प्यार का नग़मा है, मौजों की रवानी है, ज़िंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है"।संतोष आनंद जी संबंधित और भी कई बातें हम आगे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी रखेंगे।

'पूरब और पश्चिम' १९७० की मनोज कुमार निर्मित, निर्देशित व अभिनीत फ़िल्म थी। मूल कहानी श्रीमति शशि गोस्वामी की थी, जिसे फ़िल्म के लिए लिखा मनोज कुमार ने। इस फ़िल्म के अन्य मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, सायरा बानो, प्राण, भारती, निरुपा रॊय, कामिनी कौशल, विनोद खन्ना, राजेन्द्र नाथ आदि। विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में कमल शर्मा ने आनंदजी भाई से फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' के संगीत से जुड़ा सवाल पूछा था, ख़ास कर आज के इस गीत को बजाने से पहले, तो भला यहाँ पर उस बातचीत के अंश को पेश करने से बेहतर और क्या होगा!

प्र: जैसे 'पूरब और पश्चिम', जैसा आप ने ज़िक्र किया, उसमें दो शब्द ही अपने आप में सारी बातें कह देता है। एक तरफ़ पूरब की बात है, दूसरी तरफ़ पश्चिम की बात है, कल्चर डिफ़रेण्ट हैं, उस पूरी तसवीर को संगीत में खड़ा करना और उसको सपोर्ट देना चैलेंजिंग् तो रहा ही होगा?

उ: चलेंजिंग् तो रहता है लेकिन साथ में एक इंट्रेस्टिंग् भी रहता है, इसलिए कि म्युज़िक डिरेक्टर को एक घराने में नहीं रहना पड़ता है, यह होता है न कि मैं इस घराने से हूँ, ऐसा नहीं है, यहाँ पे वेस्टर्ण म्युज़िक भी देना है, इंडियन म्युज़िक भी देना है, हिंदुस्तान के इतने सारे फ़ोक हैं अलग अलग, उन फ़ोक को भी आपको इस्तेमाल करना पड़ेगा, क्योंकि जैसा सिचुयशन आएगा, वैसा आपको गाना देना पड़ेगा, उसका सब का स्टडी तो करना पड़ेगा। उसके लिए मैं आपका शुक्रगुज़ार रहूँगा, आपके यहाँ एक प्रोग्राम है जिसमें पुराने, गाँव के गानें आते हैं, क्या है वह?

प्र: 'लोक संगीत'।
उ: 'लोक संगीत'। इसको मैं बहुत सुनता रहा हूँ, यहाँ पे मादल क्यों बज रहा है, यहाँ पे यह क्यों बज रहा है, वो चीज़ें मुझपे बहुत हावी होती रही है, क्योंकि शुरु से मेरी यह जिज्ञासा रही है कि यह ऐसा क्यों है? कि यहाँ मादल क्यों बजाई जाती है। हिमाचल में अगर गाना हो रहा है तो फ़ास्ट गाना नहीं होगा क्योंकि उपर हाइ ऒल्टिट्युड पे साँस नहीं मिलती, तो वहाँ पे आपको स्लो ही नंबर देना पड़ेगा। अगर पंजाब है तो वहँ पे प्लैट्यू है तो आप धनधनाके, खुल के डांस कर सकते हैं। सौराष्ट्र में आप जाएँगे तो वहाँ पे कृष्ण, उषा, जो लेके आए थे, वो आपको मिलेगा, वहाँ का डांडिया एक अलग होता है, यहाँ पे ये अलग होता है, तो ये सारी चीज़ें अगर आप सीखते जाएँ, सीखने का आनंद भी आता है, और इन चीज़ों को काम में डालते हैं तो काम आसान भी हो जाता है।

दोस्तों, इन्ही शब्दों के साथ उस प्रोग्राम में बजाया गया था "पुरवा सुहानी आई रे", तो चलिए हम भी झूम उठते हैं इस गीत के साथ। गीत के शुरुआती बोलों पर ग़ौर कीजिएगा दोस्तों, "कहीं ना ऐसी सुबह देखी जैसे बालक की मुस्कान, या फिर दूर कहीं नींद में हल्की सी मुरली की तान, गुरुबानी गुरुद्वारे में, तो मस्जिद से उठती आज़ान, आत्मा और परमात्मा मिले जहाँ, यही है वह स्थान।" कितने उत्कृष्ट शब्दों में संतोष आनंद जी ने इस देश की महिमा का वर्णन किया है न! आइए सुनते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि गीतकार संतोष आनंद को फ़िल्म 'रोटी कपड़ा और मकान' के गीत "मैं ना भूलूँगा" के लिये उस साल के सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। और इसी फ़िल्म के उनके लिखे गीत "और नहीं बस और नहीं" के लिए गायक महेन्द्र कपूर को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"पुकार", गीत बताएं -३ अंक.
2. एक निर्देशक जिनकी सभी फ़िल्में अंग्रेजी के "ए" अक्षर से शुरू होती है, केवल पहली फिल्म को छोडकर, ये उन्हीं की फिल्म का गीत है, उनका नाम बताएं -२ अंक.
3. गीत के गीतकार कौन हैं -२ अंक.
4. धमेन्द्र इस फिल्म के नायक थे, नायिका का नाम बताएं-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
आज सभी ने जम कर भाग लिए और अंक भी पाए, इंदु जी मुझे भी (सजीव) आपकी बात ठीक लग रही है, सुजॉय जी अपना पक्ष रखेंगें :)
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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