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Wednesday, January 21, 2009

सुनिए और बूझिये कि आखिर कौन है दिल्ली ६ की ये मसकली

सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (9) स्लमडॉग विशेषांक

स्लम डॉग ने रचा इतिहास
इस सप्ताह की ही नही इस माह की सबसे बड़ी संगीत ख़बर है ऐ आर रहमान का गोल्डन ग्लोब जीतना. आज का ये एपिसोड हम इसी बड़ी ख़बर को समर्पित कर रहे हैं. जिस फ़िल्म के लिए ऐ आर को ये सम्मान मिला है उसका नाम है स्लम डॉग मिलेनिअर. मुंबई के एक झोंपड़ बस्ती में रहने वाले एक साधारण से लड़के की असाधारण सी कहानी है ये फ़िल्म, जो की आधारित है विकास स्वरुप के बहुचर्चित उपन्यास "कोश्चन एंड आंसर्स" पर. फ़िल्म का अधिकतर हिस्सा मुंबई के जुहू और वर्सोवा की झुग्गी बस्तियों में शूट हुआ है. और कुछ कलाकार भी यहीं से लिए गए हैं. नवम्बर २००८ में अमेरिका में प्रर्दशित होने के बाद फ़िल्म अब तक ६४ सम्मान हासिल कर चुकी है जिसमें चार गोल्डन ग्लोब भी शामिल हैं. फ़िल्म दुनिया भर में धूम मचा रही है,और मुंबई के माध्यम से बदलते हिंदुस्तान को और अधिक जानने समझने की विदेशियों की ललक भी अपने चरम पर दिख रही है. पर कुछ लोग हिंदुस्तान को इस तरह "थर्ड वर्ल्ड" बनाकर दुनिया के सामने प्रस्तुत करने को सही भी नही मानते. अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि फ़िल्म इसलिए पसंद की जा रही है क्योंकि विकसित देश भारत का यही रूप देखना चाहते हैं. पर लेखक विकास स्वरुप ऐसा नही मानते. उनका कहना है कि फ़िल्म में स्लम में रहने वालों को दुखी या निराश नही दिखाया गया बल्कि उन्हें ख़ुद को बेहतर बनाने और अपने सपनों को सच करने की कोशिश करते हुए दिखाया गया है, यही उभरते हुए भारत की सच्चाई है. फ़िल्म में एक दृश्य है जहाँ नायक का बड़ा भाई उसे वो इलाका दिखाता हुए कहता है जहाँ कभी उनकी झुग्गी बस्ती हुआ करती थी और जहाँ अब गगनचुम्भी इमारतें खड़ी है,कि -"भाई आज इंडिया दुनिया के मध्य में है और मैं (यानी कि एक आम भारतीय) उस मध्य के मध्य में..." यकीनन ये संवाद अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है. बहरहाल हम समझते हैं कि ये वक्त बहस का नही जश्न का है. जब "जय हो" और "रिंगा रिंगा" जैसे गीत अंतर्राष्ट्रीय चार्ट्स पर धूम मचा रहे हों, तो शिकायत किसे हो. अमूमन देखने में आता है कि गोल्डन ग्लोब जीतने वाली फिल्में ऑस्कर में भी अच्छा करती हैं, तो यदि अब हम आपके लिए रहमान के ऑस्कर जीतने की ख़बर भी लेकर आयें तो आश्चर्य मत कीजियेगा



जिक्र उनका जो गुमनाम ही रहे

बात करते हैं इस फ़िल्म से जुड़े कुछ अनजाने हीरोस की. रहमान ने अपने इस सम्मान को जिस शख्स को समर्पित किया है वो हैं उनके साउंड इंजिनीअर श्रीधर. ४ बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित श्रीधर, रहमान के साथ काम कर रहे थे उनकी पहली फ़िल्म "रोजा" से, जब स्लम डॉग बन कर तैयार हुई श्रीधर ने रहमान का धन्येवाद किया कि उन्होंने उनका नाम एक अंतर्राष्ट्रीय एल्बम में दर्ज किया, दिसम्बर २००८ में श्रीधर मात्र ४८ वर्ष की आयु में दुनिया को अलविदा कह गए और उस अद्भुत लम्हें को देखने से वंचित रह गए जब रहमान ने गोल्डन ग्लोब जीता. पर रहमान ने अपने इस साथी के नाम इस सम्मान को कर इस अनजाने हीरो को अपनी श्रद्धाजन्ली दी. इसी तरह के एक और गुमनाम हीरो है मुंबई के राज. जब निर्देशक डैनी बोयल से पूछा गया कि यदि उन्हें २ करोड़ रूपया मिल जायें तो वो क्या करेंगे, तो उनका जवाब था कि वो अपने पहले सह निर्देशक (फ़िल्म के)जो कि राज हैं को दे देंगें, दरअसल राज पिछले कई सालों से मुंबई के गरीब और अनाथ बच्चों के लिए सड़कों पर ही चलते फिरते स्कूल चलाते हैं और उनकी निस्वार्थ सेवा भाव ने ही डैनी को इस फ़िल्म के लिए प्रेरित किया, चूँकि उनका इन बच्चों के संग उठाना बैठना रहता है फ़िल्म के बेहतर बनाने में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है. राज जैसे लोग आज के इस नए हिंदुस्तान की ताक़त है. जिनका जज्बा आज दुनिया देख रही है.


तन्वी शाह की खुशी का कोई ठिकाना नही

स्लम डॉग के लिए "जय हो" गीत गाने वाली चेन्नई की तन्वी शाह आजकल हवाओं से बात कर रही है. मात्र एक गाने ने उन्हें अन्तराष्ट्रीय स्टार बना दिया है. उनके फ़ोन की घंटी निरंतर बज रही है, और इस युवा गायिका के कदम जमीं पर नही पड़ रहे हैं...क्यों न हो. आखिर जय हो ने वो कर दिखाया है जिसका सपना हर संगीतकर्मी देखता है. तन्वी ने कभी अपनी आवाज़ कराउके रिकॉर्डिंग कर अपने एक दोस्त को दी थी, जिसकी सी डी किसी तरह रहमान तक पहुँच गई. और वो इस तरह "होने दो दिल को फ़ना..."(फ़िल्म-फ़ना) की गायिका बन गई. स्लम डॉग से पहले उन्होंने अपनी आवाज़ का जादू "जाने तू...", "गुरु" और "शिवाजी" जैसी फिल्मों के लिए भी ऐ आर के साथ गा चुकी है....पर कुछ भी कहें "जय हो" को बात ही अलग है.


मिलिए दिल्ली ६ की इस मसकली से

देसी पुरस्कारों में भी रहमान की ही धूम है हाल ही में संपन्न स्क्रीन अवार्ड में रहमान को जोधा अकबर के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार चुना गया. वहीँ फ़िल्म "बचना ऐ हसीनों" के गीत "खुदा जाने..." के लिए इस गीत के गायक (के के), गायिका (शिल्पा राव) और गीतकार अन्विता दास गुप्तन को भी पुरस्कृत किया गया है. इस सप्ताह से हम आपको साप्ताहिक सुर्खियों के साथ साथ एक चुना हुआ सप्ताह का गीत भी सुनवायेंगे. इस सप्ताह का गीत है आजकल सब की जुबां पर चढा हुआ फ़िल्म दिल्ली ६ का - "मसकली....". क्या आप जानते हैं कि कौन है ये "मसकली", मसकली नाम है दिल्ली ६ के एक कबूतर का, जिसके लिए ये पूरा गीत रचा गया है...फ़िल्म के प्रोमोस देख कर लगता है कि राकेश ने "रंग दे बसंती" के बाद एक और शानदार प्रस्तुति दी है...पर फिलहाल तो आप आनंद लें मोहित चौहान (डूबा डूबा फेम) के गाये और प्रसून जोशी के अनोखे मगर खूबसूरत शब्दों से सजे इस लाजवाब गीत का -




Tuesday, January 13, 2009

गोल्डन ग्लोब ए आर रहमान ने कहा "करोड़ों भारतीयों" को सलाम


बात सन् ९६ की है। ४ सालों से बिना रूके, बिना थके फिल्मों में म्युजिक देने के बाद रहमान कुछ अलग करना चाहते थे। दीगर बात है कि कलाकार सीमाओं में अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे पाता और फिल्मों में संगीत देना सीमा में बँधने जैसा हीं है। निर्माता-निर्देशक,कहानी-पटकथा सबकी बात सुननी होती है।तो हुआ यूँ कि स्क्रीन अवार्ड्स के लिए रहमान मुंबई आए हुए थे और एक होटल में ठहरे थे। अचानक उन्हें कुछ ख्याल आया और उन्होंने अपने बचपन के दोस्त जी० भरत को तलब किया। जी० भरत यानि भरत बाला ने रहमान के साथ लगभग १०० से ज्यादा जिंगल्स पर काम किया था। रहमान और भरत के बीच संगीत पर चर्चा हुई। बातों-बातों में उन दोनों ने अपने अगले एलबम का प्लान कर लिया। उसी साल अंतर्राष्ट्रीय ख्याति-लब्ध म्युजिक कंपनी "सोनी म्युजिक" का भारतीय संगीत-उद्योग में आना हुआ । सोनी भारतीय कलाकारों को प्रोत्साहित करने के बहाने बाज़ार में पाँव जमाना चाहती थी। सोनी के मैनेजिंग डायरेक्टर "विजय सिंह" के दिमाग में जिस पहले बंदे का नाम आया वह थे ए०आर० रहमान । सोनी ने रहमान के साथ तीन कैसेट्स का अनुबंध किया। रहमान ने भरत बाला के साथ जिस प्रोजेक्ट की चर्चा की थे, उसे उन्होंने सोनी म्युजिक के साथ भी शेयर किया। सोनी को उन दोनों का आयडिया अच्छा लगा और इस तरह रहमान के गैर-फिल्मी एलबम पर काम शुरू हो गया। दर-असल "रोजा" के "भारत हमको जान से प्यारा है" के बाद रहमान किसी देशभक्ति गाने या फिर पूरे एलबम पर काम करना चाहते थे। समय भी माकूल था। अगले हीं साल भारत की आज़ादी की ५०वीं सालगिरह मननी थी। लेकिन एम०टी०वी० के दौर के युवाओं को "वन्दे मातरम्" या फिर "जन गण मन" कितना लुभाता इसका संदेह था। रहमान ने इन दोनों ऎतिहासिक गानों से अलग कुछ रचने का विचार किया। तिरंगा के "तीन रंगों" को परिभाषित करते तीन गाने बन कर तैयार हो गए। "केसरिया" को ध्यान में रखकर जो गाना बनाया गया वह आज तक बच्चे-बच्चे की जुबान पर बैठा है। इसी गाने में पहली बार "रहमान" कैमरे के सामने आए थे। बड़ी-बड़ी लटों के बीच साधारण से नैन-नक्श लेकिन गज़ब के तेज वाले उस चेहरे को कौन भूल सकता है, जो जब हवा में हाथ उठाकर "माँ तुझे सलाम" का आलाप लेता था, तो लगता था मानो हवाएँ थम गई हैं। जी हाँ महबूब के लिखे इस गाने ने देशभक्ति की एक नई लहर पैदा कर दी। रहमान यहीं पर नहीं थमे। "सफेद" रंग के लिए "रिवाईवल- वंदे मातरम्" को तैयार किया गया। नुसरत फतेह अली खान साहब के साथ रहमान के गाए गाने "गु्रूज़ औफ पीस" की बात हीं अलहदा है। "हरे" रंग को भूषित करता और विश्व-शांति का उपदेश देता यह गाना खुद में अनोखा इसलिए भी है क्योंकि संगीत के दो महारथी पहली मर्तबा इस गाने में साथ आए। कहा जाता है कि "सोनी" ने रहमान को छूट दी थी कि वह किसी भी अंतर्राष्टीय फ़नकार को आजमा सकते हैं,यहाँ तक कि "सेलिन डिओन" का नाम भी सुझाया गया था। लेकिन रहमान ने "खान साहब" को हीं चुना। इस बाबत रहमान का कहना था कि "मैं नाम के साथ काम करना नहीं चाहता। मैं चाहता हूँ कि उस कलाकार के साथ काम करूँ, जिसके काम के साथ मैं जुड़ाव महसूस करूँ। मैने बहुत सारे ऎसे गठजोड़ ( कोलेबोरेशन्स) देखे हैं जहाँ तेल और पानी के मिलने का बोध होता है। मैं ऎसा कतई नहीं चाहता।" रहमान का यही विश्वास "माँ तुझे सलाम" को बाकी देशभक्ति गानों से अलग करता है।

तो लीजिए हम आपको सुनाते हैं,रहमान का संगीत-बद्ध और स्वरबद्ध किया "माँ तुझे सलाम"-



कुछ बातें ऎसी होती हैं,जिन्हें सुनकर हँसी भी आती है, गुस्सा भी आता है और कुछ ओछी मानसिकता वाले लोगों पर तरस भी आता है। "वन्दे मातरम्" की रीलिज के बाद कुछ कट्टरपंथियों ने रहमान को जान से मारने की धमकी दे डाली। ये कट्टरपंथी दोनों फिरकों के थे- हिन्दु भी और मुस्लिम भी। हिन्दुओं ने रहमान पर "एक हिन्दु गाने का अपमान करने का" आरोप लगाया तो वहीं मुसलमानों ने "गैर-इस्लामिक गाने को स्वरबद्ध करने का" । रहमान फिर भी अपने पक्ष पर अडिग रहे। उनका कहना था कि "महज़ संस्कृत में होने से गाना हिन्दुओं का या फिर गैर-इस्लामिक नहीं हो जाता। इस गाने में माँ को पूजने की बात कही गई है, धरती माँ की इबादत की गई है और कौन-सा धर्म माँ और मातृभूमि की पूजा नहीं करता या फिर पूजने से मनाही करता है।" एक फ़नकार से मज़हब की बात करना कितना शर्मनाक है इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। रहमान अपनी जगह सही थे और उन्होंने किसी की भी दबाव में आए बिना माँ और मातृभूमि के कदमों में सज़दे करना ज़ारी रखा। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है ५०वें गणतंत्र दिवस पर आया "जन गण मन" जिसमें देश के लगभग २५ गणमान्य संगीत-शिरोमणियों ने उनका साथ दिया। संगीत से मातृभूमि की ऎसी सेवा शायद हीं किसी ने की हो।

ए०आर०रहमान और माईकल जैक्शन को एक मंच पर कल्पना करना कईयों के लिए नामुमकिन होगा, लेकिन अक्टूबर १९९९ की वह रात इस कल्पना को हकीकत में बदलने के लिए काफी थी। कोरियोग्राफर्स "शोभना" और "प्रभुदेवा" के साथ "माईकल जैक्शन एंड फ्रेंड़्स कोंसर्ट" में "रहमान" को आमंत्रित किया गया था। रहमान ने जो गाना वहाँ गया था, उसके बोल थे "एकम् नित्यम्" । इस गाने के आधे बोल संस्कृत में थे तो आधे अंग्रेजी में। रहमान ने गाने के चुनाव से साबित कर दिया था कि "भारतीय संस्कृति" उनके दिल में किस कदर बसी हुई है। यह कंसर्ट रहमान के विदेशी साझेदारियों के मार्फत बस पहला कदम था इसके बाद रहमान की झोली में ऎसे कई सारे प्रोजेक्ट्स आते गए। "बॉम्बे" के "बॉम्बे थीम्स" से प्रेरित होकर "म्युजिकल थियेटर कम्पोज़र" एंड्र्यु ल्वायड वेबर ने रहमान के साथ "बॉम्बे ड्रीम्स" नाम के म्युजिकल प्ले पर काम किया। यह कार्यक्रम बेहद सफल साबित हुआ और विश्व मंच पर रहमान के संगीत को वाहवाही मिली। ऎसे हीं "लौड औफ द रिंग्स" के म्युजिकल एडेपटेशन को रहमान ने फीनलैंड के फोक म्युजिक बैंड "वार्तिना" के साथ मिल्कर संगीत से सुसज्जित किया और धुनों की छ्टा बिखेर दी।जानकारी के बता दूँ कि "लौड औफ द रिंग्स" ब्रिटिश लेखक "जे०आर०आर० टाल्किन" का मशहूर उपन्यास है, जिसपर इसी नाम से फिल्म भी बन चुकी है। शेखर कपूर के "लार्जर दैन लाईफ" फिल्म "एलिजाबेथ" को रहमान ने अपने संगीत से मुकम्मल किया। रहमान की धुनों को "इनसाईड मैन", "लौड औफ वार", "द एक्सिडेंटल हसबेंड" में भी इस्तेमाल किया गया है।

रहमान को सही मायने में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति तब मिली, जब २००३ में आई मैंडरिन/जापानी भाषा की फिल्म "वैरियर्स औफ हेवेन एंड अर्थ"। इस फिल्म के सभी गाने रहमान ने तैयार किये, यहाँ तक कि पार्श्व-संगीत भी रहमान का हीं था। २००४ में यह फिल्म इंग्लिश डब होकर आई और तब इसके गाने सबकी जुबान पर चढ गए। ताईवानी गायिका "जोलिन स्वाई(साई ई लिन)" के गाये मैडरिन भाषा के गाने "वैरियर्स इन पिस" को इंग्लिश में गाया युवा की "खुदा हाफिज़" फेम "सुनीता सारथी" ने तो हिंदी में गाया "साधना सरगम" ने। आंग्ल-भाषा में बोल लिखे थे "ब्लाज़े" ने तो हिंदी के बोल थे "महबूब" के। मैंडरिन भाषा के इस फिल्म के गाने फिल्म की रीलिज के बाद "बिटविन हेवेन एंड अर्थ" नाम से अलग से रीलिज किए गए।

तो लीजिए सुनिए साधना सरगम की आवाज़ में यह गाना

लगभग १०० से भी ज्यादा फिल्मों में संगीत दे चुके एवं "पद्म-श्री" से सम्मानित ए०आर०रहमान को कल हीं गोल्डेन ग्लोब से नवाज़ा गया है। गुलज़ार साहब द्वारा कलमबद्ध किये और सुखविंदर सिंह की आवाज़ से सजे "जय हो" के लिए रहमान को यह सम्मान दिया गया। किसी भी भारतीय के लिए यह पहला "गोल्डेन ग्लोब" है। यह बात शायद हीं किसी को पता हो कि "जय हो" वास्तव में "युवराज" के लिए तैयार किया गया था। "गुलज़ार" इस सिलसिले में कहते हैं- "मैने एक गाना (आजा आजा जिंद शामियाने के तले, आजा ज़री वाले नीले आसमान के तले) युवराज के लिए लिखा था, लेकिन कुछ कारणो इसे फिल्म में शामिल नहीं किया जा सका। बाद में रहमान ने जब "स्लमडौग मिलिनिअर" की चर्चा की और कहा कि उस फिल्म में एक सिचुएशन है जहाँ यह गाना इस्तेमाल हो सकता है तो सुभाष जी ने इस गाने को देने के लिए हामी भर दी और दखिए कि यह गाना कहाँ से कहाँ पहुँच गया।" सुभाष घई इस गाने को गंवाने से तनिक भी विचलित नहीं दिखते । उन्हैं के शब्दों में- "यह गाना ज़ायेद खान पर फिल्माया जाना था, लेकिन मुझे ज़ायेद के हरफनमौला कैरेक्टर के सामने यह गाना थोड़ा सोफ्ट महसूस हुआ इसलिए मैने रहमान और गुलज़ार साहब को दूसरा गाना गढने को कहा। जहाँ तक इस गाने की प्रसिद्धि का सवाल है तो अच्छा लगता है जब अंग्रेजी बोलने वाली जनता बिना अर्थ जाने एक हिन्दी गाना गुनगुनाती है।" रहमान ने इस गाने के लिए गोल्डेन ग्लोब के अलावा और भी कई अवार्ड जीते हैं, जिनमे क्रिटिक च्वाईस प्रमुख है। वैसे यह माना जाता है कि क्रिटिक च्वाईस एवं गोल्डेन ग्लोब ओस्कर के पहले की सीढी है। इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि रहमान औस्कर से ज्यादा दूर नहीं है। हम तो यही दुआ करेंगे कि रहमान औस्कर जीतें और पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन करें।

"स्लमडौग मिलिनिअर" के डायरेक्टर डैनी बोयल ने रहमान की क्या तारीफ की.आप भी सुनें

अंत में कुछ महान हस्तियों के शब्द रहमान के विषय में-

तमिल कवि वैरामुथु- मैं शब्दों का हीं काम करता हूँ और एक प्रतिष्ठित कवि माना जाता हूँ, फिर भी मेरे पास रहमान का वर्णन करने के लिए कोई शब्द नहीं है। रहमान एक साधारण संगीतकार नहीं, बल्कि संगीत को खुदा की देन है। कोई भी संगीतकार जब धुन बनाता है, तो उसे चिन्ता होती है कि धुन श्रोताओं पर असर करेगी या नही, लेकिन रहमान की मान्यता है कि अगर कोई धुन दिल से और सच्चाई से बनाई गई है तो धुन जरूर हीं सफ़ल होगी। इसी लगन की वज़ह से रहमान का हर गाना दिल को छू जाता है।

गुलज़ार- भारतीय फिल्म संगीत में रहमान एक मील के पत्थर से कम नहीं है। उन्होंने अकेले अपने दम पर भारतीय संगीत की दिशा और दशा बदल दी है। मुखरा-अंतरा के पुराने ढर्रे पर न चलते हुए रहमान ने कई सारे नए फोरमेट्स बनाए हैं। मुक्त छंदों (फ्री वर्स) को धुन में पिरोना आसान नहीं होता, लेकिन रहमान यह काम भी आसानी से कर जाते हैं।

गीतकार महबूब- अगर दुनिया में ऎसा कोई खुदा का बंदा है, जिसे मैं खुदा की तरह पूजता हूँ तो वह बस एक हीं है- रहमान। वह मेरे लिए मेरा परिवार है, मेरा भाई है। मैं उसकी इतनी इज़्ज़त करता हूँ कि मेरे पास उस प्रशंसा/चाहत को शब्द देने के लिए शब्द नहीं हैं।

एस०पी०बालासुब्रमण्यम- आज के संगीत में वेराईटी लाने वाला बस एक हीं इंसान है- ए०आर०रहमान।

जावेद अख्तर- मेरे अनुसार रहमान आल-राउंडर हैं। वे इंडियन क्लासिकल म्युजिक जानते है, कर्नाटिक म्युजिक से उनका लगाव है, इंडियन फोक म्युजिक पर भी बराबर पकड़ है, उन्होंने लंदन के ट्रीनिटी कालेज आफ म्युजिक से वेस्टर्न क्लासिकल म्युजिक की पढाई की है, उन्हें मध्य-पूर्वी (मिड्ल ईस्ट) संगीत का भी ज्ञान है। यही कारण है कि उनके गीतों में सभी रंगों के दर्शन होते हैं। उन्होंने संगीत एवं ध्वनि को एक नया आयाम दिया है। वे बेहद लगनशील है और बस अपने काम से मतलब रखते हैं। इतनी सफलता के बाद भी उनमें ज़र्रा-भर भी गुरूर नहीं है और यही एक सफ़ल इंसान की पहचान है।

एंड्र्यु ल्वायड वेबर- I think he has an incredible tone of voice. I have seen many Bollywood films, but what he manages to do is quite unique--he keeps it very much Indian. For me as a Westerner, I can always recognize his music because it has got a rule tone of voice of its own. It's very definitely Indian, yet it has an appeal which will go right across the world. He will hit the West in an amazing kind of way; that is, if he is led in the right way. He is the most extraordinary' composer who is still true to his cultural roots, ' and deserves to be heard by an international public.

रंगीला की रिकार्डिंग से जुड़ा एक किस्सा सुनिये ताई "आशा भोंसले" के शब्दों में-



रहमान के प्रति और भी लोगों का मत जानने को यहाँ जाएँ-

और अब देखिये वो यादगार लम्हा जिसे हर भारतीय संगीत प्रेमी बरसों तक नही भूलना चाहेगा, सुनिए किस तरह रहमान ने अपना सम्मान दुनिया भर में फैले भारतीयों को समर्पित किया -



गोल्डेन ग्लोब के लिए रहमान को पुनश्च शुभकामनाएँ। आस्कर में बस अब डेढ महीने बचे हैं। खुदा करे कि आस्कर के जरिये रहमान भारत का नाम आसमान की बुलंदियों तक ले जाने में सफल हों।
आमीन!!!!!!


सुनिए स्लमडॉग मिलियनेयर के सभी गीत-



चित्र में उपर - बाल रहमान (सौजन्य ARR फैन्स अधिकारिक साईट), नीचे - रहमान अपने स्टूडियो में
इस शृंखला की अन्य कडियाँ भी यहाँ और यहाँ पढ़ें.


प्रस्तुति - विश्व दीपक "तन्हा"

Sunday, January 4, 2009

"हौले हौले" से "जय हो"...- सुखविंदर सिंह का जलवा

सुनिए गोल्डन ग्लोब के लिए नामांकित फ़िल्म स्लमडोग मिलनिअर का जबरदस्त गीत "जय हो..."

आवाज़ के टीम और श्रोताओं ने मिल कर जिस गीत को साल २००८ का सरताज गीत चुना वो है फ़िल्म "रब ने बना दी जोड़ी" का "हौले हौले..." . हौले हौले से जादू बिखेरने वाले इस गीत को गाया है "छैयां छैयां" से रातों रातों सुपर सिंगर बने सुखविंदर सिंह ने. तब से अब तक हर साल सुखविंदर अपने किसी न किसी गीत के माध्यम से टॉप सूची में रहते ही हैं. जहाँ इसी साल फ़िल्म टशन में उनका गाया "दिल हारा रे..." भी हमारी सूची में अपनी जगह बनने में कामियाब रहा वही बीते सालों पर नज़र डालें तो "दर्द-ऐ-डिस्को", "चक दे इंडिया" और ओमकारा के शीर्षक गीत के अलावा इसी फ़िल्म का "बीडी जलाई ले" खासा लोकप्रिय हुआ था. पर कई मायनों में अगर हम देखें तो "हौले हौले" उनकी परिचित शैली से बिल्कुल अलग तरह का गीत है और पहली बार सुनने पर यकीं ही नही होता कि ये वाकई सुखविंदर का गीत है.


और अब हॉलीवुड के सबसे बड़े निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग की फ़िल्म के लिए भी वो गा रहे हैं. ख़ुद सुखविंदर के शब्दों में "स्टीवन स्पीलबर्ग की टीम ने मुझसे संपर्क किया और ये गीत गाने की गुजारिश की, ये एक पारंपरिक लोक गीत है जो कच्छ गुजरात की मिटटी का है और ये गीत जीवन के उत्सव की बात करता है, वैसे मेरा हॉलीवुड कनेक्शन तो "स्लमडोग मिलनिअर" से ही शुरू हो चुका था जहाँ मैंने रहमान जी का स्वरबद्ध किया और गुलज़ार जी का लिखा "जय हो" गीत गाया था. ये गीत मेरा ख़ुद का बहुत पसंदीदा है, मैं जब भी इसे सुनता हूँ, मुस्कुराने लगता हूँ..."

गौरतलब है कि रहमान को इसी फ़िल्म के लिए गोल्डन ग्लोब का नामांकन मिला है. रहमान के बारे में सुखविंदर कहते हैं -"वो एक जीनिअस हैं जिन्होंने भारतीय संगीत को विश्व मंच दिया है. स्वभाव से भी वो बहुत शांत और जमीन से जुड़े हुए इंसान हैं, उन्हें कविता से प्रेम है और वह शख्स संगीत खाता है संगीत पीता है और संगीत से ही साँस लेता है, उनके रोम रोम में संगीत है और उनके जेहन में दिन रात बस संगीत का जनून छाया रहता है..."

बहरहाल इस नए साल में हम सब तो यही चाहेंगें कि रहमान साहब अपनी इस फ़िल्म के लिए गोल्डन ग्लोब जीते. ये भारतीय संगीत के लिए एक बड़ी घटना होगी. सुखविंदर भी इस साल अपने नए गीतों से हम सब को चकित करते रहें. आने वाली फ़िल्म "बिल्लू बार्बर" में उनके गाये गीत श्रोता जल्दी ही सुनेंगें, फिलहाल हम आपको सुनवाते हैं, गोल्डन ग्लोब के लिए नामांकित फ़िल्म "स्लमडोग मिलनिअर" से सुखविंदर का गाया गीत "जय हो...". कहते हैं जीनिअस के काम पहली बार में कम समझ आता है, पर हमारे शब्दों पर यकीन करें इस गीत को धैर्य के साथ ४-५ बार सुनें और अगर इसका जादू आपके सर चढ़ कर न बोले तो कहियेगा. तो सुनिए और दुआ कीजिये कि "जय हो" हमारे संगीत कर्णधारों की विश्व मंच पर भी.



Sunday, December 21, 2008

कहाँ है जरुरत रीमिक्स गीतों की...

सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (7)

ऐ आर आर ने फ़िर किया करिश्मा

ऐ आर रहमान ने फ़िर ये कर दिखाया. ब्रिटिश निर्देशक डैनी बोयले की फ़िल्म "स्लम डोग मिलेनियर" के लिए उनके संगीत को अंतर्राष्ट्रीय प्रेस एकेडमी का सेटालाइट पुरस्कार प्राप्त हुआ है. फ़िल्म पूरी तरह से मुंबई में शूट हुई है और एक साधारण सी बस्ती में रहने वाले १८ साल के अनाथ लड़के की एक "गेम शो" में भाग लेकर करोड़पति बनने की बेहद दिलचस्प कहानी कहती है. सर्वश्रेष्ठ संगीत के आलावा फ़िल्म ने सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार भी जीता है. गौरतलब है कि रहमान का ये संगीत गोल्डन ग्लोब पुरस्कार के लिए भी नामांकित हुआ है. वहां भी अपने रहमान बाज़ी मारे हम तो यही कामना करेंगें.


कुछ ख़ास है नेहा में


एक संगीत चैनल की विजेता रही और पूर्व "वीवा" बैंड की गायिका नेहा इन दिनों बेहद खुश है. फ़िल्म "फैशन" के लिए उनका गाया गीत "कुछ ख़ास है..." बेहद चर्चा में जो है आजकल. और इसी के साथ दिल्ली की कुडी नेहा भासिन का संगीत कैरियर अब उठान पकड़ चुका है. ओनिर कि अगली फ़िल्म "किल छाबरा" के लिए भी वो गा रही हैं संगीतकार गौरव दयाल के निर्देशन में. पर नेहा अभी भी तलाश में है उस जबरदस्त गीत की जो उन्हें शिखर तक ले जाए. वो दिन भी दूर नही हैं ....नेहा..


रीमिक्स गुरु अकबर सामी की वापसी

रीमिक्स गीतों की हमें क्यों जरुरत पड़ती है. जब कोई संगीतकार किसी फ़िल्म या एल्बम के लिए गीत बनाते हैं तो वो वाध्य यंत्रों का पार्श्व में केवल उसी मात्रा में इस्तेमाल करते हैं जिससे कि बोलों की सरलता, धुन की तरलता और आवाज़ की मधुरता बनी रही और वाध्यों के शोर में कहीं गीत की आत्मा खो न जाए. पर बदलते समय में सोशल पार्टियाँ लोगों के व्यस्त जीवन से एक राहत का काम कर रही हैं. अब इन पार्टियों में लोगों को झूमने और नाचने के लिए भी संगीत चाहिए. इसी उद्देश्य से रीमिक्स और DJ परम्परा की शुरुआत हुई. जहाँ गीत वही लिए जाते हैं जो लोगों ने सुने हुए होते हैं ताकि नाचने वालों को कुछ भाव मिल सके और संगीत में कुछ अतिरिक्त पर्कशन और जोड़ तोड़ का तड़का लगा कर लोगों को नचाने का प्रबंध किया जाता है. अब ये कितना सही है कितना नही इसका फैसला हम आप पर छोड़ते हैं वैसे झूमने और नाचने के लिए कुछ ऐसे देसी गीत भी होते हैं जिनको हम शायद भूल से गए हैं...खैर तो बात रीमिक्स गीतों की हो रही थी, यहाँ ये भी बहुत ज़रूरी है कि किन गीतों को रीमिक्स के लिए इस्तेमाल किया जाए...पर फिलहाल यहाँ इस प्रकार की कोई चुनाव प्रक्रिया मौजूद नही दिखती है तभी तो कुछ बेहद दर्द भरे संवेदनशील गीतों का बेहद फूहड़ तरीके से रीमिक्स कर मार्किट में उतरा जाता है. भारत में इस परम्परा के गुरु रहे डी जे अकबर सामी ने बरसों पहले जब अपना रीमिक्स एल्बम "जलवा" प्रस्तुत किया था तब इस बात की जरुरत की तरफ़ इशारा किया था. एक लंबे अंतराल ९लग्भग ५ साल) के बाद सामी लौटे है अपने नए रीमिक्स एल्बम "जलवा रिटर्न्स" के साथ. एक बार फ़िर आर डी के हिट गीतों को इस एल्बम में शामिल किया गया है. रीमिक्स के शौकीन अपनी पार्टियों के लिए इसे खरीद सकते हैं. बाकी संगीत प्रेमियों के लिए मूल गीत तो है ही....

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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