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Saturday, November 26, 2016

"प्यार किया तो डरना क्या...”, ’एक गीत सौ कहानियाँ’ की 100-वीं कड़ी में इस कालजयी रचना की बातें


एक गीत सौ कहानियाँ - 100 (अंतिम कड़ी)
 

'जब प्यार किया तो डरना क्या...' 



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 100-वीं कड़ी में आज जानिए 1960 की कालजयी फ़िल्म ’मुग़ल-ए-आज़म’ के मशहूर गीत "प्यार किया तो डरना क्या...” के बारे में जिसे लता मंगेशकर ने गाया था। बोल शिव शक़ील बदायूंनी के और संगीत नौशाद का।

फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी किस्से-कहानियाँ सुनाते हुए आज हम आ पहुँचे हैं ’एक गीत सौ कहानियाँ’ स्तंभ के 100-वें पड़ाव पर। और यहाँ पहुँच कर रुकती है यह कारवाँ। ’एक गीत सौ कहानियाँ’ के इस सीज़न का यही है समापन अंक। आप सभी ने इस सफ़र में हमारा पूरा-पूरा साथ दिया, इस मंज़िल तक हमने साथ-साथ सफ़र तय किया, इसके लिए हम आप सभी पाठकों के आभारी हैं। इस सीज़न के इस अन्तिम अंक को ख़ास बनाने के लिए हम लेकर आए हैं एक बहुत ही ख़ास गीत। यह उस फ़िल्म का गीत है जो हिन्दी फ़िल्म इतिहास के 10 सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में गिना जाता है। और यह वह गीत है जो फ़िल्म-संगीत इतिहास के 10 सर्वश्रेष्ठ रोमान्टिक गीतों में गिना जाता है। यह फ़िल्म है ’मुग़ल-ए-आज़म’ और यह गीत है “प्यार किया तो डरना क्या...”। 

‘मुग़ल-ए-आज़म' 1960 की सर्वाधिक चर्चित फ़िल्म। के. आसिफ़ निर्देशित इस महत्वाकांक्षी फ़िल्म की नीव सन् 1944 में रखी गयी थी। दरसल बात ऐसी थी कि आसिफ़ साहब ने एक नाटक पढ़ा। उस नाटक की कहानी शहंशाह अकबर के राजकाल के पार्श्व में लिखी गयी थी। कहानी उन्हें अच्छी लगी और उन्होंने इस पर एक बड़ी फ़िल्म बनाने की सोची। लेकिन उन्हें उस वक़्त यह अन्दाज़ा भी नहीं हुआ होगा कि उनके इस सपने को साकार होते 16 साल लग जायेंगे। 'मुग़ल-ए-आज़म' अपने ज़माने की बेहद महंगी फ़िल्म थी। एक एक गीत के सीक्वेन्स में इतना खर्चा हुआ कि जो उस दौर के किसी पूरी फ़िल्म का खर्च होता था। नौशाद के संगीत निर्देशन में भारतीय शास्त्रीय संगीत व लोक संगीत की छटा लिए इस फ़िल्म में कुल 12 गीत थे जिनमें आवाज़ें दी उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ, लता मंगेशकर, शम्शाद बेग़म और मोहम्मद रफ़ी। हिन्दी फ़िल्म संगीत के इतिहास का यह एक स्वर्णिम अध्याय रहा। यहाँ तक कि इस फ़िल्म के सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "प्यार किया तो डरना क्या" को शताब्दी का सबसे रोमांटिक गीत का ख़िताब भी दिया गया था। 

नौशाद साहब के ज़बान से 'मुग़ल-ए-आज़म' के साथ जुड़ी उनकी यादों के उजाले पेश हैं, नौशाद साहब की ये
शकील, लता और नौशाद
बातें हमें प्राप्त हुईं हैं विविध भारती के 'नौशाद-नामा' कार्यक्रम के ज़रिए - "मुझे एक क़िस्सा याद है, इसी घर में (जहाँ उनका यह 'इंटरव्यू' रिकार्ड हुआ था) छत पर एक कमरा है। एक दिन मैं वहाँ बैठकर अपनी आँखें बंद करके फ़िल्म 'अमर' का एक गाना बना रहा था। ऐसे में के. आसिफ़ वहाँ आये और नोटों की एक गड्डी, जिसमें कुछ 50,000 रुपय थे, उन्होंने मेरी तरफ़ फेंका। यह अगली फ़िल्म के लिए 'अडवांस' था। मेरा सर फिर गया और उन पर चिल्लाया, "यह आपने क्या किया, आपने मेरा सारा काम ख़राब कर दिया, आप अभी ये पैसे उठाकर ले जायो और ऐसे किसी आदमी को दे दो जो पैसों के बग़ैर काम नहीं करता हो।" थोड़ी देर के बाद आसिफ़ साहब कहने लगे कि मैं 'मुग़ल-ए-आज़म'  बनाने जा रहा हूँ। मैंने कहा, "कोई भी आज़म बनाइए, मैं आपके साथ हूँ क्युंकि आपका और हमारा उस वक़्त का साथ है जब दादर पर हम इरानी होटल में एक कप चाय आधी आधी पीते थे"। हमने कहा कि "हमारा आपका साथ उस वक़्त का है, क्या आप ये पैसे नहीं देंगे तो मैं काम नहीं करूँगा?" वो नीचे गये और मेरी पत्नी से कहा कि "अरे, वो उपर छत पर नोट फेंक रहे हैं।" वो मेरी पतनी को उपर ले आये और ज़मीन पर फैले नोटों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, "मैनें दिया था उनको 'अडवांस', वो रखे नहीं"। तब मैने कहा, "देखिए, यह आप रखिए पैसे अपने, आप बनाइए, मैं आपके साथ हूँ, ख़ुदा आपको कामयाबी दे"। फिर वह फ़िल्म बनी, और बहुत सारे साल गुज़र गये इस फ़िल्म के बनते बनते। यह वही घर है जहाँ उस फ़िल्म की मीटिंग वगेरह हुआ करती थी। आख़िर में 'मुग़ल-ए-आज़म' बनकर तय्यार हो गयी।" 

अब ज़रा इस गीत को गानेवालीं सुरकोकिला लता मंगेशकर की भी राय जान लें इस गीत के बनने की कहानी के बारे में। अभी हाल में जब IBN7 TV Channel वालों ने एक मुलाक़ात में लताजी से पूछा:

"60 के दशक की बात करें तो एक फ़िल्म जिसे हम नज़रंदाज़ नहीं कर सकते, 'मुग़ल-ए-आज़म'। वह एक गाना, जो आज भी लोगों को उतना ही 'हौंटिंग फ़ीलिंग' देता है, लोग कहते हैं कि 'रोंगटे खड़े हो जाते हैं उस गाने को सुनकर', 'प्यार किया तो डरना क्या'। गाना बहुत ही 'लीजेन्डरी' है, कहते हैं कि नौशाद साहब ने आपको बाथरूम मे वह गाना गवाया था, बताइए क्या यह सच है?" 


सवाल सुनते ही लताजी के साथ साथ सभी दर्शक ज़ोर से हँस पड़े, और फिर लताजी ने जवाब दिया - "नहीं, बाथरूम मे नहीं गवाया था, वह गाना जब हमने रिकार्ड किया, तो 'लास्ट लाइन' उनको 'रिपीट' करनी थी 'इको इफ़ेक्ट' के लिए। पर 'इको इफ़ेक्ट' तब ऐसे नहीं आता था, किसी मशीन से नहीं आता था। तो मुझे उन्होने दूसरे कमरे में खड़ा किया था, और वहाँ से मैने गाया, थोड़ा नज़दीक जाके गाया, मतलब, वही सर्कस ही चलता रहा, यहाँ से वहाँ, वहाँ से वहाँ, इस तरह से उन्होंने रिकार्ड किया था।" 


बाथरूम में नहीं गवाया था?

(हँसते हुए), जी नहीं, बाथरूम में नहीं गवाया था।

“जब प्यार किया तो डरना क्या...” गीत के दो पैरोडी संस्करण भी बने हैं, ऐसा शायद ही किसी और गीत के साथ हुआ हो। पहला गीत है मन्ना डे का गाया हुआ 1967 की फ़िल्म ’राज़’ का गीत “जब प्यार किया तो मरना क्यों, अरे प्यार किया कोई जंग नहीं की, छुरियों से फिर लड़ना क्यों”। यह गीत आइ.एस. जोहर पर फ़िल्माया गया था और हास्य रस में डुबो कर इसे पेश किया गया। गीत के बोलों के लिए कमर जलालाबादी और संगीत के लिए कल्याणजी-आनन्दजी को भले ही क्रेडिट दिया गया है, पर बोल और संगीत, दोनों के लिहाज़ से यह गीत मूल गीत से 90% मिलता-जुलता है। दूसरा पैरोडी बना 1970 में, फ़िल्म थी ’रातों का राजा’। इस फ़िल्म में गीतकार राजेश नाहटा और संगीतकार राहुल देव बर्मन ने शम्शाद बेगम और महेन्द्र कपूर से गवाया था “जब प्यार किया तो डरना क्या, प्यार किया कोई दारु नहीं पी, छुप-छुप प्याले भरना क्या”। यह भी हास्य रस आधारित गीत है जो वैशाली और राजेन्द्र नाथ पर फ़िल्माया गया। इस गीत का संगीत पूर्णत: मूल गीत की धुन पर ही है, पर बोल नए हैं, जिसे सही मायने में पैरोडी कहते हैं।

ख़ैर यह तो रही पैरोडी की बातें, लेकिन आज हम सुनेंगे मूल गीत। आइए सुनते हैं यह कालजयी रचना और ’एक गीत सौ कहानियाँ’ स्तंभ को फ़िलहाल यहीं समाप्त करने की दीजिए मुझे इजाज़त, नमस्कार! 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, November 23, 2014

‘प्रेम जोगन बन के...’ : SWARGOSHTHI – 195 : RAG SOHANI



स्वरगोष्ठी – 195 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 4 : राग सोहनी

एक बड़े मानदेय के एवज में उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ने रचे मुगल-ए-आजम के मनोहारी गीत




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के प्रयोक्ताओं और विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के चौथे अंक में आज हम आपसे 1956 में प्रदर्शित, भारतीय फिल्म जगत की उल्लेखनीय फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ के एक गीत- ‘प्रेम जोगन बन के...’ पर चर्चा करेंगे। फिल्म के इस गीत में राग सोहनी के स्वरों का भावपूर्ण उपयोग किया गया है। भारतीय संगीत के शीर्षस्थ साधक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ने इस गीत को स्वर दिया था। खाँ साहब ने अपने पूरे सांगीतिक जीवनकाल में एकमात्र फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ में ही दो गीत गाये थे। इन्हीं दो गीतों में से एक गीत राग सोहनी के स्वरों में पगा हुआ है। आज की गोष्ठी में हम इसी गीत पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही राग ‘सोहनी’ के मिजाज को समझने के लिए हम आपके लिए सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ के स्वरों में इस राग की एक बन्दिश भी प्रस्तुत करेंगे। 
 


उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ
मारे कई संगीत-प्रेमियों ने फिल्म संगीत में पटियाला कसूर घराने के विख्यात गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के योगदान पर चर्चा करने का आग्रह किया था। आज का यह अंक हम उन्हीं की फरमाइश पर प्रस्तुत कर रहे हैं। पटियाला कसूर घराने के सिरमौर, उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ पिछली शताब्दी के बेमिसाल गायक थे। अपनी बुलन्द गायकी के बल पर संगीत-मंचों पर लगभग आधी शताब्दी तक उन्होने अपनी बादशाहत को कायम रखा। पंजाब अंग की ठुमरियों के वे अप्रतिम गायक थे। संगीत-प्रेमियों को उन्होने संगीत की हर विधाओं से मुग्ध किया, किन्तु फिल्म संगीत से उन्हें परहेज रहा। एकमात्र फिल्म- ‘मुगल-ए-आजम’ में उनके गाये दो गीत हैं। आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में हम इनमें से एक गीत पर चर्चा करेंगे।

भारतीय फिल्मों के इतिहास में 1960 में प्रदर्शित, बेहद महत्त्वाकांक्षी फिल्म- ‘मुगल-ए-आजम’, एक भव्य कृति थी। इसके निर्माता-निर्देशक के. आसिफ ने फिल्म की गुणबत्ता से कोई समझौता नहीं किया था। फिल्म के संगीत के लिए उन्होने पहले गोविन्द राम और फिर अनिल विश्वास को दायित्व दिया, परन्तु फिल्म-निर्माण में लगने वाले सम्भावित अधिक समय के कारण बात बनी नहीं। अन्ततः संगीतकार नौशाद तैयार हुए। नौशाद ने फिल्म में मुगल-सल्तनत के वैभव को उभारने के लिए तत्कालीन दरबारी संगीत की झलक दिखाने का हर सम्भव प्रयत्न किया। नौशाद और के. आसिफ ने तय किया कि अकबर के नवरत्न तानसेन की मौजूदगी का अनुभव भी फिल्म में कराया जाए। नौशाद की दृष्टि विख्यात गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ पर थी, किन्तु फिल्म में गाने के लिए उन्हें मनाना सरल नहीं था। पहले तो खाँ साहब ने फिल्म में गाने से साफ मना कर दिया, परन्तु जब दबाव बढ़ा तो टालने के इरादे से, एक गीत के लिए 25 हजार रुपये की माँग की। खाँ साहब ने सोचा कि एक गीत के लिए इतनी बड़ी धनराशि देने के लिए निर्माता तैयार नहीं होंगे। यह उस समय की एक बड़ी धनराशि थी, परन्तु के. आसिफ ने तत्काल हामी भर दी। नौशाद ने शकील बदायूनी से प्रसंग के अनुकूल गीत लिखने को कहा। गीत तैयार हो जाने पर नौशाद ने खाँ साहब को गीत सौंप दिया। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ने ठुमरी अंग की गायकी में अधिक प्रयोग किए जाने वाले राग सोहनी, दीपचन्दी ताल में निबद्ध कर गीत- ‘प्रेम जोगन बन के...’ को रिकार्ड कराया। रिकार्डिंग से पहले खाँ साहब ने वह दृश्य देखने की इच्छा भी जताई, जिस पर इस गीत को शामिल करना था। मधुबाला और दिलीप कुमार के उन प्रसंगों को देख कर उन्होने गायन में कुछ परिवर्तन भी किये। इस प्रकार भारतीय फिल्म-संगीत-इतिहास में राग सोहनी के स्वरों में ढला एक अनूठा गीत शामिल हुआ। आइए पहले आपको यह गीत सुनवाते हैं-


राग – सोहनी : फिल्म – मुगल-ए-आजम : ‘प्रेम जोगन बन के...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ : ताल – दीपचन्दी




उस्ताद राशिद खाँ 
उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ द्वारा राग सोहनी के स्वरों में पिरोया यह गीत के. आसिफ को इतना पसन्द आया कि उन्होने खाँ साहब को दोबारा 25 हजार रुपये भेंट करते हुए एक और गीत गाने का अनुरोध किया। खाँ साहब का फिल्म में गाया राग रागेश्री, तीनताल में निबद्ध दूसरा गीत है- ‘शुभ दिन आयो राजदुलारा...’। ये दोनों गीत फिल्म संगीत के इतिहास के सर्वाधिक उल्लेखनीय किन्तु सबसे खर्चीले गीत सिद्ध हुए।

आइए, खाँ साहब के गाये, राग सोहनी में निबद्ध इस गीत के बहाने थोड़ी चर्चा राग सोहनी के बारे में करते हैं। हम ऊपर यह चर्चा कर चुके हैं कि राग सोहनी का प्रयोग खयाल और ठुमरी, दोनों प्रकार की गायकी में किया जाता है। ठुमरी अंग में इस राग का प्रयोग अधिक होता है। यह राग मारवा थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग पंचम स्वर का प्रयोग वर्जित होता है। आरोह में कोमल ऋषभ स्वर पूर्णतः वर्जित नहीं होता, बल्कि अल्प परिमाण में प्रयोग किया जाता है। राग सोहनी में उन्हीं स्वरों का प्रयोग होता है, जिनका राग पूरिया और मारवा में भी किया जाता है। किन्तु इसके प्रभाव और भावाभिव्यक्ति में पर्याप्त अन्तर हो जाता है। राग सोहनी का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। धैवत पीड़ा की अभिव्यक्ति करने में समर्थ होता है। ‘नी सां रें (कोमल) सां’ की स्वर संगति से तीव्र पुकार का वातावरण निर्मित होता है। संवादी गान्धार कुछ देर के लिए इस उत्तेजना को शान्त कर सुकून देता है। वास्तव में वादी और संवादी स्वर राग के प्राणतत्त्व होते हैं, जिनसे रागों के भावों का सृजन होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में राग सोहनी के भाव अधिक स्पष्ट होते हैं। इस राग में मींड़ एवं गमक को कसे हुए ढंग से मध्यलय में प्रस्तुत करने से राग का भाव अधिक मुखरित होता है। राग सोहनी का चलन कुछ इस प्रकार से किया जाता है- ग s म(तीव्र) ध नी सां s नी ध नी ध, म(तीव्र) ग, ग म(तीव्र) ध ग म(तीव्र) ग, रे(कोमल) सा। यह चंचल प्रवृत्ति का राग है। श्रृंगार के विरह पक्ष की सार्थक अनुभूति कराने में यह राग समर्थ है। राग सोहनी, कर्नाटक पद्यति के राग हंसनन्दी के समतुल्य है। यदि राग हंसनन्दी में शुद्ध ऋषभ का प्रयोग किया जाए तो यह ठुमरी अंग के राग सोहनी की अनुभूति कराता है। तंत्रवाद्य पर राग मारवा, पूरिया और सोहनी का वादन अपेक्षाकृत कम किया जाता है।

राग सोहनी के खयाल और ठुमरी अंग की अनुभूति के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, युवा संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ के स्वरों में एक कर्णप्रिय रचना प्रस्तुत करेंगे। उस्ताद राशिद खाँ रामपुर सहसवान घराने की गायकी के संवाहक हैं। उस्ताद राशिद खाँ इस घराने के संस्थापक उस्ताद इनायत हुसैन खाँ के प्रपौत्र हैं। उन्होने अपने नाना उस्ताद निसार हुसैन खाँ से गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत संगीत की विधिवत शिक्षा ग्रहण की है। आइए, प्रतिभा के धनी गायक उस्ताद राशिद खाँ से सुनते हैं, राग सोहनी की यह आकर्षक रचना। आप राग सोहनी का आनन्द लीजिए और मुझे आज इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग – सोहनी : ‘देख वेख मोरा जिया ललचाए....’ : उस्ताद राशिद खाँ : ताल - तीनताल





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 195वें अंक की पहेली में आज हम आपको फिर एक बार लगभग छः दशक पुरानी एक फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 200वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का और सभी पाँच श्रृंखलाओं में सर्वाधिक अंक पाने वाले प्रतिभागी को वर्ष 2014 का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – यह रचना किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 29 नवम्बर, 2014 को मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 197वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 193वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘बसन्त बहार’ के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बसन्त बहार और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल द्रुत एकताल। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम भारतीय शास्त्रीय संगीत के विद्वानों द्वारा फिल्मों के लिए गाये गए गीतों पर चर्चा कर रहे हैं। वर्ष 2015 से ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखलाओं के बारे में हमे अनेक पाठकों और श्रोताओ के बहुमूल्य सुझाव प्राप्त हो रहे हैं। इन सभी सुझाव पर विचार-विमर्श कर हम नये वर्ष से अपनी प्रस्तुतियों में आवश्यक संशोधन करने जा रहे हैं। यदि आपने अभी तक अपने सुझाव और फरमाइश नहीं भेजी हैं तो आविलम्ब हमें भेज दें। अगले रविवार 30 नवम्बर, 2014 को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

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