Showing posts with label madhushree. Show all posts
Showing posts with label madhushree. Show all posts

Friday, July 21, 2017

गीत अतीत 22 || हर गीत की एक कहानी होती है || इश्क ने ऐसा शंख बजाया || लव यू फॅमिली || रोब्बी बादल || सोनू निगम || मधुश्री || तनवीर गाज़ी

Geet Ateet 22
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Ishq ne aisa shunkh bajaya
Love U Family
Robby Badal (Music Composer)
Also featuring Tanvir Ghazi, Sonu Nigam & Madhushree 


"जहाँ तक मेरी जानकारी है आज तक बॉलीवुड के किसी गीत में शंख को इश्क से जोड़कर नहीं लिखा गया " -    रोब्बी बादल 

पारिवारिक रोमांटिक फिल्म लव यू फॅमिली का मधुरतम गीत "इश्क ने ऐसा शंख बजाया" के बनने की कहानी आज हमारे साथ बांटने आये हैं संगीतकार रोब्बी बादल, जानिये क्यों मुश्किल में डाल दिया गायक सोनू निगम ने इस गीत के दौरान रोब्बी भाई को. प्ले के बटन पर क्लिक करें और गीत अतीत के इस ताज़ा एपिसोड में सुनें इस मधुर गीत की कहानी, जिसे लिखा है तनवीर गाजी ने और गाया है सोनू निगम और मधुश्री ने...




डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -
हौले हौले (गैर फ़िल्मी सिंगल)
कागज़ सी है ज़िन्दगी (जीना इसी का नाम है) 
बेखुद (गैर फ़िल्मी सिंगल)
इतना तुम्हें (मशीन) 
आ गया हीरो (आ गया हीरो)
ये मैकदा (गैर फ़िल्मी ग़ज़ल)
पूरी कायनात (पूर्णा)
दम दम (फिल्लौरी)
धीमी (ट्रैपड) 
कारे कारे बदरा (ब्लू माउंटेन्स)
रेज़ा रेज़ा (सलाम मुंबई)

Tuesday, May 31, 2011

गुरूदेव की "नौका डूबी" को "कशमकश" में तब्दील करके लाए हैं संजॉय-राजा..शब्दों का साथ दिया है गुलज़ार ने

Taaza Sur Taal (TST) - 15/2011 - KASHMAKASH (NAUKA DOOBI)

कभी-कभार कुछ ऐसी फिल्में बन जाती हैं, कुछ ऐसे गीत तैयार हो जाते हैं, जिनके बारे में आप लिखना तो बहुत चाहते हैं, लेकिन अपने आप को इस लायक नहीं समझते कि थोड़ा भी विश्लेषण कर सकें। आपके मन में हमेशा यह डर समाया रहता है कि अपनी नासमझी की वज़ह से कहीं आप उन्हें कमतर न आंक जाएँ। फिर आप उन फिल्मों या गीतों पर शोध शुरू करते हैं और कोशिश करते हैं कि जितनी ज्यादा जानकारी जमा हो सके इकट्ठा कर लें, ताकि आपके पास कही गई बातों का समर्थन करने के लिए कुछ तो हो। इन मौकों पर अमूमन ऐसा भी होता है कि आपकी पसंद अगर सही मुकाम पर पहुँच न पा रही हो तो भी आप पसंद को एक जोड़ का धक्का देते हैं और नकारात्मक सोच-विचार को बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। अंतत: या तो आप संतुष्ट होकर लौटते हैं या फिर एक खलिश-सी दिल में रह जाती है कि इस चीज़ को सही से समझ नहीं पाया।

आज की फिल्म भी कुछ वैसी है.. गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर की लिखी कहानी "नौका डूबी" पर उसी नाम से बनाई गई बांग्ला फिल्म का हिंदी रूपांतरण है "कशमकश"। इस फिल्म के सभी गाने रवींद्र-संगीत पर आधारित हैं। फिल्म में ४ हिन्दी गाने हैं जिन्हें लिखा है गुलज़ार साहब ने और पाँचवां गाना एक सुप्रसिद्ध बांग्ला गाना है, जिसे अब तक कई सारे फ़नकार अपनी आवाज़ दे चुके हैं। फिल्म में संगीत दिया है संजॉय दास और राजा नारायण देब की जोड़ी ने। इन दोनों ने चिर-परिचित रवींद्र संगीत में अपनी कला का मिश्रण कर गानों को नए रूप में ढालने की यथा=संभव सफ़ल कोशिश की है। चलिए तो सीधे-सीधे गानों की ओर रुख करते हैं।

फिल्म का पहला गना है "मनवा भागे रे"। "सौ-सौ तागे रे".. ऐसी पंक्तियों को सुनकर हीं गुलज़ार साहब के होने का बोध हो जाता है। ऊपर से श्रेया घोषाल की सुमधुर आवाज़, जिसका कोई तोड़ नहीं है। पवन झा जी से मालूम हुआ है कि यह गाना रवींद्र संगीत के मूल गीत "खेलाघर बांधते लेगेची" पर आधारित है। वाद्य-संयोजन बेहतरीन है। बोल कैसे हैं.. आप खुद देख लें:

मनवा आगे भागे रे,
बाँधूं सौ-सौ तागे रे,
ख्वाबों से खेल रहा है,
सोए जागे रे..

दिन गया जैसे रूठा-रूठा,
शाम है अंजानी,
पुराने पल जी रहा है,
आँखें पानी-पानी..


दूसरा गाना है हरिहरण की आवाज़ में "खोया क्या जो पाया हीं नहीं।" आजतक लोग यही कहते आए हैं कि हाथों की लकीरों में किस्मत की कहानी गढी जाती है, लेकिन यहाँ पर गुलज़ार साहन निराशा का ऐसा माहौल गढते हैं कि अब तक की सारी दलीलों को नकार देते हैं। वे सीधे-सीधे इस बात का ऐलान करते हैं कि हथेलियों पर फ़क़त लकीरें हैं और कुछ नहीं, इन पर कुदरत की कोई कारीगरी नहीं। अपनी बात के समर्थन में वे भगवदगीता की उस पंक्ति का सहारा लेते हैं, जिसमें कहा गया है कि "तुमने क्या पाया था, जो तुमने खो दिया।" हरिहरण अपनी आवाज़ से इस दर्द को और भी ज्यादा अंदर तक ठेल जाते हैं और सीधे-सीधे दिल पर वार होता है। बखूबी तरीके से चुने गए वाद्यों की कारस्तानी इस दर्द को दूना कर देती है।

खोया क्या जो पाया हीं नहीं,
खाली हाथ की लकीरें हैं,
कल जो आयेगा, कल जो जा चुका..

बीता-बीता बीत चुका है,
फिर से पल-पल बीत रहा है..

तारे सारे रात-रात हैं,
दिन आए तो खाली अंबर,
आँख में सपना रह जाता है..


तीसरे गाने ("तेरी सीमाएँ") के साथ पधारती हैं श्रेया घोषाल। इनकी मीठी आवाज़ के बारे में जितना कहा जाए उतना कम होगा। ये जितने आराम से हँसी-खुशी वाले गीत गा लेती हैं, उतने हीं आराम से ग़म और दर्द के गीतों को निबाहती हैं। भले हीं संगीत कितना भी धीमा क्यों न हो, पता हीं नहीं चलता कि इन्हें किसी शब्द को खींचना पड़ रहा है। ऐसा हीं मज़ा लता दीदी के गीतों को सुनकर आया करता था (है)। अब जैसे इसी गीत को ले लीजिए - "मुक्ति को पाना है".. "मुक्ति" शब्द में अटकने की बड़ी संभावनाएँ थीं, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.. इसके लिए श्रेया घोषाल के साथ-साथ संगीतकारों की भी तारीफ़ करनी होगी। पहली मर्तबा मैंने जब इस गीत को सुना तो "मुक्ति" का इस्तेमाल मुझे कुछ अटपटा-सा लगा.. गुलज़ार साहब के नज़्मों में इस शब्द की कल्पना की जा सकती है, लेकिन गीत में? नहीं!! फिर मुझे ध्यान आया कि गुलज़ार साहब ने गुरूदेव के बांग्ला गीतों की तर्ज़ पर इस फिल्म के गीत लिखे हैं और बांग्ला गानों में ऐसे शब्द बहुतायत में नज़र आते हैं। यहाँ यह बात जाननी ज़रूरी है कि गुलज़ार साहब ने गीतों का अनुवाद नहीं किया, बल्कि वही माहौल बरकरार रखने की कोशिश की है।

तेरी सीमाएँ कोई नहीं हैं,
बहते जाना है, बहते जाना है..

तेरे होते दर्द नहीं था,
दिन का चेहरा ज़र्द नहीं था,
तुझसे रूठके मरते रहना है..

तुझको पाना, तुझको छूना,
मुक्ति का पाना है..


अब हम आ पहुँचे हैं चौथे गाने के पास, जो है "नाव मेरी"। एक बंगाली गायिका के बाद बारी है दूसरी बंगालन की यानि कि "मधुश्री" की। इनका साथ दिया है हरिहरण ने। इस गाने में गुलज़ार साहब अपनी दार्शनिक सोच के शीर्ष पर नज़र आते हैं। पहले तो वे कहते हैं कि सागरों में घाट नहीं होते, इसलिए तुम्हें बहते जाना है.. तुम्हारा ठहराव कहीं नहीं। और अंत होते-होते इस बात का खुलासा कर देते हैं कि तुम्हारे लिए किनारा किसी छोर पर नहीं, बल्कि तलछट में है.. तुम डूब जाओ तो शायद तुम्हें किनारा नसीब हो जाओ। इन पंक्तियों का बड़ा हीं गहरा अर्थ है। आप जब तक अपने आप को किसी रिश्ते की सतह पर रखते हैं और कोशिश करते हैं कि वह रिश्ता आपको अपना मान ले, तब तक आप भुलावे में जी रहे होते हैं। फिर या तो आपको एक रिश्ते से दूसरे रिश्ते की ओर बढना होता है या फिर ऐसे हीं किसी रिश्ते की सच्चाईयों में डूब जाना होता है। अगर आप डूब गए तो वह रिश्ता और आप एक हो चुके होते हैं, जिसे कोई जुदा नहीं कर सकता। इसलिए डूब जाने से हीं किनारा नसीब होगा ना कि किसी जगह सतह पर ठहरने से। संभव है कि गुलज़ार साहब ने कुछ और अर्थ सोचकर यह गाना लिखा हो (मैंने अभी तक फिल्म नहीं देखी, इसलिए यकीनन कह नहीं सकता), लेकिन मेरे हिसाब से यह अर्थ भी सटीक बैठता है।

नाव मेरी ठहरे जाने कहाँ!
घाट होते नहीं.. सागरों में कहीं..

दूर नहीं है कोई किनारा,
सागर जाती है हर धारा..

डूब के शायद इस नौका को,
मिल जाए किनारा..


इस फिल्म का अंतिम गाना है "आनंद-लोके मंगल-लोके", जिसे गाया है सुदेशना चटर्जी और साथियों ने। हिंदी रूपांतरण में बांग्ला गाने को यथारूप रखने से ज़ाहिर होता है कि निर्माता-निर्देशक ने गुरूदेव को श्रद्धांजलि अर्पित करने का प्रयास किया है। रवींद्र संगीत में आधुनिक वाद्य-यंत्रों का प्रयोग एक सफ़ल प्रयोग बन पड़ा है। भले हीं इसमें बांग्ला भाषा के शब्द हैं, लेकिन संगीत-संयोजन और गायिका की स्पष्ट आवाज़ के कारण गैर-बांग्लाभाषी भी इसे कम-से-कम एक बार सुन सकते हैं। मुझे जितनी बांग्ला आती है, उस हिसाब से यह कह सकता हूँ कि "सत्य-सुंदर" से गुहार लगाई जा रही है कि इस आनंद-लोक, इस मंगल-लोक में पधारें और स्नेह, प्रेम, दया और भक्ति का वरदान दें ताकि हम सबके प्राण कोमल हो सकें। आगे के बोल मुझे कुछ कठिन लगे, इसलिए न तो उन्हें यहाँ उपलब्ध करा पाया और ना हीं उनका अर्थ समझ/समझा पा रहा हूँ।

आनंद लोके मंगल लोके,
बिराजो सत्य-सुंदर..
स्नेह-प्रेम-दया-भक्ति,
कोमल करे प्राण..


तो ये थे "कशमकश" के पाँच गाने। आज के ढिंचाक जमाने में शांत और सरल गानों की कमी जिन किन्हीं को खल रही होगी, उनके लिए यह एलबम "टेलर-मेड" है। हिन्दी फिल्मों के ये दोनों संगीतकार नए हैं, लेकिन इनकी शुरूआत कमज़ोर नहीं कही जा सकती। इन दोनों के लिए तो यह सौभाग्य की बात है कि इन्हें रवींद्र संगीत पर काम करने का अवसर मिला और इनकी धुनों पर गुलज़ार साहब ने बोल लिखे। हाँ मुझे यहाँ गुलज़ार साहब से थोड़ी-सी शिकायत है। यूँ तो आप हर गाने में उपमाओं और "नई सोचों" की लड़ी लगा देते हैं और विरले हीं अपनी पंक्तियों को दुहराते हैं.. फिर ऐसा क्यों है कि "कशमकश" के गानों में "दुहराव-तिहराव" की भरमार है और हर गाने में एक या दो हीं नए ख़्याल हैं। यह मेरी नाराज़गी है अपने "आदर्श" से... आप लोग इस "बहकावे" में मत बहकिएगा। आप तो इन गानों का आनंद लें।

चलिए तो इस बातचीत को यहीं विराम देते हैं। आज की समीक्षा आपको कैसी लगी, ज़रूर बताईयेगा। अगले हफ़्ते फिर मुलाकात होगी। नमस्कार!

आवाज़ रेटिंग - 7.5/10

एक और बात: इस एलबम के सारे गाने आप यहाँ पर सुन सकते हैं।




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, August 31, 2010

किलिमांजारो में बूम बूम रोबो डा.. रोबोट की हरकतों के साथ हाज़िर है रहमान, शंकर और रजनीकांत की तिकड़ी

ताज़ा सुर ताल ३३/२०१०

सुजॊय - आज है ३१ अगस्त! यानी कि आज 'ताज़ा सुर ताल' इस साल का दो तिहाई सफ़र पूरा कर रहा है। पीछे मुड़ कर देखें तो इस साल बहुत ही कम फ़िल्में ऐसी हैं जिन्होंने बॊक्स ऒफ़िस पर कामयाबी के झंडे गाड़े हैं।

विश्व दीपक - हाँ, लेकिन फ़िल्म संगीत की बात करें तो इन फ़िल्मों के अलावा भी कई फ़िल्मों का संगीत सुरीला रहा है। 'वीर', 'इश्क़िया', 'कार्तिक कॊलिंग‍ कार्तिक', 'आइ हेट लव स्टोरीज़', 'मिस्टर सिंह ऐण्ड मिसेस मेहता', 'वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई' जैसे फ़िल्मों के गानें काफ़ी अच्छे हैं। अब देखते हैं कि २०१० का बेस्ट क्या अभी आना बाक़ी है!

सुजॊय - अच्छा विश्व दीपक जी, क्या आप ने कोई ऐसा कम्प्युटर देखा है जिसका स्पीड १ टेरा हर्ट्ज़ हो, और मेमरी १ ज़ीटा बाइट, जिसका प्रोसेसर पेण्टियम अल्ट्रा कोर मिलेनिया वी-२, और एफ़. एच. पी-४५० मोटर हिराटा, जापान का लगा हो?

विश्व दीपक - अरे अरे ये सब क्या पूछे जा रहे हैं आप? यह 'टी. एस. टी' है भई!

सुजॊय - तभी तो! आज हम जिस फ़िल्म के गानें सुनने जा रहे हैं यह उसी से ताल्लुख़ रखता है। ये जो स्पेसिफ़िकेशन्स मैंने अभी बताए, यह दरसल किसी कम्प्युटर का नहीं, बल्कि एक अत्याधुनिक रोबोट का होगा जिसका निर्माण कर रहे हैं फ़िल्म निर्माता कलानिथि मारन निर्देशक शंकर के साथ मिल कर अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'रोबोट' में।

विश्व दीपक - 'रोबोट' इस देश में बनने वाली सब से महँगी फ़िल्म है और इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं साउथ सुपरस्टार रजनीकांत और ऐश्वर्या राय बच्चन। फ़िल्म में संगीत दिया है ए. आर. रहमान ने और गीतकार हैं स्वानंद किरकिरे। दोस्तों, इससे पहले कि हम 'रोबोट' की बातों को आगे बढ़ाएँ, आइए फ़िल्म का पहला गाना सुन लेते हैं जिसे गाया है ए. आर. रहमान, सुज़ेन, काश और क्रिसी ने।

गीत - नैना मिले


सुजॊय - फ़िल्म की कहानी और प्लॊट के हिसाब से ज़ाहिर है कि इस फ़िल्म के गानें हाइ टेक्नो बीट्स वाले होंगे और गायन शैली भी उसी तरह का रोबोट वाले अंदाज़ का होगा, और अभी अभी जो हमने गीत सुना उसमें इन सभी बातों का पूरा पूरा ख़याल रखा गया है। "नैना मिले, तुम से नैना मिले", स्वानंद किरकिरे के बोलों को ध्यान से सुना जाए तो उनका ख़ास अंदाज़ महसूस किया जा सकता है। लेकिन जैसा कि मैंने कहा कि 'ध्यान से सुना जाए', क्योंकि टेक्नो बीट्स के चलते गीत के बोल पार्श्व में चले गए हैं और संगीत ही सर चढ़ कर बोल रहा है।

विश्व दीपक - वाक़ई एक 'रोबोटिक' गाना है। हाल में एक फ़िल्म आई थी 'लव स्टोरी २०५०' जिसका संगीत भी कुछ इसी तरह का डिमाण्ड करता था। "मिलो ना मिलो" गीत मशहूर हुआ था लेकिन कुल मिलाकर फ़िल्म पिट गई थी। ख़ैर, 'रोबोट' का दूसरा गीत पहले गीत की तुलना में टेक्नो बीट्स के मामले में हल्का है और एक रोमांटिक युगल गीत है मोहित चौहान और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में। सुनते हैं फिर चर्चा करते हैं।

गीत - पागल अनुकन (प्यारा तेरा गुस्सा भी)


विश्व दीपक - भले ही एक नर्मोनाज़ुक रूमानीयत से भरा गीत है, लेकिन स्वानंद किरकिरे इसमें भी वैज्ञानिक शब्दों को डालना नहीं भूले हैं। हिंदी सिनेमा का यह पहला गीत है जिसमें "न्युट्रॊन" और "ईलेक्ट्रॊन" शब्दों का इस्तमाल हुआ है।

सुजॊय - आइए अब इस फ़िल्म के प्रमुख किरदार रोबोट का परिचय आप से करवाया जाए। इस ऐण्ड्रो-ह्युमानोएड रोबोट का नाम है 'चिट्टी'। यह एक इंसान है जिसने जन्म नहीं लिया, बल्कि जिसका निर्माण हुआ है। चिट्टी गा सकता है, नाच सकता है, लड़ सकता है, पानी और आग का उस पर कोई असर नहीं होता। वो हर वो सब कुछ कर सकता है जो एक इंसान कर सकता है लेकिन शायद उससे भी बहुत कुछ ज़्यादा। वो विद्युत-चालित है और वो झूठ नहीं बोल सकता। चिट्टी की कुछ विशेषताओं के बारे में हमने आपको बताया, आइए अब सुनते हैं 'चिट्टी डान्स शोकेस'।

विश्व दीपक - 'चिट्टी डान्स शोकेस' एक डान्स नंबर है प्रदीप विजय, प्रवीन मणि, रैग्ज़ और योगी बी. का।

गीत - चिट्टी डान्स शोकेस


सुजॊय - वाक़ई ज़बरदस्त इन्स्ट्रुमेन्टल पीस था। हिप-हॊप डान्स के शौकीनों के लिए बहुत अच्छा पीस है। इस फ़्युज़न ट्रैक का इस्तमाल टीवी पर होने वाले डान्स रियल्टी शोज़ में किया जा सकता है।

विश्व दीपक - और अब एक ऐसा गीत जिसे सुनते हुए आप शायद ९० के दशक में पहुँच जाएँगे। और वह इसलिए कि इसमें आवाज़ें हैं हरिहरण और साधना सरगम की। लेकिन गाने के अंदाज़ में ९० के दशक की कोई छाप नहीं है। यह तो इसी दौर का गीत है। यह गीत दर-असल इस रोबोट की गरिमा और महिमा का बखान करता है। रहमान के शुरुआती दिनों में दक्षिण के फ़िल्मों में वो जिस तरह का संगीत दिया करते थे, इस गीत में कुछ कुछ उस शैली की छाया मिलती है। सुनते हैं "अरिमा अरिमा"।

गीत - अरिमा अरिमा


विश्व दीपकव - स्वानंद किरकिरे ने केवल "ईलेक्ट्रॊन" और "न्युट्रॊन" तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखा, अब एक ऐसा गीत जिसमें किलिमांजारो और मोहंजोदारो का उल्लेख है, और उल्लेख क्या, गीत के मुखड़े में ही ये दो शब्द हैं जिन पर इस गीत को आधार किया गया है। इस तरह के शब्दों के चुनाव का तो यही उद्येश्य हो सकता है कि धुन पहले बनी होगी और उस धुन पर ये शब्द फ़िट किए गए होंगे।

सुजॊय - जावेद अली और चिनमयी का गाया यह गीत एक मस्ती भरा गीत है जिसमें वह रोबोटिक शैली नहीं है, बल्कि तबले का भी इस्तमाल हुआ है। जावेद अली धीरे धीरे कामयाबी की सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे हैं। आज के दौर के गायकों में उन्होंने अपनी एक अलग जगह बना ही ली है और फ़िल्म संगीत संसार में उन्होंने अपने क़दम मज़बूती से जमा लिए हैं। आइए सुनते हैं "किलिमांजारो"।

गीत - किलिमांजारो


विश्व दीपक - फ़िल्म के शुरु में चिट्टी कोई भी काम तो कर सकता है, लेकिन वो इंसान के जज़्बातों को समझ नहीं सकता। उसमें कोई ईमोशन नहीं है। और तभी डॊ. वासी चिट्टी के प्रोसेसर को अपग्रेड करते हैं और उसमें ईमोशन्स का सिम्युलेशन करते हैं यह सोचे बिना कि इसके परिणाम क्या क्या हो सकते हैं। अब चिट्टी महसूस कर सकता है और सब से पहले जो वो महसूस करता है, वह है प्यार। क्या यही प्यार डॊ. वासी के रास्ते पे दीवार बन कर खड़ा हो जाएगा? क्या डो. वासी का क्रिएशन ही उनका विनाश कर देगा? यही कहानी है 'रोबोट' की।

सुजॊय - और अब एक और रोबोटिक नंबर, फिर से टेक्नो बीट्स की भरमार लिए यह है "बोम बूम रोबोडा", जिसे गाया है रैग्ज़, योगी बी., मधुश्री, कीर्ति सगठिया और तन्वी शाह ने। मधुश्री को ए. आर. रहमान ने कई ख़ूबसूरत गीतों में गवाया है। बहुत ही मिठास है उनकी आवाज़ में। यह ताज्जुब की ही बात है कि मुंबई के फ़िल्मी संगीतकार क्यों उनसे गानें नहीं गवाते! ख़ैर, सुनते हैं यह गीत।

गीत - बूम बूम रोबोडा


विश्व दीपक - और अब फ़िल्म का अंतिम गीत "ओ नए इंसान"। श्रीनिवास और खतिजा रहमान का गाया यह गीत है। श्रीनिवास ने बिलकुल रोबोटिक अंदाज़ में यह गाया है। श्रीनिवास ने इस गीत में दो अलग अलग आवाज़ें निकाली हैं, जो एक दूसरे से बिलकुल अलग है। ऒर्केस्ट्रेशन पूरी तरह से ईलेक्ट्रॊनिक है और इस गीत को सुनते हुए एक साइ-फ़ाइ फ़ील आता है।

सुजॊय - और जिन्हें मालूम नहीं है, उन्हें हम यह बताना चाहेंगे कि खतिजा रहमान ए. आर. रहमान की बेटी है जो इस गीत के ज़रिए हिंदी पार्श्व गायन में क़दम रख रही है। चलिए सुनते हैं यह गीत।

गीत - ओ नए इंसान


सुजॊय - हाँ तो विश्व दीपक जी, कैसा रहा इन रोबोटिक गीतों का अनुभव? मुझे तो बुरा नहीं लगा। हाल के कुछ फ़िल्मों में रहमान का जिस तरह का संगीत आ रहा था, ज़्यादातर सूफ़ियाने अंदाज़ का, उससे बिलकुल अलग हट के, बहुत दिनों के बाद इस तरह का संगीत सुनने में आया है। वैसे हाल में 'शिवाजी' में रहमान ने इस तरह का संगीत दिया था, लेकिन हिंदी के श्रोताओं में 'शिवाजी' के गानें कुछ ख़ास असर नहीं कर सके थे। अब देखना है कि 'रोबोट' के गीतों को किस तरह का रेसपॊन्स मिलता है! "पागल अनुकन" और "किलिमांजारो", ये दोनों गीत मुझे सब से ज़्यादा पसंद आए।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, भले हीं गाने सुनने के दौरान मैंने इलेक्ट्रान, प्रोटॉन, किलिमांजारो और मोहनजोदाड़ो जैसे शब्दों के लिए स्वानंद किरकिरे को क्रेडिट दिया था, लेकिन एक बात मेरे दिल में चुभ-सी रही थी.. शुरू में सोचा कि रहने देता हूँ, हर बात कहनी ज़रूरी नहीं होती, लेकिन जब हम समीक्षा हीं कर रहे हैं तो हमें कुछ भी छुपाने का हक़ नहीं मिलता। शायद आपने रोबोट के तमिल वर्ज़न ऐंदिरन के गाने नहीं सुने। मैंने सुने हैं.. गाने के बोल तो समझ नहीं आए लेकिन ऊपर बताए गए शब्द पकड़ में आ गए थे} और जब मैंने हिन्दी के गाने सुने और हिन्दी में उन्हीं शब्दों की पुनरावृत्ति मिली तो मुझे पक्का यकीन हो गया कि गीतकार ने गाने का बस अनुवाद हीं किया है और कुछ नहीं। नहीं तो तमिल का "डा" (बूम बूम रोबो डा), जो हिन्दी के "रे" या "अरे" के समतुल्य है, हिन्दी में भी "डा" हीं क्यों होता। और भी ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं.. जिन्हें सुनने पर मुझे लगा था कि किसी साधारण-से गीतकार से गाने लिखवाए (अनुवाद करवाए) गए हैं। लेकिन गीतकार के रूप में "स्वानंद किरकिरे" का नाम देखकर मुझे झटका-सा लगा। अब जैसा कि आपके साथ हुआ और दूसरे हिन्दी-भाषी श्रोताओं के साथ होने वाला है, हम तो बस हिन्दी के गाने हीं सुनते हैं और उसी को "असल" समझ बैठते हैं। अब यहाँ पर दोषी कौन है, यह तो कहा नहीं जा सकता, लेकिन स्वानंद साहब से मुझे ऐसी उम्मीद न थी। वे "गुलज़ार" और "महबूब" की तरह मिसाल बन सकते थे, जो तमिल के गानों (जिसे वैरामुतु जैसे बड़े कवि/गीतकार लिखा करते हैं) से बोल नहीं उठाते, बल्कि रहमान की धुनों पर अपने नए बोल लिखते हैं। बस इतना है कि स्वानंद साहब से निराश होने के बावजूद रहमान के संगीत के कारण हीं मैं इस एलबम को पसंद कर पा रहा हूँ। सुजॊय जी, आपने इस एलबम के लिए साढे तीन अंक निर्धारित किए थे, लेकिन मैं आधे अंक की कटौती गीतकार के कारण कर रहा हूँ। एक गीतकार/कवि के मन में शब्दों के लिए जो टीस उठती है, वह तो आप समझ हीं सकते हैं.. है ना? खैर.. मैं भी किस भावनात्मक दरिया में बह गया... हाँ तो, आज की समीक्षा को विराम देने का वक्त आ गया है, अगली बार "अनजाना अनजानी" के साथ हम फिर हाज़िर होंगे। तब तक के लिए शुभदिन एवं शुभरात्रि!!

आवाज़ रेटिंग्स: रोबोट: ***

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ९७- हरिहरण और साधना सरगम की आवाज़ में उस मशहूर गीत का मुखड़ा बताइए जिसके एक अंतरे में पंक्ति है "ये दिल बेज़ुबाँ था आज इसको ज़ुबाँ मिल गई, मेरी ज़िंदगी को एक हसीं दास्ताँ मिल गई"?

TST ट्रिविया # ९८- फ़िल्म 'रोबोट' के साउण्डट्रैक में आपने जितनी भी आवाज़ें सुनीं, उनमें से एक गायिका हैं जिनका असली नाम है सुजाता भट्टाचार्य। बताइए इस गायिका को अब हम किस नाम से जानते हैं?

TST ट्रिविया # ९९- परिवार की नाज़ुक आर्थिक स्थिति के चलते ए. आर. रहमान को कक्षा-९ में स्कूल छोड़ना पड़ा था। बताइए रहमान उस वक़्त किस स्कूल में पढ़ रहे थे?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. खुदा जाने (बचना ए हसीनों)
२. ६७
३. इन दोनों फ़िल्मों में विदेशी गीत की धुन का इस्तेमाल किया गया है। 'वी आर फ़मिली' में एल्विस प्रेस्ली के "जेल-हाउस रॊक" तथा 'कल हो ना हो' में रॊय ओरबिसन के "प्रेटी वोमेन"।

एक बार फिर सीमा जी २ सही जवाबों के साथ हाज़िर हुई, बधाई

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ