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Sunday, November 1, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (१९) फिल्म गीतकार शृंखला भाग १

जब फ़िल्मी गीतकारों की बात चलती है तो कुछ गिनती के नाम ही जेहन में आते हैं, पर दोस्तों ऐसे अनेकों गीतकार हैं, जिनके नाम समय के गर्द में कहीं खो से गए हैं, जिनके लिखे गीत तो हम आज भी शौक से सुनते हैं पर उनके नाम से अपरिचित हैं, और इसके विपरीत ऐसा भी है कि कुछ बेहद मशहूर गीतकारों के लिखे बेहद अनमोल से गीत भी उनके अन्य लोकप्रिय गीतों की लोकप्रियता में कहीं गुमसुम से खड़े मिलते हैं, फ़िल्मी दुनिया के गीतकारों पर "रविवार सुबह की कॉफी" में हम आज से एक संक्षिप्त चर्चा शुरू कर रहे हैं, इस शृंखला की परिकल्पना भी खुद हमारे नियमित श्रोता पराग सांकला जी ने की है, तो चलिए पराग जी के संग मिलने चलें सुनहरे दौर के कुछ मशहूर/गुमनाम गीतकारों से और सुनें उनके लिखे कुछ बेहद सुरीले/ सुमधुर गीत. हम आपको याद दिला दें कि पराग जी मरहूम गायिका गीत दत्त जी को समर्पित जालस्थल का संचालन करते हैं.


१) शैलेन्द्र

महान गीतकार शैलेन्द्र जी का असली नाम था "शंकर दास केसरीलाल शैलेन्द्र". उनका जन्म हुआ था सन् १९२३ में रावलपिन्डी (अब पाकिस्तान में). भारतीय रेलवे में वास मुंबई में सन् १९४७ में काम कर रहे थे. उनकी कविता "जलता है पंजाब " लोकप्रिय हुई और उसी दौरान उनकी मुलाक़ात राज कपूर से हुई. उसीके साथ उनका फ़िल्मी सफ़र शुरू हुआ फिल्म बरसात से ! शंकर जयकिशन की जोड़ी के साथ साथ शैलेंद्र ने सचिन देव बर्मन, सलिल चौधरी और कई संगीतकारों के साथ काम किया. उनके राज कपूर के लिए लिखे गए कई गीत लोकप्रिय है, मगर आज हम उनके एक दुर्लभ गीत के बारे में बात करेंगे. लीजिये उन्ही का लिखा हुआ यह अमर गीत जिसे गाया हैं मखमली आवाज़ के जादूगर तलत महमूद ने फिल्म पतिता (१९५३) के लिए. संगीत शंकर जयकिशन का है और गीत फिल्माया गया हैं देव आनंद पर. सुप्रसिद्ध अंगरेजी कवि पी बी शेल्ली ने लिखा था "Our sweetest songs are those that tell of saddest thoughts".शैलेन्द्र ने इसी बात को लेकर यह अजरामर गीत लिखा और जैसे कि पी बी शेल्ली के विचारों को एक नए आसमानी बुलंदी पर लेकर चले गए. गीतकार शैलेन्द्र पर विस्तार से भी पढें यहाँ.



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२) इन्दीवर

बप्पी लाहिरी के साथ इन्दीवर के गाने सुननेवालों को शायद यह नहीं पता होगा की इन्दीवर (श्यामलाल राय) ने अपना पहला लोकप्रिय गीत (बड़े अरमानों से रखा हैं बलम तेरी कसम) लिखा था सन् १९५१ में फिल्म मल्हार के लिए. कहा जाता है की सन् १९४६ से १९५० तक उन्होंने काफी संघर्ष किया, मगर उसके बारे में कोई ख़ास जानकारी उपलब्ध नहीं है. रोशन के साथ इन्दीवर को जोड़ी बन गयी, मगर दूसरे लोकप्रिय संगीतकारों के साथ उन्हें गीत लिखने के मौके (खासकर पचास के दशक में) ज्यादा नहीं मिले. बाद में कल्यानजी - आनंद जी के साथ इन्दीवर की जोड़ी बन गयी. समय के साथ इन्दीवर ने समझौता कर लिया और फिर...

खैर, आज हम महान गायक मुकेश, संगीतकार रोशन और गीतकार इन्दीवर का एक सुमधुर गीत लेकर आये है जिसे परदे पर अभिनीत किया गया था संजीव कुमार (और साथ में मुकरी और ज़हीदा पर). फिल्म है अनोखी रात जो सन् १९६८ में आयी थी. यह फिल्म रोशन की आखरी फिल्म थी और इस फिल्म के प्रर्दशित होने से पहले ही उनका देहांत हुआ था.

इतना दार्शनिक और गहराई से भरपूर गीत शायद ही सुनने मिलता है.



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३) असद भोपाली

असद भोपाली (असद खान) ऐसे गीतकार हैं जिन्हें लगभग ४० सालके संघर्ष के बाद बहुत बड़ी सफलता मिली. उनका लिखा हुआ एक साधारण सा गीत "कबूतर जा जा जा " जैसे के देश के हर युवक युवती के लिए प्रेमगीत बन गया. यह गीत था फिल्म मैंने प्यार किया (१९८९) का जिसे संगीतबद्ध किया था राम- लक्ष्मण ने.

असद भोपाली की पहली फिल्मों में से एक थी बहुत बड़े बजट की फिल्म अफसाना (१९५१) जिसमे थे अशोक कुमार, वीणा, जीवन, प्राण, कुलदीप कौर आदि. संगीत था उस ज़माने के लोकप्रिय हुस्नलाल भगतराम का. इसके गीत (और फिल्म भी) लोकप्रिय रहे मगर असद चोटी के संगीतकारोंके गुट में शामिल ना हो सके. सालों साल तक वो एन दत्ता, हंसराज बहल, रवि, सोनिक ओमी, उषा खन्ना, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल आदि संगीतकारों के साथ करते रहे मगर वह कामयाबी हासिल न कर सके जो उन्हें फिल्म मैंने प्यार किया से मिली.

लीजिये फिल्म अफसाना (१९५१) का लता मंगेशकर का गाया हुआ यह गीत सुनिए जिसे असद भोपाली ने दिल की गहराईयों से लिखा है



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४) कमर जलालाबादी

अमृतसर के पास एक छोटा सा गाँव हैं जिसका नाम है जलालाबाद , जहां पर जन्म हुआ था ओमप्रकाश (कमर जलालाबादी) का. महान फिल्मकार दल्सुखलाल पंचोली ने उन्हें पहला मौका दिया था फिल्म ज़मीनदार (१९४२) के लिए. उन्होंने चालीस और पचास के दशक में सदाबहार और सुरीले गीत लिखे. उन्होंने सचिन देव बर्मन के साथ उनकी पहली फिल्म एट डेज़ (१९४६) में भी काम किया. उस ज़माने के लगभग हर संगीतकार के साथ (नौशाद और शंकर जयकिशन के अलावा) उन्होंने गीत लिखे.

उनका लिखा हुआ "खुश हैं ज़माना आज पहली तारीख हैं"(फिल्म पहली तारीख १९५४) का गीत आज भी बिनाका गीतमाला पर महीने की पहली तारीख को बजता है. रिदम किंग ओ पी नय्यर के साथ भी उन्होंने "मेरा नाम चीन चीन चू" जैसे लोकप्रिय गीत लिखे.

लीजिये उनका लिखा हुआ रेलवे की तान पर थिरकता हुआ गीत "राही मतवाले" सुनिए. इसे गाया है तलत महमूद और सुरैय्या ने फिल्म वारिस (१९५४) के लिए. मज़े की बात है कि गीत फिल्माया भी गया था इन्ही दो कलाकारों पर.



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५) किदार शर्मा

महान फिल्म निर्माता, निर्देशक और गीतकार किदार शर्मा की जीवनी "The one and lonely Kidar Sharma" हाल ही में प्रर्दशित हुई थी. जिस गीतकार ने सैंकडो सुरीले गीत लिखे उन्हें आज ज़माना भूल चूका है. कुंदन लाल सहगल की फिल्म "देवदास " के अजरामर गीत इन्ही के कलम से लिखे गए है. "बालम आये बसों मोरे मन में" और "दुःख के अब दीन बीतत नाही". उनके लिखे हुए लोकप्रिय गीत है इन फिल्मों मे : नील कमल (१९४७), बावरे नैन (१९५०), सुहाग रात (१९४८). फिल्म जोगन (१९५०) का निर्देशन भी किदार शर्मा का है.

आज की तारीख में किदार शर्मा को कोई अगर याद करता हैं तो इस बात के लिए की उन्होंने हिंदी फिल्म जगत को राज कपूर, मधुबाला, गीता बाली जैसे सितारे दिए. मुबारक बेग़म का गाया "कभी तनहाईयों में यूं हामारी याद आयेगी" भी इन्ही किदार शर्मा का लिखा हुआ है. इसे स्वरबद्ध किया स्नेहल भाटकर (बी वासुदेव) ने और फिल्माया गया हैं तनुजा पर. मुबारक बेग़म के अनुसार यह गीत अन्य लोकप्रिय गायिका गानेवाली थी मगर किसी कारणवश वह ना आ सकी और मुबारक बेग़म को इस गीत को गाने का मौका मिला. उन्होंने इस गीत के भावों को अपनी मीठी आवाज़ में पिरोकर इसे एक यादगार गीत बना दिया.



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प्रस्तुति -पराग सांकला


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Monday, April 20, 2009

ख्यालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते...रोशन साहब का एक नायाब गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 57

न १९४९ में एक नौजवान अपनी पत्नी का प्रोत्साहन और ज़िन्दगी में कुछ बड़ा करने का ख्याल लेकर मायानगरी मुंबई पहुँचे थे। एक दिन ख़ुशकिस्मती से दादर स्टेशन पर उनकी मुलाक़ात हो गई फ़िल्मकार केदार शर्मा से। केदार शर्मा उन दिनो मशहूर थे नये नये प्रतिभाओं को अपनी फ़िल्मों में मौका देने के लिए। बस फिर क्या था, उन्होने इस नौजवान को भी अपना पहला 'ब्रेक' दिया बतौर संगीतकार, फ़िल्म थी 'नेकी और बदी'। और वह नौजवान जिसकी हम बात कर रहे हैं, वो और कोई नहीं बल्कि संगीतकार रोशन थे। दुर्भाग्यवश 'नेकी और बदी' में रोशन अपनी संगीत का कमाल नहीं दिखा सके और ना ही यह फ़िल्म दर्शकों के दिलों को छू सकी। इस असफलता से रोशन इतने निराश हो गए थे कि उनकी जीने की चाहत ही ख़त्म हो गई थी। केदार शर्माजी का बड़प्पन देखिये कि उन्होने रोशन की यह हालत देख कर उन्हे अपनी अगली फ़िल्म 'बावरे नैन' में भी संगीत देने का एक और मौका दे दिया। और इस बार इस मौके को रोशन ने इस क़दर अंजाम दिया कि उन्हे फिर कभी पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। बावरे नैन कामयाब रही और इसके संगीत ने भी काफ़ी धूम मचाया। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में प्रस्तुत है इसी फ़िल्म का एक सदाबहार युगल गीत।

बावरे नैन १९५० की फ़िल्म थी जिसका निर्माण केदार शर्मा ने अपनी बैनर ऐम्बिशियस पिक्चर्स के तले बनाई। राज कपूर और गीता बाली परदे पर नज़र आए। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि १९४७ में शर्माजी ने ही राज कपूर को अपनी फ़िल्म नीलकमल में पहली बार बतौर नायक मौका दिया था और १९४८ में गीता बाली को फ़िल्म सुहाग रात में। सुहाग रात में ही उन्होने संगीतकार स्नेहल भाटकर को भी अपना पहला ब्रेक दिया था। ख़ैर, 'बावरे नैन' में रोशन का संगीत लोकप्रिय हुआ, जिसमें गीता रॉय, मुकेश, राजकुमारी, आशा भोंसले और मोहम्मद.रफ़ी ने गाने गाये। आज इस फ़िल्म का जो गीत हम आप के लिये चुन कर लाये हैं, वह गीत है मुकेश और गीता रॉय का गाया हुआ। यह गीत इस गायक-गायिका जोड़ी की सबसे लोकप्रिय युगल गीतों में से एक है। केदार शर्मा के ही बोल हैं। ४० के दशक के आख़िर के सालों से फ़िल्म संगीत में और्केस्ट्रेशन का प्रभाव बढ़ने लगा था। इस वजह से गीतों की अवधी भी बढ़ने लगी थी। प्रस्तुत गीत ने एक साधारण युगल गीत होते हुए और केवल ३ अंतरे के होते हुए भी ५ मिनट की सीमा को छू लिया। तो सुनिये यह गीत और याद कीजिये उसे जिसे आपने अपने ख्यालों में बसा रखा है।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. एक भोजपुरी फिल्म जो मुग़ले आज़म की टक्कर दे गयी, उसका शीर्षक गीत है ये.
२. लता -तलत की आवाजें, चित्रगुप्त का संगीत.
३. मुखड़े में एक प्यारा शब्द है - "सुगना".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
मनु जी क्या बात है...एक बार फिर वही जोश नज़र आ रहा है. नीलम जी आपकी फरमाईश वाला गीत "मेरी जान तुम पे सदके" पहले ही ओल्ड इस गोल्ड का हिस्सा बन चूका है...ज़रा अतीत में झांकिए. बबली जी आपका स्वागत है...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Sunday, November 16, 2008

बस एक धुन याद आ गई थी....संगीतकार रोशन की याद में

संगीतकार रोशन की ४१ वीं पुण्यतिथी पर हिंद युग्म आवाज़ की श्रद्धांजली

संगीतकार रोशन अक्सर अनिल दा (अनिल बिस्वास) को रिकॉर्डिंग करते हुए देखने जाया करते थे. एक दिन अनिल दा रिकॉर्डिंग कर रहे थे "कहाँ तक हम गम उठाये..." गीत की,कि उन्होंने पीछे से किसी के सुबकने की आवाज़ सुनी.मुड कर देखा तो रोशन आँखों में आंसू लिए खड़े थे. भावुक स्वरों में ये उनके शब्द थे- "दादा, क्या मैं कभी कुछ ऐसा बना पाउँगा..." अनिल दा ने उन्हें डांट कर कहा "ऐसा बात मत कहो...कौन जाने तुम इससे भी बेहतर बेहतर गीत बनाओ किसी दिन..." कितना सच कहा था अनिल दा ने.


बात १९४९ की है. निर्देशक केदार शर्मा फ़िल्म बना रहे थे "नेकी और बदी", जिसके संगीतकार थे स्नेहल भटकर. तभी उन्हें मिला हाल ही में दिल्ली से मुंबई पहुँचा एक युवा संगीतकार रोशन, जिसकी धुनों ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने स्नेहल साहब से बात कर फ़िल्म "नेकी और बदी" का काम रोशन साहब को सौंप दिया. फ़िल्म नही चली पर केदार जी को अपनी "खोज" पर पूरा विशवास था तो उन्होंने अगली फ़िल्म "बावरे नैन" से रोशन साहब को फ़िर से एक नई शुरुआत करने का मौका दिया. इस बार रोशन साहब भी नही चूके. १९५० में आई इस फ़िल्म के सभी गीत बेहद मकबूल हुए विशेषकर -"ख्यालों में किसी के इस तरह आया नही करते...","तेरी दुनिया में दिल लगता नही..." और "सुन बैरी बालम सच बोल रे इब क्या होगा..." ने तो रातों रात रोशन साहब को इंडस्ट्री में स्थापित कर दिया.

मुश्किल से मुश्किल रागों पर रोशन साहब ने धुनें बनाईं और इतनी सहजता से उन्हें आम श्रोताओं तक पहुंचाया कि वो आज तक हम सब के मन से उतर नही पाये. फिल्मों में कव्वालियों को उन्होंने नया रंग दिया. सोचिये ज़रा क्या ये गीत कभी पुराने हो सकते हैं - "निगाहें मिलाने को जी चाहता है...", "लागा चुनरी में दाग....", "जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा....", "बहारों ने मेरा चमन लूटकर...", "मिले न फूल तो...", "कारवां गुजर गया ....", "रहें न रहें हम...", "ओ रे ताल मिले..." या फ़िर रफी साहब का गाया फ़िल्म चित्रलेखा का वो अमर गीत "मन रे तू काहे न धीर धरे...."

१९६४ में आई चित्रलेखा भी केदार शर्मा की रीमेक थी रंगीन रजत पटल पर. तुलसी दास की दो पंक्तियों से प्रेरित होकर (मन तू कहे न धीर धरे अब, धीरे धीरे सब काज सुधरता...) केदार जी ने ही इस स्थायी का सुझाव दिया था जिसे साहिर साहब ने मुक्कमल रूप दिया और रफी साहब ने आवाज़. इसी फ़िल्म में लता मंगेशकर के गाये इन दो गीतों को भी याद कीजिये -"संसार से भागे फिरते हो..." और "ऐ री जाने न दूँगी...". रागों का इतने शुद्ध रूप में अन्य किसी फ़िल्म संगीतकार ने इस मात्रा में प्रयोग नही किया, जैसा रोशन साहब ने किया.

आगे बढ़ने से पहले क्यों न हम ये अमर गीत एक बार फ़िर सुन लें - "मन रे तू काहे न धीर धरे..."



वापस आते हैं रोशन साहब के संगीत सफर पर. गुजरांवाला से लखनऊ के मौरिस कॉलेज ऑफ़ म्यूजिक में दाखिला लेने आए रोशन साहब से कॉलेज के प्रधानाचार्य ने कॉल बेल बजाकर उस स्वर के नाद को पहचानने को कहा. सही नाद पहचानने के एवज में उन्हें दाखिला मिला. मुंबई कूच करने से पहले उन्होंने दिल्ली के आल इंडिया रेडियो में १० साल जलतरंग वादक के रूप में काम किया. बावरे नैन की सफलता के बाद उन्होंने ५० के दशक में मल्हार, शीशम और ऐ के अब्बास की अनहोनी जैसी फिल्मों में संगीत दिया. अनहोनी में तलत महमूद का गाया "मैं दिल हूँ एक अरमान भरा..." रोशन के १० बहतरीन गीतों में से एक कहा जा सकता है. १९६० में मिली एक और बड़ी सफलता फ़िल्म बरसात की रात के रूप में. "जिंदगी भर नही भूलेगी..." और याद कीजिये वो मशहूर और लाजवाब कव्वाली "न तो कारवां की तलाश है...". सुरों का उतार चढाव, शब्दों की लयकारी, और ताल में संजीदगी भी मस्ती भी, क्या नही है इस कव्वाली में. आगे बढ़ेंगे पर इस कव्वाली को सुने बिना नही, सुनिए -



1963 में आई फ़िल्म ताज महल ने रोशन साहब के संगीत सफर में चार चाँद लगा दिए. "जो वादा किया ...." और पाँव छू लेने दो..." जैसे गीत आज भी अपने नर्मो नाज़ुक मिजाज़ के मामले में नासानी हैं. इसी फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्म फेयर पुरस्कार भी मिला. इंडस्ट्री के दांव पेंचों से दूर रोशन उम्र भर बस संगीत की ही साधना करते रहे. वो अपने समकालीन संगीतकारों से बहुत अलग थे. वो मेलोडी को साज़ बाजों से अधिक ताजीह देते थे. शास्त्रीय संगीत पर भी उनकी पकड़ बखूबी झलकती थी, कुछ गीत तो उन्होंने शुद्ध बंदिश के बनाये जैसे - "आली पिया बिन.." (राग यमन). वो फ़िल्म के मूड और फ़िल्म की सिचुएशन को गीत में उभारने के लिए नए प्रयोगों से भी नही चूकते थे. "दुनिया करे सवाल तो हम..." और "तुम एक बार मोहब्बत का..." जैसे गीत आम फिल्मी गीतों से अलग छंद रुपी थे. वाध्यों के लेकर उनकी समझ बेमिसाल थी.

स्वभाव से हंसमुख रोशन साहब संसार से विदा भी हुए तो हँसते हँसते..जी हाँ, एक पार्टी में अदाकार प्राण के किसी चुटकुले पर वो इतनी जोर से हँसे कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा और ५० वर्ष की उम्र में, आज ही के दिन १९६७ में वो हम सब को छोड़ कर चले गए. उनके बेटे और मशहूर निर्देशक राकेश रोशन उन्हें याद करते हुए बताते हैं -"अक्सर वो हमें रात के २ बजे जगे हुए मिल जाते थे पूछने पर कहते थे - बस एक धुन याद आ गई..." ऐसे थे हम सब के प्रिय रोशन साहब. उन्होंने कम काम किया पर जो भी किया लाजवाब किया. फ़िल्म इंडस्ट्री से उन्हें वो सब नही मिला,जिसके कि वो हक़दार थे पर ४१ सालों के बाद आज भी हर संगीत प्रेमी ह्रदय उनके गीतों को सुन धड़कता है, इससे बड़ी कमियाबी एक कलाकार के लिए क्या होगी.शायद ये गीत उनके संगीत की अमरता को सही रूप से वर्णित करता है. लता मंगेशकर, फ़िल्म ममता में - "रहें न रहें हम, महका करेंगे बन के कली बन के सबा बागे वफा में ....", गीतकार हैं मजरूह सुल्तानपुरी. सुनें और याद करें रोशन साहब को -




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